• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

मेरा पता कोई और है /कविता

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
S

StoryPublisher

Guest
मेरा पता कोई और है /कविता

धूप कमरे की खिड़की से घुस कर उसके शिथिल बदन से अठखेलियाँ करने लगी थी। उसकी किरणें उसका सारा ताप सारी थकन हरे ले रहा था। शरीर, मन सब जैसे हल्का हुआ जा रहा हो। अब उसकी नर्म गर्मी उसे सहलाती, छेड़ती, अंतत: परेशान करने लगी थी। वह थोड़ा सा खिसक लेती, वह थोड़ी दूर और फैल जाता। वह थोड़ा और खिसकती वह थोड़ा और फैलता... जैसे उसके इस आलस से उसे चिढ़ हो रही हो।

नंदिता अभी तक उस बिस्तर से चिपकी पड़ी थी; सुबह के साढ़े नौ हो जाने तक। वसीम को यहाँ से निकले हुए लगभग डेढ़ घंटे हो चुके थे और प्रो. हनीफ कई दिनों से घर आए ही नही थे। घर, हाँ अगर उसे वो घर की संज्ञा से नवाजते हों तो... यों उनका आना न आना हमेशा उनकी मर्जी से ही होता है और उसने कभी कोई प्रतिवाद या प्रतिरोध नहीं किया। उसके लिए यही कम नही था कि प्रो. हनीफ से उसका कोई रिश्ता था। जायज-नाजायज ये शब्द बड़े दुनियावी और तुच्छ थे उस रिश्ते के आगे... उसकी गहराइओं-ऊँचाइयों को छूने के लिए।

यहाँ कोई प्रश्न-प्रतिप्रश्न नहीं था और उत्तरों की श्रृंखला भी नहीं थी, न जवाबदेही ही। प्रो. हनीफ इसी से टिक पाते थे इस घर और रिश्ते पर... वह कृतार्थ हो लेती थी।

उसने कभी सोचा भी नहीं था प्रो. हनीफ की ऊँचाइयों को अपने कंधे से माप सकेगी; वे आकाश-कुसुम थे उसके लिए और वह आकाश-कुसुम अब उसकी झोली में था। वह यकीन करने की खातिर अब भी जब-तब टटोल लेती है अपना दामन। उस रिश्ते की छुअन, उसकी गर्मी क्या मौजूद है वहाँ... वह किसी स्वप्न को तो नहीं जी रही...? उनके टँगे कपड़ों को वह आलमारी में टटोल आती है... टटोलने से याद आता है उसे, उनके गंदे कपड़े अभी धुलने को नहीं गए हैं। आज तो दे ही देना होगा उसे। वह अपनी अस्वस्थता -जन्य आलस को छोड़ चेतन होने लगती है। एक दिन और कितने-कितने तो काम... सामने थीसिस के पन्ने पड़े हैं अस्त-व्यस्त। वह उन्हें तरतीब से फाइल-बंद करके रख लेती है।

पता नहीं आगे कब...

वक्त मुट्ठी से फिसलता जा रहा है चुपचाप। पर उसे वक्त का यूँ बीतना पता ही नहीं चल पाता। उसकी जिंदगी के तो उतने ही दिन बीतते हैं; उतने ही दिन जीती है वह जितने दिन हनीफ उसके साथ होते हैं। शेष दिन प्रतीक्षा और सिर्फ प्रतीक्षा में। हनीफ टोकते हैं उसे अक्सर, ऐसे कैसे बिता देती हो सारा समय। कुछ तो पढा-लिखा करो। थीसिस वहीं की वहीं अटकी पड़ी है। कैसे कटता है तुम से सारा का सारा वक्त।

वह उनके नाक से उतरते चश्मे को फिर से नाक पर चढ़ाती हुई कहती है - 'आपकी याद में।'

'भाड़ में जाए यह याद। पढ़ाई-लिखाई...'

वह छोटे बच्चे की तरह उनके कंधे से लटक पड़ती है - 'कर लूँगी वह भी।'

'कब...? अभी...'

'नहीं, आपके जाने के बाद...'

'नहीं, अभी।'

'नहीं, आपके जाने के बाद...'

'अभी...'

अभी तो मैं आपके साथ बैठूँगी, बातें करूँगी। फिर खाना खाएँगे हम। अ... खाने से याद आया, सब्जी चढ़ा रखी थी गैस पर; कहीं जल न गई हो... कैसे खाएँगे आप... उसकी आँखों में चिंता की लकीरें हैं गहरी... नीली... भूरी...

वे लाड़ से देखते हैं उसे... खा लूँगा... पूरी तरह से न जली हो तो ... नहीं तो बाहर भी...

ट्रिन... ट्रिन... मोबाइल की हल्की सी टिनटिनाहट उसे बाहर धकेलती है स्मृतियों से।

वह एसएमएस पढ़ती है - 'तुम्हारे लिए कोई क्षमा नहीं है स्त्री / स्वर्ग के दरवाजे बंद हैं / कि तुम्हारे कारण ही / धकेला गया पुरुष पृथ्वी पर / नींद में चहलकदमी मत करो स्त्री / कि पाँवों की साँकल बज उठेगी / भूलो मत अभिसार के बाद, अभी-अभी नींद आई है तुम्हारे पुरुष को...' - एमीलिया

यह एमी भी... पता नहीं क्या-क्या लिख कर भेजती रहती है। अभी कल तो उसने... वह दुबारे इस कविता को पढ़ती है और चौंक उठती है। ये पंक्तियाँ कहीं उसी कविता की कड़ी तो नहीं।

वह 'इन बाक्स' में जाती है - 'स्त्री / बचा सको तो बचा लो अपना नमक / नमक के सौदागरों से / वे तुम्हें जमीन पर पाँव न धरने देंगे / कि कहीं तुम्हारे पाँव से झर न जाए रत्ती भर नमक... अगर्चे तुम बच गई स्त्री / लिखेंगे वे धर्मग्रंथों और सुनहरी पोथियों में/ कि दर-दर नमक बाँटती फिरती थी निर्लज्ज स्त्री...'

वह समझना चाहती थी एमी क्या कहना चाहती है, वह समझ रही थी एमी का मतलब क्या है... वह भरोसा नहीं करना चाहती थी एमी के कहने पर। एमी की शुक्रगुजार है वह। वह न होती तो प्रो. हनीफ से वह मिल भी कहाँ पाती। वह एमी ही थी जिसने इंटर की परीक्षाओं के बाद के खाली दिनों में उसे आर्ट्स क्लासेज ज्वाइन करवाया था जबरन। वह बेमन से जुड़ी थी सिर्फ एमी का साथ देने की खातिर। पर फिर... प्रो. हनीफ वहाँ गेस्ट फैकल्टी थे। वह पहली मुलाकात, अगर सिर्फ सुने और देखे जाने को भी मुलाकात कहते हों तो अब भी उसकी स्मृतियों में ज्यों की त्यों है। वह आँखें फाड़-फाड़ कर सुनती रहती उन्हें, देखती रहती उन्हें, एकटक। क्लास कब खत्म हो जाते उसे पता ही नहीं चलता अगर एमी बाजू पकड़ कर उठने को नहीं कहती - 'चल।'

वह प्रो. हनीफ के प्रभामंडल की जद में थी, बुरी तरह। उनकी आँखें, उनका चेहरा, सिर के कुछ सफेद बाल, उनका ऊँचा कद। एमी कहती यह उम्र होती ही है ऐसी जब लोग बुजुर्गों की तरफ आकर्षित होते हैं। फादर सिंड्रोम, पितृ-ग्रंथि कहते हैं इसे। वे बाहर आ खड़ी हुई थीं। मुझे जब पिता से कोई लगाव ही नही रहा फिर पितृ-ग्रंथि क्या...?

वही तो... कभी-कभी जो मिलता नहीं उसे हम तलाशते फिरते हैं बाहर-बाहर। तुम्हारे दिमाग मैं बैठा पिता का रोल माडल...

पिता शब्द उसे चुभता है। वह कहती है अब बस भी कर... पर एमी के अनुभव बोलते हैं, बोलते ही रहते हैं।

उबरने के लिए वह हनीफ सर का पहला एसएमएस निकालती है -

'यूँ तो था पास मेरे बहुत कुछ, जो मैं सब बेच आया।

कहीं ईनाम मिला और कहीं कीमत भी नहीं।

कुछ तुम्हारे लिए इन आँखों में बचा रखा है,

देख लो, और न देखो तो शिकायत भी नहीं।'

उनके लिए हैरत का सवब था यह एसएमएस। वे क्लास में हर लड़के का मोबाइल नंबर पता कर-कर के थक चुकी थीं। उससे ज्यादा शायद एमी...

वे तो शायद भूल भी जातीं एसएमएस की बात, लेकिन उस दिन इन्स्टीच्यूट की डायरेक्टरी मिली थी उन्हें और उसे पलटते-पलटते हनीफ सर के नंबर पर उनकी निगाहें अटक गई थीं...

एमी ने चिकोटा था उसे - तो आग दोनों तरफ लगी हुई है... मैं तो समझी थी... बुड्ढे के बच्चे हों शायद हमारे बराबर... मैं बात करती हूँ उससे... नंदिता ने बाँहें थाम ली थी उसकी - ' नहीं एमी... नहीं... मेरी खातिर...'

बुढ़ापे में आदमी सठिया जाता है, और तू तो... वह उसे गुस्से से घूरती है, घूरती रहती है। फोन करती हूँ मैं तेरे घर, बुलाती हूँ अंकल को... तेरी अक्ल तभी ठिकाने आएगी।

वह उसे मासूम निगाहों से देखती है, आँखों में इल्तिजा भर कर, प्लीज घर फोन नहीं करना एमी। पापा नाराज होंगे, नहीं समझ पाएँगे यह सब कुछ।

यह सब कुछ तू समझ पा रही है? कि यह सब कुछ है क्या सिवाय बेवकूफी और बचपने के। बुढ़िया नानी कहती हैं, तू नहीं समझ पाएगी यह सब कुछ।

क्या है यह सब कुछ तू पहले मुझे समझा कर तो देख। अंकल को बाद में... पहले मुझे ही, चल शुरू कर... वह उसे कंधे से झकझोर रही है।

प्लीज एमी...

प्लीज क्या, हमेशा मरी बकरियों की आँखों की तरह आँखें बना मुझे जीत नहीं सकती तू। मैं तुझे नहीं चलने दूँगी इस राह... और अगर इस राह गई तू तो हमारी दोस्ती यहीं खत्म...

छोड़ देना या छूट जाना इतना आसान होता है क्या; न उससे हनीफ सर का मोह छूटा था न एमी से उसका। पूरे पाँच वर्ष बीत चुके हैं इस बीच। लंबे-लंबे पाँच वर्ष। पर उसे लगता है जैसे अभी की बात है यह सब। अभी तक तो वह भरोसा भी नहीं कर सकी कि वह साथ है हनीफ सर के, किसी लंबे स्वप्न में नहीं जी रही वह। और एमी... जब तब मिलने के बहाने ढूँढ़ती है उससे... एसएमएस और फोन। उसने शायद अभी तक उम्मीद नहीं छोड़ी है और नंदिता ने अपना भरोसा...

एमीलिया, कभी की छात्र नेता, आज की तेज-तर्रार पत्रकार। उसकी इच्छाओं के आगे झुक कैसे लेती है, मान कैसे लेती है उसकी बात। अपनी दलील से सबको परास्त करनेवाली एमीलिया। प्यार सबको पराजित करता है, झुका लेता है, प्रिय की इच्छाओं के आगे। एमीलिया कोई अपवाद तो नहीं...

नंदिता खुद नहीं छोड़ आई इस प्यार के पीछे घर-द्वार, दोस्त-रिश्ते सब। लोगों की आँखों में उगे अपमान को वह नहीं पहचानती हो ऐसा नहीं है पर पहचान कर भी उस पर मिट्टी डाल देती है वह। एक घर-परिवार, अपना घर-परिवार कभी-न-कभी उसने भी तो चाहा होगा। पर अब वह सारी चाहत हनीफ सर के साथ की चाहत में बदल कर रह गई है।

...और खुद हनीफ सर, वे किसी के लिए उत्तरदायी नहीं? उसको हर क्षण किसी की आँखों में उगी नफरत नहीं झेलनी होती पर उन्हें तो उनके पूरे परिवार का सामना करना होता है, पत्नी, बच्चे सबका... छोटा लड़का चाहे न समझता हो उतना कुछ पर वसीम... वसीम तो बड़ा है। लगभग उसी उम्र का है वह जिस उम्र में हनीफ सर से मिली थी वह...

प्यार व्यक्ति को कमजोर बना देता है और लाचार भी... एनी अक्सर कहती थी। उस वक्त तो और भी जब आर्ट क्लासेज खत्म हो चुके थे और इंटर का रिजल्ट आने में अभी वक्त बाकी था। नंदिता तड़पती रहती... एक बार, बस एक बार वह हनीफ सर से मिल पाती। वह एमी से प्रार्थना करती बार-बार। कहती, कोई उपाय... कैसे भी... गजब यह कि हनीफ सर ने इस बीच उसे कभी कोई एसएमएस भी नहीं भेजा था। अपनी पहल पर एसएमएस करनेवाले हनीफ सर की इस चुप्पी का कोई मतलब वह नहीं समझ पा रही थी। या यूँ कहें कि यह चुप्पी जो बतलाना चाह रही थी वह सच उसे स्वीकार्य नहीं था। एमी उसकी तकलीफों से पसीज कर कहती है, फोन कर, एसएमएस कर, बुला कर मिल तो उनसे। उसे हैरत होती है पर नहीं होती है। वह जानती है प्यार व्यक्ति को कमजोर बना देता है, लाचार भी। वह चाहती थी एमी उससे यही कहे पर पर जब उसने कह दिया वही सब कुछ तो उसके हाथ मोबाइल उठाने से इन्कार कर देते हैं...। अजीब है तू भी, यही तो चाहती थी न तू, फिर अब क्या हुआ? कर ले फोन, वह उसे मोबाइल थमाती है। वह चुपचाप रख देती है उसे... पागल लड़की, सँभाल खुद को। इस तरह तो तू... एमी ने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया है, वह उसके बाल सहला रही है।

एमी सैंडविच बना कर लाती है, प्लेट उसके सामने कर देती है। वह उठा कर कर खाना चाहती है सैंडविच पर उसके हाथ बेतरह काँप रहे हैं, थर-थर। अपनी हालत पर उसे खुद तरस आ जाता है, कैसी तो हालत बना रखी है उसने खुद की। अगर एमी भी साथ न हो उसके तो... और एमी भी कब तक झेल पाएगी यों उसे। उसने बेतरह काँपते शरीर और हाथ को सहेजा है, तोड़ा है एक ग्रास और मुँह में ठूँस लिया है, नहीं बस और अब नहीं। उसने छोटे-छोटे कौर तोड़ने शुरू किए हैं। सैंडविच बिल्कुल बेस्वाद है, कि स्वाद, रस, गंध ही उसकी जिंदगी से पीछे छूट चले हैं...

बेल बजी है, एमी गई है दौड़ कर। कौन होगा, वह सोचती है कोई नहीं आता उन दोनों के घर। बाहर-बाहर ही वे मिलती हैं लोगों से, जरूरत भर की बातचीत भी कर लेती हैं, पर घर तो सिर्फ उन दोनों का है, उनका एकछ्त्र साम्राज्य। उन्हें कभी किसी तीसरे की जरूरत नहीं पडी, बचपन से अब तक। लोगों को भी उनके इस एकांत में खलल डालने का कोई शौक नहीं था। खास कर इस शहर में। यह शहर उन्हें इसलिए भी बहुत पसंद था। यहाँ उनके लिए झोली भर आजादी थी और सिर पर मुट्ठी भर सपनों की छतरी भी, जिसके साये तले वे धूप, बारिश सबसे बचती-बचाती अपने सुख-दुख आपस में बाँट लेती थीं, बचपन के अपने पुराने शहर के दिनों की तरह ही...

वह कभी-कभी सोचती थी उन दिनों उन दोनों का अपना घर जो कि अब उसे एमी का घर लगने लगा था छोड़ देने से पहले, एमी के स्वरों में जो हनीफ सर के लिए हिकारत है वह कहीं सिर्फ इसलिए तो नहीं कि वह उससे उसका कुछ निजी छीन ले जा रहे थे। वैसा निजी जिसे वह सिर्फ अपना समझ जी रही थी अब तक...। या कि उसके स्वर की पीड़ा-चिंता सब जेनुइन है। खालिस फिक्र और उसके हित से जुड़ी हुई। पर वह जब भी इस मुद्दे पर सोचना शुरू करती उलझ जाती बुरी तरह से। कोई निष्कर्ष न कभी निकला था न अब निकलता। हार-झख कर खयालों के उलझे गुच्छे को वह दूर फेंक देती जैसे माँ अक्सर उलझे पुराने ऊन को सुलझाते-सुलझाते हार जाती तो उठा कर दूर फेंक देती थी... यह अलग बात है कि वह अगले दिन या कि उसी दिन एक-दो घंटे के बाद उसे फिर सुलझाने बैठती...

वह अभी तक वैसी उलझी-उलझी ही बैठी थी, अधकुतरा हुआ सैंडविच का प्लेट उसी तरह सामने रखे हुए। उसके विचार अभी तक उन्ही दोनों ध्रुवों के दो छोर पर तने खडे थे कि एमी ने पूछा था उससे - कौन होगा? फिर उससे जवाब की अपेक्षा न रखते हुए वह गेट की तरफ बढ़ गई थी। पोस्टमैन ने साइन करवाया था एमी से। फिर लिफाफा उसके सामने रख कर उसकी बगल में आ बैठी थी, 'क्या है' की उत्सुकता के साथ।

वह अब तक ऊहापोह में थी, राइटिंग तो बहुत खूबसूरत और पहचानी सी है... किसने भेजा होगा, और क्या...? वह कोइ अंदाजा नहीं लगा पा रही। एमी के सिवा कोई दूसरी सहेली भी नहीं। माँ-पिताजी तो चेक भेज कर ही निवृत हो लेते हैं, अपनी जिम्मेदारियों से। फिर... उसने इशारा किया था खोलो एमी...

एक कागज निकला था लिफाफे से... एक पन्ना मात्र। एमी ने पढ़ना शुरू किया था उसे -

'खलबतो-जलवत में मुझसे तुम मिली हो बारहा

तुमने क्या देखा नहीं, मैं मुस्कुरा सकता नहीं

'मैं' की मायूसी मेरे फितरत में शामिल हो चुकी,

जब्र भी खुद पर करूँ तो गुनगुना सकता नहीं।

मुझमें क्या देखा कि तुम उल्फत का दम भरने लगी

मैं तो खुद अपने भी कोई काम आ सकता नहीं।

किस तरह तुमको बना लूँ मैं शरीके जिंदगी,

मैं खुद अपनी जिंदगी का भार उठा सकता नहीं।

यास की तारीकियों में डूब जाने दो मुझे,

अब मैं शम्मे जिंदगी की लौ बढ़ा सकता नहीं।'

पढ़ने के बाद एमी बुदबुदा रही थी - बुड्ढे में इतनी भी हिम्मत नहीं कि अपनी बात आमने-सामने कह सके। कायर... डरपोक। इधर-उधर की पंक्तियाँ भेजता रहता है, वह भी बिना अपने नाम के। और यह है कि उसी में मार खुशी के मार गम के डूबती-उतराती रहती है...। बल्कि डरपोक नहीं, खेला-खाया हुशियार है वह। सब कुछ इतनी सफाई... अपने दामन को पाक-साफ रखते हुए, हर गँदले छींटे से बचाते हुए...

उसके कान यह सब सुन रहे थे पर वैसे ही जैसे बिना काम की बातें... उसने कागज के उस टुकड़े को छाती से लगा लिया था। जार-जार रोई थी वह। उसने काँपती उँगलियों से उन्हें फोन मिलाया था - सर मैं मिलना चाहती हूँ... बगैर एमी की तरफ देखे... आपसे, अभी इसी वक्त। उधर से कोई पुरजोर मनाही भी नहीं सुनाई दी थी... कहाँ सर? ठीक है... आती हूँ मैं... वह एमी से आँखें चुराती उठी थी। कुछ भी नहीं कहा था उससे, और तैयार होने चली गई थी।
 
2

रास्ते भर एमी की आँखें उसका पीछा करती रहती हैं, घूरती हुई। वह उन शिकायती नजरों से दूर भागना चाहती है, बहुत दूर। वह आटो रिक्शावाले से कहती है, गाड़ी इतनी धीरे-धीरे क्यों चला रहे हो, तेज चलाओ। अभी मैडम, आटोवाला बहुत कम उम्र का है, उसकी आँखों में एक शरारत भरी चमक है, वह शरारत और गहराती है, नंदिता के कहने से। वह उन शरारत भरी आँखों की अनदेखी करना चाहती है। अब कितनी-कितनी आँखों से उलझे वह। गाड़ी जैसे हवा में उड़ने लगी है, वह हिल रही है बिल्कुल। गनीमत है कि दोपहर है, भीड़ उतनी नहीं सड़कों पर। पर फिर भी ठहरी तो दिल्ली की भीड़ ही। अरे कोई एक्सीडेंट करने का इरादा है क्या, तेज चलाने को कहा था पर इतना तेज भी नहीं, अभी गिरते-गिरते बची मैं। ठीक है मैडम... पर कह वह कुछ इस अंदाज में रहा है जैसे कह रहा हो 'जो हुक्म शाहजादी'। गाड़ी ठीक-ठीक गति से चलने लगी थी। आटोवाले ने कोई गीत लगा दिया है, वह सुनती है उसे ध्यान दे कर -

शबनम कभी, शोला कभी, तूफान है आँखें,

उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता

जिस मुल्क के सरहद की निगहबान हैं आँखें।

उफ अब यहाँ भी आँखें, एमी की आँखें... निगहबानी का शौक जिन्हें बेइंतहा हैं। इसी चौकसी से भाग कर वह दिल्ली आई थी ताकि जी सके अपनी तरह, अपनी मर्जी से। पर मुश्किल यह कि एक सिपाही वह खुद साथ लेती आई थी, जो तैनात रहता था हरदम उसकी पहरेदारी में। तब तो बहुत खुश थी वह। उसकी सबसे अच्छी दोस्त, उसकी बचपन की सहेली, चौबीस घंटे उसके साथ होगी। उन्हें मिलने, फिल्म देखने और गप्पबाजियों के लिए मौकों और समय की तलाश नहीं करनी होगी। वे साथ होंगी दिन-रात...।

उन्होंने अपने कमरे को भी बहुत प्यार से सजाया था। दो फोल्डिंग, दो बुक रैक्स, एक आल्मारी और एक किचेन। दिन बड़े प्यार से गुजर रहे थे उनके। हनीफ सर के नंदिता की जिंदगी में आने तक।

उसे कोफ्त हो रही है बेइंतहा। वह एमी के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचना चाह रही, रत्ती भर भी नहीं। उसने अपनी पीठ से टँगी उन आँखों की पलकें जबरन बंद कर दी है। फिर भी वे पीछे-पीछे चली आ रही हैं...। चली आ रही हैं। वह एमी के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचना चाहती इस वक्त। अभी वह सिर्फ हनीफ सर के बारे में सोचना चाहती है, अभी उसकी इंतजार में होंगे वह, उसे ऐसा सोच कर अच्छा लग रहा है। इंतजार करने का ढंग भी क्या उनका बिल्कुल अलग होगा... बेचैनी को काबू में करने का ढंग... कि आम आदमी की तरह चहलकदमी कर रहे होंगे वह भी... नहीं, सर आम लोगों जैसे बिल्कुल भी नहीं। उनकी कोई भी आदत आम लोगों जैसी कैसे हो सकती है। वह देखना चाहती है सर को इस हाल में... वह पगली है बिल्कुल।

वह आटोवाले को बरजती है, यह क्या बजा रहे हो तुम। कोई और अच्छा गाना नहीं है तुम्हारे पास। उसकी शरारती आँखें कहती हैं 'अभी बदलता हूँ मैडम'। वह छुपी हुई ध्वनि सुनती है, 'जो हुक्म मल्लिका'। उसने कैसेट पलट दिया है - 'ये रेशमी जुल्फें, ये शरबती आँखें, इन्हें देख कर जी रहे हैं सभी...' लगता है आटो रिक्शावाले के पास जो कैसेट है उसके सारे गाने आँखों से ही संबंधित हैं। वह उसकी आँखों की चमक को इग्नोर करती है, चलेगा, चल जाएगा यह। कम से कम इस गाने में उसे अपने पीछे कौंधती एमी की आँखें तो नहीं दिखेंगी...

वह आँखें मूँद कर प्रतीक्षा करते हनीफ सर की कल्पना करती है। अब मन्ना डे की आवाज गूँज रही है - 'तेरे नैना तलाश करें जिसे वे हैं तुझी में कहीं दीवाने... तेरे नैना...'

सदियों लंबा यह रास्ता भी आखिरकार तय हो ही गया। वह आटोवाले को पैसे थमाती है। पलट कर देखने की जरूरत नहीं है उसे, न बचे हुए खुल्ले पैसे लेने की। वह तेज कदमों से गेट की तरफ बढ़ती है। अगर वे गेट पर ही नहीं मिले तो... वे गेट पर ही थे, सफेद कुर्ते पाजामे में, कानों के पीछे से बहते पसीने को रूमाल से पोंछते। पसीने की बूँदों से चमकता लेकिन धूप से सँवलाया हुआ चेहरा। साँवले लगते चेहरे पर उनकी आँखें और ज्यादा चमकदार और उदास सी... उसे उनके भेजे नज्म की अंतिम पंक्तियाँ याद हो आईं -

'यास की तारीकियों में डूब जाने दो मुझे,

अब मैं शम्मे जिंदगी की लौ बढ़ा सकता नहीं।'

आखिर क्या कहना चाहते थे वह... पूछना था उसे उन्हीं से। वह समझ रही थी कुछ-कुछ पर जैसे उसे अपनी समझ पर विश्वास ही नहीं रह गया था... इसीलिए भागी आई थी वह, पर अब जबकि चली आई थी उसे खुद पर गुस्सा आ रहा था। इस तरह परेशान किया उन्हें, न जाने धूप में ऐसे कब से खड़े होंगे। उसका मन हुआ बढ़े वह और अपने रूमाल से, अपने हाथों से पोंछ दे उनका पसीनाया चेहरा। पर तब हिचक थी और खूब थी। वह चुपचाप उनके सामने जा खड़ी हुई थी, चाभी की गुड़िया सी।

उन्होंने देखा था उसे, पर जैसे देखा नहीं हो। चल रहे थे उसके साथ पर जैसे साथ नहीं चल रहे हों। वे बोल रहे थे कुछ साथ-साथ चलते, उसने अपना ध्यान बटोरा था - 'इस कुतुबमीनार को अलाउद्दीन खिलजी, इससे ढाई गुना बड़ा बनाना चाहता था। पर पहले तल के बनते ही उसकी मृत्यु हो गई। ख्वाहिशों का क्या वे बेइंतहा होती हैं जिंदगी मे और अंत तक पीछा करती रहती हैं हमारा। सब कुछ हमारे ही हाथों में नहीं होता। तुमने सुना है ना, 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...'

वह समझ रही थी वह जो वे उससे कहना चाह रहे थे; पर वह जो कह रहे थे उसे वह बिल्कुल ही नहीं समझना था... वह यही सब सुनने-समझने तो नहीं आई थी यहाँ।

वे कह रहे थे - 'ऐबक बहुत ही महत्वाकांक्षी इनसान था। वह मुहम्मद गोरी का गुलाम था जिसने गुलाम वंश की स्थापना की और एक गुलाम इल्तुतमिश को ही अपना दामाद चुना। इल्तुतमिश ने ही कुतुबमीनार को पूरा करने का काम अपने शासन काल में किया। दिल्ली सल्तनत की पहली महिला शासक रजिया बेगम इसी इल्तुतमिश की बेटी थी।'

वह धूप से आँखें बचाती पेड़ों की ओट-ओट बढ़ रही थी। वे अब भी कह रहे थे - 'तुम जानती हो कुतुबमीनार और ताजमहल दोनों अर्थक्वेक प्रूफ हैं। सोचो, विज्ञान और कला का विकास उन दिनों कितना हो चुका था।

ऐबक ने जहाँ हिंदू आर्किटेक्ट से काम लिया, इल्तुतमिश ने वहाँ इजिप्ट से कलाकार बुलाए। अलाउद्दीन खिलजी ने जहाँ सफेद संगमरमर का उपयोग किया वहीं इल्तुतमिश ने लाल बलुई पत्थर का। यहाँ चार राजाओं के शासन काल की कला-विशेषताएँ अलग-अलग अंदाज में नजर आती हैं।

कुतुबमीनार का मेन गेट जिसे अलाई दरवाजा कहते हैं देखने में कितना खूबसूरत है कभी गौर से देखा है? दरवाजे पर छोटे-छोटे कमल, राजपूत कला के चिह्न बल्कि कहें तो हिंदू और जैन शैलियों का मिश्रित रूप। छतरियाँ बुद्धिष्ट कला से प्रेरित... मृत्योपरांत ऐबक का क्या हुआ कुछ पता नहीं, कहते हैं वह पोलो खेलते वक्त घोड़े से गिर गया था और उसकी मृत्यु हो गई थी। इसीलिए इल्तुतमिश ने अपने जीवन काल में ही यह मकबरा बनवा लिया था।' वे चलते-चलते आगे आ चुके थे। 'यह जो मकबरा देख रही हो न तुम इसके सेंटर टाप दो तरह के हैं। एक तो ऊपर नकली और दूसरी नीचे मिट्टी में असली।

वह बोलते हुए हनीफ सर का चेहरा गौर से देख रही थी। उसे लग रहा था वे कक्षा में हैं और सर... वह उन्हें टोकना चाहती थी पर नहीं भी। उनके चेहरे पर पसरी गरिमा और विद्वता उसमें झिझक भर रही थी। इतनी बार तो वह आई है यहाँ, लेकिन इतने सलीके से... करीने से कहाँ किसी ने बताया कभी। उसने गाइडों को भी बोलते हुए सुना है, पर उनके चेहरे पर उनका पेशेवराना अंदाज छपा रहता है लगातार, उनकी सीमाओं को बताता हुआ। सर बहुत कुछ बताना-कहना चाह रहे हैं उससे, उसे ऐसा लगा, इतना कि एक बात को अधबीच छोड़ दूसरी जगह आ ठिठकते हैं वे।

वे अशोक स्तंभ के सामने थे। अब बाड़े में कैद स्तंभ। जिसे कितने लोगों ने न जाने कितनी बार अपनी बाँहों में कैद कर कितनी मन्नतें माँगी थी, जिसके चिह्न उसके बदन पर थे। उसकी इच्छा हुई वह भी उसे बाहों में भर एक कामना करती, पूरे मन से... काश...

'पता है तुम्हें, यह आयरन पिलर पहले विष्णुपद पर था और उसके शिखर पर एक विष्णु ध्वज भी था, जो कालांतर में नहीं रहा। तुम सोच सकती हो गुप्त काल के लोग कितने एडवांस रहे होंगे। उन्हें स्टील बनाने की कला आती थी। इस पर कभी जंग लगते नहीं देखा गया। दूसरा अशोक स्तंभ जो मेरठ से लाया गया और टूट गया था, उसे लानेवाला फिरोज शाह तुगलक था और जिसे बाड़ा हिंदूराव के समय में जोड़ा गया था... इस पर ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है आदमी कैसे जिंदगी जिए...'

नंदिता वह पकड़ना चाहती है जो सर कहना चाहते हैं उससे, पर कौन सा छोर पकड़े वह। कहाँ से जोड़े बातों का सिरा। वह बहुत छोटी है... और इस वक्त तो जैसे और भी ज्यादा छोटी हो गई है। वह इस व्यक्ति का सामीप्य चाहती है; इसकी निकटता... लेकिन यह पास हो कर भी पास नहीं होगा और वह उसकी छत्रछाया में और सिकुड़-सिमट जाएगी। ठीक कहती है एमी...

वह साफ-साफ जानना चाहती है, उनका इरादा क्या है... वह कहती है उनसे 'यही सब कहने के लिए आए थे...'

'जो कहना था लिख कर भेज तो दिया था। फिर भी...' वे चुप रहते हैं थोड़ी देर... फिर कहते हैं, 'इस जगह पर जहाँ तुम खड़ी हो, इसे देखने के लिए लोग इतना वक्त गुजर जाने के बाद भी टूट कर आते हैं। इसे बनाने केलिए 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़ा गया था। तुगलकाबाद जिसे हम आज सिरी फोर्ट के नाम से जानते हैं, को बनाते वक्त हूण और मंगोल जाति के लोगों को पकड़ कर उनके सिर काट कर नींव में दबाए गए। गयासुद्दीन तुगलक इसे अपनी राजधानी बनाना चाहता था... और और कितनी बातें कहूँ मैं...

'मैं उसी कौम का हूँ जिसके लिए तुम्हारी पद्मिनी और कितनी रानियों ने जौहर का व्रत लिया था। और... और...' उनका चेहरा उत्तेजना से लाल है। वे अपने अराजक गुस्से पर काबू करना चाहते हैं... 'क्या करोगी मेरी दुनिया मे आ कर...? मेरे दो बच्चे, बीवी... सौत बनोगी उसकी... उनकी सौतेली माँ... चलो मान भी लिया... हमारे समाज को इसमें कोई उज्र भी नहीं। पर खुद सोचो तुम, मुझ पर इल्जाम और तोहमतें लगेंगी... एक मासूम लड़की को... दूसरे कौम की लड़की को बरगला कर... अंजाम इससे भी बुरा हो सकता है नंदिता... दंगे... बलवा...'

'अतीत का बोझ यूँ भी मेरे सिर चढ़ रोता रहता है, बेताल की तरह... कंधों पर परिवार की जिम्मेदारी अलग... तुम क्या... क्या चाहती हो मुझसे...?'

'कुछ भी नहीं।'

'कुछ भी नहीं तो फिर आई क्यों हो यहाँ?'

'मैं मीरा के देश की हूँ, उसी परंपरा में विश्वास करती हूँ। मैं आप से कुछ भी नहीं चाहती सर... कुछ भी नहीं।'

'मीरा बनने के लिए जीते-जागते इनसान के सामीप्य की जरूरत नहीं होती। बुत ढूँढ़ो कोई। मुझ से मिलना इतना जरूरी क्यों है... क्यों है तुम्हारे लिए...'

वह उठ कर चल देती है, चुपचाप। अपने आँसू कहीं भीतर ही पीती हुई। हिचकियों को कहीं अपने भीतर साधे... एमी नहीं है उसके पास... पर साथ है वह, रास्ते भर उसकी पीठ सहलाती, कंधे को अपने सिर से लगाए हुए...

उसे लगता है घर बिल्कुल भी न जाए वह, एमी के सामने तो बिल्कुल भी न पड़े। कभी भी नहीं... अपनी हार को लिए हुए तो और भी नहीं।
 
3

एमीलिया ने नंदिता को जाते देखा है चुपचाप। उससे आँखें चुराकर जाते हुए। उससे कहे बगैर जाते हुए। उसने जाती हुई बहार को देखा है। उसे बेमौसम पतझड़ के आने की आशंका है और यह आशंका निराधार नहीं है। 21 साल की कोई लड़की अगर 52 साल के किसी पुरुष से जुड़ती है तो और क्या हो सकता है। नंदी अगर जीतती भी है तो भी हार उसी की है, और हारती है तो हार है ही...

उसने हमेशा नंदी में खुद को देखा है। वे एक जैसी नहीं हैं। पर एक जैसी हैं। एमीलिया जो नहीं है वह खुद को उसे बनाए रखने में जुटी रहती है। अपने भीतर की नंदी या नंदी जैसी को सुलाए रखने में। वह नंदी को देख-देख जी लेती है अपने वजूद का वह हिस्सा जो कहीं उसने दबाए रखा है। नंदी का साथ उसे इसलिए भी बेहद जरूरी लगता है।

आनंद जैन और इशिता पंडित की इकलौती बेटी, नंदिता, नंदिता जैन। माँ-बाप की दुलारी बेटी नंदिता जैन। नंदी के पास एक अपना घर है। बहुत ज्यादा ध्यान देनेवाले माता-पिता और अब उसके हनीफ सर। वह सारी खुशियाँ जिसे एमी ने हमेशा अपने लिए चाही थी... नंदिता के लिए वे खुशियाँ ही बंधन थीं। वह प्यार ही बंधन। चीजों को देखने-आँकने के दृष्टिकोण सबके अपने-अपने होते हैं। कोई अलग सा नाम भी नहीं सूझा उन्हें। मतलब क्या है नंदिता का? दोनों नाम इकट्ठा किए और जो कुछ उससे बन पड़ा बना लिया। मेरी अपनी पहचान-स्वायत्तता कुछ भी नहीं। मेरे नाम के प्रति उनका रवैया ही मेरे जीवन के प्रति उनके दृष्टिकोण का परिचय दे देता है। उनकी इच्छाओं की गुलाम। उनके लिए एक गुड़िया... यह नाम उन दोनों के प्यार का प्रतीक भी तो हो सकता है... भाड़ में जाए यह प्यार-व्यार, मुझे चिढ़ होती है इस तरह के और इतने ज्यादा प्यार से। मेरी साँसें घुटती हैं इस प्यार के तहखाने में। नंदिता तब भी कहती ही रहती है। सहज, सरल मृदुभाषिणी नंदिता। स्कूल में सबकी चहेती, वेल मैनर्ड...। घर के मुद्दे पर ही वह बिफरी सिंहनी क्यों हो जाती है, एमीलिया कभी समझ नहीं पाई।

खुद एमी का बचपन; एमी याद करना चाहे तो सिवाय माँ की स्मृतियों के उसे कुछ याद करने लायक लगता भी नहीं। नंदी को अपने नामकरण के जिस जोड़-घटाव से नफरत है वही जोड़ वही लगाव वह तलाशती रहती अपने नाम में। पर नाम बड़ा अजनबी सा उसके लिए...। उसने माँ से ही पूछा था एक दिन, उसका नाम ऐसा क्यूँ है? ऐसा मतलब? ऐसा मतलब बिल्कुल अलग-अलग सा। रंग रूप कद काठी सब में बिल्कुल अपनी माँ की उसी छवि की अनुकृति एमी का नाम विदेशियोंवाला। माँ चुप रही थी कुछ देर। तेरे पापा को पसंद था यह नाम। और तुम्हें? ...माँ चुप रही थी बहुत देर तक। ...उसने फिर माँ को छुआ, झकझोरा था। बोलो न माँ तुम्हें? ...माँ ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा था, उतना नहीं। मैंने सोचा था तेरा नाम दिव्या रखूँगी। दिव्या मतलब...? दिव्य, अलौकिक, अपरूप। मतलब जिसकी बराबरी कोई न कर सके। जो इस लोक का नहीं हो। तो फिर किस लोक का हो माँ? बच्ची एमीलिया की जिज्ञासा थमती ही नहीं थी कहीं। परियों की दुनिया से आई कोई परी, राजकुमारी।

वह खुश हुई थी उस नाम के अर्थ को जान-सुन कर... तो फिर रखना था न माँ। माँ कुछ उदासी से बोली थी - एमीलिया तेरे पापा की बहुत अच्छी दोस्त थी। तेरे पापा उसे बहुत पसंद करते थे। वह कहाँ है माँ? रूस में। तेरे पापा जब वहाँ थे; तभी उससे जान-पहचान हुई थी उनकी। तुम नहीं मिली कभी उससे? नहीं। उसकी तस्वीर देखी है? पता नहीं क्या सोच कर वह उससे पूछती है - तस्वीर देखेगी तू उसकी? उसने न जाने क्या सोच कर कहा था या कि बस बच्चोंवाली उत्सुकतावश - हाँ। पिता के कमरे में बहुत कम जानेवाली माँ उस दिन उनके कमरे में घुसी थी। बहुत ढूँढ़-ढाँढ़ कर एक पुराना एलबम निकाल लाई थी। चमकीला कवर। काले मोटे पन्ने के उपर एक पतला पारदर्शी कागज। वे पन्ने पलटती रही थीं और ठिठक गई थीं उस पन्ने तक आ कर। एमी चाहती थी माँ जल्दी से वह कागज पलटे और वह देख पाए उस औरत का चेहरा जिसका नाम उसे दिया गया है। माँ के हाथ ठिठके हुए हैं उसी जगह। एमी कहती है माँ, फोटो... वे चौंकती हैं जैसे, अरे हाँ... वे उस पतली सी पारदर्शी पन्नी को हटाती है। अंदर ब्लैक एंड ह्वाइट में ली गई तस्वीरें हैं। गोल-मटोल पर मोटी नहीं। लंबी, हृष्ट-पुष्ट। गोल से ही चेहरेवाली, भरे-भरे गालोंवाली। उजले स्कर्ट-शर्ट में एक औरत... पापा के कंधे से झूलती। कहीं पापा उसका हाथ थामे खड़े हैं। कहीं पता नहीं किस बात पर दोनों खिलखिला रहे हैं, हँस रहे हैं जोर-जोर से। और हैं माँ...? उसने उत्सुकतावश पूछा होगा। माँ ने कहा था 'हाँ, पर अब नहीं बेटा। कहते-कहते माँ की आँखें छलछलाई थीं। वह तब समझ नहीं पाई थी क्यों? अपने आँचल से पोंछा था उन्होंने आँखों को, एल्बम को उसकी सही जगह पर रख दिया था सलीके से और उसे ले कर पापा के कमरे से निकल आई थी। माँ के स्वरों की उदासी ने उसे जिद करने से रोक लिया था। वह चाह कर भी पूछ नहीं पाई थी उनसे अगर और हैं तो वह उन्हें देख क्यों नहीं सकती? ...उसी रात पापा फिर बहुत नाराज थे... उनके सामान छुए तो किसने छुए? उनके कमरे में गया तो कौन? पिता के कमरे में सिर्फ पिता ही जाते थे। नौकर भी जब सफाई के लिए जाते तो पिता की उपस्थिति में ही।

माँ ने कहा था - एमी जिद कर रही थी। क्यों जिद कर रही थी वह, मेरे कमरे में ऐसा क्या है? और बच्ची जिस चीज के लिए जिद करे वह पूरा करना जरूरी है क्या? उसे हैरत हुई थी, माँ से ज्यादा तो पिता को ही उसकी इच्छाओं का खयाल था। वह जो कुछ माँगती पिता उसे तुरंत ला देते। फिर... और माँ झूठ क्यों बोल रही है उनसे? उसने तो नहीं कहा था वह पिता के कमरे में जाना चाहती है... उसने पापा से सच कहने को मुँह खोला ही था कि माँ के आँसू भरे चेहरे ने रोक लिया था उसे। माँ ने इसीलिए झूठ कहा होगा। पिता नाराज जो होते रहते हैं बिन बात उन पर। हर बात में गुस्सा, गुस्सा बस गुस्सा। पापा ने फिर अपना सारा सामान करीने से रखा था। ड्राअर्स में ताले लगाए थे। सब कुछ एक बार फिर से चेक किया था और क्लीनिक चले गए थे बगैर खाए... माँ ने भी फिर नहीं खाया था उस दिन कुछ।

उसे अब याद आता है, पापा और माँ को उसने औरों की तरह कभी हँसते-बतियाते नहीं देखा। एक साथ सोते भी नहीं। पर बचपन में उसे यह अजीब नहीं लगता था। अच्छा लगता था कि माँ उसके साथ सोती है। उसी के पास रहती है हर वक्त। पिता की जिंदगी में क्लीनिक, क्लीनिक और बस क्लीनिक। उन्हें काम से फुरसत नहीं होती थी, वे कभी काम से फुर्सत नहीं चाहते थे। यही था घर का हो कर भी घर से दूर रहने का उपाय। एक एमी ही थी जिसकी किलकारियाँ, जिसकी तुतली बातें उन्हें खींच लाती थी घर तक। जिसकी जिम्मेवारियाँ जिसके परवरिश के दायित्व से बँधे हुए थे वे। पिता जतलाते भी रहते थे हरदम माँ के लिए अपने व्यवहार से यह सब।

पिता ने तय कर लिया था। वे माँ से अलग हो कर एमीलिया से शादी कर लेंगे। बस जाएँगे वहीं। माँ तब मायके ही रहती थी अक्सर। दादी ने बहुत समझाया था फोन पर पिता को पर उनकी एक भी नहीं सुनी थी उन्होंने। हर बात पर अपनी माँ की बात माननेवाले पिता। माँ ने तब भी कुछ नहीं कहा था उनसे। नानाजी को बुलवाकर मायके चली गई थी। वहीं मालूम हुआ था माँ बननेवाली हैं वो। नानाजी ने दादी को फोन किया था। दादी ने पापा को। पापा लौट आए थे फिर अपने देश। माँ को भी बुलवा लिया गया था। दादी को भरोसा था, आनेवाला बच्चा बाँध लेगा उन्हें एक डोर से। वह माँ को भी यही दिलासा दिलाती रहतीं। पर उनकी गृहस्थी एक समझौता बन कर ही रह गई थी। एमीलिया ने बाँध लिया था अपनी नन्हीं सी मुट्ठी में अपने पापा का हाथ, अपनी भोली सी मुस्कुराहट से भर दिया था उनका मन। पर माँ से वह नहीं जोड़ पाई उन्हें कभी; वह उनके बीच की कड़ी कभी नहीं बन सकी। जब तक वह सब कुछ समझती, ढूँढ़ पाती कोई रास्ता, इतनी समझ आती उसके भीतर। माँ ही नहीं रही थी। ...सब्र और आँसुओं को पीते रहने की कोई सीमा तो होती होगी। माँ शायद उस सीमा को पार कर चुकी थी। उसे बहुत बुरा लगा था, माँ का उसे ऐसे अचानक छोड़ कर चले जाना। उसे अच्छा लगा था, माँ को रोते सिसकते अब नहीं देखना पड़ेगा। अब और आँसू और कष्ट नहीं होंगे उसके हिस्से। वह अकेली हो चली थी, बिल्कुल अकेली। पिता को उसकी फिक्र रहती। वे हमेशा उसके लिए समय निकालते, सरेशाम घर चले आते। उसे चिढ़ होती कभी पहले आए होते इस वक्त, माँ खुश होती। वे उसे बाजार ले जाना चाहते अपने साथ। वह इन्कार कर देती। कभी माँ को ले गए होते। वे उसके जितना नजदीक आने की कोशिश करते वह उतनी ही दूर भागती उनसे। उन्हें पास देख कर उसे माँ का आँसुओं से भीगा चेहरा याद आता। उसकी गुपचुप सिसकियाँ याद आतीं। ऐसे ही वक्त नंदी और उसके परिवार का सहारा उसके बहुत काम आया था। वह नंदी के घर में अपने सपनों का घर देखती। वहाँ उसे स्नेह मिलता, राहत मिलती। वह ज्यादा से ज्यादा वक्त नंदी के घर में बिताती। पापा उसे खुश देख कर खुश हो लेते। यूँ भी उन्होंने कभी उस पर कोई पाबंदी नहीं लगाई थी। वे बच्चों की स्वतंत्रता-स्वायत्तता के पक्षधर थे। वे उसकी इच्छाओं की परवाह करते थे, कद्र भी।

कभी-कभी नंदी भी उसके घर आ जाती; आती तो फिर जाने का नाम ही नहीं लेती। उसे भी अच्छा लगता था यह। अपनी स्मृतियों से, इस दमघोंटू एकांत से छुटकारा मिल जाता उसके आने से। नंदी चैन की साँस लेती। कॉफी पर कॉफी बनाती, पीती। तीखा-खट्टा खाती खूब-खूब पढ़ने का कह कर आती पर खूब गप्पबाजियाँ करतीं वे। नंदी कहती कितने अच्छे हैं तुम्हारे पापा। कभी किसी बात के लिए रोक-टोक नहीं। जो कहो वही मान लेते हैं चुपचाप। और एक मेरा घर, मेरे मम्मी-पापा...। वह मुस्कुरा भर देती नंदी की बात सुनकर। सिवाय मुस्कुराने के वह और कर भी क्या सकती थी। नंदी के मम्मी-पापा को भी नंदी का उसके घर रुकना कभी बुरा नहीं लगा, खला भी नहीं। उसकी साँस-साँस की गिनती रखनेवाले उसके मम्मी-पापा उसे उसके घर छोड़ देते थे, यह उसके लिए फक्र की बात थी। पर शायद नहीं... कारण कुछ और था। उन्होंने जो कुछ भी नंदिता में देखना चाहा था एमी के भीतर वह सब था। एमी मेधावी थी, एक अच्छी डांसर थी, एक अच्छी तैराक थी। एमी को म्यूजिक और लिटरेचर से लगाव था। नंदी को इन सब के लिए धकेल-धकेल कर थक गए थे वे। वे सोचते थे एमी के साथ से नंदी भी बदलेगी... और शायद सबसे ऊपर था एमी के पापा का डॉक्टर होना। नंदी के माता-पिता उसे डॉक्टर ही बनाना चाहते थे। वे सोचते एमी के घर का वातावरण उसे उत्प्रेरित करेगा।

इसी बीच दसवीं के रिजल्ट आए थे। दोनों के अंक अच्छे थे। नंदी के 81% और एमी के 85%। नंदी के मम्मी-पापा ने चाहा था वह दिल्ली जाए। वहीं किसी अच्छी कोचिंग में एडमिशन ले मेडिकल के प्रेपरेशन के लिए और आगे की पढ़ाई भी वहीं करे। नंदिता के लिए यह मुक्ति थी, आजादी थी। वह ना क्यों कहती। एमीलिया ने सोचा था वह भी जाएगी नंदी के साथ। इस तरह वह घर की स्मृतियों से पीछा छुड़ा सकेगी। और नंदी के बगैर... शायद पिता को भी आजादी मिल सके इस तरह। और उसके कारण जिन अनजाने बंधनों में जीते रहे वे उम्र भर उसका बोझ उनके सिर से उतर जाएगा... शायद वे अपनी एमीलिया को वापस ला सकें अपनी जिंदगी में... शायद वो चले जाएँ उसी के पास।

यूँ भी पिता को अपने सामने पाना उसके लिए एक त्रासदी थी... पिता के सामने होते उसे माँ याद आती; उनका दुख, उसके आँसू याद आते। उनका चला जाना याद आता। डॉक्टर की पत्नी का कैंसर से खत्म होना। वे अंतहीन दर्द को सहती रहती थी। पर वह दर्द उनके भीतर पलते दर्द से बड़ा नहीं था। जीना नहीं चाहती थीं वे, बिल्कुल भी नहीं। उन्होंने केमियोथेरैपी, रेडियेशन सब से मना कर दिया था। बीमारी भी फैल चुकी थी बहुत ज्यादा। 90% के आस-पास। वे रात-रात भर तड़पती रहतीं। पर एमी को इसका एहसास नहीं होने देना चाहती। कहतीं बस नींद नहीं आ रही थी। वे नहीं चाहती थी कि एमी को कोई बाधा पहुँचे, वह पढ़ नहीं पाए। वे हमेशा उसकी पढ़ाई को ले कर चिंतित रहतीं। वह कराहने की आवाज सुनती और दौड़ कर जाती उनके पास। वे दुत्कार देतीं उसे...जा पढ़, परीक्षा है तेरी। हर समय बच्चों की तरह क्या चिपकी चली आती है। उसे बुरा लगता। पर अब लगता है उसे अलगा रही थीं वे खुद से या फिर खुद को ही उससे। उसे छोड़ जाने की तैयारी में थीं वह।

उनका अंतिम वक्त का केशविहीन, केवल हड्डियों का ढाँचा रह गया शरीर... वह माफ नहीं कर पाती पिता को और उस एमीलिया को भी जो बेवजह उसके वजूद से आ चिपकी थी। पिता का माँ के अंतिम वक्त का बदलाव भी उसे कभी विचलित नहीं कर पाया। पिता दौड़ कर पानी देने जाते। माँ बाद में पानी बहा देतीं। पिता उससे दवा भिजवाते। सारी दवाइयाँ गद्दे के नीचे पड़ी मिली थीं बाद में जिसे देख बहुत रोई थी वह। माँ को उसका तो खयाल करना था, उसके लिए तो दवाएँ लेनी थी। पर नहीं... माँ पापा को माफ नहीं कर सकी थीं। वह सामने होते, कुछ पूछते वह बोलती ही नहीं। देखती तक नहीं उनकी तरफ। आँखें नीचे किए रहती।

माँ ने माफ कर दिया होता तो वह भी माफ कर देती शायद। अभी हनीफ सर को देख, उनके लिए नंदी का लगाव देख उसे पापा याद आते... तस्वीर में देखी गई एमीलिया याद आती। और बेतहाशा बुरा-भला कहती वह पहले हनीफ सर को फिर नंदी को... अब नंदी के भोलेपन और मासूमियत को देख वह मन ही मन नफरत भी नहीं कर पाती उस दूसरी एमीलिया से। उससे, जिसने उसके पापा को उसकी माँ से दूर रखा। वह जो उनके घर में साये की तरह बनी रही हमेशा। वह जिसके लिए उसके पिता ने उसकी माँ के प्रेम और सादगी को कभी महत्व नहीं दिया।

क्या नंदी जैसी ही भोली-भाली रही होगी वह? क्या उसका प्रेम भी इतना ही निश्छल और मासूम रहा होगा? कि सब कुछ बिना जाने-समझे हो गया होगा इसी तरह।

वह एमीलिया को कभी माफ कर भी दे तो पापा को नहीं माफ कर सकती। और इसीलिए हनीफ सर को भी... कभी भी नहीं... बिल्कुल भी नहीं।
 
4

हनीफ को नंदिता का भोलापन बहुत पसंद है। अपने पर इस तरह बेतहाशा विश्वास और भरोसा किया जाना भी। वे देखते रहते हैं उसे दूर तक जाते हुए। वह मुड़ कर नहीं देखती एक भी बार। पतली-दुबली नंदिता का जिस्म हिल रहा है लगातार। हवाओं से नहीं रुलाई के झकोरों को भीतर दबाए रखने की जद्दोजहद में। वह ऑटो रिक्शा रुकवाती है और बैठ जाती है झटके से... वे देखते रहते हैं उसे जाते हुए दूर तक, टकटकी लगाए। काश वह उनकी मजबूरियों को समझ पाती... वे बाहर आते हैं, ड्राइवर से गाड़ी निकालने को कहते हैं और बैठ जाते हैं यही सब सोचते-सोचते। उन्होंने उसे दुखी किया है, उन्हें अफसोस है। उन्होंने तो जान बूझ कर ऐसा कुछ भी नहीं किया। वे उसे समझाने जरूर आए थे पर उससे ज्यादा खुद को समझाने।

उनसे शायद गलती हुई थी। आना ही नहीं था उससे मिलने। पर वे रोक नहीं पाए थे खुद को आने से। खास कर वह जब ऐसे इसरार कर रही हो। उनका खुद पर से नियंत्रण खत्म हो गया था। उन्होंने कह दिया था आ रहा हूँ मैं। वे तब सोच रहे थे उससे मिल कर भी वही सब कहेंगे जो उन्होंने लिख कर भेजा है। मिल कर कहने से शायद लिखे हुए में कुछ वजन आ जाए। वह समझ सके उनकी बात थोड़े बेहतर तरीके से... पर शायद वो खुद को बहला रहे थे। दरअसल वे नंदिता की एक झलक देखने के लिए तरस गए थे इन दिनों। वे सोते जागते बस उसी के बारे में सोचते-रहते... उसकी खिलखिलाहट, मुस्कुराहट... सोचने का वह अलग सा ढंग... वह अपनी नाक में उँगली घुसा गोल-गोल घुमाती रहती। सोचते हैं वे... क्या यह तरीका घिनौना नहीं। घिन आनी चाहिए थी उन्हें उसकी इस हरकत पर। पर नहीं, उन्हें तो प्यार आता था उस पर और उसकी सारी उटपटाँग हरकतों पर भी...।

वे देखते थे पानी जहाँ कहीं भी दिख जाए कैंपस में, साफ या कि गँदला, वह उस में पाँव जरूर डालती। हल्के से थपकती उसे और थपकती रहती। तब तक जब तक कि एमीलिया उसे बाँहों से खींच कर वहाँ से बड़बड़ाती हुई हटा न ले। एमीलिया का हमेशा उसके साथ होना उनके लिए एक भरोसा था। वह साथ है तो नंदिता सुरक्षित है। वह साथ है तो... अपनी कमजोरियों से जब वह हारने लगते नंदिता का पिघलता-गलता चेहरा उन्हें याद आता। वे सोचते और पूरे भरोसे से सोचते, एमीलिया उबार लेगी उसे। वह उन से दूर ही रखेगी नंदिता को। चाहे कैसे भी... वे जानते थे बल्कि इससे ज्यादा भी कहें तो समझते थे, एमीलिया उनसे नफरत करती है। पर उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। बल्कि जितनी ज्यादा नफरत से वह उनकी ओर देखती वे मन ही मन उतना ही खुश हो लेते।

सोचते-सोचते वे घर तक आ पहुँचे हैं। घर पहुँच कर वे बीती सारी बातों को यूँ परे छोड़ देना चाहते हैं जैसे रास्ते में चिपक आई गर्दो-गुबार। वे माथा झटकते हैं अपना। शरीर भी झटका खाता है हौले से... पर नंदिता दूर छिटक कर नहीं जाती उनकी स्मृतियों से। उसका रुआँसा चेहरा, उसकी उदास आँखें चिपकी रह जाती हैं उनके वजूद के साथ। कुछ इस तरह कि नसीमा की खिलती मुस्कुराहट के जवाब में कोई हल्की सी जुंबिश तक भी नहीं आ पाती उनके होंठों पर, चेहरे पर। वो मुस्कुराती हुई कह रही है कुछ... चलिए आपको याद तो रहा... मैं तो डर रही थी, वादा कर के आप भले ही निकले हों, पर निकल गई यह बात कहीं खयाल से तो... मैंने तैयारियाँ पूरी कर ली है। आप नहा-धो लें। वे याद करना चाहते हैं। क्या याद रखना था उन्हें पर याद नहीं कर पाते। सुन कर ध्यान से बातों को समझना चाहते हैं वे, पर वह भी मुश्किल। वे पूछते हैं बेचैन होकर बच्चे... छुटका सो रहा है... वसीम निकला है अभी कहीं पड़ोस में... उसे जाने क्यों दिया, उसे बताया नहीं उसका शाम को रहना जरूरी है... आ जाएगा वह। वैसे भी कभी कहीं निकलता कहाँ... वे नसीमा को गौर से देखते हैं। इतनी गौर से जैसे पहले कभी देखा ही न हो उसे। उजली सलवार-कमीज, चिकन की हल्की-फुल्की कढ़ाईवाला। उजला ही दुपट्टा जिसे उसने इस वक्त सिर पर डाल रखा है। जिसे इस तरह डाल लेने से उसका गोल-मटोल चेहरा और गोल हो आया है। वे जैसे याद करते हैं, नसीमा का चेहरा पहले गोल और भरा-भरा नहीं था। कुछ लंबोतरा सा था, गाल धँसे नहीं पर उभरे हुए भी नहीं। कुछ -कुछ नंदी की तरह के। पर शायद नहीं। नंदी के तो कुछ उभरे हुए से हैं। चेहरे की बनावट में अलग से दिख जाते। उसके नक्श ऐसे ही अलग से दिख जानेवाले हैं। चेहरे में गुम होते नहीं, अपने होने को... अपने विशिष्ट होने को दर्शाते... बताते कि मैं हूँ... मैं सबसे अलग हूँ। नसीमा का अक्स तब भी और अब भी उसके चेहरे का हिस्सा है। उसमें घुले मिले, तरलता लिए हुए। वे चीख-चीख कर अपने होने का अहसास नहीं कराते बस होते हैं, जैसे कि खुद नसीमा।

नसीमा तौलिया, धुला कुर्ता पाजामा बाथरूम में रखने जा रही थी वे उसके हाथों से ले लेते हैं। मैं खुद ही ले जाता हूँ। वह एतराज नहीं करती, सौंप देती है उन्हें सब कुछ। वे जानते हैं नसीमा ऐसी ही है। उन्हें इसीलिए उसकी फिक्र रहती है और कुछ ज्यादा भी। वह कभी कुछ नहीं कहेगी। वे गलत भी हों तब भी। यही एहसास उन्हें गलतियाँ करते-करते थाम लेता है - नहीं...

वे जब नहा कर निकले तो भौंचक हो उठे, पूरा घर रोशनी से नहा उठा था। घर के लंबे-लंबे बाउंड्री वाल पर मोमबत्तियों और रंगीन बल्बों की लड़ियाँ जगमगा रही थीं। घर भी पूरा रोशन-रोशन। उन्होंने पूछना चाहा था नसीमा से कोई खास बात? कोई पार्टी-वार्टी है क्या... कहने को मुँह खोलते-खोलते मामला उनकी समझ में आ गया था। जानकर अपनी भुलक्कड़ी पर वे बेतरह खीजे थे, अगर नसीमा उनकी जिंदगी में न हो तो... तो...।

आगे की पाक की हुई जमीन पर वे बैठ गए थे चुपचाप। रूमाल के कोनों को अपने कानों पर अटकाते हुए उन्होंने अपना सिर ढक लिया था। सामने जरूरी चीजें फैली हुई थीं। काँच के एक गिलास में भरा हुआ अछूता पानी। छोटी सी कटोरियों में थोड़ी सी संदल, उसमे डले हुए गुलाब के फूल, आग से भरी उददानी, एक पुड़िया में पिसा हुआ लोबान। अगरबत्ती की खुशबू से माहौल खुशनुमा और पाक हुआ जा रहा था।

नसीमा बोली थी - आज शबे-बरात है, शबे कद्र की रात। उन्हें लगा जैसे सामने नसीमा नहीं बल्कि अम्मी खड़ी कह रही हों... भूली-बिसरी रूहें आज घर का रुख करती हैं, इबादतों और दुआ की रात है यह, जिस रात जन्नत के दरवाजे खुले हुए होते हैं। और इस एक रात की इबादत मतलब चार सौ बरस के सिजदे के बराबर... अजाब और गुनाहों से तौबा करने का बेशकीमती मौका होता है यह।

नसीमा आगे झुकी। काली जिल्दवाली एक कापी उसने उनकी ओर बढ़ाई। उन्होंने आगे बढ़ के उसे थाम लिया था। उनसे पहले उनके हाथों को उसका चिकनापन खला था। उन्हें याद आया पहले यह जिल्द चमड़े की नहीं होती थी। रुखड़ी सी, जगह-जगह से फटी हुई कूट के दस्तेवाली। अम्मी उसे जब भी थमाती कहती जरूर... मुई जगह-जगह से फटी-उड़ी जा रही है, कितना पुराना तो कागज है इसका पीला-बुसा। एक दिन जिल्दसाज को दे कर इसे बँधवा दे। पर अम्मी की यह पुकार और ललक भी सिर्फ एक दिन की ही होती। बाकी के 364 दिन बिसरा रिरियाता रहता वह किसी पुरानी-धुरानी ट्रंक के काले अँधेरे कोने में। और हनीफ को भी इस बीच कभी इसकी याद नहीं आती। वह समझ नहीं सका था यह करिश्मा कब हुआ। हुआ तो उसकी नजर उस पर आज और इसी वक्त क्यों गई? उसने दिमाग पर जोर डाला। पिछले कई वर्षों से वे इस दिन घर पर रहे ही नहीं। उनके पीछे वसीम ही पढ़ता रहा है फातिहा। शायद उसकी अम्मी ने भी उससे कहा हो - इसे जिल्दसाज को दे कर बँधवा दे बेटा। कितनी तो पुरानी हो चली है, मुई जगह-जगह से फटी पड़ रही है' और वसीम बँधवा लाया हो जिल्दसाज से उसे। उन्हें लगा उनका कद कुछ छोटा हो आया है अचानक। कि उनकी रीढ़ की हड्डियाँ घिस-घुस चुकी है बीचम बीच। वे बूढ़े हो चले हैं अचानक और बेकार भी। घर तो नसीमा और उसके बड़े बेटे वसीम ने सँभाल रखा है। वे तो बस पैसे थमा देते हैं हर महीने। वसीम सचमुच अपनी अम्मी का बेटा है। तहेदिल से। शक्ल, सूरत,सीरत और अक्ल सभी में। वह जहीन नहीं है अपनी माँ की तरह पर दुनियादारी में बिल्कुल परफेक्ट। माँ जो बोले वही मानता है और पूरे दिल से मानता है। वे कभी अपनी माँ के लिए वैसे नहीं हो पाए, चाह कर भी नहीं। वे बँटे रहे छोटी अम्मी और अम्मी के बीचम-बीच। कभी उन्हें वो सही लगती रहीं कभी ये। कभी वो ननहर रहे तो कभी अम्मी के पास। उनकी जहीनियत कभी इस फैसले पर नहीं पहुँच सकी कि सही कौन है। और छोटी अम्मी भी कोई दूसरी तो थी नहीं, उनकी अपनी छोटी मासी, माँ की लाड़ली, दुलारी बहन, जो बाद में बिल्कुल भी दुलारी नहीं रह गई थी।

वे सब बेचेहरे से नाम थे उनके लिए। नसीमा रोटियाँ बदलती, हलवा डालती तश्तरी में। वे फातिहा पढ़ते। फिर रोटियाँ बदल दी जाती चुपचाप। नसीमा ने फिर रोटियाँ बदली थी - कुदैशा बेगम... नाम उचारा था उसने। वे चौंक गए थे, छोटी अम्मी का चेहरा, गोरा, लाल भभूका सा उनकी आँखों के आगे आगे आ खड़ा हुआ था। हाँ छोटी अम्मी ही सबसे पहले... अब्बू और अम्मी से भी पहले। बहुत छोटी थी उम्र में। बिल्किस तब सिर्फ आठ साल की थी। अम्मी ने समेट लिया था तब उसे अपनी गोद में। नानी के सारे हील-हुज्जतों के बावजूद उसे अपने साथ लेती आई थी। वे कहतीं एकदम से कुस्सो है यह। वैसे ही गोद में चिपकी रहती है हरदम। वो भी उतनी बड़ी हो जाने पर भी पीछे-पीछे लगी रहती थी, इसी तरह।

अम्मी फूट-फूट कर रोई थीं। कुदैशा बेगम, उर्फ कुस्सो, उर्फ अपनी छोटी बहन उर्फ अपनी इकलौती सौत के इंतकाल पर। उन्हें अजीब लगा था यह सब। 18-19 की उम्र हो गई थी उनकी। वे अपने तई समझने-जानने लगे थे चीजों-बातों को। उन्हें अजीब लगता। वे जब भी ननिहाल जाते, अम्मी दिन भर बिसूरती रहतीं, कुस्सो के गर्क हो जाने की, खाक में मिल जाने की दुआएँ करती फिरती। कहतीं, बित्ते भर की जान इतनी घुइयाँ, इतनी चालाक निकलेगी वे कब जान पाई थीं। जानती तो इतना प्यार-दुलार ही न दिखाया होता। चौबीस घंटे गोद से चिपकी फिरती थी। अम्मी को कब फुर्सत थी कि वे... उन तीन बच्चों के होते न होते उसका शरीर टूट चुका था भीतर से। वह सबसे बड़ी थीं। सबकी जिम्मेवारी सँभाली उन्होंने। सबको खिलाया चोटियाँ की, कंघी किया, स्कूल भेजा। खुद की पढ़ाई कहाँ होती थी उस जमाने में। मौलवी आते थे। शुरुआती सलीका और दीनो-मजहब की बातें उन्हींने सिखाई... पर वे कुस्सो के लिए अड़ गई थीं, कुस्सो स्कूल जाएगी... और गोल-गोल टमाटर जैसे गालोंवाली उस लड़की को जब वे पहले दिन स्कूल छोड़ने गई थीं, उनके रानों में धँसी जा रही थी वह। कस के जकड़ रखा था उनकी टाँगों को। अलग करना चाहा था खुद से तो बुक्का फाड़ के रो पड़ी थी। किसी तरह स्कूल तो छोड़ आई थी वे उसे पर मन कहीं उसी में अटका रहा। वह जो उनके बिना न खाए, न पीए, न सोए। वह जो उनके पीछे-पीछे घूमती फिरे दिन भर... कैसे रही होगी उनके बगैर। ...शाम को अब्बू के उसके घर लाते ही उन्होंने उसे बाँहों में कस लिया था।

उनके उसी उन्स का तो फायदा उठाती रही वह हमेशा। उनके नए-नए दुपट्टे कतर कर अपनी गुड़िया के कपड़े बना डालती। वे कुछ नहीं कहतीं। उनके कंघे, रिबन, सुरमा सब इधर उधर करती रहती वो। थोड़ी बड़ी हुई तो उनके दुपट्टे, उनके सारे अच्छे कपड़े... वे कुछ भी नहीं कहती थी। चुपचाप पुराने-धुराने से ही मन मार लेतीं। खेलने-खाने के दिन हैं उसके। छुटकी थी सबसे। अब्बा रहते अब तक तो इस खूबसूरत सी जान पर सौ जान निछावर जाते। दुनिया भर की खुशियाँ रख देते उसके कदमों पर। लेकिन, बिचारी ने कुछ नही देखा तो नहीं देखा... इतने से ही खुश हो लेती है तो वे कौन होती हैं उसकी खुशियाँ छीन लेनेवाली। वे लाड़ करतीं फिर भी। छोटी तो है वो। पर वे शायद गफलत में ही रही थीं हमेशा। वह छोटी न जाने कब की बड़ी हो चुकी थी। इतनी बड़ी कि बहन की छोटी-छोटी चीजों से उसका मन नहीं भरनेवाला था। बहन की गृहस्थी, उसकी खुशियाँ सब की चाहत होने लगी थी उसे। तभी तो पूछा होगा अमिया से और अमिया ने कुस्सो से तो उसने मनाही न की... उनकी आँखों में आँसू आ जाते हैं टूटकर... जब रहमान मियाँ ने ही एक बार भी मना नहीं किया तो...

कोई आ गई होती... कोई भी... कोई हुस्नपरी या कि फिर कोई ऐरी-गैरी, ऐसी-वैसी, सब सिर माथे पर। पर उस कुस्सो के हाथों कैसे देखती रहती वे अपने शौहर को छिनते हुए। किए हैं उन्होंने वे सारे करम जिसके लिए पहले रहमान मियाँ और फिर हनीफ कुसूरवार समझता है उन्हें... और नहीं है उन्हें कोई अफसोस... वह क्या कोई भी औरतजात सह पाती यह सब कुछ?... और किया भी तो क्या... अच्छी सौत नहीं बन सकीं... सौत भी कभी अच्छी हुई है...?

कुस्सो ने ही क्या नहीं चाहा कि मौका मिलते ही रहमान मियाँ को मोड़ ले अपनी तरफ! वो तो वही खड़ी रही सख्तजान होकर... और फिर खुदा ने सुन ली उनकी... कोख हरी हुई तो पहले-पहल उन्हीं की, चाहे बरसों बाद ही सही।

और उन्होंने छोटी को अपने सारे मौके निकाल लेने के बाद वापस मायके भिजवा दिया। अब उसका काम भी क्या था इस घर में। और अब वह उनकी कुस्सो थी भी कहाँ, सिर्फ छोटी बन कर रह गई थी उनके लिए। हनीफ घुटनों चलने लगा था, गिरस्ती सँभलने लगी थी धीरे-धीरे कि वे चाहने लगी थीं कि उनकी गिरस्थी आजाद हो उस कुस्सो के चंगुल से। अब उसका इस घर में क्या काम। जो देने आई थी वो इस घर को और उसके शौहर को वह तो... या कि देने ही नहीं दिया था उन्होंने... और मारे जलन के उनकी सूखी-सिली हिम्मतहारी कोख अचानक से हरिया उठी थी, कुस्सो का आना जैसे उसे भी न सुहाया हो।

अम्मीजान की नजर भी बदलने लगी थी। जो कुस्सो उनकी आँख का तारा हुई जा रही थी, अचानक से दाई सरीखी होने को आई थी। वे कहती भी - इसमें गलत क्या है, बहन की ही तो टहल करनी है। बहन ने अपना शौहर दे दिया पर तूने क्या दिया बदले में। यह वही अम्मीजान थी जिसने बढ़कर अमिया से कुस्सो का हाथ माँगा था। अमिया भी वारी-वारी। बिलाशौहर तीन-तीन बेटियों को ब्याहते-निबटाते, उनके तीज-त्योहार की रसम पूरी करते-करते थक चली थी वो। इतनी ज्यादा कि बेचारी कुस्सो के लिए कुछ बचा ही नहीं रह गया था उनके पास। उल्टे कुस्सो ही छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा लेती और कुछ पैसे आ जाते उनके हाथ। नहीं तो पट्टीदारों-बटाईदारों से बच कर जो कुछ हाथ आता वह खींच तान कर बमुश्किल इतना होता कि किसी तरह उन दो जनियों का गुजारा हो जाए। अमिया को कुस्सो की चिंता सताती। इस तरह जवान-जहान बेटी को कब तक सिर बैठा के रखेंगी। वे हर आने-जानेवाले को कुस्सो के लिए कोई बढ़िया लड़का देखने को कहतीं। लोग कुस्सो को देखते, उसकी भोली खूबसूरती को देखते, लड़कों की फेहरिस्त दिमाग में आ जाती पर घर की माली हालत का ख्याल करते हुए वे बस इतना ही कहते - 'बताऊँगा कहीं कोई दिखा तो'।

नफीसा जब पिछली बार मायके गई थी वे और अमिया सारी रात बतियाती रही थी सिर्फ कुस्सो के बारे में। आसापास के लौंडे लफाड़े सामने जमघट लगा कर बैठने लगे थे। दिन भर पत्ती खेलते, हाहा हीही करते। कुस्सो को कहीं भेजना-निकालना भी मुश्किल। अब काम चाहे दो पैसे का ही हो, काम है तो वहीं निकलेंगी। और घर है तो सौ काम। दवाएँ, राशन, घर की घटी-बढ़ी चीजें। वे सोचती रही थीं उस रात शानो और बन्नो दोनों से बातें करेंगी। उन्हीं की तो जिम्मेदारी है कुस्सो। किसी तरह मिल जुल कर निबटा दे उसे। वे माँ की तरह बिल्कुल भी नहीं चाहती थी कि रुपए-पैसे की तंगी में किसी दुहाजू बूढ़े के संग निकाह हो उनकी छोटी सी बहन का। वे सोचती रही, थोड़ा बहुत ही सही पढ़ा-लिखा हो। कमा खा लेने की हैसियत रखता हो और शक्ल से बहुत खूबसूरत न सही बदशक्ल भी न हो। वे तीन-तीन बहनें मिल कर भी क्या कुस्सो के लिए इतना नहीं कर पाएँगी। एक ऐसा लड़का... उसने सोचा रहमान मियाँ से भी बात करेगी वह इस बाबत।

सुबह जब वे सो कर उठीं कुस्सो उनके लिए नहाने का पानी गर्म कर के रख रही थी। साबुन, तौलिए सब अपनी जगह दुरुस्त... उन्होंने ध्यान से देखा दिन पर दिन कितनी खूबसूरत होती जा रही है कुस्सो। वे तीनों बहनें तो कभी ऐसी नहीं रही। साधारण सी शक्ल-सूरत साधारण सा बढ़ाव। बस रंग अमिया जैसा शफ्फाक। यही खूबी उन्हें खूबसूरतों की कतार में ला खड़ा करती। पर कुस्सो... हर तरह से खूबसूरत, कद, बुत, रंग, जिस्म सबसे। फूले-फूले गुलाबी-सुर्ख गाल। बड़ी-बड़ी काली आँखें। उनकी और शानो की आँखें तो अमिया की तरह भूरी हैं, कुईस आँखें। बन्नो की आँखें काली तो हैं लेकिन कुस्सो जितनी बड़ी-बड़ी और गहरी नहीं। उन्हें जलन हुई थी पल भर को कुस्सो से। इसे ही होना था इतना खूबसूरत। वह भी तब जब घर में पाई-कौड़ी तक का ठिकाना नहीं। किसी ऐसे-वैसे से ब्याही गई तो लंगूर-अंगूरवाली कहावत हो जाएगी। और खुदा न खास्ता कुछ ऐसा-वैसा ही हो जाए तो... ताक में बैठे हैं दुश्मन... वे सोच कर ही घबड़ा उठी थीं। सोच की इस बेख्याली में तौलिया उनके हाथ से छूट कर गिर पड़ा था। कुस्सो खिलखिला कर हँस पड़ी थी बेसाख्ता। खिलखिला कर हँसती हुई कुस्सो को देख कर उन्हें गुस्सा आया था। जोर से चीखीं थी वे। इसमें इस तरह खिलखिला कर हँसने की कौन सी बात हो गई। वह चुप हो गई थी अचानक। अमिया ने भी उन्हीं की हाँ में हाँ मिलाई थी। जनी जात को इस तरह हँसना भाता नहीं... लड़कियों की तरह रहना सीख। फिर उन्हें लगा था बेवजह ही बरस गईं वे उस पर। इत्ती सी उम्र में इतने सारे बोझ, घर का इतना सारा काम और हँसने पर भी पहरे। वे और शानो तो इससे बड़ी होने पर भी अमिया की गोद में घुस कर बैठ जाती थीं। इतनी बेपरवाह कि दुपट्टे-कपड़े तक का शऊर नहीं। हर बात पर खिखियाती फिरतीं। और अब्बू तो जैसे इसी पर वारी-वारी रहते।

वे जब सरापा कुस्सो की फिक्र में जुटी थीं, मायके से अपने घर तक... उसी बीच जिंदगी ने नए रुख ले लिए थे। उनके आने के बाद अम्मीजान मिलने गई थीं अमिया से। अम्मी जान पहले भी मिलने जाती रही थीं अमिया से, इसमें उन्हें क्या उज्र होती। और यूँ भी अम्मी जान के किसी काम में उज्र करे या अपनी टाँग अड़ाये इतनी उनकी हैसियत ही कहाँ थी। पर जाने का अंजाम ऐसा भी होगा या हो सकता है नफीसा बेगम ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। वरना वो जैसे भी होता, जिस तरह भी बन पड़ता अम्मी जान को अपने मायके नहीं जाने देती।

उन्हें सोच कर तकलीफ होती, अमिया ने कैसे मान ली उनकी बात? और कुस्सो... उसे खयाल भी नहीं आया कि इस तरह वह अपनी अपिया का घर, उसकी जिंदगी तबाह करेगी। पढ़ी-लिखी लड़की ठहरी इतनी तो समझ होगी ही उसे... पर कौन सी मजबूरी थी आखिर...।

उन्हें पता थी सारी मजबूरियाँ। पर वे मजबूरियाँ अभी छोटी जान पड़तीं। वे तो तैयार ही थीं कुस्सो का ब्याह करवाने की खातिर। अमिया ने थोड़ा तो इंतजार किया होता। उसके बारे में नहीं तो रहमान मियाँ की उम्र के बाबत ही सोचा होता। पर अमिया को सोचने-समझने की फुर्सत ही कहाँ थी। बसा-बसाया घर दिख रहा था उन्हें, भरा-पूरा। अपनी आजादी दिख रही थी... अपनी जिम्मेदारी से आजाद होने का खयाल... वह खयाल, जिसकी चिंता में वे दिन-रात घुल रही थी। बस नहीं दिख रही थी तो अपनी बच्ची नफीसा। उनकी निगाह से तो कुछ भी हैरतअंगेज नहीं था। वे न कर देतीं तो उनकी सास कोई और रिश्ता माँग लाती। फिर बुरा क्या था कि कुस्सो ही उनके घर जाए। कम से कम बहन का लिहाज तो रहेगा उसे। खयाल ही रखेगी हमेशा की तरह अपनी अपिया का। सौत बन कर छाती पर मूँग नहीं दलेगी।

अम्मी जान ने छह साल की लंबाई को खींच तान कर इतना बड़ा कर दिया था कि उसके बोझ के तले वे तो अधमरी हुई ही जा रही थी। रहमान मियाँ तक ने भी उफ नहीं किया।

या कि वे भी चाहते थे यही सब कुछ। सोच-सोच कर उनका कलेजा मुँह को आने को होता। पर वे बेचारी सी, करती भी तो क्या। एक कोने में बैठी चुपचाप देखती रही सारा खेल। ब्याह तो ऐसे रचा रही थीं अम्मीजान जैसे पहले-पहल घोड़ी चढ़ने जा रहे हों रहमान मियाँ, 16-18 की उम्र हुई होगी उनकी। साज-सिंगार हौसला... कमी किस चीज की थी। उन्हें दुख होता, इतनी हौस तो पहली बार भी न दिखाई थी उन्होंने... गहमागहमी ऐसी कि अपना दुख बाँटनेवाला कोई कोना न दिखे। रिश्तेदारों की लपक-झपक, चुहल। खदबद-खदबद पकते तरह-तरह के गोश्त... रंग-बिरंगे मसालों की खुश्बू। देग में हमेशा हमेशा कुछ खदबदाता रहता। भाप के गुबार से जाड़े के सर्द दिन भपाए हुए से हल्के नरम-गरम। और कोई छोड़ता कहाँ था उसे, न काम में पेरने से न ताने मारने से। का हुआ भौजाई, बहिन ही तो आ रही है, रानी बन के रहना। मन लगा रहेगा दोनों का। रहमान भाई तो ऐसे भी काम में फँसे रहते हैं। उन्होंने भँड़ास बर्तन-भाड़े पर निकाली थी... धम्म... धुम्म... खट... खटाक...

रमजान मियाँ शायद कपड़े बदल रहे थे। बर्तनों की उठापटक से मन नहीं भरा तो लाज-हया सब छोड़ कर दरवाजे की ओट में लिपट गई थी उनसे। ऐसा कौन सा गुनाह हो गया था हम से... एक बार बस एक बार झूठ ही सही मना तो कर देते अम्मी जान से। मेरा कलेजा जुड़ा गया होता। मैंने आपकी खिदमत में कौन सी कमी छोड़ी थी... आप ही तो कहते थे कि तुम्हारे बगैर अपनी जिंदगी की मैं सोच भी नहीं सकता। फिर मेरी जगह पर किसी और को लाने को कैसे तैयार हो गए आप? उसने देखा था रहमान मियाँ पसीजे थे... उनकी बाँहें उसके इर्द-गिर्द कसी थी, फुसफुसाए थे वे, कोई देख तो नहीं रहा होगा... वह हरी हुई थी भीतर से... देख लेने दीजिए, कौन सी चोरी कर रहे हैं हम। आपकी बीवी हूँ मैं। निकाह पढ़ा कर लाए हैं मुझे। यह अलग बात है मुझमें वो बात नहीं है। उसे लगा उसके सिर पर से ससरा है कुछ कीड़े जैसा, वह माथे तक आया तो समझ पाई रहमान मियाँ के मन का गीलापन था। वह बेकार ही दोष देती रहती है उन्हें, अब बेचारा मर्द तो हर तरफ से मारा जाता है औरतों की तरह बहस, जिरह चिल्ला चिल्ली तो करने से रहा। रहमान मियाँ को पिघलते जान उसने मन की बातें पुख्तगी से जारी रखी...। एक बच्चे के न होने ने... मुझ से मेरे ये सारे हक छीन लिए हैं। मैं कहती हूँ कौन सी उमर बीत गई है मेरी। अभी तो चौबीस को भी नहीं लगी। छ: साल न हुए...। उसे लगा रहमान मियाँ की पकड़ ढीली हुई फिर फिसल गई ऊपर-ऊपर। मुझे एक जरूरी काम याद आ रहा है। वैसे भी घर लोगों से अटा पड़ा है... वे झटके से निकल गए थे। वे जब कमरे से निकली तो उन्हें लगता रहा सब के सब लोग उन्हें ही देख कर हँस रहे हैं। वे जैसे नजरें चुराती फिर रही थीं सबसे। वे आँगन तक निकल आई थी वहाँ। जहाँ रिश्तेदार औरतें सालन के लिए ढेरमढेर प्याज काटने के लिए बैठी थी। उन्हें देखा तो किसी ने पुकार भी लिया इधर उधर कहाँ डोलती फिर रही हो दुल्हन बी? ये न कि थोड़ा हाथ ही बँटा दे हम बूढ़ियों का। चचिया अभी आई कह कर वे चुपचाप बैठ कर प्याज काटने लगी थी। भीतर उमड़-घुमड़ करते आँसू जैसे बाहर निकलने का रास्ता पा गए हों। वे आँसुओं को बहने दे रही थी चुपचाप। अभी मौका है... यही मौका है। किसी ने टोका भी था छोड़ भी दो दुल्हन बी, इस तरह जार-जार आँसू बहाओ तो... आपा जान या रहमान मियाँ ने देख लिया तो... वे फिर भी नहीं उठी थी। बहने दिया था अपने आँसुओं को।

वे सोच रही थी एक ही पल में रहमान मियाँ ने उसे किस तरह परे ढकेल दिया, सिर्फ एक औलाद न होने के कारण न। उन्होंने अपनी हथेलियाँ हौले से पेट पर फिराई थीं। इसी कोख की कारण सब कुछ। इसी कोख ने उनकी छोटी बहन को छोटी नहीं रहने दिया था...। फिर भी जब वे ही माँ बनी तो कैसे भूल जातीं वह सब कुछ। उन्होंने अपने हाथ से छूटी जा रही बागडोर को एक बार फिर अपने हाथों में सँभाल लिया था। अम्मीजान बीमार रहने लगी थीं। पर वे पलट कर भी नहीं देखती उनकी तरफ। उनकी लाड़ली कुदैशा तो है ही, ले आई थीं जिसे बड़े चाव से। करे उनकी सेवादारी। वे पल भर को भी नहीं सोच पाती थीं कि छोटी उनकी अपनी ही बहन है। सगी बहन। बाद में कुदैशा को भी अमिया के घर भिजवा के ही दम लिया था और अम्मीजान का काम दाई नौकरों के हाथ। इस तरह पल भर को उनके कलेजे की बेचैनी कमी थी। पर बस पल भर के लिए। वे जब-जब खुश होने की कोशिश करतीं कहीं से कूद कर आगे आ जातीं वह और जब-तब वो अपनी सारी भँड़ास रहमान मियाँ पर ले कर टूट पड़ती। जितना कड़वा-कसैला था भीतर वे सब बहा देना चाहती। पर वह फिर-फिर उग आता था नमीवाली जगह पर उग आनेवाली काई की तरह।

धीरे-धीरे उन्होंने गौर किया था, रहमान मियाँ तो उससे दूर-दूर ही रहते। छोटा हनीफ भी दूर-दूर भागने लगा था उनसे। रहमान मियाँ की तरह गाहे बगाहे बहाने-बहाने अमिया के घर डेरा डालने लगा था। वहाँ से ले आओ या मँगवा लो तो वो लोटमपोट कि उनका जी घबड़ा उठता। घबड़ा कर सोचती पड़े रहने दो वहीं। उनका क्या कमा जाता है इससे। बेटा तो उन्हीं का कहलाएगा। पर कभी-कभी मन बेतरह कसक उठता। उनके हिस्से सब कुछ था पर कुछ भी नहीं। और उस छोटी के... ऐसे में ही उसका प्यार जीतने की खातिर दस-बारह बरस के हनीफ को बगल में सुलाए-सुलाए ये कथा-व्यथा सुनाई थी...

...पता नहीं कितना और क्या समझा था उसने। पर अब पहले की तरह दूर-दूर नहीं भागता था उनसे। कभी-कभी बगल में आ लेटता। और जब तब उनके पेट में टाँगें घुसेड़ कर, बालों में ऊँगलियाँ फँसा कर सो जाता वह तो उनका मन पल भर को अपने सारे दुख भूल जाता। वह सोचती कुस्सो के हिस्से में ये खुशियाँ कहाँ। अगर हनीफ सो ही लेता होगा ऐसे लिपट कर तो फिर भी मन में एक कसक तो होती होगी... यह उसका खुद का जना होता, उसकी अपनी औलाद... बाद में आई भी तो बिलकिस, उसके गम को और गाढ़ा और पुख्ता करने...। इसी दुख ने लील लिया होगा उसे। वे अपने सिर से जैसे सारे इल्जाम हटा देना चाहती, हनीफ के आगे...

... नसीमा ने अपने सिर का दुपट्टा सँभालते-सँभालते जब अब्बू के नाम की रोटियाँ बदली तब तक वे अम्मी और छोटी अम्मी की यादों से उलझे हुए थे बेपनाह। अब्बू अब सब से बड़े कसूरवार थे उनकी नजर में। अम्मी से तो वे जुड़ भी चले थे धीरे-धीरे पर उन्हें वे कभी माफ नहीं कर पाए। बाकोशिश उनकी किसी याद को उन्होंने इस वक्त भी अपने पास नहीं फटकने दिया। वे मशीन की तरह नसीमा का कहा-किया दुहरा रहे थे बस...।

...पल भर को उन्हें खयाल आया था कल को वसीम भी अगर उनसे इसी तरह नफरत करे तो...? अब्बू के पास तो झूठी-सच्ची ही सही कई मजबूरियाँ थीं, कई दवाब... पर वे? उन्हें अब्बू के नाम का फातिहा पढ़ते-पढ़ते अम्मी की बात याद हो आई - 'अजाब और गुनाहों से तौबा करने की रात है यह। ईबादतों और दुआ की रात।' नसीमा के चेहरे को बराबर देखते हुए उन्होंने एक अनकहा फातिहा नंदिता के नाम का भी पढ़ा था - 'यह अनकहा रिश्ता, भूल-चूक, गिले-शिकवे, सब के सब आज यहीं खत्म। बीती कहानी कभी नहीं दुहराई जाएगी... हर्गिज नहीं... उनके हाथों तो कभी भी नहीं।
 
5

सुबह बहुत सीली-सीली थी। दिसंबर की आम सुबहों की तरह हल्की गीली, पोली। नंदिता अभी-अभी नहा कर निकली थी। कुछ कपड़े भी धो डाले थे उसने, अपने और हनीफ सर के। इसलिए हल्की कँपकँपाहट हो रही थी उसे। उसने कॉफी का मग तैयार किया और बाल्कनी में आ बैठी। अखबार अभी आया नहीं था। वह सोच रही थी करे भी तो क्या करे। यूँ करने को बहुत कुछ था। थीसिस अधूरी थी। बहुत दिनों से उसने घर फोन नहीं किया था। माँ की बीमारी की खबर जानने के बाद भी... बात करने का बहुत मन होने के बाद भी। वह जानती थी माँ की इस हालत की जिम्मेवार कहीं वह भी है। पर वह आखिर करे भी तो क्या? अगर फोन किया उसने तो माँ फिर शुरू हो जाएँगी। हनीफ सर के लिए अनाप-शनाप बकेंगी और वह सह नहीं पाएगी। उल्टे अगर उसके मुँह से कुछ निकल गया तो... नहीं, वह ऐसा नहीं होने देना चाहती...। मोबाइल वह कमरे में रख आई थी। फिर क्या करे वह...? उसे एक अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। कोई तीखी सी गंध जैसे नथुनों में पसर रही हो, तेजी से। एक अजीब सी घबड़ाहट। हनीफ सर को फोन करे वह...? नहीं अभी परसों ही तो आए थे वे। और अभी तो वे कान्फ्रेंस के लिए मुंबई पहुँचे ही होंगे...। तो फिर क्या करे वह...? तो क्या सब ठीक ही कहते हैं... उम्र के इसी पड़ाव पर यदि इतना अकेलापन है तो बाद में उसके हिस्से सिर्फ एकांत ही बचेगा। आखिरकार उसने अपनी यह नियति भी तो खुद ही चुनी है। उसे बेतरह घबड़ाहट होने लगी थी। खुद से... अपने घर से... अपने आस पास के माहौल से... उसने बाल्कनी से बाहर देखना चाहा। वहाँ भी बस एक अजीब सा सन्नाटा। माना कि जाड़े की धुर सुबह थी यह... लेकिन स्कूल, कालेज या दफ्तर को ही निकलता कोई व्यक्ति... एक भी इनसान उसे क्यों नहीं दिख रहा दूर-दूर तक... उसकी तलाश जितनी अधिक बढ़ रही थी उसकी घबड़ाहट उससे भी दुगुनी गति से। वह मन ही मन प्रार्थना करने लगी थी कोई आए... कोई आ जाए... एमी ही आ जाए... पर एमी से बातचीत हुए महीनों बीत गए थे। अंतिम बार भी बात बस बहस पर ही आ थमी थी। वह समझाकर नहीं थकती और वह नहीं समझ कर। उसके बाद दोनों ने यही ठीक समझा था कि वे जितना कम मिलें वही बेहतर।

हनीफ सर के होने से इस घर, इसकी दरोदीवारें और खुद उसमें एक नई जान आ जाती है। वह अगला-पिछला सब भूल उठती है उनकी छाया में। ...बस वे और वह। जैसे साधारण से साधारण बात, साधारण से साधारण चीज सब अद्वितीय हुई जा रही हो। सब के सब पल अविस्मरणीय। छोटी से छोटी बातें भी बहुत महत। इन्हीं पलों की चाहत में तो वह इतना बड़ा फैसला ले पाई। वर्ना वह एक कमजोर सी लड़की... उसमें तो एमी जितनी हिम्मत और ताकत भी नहीं। हनीफ सर के कद-बुत ने जैसे उसे भी एक ऊँचाई दी हो...। उसी ऊँचाई, उसी प्रेम-बोध में डूबी वह बिता लेती थी जीवन के और सारे दिन। वे सारे दिन, जब हनीफ सर उसके पास नहीं होते थे, वह यादों की चादर को कस कर ताने रहती अपनी चारों तरफ जिसकी गर्माई और शीतलता मौसमानुकूल उसका कवच बन तनी रहती उसके इर्द-गिर्द। जहाँ बाहर के वातावरण का कोई कण-क्षण प्रवेश नहीं कर पाता था। पर इन दिनों वह देख रही थी, वह चादर थोड़ी पुरानी हो चली थी। हालाँकि नंदिता का मन यह मानने को तैयार नहीं होता था पर अब जब भी वह उसे अपने इर्द-गिर्द लपेट सुकून और चैन से दो पल बिताना चाहती धूल कण की तरह छोटी-छोटी श्रृंखलाएँ उसे आ घेरतीं। नाचतीं चारों तरफ इस हद तक कि उसे परेशान करने लगतीं। वह हैरान थी यह सोच कर कि ऐसा हुआ तो कैसे और कब?

वह चौंकी थी दरवाजे पर कोई दस्तक हुई थी। कौन होगा... तो क्या उसकी प्रार्थना ही रंग ले आई? वह इस तरह खयालों में डूबी थी कि बाल्कनी में होने के बावजूद किसी का आना देख नहीं पाई। विचारश्रृंखलाओं से बँधी-बिंधी वह दरवाजे तक आ पहुँची थी। दरवाजे पर अखबारवाला था। साथ में बिल होने के कारण उसने दरवाजे पर दस्तक दी थी। वह अखबार समेट कर भीतर आई थी और पुनः उसी बाल्कनी में... उसने बेमन से अखबार खोला था। पर अखबार खोलते ही उसकी बेदिली काफूर हो चली थी। उसका अकेलापन भी खो चला था जैसे। ऐसा अक्सर होता है। जब-जब एमीलिया का कुछ लिखा वह अखबार में पाती है। बल्कि पहले साथ-साथ होने पर वह जैसे अखबार के इंतजार में ही रहती थी। एमी कहती थी ऐसा भी क्या इंतजार... लिखना मेरा काम था... लिखने से मैं खुद को रोक नहीं सकी थी। यह इंतजार तो औरों में हो... और इंतजार से भी ज्यादा प्रतीक्षा मुझे उस छोटे से बदलाव की होती है जिसकी आशा में मैं इस जद्दोजहद से बार-बार गुजरती हूँ...

उसके मन से किसी प्रिय की प्रतीक्षा खत्म हो चुकी थी। एमी साथ नहीं थी पर सामने थी उसके। रात को जाग-जाग कर लिखती... बेचैनी में चहलकदमी करती। उसकी या खुद की बनाई कॉफी पीती और फिर-फिर लिखती। उसने लेख को पढ़ना शुरू किया था...। उसे लगा वह एमी से बात ही कर रही है... बल्कि बात न कर के सुन रही है उसे भोली-भौंचक सी हमेशा की तरह। लेख दिल्ली महिला आयोग के उस निर्णय की प्रतिक्रिया में था जिसमें छोटी बच्चियों को भी यौन शोषण और अपराधों के खिलाफ प्रशिक्षित करने की बात थी। शीर्षक था - रक्षा में हत्या। उसने पढ़ा था - तर्क यह कहता है कि जिन छोटी बच्चियों को खुद से कपड़ा पहनने, मुँह धुलने तक का शऊर नहीं, जिन्हें भूख-प्यास और तमाम दैनंदिन आवश्यकताओं के लिए अपने से बड़ों, खास कर स्त्रियों पर आश्रित रहना पड़ता है उन्हें हम समझाँ तो क्या, कितना और कैसे। कितना शंकालु बनाएँ कि वो सामनेवाले की नीयत भाँप सके। कि वो पिता और ताऊ की गोद में जा कर न बैठे, भाई से लाड़ न लड़ाए... क्या इस तरह हम मासूम बच्चियों से उसका बचपन नहीं छीन लेंगे। मर्ज कहीं और ईलाज कहींवाली स्थिति है यह। कौन सा सपना होगा फिर उन आँखों में, रिश्तों के प्रति औन सी संवेदना बची रह जाएगी उनके कोमल हृदय में। कैसा होगा फिर उनका बचपन, डरा-सहमा किसी अनजान-अनहोनी की आशंका से इतनी भयभीत? क्या हमारे लाख प्रयासों के बावजूद ये इतनी हिम्मत जुटा पाएँगी कि जवान और बलिष्ठ पुरुष शरीरों का भरपूर प्रतिरोध कर सकें। जबकि परिपक्व और समझदार स्त्रियाँ चार पुरुषों से घेर लिए जाने पर खुद को अवश और असहाय पाती हैं... गरीबी और भुखमरी से जूझते झुग्गी झोपड़ियों की बच्चियों में कितनी और कैसी शारीरिक शक्ति भर पाएँगे हम...?

एमी ने आगे लिखा था... जरूरत यह है कि बाल बलात्कार के मामलों को अन्य बलात्कार के मामले से जोड़कर न देखा जाय क्योंकि दोनों के बीच मूलभूत अंतर है। उतना ही बड़ा अंतर जितना कि एक मासूम और परिपक्व के शारीरिक और मानसिक बुनावट के बीच होता है। इसके लिए सरकार और न्यायपालिका को कड़ा से कड़ा नियम बनाना चाहिए और इसका सख्ती से पालन होना चाहिए कि बलात्कृत होकर या कि बलात्कार से बचने की प्रक्रिया में किसी के बचपने के साथ बलात्कार न हो...

लेख को पढ़ने के बाद उसका मन बहुत उदास हो आया था। कितनी देर तक बैठी रही थी वह किंकर्तव्यविमूढ़ सी। फिर जब थोड़ा चेती एमी को एसएमएस किया - लेख बहुत अच्छा था, पढ़ कर जैसे मन विचलित हो उठा। मिलना चाहती हूँ, क्या तुम भी चाहोगी? उसे याद नहीं कि पिछला एसएमएस उसने एमी को कब किया था। वह एसएमएस बहुत कम करती थी। एमी के ही एसएमएस आते रहते थे अक्सर। बातचीत जब लगभग बंद थी उस अवधि में भी। कभी वह उसके एसएमएस से खुश होती थी। पर अब उसके भेजे गए संदेशों से उसे चिढ़ होने लगी थी, जहाँ उसे याद करने या कि उसकी याद आने की भावना से ज्यादा अब वह हनीफ सर और उसके रिश्ते के प्रति अप्रत्यक्ष में अनाम सा जहर ही पाती थी। वह अक्सर सोचती आखिर एमी कब तक ऐसा करती रहेगी। अब जब कि उसके ऐसा करने का कुछ भी मतलब ही नहीं रह जाता।

वह चाहती तो एमी को फोन कर सकती थी पर उसने ऐसा नहीं किया। एसएमएस में अपना कह लेने और दूसरे से रूबरू न होने की आजादी तो थी ही... और दूसरे को भी यह स्वतंत्रता थी कि मन हो तो आपका कहा सुने, माने, जवाब दे कि न दे... नंदिता के मन में झेंप, शर्म, पीड़ा, दुख और अवसाद सब के सब घुले पड़े थे और वह नहीं चाहती थी कि उसकी बातों के साथ यह सब भी एमी तक संप्रेषित हो। फोन सुनना मजबूरी हो सकती है पर एसएमएस पढ़ना...।

एसएमएस भेजने के बाद नंदी प्रतीक्षा करती रही देर तक... या कि वक्त का वह छोटा सा टुकड़ा ही रबड़ की तरह खिंचा चला जा रहा था। उसमें अजीब सा अनमनापन घर करने लगा था। क्यों भेजा उसने मैसेज। ऐसे तो उसने भी कभी एमी के संदेश का जवाब देना तक उचित नहीं समझा फिर आज...। एमी भी उसे जवाब क्यों दे... उससे उम्मीद क्यों? वह उठ कर ब्रेड सेंकने चल दी थी, नाश्ते के लिए। नाश्ता अभी आधा-अधूरा ही तैयार हुआ था कि उसने सुना मोबाइल की घंटी टनटनाई थी, संक्षिप्त सी। वह भागी थी। एमी का ही एसएमएस था - शुक्रिया। अगर व्यस्तता न हो तो तुम जब चाहो और जहाँ, लेकिन शाम के चार बजे से पहले तक ही। ...फिर ठीक, लोदी गार्डेन। दोनों के लिए दूरी समान होगी और थोड़ी धूप भी सेंक पाएँगे हम इन दड़बों से निकल कर। नंदिता ने फिर से एसएमएस ही किया था, फोन नहीं। अब आमना-सामना एक बार ही।

वह तय कर के निकली थी आज चाहे जो हो वह एमी की बातों का बुरा नहीं मानेगी। उसकी अपनी दृष्टि है और वह गलत भी तो नहीं। उसी के भले के लिए तो कहती है वह... उससे प्यार करती है इसी खातिर न। मम्मी पापा तो कितने-कितने दिन दिनों तक नहीं बोलते हैं उससे, एक वही है जो कभी मन में कुछ रखती नहीं।

सुबह के दस बजे होंगे। कुहरा छँट गया था आसमान से। सुबह गुनगुनी हो उठी थी। नर्म, मुलायम सी। सेंक से मन हुलस रहा था। दूर तक फैली हरी घास, पुरानी इमारतें और इस ठंड में भी पेड़ों की ओट में छिपते-दिखते दुनिया से बेखबर जोड़े। उन्हें अभी कुछ से मतलब नहीं था। नीचे हरी घास और ऊपर धूप से भरा आसमान और उन के बीच वे दोनों थीं। यह नेमत थी उनके लिए जो बहुत दिनों बाद नसीब हुई थी उन्हें। वे मूँगफलियाँ टूँगती हुई एक दूसरे को देख रही थीं। बहुत दुबली हो गई है तू... और तू तो मुटा कर जैसे अम्मा हुई जा रही है... एमी ने कहा बिल्कुल खयाल नहीं रखती तू अपना, दोनों ने लगभग साथ-साथ ही कहा था एक दूसरे से और हँस पड़ी थीं साथ-साथ। उनकी हँसी से घुल कर धूप और खिल उठी थी। घास और हरी-हरी और सामने के खंडहरनुमा इमारत में भी जैसे चमक जैसा चमक उठा था कुछ।

पापा आए थे, एमी ने धीरे से कहा... फिर...। बहुत कमजोर और उदास लग रहे थे। कुछ कह रहे थे... क्या कहते, सिवाय इसके कि सैटल हो जाओ अब। जितना कुछ करना-धरना था सब तो कर लिया। और यदि नहीं करनी शादी तो मेरे पास चली आओ या मैं ही तुम्हारे साथ... अब अकेले रहा नहीं जाता। हम दोनों को ही एक दूसरे के सहारे की जरूरत है... क्या सोचा तुम ने? कहती क्या, इसमें से कुछ भी संभव नहीं। वे न अपनी क्लीनिक छोड़ कर यहाँ आएँगे और न मैं सुबह शाम उन्हें अपने सामने बर्दाश्त ही कर पाऊँगी। दूर रह कर कभी-कभी तो सहानुभूति से सोच भी पाती हूँ उनके पक्ष में। जब साथ रहूँगी तो फिर वही पुराना... तब और अब में बहुत अंतर है। शायद सब कुछ अब सुलझ सके। शायद अब तुम उन्हें माफ कर सको। एक बार कोशिश तो कर ही सकती हो। नंदिता सोच कर आई थी कि एक-दूसरे की जाती जिंदगी में दखल नहीं देंगे पर आज एमी ने कुछ नहीं कहा तो वही शुरू हो गई... अचानक बात बदलने के लिए उसने कहा था... सामने के मकबरे को तुमने गौर से देखा है कभी। इसकी आकृति अष्टभुज जैसी है न। आम मकबरों में ऐसा कभी नहीं होता। अष्टभुज हिंदू मैथॉलजी का एक पवित्र चिह्न है। और इसकी छतरियाँ भी लाल बलुई पत्थर की नहीं बनी है, आम मकबरों जैसी। इन छतरियों में राजपूत शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखता है। दो संस्कृतियों का एक दूसरे में घुल-मिल जाना इसी को कहते हैं। एमी हँसी थी खिलखिलाकर, इतना खिलखिलाकर कि सामने पीले सूट और नीली कमीजवाली जोड़ी चौंक कर छिटक पड़ी थी एक दूसरे की बाँहों से। नंदी तू भी... यह सब तुझे हनीफ सर ने बताया होगा न... तू अब उनकी ही बोली बोलने लगी है... बिल्कुल उनकी बोली... कैसे हैं वो...?

नंदिता एक वर्जित प्रदेश से बचते-बचाते दूसरे से आ टकराई थी। जैसे किसी नदी में नाव खे रही हो और एक टापू से बचने की फिराक में दूसरे से लगने-लगने को हो आई हो। वह बेखयाली भी अपनेपन से जाग कर थोड़ी चौकन्नी हो उठी थी। अब जो कुछ भी बोलना है बहुत सोच-समझ कर। बात फिर किसी गलत दिशा की तरफ रुख न कर ले। पर कहानियाँ बनाना उसे ठीक से आता नहीं था। यह एमी ही कहती थी। मुँह से जो निकला वह बिल्कुल सच था। कोरा सच... ठीक हैं वो... एक बार आई थी उनके साथ। बहुत चाव से ले कर आए थे वे। पर आते ही मूड बिगाड़ लिया था... 'हद कर दी है इन लोगों ने, कोई भी जगह नहीं छोड़ी, कोई भी किला पार्क या फिर ऐतिहासिक स्थल। हर जगह लिपटे-चिपटे मिल जाएँगे। जैसे उनसे बाहर जो दुनिया है उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है उनके लिए।' वह चौंकी थी उनके क्रोध के अचानक आए इस झोंके से। वह ही नहीं चौंकी थी सिर्फ, एक दूसरे से लिपटा ठीक सामनेवाला जोड़ा जैसे क्षण भर को हिचका था, थमा था। पर क्षण भर को ही... हम लौट चलते हैं नंदी, हनीफ सर ने कहा था। उसने हौले से उनकी हथेलियाँ थामी थी... ऐसा भी क्या हो गया अचानक। इतने दिनों से कहते-कहते तो हम आज निकल पाएँ हैं... कुछ भी नहीं, बस मन नहीं रहा अब। ...वे उसकी हथेलियों पर उल्टे अपना जोर कसने लगे थे लौट चलने के लिए। उसे हँसी आ गई थी। कोई और होता तो... किस बात से कतराते हैं वे, किस चीज से... क्या अपने आप से... अपने मन में बसे आदिम इच्छाओं से...? पर उसने कहा बस इतना भर था... क्या कर रहे हैं वे... प्यार भर हीं न... कोई तो जगह, कोई तो कोना चाहिए उन्हें भी अपना सा, जहाँ बेफिक्र वे मिल सकें... आप तो सर... बजरंग दल और शिव सैनिकों की तरह रिऐक्ट कर रहे हैं...। तुम भी नंदी... तुम भी ऐसा सोचती हो तो हैरत होती है मुझे। देह, बस देह प्यार नहीं होता है... प्यार तो एक कोमल सा एहसास होता है जो अपनी मौजूदगी-गैर मौजूदगी में लपेटे रहता है हमें अपनी नर्म सी उपस्थिति से... देह कहाँ मायने रखती है तब... यह रह ही कहाँ जाती है तब... नंदी तुम... तुम्हें तो यह समझाने की जरूरत नहीं है। वे दोनों वापस लौट आए थे फिर...।

नंदी ने एमी के कहे के समर्थन में सिर्फ हामी में सिर भर हिलाया था। उसने सोच कर देखा था अगर वह उससे यह सब कहेगी तो यह सफाई जैसा ही कुछ होगा। और सफाई देने की उसकी फितरत नहीं थी और न हीं इच्छा।

दोपहर ढल रही थी धीरे-धीरे। धीरे-धीरे बातें करते-करते वे चुप हो चली थीं। हमेशा की तरह, जो कहता था कि अब वे दो हैं। अब वे अपना अलग-अलग वजूद चाहती हैं कि अपनी अलग-अलग दुनिया में खो जाना है उन्हें। ऐसा साथ रहने पर भी होता था कई बार। वे बाहर निकल आई थीं। एमी ने जैसे इशारों-इशारों में जाने की इजाजत माँगी हो। नंदिता डर उठी थी क्षण भर को... फिर वही एकांत, फिर वही अकेलापन। उसने धीमे से पूछा था कहाँ जाना है तुझे? क्या वहाँ मैं तेरे साथ-साथ चल सकती हूँ...? एमी जैसे चौंकी थी। एक क्षण को, फिर सँभली थी... थोड़ा थम कर बोली थी वो... चल क्यों नहीं सकती पर पता नहीं वहाँ तुम्हें कैसा लगे... मन लगे भी कि न लगे। तू जहाँ रहेगी मुझे अच्छा ही लगेगा... कहती तो है वो पर पर मन ही मन सोचती है, ऐसे दिन भी आ गए उनकी जिंदगी में कि उन्हें आज एक-दूसरे से यह कहने की जरूरत भी आन पड़ी। कितनी अलग राहें हो गई उनकी, जाने-अनजाने में ही सही।

ऑटो रिक्शा देर तक चलने के बाद शहर से बहुत दूर निकल आया था। गर्दो गुबार चेहरे-कपड़े ढकने लगे थे। कँकड़ीले, टूटे-फूटे रास्ते पर गाड़ी कभी उछलती कभी फुदकती। पेट में पहले कुछ गुदगुदी सी हुई थी और फिर कुछ मरोड़ सा। उसे याद आया, खाने के नाम पर ठोस कुछ उसके पेट में आज गया नहीं था। ब्रेड भी सिंका-अधसिंका छूटा ही रह गया था, एमीलिया के मैसेज के आने के बाद। क्या एमी भी ऐसा ही महसूस कर रही होगी।

गाड़ी रुकी थी झटके से। वे सारे बच्चे बाहर निकल आए थे और एमी को घेर लिया था उन्होंने। फिर उसे देख एमी से भी अलग हट कर खड़े हो लिए थे। एमी मुस्कुराई थी। ये भी दीदी हैं, आपकी एक और दीदी। मेरी सबसे अच्छी फ्रेंड...। जैसे तुम और निकिता... उसने एक गोल-मटोल बच्ची का गाल छुआ था। पर आप तो बड़े हो न? हम भी इतने से ही थे और तभी से दोस्त हैं। निकिता कही जानेवाली लड़की के चेहरे पर एक आश्चर्य का भाव पुत सा गया था। सच्ची...। उसने शब्द को खींचा था। नंदी की नजर सामने लगे बोर्ड पर पड़ी थी। गाढ़े-मोटे अक्षरों में लिखा हुआ और छोटे लाल अक्षरों में नीचे लिखा हुआ था - 'आनंदवन' : जीवन के प्रति एक अटूट विश्वास। सच्ची...। एमी ने भी जवाब वैसे ही खींच कर दिया था। उसने गुलथुल सी एक बच्ची को गोद में उठा लिया था। कैसी है गुड़िया? ठीक... ठीक... एमी ने फिर प्रश्न नहीं किया था। हाँ, पल आपसे गुच्छा हूँ। त्यों... त्यों कि आप बहुत दिनों बाद आए हो... आई तो हूँ न बेटा। और बहुत सारी चीजें लाई हूँ आपके लिए। छच... बच्ची की आँखें विस्फरित हुईं। उसके चेहरे का नकली सूजापन कमा था। दरबान ने कहा था दीदी जी जल्दी अंदर आइए। मिली की तबीयत सुबह से ही खराब है, बेहोश है वह। डॉक्टर ने कहा है ब्लड की जरूरत है उसे। आपको इसीलिए बुलवाया। एमी ने आँखों ही आँखों में कहा, पता है उसे। उसने बच्ची को उसकी गोद में थमाया और तेजी से एक कमरे की तरफ बढ़ी थी वह... मैं क्या करूँ समझ नहीं पा रही थी... फिर आदतन वह एमी के पीछे चल दी थी हमेशा की तरह। सामने एक कमरा था। कमरे में दो बेड थे पहले से ही, दोनों पर आक्सीजन और ग्लूकोज चढ़ाए जाने के सरंजाम। एक बेड पर सात-आठ साल की खूबसूरत नक्श पर पीले निचुड़े चेहरेवाली एक बच्ची। दूसरे खाली बेड पर एमी लेट गई थी चुपचाप। डॉक्टर ने पूछा था कुछ खाया-पीया है न, उसने कहना चाहा था नहीं... पर एमी ने नंदी को निगाहों से ही बरजते हुए कहा था 'हाँ'। प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी, एमी आँखें बंद किए पड़ी थी। बच्ची को करवट कराया जा चुका था। बेड सीट गीला था कमर के नीचे, रक्त से सनी हुई। वह सिहर उठी। चादर बदल दी गई थी। बच्ची पूर्ववत थी। सब कुछ से अनजान। निस्पंद... वह वहीं स्टूल पर एमी की हथेलियाँ थामे बैठ गई थी। एमी की मुँदी आँखें खुली थी, उसने देखा था उसे क्षण भर को फिर आँखें बंद कर ली थी। वह अंदाजा लगाना चाह रही थी एमी के कष्ट का। पर चेहरे से कुछ भी पता नहीं चल रहा था, सिवाय अतिरिक्त थकान की मुद्रा के। वक्त लंबा खिंचा था कि लगा था उसे। नहीं... बच्ची के चेहरे पर थोड़ा हरापन दिखा था। पर कोई छोटी प्रक्रिया नहीं थी यह न ही कोई छोटी बात। बेड से उठती एमी के सहारे के लिए उसके हाथ बढ़े थे। वह हँसी थी इसकी कोई जरूरत नहीं। इतनी कमजोर भी नहीं हुई मैं... उसने अपना हाथ फिर भी पीछे नहीं किया था। एमी ने डाक्टर से पूछा था हुआ क्या था आखिर...? कुछ नहीं... ठीक होते-होते सब बिगड़ गया था अचानक। वही दौरा आ पड़ा था मिली को। फिर जिस्म ऐंठ गया। ब्लीडिंग होनी शुरू हो गई थी। इसीलिए आपको फोन किया। ओ निगेटिव ब्लड ग्रुप का इससे जल्दी कोई दूसरा इंतजाम मेरी समझ में नहीं आ रहा था... सॉरी...। एमी हँसी थी एक मासूम सी हँसी। इसमे सॉरी की कौन सी बात है डॉक्टर...। अम्मा कहाँ हैं? बाहर गई हैं। निजाम को वापस लाने। उस नए घर में एडजस्ट नहीं कर पा रहा वह।

वे बाहर निकलने को थीं कि 16-17 साल के एक लड़के ने आकर उन्हें रोक लिया। अम्मा नहीं तो क्या दीदी ऐसे ही चली जाएँगी। उसे पता था कि दीदी आज आनेवाली है और इसीलिए उसने मक्के की रोटी और सरसों की साग पकाई है। गुड़ की भेलियाँ भी मँगवाई सुबह-सुबह। सब खत्म हो चली थी।

उन दोनों ने छक कर खाया, खूब खेली बच्चों के साथ। जब निकलने को हुई तो नंदी का जैसे मन ही नहीं हो रहा था कि वह जाए...। एमी ने अपनी जिंदगी को किस तरह एक सार्थक दिशा दी है और एक वह... प्यार-प्यार करती खुद को चौबीस घंटे एक कमरे में कैद कर लिया है।

एमी भी जानती है कि बदल गई है वह, तभी तो सोच रही थी कि उसे अच्छा लगेगा यहाँ या नहीं। वरना उसे तो पता ही था बच्चों के बीच कितना अच्छा महसूसती है वह।

वे लौट रही थीं कि नंदी अचानक मुड़ी थी सामनेवाले उस कमरे की तरफ। बेसुध पड़ी बच्ची का सिर उसने सहलाया था धीरे से। उसके चेहरे पर हौले से अपनी उँगलियाँ फिराई थी, जैसे उसकी खुद की बच्ची हो वह...

वे दोनों सारे रास्ते चुपचाप थीं, अपने-अपने घर पहुँचने तक। नंदिता की आँखों के सामने उस मासूम सी बच्ची मिली का चेहरा बार-बार घूम जा रहा था... उसे एमी के लेख का मर्म अब समझ आया था।
 
6

नसीमा सुनती रही थी बार-बार इधर-उधर से उस लड़की के बारे में। लोग बाग उसे घेर-घूर कर बतलाना चाहते यह, तरह-तरह से। जिसमें रिश्तेदार भी थे और दोस्त भी...। पर वह हनीफ मियाँ के चेहरे से कभी कुछ नहीं पढ़ पाती। न वह उनकी तरफ से रिश्ते को निभाने में कोई कोताही देखती और न ही गर्मजोशी का अभाव।

लोग जब-जब कहते वह एक बार फिर परखना चाहती अपने उस रिश्ते को। एक-एक पल निगाह रखती उन पर। पर वे जस के तस... वही बच्चों को बेहद प्यार करनेवाले पिता... उसके लिए लबालब प्यार से भरे पति। ठीक था कि हनीफ मियाँ घर की दूसरी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाह थे, पर वह इसलिए कि उसने खुद ओढ़ ली थी सारी जिम्मेदारियाँ... अब दिन भर वह घर में करे भी तो क्या... बच्चे भी तो बड़े हो गए थे। और फिर आम घरेलू औरतों की तरह इधर-उधर का बतियाने या फिर टीवी सीरियल्स देखने में उसका मन नहीं लगता था। कुछ औरतों के बीच जो थोड़ा बहुत बैठती थी उससे भी वह इसलिए कतराने लगी थी कि जब बैठो घूम फिर कर वे उसी एक बात पर आ जाती, इशारों में, कनफूसियों में या कि सीधे-सीधे। और फिर ये काम भी तो अपने ही थे, उसी के अपने घर के... लेकिन घर की जिम्मेदारियों से वे चाहे जितने भी लापरवाह रहे हों, उसकी खातिर कभी कोई लापरवाही उन्होंने नहीं की। उसकी हल्की सी सर्दी हो या दाँत का छोटा-मोटा दर्द, वे बुरी तरह परेशान हो जाते। बेसाख्ता डॉक्टरों के चक्कर लगाना शुरू कर देते। चाहे जैसा बन पड़ता खुद ही पकाते और बच्चों को भी खिलाते। वह समझ नहीं पाती थी कि वह उनसे कहे भी तो क्या, खास कर तब जब अम्मी और भाई उसे तरह-तरह से समझाते, दवाब देते उस पर कि वह हनीफ मियाँ से बात करे... वह दिन-रात तलाशती रहती वह सिरा जहाँ से अपनी बात शुरू कर सके। पर वह कोई एक सिरा जैसे हनीफ उसके हातों में आने ही नहीं दे रहे थे...। वह अगर एक बार कभी कहती - हमलोगों को साथ बाहर गए कितने दिन हो गए तो हनीफ मियाँ उसकी ख्वाहिश को हाथोंहाथ लेते हुए कई दिनों का प्रोग्राम बना देते... वे उसकी कोई भी ख्वाहिश अधूरी नहीं रहने देना चाहते थे... और सबसे बड़ी बात तो यह कि ऐसा करते हुए उसके लिए उनकी चाहत, उनकी गर्मजोशी बिल्कुल वैसी ही थी...। वे टूट कर प्यार करते उसे... इस तरह जैसे कि पहली बार मिले हों, वह भी तब जब वसीम सयाना हो चुका था। कभी-कभी तो वह खुद भी शर्मा उठती उनके चाहत की इस ललक से। वह सोचती बार-बार... झूठ ही कहते हैं सब। अगर हनीफ मियाँ की जिंदगी में कोई दूसरी औरत होती तो यह ललक कहाँ बनी रहनेवाली थी। उसे भरोसा नहीं होता था इस बात पर कि पेट यदि भरा हो तो कोई इस ललक से टूट सकता है सामने परोसी थाली देख कर। जैसे पेट एक ही होता है उसी तरह मन भी एक। जब कोई भीतर से भरा हो कहाँ जुड़ सकता है किसी दूसरे से। इसीलिए उसने लोगों की बात पर ध्यान देना छोड़ दिया था...। इसी कारण बाहर निकलना भी। अब जब निकलो यही एक बात। अगर वह खुश है अपनी जिंदगी से फिर दूसरों को क्या दिक्कत है, कौन सी परेशानी? उसे लगता लोगबाग जलते हैं उसके रिश्तों में अभी तक बची गर्माहट को देख कर। और हनीफ मियाँ भी तो और हैं, कोई सी भी जगह हो, कितने भी लोग... उनकी निगाहें लगातार उस पर ही लगी रहती हैं। उसे कोई परेशानी तो नहीं... वह असहज तो नहीं दिख रही। उसे तो कभी-कभी यह भी लगता कि उसके प्रति उनकी यह ललक दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है...।

वह सोचती, होगी कोई लड़की जिसकी कुछ मदद कर दी होगी इन्होंने। बताते तो हैं वो उसे मकान दिलवा दिया है, पढ़ाई में भी मदद करनी होती है... और लोगों के ले उड़ने के लिए बस इतना ही काफी हो गया होगा। अब इनकी तो आदत ही ठहरी लोगों की मदद करने की। वक्त-बेवक्त, जगह-बेजगह... फिर कुछ भी कहाँ खयाल रह जाता है इन्हें... अब उनकी आदतों को कैसे बदल दे वह...। पर हाँ, पिछले ही दिनों जब वे बाहर थे उन्होंने वहाँ से फोन किया था - वसीम को कहना कि थोड़ा वक्त निकाल कर एक बार नंदिता को देख आए, अकेली है और बीमार भी। कोई दवा तक ला देनेवाला नहीं है उसके पास... तो पहली बार चिहुँकी थी वह... वसीम क्यों जाने लगा वहाँ... बुला ले किसी को फोन कर के, कोई न कोई तो होगा ही, सहेली, साथी... कोई रिश्तेदार। आप बाहर गए फिर भी... जो कुछ वह सामने रहते नहीं कह पाई थी कभी, फोन पर कह गई थी उस दिन... मन जैसे हल्का हुआ था कुछ... उधर से आती हनीफ मियाँ की आवाज में फिर भी एक इल्तिजा थे... कोइ गुस्सा या कि बेअदबी किए जाने का कोई दुख तक नहीं। कोई नहीं है तभी तो कह रहा हूँ, बुखार में है... और करना ही क्या है। जा कर देख लेगा एक बार। जरूरत हुई तो डॉक्टर को दिखला देगा नहीं तो दवाएँ भर लानी होंगी बस। नसीमा को लगा उसके किसी कहे को कहाँ कभी इन्कार करते हैं हनीफ। उसे हैरत हो रही थी कैसे इतनी कड़ी हो गई है वह, लोगों के कहे-सुने में आकर... उसे उनकी बात तो माननी चाहिए थी। उसने कहा ठीक है...

और तब से वह वसीम की राह तक रही थी कि वह आए और उससे वह उस लड़की के पास जाने की बात कह सके। उसे लगा यह ठीक भी है। वसीम उससे बता सकेगा उस लड़की के बारे में... घर देख कर तो बहुत कुछ समझ में आ जाता है, और वसीम भी तो कोई बच्चा नहीं रह गया है अब... कुछ न कुछ तो सुना होगा उसने भी... आखिर देखूँ वह क्या कहता है।

वसीम आया और चला गया था। उसे हैरत हुई कि उसने कोई इन्कार नहीं किया था। पर तब से जैसे घड़ी की सुइयाँ जैसे रुक गई हों। वक्त खिसकने का नाम ही नहीं ले रहा था। उफ, ये वसीम भी न... गया तो अपना डेरा-डंडा भी वहीं जमा लिया। अपने बाप का ही तो बेटा है। गुस्से में उसने सोचा जरूर पर गुस्सा थम गया था यह सोच कर कि उसी का लाड़ला है वह... उसकी हर बात माननेवाला। उसका खयाल रखनेवाला। और वह वहाँ गया भी तो उसी के कहने पर है। उससे हर बात बताए बगैर जिसका दिन अभी भी पूरा नहीं होता, छोटे बच्चे की नाई... वह आएगा तो कहेगा ही सब कुछ। बाहर शाम गहराती जा रही थी। बेमन से ही सही उसने खाना पकाना शुरू कर दिया था...। वह आएगा तो भूख लगी होगी उसे। सब्जी बना लेने के बाद जब उसने चखा तो पता लगा उसमें नमक ही नहीं है, सालन भी बिल्कुल गाढ़ा। उसने नमक और पानी मिलाया। रोटियाँ भी उतनी मुलायम नहीं हो सकी थी, हमेशा की तरह। कुछ कड़ी, चीमड़, मोटी-मोटी सी। उसने रोटियों पर घी थपका। ऐसी रोटियाँ तो उसने कभी नहीं पकाई, कौन खा पाएगा इन्हें। बेखयाली के आलम में यह क्या-क्या कर डाला उसने। थोड़ी मुलायम हो जाएँगी ऐसे। हनीफ होते तो ऐसा नहीं कर पाती वह। घी लगी रोटियाँ नहीं खाते वे। वे नहीं खाते इसलिए और सब भी...। पर उसे आज कुछ अलग कर के अच्छा लगा। फिर रोटियों को कपड़े में लपेट कर उसे डलिया में डाला। फिर सोचने लगी वह पता नहीं वसीम कब तक आएगा...। पता नहीं इतनी देर क्यों लगा रहा है वह। रोटियाँ ठंडी हो जाएँगी रखे-रखे। फिर वक्त काटने के लिए उसने सेवइयों का डब्बा खोला। सूखी-भूनी सेवइयाँ निकाली और उबलते दूध में छोड़ दिया। ताजा दही निकाल कर आलू का रायता बनाया। हनीफ और वसीम दोनों को पसंद आता है यह रायता। वह सोच रही थी कि अपनी तरह का यह अकेला मुसलमान परिवार होगा जहाँ महीने में चार दिन भी गोश्त नहीं पकता... उसके मायके तो मांस के पकवानों के बिना तो खाना पूरा माना ही नहीं जाता। हनीफ मियाँ गोश्त नहीं खाते, अंडे खाते हैं सिर्फ सो पकना भी लगभग जैसे बंद हो गया है...। वह वसीम के लिए पकाती है बस... उसने सोचा कल कहेगी वह उससे कि गोश्त ले आए, अब्बू तो वैसे भी लौट नहीं रहे कल।

उसे याद आया शुरू-शुरू में हनीफ मियाँ खाते तो थे गोश्त पर हर निवाले के साथ उनका बोलना यूँ चलता रहता जैसे कोई प्रायश्चित... यह कहाँ का नियम है... कहाँ का शौक... अपना पेट भरने के लिए किसी मासूम जानवर की जान ले किसी का परिवार खत्म कर दो... किसी का बच्चा, किसी की बीवी, किसी का शौहर... उसका कौर भी जहाँ का तहाँ थम जाता... गले का गले में अटकने लगता फिर। मुँह में जो कुछ भी होता बेमजा हो जाता अचानक। वह उठ जाती थाली से। वे खाते-खाते बतियाते रहते खुद से ही वही अल्ल-बल्ल। उसने पूछा था एक दिन, आप कहें तो मांस-मछली न पके इस घर में... उसकी आवाज में जरूर कहीं गुस्सा रहा होगा। वे झेंप से गए थे, शर्मिंदगी उनकी आवाज पर तारी थी... मैने ऐसा कब कहा? मैं तुम लोगों को नहीं रोकूँगा। रोकूँ भी क्यों... पर हाँ मुझे मत परोसा करो...। नसीमा प्लीज मेरी बातों को समझने की... उस दिन से गोश्त जब भी पका उनके लिए, सूखी सब्जियाँ पकी, सालन पके। उसमें यह दोहरी मिहनत हिकारत भरती। फिर उसने यह सब तभी पकाना शुरू किया जब हनीफ मियाँ घर पर नहीं हों। और महीने में तीन-चार दिन तो ऐसे हो ही जाते थे... उसे इतनी रस्साकस्सी करने की जरूरत भी नहीं पड़ती...। हाँ अंडे वे खाते थे अब भी। अंडे उन्हें पसंद थे और वह जानती थी इन्हें खाने के लिए कोई न कोई तर्क तलाश लिया होगा उन्होंने।

रात धीरे-धीरे पसरती जा रही थी और वसीम... उसने समझाया खुद को, दिल्ली की सड़कें इतनी खाली तो होती नहीं है, ऊपर से शाम का वक्त। कहीं डॉक्टर से भी दिखलाना न पड़ा हो... उसे इंतजार ही नहीं करना चाहिए, वह आएगा ही वक्त होने पर... वह इतनी बेसब्र क्यूँ हुई जा रही है... वह बिस्तर पर आ कर लेट गई थी... टी.वी. चलाया था और फिर ऑफ कर दिया था। जबकि सामने चलता धारावाहिक उसका पसंदीदा प्रोग्राम था और कहानी भी आज एक नया रुख लेनेवाली थी...। वह बिस्तर पर ही बैठी रही चुपचाप, पता नहीं कब तक कि घंटी बजी थी। उसने जैसे झपट कर दरवाजा खोल था... देर कर दी बहुत... हाँ हो गई... बुखार ज्यादा था उन्हें... डॉक्टर के यहाँ तो नहीं जाना पड़ा...? वह देख कर जा चुका था पर दवाइयाँ लानी थी। वह वसीम का चेहरा बहुत गौर से देख रही थी। पर वह तो कोरे कैनवस की तरह बेरंग था... चेहरे पर कोई भाव तक नहीं। अब कैसी है... बुखार कम तो था तब, अब पता नहीं। वैसे मैंने अपना मोबाइल नंबर उसे दे दिया है... उसे अजीब लगा, हालाँकि जैसा वह समझती है वह वसीम की ही हमउम्र होगी। पर वसीम का उसे तुम कहना, कुछ अजीब सा लगा... क्यों... वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी। पर इस अजीब लगने को वह बुरा लगना भी नहीं कह पा रही थी। चलो खाना लगाती हूँ। वे दोनों खाने पर बैठ गए थे पर खाया भी उन्होंने बिल्कुल चुपचाप। वह इंतजार ही करती रही कि वसीम उसे कुछ बताएगा, उस लड़की के बाबत... उसके घर उससे मुलाकात के बाबत... वह वसीम जो कहीं से भी लौट कर एक-एक घटना उसे तसल्ली से बताता था, छोटी से छोटी बात भी... हनीफ कहते भी इसे जरा खुद से दूर करो अब... औरतों की तरह बतियाने लगा है। पर आज जो वसीम था वह कोई दूसरा ही था...। पर नहीं, थोड़ी देर बाद समझ में आया उसे, सामने बैठा शख्स वसीम था ही नहीं, जैसे हनीफ मियाँ ही थे अपने गुरु-गंभीर अंदाज में। और फिर हमेशा की तरह सवाल सब उसके चुप हो गए थे। जिद तो वह वसीम से करती है, सवाल भी पूछने का हक भी उसका उसी से है, इस हनीफ मियाँ की परछाई से नहीं...

खाना खत्म हो गया था, वे दोनों उठ कर अपने कमरे की तरफ चल दिए थे। पता नहीं क्यों उसे लगा बिल्कुल अकेली हो चली है वह... वसीम की इस छोटी से चुप्पी ने झकझोरा था उसे।

देर रात तक सोचती रही थी वह... अगर कुछ गलत या बुरा लगता उसे वहाँ तो उसे वसीम जरूर बताता। वसीम चुप था मतलब वैसी कोई बात ही नहीं थी बताने की। उसे तो निश्चिंत होना चाहिए पर वह बेकार ही परेशान हुई जा रही है। उसने तकिए को खींचा था। उसे लगा हनीफ की हथेलियाँ है उसके सिर के नीचे। दूसरा तकिया उसके समानांतर था ठीक उनकी जगह पर। उसने मुँह छुपा लिया था उसमें। मेरे सिवा और कोई तो नहीं है आपकी जिंदगी में... उसके स्वर में लाड़ था, अधिकार भी... मैं तुम्हारी जगह किसी और को नहीं दे सकता... कभी भी, किसी भी हाल में। तुम बेफिक्र रहा करो नसीमा। नसीमा के माथे पर उस चुंबन की मिठास जैसे फिर से चिपक आई। वह तकिए में समा गई थी फिर... वह हनीफ मियाँ में समा गई थी... वह उनकी पनाहों में थी और सुरक्षित-संरक्षित भी... वह बेकार डरती रहती है लोगों की बात सुन कर। वह कैसे भूल उठती है यह सब कुछ। वह तकिए से लगी-लगी निश्चिंत सो गई थी।
 
7

वसीम के लिए वह सुबह जैसे बिल्कुल नई-नई थी, आम सुबहों से बिल्कुल अलग। एक दम नई-नकोर, बिल्कुल धुली-धुली सी। हवा की खुनक में पिछली रात की यादें हों जैसे। उसका रोम-रोम वे वैसे ही तो सिहरा रही थी। उसका मन बहुत हल्का-हल्का था। बीत चुके न जाने कितने वर्षों के बाद एक बार फिर... वगरना तो वह एक बोझ सिर पर लादे रहता चौबीस घंटे। और वह बोझ अम्मी को न दिखे इसके लिए जबरन बोलता बकवास करता रहता उनके आगे।

उसे लगा जैसे अचानक बड़ा और जिम्मेदार हो उठा है वह सब के लिए...। अम्मी, अब्बू और उसके लिए भी...। उसके घर से अपने घर तक का सफर जैसे उसने हवा में उड़ते हुए पूरा किया। सुबह अभी-अभी हुई ही थी। ट्रैफिक और भीड़ नहीं थी सड़कों पर उतनी। वह बाइक को जैसे उड़ा ले जा रहा था। हालाँकि ऐसा करते हुए उसे खुद हैरत हो रही थी...। वह हमेशा एक जिम्मेदार चालक रहा है, जिम्मेदार बेटे और जिम्मेदार नागरिक की तरह। उसका मन हो रहा था वह उड़ कर अम्मी के पास पहुँच जाए और उन्हें सब बता दे... सब कुछ। हाँ दोस्त बहुत रहे हैं उसके पर अम्मी से बड़ा दोस्त नहीं रहा कोई उसका। वह सारी बातें अम्मी को न बता ले जब तक चैन कहाँ मिलता है उसे... अभी तक भी। अब्बू इसीलिए उसे अम्मी का बच्चा बताते हैं सबको। बताते रहें उसे परवाह नहीं कोई।

उसे अम्मी का उस दिन का चेहरा याद आया जिस दिन उन्होंने उसे नंदिता को देखने जाने को कहा था, अब्बू के कहने पर... उनका वह चेहरा जो लौटने पर न जाने कितने सवाल लिए उसके सामने खड़ा था पर जवाब कुछ नहीं था उसके पास। और अम्मी का न जाने कितनी बार का उतरा चेहरा... जबकि जानता था वह अम्मी में बर्दाश्त करने की हिम्मत बहुत ज्यादा है। भरोसे की माटी से गढ़ी गई हैं वह। फिर भी उनका मन कभी-कभी तो डोलता ही थी। और जब डोलता परछाइयों की तरह तकलीफ उनके चेहरे से आती-जाती गुजरती दिखती। वे अपने आप में उतनी नहीं होती तब। वह कुछ भी पूछ लेता वे हाँ-हूँ में जवाब दे देतीं कुछ भी समझे बगैर... और उसे बेतरह दुख होता। उससे भी ज्यादा तब जब वह खुद कुछ सुन के आता अब्बू के बारे में। वह अम्मी को इस दुख से बचाए रखना चाहता था इसीलिए सुरक्षा कवच बन कर तैनात रहना चाहता हर वक्त उनके साथ। पर यह असंभव जैसा था, उसकी पढ़ाई, घर के काम। रिश्तेदारों-दोस्तों का आना-जाना। उसकी कोशिशें कई बार नाकाम हो उठतीं और फिर परिणाम... उसे अच्छा लगा अम्मी कहीं जाती-आती नहीं थी ज्यादा। खुद को घर में समेटे रहती... बल्कि अब तो उसे लगने लगा था वह और ज्यादा खुद को घर में कैद किए जा रही थी, वह भी गैर इरादतन नहीं। वह सिर्फ देख-समझ ही पा रहा था सब कुछ...। कुछ भी कर पाना उसके लिए मुश्किल हुआ जा रहा था। ऐसे में उसे उस लड़की पर बेपनाह गुस्सा आता, क्या चाहती है वह आखिर? क्यों घुसपैठ कर रही है वह उनकी जिंदगी में इस तरह। क्या मिलेगा उसे ऐसा कर के? वह सोचता रहता पर किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाता...

उस दिन जब वह नंदिता के घर पहुँचा तो भरा हुआ था भीतर से। उसने हामी भरी थी तो किसी दयाभाव के तहत नहीं, बल्कि वह तो यह सोच कर गया था कि जा कर पूछेगा वह उससे कि यह सब कर के क्या हासिल होनेवाला है उसे? क्यों कर रही है वह ऐसा? ...पर जब पहुँचा था वह, और बेल बजाने के बाद जिस लड़की ने दरवाजा खोला था, कुछ भी... कुछ नहीं कह पाया था वह उस लड़की से। वह बहुत कमजोर सी दिख रही थी, कई-कई दिनों के ज्वर के बाद अमूमन लोग जैसे दिखने लगते हैं। पर उसकी कमजोरी जैसे उसके नक्श को और ज्यादा उभार रही थी। बेहद खिंची-खिंची दो आँखें, सामान्य से खिंचे हुए होठ, बहुत तीखी नाक। सामान्य से ज्यादा लंबे, घने और काले बाल... उसने गौर किया था। उसने यह भी नोटिस किया कि उस लड़की में कुछ भी सामान्य या साधारण सा नहीं है। एक तेज था उसमें पर उसके साथ एक ऐसा दीन-हीन सा भाव भी जिसमें अपने वजूद के लिए कोई चेत न हो... उसे लगा यह सारे निष्कर्ष वह जबरन ही थोप रहा है उसके व्यक्तित्व पर। कैसी-कैसी बातें सोच लेता है वह। एक नामालूम सा तेज... जैसे अपने प्रति कोई चेत, कोई सजगता ही नहीं... भला दोनों कैसे हो सकते हैं एक ही साथ... यह उसकी कल्पना है और क्या। वह जानता है कि उसके अब्बू पर यह निर्भर है... इसीलिए इस तरह सोच रहा है वह...

...पर ऐसा सोच रहा है वह तो आखिर क्यों? निर्भर होने का कोई कारण तो उसे दिख नहीं रहा है... पढ़ी-लिखी लड़की है, जहीन और खूबसूरत भी। बातचीत करने का सलीका, तौर-तरीके, रहन-सहन सब उम्दा... फिर क्या वजह हो सकती है कि वह अब्बू पर निर्भर हो... सिवाय प्यार और चाहत के... वसीम को उस पल लगा और खूब-खूब लगा कि जुड़ने-निर्भर होने का कारण यही और बस एक यही तो हो सकता है... और इस पर किसी का क्या बस... यह तो लाचारगी हो सकती है। इनसान का अपने पर काबू न रह जाना; किसी के लिए प्यार महसूसना और ऐसे महसूसना कि उसके लिए कुछ भी कर गुजरना... किसी भी सीमा से परे जाकर। मुहावरे में कहें और अगर अम्मी के लफ्जों में ही कहें तो ...अपना कलेजा निकाल कर रख देना। इसमें इस मासूम सी लड़की की क्या गलती... इसमें इसका क्या दोष...

वह भूल गया था वह नंदिता से क्या कहने आया था। वह पानी देने के लिए झुकी ही थी कि उसने उसे रोक कर पानी खुद ही निकाल लिया था, उसके लिए भी और अपने लिए भी। उसे पानी निकालने से रोकने के लिए उसने उसे कंधे से पकड़ कर रोका था और रोक कर जैसे खुद से लजा गया था वह। आज तक अम्मी के सिवा वह किसी स्त्री के इतना करीब नहीं हुआ। उसने लड़कियों से बात जरूर की थी लेकिन कोई लड़की उसकी उतनी नजदीकी दोस्त नहीं रही। को-एड में पढ़ने के बावजूद। बल्कि यूँ कहें कि कभी उसकी इच्छा ही नहीं हुई किसी के भी इस कदर नजदीक जाने की। उसके लिए कुछ या कुछ भी कर जाने की... अपना कलेजा निकाल कर रख देने की। वही चाहत उसके जिस्म को ऐंठ रही थी, मरोड़-मरोड़ कर बाहर हो जाना चाह रही थी। कैसे... कितना और क्या कर दे वह इस लड़की के लिए। वह भी इस तरह कि उसे कुछ भी अजीब महसूस न हो। उसे अभी यह सोच कर भी अजीब लग रहा था कि अब्बू उसके पास ऐसे ही आते होंगे और बैठते भी। वह नजरें चुराता फिर रहा था कमरे से कि उसे अब्बू की मौजूदगी का कोई निशान न दीख जाए। और उसे राहत थी। अब्बू का कोई भी सामान उसे कहीं नहीं दिख रहा था कमरे में। वह जानता था वह सच्चाई से आँखें मोड़ रहा है... पर यह जानते हुए भी उसने राहत की एक साँस ली थी। उसने कहा था, डॉक्टर के यहाँ चलिए... डॉक्टर आ कर जा चुका है... दवाएँ लानी है और खाने के लिए कुछ ब्रेड वगैरह भी। मैं प्रेस्क्रिप्शन और पैसे देती हूँ। उसने धीमे से कहा था... सिर्फ प्रेस्क्रिप्शन, पता नहीं उसने यह सुना भी था या नहीं। वह कॉट से उठी थी दीवार में बने आलमारी तक जाने के लिए। उसके पैर डगमग हुए थे... शायद कमजोरी से... उसने इशारे से कहा जगह बताइए मैं खुद ले लूँगा... उसने दरवाजा खोला था और उस अप्रत्याशित से अचानक ही उसकी मुठभेड़ हो गई थी जिससे वह लगातार बचना चाह रहा था। सलीके से टँगे नंदिता के कपड़ों के बीच दो कुर्ते पाजामे भी थे। उसे लगा जैसे किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो उसे, पर जो उसके हाथों को छू गए थे वे शायद उसके अब्बू के कपड़े थे...

वह समझा रहा था खुद को कि ये कपड़े नंदिता के पिता के, भाई के या किसी और के भी हो सकते हैं... कोई तो आता होगा ही उसके पास... पर वह जानता था, ऐसा सोच कर वह खुद को झुठला रहा है। पर क्यों... वह खुद से पूछ रहा था। ऐसा क्या था जो वह नहीं जानता था। और जब वह पहले से जानता ही था तो फिर यह बेचैनी क्यों? उसने प्रेस्क्रिप्शन निकाल कर दरवाजा बंद कर दिया था। पैसे के लिए उसने तकिया हटा कर पर्स निकाला था... पर नहीं किताब थी वह। वही किताब जो अब्बू पढ़ते रहे थे पिछले दिनों। जिसके बारे में उससे चर्चा करते रहे थे और उसे भी पढ़ने को कहा था। पर इस बार वह चकित नहीं था। वह सँभाल रहा था खुद को। वह सोचना चाह रहा था सिर्फ अम्मी की खातिर... वह अम्मी को लेकर शॉक्ड हुआ। पर वह जानता था कि वह जो समझा रहा है खुद को वह एक झूठ है, एक दिलफरेब झूठ। ...बस।

पर इस सब के बावजूद दवा और सामान ला देने के बाद भी वसीम रुका था वहाँ देर तक। उससे बोलता-बतियाता रहा था न जाने कितनी बातें। वह हैरत में था, वह उठ कर चला क्यों नहीं गया आखिर... और तो और वह उसके बाद भी कई रोज वहाँ आया अम्मी को बताए-बिना बताए भी। अब्बू का टूर ज्यादा लंबा खिंचने लगा था और नंदिता अभी ठीक नहीं हुई थी पूरी तरह से।

अम्मी ने जब दरवाजा खोला था उस दिन पहली बार समझ में नहीं आया था कि उनसे वह क्या कहे। हालाँकि उसने वहाँ आल्मारी में मर्दाने कपड़े देखे थे, उसके पास अब्बू की किताब भी थी। पर वह तो जानता ही था अब्बू वहाँ जाते हैं... और वह इससे आगे का कुछ भी तय नहीं कर पा रहा था। कि तय करना नहीं चाह रहा था वह। नंदिता उसे बिल्कुल अछूती सी लगी थी, पाक, सुंदर और मासूम जिसको ले कर कोई बेतुकी कल्पना की ही नहीं जा सकती थी। उससे तो बिल्कुल भी नहीं। अब्बू वहाँ जाते हैं यह कौन नहीं जानता। वैसे भी अब्बू का क्या... पहले जब वह घर के बगलवाले इंटर कॉलेज में पढ़ाते थे तब भी एक घंटे के अवकाश में भी जब घर आते कुर्ता-पाजामा पहन लेते थे। वह कहता भी इतनी मशक्कत किस लिए, थोड़ी देर वही कपड़े पहने रहते। आखिरकार लौटना ही तो है आपको... वो हँस देते। मैं शर्ट-पैंट में खुद को सहज नहीं महसूस पाता। बाहर जाना और पढ़ाना तो मजबूरी है वसीम... पर घर में... मुझे खाते-पीते, उठते-बैठते यह अहसास सालता रहता है कि आजाद नहीं हूँ मैं, कैद में हूँ जैसे। जैसे उठ कर चल देना हो अभी तुरत कहीं... मैं घर में घर में होने के अहसास के साथ जीना चाहता हूँ... अब्बू इसी सहजता के लिए पहन लेते होंगे उसे पढ़ाते-समझाते वक्त कुर्ता-पाजामा ताकि आराम महसूस कर सकें। कभी बात-बात में कह दिया होगा उन्होंने और उसने रख लिया होगा खरीद कर...। वह घर में होने पर घर में होने के अहसासवाले खयाल को परे धकेलता रहा। इसी कश्मकश में वह अम्मी को कुछ भी नहीं कह पा रहा था। सब कुछ उसे ठीक-ठाक लगा था और जो थोड़े बहुत किंतु-परंतु थे वह उन्हें परे ही रखना चाहता था। उसने तय कर लिया था वह अपनी तरफ से कुछ भी नहीं कहेगा अम्मी से। अगर पूछेंगी भी तो उतना ही जो कि उसे लगा था कि जो उसका मन मानता है... पर अम्मी ने कुछ भी नहीं पूछा था उससे। बस उसके चेहरे में न जाने क्या-क्या ढूँढ़ती रही थी... एकटक... उसने राहत की साँस ली थी उस दिन।

उसके बाद भी कई रोज नंदिता के कमरे पर वह गया था, अक्सर दिन में ही। जाता और दवाएँ तथा जरूरत के सामान ला देता। कुछ देर संग बैठ-बतिया लेता। उसे अच्छा लगता... और उसे भी। एकाध बार उसने अम्मी को कहा भी था कि वह आज नंदिता को डॉक्टर से दिखलाने गया था या कि उसकी दवा ला देने। अम्मी अक्सर कुछ नहीं कहती थीं, बस एक दिन कहा था - अभी तक ठीक नहीं हुई वो...? यह एक साधारण सा सवाल था पर उसे लगा जैसे यह एक सवाल भर नहीं था एक निषेध था। मनाही जैसा कुछ। उनकी आवाज के पीछे जो कुछ छिपा था वह यह था कि बस भी करो अब, बहुत हुआ। वह अम्मी का मतलब समझ गया था... उसने खुद को भी कहा था - बस, बहुत हुआ। ठीक तो हो चुकी है वह लगभग ... पर उसे याद आया उसने कहा था नंदिता से आज के लिए कि आज वह दिन में आएगा और वह जहाँ कहेगी उसे घुमा लाएगा। दर असल घर मे पड़े-पड़े वह बहुत बोर हो रही थी और उसने कहा था कल वह जरूर बाहर निकलेगी। थोड़ा घूम-फिर आएगी तो मन ठीक होगा उसका। यूँ पड़े-पड़े... बुखार पिछले दो दिनों से नहीं आ रहा था उसे। पर अभी भी वह बेइंतहा कमजोर थी... उसे डर लगा था... अकेले गई और ... यह उसका डर था या कि उसके साथ होने को एक और बहाना ढूँढ़ रहा था। खुले आसमान के नीचे। दरोदीवार के साये से दूर। अब्बू के अहसासों की पहुँच से बाहर। क्या उसे सिर्फ अपनी नंदिता की तलाश थी... अपने हिस्से की नंदिता की जिससे किसी का साया इस कदर लिपटा हुआ न हो...

उसने खुद को समझाया बस आज भर। आज के लिए तो उसने खुद से हाँ की थी। नहीं जाना ठीक नहीं होगा। फिर आज के बाद कभी नहीं। परसों तक यूँ भी अब्बू आ जाएँगे। फिर अपने इस बोझ से छुटकारा पा सकेगा वह। उसने 'बोझ' शब्द पर मन ही मन जोर दिया था और उसके पक्ष में खुद को ही एक तर्क भी - और नहीं तो क्या, अब्बू के कारण ही तो वह इस जंजाल में फँसा... और फँसा तो इस कदर फँसा कि नंदिता के हर अच्छे-बुरे में वह अच्छाई ही ढूँढ़ने लगा है। उसका कुछ भी अब उसे बुरा नहीं लगता क्यों...। इस क्यों का न तो कोई जवाब ही उसके पास था और ना ही उसकी कोई वजह ही। इस क्यों की तरह ही एक बेमानी सा अल्फाज - बस यूँ ही। इस यूँ ही में वह बुरी तरह फँसा जा रहा था। भँवर की तरह गोल-गोल घूमता... पर जाना तो आखिरकार उसे था ही और वह गया भी...

जगह चुनने की बात उसने नंदिता पर छोड़ दी थी, आज का दिन उसका... फिर जाने कब... उसने उदासी से पूछा... अगले ही पल उसने अपनी इस उदासी से पूछा - दो दिन के इस पहचान को पीछे छोड़ देने की इच्छा या मजबूरी से यह उदासी क्यों...?

नंदिता मुख्य दरबार पर अभी पहुँची ही थी कि उसे याद आया - जानती हो यह दरवाजा लाहौरी गेट क्यों कहा जाता है? नंदिता ने ना ही में सिर हिलाया था... इसलिए कि इसका रुख लाहौर की तरफ है... इसके अलावे भी यहाँ दो और गेट हैं। दिल्ली दरवाजा और हाथी दरवाजा। पर आजकल अंदर जाने के लिए बस यही इस्तेमाल में लाया जता है। शाहजहाँ द्वारा लाल पत्थर से बनाया गया यह किला देश के सर्वश्रेष्ठ किलों में से एक है। यह उसने 17वीं शताब्दी में बनवाया था जब उसने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली लाई थी। यह पूरे दो किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। इसका आकार अष्टकोणीय है, पर समान रूप से अष्टकोणीय भी नहीं...। किले के चारों तरफ जो खाई तुमने देखी न वह 75 फुट चौड़ी और 30 फुट गहरी है जिसे युद्ध के समय सुरक्षा के लिहाज से पानी से भर दिया जाता था...

वह सोचती रही, वसीम के साथ आज वह बाहर क्यों आई है... क्या इसलिए कि उसका साथ उसे अच्छा लगने लगा है। या सिर्फ इसलिए कि वह हनीफ सर का बेटा है... उस हनीफ सर का... वह माने न माने वसीम का साथ उसे अच्छा लगता है... पर एक सच्चाई यह भी कि वह इस सच से गुरेज करती है। उसे यह मानते तकलीफ होती है कि हनीफ सर के अलावे किसी और के आने से भी उसे खुशी हो सकती है... उसके व्यवहार में एक सच्चाई होती है, सहजता-सरलता जैसा कुछ। वे किसी भी विषय पर बातें कर सकते हैं घंटों... हनीफ सर की विद्वता के आगे दबी-झुकी नतमस्तक सी वह वसीम के साथ बराबर की होती है। वे दोनों साधारण से विषयों पर भी बातें कर पाते हैं। नई लगी पिक्चर, खेल और तमाम ऊलजलूल विषयों पर भी... वो सारी बातें भी जो वह हनीफ सर के सामने करने से कतराती है, डरती है। या कि फिर वे बातें जो वह सिर्फ एमी के साथ खुल के कर सकती है। उसने गौर किया वसीम धीरे-धीरे उसकी जिंदगी में वह जगह घेर रहा है जो कभी एमी की थी। एमी थी उसकी जिंदगी में, कहीं गई नहीं थी पर वह उसके साथ-साथ अब औरों की भी हो चली थी, उसने यह हाल-फिलहाल ही जाना था। एमी का यूँ विस्तृत-विशाल हो जाना उसे अच्छा भी लगता है जैसे वह भी कहीं कुछ बड़ी हो गई हो। बड़प्पन के बोध से भर-भर उठती है वह यह सोच के पर उसके व्यक्तित्व के इस तरह विस्तार पा लेने से कुछ छोटी तो हो ही गई है वह। मन का एक कोना अब खाली सा हो गया है जो एमी के होने से भरा-भरा था। खालीपन हमें हमेशा डराता है। कोई भी जगह कभी खाली नहीं रहती कि उसे खाली नहीं रहने देते हम। और इसी खालीपन से डर कर उसने इतने कम समय में वसीम को अपनी जिंदगी में जगह लेने दिया था।

सोचती रही वह बार-बार कि इस बात पर क्यों जोर देना चाह रही है कि वसीम ने एमी की जगह ली है उसकी जिंदगी में। क्या वसीम के होने की आश्वस्ति के साथ-साथ कोई खतरा भी मँडराता रहता है उसके आस-पास जिसे वह तरजीह नहीं देना चाहती तर्क दे कर। यूँ बहला-फुसला कर धोखे में रखना चाहती है खुद को...। इससे पहले तो कोई उसकी जिंदगी में नहीं आया...। इतने-इतने लोग... स्कूल-कॉलेज सब जगह चुप्पा सी रही है वह, घरघुस्सू भी। गिने-चुने लोग ही रहे हैं उसकी जिंदगी में। पहले माँ-बाप के कठोर सुरक्षा-संरक्षण में, पुनः एमी की और अब खुद की, जो जगह थी उसकी जिंदगी में वह हनीफ सर के आने से पूर चुकी... वसीम आया तो इसलिए आया कि हनीफ सर का बेटा है वह और उसे हमेशा यह याद रखना चाहिए।

वह एक लंबी बहस में उलझ गई थी खुद से ही, इतनी कि परेशानी की लंबी-लंबी रेखाएँ खिंच रही होंगी उसके माथे पर, चेहरे पर। उसने देखा आस-पास खड़े लोग उसे गौर से देख रहे थे। उसने सोचा उसे इन सब चिंताओं-परेशानियों से निकलना पड़ेगा। वसीम आता ही होगा अभी-अभी टिकट ले कर। और यूँ भी तो वह घूमने निकली है, जी हल्का करने, लंबी बीमारी के अवसाद से उबरने। यह अलग बात है कि घूमने के लिए अब उसे किले, मकबरे, आर्ट गैलरियाँ और ऐतिहासिक जगहें ही समझ में आती हैं, हनीफ सर के उसकी जिंदगी में आने के बाद। पर इसमें बुरा ही क्या है... चीजों को, जिंदगी को एक नए नजरिए से देखना तो उन्होंने सिखाया ही है उसे।

वह सहज होना चाहती थी...। वह सहज होने लगी थी वसीम के आने तक, उत्साह और स्फूर्ति से भरी-पूरी। मुख्य द्वार जिस बंद सी गली मे खुला वह हमेशा उसे चौंधियाता है। वह ठगी सी खड़ी हो गई थी थम कर उस मीना बाजार के आगे... चमकदार रंगों और उनकी दीप्ति से अपनी ओर खींचती एक अलग ही दुनिया। वसीम को उसका यूँ बच्चों की तरह चकित होना, ठिठकना, मचलना भाया था। उसने पूछा था कुछ लेना है आपको... उसने कहा था, नहीं। बस देखना अच्छा लगता है... एमी को बहुत पसंद हैं ये कलात्मक चीजें, गहने, एंटिक पीसेज...। कुछ उसके लिए लेना है...। नहीं, कभी साथ हुई तब... 'मीना बाजार', यह शब्द ही चौंधियानेवाला होता है शायद... जानते हो मुगल काल में भी यह बाजार यहीं लगता था। तब यहाँ मीनाकारी की वस्तुएँ ज्यादा बिकती थीं, मीना बाजार नाम भी शायद इसीलिए पड़ा हो। और हाँ, तब यहाँ सिर्फ स्त्री विक्रेता ही हुआ करती थी, पुरुष नहीं... सोचो, तब की स्त्रियाँ भी आत्मनिर्भर होती थीं और हर क्षेत्र में...। वसीम ने बीच में ही कहा था, हाँ, सिर्फ आम महिलाएँ... यह बाजार ही शाही स्त्रियों के लिए था। कि बाहर जाने की जरूरत ही न पड़े उन्हें... कि किसी दूसरे मर्द की छाया भी न पड़े उन पर...। कि बाजार में भी कोई पुरुष दुकानदार न हो...

नंदिता चुप हो गई थी... उसे लगा जैसे हनीफ सर ही बोल रहे हों... पर हनीफ सर ने कभी नहीं कही थी यह बात उससे। कि उन्हीं से सुना-सुनाया तो दुहरा रही थी वह तब से। भूल चुकी थी कि वसीम भी हनीफ सर का ही बेटा है और फिर वह यह भी भूल गई थी कि वह कला का विद्वान भले ही न हो इतिहास का छात्र तो था ही।

उसने सोचा क्या हनीफ सर ने कभी नहीं सोचा होगा इस बिंदु पर... उन्होंने क्यों नहीं कही यह बात उससे? जैसे ज्ञान की हर बात पर हनीफ सर का कॉपीराइट हो... और उसका यह अधिकार कि वह उन्हीं से जाने। क्या वह भी किले में बंद उन रानी और राजकुमारियों की तरह थी जिन्हें राजा के किले में ही नजरबंद रहना पसंद था। उन्हीं की निगाह से खुद को और दुनिया को देखना था। हनीफ सर से प्रेम जैसे एक अभेद्य किला था और उसमें कैद हो गई थी वह।

फिर मन उचट गया था उसका। वसीम को भी लगा जैसे वह चंचल हिरणी गुम हो गई कहीं। अब एक थकी-हारी औरत चल रही थी उसके साथ, घिसटती-पिसटती और उसे नंदिता का यूँ बिला उम्र बुजुर्ग होना अच्छा नहीं लगा था। वह उसे बेउम्र बुजुर्ग नहीं होने देना चाहता था... वह बार-बार कोशिश करता रहा। नंदिता बोल ही नहीं रही थी कुछ अपनी तरफ से। उसकी कोशिश कभी-कभी रंग लाती कि वह लौट जाती क्षण भर में ही, और गुम हो जाती कहीं।

वे घूमते रहे थे फिर एक-एक कर... नौबतखाना, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, रंग महल, खास महल, मोती मस्जिद फिर संग्रहालय और युद्ध स्मारक भी। पर नंदिता इस बार बिल्कुल ही हतप्रभ नहीं हो पा रही थी। पिछली बार की तरह तो बिल्कुल ही नहीं। न रंग महल में सुनहरे फूलों से सजी छतों को देख कर जिसका बिंब तब नीचे बने तालाब में प्रतिबिंबित होता होगा न ही सम्राट के सिंहासन की अद्भुत पच्चीकारी से। वह मोती मस्जिद को देख कर सोचती रही इबादत के लिए भी औरतों के लिए अलग जगह... उस सृष्टि रचनेवाले के सामने भी भेद... उसी ने तो रचा है दोनों को एक दूसरे का पूरक बना कर। पर उसके इबादत में भी क्यों साथ-साथ खड़े नहीं हो सकते दोनों यही सोच-सोच कर संगमरमर से बना हुआ वह मस्जिद और उसका शाही सौंदर्य भी फीका हो चला था उसकी नजर में।

उसने सोचा वसीम भी यही सोच रहा होगा। वसीम ने जैसे पकड़ लिया था उसकी सोच का सिरा। उसने कहा - दरअसल इस्लाम में औरतों को मस्जिद में जाने की मनाही है, वे घर में ही नमाज अदा करती हैं। शायद उसका एक कारण पर्दा प्रथा हो। हालाँकि औरंगजेब एक कट्टर, धर्मभीरु और कठोर शासक के रूप में याद किया जाता है पर उसने यह एक नेक काम तो किया ही था। उसने अलग से ही सही शाही महिलाओं के लिए मस्जिद तो बनवा ही दिया, और सबसे खास बात, इसका रुख मक्का की तरफ है।

...उसे लगा बहुत थक गई है वह, मानो सदियों लंबी दूरी तय कर ली हो उसने। और उसके भीतर एक साथ ही न जाने कितना कुछ बन-टूट रहा हो। उसने सुना था कि कोशिकाएँ बनती टूटती रहती हैं हर पल...। पर क्या मनुष्य भी बनता-टूटता है उसके साथ। आखिर वह क्या था जो लगातार उसके भीतर टूट रहा था, बन रहा था। वह खुद भी इसे समझ नहीं पा रही थी।

उसे बहुत भूख महसूस हो रही थी, बहुत ज्यादा प्यास भी। क्या सिर्फ बीमारी की वजह से... नहीं, पिछले दिन उसकी जिंदगी में बहुत अलग किस्म के रहे हैं। पहले एमीलिया का लेख, फिर उसके बाद 'आनंदवन' जाना, मिली नामक उस बच्ची से मिलना, उसकी हालत देखना... जैसे जीवन कोई खेल खेल रहा था उसके साथ या कि जीवन का यह कोई नया चक्र था। वह बैठ सी गई थी वहीं थक कर जहाँ वह खड़ी थी। वसीम चौंक पड़ा था... वह दौड़ कर गया था दूसरी तरफ जहाँ रंगीन छतरियों के नीचे कुर्सियाँ थीं, टेबल थे। ठंडा पानी, बिस्कुट, नमकीन और चिप्स की दुकानें थीं। वह पानी का एक बोतल लेता आया था अपने साथ। उसने बोतल की ढक्कन खोल नंदिता की तरफ बढ़ाया था। अभी नंदिता ने कुछ घूँट पानी पिया ही था कि उसने सुना वसीम कुछ खाने-पीने के लिए कह रहा है। नंदिता ने मना कर दिया था... नहीं अब घर चलते हैं। बहुत थकान हो रही है मुझे। वसीम को लगा जिद करना सही नहीं रहेगा। अलबत्ता उसके उतरे चेहरे को देख कर उसे यह जरूर लगा कि शायद फिर बुखार चढ़ रहा है।

वसीम का डर सही निकला। नंदिता रास्ते में ही सिहरने लगी थी। हल्की कँपकँपाहट होते देख रहा था वह उसके पूरे बदन में। पर वह कर कुछ भी नहीं सकता था सिवाय गाड़ी की स्पीड कम कर देने के जिसे कम करते भी वह हिचक रहा था, जितनी जल्दी हो सके वह नंदिता को घर पहुँचा पाता...

वे घर पहुँच चुके थे। वसीम ने कंबल खोला था उसे ओढ़ाने के लिए, और ओढ़ा दिया था गर्दन तक। टेंप्रेचर लिया था 103.2 नंदिता बताती है इससे भी ज्यादा-ज्यादा बुखार हुआ है उसे इस बीमारी के दौरान। उसे इस तरह बेसुध देखकर सोचता रहा था वह कि किस तरह रही होगी वह इस हालत में। कैसे बीत होगा उतना सारा वक्त। नंदिता ने बताया था उसे बुखार अक्सर शाम के बाद ही बढ़ता है... पर आज तो दोपहर से ही। उसी की गलती है सब। उसने क्यों मानी नंदिता की बात। दो दिन बुखार नहीं हुए तो उसने क्यों सोच लिया कि अब ठीक हो चुकी है वह... थकान से ही हुई होगी उसकी यह हालत। उसने टेबल पर पड़े प्रेस्क्रिप्शन को उठा कर डाक्टर का नंबर देखा था और फोन लगाया था उन्हें। उधर से किसी महिला की आवाज आई थी... हलो, प्रशांत क्लीनिक... किससे बात करनी है...। सॉरी, डाक्टर तो बाहर गए हुए हैं... कोई इमरजेन्सी...? अगर जरूरत हो तो नर्सिंग होम में एडमिट करवा सकते हैं उन्हें। डॉक्टर कल दोपहर तक आ जाएँगे... उसने नंदिता से पूछा था इस बाबत। पर उसने नहीं में अपना कमजोर सिर हिलाया था। दवाइयों की तरफ इशार किया था, जैसे कह रही हो दे दो उन्हें, ठीक हो जाऊँगी।

वह किचेन से एक ग्लास पानी लेता आया था, थोड़े से बिस्किट भी, वहीं कहीं किसी डिब्बे से ढूँढ़-ढाँढ़ कर। उसने नंदिता को सहारा दे कर बैठाया था। वह तकिए के सहारे थोड़ी उठंग सी हुई थी। बिस्किट देखते ही उसने ना में गर्दन हिलाई थी लेकिन वसीम जबरन उसे छोटे-छोटे टुकड़े तोड़-तोड़ कर देता रहा... दवा खाली पेट नहीं लेते...

वह नंदिता के सिरहाने एक स्टूल पर बैठ गया था, उसकी बालों में उँगली फिराता हुआ, उसकी हथेलियाँ सहलाता हुआ। उसे याद है उसे या नसीम को जब भी बुखार हुआ है अम्मी उसके पास ऐसे ही बैठती है... वह पल भर को भी नहीं सोच रहा था कि वह किसी लड़की के पास बैठा है... इतने एकांत में और इतना करीब। उसे अब यह भी याद नहीं था कि उसने सुबह मन ही मन अम्मी से और खुद से क्या वादा किया था। उसे बस नंदिता की चिंता थी; उसके सूखे हुए होंठों, उसके बुझे हुए चेहरे और ज्वर से थरथराते कमजोर हुए उसके शरीर की भी...

नंदिता के मोबाइल की घंटी बजी थी तभी। उसने फोन अपनी ओर बढ़ाने का इशारा किया था। उसने स्क्रीन पर नजर फेरी थी और फोन को बजने दिया था। वसीम ने इशारे से ही पूछा था किसका है... नंदिता ने क्षीण से स्वर में कहा था - मम्मी का है, घर से। फिर उठाती क्यों नही... उठाओ फोन... नहीं वो मेरी हालत जानेंगी तो चिंता में पड़ जाएँगी। भागे-भागे आ पहुँचेंगे दोनों और वह ऐसा नहीं चाहती। तुम मत बताना, फिर कैसे जान लेंगी... माँ हैं, वह आवाज पढ़ लेंगी... मैं बात करूँ? नहीं... नंदिता के धीमे स्वर का विरोध भी बहुत तगड़ा था। ...वह हँसा था इसी तरह बात किया तो वे कुछ नहीं समझ पाएँगी... उसने रूठने का अभिनय किया था, अपने पपड़ाए होंठों और बोझिल आँखों के साथ-साथ। उसने फोन बंद कर दिया था... वसीम से फिर नहीं रहा गया था... इस तरह तो... वह झुँझलाई थी, वे नहीं करेंगी चिंता-विंता। और करती हैं तो करती रहें। मुझे अपने हर एक पल का हिसाब नहीं देना उन्हें... नहीं देनी कोई सफाई। फिर उसके चेहरे को देखते हुए कहा था। मैं ठीक हो जाऊँगी तो बात कर लूँगी उनसे, तुम परेशान मत हो...। फिर उसे याद आया हो कुछ अचानक, उसने कहा था... रात होती जा रही है, तुम घर जाओ अपने...। वह कुछ भी नहीं कह सका था... नंदिता की मम्मी का फोन आने के बाद उसे भी याद हो आई थी अपनी मम्मी की, सुबह उनसे किए वायदे की भी। पर सामने लेटी हुई लड़की की आँखों में ऐसा क्या था। उसे छोड़ कर चले जाने को उसके पाँव उठ ही नहीं रहे थे। उसने जैसे कोई फैसला लिया था अचानक... मैं तुम्हें इस तरह छोड़ कर नहीं जा रहा, वह भी ऐसी हालत में। अब्बू ने ही मुझे तुम्हारी देख-भाल के लिए कहा था। हाँ, अम्मी को एक फोन जरूर करना चाहूँगा... वह यह कह कर बहार निकल पड़ा था बिना नंदिता के प्रतिरोध को सुने... मैंने तो पिछली कई रातें ऐसे ही...।

नंदिता भले ही वसीम को जाने को कहती रही हो पर उसके रुक जाने से उसे एक इत्मीनान मिला था। उसने जबरन जो चेत ओढ़ रखा था अपने ऊपर उसे ढीला छोड़ दिया था। उसकी बोलने की हिम्मत बिल्कुल चुकी जा रही थी। उसने काँपते हाथों से लिखा था वसीम की नोटबुक में - आल्मारी में कुर्ता पाजामा है, पहन लेना आराम मिलेगा। किचेन में तुम्हारा ही लाया ब्रेड-बटर है, खा जरूर लेना। आल्मारी के निचले खाने में थोड़ा-बहुत कुछ बिछावन जैसा है, निकाल कर सो सकते हो। स्टूल पर नींद नहीं आएगी। मैं अब आराम करना चाहती हूँ, पूरी तरह।

वसीम जब फोन कर के लौटा उसका मन बहुत उदास था। उसे बुरा लग रहा था मम्मी से झूठ बोल कर। उसे दुख हो रहा था कि अब्बू की गैरमौजूदगी में वह अम्मी और नसीम को यूँ अकेले छोड़ कर बाहर रह रहा है, वह भी रात में। अम्मी अब तक उसके इंतजार में बैठी थीं। वह उन्हें खा लेने को कह कर आ रहा है... उसने उनसे कहा था कि एक दोस्त की तबीयत खराब हो गई है अचानक, वह अकेला है और उसे रुकना पड़ रहा है। वह झूठ तो बोल रहा था पर कोशिश कर रहा था कि कम से कम बोले। बिना यह तय किए कि झूठ छोटा हो या कि बड़ा, कम या कि ज्यादा होता तो झूठ ही है...। या यूँ कि उसे सफाई से झूठ बोलना अभी आता ही नहीं है। अम्मी चुप हो गई थीं देर तक। क्या अम्मी ने सच्चाई समझ ली थी। नहीं, उन्हें उसके कहे पर भरोसा है।

लौट कर उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वह करे तो क्या करे। नंदिता सोई हुई थी बेसुध और वह बुत की तरह खड़ा था। क्या उसे घर लौट जाना चाहिए था... क्या उसने रुक कर गलती कर दी कोई? वह अचानक खुद को बहुत उदास महसूस करने लगा था, बहुत बुझा-बुझा और टूटा हुआ भी। कि तभी सामने खुला पड़ा अपना नोट बुक दिख गया उसे। बस इतने से जुड़ाव से इतनी सी चिंता...? वह किचेन में गया था और ब्रेड निकाल कर खा लिया था ऐसे ही... अब सेंकने बटर लगाने की जहमत कौन उठाए। अम्मी ने तो उसकी आदतें यूँ बिगाड़ रखी है कि अपने लिए तो उससे कुछ होता ही नहीं है... फिर थोड़ी सी बिस्किट और नमकीन... और फिर कमरे में आ गया था वह। आल्मारी खोल कर उसने नीचेवाले रैक की तलाशी ली थी। बिछावन के नाम पर वहाँ जो था वह इस ठंड के मौसम में उसे नाकाफी लगा। एक पतली सी दरी, लगभग उतना ही पतला एक बिस्तर और चादर। वह खड़ा-खड़ा सोचता रहा कि क्या करे। उसने सोने के इरादे को दरकिनार किया। वह तो नंदिता की देखभाल की खातिर रुका है तो फिर सोना क्या? रात में उसका बुखार यदि और बढ़ा तो? रात में उसे किसी चीज की जरूरत पड़ी तो? वह स्टूल पर जा बैठा था। तभी उसे लगा, क्यों न वह कपड़े बदल ले, कम से कम बैठने में अराम तो मिलेगा। वह आल्मारी तक गया था। टँगे हुए कुर्ते-पाजामे को देखता रहा था देर तक, अनिर्णय की स्थिति में। फिर तात्कालिकता के दवाब में उसे खींच लिया था उसने झटके में कि ज्यादा सोचा-बिचारा तो...

दीवार से लगा हुआ स्टूल पर वह सो ही चुका था शायद कि उसे नंदिता की कमजोर सी आवाज सुनाई पड़ी। उस फुसफुसाहट को सुनने के लिए उसने अपना कान उसके चेहरे की तरफ किया और धीमे से पूछा था - पानी...? उसने सिर हिलाया था - नहीं... उसने इशारा किया था - कमरे की बत्ती की तरफ। रोशनी बुझा कर वह फिर अपनी जगह पर आ बैठा था... कि नंदिता के टटोलते हाथ उसकी हथेलियों तक आ गए थे। उस हाथों का ताप, उसकी जलन जैसे बेचैन कर गए उसे। अब तक इतना बुखार है... तभी तो बेसुध पड़ी है इस तरह। उसने उसकी हथेली को अपनी दोनों हथेलियों के बीच रखा था और हौले-हौले सहलाया था उसे। उन हथेलियों की तड़फड़ाहट वैसे ही थमी थी जैसे पानी से निकाल दी गई मछलियों को वापस पानी मिल गया हो। उसे जैसे सुकून मिला था, चलो नंदिता को उसने कुछ तो आराम दिया है। पर सुकून का यह टुकड़ा बहुत छोटा था। वह खुद बेचैन हो उठा था आखिर क्या करे वह कि नंदिता की तकलीफ दूर हो जाए... उसने उसके तपते माथे पर अपनी उँगलियाँ रख दी और सहलाता रहा धीरे-धीरे। उसकी उँगलियाँ जैसे तप गई थी। झटके से खीचा था उसने उन्हें और सहसा किसी आवेग के तहत अपने होंठ रख दिए थे उसके माथे पर। होंठों में शायद पानी था बहुत-बहुत। वे तपे नहीं थे, पुरसुकून से हल्के गुनगुने हुए थे बस। उसे अच्छा लगा। नंदिता के बुदबुदाते, काँपते से होंठों ने भी शायद यही कहा था... और फिर वह अपने होंठों को फिराता रहा था उसके पूरे माथे पर, चेहरे पर। न जाने कितनी देर तक, न जाने कितनी-कितनी बार... जैसे लम्हों में सदियाँ सिमट आई थी कि नंदिता ने ही धीरे से खींच लिया था उसे होंठों तक। जब नंदिता के होंठ उसके होंठों से मिले तभी उसे यह खयाल आया कि कैसे उसे इन सूखे, पपड़ी जमे होंठों की स्मृति नहीं हुई... कि उसे कैसे यह समझ में नहीं आया कि वह इस सूखे प्रदेश को फिर से हरा कर दे, जीवन से भरा हुआ... नंदिता के हाथ उसे नीचे और नीचे खींचते रहे थे...

वसीम को प्रकृति पसंद थी, मोहक, दीप्त और हरी-भरी... उसे खूबसूरती भाती थी हर शय में और वह दिल से झुक पड़ा था उस अद्भुत अरूप के कदमों में... इस तरह उसने उस अदृश्य का शुक्रिया भी किया था और उसकी इबादत भी। बुतपरस्ती उसे पसंद थी। मंदिर, मंदिर की घंटियाँ, कलश, कंगूरे सब उसे बचपन से ही खींचते थे अपनी तरफ। एक बार तो वह अपने एक दोस्त के साथ पहुँच भी गया था वहाँ तक। पर अम्मी की चेतावनी उसे याद आई... जो मना है, बस मना है... पकड़े गए तो...? और वह लौट आया था मन मार कर। पर आज लौटना नहीं था उसे... आज वह लौटना नहीं चाहता था, किसी भी डर से, किसी के आतंक से, वह भी तब जब मंदिर के कलश... कंगूरे अपने आकर्षण और भव्यता के साथ उसकी उँगलियों को खुद खींच रहे थे अपनी तरफ पूरे वेग और आवेग से...

पर हर ऊँचाई चढ़ लेने के बाद उतरना भी होता है। मंजिल तक पहुँच जाने के सुख को पाने के बाद लौटना भी... यही शाश्वत नियम है... चाहना न चाहना अब वश में कहाँ थे... वह फिसल रहा था जैसे अपने-आप। नीचे एक नदी थी और आवेग से भरी उसकी गुनगुनी धार लगातार बुला रही थी उसे और उस तक जाना उसमें डूब जाना ही जैसे उसकी नियति थी। वह रोके भी तो कैसे रोके खुद को... वह तैरना चाहता था पर डूब रहा था... ऊपर आने की हर कोशिश में और-और गहरे जाता... जैसे तैरने की उसकी सारी कोशिशें निष्फल और बेकार... उसने छोड़ दिया था खुद को डूबने की खातिर... कि डूबने का आनंद तभी समझ पाया था वह। डूबने के इस आनंद को महसूस ही रहा था वह, कि डूबना ही चाहता था वह इस डूबने के आनंद में कि अचानक उसे लगा वह तैरने लगा है... कि उसे तैरना आ गया है... कि हल्का हो गया है वह एकदम से...। और तैरने की कोशिश में डूबते और डूबने की कोशिश में तैरते वह खुश था कि दुखी वह खुद नहीं समझ पा रहा था। वह जैसे महसूस ही नहीं पा रहा था कुछ कि अचानक उसने महसूस किया जैसे नंदिता का बदन तापहीन हो गया है, बिल्कुल सामान्य और जाड़े के दिनों में जितना ठंडा हो सकता है उतना ही ठंडा। उसके मन में जैसे खुशी का ज्वार फूट पड़ा था।

नंदी ने सामने के स्टूल पर अपनी बेसुधी में भी वसीम को देखा था। पर उसकी नजरों में तो वसीम कहीं था ही नहीं... एक रुकी हुई रात थी जो वहीं आ कर रुक जाती थी हमेशा। उसके आगे बढ़ती ही नहीं थी कभी और वह उस लंबी-अंतहीन रात में छटपटाती रहती थी हमेशा। उसने सोच लिया था आज रात को बीतना होगा; वह अँधेरे का सफर तय कर लेना चाहती थी... कि आज रात को भी चलना था उसके संग-संग।

उसने देखा था अपनी क्षीण नजरों से... हनीफ सर हमेशा की तरह बैठे हैं उसी स्टूल पर। अब विदा लेना होगा उन्हें। कि यही हैं अंतिम हदें। कि इसके आगे हनीफ सर की निजी जिंदगी है... उनका परिवार। उसने देखा था उस अदृश्य लक्षमण रेखा को जो वे जाते-जाते खींच जाते थे उसके चारों तरफ। उन्होंने हमेशा की तरह उसके बालों में उँगलियाँ फिराई थी। बड़ी मासूम सी उँगलियाँ जिसमें समर्पण भी था और प्यार भी। जिसमें अपनापन भी था और खुद को बिसरा देने की इच्छा भी। वे पूरे स्नेह, पूरे आदर और पूरे अपनत्व से चूमेंगे उसका माथा और चल देंगे जैसे कि पूर्णविराम लगा दिया हो उसके आगे की हर इच्छा पर, उसके प्रश्नों पर, उसके मनुहारों पर। वह अवाक सी देखती रह जाएगी उन्हें जाते हुए, उसका शरीर जलता रहेगा उस मीठे चुंबन की आग में, वह तड़पती रहेगी पूरी रात, ऐंठता रहेगा उसका सारा जिस्म पर हनीफ सर को उसकी परवाह क्या। उनकी जिम्मेदारी तो उनकी पत्नी है, उनका परिवार है। शिकायत नहीं कर सकती है वह; शिकायत करने का हक नहीं है उसे। हनीफ सर इसी शर्त पर तो आए थे उसकी जिंदगी में। उसी ने मानी थी उनकी हर बात। वह तो सिर्फ उनका सामीप्य चाहती थी, पल दो पल का सुखद साथ... पर ये चाहनाएँ क्यों...? आजकल यूँ भी उसकी सोच और इच्छाओं के बीच कोई तालमेल नहीं रह गया। वह जितना ज्यादा सोचती उसका जिस्म एक अतृप्त चाहना में उतना ही ऐंठता रहता सारी रात...

आज उसने वह सब कुछ चाहा था जो उसके हिस्से का नहीं था और पूछा था खुद से पहली बार आखिर वह उसके हिस्से का क्यों नहीं है? उसे उसके हिस्से का भी होना होगा... इसलिए जब हनीफ सर ने विदा चिह्न अंकित किया था हमेशा की तरह उसके माथे पर, वह तड़प उठी थी। वह उसे ऐसे कैसे छोड़ कर जा सकते हैं। उसने उनका सिर थाम लिया था अपने दोनों हाथों में और खींच कर ले आई थी उन्हें सीमा-रेखा से बाहर जहाँ उन्होंने कभी दस्तक नहीं दी थी। वे दस्तक दें न दें उसकी इच्छा थी कि वह खींच ले उन्हें कपाट के भीतर। उसने उनके तपते होंठों को अपने होंठों तक खींच लिया था। उनके कुर्ते के बाँहों को मजबूती से थामे रखा था हर पल कि छूटते ही कहीं छिटक न लें वे उसकी पहुँच से। उस हर क्षण में भी कभी उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई थी, एक पल को भी नहीं। नंदिता को भले ही चेत नहीं था पर उसके शरीर को था। वह अपनी वर्षों लंबी थकन, अपनी जलन सब बिसरा देना चाहता था। वह हनीफ सर को अपनी हर तकलीफ हर पीड़ा तक खींच-खींच ले जाती रही। ताप मिटता रहा, तन हुलसता रहा, हरियाता रहा। उसने जैसे वर्षों की थकान, जलन सब पीछे छोड़ दी हो। शरीर बिल्कुल हल्का हो आया था उसका... अँधेरा खत्म हो चला था उसकी जिंदगी से हमेशा के लिए। उसे लगा रात का सफर तय हो चुका था...
 
8

अम्मा ने जब नंदिता को देखा तो जैसे देखती ही रह गई थीं। एमीलिया, वह भी उनकी पहलेवाली एमीलिया, जाते-जाते कैसे लौट आई थी। उन्हें भरोसा था, वह रास्ता लौटनेवाला नहीं है। और पीछे से आवाज देना उनकी फितरत नहीं रही है। पर जो सामने खड़ा था वो कोई बुत नहीं था, न ही कोई वहम...।

वह एमीलिया नही, नंदिता थी जिसे दूर से देखकर अम्मा को यह भ्रम हुआ था... जब वह सामने आई तो भरम मिटा था उनका... वह एमीलिया जैसी ही कोई थी... वह क्यों एमीलिया जैसी थी यह तो वे बाद में जान पाई थीं। पर कुछ उस दिन भी जाना था... उसके हाथों में कई कागजात थे, आनंदवन से जुड़े हुए... और एमीलिया की सगाई का न्योता भी। तभी वे जान पाई थीं कि नंदिता एमीलिया की बचपन की सहेली है... वे दोनों दिल्ली में भी बरसों साथ रही हैं शायद इसी खातिर...

उन्होंने पूछा था उससे आने में कोई परेशानी तो नहीं हुई... नंदिता ने कहा था वह पहले भी आ चुकी है यहाँ एमीलिया के साथ... वे चौंक सी गई थी... कब आई थी यह... उन्हें याद क्यों नहीं आ रहा...वे ढूँढ़ती इस सवाल का जवाब कि नंदी ने फिर चौंकाया था, मिली कहाँ है, कैसी तबीयत है उसकी... ठीक है अब... अम्मा ने खुद से उलझते हुए ही जवाब दिया। नंदिता समझ गई थी यह परेशानी। उसने हँस कर कहा था... जब मैं आई थी आप नहीं थी यहाँ, किसी काम से बाहर गई थीं...

अम्मा सामान्य हो आई थीं। नंदी ने उसी दिन पूछा था उनसे... क्या मैं आ सकती हूँ यहाँ, जब जी चाहे... अम्मा को लगा एमीलिया ही खड़ी है उनके आगे...। और उन्होंने उसे भी वही जवाब दिया था जो कभी एमीलिया को... फिर पूछा था, क्या कर रही हो बेटी... शोध कर रही हूँ... विषय... स्वतंत्रता संग्राम में महिलाएँ। कहाँ रहती हो... फिलहाल मुनिरका में... लेकिन दूसरी जगह तलाशनी है बहुत ही जल्दी... चाहो तो यहाँ रह सकती हो, शहर से दूर है पर... न जाने क्यों अम्मा अचानक ही कह उठी थीं। नंदिता खुश हो गई थी, जैसे उसके मन की...

उसने सबसे पहले प्रवीण को फोन किया था... मुझे रहने की नई जगह मिल गई है... शायद जीने की एक नई राह भी... मैं आनंदवन में अम्मा के साथ चली आई हूँ... बच्चों के साथ शायद जल्दी सहज हो जाऊँ...

... प्रवीण को भी सुनकर थोड़ी राहत मिली थी। वर्ना कल तो उसके फोन से घबड़ा ही उठा था वह... बच्ची की तरह सिसक रही थी वह... वसीम एमी से शादी कर रहा है और हनीफ सर उसे यूँ देखते हैं जैसे कभी जाना ही नहीं हो उसे... प्रवीण बेतरीके डर गया था उस क्षण... कैसे सँभालेगी यह खुद को... वे लोग भी तो नहीं हैं उसके पास कि... उसने उसी से सुनी एक कविता सुनाई थी - 'उड़ चल हारिल लिए हाथ में, एक अकेला ओछा तिनका। ऊषा जाग उठी प्राची में, कैसी बात भरोसा किनका?'

दूसरा फोन प्रवीण के पास अर्से बाद आया था... मैंने मिली को गोद ले लिया है... बाकायदा... आप खुश हो न...? उसने कहा था... बहुत। नंदिता की आवाज की चहक उसे अच्छी लगी थी... उसने कहा था सुनाऊँ कुछ... आजकल मैं भी तुम्हारी तरह कविताएँ पढ़ रहा हूँ... खासकर अज्ञेय की... 'यह दीप अकेला स्नेह भरा, है गर्व रहित मदमाता पर, इसको भी पंक्ति को दे दो।' नंदिता ने हँस कर कहा था... हाँ, मेरा मोक्ष भी यही है। मेरी मुक्ति का रास्ता... मेरे द्वारा खोजी हुई मेरी अपनी राह। मेरा अस्तेय-अपरिग्रह।

फिर तो अम्मा की सारी जिम्मेदारियाँ। स्कूल का सारा काम... बच्चों की देखभाल... नंदी ने कभी एमीलिया की कमी महसूस ही नहीं होने दी थी उन्हें... और उनकी चिंता जैसे जाती रही थी एक-एक कर... वे एमी को भूलने लगी थीं। याद करती भी तो वैसे ही जैसे कभी शिखा को याद करती हैं। एमीलिया भी आती तो... पर नंदी को इस तरह आनंदवन से जुड़ा देखकर लौट जाती।

वह आती थी अपने वादे का खयाल करके... अम्मा, नंदी और बच्चों का खयाल करके... कि तुम मुझे और आनंदवन से एकदम से नाता नहीं तोड़ लोगी न... कहो, कि कुछ समय निकलोगी तुम हमारे खातिर भी... भरी आँखों और मुस्कुराती होंठोंवाली एमीलिया ने भी कहा था... कैसी बात करती हैं अम्मा, यह भी कोई कहने-सुनने की बात है... उन्हें लगा था एमीलिया की आँखें शिखा की आँखें नहीं है, उनमें एक सच्चाई है। हमेशा की तरह... एमीलिया खुश होती, नंदी रम गई है इस जिंदगी में, एमीलिया खुश होती अम्मा को एक सहारा मिल गया था... एमीलिया खुश होती बच्चों के लिए... उसकी जगह खाली नहीं रह गई थी। एमीलिया खुश थी, नंदी ने वह कर दिखाया था जो कभी एमी का सपना था और वह पूरा नहीं कर पाई। रिसर्च पूरा कर लेने और लेक्चरर की नौकरी कर लेने के बाद भी नंदी ने अम्मा और आनंदवन को नहीं छोड़ा था। बल्कि उससे आगे बढ़ के मिली को गोद लेकर उसे नई जिंदगी दी थी। एक नई मिसाल कायम की थी उसने, अपनी जिंदगी आनंदवन और बच्चों को सौंपकर... किसी को गोद लेकर... इन सबकी खातिर शादी न करके। उसे रश्क होता नंदिता से... यह सब तो सारी उम्र वह चाहती रही थी फिर नंदी...

वर्ना जयपुर से लौटकर आई नंदी को देख उसका मन कसक उठा था... उसकी नंदी कहाँ गुम हो गई थी आखिर। एक-एक कुर्ता-जींस कई-कई दिनों तक पहने रहती। राजस्थान से खरीद कर लाए सारे शोख-चटक दुपट्टे और कपड़े उसे दे गई थी वह... बस खोई रहती अपने में ही कहीं... और एक अपराधबोध से भर जाती वह... उसी ने तो नहीं छीन लिया उससे उसका सब कुछ... नंदी ठहरकर सोचती तो शायद लौट आती। वसीम उसे हाथोंहाथ थाम लेता, जानती थी वह। फिर भी... क्यों किया उसने ऐसा। क्या नंदी से प्रतिशोध ले रही थी वह... उसे अकेले छोड़ कर जाने का प्रतिशोध... हनीफ सर की खातिर... क्या दोस्ती की आड़ में किसी मौके की ही तलाश थी उसे... और वह मौका खुद नंदी ने ही दे दिया था उसे...

9

एमीलिया की मोबाइल की घंटी उस दिन जब जोर-जोर से चिल्ला रही थी, वह सोई हुई थी गहरी नींद में। यूँ भी उसे देर तक सोने की आदत थी। नंदिता थी तो उसकी सुबह कभी नौ-साढ़े नौ बजे से पहले होती ही नहीं थी। वह भी उसके चीखने-चिल्लाने और बार-बार हल्ला मचाने के बाद... पर नंदी के जाने के बाद उसे मजबूरन इस आदत को बदलना पड़ा था... कभी दूधवाले की घंटी से, कभी अखबारवाले, ब्रेडवाले के...

वह सोचती है आदतें तो अब तक बदल जानी चाहिए थी। नंदी को गए हुए कितने बरस तो बीत चुके थे। पर नहीं, कुछ भी नहीं बदला था उसकी घरेलू जिंदगी में। वह सोई होती और दूधवाला आता तो कहती अधनींदी सी ही... जा ले ले न नंदी। रोज तो लेती है तू, फिर आज किस बात का नखरा...। फिर कच्ची नींद जैसे बिखर जाती। नंदी... नंदी कहाँ है अब यहाँ। वह तो चली गई कब की उसे छोड़कर... उसने एक पल को भी नहीं सोचा कि वह अकेली कैसे रहेगी। उसे नहीं याद आया वह वादा भी जो अपना घर और शहर छोड़ते वक्त दोनों ने एक-दूसरे से किया था... कि कैसे भी हालात हों, वे एक दूसरे का साथ कभी नहीं छोड़ेंगी...। कि कैसा भी दौर आए उनकी दोस्ती, उनके संबंधों में कभी भी कोई बदलाव नहीं आएगा... पर कोई भी वादा नहीं टिका था उस पल... वह हतप्रभ सी देखती ही रह गई थी तब...

लगातार बजती फोन की घंटी ने उसे परेशान कर दिया था। ऐसे भी कौन सा सो रही है वह। उठाकर खबर ले ही ले सामनेवाले की... यह कौन सा तरीका हुआ आखिर... कोई फोन नहीं उठा रहा है तो कोई तो बात होगी। थोड़ा सा सब्र तो किया ही जा सकता है... वह उठी थी झटके से कि रिंग आना बंद हो गया था। वह सेल उठा कर नंबर देखती ही कि डोरबेल चीखने लगा था और मजबूरन उसे दरवाजे की तरफ पलटना पड़ा था... हाँ, चीखना ही कहेंगे... पता नहीं नंदी कहाँ से ढूँढ़ कर लाई थी यह डोरवेल। वह कहती, कितनी यूनिक सी आवाज है और उसी आवाज की तासीर उसमें घबड़ाहट और बेचैनी भर देती। एक छोटे से बच्चे के जोर-जोर से रोने की आवाज; रोते-रोते चीखने लगा हो जैसे। वह कहती हर बार - तुझे यही मिला था... और भी तो... वह हँस देती... तभी तो उठेगी हड़बड़ाकर। वर्ना सोई रहेगी भीमपटास सी... वह सोचती है अब तो वह भी अभ्यस्त हो चली है इस कानफाड़ू रुदन की... पर यदि गहरी नींद में हो तो अब भी कभी-कभी परेशान हो उठती है।

वह चाहती तो नंदी के जाने के बाद इसे बदल सकती थी। पर चाह कर भी नहीं बदल पाई इसे...

कितनी देर लगा देती हैं आप दरवाजा खोलने में। नंदी बेबी थीं तो... कितना देर लगा दिया... तुम घंटी पर से हाथ हटाती ही नहीं हो... कोई बाथरूम में हो सकता है... कुछ भी करता हो सकता है... तुम हो कि समझती ही नहीं... काहे का बाथरूम और कैसा नहाना-धुलना... मुझे पता है आप सो रही होंगी अब तक... इसीलिए तो बजाती हूँ बेल जोर-जोर से इतना, नंदी बेबी...

यह नंदी बेबी-नंदी बेबी क्या लगा रखा है तुमने। वह होती थी तब न... वह चली गई यहाँ से कब की। और उसे गए जमाना हो चुका है। भूल क्यों नहीं जाती तुम उसे... वह शायद चीखी थी जोर से। नन्हू ताई घबड़ा गई थी उसके इस तरह चीखने से... हतप्रभ सी खड़ी रही थी देर तक। फिर आँसू बह निकले थे उनके... फिर उन्होंने पोंछा था इसे और चादर झाड़ने लगी थी... दूसरे बिछावन का चादर झाड़ते-झाड़ते वह बड़बड़ाई थी और बड़बड़ाने की तरह नहीं बल्कि कुछ जोर से। मैं नहीं भूलती... अरे खुद तो भूलो पहले... यह चादर क्यों बदलवाती हो अक्सर... यह बिछावन क्यों लगे रहने दिया है अब तक... रोज टेबुल पर झाड़न मारो... क्यों... मुझसे कहती है भूल क्यों नहीं जाती... नहीं भूलती मैं, तुम तो भूलो पहले... पता नहीं किस आस में... एमी की सुबह उदास हो चुकी थी। वह नन्हू ताई को कुछ कह नहीं सकती थी। और कहे भी तो क्या। अब वह इसी तरह बड़बड़ाती रहेगी पूरे दिन। वे दोनों जब नई-नई आई थी नन्हू ताई तब से काम कर रही है उनके यहाँ। चिड़चिड़ी तो हमेशा से रही है। किसी बात पर चिढ़ गई तो चिढ़ गई... नंदी सँभाल लेती थी इन्हें, मना ही लेती थी किसी न किसी तरह। उससे ये सब नखरे अमूमन उठाए नहीं जाते। पर जब से नंदी चली गई है उसकी भूमिका भी तो उसे ही करनी होती है... उसने पीछे से आकर उसे कंधे से पकड़ लिया था और फिर बाद में उसके कंधों पर अपना सिर डाल दिया था हौले से... उसे लगा उसका संताप कुछ कमा है। उसे माँ की याद हो आई थी। वह माँ के कंधे पर भी वैसे ही सिर डाल देती थी, जब भी नाराज होती थी वह। और तब वह मान भी जाती थी... हाँ, बीमारी के दिनों में झिड़कने लगी थीं वे उसे बेतरह। दुत्कार कर हटा देतीं... उसकी आँखों में सचमुच के आँसू आ गए थे... नन्हू ताई मुड़ी थी उसकी तरफ... अब रो क्यों रही हो... रोना नहीं बिल्कुल। मैं तो कहती हूँ, ये बिछावन, ये टेबुल ये कुर्सी सब निकाल फेंको कमरे से। कुछ जगह बन जाएगी, कमरा खुला-खुला लगेगा बिल्कुल। और वह नंदिता के टेबुल को उठाकर बाहर करने ही वाली थी कि वह फिर से चीखी थी शायद... तुम अपना काम क्यों नहीं करती, जाओ जा कर नाश्ता बनाओ... वह चली गई थी रूठ कर या यूँ ही, उसे नहीं पता। वह जानना चाहती भी नहीं थी... यह सब उसके बस का नहीं बिल्कुल। सँवारने की कोशिश में चीजें और-और बिगड़ जाती हैं उससे। वह नंदिता नहीं हो सकती... वह नंदिता होना चाहती भी नहीं... उसने चिढ़ कर कहा था खुद से और पैर पटकती हुई बाथरूम की तरफ बढ़ चली थी। वह पहुँची थी अभी बाथरूम तक कि मोबाइल की घंटी फिर टनटनाई थी। उसने मैसेज पढ़ा था - मैं मिलना चाहती हूँ तुमसे। अभी, इसी वक्त... बोलो कब और कहाँ... फोन क्यों नहीं उठा रही...? एमीलिया झुँझला उठी थी खुद पर... तो फोन नंदी कर रही थी और उसने उठाने की जहमत नहीं की। और उठाना तो दूर नन्हू ताई की बेमतलब की बातों मे उलझ कर फोन की बात तक भूल गई वह... उसने तुरंत फोन किया... क्या हुआ नंदी... बस तुमसे मिलना है... उसे आवाज उदास सी लगी थी, भर्राई भी... कोइ खास बात... तू ठीक तो है न... ठीक हूँ... फिर रुक कर... शायद नहीं भी... बस इसीलिए तुझसे मिलना है... मैं तो खुद आज आकर तुझसे मिलती। अभी रात को ही लौट कर आई हूँ... थकी थी इसलिए फोन का पता नहीं चला... वह एक छोटा सा झूठ बोल गई थी। तेरी तबीयत अब कैसी है... ठीक हूँ... बोलो कहाँ मिलें... कहाँ क्या मिलें... यहीं चली आ... क्या यहाँ नहीं आने की कोई कसम ली है तूने... नन्हू ताइ भी अभी-अभी तुम्हें ही याद कर रही थी... नंदी ने उसकी बात काटी थी, कहाँ... आ जाऊँ... फिर कुछ सोचते हुए... तुझे कोई जरूरी काम तो नहीं आज... बोल कब तक आऊँ... कोई काम नहीं है मुझे... अभी की अभी आजा चुपचाप... मैं आज घर में ही रहकर आराम करनेवाली हूँ पूरे दिन। नन्हू ताइ को तेरे लिए भी नाश्ता-खाना बनाने के लिए कह देती हू... फिर दिन भर बैठ कर गप्पें मारेंगे दोनों... तो फिर फ्रेश हो कर आती हूँ... फोन काट दिया था नंदिता ने... वह उसके इंतजार में जहाँ की तहाँ बैठ गई थी... नहाना-धोना कुछ भी याद नहीं रह गया था उसे, कुछ भी...

नंदी आनेवाली थी। आज उसने नन्हू ताई को उसकी पसंद का नाश्ता-खाना बनाने को कहा था - नाश्ते में पोहा और खाने में कढ़ी-चावल। उसे याद आया अंतिम खाना जो नंदी छोड़कर चली गई थी प्लेट में वह कढ़ी-चावल ही था। नन्हू ताई बड़बड़ाई थी... पहले से कुछ बताते नहीं और अचानक फरमाइश... अब दही कहाँ से लाऊँ... नंदी बेबी थीं तो सप्ताह भर का मेन्यू तय कर के रख देती थीं। कभी कोई परेशानी नहीं... अरे मैं अपने लिए नहीं, तुम्हारी उसी लाड़ली नंदी बेबी के लिए कह रही हूँ... चौकवाली दुकान से लेती आओ न, कितना वक्त लगेगा। खिड़की पर रखे एक चॉकलेट के डब्बे से पैसे निकाल कर वह बाहर चली गई थी, बुदबुद करती हुई... नंदिता को याद आया खुले पैसे रखने की यह जगह नंदिता ने ही बनाई, तय की थी। चॉकलेट का यह डिब्बा कभी उसके पापा लाए थे... नंदी को चॉकलेट भी बहुत पसंद हैं...

छोटी-छोटी कितनी सारी चीजें, किचेन के दरवाजे से टँगी डायरी और पेन जो नंदिता के चले जाने के बाद से अब तक वैसे ही टँगे हैं, भले ही उसमें कोई नई रेसेपी नहीं जुड़ी तब से... न ही साप्ताहिक मेन्यू लिखा गया उसके जाने के बाद। किचेन में रुई, बरनॉल, डिटॉल, कैंची... अपने और उसके दोनों के टेबल पर स्केल, इरेजर, पेंसिल, कलर पेंसिल, पिन, स्केच, स्टेपलर, मार्कर, गम... सब उसी ने जमाए थे। हालाँकि काम ज्यादा एमीलिया के ही आती थी ये चीजें, खासकर नंदी से तो ज्यादा ही। बड़ी आलमारी में उसके और अपने दोनों के कपड़े प्रेस करवा कर तरतीबवार रखना। ये छोटे-छोटे पर महत काम नंदी ही तो करती थी। उसके जाने के बाद उससे बाहर निकलकर एकमुश्त कपड़े प्रेस करवा लेना कभी नहीं हो सका। घर से निकलते हुए हड़बड़ी में खुद से दाएँ-बाएँ मार लेती है प्रेस। ज्यादा देर हुई तो वह भी नहीं... उतारे कपड़े पहन कर ही चल देती है वह। एमीलिया ने उठकर दोनों के पेन स्टैंड से खत्म हुई रीफिलें, टूटे पेन, खराब और सूखे स्केच निकाल कर बाहर किए। उसने अगर इन्हें देखा तो...

वह आ रही थी, और वह उसके आने की तैयारी में थी... पर उसके जाने का दिन जाने क्यों टँगा आ रहा था उसकी स्मृतियों में... उसकी जुठाकर छोड़ी गई कढ़ी-चावल की प्लेट... बाथरूम में उसका गीला पड़ा तौलिया, अलगनी पर टँगी रह गई उसकी सलवार-कमीज... रैक में लगी उसकी पसंदीदा किताबें... और भी न जाने कितना कुछ... सब कुछ तो छूटा रह गया था उसका यहीं। या कि जान-बूझ कर वह छोड़कर चली गई थी उन्हें...

नंदिता चली गई थी अचानक, पर क्या सचमुच अचानक ही गई थी वह... कमरा अचानक ही नहीं मिल जाता... एकाएक तो कुछ भी नहीं हुआ होगा... हाँ, अचानक तो शायद कुछ भी घटित नहीं होता जिंदगी में, वह सब भी, जिसे हम सोचते हैं अचानक ही घटित हो गया। भूमिकाएँ तैयार होती हैं पहले हर घटना की। वह समझे न समझे, नंदिता उसके पहरों से ऊबने लगी थी। उपदेशों से तो नफरत उसे पहले से ही थी... और वह समझती थी कि अंकल-आंटी के पीछे उसी की तो जिम्मेदारी है नंदी। वह उसे सही-गलत नहीं बताएगी तो और कौन बताएगा। खासकर हनीफ सर के सिलसिले में... वह जितना कहती, जितना चिढ़ती, नंदी उतनी ही वेग से उनसे जुड़ती चली गई... भूल उसी की थी शायद, उसे भूलना नहीं चाहिए था। नंदी हमेशा से आजादी की आग्रही थी। दम घुटता था हमेशा उसका माँ-पिता के संरक्षण में। वह तो जानती थी यह सब, फिर कैसे भूल गई इतनी जरूरी बात?

हर दिन की तरह उस दिन भी वह नंदी के इंतजार में बैठी हुई थी। पहले आठ, फिर साढ़े आठ, नौ, साढ़े नौ, फिर दस... वह सोचने लगी थी, हद होती है इंतजार की भी... कल उसका पेपर था पर पढ़ने में भी मन कहाँ लग रहा था... पता नहीं क्या बात हुई इतनी देर तो कभी भी नहीं करती... हाँ देर से आती है वह पर हद से हद आठ -साढ़े आठ तक। उसके हाथ चिंता से पसीजने लगे थे। माथे की नसें तड़क रही थीं हौले-हौले। हथेलियों को उसने बेसिन की धार के नीचे धर दिया था और खड़ी रही थी चुपचाप...

पहले तो नंदिता पर उसकी बातों का असर होता था। उसने कहा था और उसने आर्ट क्लासेज जाना बंद कर दिया था। बीमार हो चली थी वह पर उसने अपने कहे को निबाहा था, बस 15 दिन बाकी थे उन हॉबी क्लासेज के जब वह खींच कर फिर उसे लेती गई थी दुबारा। ऐसे तो मर जाएगी। वह है उसके साथ फिर नंदिता कैसे कुछ गलत कर सकती है। क्या हो जाएगा इन पंद्रह दिनों में...

पर शायद वह गलती वहीं कर गई थी, वह देखती वे दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल भी बात नहीं करते हैं, पर वह देखती उनकी आँखें गुपचुप-गुपचुप मौका मिलते ही बतिया लेती हैं... न जाने कितनी बातें, कितने कॉल रोज किए जाते रहें और वह देखती रही अवाक। वह रोकती भी तो उन्हें कैसे और कहती भी तो क्या।

उसने रोका था नंदिता को और पूरे हक से रोका था, जब वह बीए में थी उसने हनीफ सर का विषय यानी कला चुनना चाहा था, उसने जोर दे कर कहा था नंदी उबरने की कोशिश कर इस सब से। बिना कोशिश किए यह कहना बेकार है कि हाय मैं तो डूब ही गई... दूर रह कर देखो उनसे, शायद उन्हें भूल पाओ। हो सकता है आकर्षण हो, सिर्फ आकर्षण... हमारी उम्र भी तो...

और नंदिता ने उसकी बात मान ली थी। उसने अपना विषय इतिहास चुना था। उसने जब यह बात अंकल-आंटी को बताई तो वे खुश हुए, न सही डॉक्टर, आईएएस की तैयारी तो कर ही सकती है अब। नंदिता ने भी जी जान से खुद को पढ़ाई में झोंक दिया था। वह अब पहलेवाली नंदिता हो चुकी थी, वही स्कूलवाली। बस एक चीज गायब होती उसके चेहरे से, सुकून... खुशी। एमी के लिए यह कोई चिंतावाली बात नहीं थी। पहले भी वह जब किसी लक्ष्य के लिए जुट जाती तो ऐसे ही होती थी किसी तड़पती हुई मछली की तरह बेचैन, जैसे पानी का भान भी न हो उसके आस पास। पर एमीलिया जब साथ होती वह पुरसुकून हो लेती। हँसी-खुशी, बचपन जैसे सब लौट आता बस एक एमी के साथ भर से।

पर वही एमीलिया साथ थी और नंदिता खुश नहीं थी बिल्कुल। उसके दुखों का कारण भी शायद वही थी, सिर्फ वही... वह नंदिता को हर तरह से बहलाना चाहती थी, पर वह बहलती नहीं एक पल को भी। बल्कि तुर्शी से कहती अब क्या चाहिए तुम्हें... अब और क्या करूँ तुम्हारी खुशी के लिए...

... पर अचानक उठा यह बवंडर धीरे-धीरे सतह पर आने लगा था। पिछले दो-ढाई महीने से नंदिता फिर खुश रहने लगी थी। उसे अच्छा भी लगा था। यही तो चाहती थी वो। उसका थोड़ी देर से आना उसे बिल्कुल भी नहीं खटका था। हाँ उसे पता था क्लास साढ़े पाँच बजे समाप्त हो जाती है... उसकी आँखों की उदासी कमी थी, आवाज की तुर्शी भी। वह जो भी कहती उसे बड़े चैन से सुनती वह। गुनगुनाना फिर शुरू हो गया था उसका। खुश हो कर गले भी लग जाती पहले की तरह कभी-कभी... और जब गुनगुनाना शुरू हुआ उसका ध्यान तभी खींचा था नंदी के बदलावों ने... पर यह शगुन नहीं था। हनीफ सर जब मिले थे पहले पहल यूँ ही उड़ती-पड़ती, गुनगुनाती फिरती थी हर पल...। वह कुछ पूछती न पूछती कि उसने देख लिया था एक दिन खिड़की पर खड़ी-खड़ी नंदिता को उनकी कार से उतरकर घर तक आते हुए।

फिर वह कहती रहती बार-बार और नंदिता सुन-सह लेती सब चुपचाप। वह जब ज्यादा झल्लाती, चीखती-चिल्लाती वह बड़े संयत ढंग से कहती और इतना कहती, मैं हार चुकी हूँ खुद से... मैंने तुम्हारे सारे कहे पर अमल किया... पर मैं नहीं जी सकती उनसे मिले बगैर। वह निरुत्तर हो जाती, हर बार। पर फिर-फिर वही कोशिश... एक और कोशिश... नंदी शायद इन कोशिशों से ही झल्ला उठी थी। उसने कहा होगा शायद हनीफ सर से सब कुछ। उन्होंने मकान ढूँढ़ना शुरू कर दिया था शायद पहले ही... तभी तो उसने नंदी से जब कहा और वह भी चुपचाप दरवाजा खोलने, उसके हाथ-मुँह धोने और उसका पसंदीदा कढ़ी-चावल गरम करके परोसने के बाद... नंदी यह भी कोई आने का वक्त है... तुम जानती हो मेरा पेपर है, मुझे चिंता होती रहती है तुम्हारी... पता नहीं... क्या कुछ... कि चीख ही पड़ी थी वह... मुझे मेरी जिंदगी जीने दो, मत लगाओ मेरी साँसों पर भी पहरे... चिंता होती है तुम्हारी... कौन होती हो तुम मेरी चिंता करनेवाली... होती कौन हो आखिर? थाली झटके से खिसका दी थी उसने। हाथ धोया था झपाटे से और एक एयर बैग में सामान ठूँसने लगी थी। जो सामने दिख जाए। जो कुछ छूटे, छूट जाए, उसी ने कहा था क्या कर रही हो नंदी... देख तो रही हो... कहाँ जा रही हो मुझे अकेली छोड़कर... अकेले तो हम अब भी हैं। हम वही हम हैं क्या... और मुझे नहीं रहना है तुम्हारे साथ अब। उसने जबरन उसके हाथों को थाम लिया था... नहीं नंदी, प्लीज... अब से कुछ नहीं कहूँगी, कुछ भी नहीं। तुम जब चाहे जहाँ चाहे आओ-जाओ... ऐसे इतनी रात को कहाँ चली जाओगी... नंदी ठंढे दिमाग से सोचो जरा... पर पलटी नहीं थी वह। एक बार भी मुड़कर नहीं देखा था उसने...। और उसने देखा था खिड़की से हनीफ सर की गाड़ी का दरवाजा खुला था, नंदी ने बैग डाला था, खुद को भी... और गाड़ी चल पड़ी थी...

वह खुद को छला हुआ महसूस कर रही थी... तो क्या सब कुछ तय था। पक्के ढंग से प्लान किया हुआ। तो क्या इसीलिए नंदी और ज्यादा देर से लौटी थी, रोज से भी... उसे पता था कि वह रिएक्ट करेगी ही करेगी... तो क्या हनीफ सर इसीलिए खड़े थे अब तक...

उसके भीतर जैसे बहुत कुछ टूट गया था एक बारगी। वह बिछावन पर बैठ गई थी धम्म से...

उसने देखा था खिड़की से, नीली सलवार-कमीज में एक लड़की को आते। उसने गौर किया वह नंदी ही थी। नंदी का पीला दुपट्टा उड़-उड़ कर उसके चेहरे के सामने आ रहा था। वह उसे दूर फेंक रही थी, पीछे की तरफ। उस दुपट्टे की रोशनी में सूरज की किरणें कुछ और पीली हो गई थीं, कुछ और चमकीली... उसे लगा नंदी के चेहरे पर भी एक पीलापन था उदासी का। उसने सोचा चाहे बात जो भी हो, चाहे कारण जो भी, उसे नंदी के चेहरे से उदासी की ये परतें हटानी होंगी। नंदी उसी तक तो आ रही थी अपनी बात कहने। आज भी तो उसे सबसे अपनी वही लगी थी... उसने भी पिछली यादों को दूर फेंक दिया था, पीछे कहीं... वह बिछावन से उठ खड़ी हुई थी। उसने कढ़ी की कराही फिर से चूल्हे पर चढ़ा दी थी।

 
10

हनीफ जब लौटने के बाद नंदिता से मिलने पहुँचे थे, नंदिता लगातार सोचती रही थी आज कोई बंदी हो और सर उसके घर तक नहीं पहुँच पाएँ। कि ट्रैफिक जाम में ही फँस जाएँ वो। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था। सर हमेशा की तरह अपने कहे हुए वक्त पर आ गए थे और दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे। देर तक वह सुन कर भी अनसुना करती रही थी जैसे उसके न सुनने भर से ही हनीफ सर अनुपस्थित हो जाएँगे। पर अनसुना करना जब बिल्कुल ही असंभव हो गया उसने दरवाजा खोला था और पलट कर बाथरूम में घुस गई थी। जैसे उसके इस तरह बैठे रहने से वे लौट जाएँगे अपने आप।

वह बैठी-बैठी सोचती रही थी... उसके ठीक भीतर बैठी एमी कह रही थी उसने ऐसा कौन सा अपराध किया है आखिर कि मुँह छिपाती फिर रही है वह। सर भी तो उसके होने के बावजूद अपनी बीवी से संबंध रखते हैं। और न सिर्फ संबंध बल्कि अपने परिवार के लिए उनका मोह भी जस का तस है। फिर उसकी जिंदगी में अगर एक कमजोर पल आ गया तो क्या हुआ। ...हाँ, हनीफ सर के उसकी जिंदगी में होने के बावजूद। जब नसीमा बी के होने के बावजूद सर उससे जुड़ सकते हैं तो... और उसने कोई जानबूझ कर भी कहाँ किया कुछ। वह एमी के दिए हिम्मत से भर चुकी थी। वह पिछले दिनों सोचती रही थी लगातार सर जब आएँगे वह सब कुछ बता देगी उन्हें साफ-साफ। फिर वे जो भी निर्णय लें... उसने भी तो स्वीकारा है उन्हें उनकी सारी मजबूरियों, कमियों और अतीत के साथ... अगर प्यार करते हैं वे उससे तो यह सब जानने के बाद भी उसे स्वीकारेंगे।

एमी ने कहा था उससे, परीक्षा उसकी नहीं हनीफ सर की है। वह क्यों जल रही है आत्मग्लानि में इस तरह... क्या हनीफ सर भी शर्मिंदा हुए हैं कभी उसके सामने आने पर...? लगभग हर रात सोकर - रहकर आते हैं वे अपनी पत्नी के साथ। गलती उसकी नहीं सिर्फ हनीफ सर की है। आखिर क्या चाहते हैं वे उससे। अपना सब कुछ बचाए-जोड़े रहने के बाद भी एक 'एडिशनल' सा कुछ। नंदी की जगह क्या है आखिर उनके जीवन में। आए, मन बहलाए कुछ देर और फिर चल दिए उठ कर। नंदी भी अब सोचे सब कुछ गंभीरता से... 'भूख' भी एक शाश्वत सत्य है और उस हाल में तो और ज्यादा वाजिब जब परोस-परोस कर थाली खींच ली जाए सामने से...

वह एमी के हनीफ सर को इस तरह भला-बुरा कहने से नाराज क्यों नहीं हो पा रही थी हमेशा की तरह। उसने सोचा था... क्यों नहीं प्रतिवाद कर पा रही वह हमेशा की तरह पुरजोर ढंग से। क्यों नहीं उठ कर जा रही वह उसी दिन की तरह... यह सोचकर उसने विरोध करना चाहा था पर आज आवाज बिल्कुल ढीली थी, हल्की और लचर सी। इसमें हनीफ सर की क्या...

गलती है और उन्हीं की है। मैं तो कहती हूँ अगर वसीम तुझे प्यार करता हो और अपनाए तो तू उसी की हो ले पर हनीफ सर की बिल्कुल नहीं... बोल... नंदी बोल न वह कैसा लगता है तुझे...?

नंदिता को क्रोध आया था और अबकि जोर से आया था। तू ही न कहती है नेचुरल है यह सब कुछ... भूख प्यास की तरह प्राकृतिक... फिर... फिर क्यों जुड़ने को कह रही है तू उससे, उस एक रात के घट जाने के एवज में। जबकि उसमें मेरी कोई गलती थी ही नहीं। मैं चैतन्य नहीं थी, वह था। मुझे होश नहीं था, उसे था। और उसे यह भी पता था कि उसके पिता को प्यार करती हूँ मैं। फिर भी उसने... उसकी गलती की सजा खुद को मैं क्यों दूँ...? बोल तू...।तू भी वही कह रही है जो सामान्यतः लोग कहते हैं। मैं प्यार नहीं करती उससे...। नंदी के स्वर में रोष था।

तो फिर हनीफ सर को बता दे सब कुछ... पर मुझे नहीं लगता... लाख प्रोग्रेसिव हों वो पर हैं तो इसी समाज से, जहाँ ससुर अगर बलात्कार करता है बहू से तो भी समाज का निर्णय उस बेचारी बहू के पक्ष में न जा कर उस बलात्कारी के पक्ष में ही जाता है कि अब वह लड़की अपने पति की माँ हो गई और उसका पति से रिश्ता नाजायज हो गया... और तेरे साथ तो नंदी बलात्कार जैसा भी कुछ घटित नहीं हुआ... मुझे डर है नंदी... हनीफ सर अब... उसके डर से नंदिता भी डर गई थी... उसने अपने डर को परे धकेलते हुए ढीठ हो कर कहा था... ऐसा नहीं होगा कुछ... मैं कहती हूँ ऐसा नहीं करेंगे वे... और वह हथेलियों में अपना चेहरा छिपाकर फफक-फफक कर रो उठी थी।

एमी ने थाम लिया था उसे कंधे से। फिर उसका सिर अपने कंधे पर डाल लिया था और रोने दिया था उसे फूट-फूट कर...। रो ले नंदी, जी भर के रो ले... मन हल्का हो जाएगा।

बहुत देर की चुप्पी के बाद न जाने क्या सोचते हुए एमी ने कहा था... वसीम ने तुम से फिर कोई संपर्क करने की कोशिश की...? चिढ़ी हुई नंदिता ने कहा था... की न, बार-बार फोन कर रहा था मुझे और अब एसएमएस... एमी ने पढ़ा था उन पंक्तियों को, नहीं, कविता-पंक्तियों को...

'अगर मैंने किसी के होंठ के पाटल कभी चूमे,

अगर मैंने किसी के नयन के बादल कभी चूमे,

महज इससे किसी का पुण्य मुझ पर पाप कैसे हो?

महज इससे किसी का स्वर्ग मुझ पर शाप कैसे हो?'

...बहुत ही ज्यादा इरीटेटिंग होता जा रहा है यह सब कुछ। आखिर वह मुझ से कहना क्या चाहता है। एमीलिया ने उसके नंबर को अपने दिमाग में बैठाते हुए कहा था यह तो वही बताएगा न... पर इसके लिए तुझे उससे बात करनी होगी... जो कि तू करेगी नहीं।

एमी फिर चुप हुई थी थोड़ी देर को... उसकी इस चुप्पी से नंदिता को डर लगता है, चेहरे के इस निर्मम तटस्थ भाव से भी। हमेशा लिखते-पढ़ते वक्त एमी का चेहरा यूँ ही होता है। खास कर लेख लिखते वक्त। यह चेहरा निर्णय करनेवाला चेहरा था, अपनी राय तटस्थ हो कर देनेवाला चेहरा, जहाँ कोई लाग लपेट न हो, ना ही कोई पूर्व भूमिका।

...वैसे एक बात कहूँ नंदी, वसीम के सिर सारे दोष मढ़ कर यूँ किनारे भी खड़ी नहीं हो सकती तू। तूने उसे उस रात रुकने ही क्यों दिया था अपने पास। उसके साथ यूँ वक्त बिताने, घूमने-फिरने क्यूँ लगी थी तू... तुझसे तो छिपी नहीं रही होगी उसकी चाहत...? फिर भी... सीधी सी बात यह है कि तुझे उसका साथ अच्छा लगने लगा था... अभी भले ही तू यह स्वीकार न करे पर यह सब करने के पीछे तेरे मन मे भी तो कोई चोर था ही न...बोलते-बोलते एमीलिया ने नंदिता का भक्क चेहरा गौर से देखा था और फिर भी हिम्मत जुटा ही ली थी यह सब कहने के लिए... तू कह रही थी बुखार उतर रहा था तब। बुखार चढ़ा भी तुझे उस दिन रोज से कम ही था, डेढ़-दो के बीच कहीं... इतना बुखार होश खोने के लिए काफी नहीं होता, वह भी दवा खा लेने के बाद उतरने की प्रक्रिया में। सीधी-सीधी बात यह नंदी कि भूख उसे थी पर तूने उसे उभारा, हावी होने दिया कि अपनी नजर में ही दोषी न हो जाऊँ कहीं... कि कसूरवार कहलाए भी तो वही। फिर अपने कमजोर शरीर और मन को दिया एक उड़ान... ऐसे में कल्पनाशक्ति बहुत तेज हो जाती है... सामने बैठा व्यक्ति वसीम नहीं हनीफ सर हैं... और फिर सब कुछ...

तिलमिला उठी थी नंदिता, इतनी कि कमजोरी से पीला हुआ चेहरा लाल-भभूका हो उठा था अचानक। उसने झटके से पर्स उठाया था और बगैर पीछे मुड़े चल दी थी उसी दिन की तरह... एमीलिया को लगा, तो क्या इसी पुनरावृत्ति की खातिर उसने उसे घर बुलाया था... उसने दौड़ कर नंदिता का कंधा पकड़ा था पीछे से... नंदी सुन तो... और मोड़ा था उसे अपनी तरफ... मुड़ते ही न जाने क्या घटित हुआ था कि नंदी के चेहरे की रेखाएँ पिघली थी और वह फूट-फूट कर रो पड़ी थी दुबारे...

उसे याद आया था वसीम के साथ का एक-एक पल। उसे याद आया था उसके साथ लाल किला में संग-संग घूमना... उसे याद आया था उसका खुल के हँसना बोलना... उसका उसके लिए लगाव... अस्वस्थता में हर पल उसके आसपास बने रहना। उसे सबसे ज्यादा याद आया था अपना वह गुस्सा जब वह सोचने लगी थी हनीफ सर ने उसे ये बातें क्यूँ नहीं बताई... उसे लगा था उस वक्त कि क्या वह भी हनीफ सर के किले में नजरबंद कोई राजकुमारी है जिसे उतनी ही रोशनी मिलती है जितनी कि वह उसे दे। या कि बंद महल में बने सुराखों से होकर आ सके... उसकी समझ विकसित हो तो उतनी ही जिससे कभी बगावत नहीं कर पाए वह। वह खुद हैरत में थी, खुद अपनी जिंदगी चुननेवाली, हनीफ सर के लिए सबसे बगावत करनेवाली वह ऐसा सोच पा रही थी तो कैसे... क्या यह वसीम के साथ का असर था? क्या इसीलिए हनीफ सर बचाए रखना चाहते थे उसे दुनिया की निगाहों से... कि नजर लग ही गई थी उनके रिश्ते को...

वह सोच रही थी, ठीक ही कह रही है एमीलिया शायद, उस रात का बीज तो उसी क्षण पैदा हो चुका था उसके भीतर... उस रात की यानि मुक्ति की कामना उसी क्षण पलने लगी थी शायद उसके लहू में। वह हनीफ सर के कैद से मुक्ति चाहती थी... अपनी तमाम अभिलाषाओं को जीना चाहती थी। वह उन प्रदेशों में भी जाना चाहती थी जो उसके लिए वर्जित थे। आखिरकार वह हव्वा की ही तो बेटी थी... और अंततः उसने चख ही लिया था उस वर्जित फल का स्वाद। वसीम तो शायद निमित्त मात्र था। वर्षों से थमी हुई रात उस पल चल पड़ी थी और फिर सुबह हुई थी दूसरी...

उसने सब कुछ कहना चाहा था एमी से पर बोलने के लायक स्थिति नहीं रह गई थी उसकी। आँसू के हिचकोले बोलने नहीं दे रहे थे उसे... बस बदन हिल रहा था उसका आवेग से और एमीलिया जिसे अपनी बाँहों में थामकर सामान्य स्थिति में लाने की कोशिश कर रही थी, लगातार।

...उसने दरवाजा खोला था और पूरे आवेग से खोला था, इंतजार कर के हनीफ सर कहीं चल तो नहीं दिए हों। उसे उन्हें बतानी है हर एक बात... उसे उन्हें सब कुछ सच-सच कह देना है...
 
11

वसीम की जिंदगी के तीन दिन जैसे तीन युग हो चले थे। नंदिता को बगैर देखे, नंदिता को बगैर सुने और नंदिता के टेलीफोन के बगैर... उसकी इच्छा होती सुबह उठते-उठते वह नंदिता के घर जा पहुँचे, बेल बजाए और पाए कि वह उसके सामने है। पर चाह कर भी वह ऐसा नहीं कर पाता था। नंदिता अब स्वस्थ थी और अब्बू भी आ चुके थे। उसे गुस्सा आता, अब्बू को भी इतनी जल्दी लौट आना था... उसे गुस्सा आता था खुद पर... वह अगले ही दिन क्यों नहीं नंदिता से मिलने गया। किस ऊहापोह में फँसा रहा था वह। उसकी एक छोटी सी झिझक ने उसके सामने कई मुश्किलें पैदा कर दी थी। वह परेशान था बेतरह। आखिर करे भी तो क्या?

नसीम जब उससे कोई सवाल पूछने आया वह बेतरह झुँझला उठा था उस पर... मारने-मारने को हो आया था उसे। बेचारा नसीम भी हैरत में था, यह भाईजान को क्या हो गया। वह कितनी भी बेवकूफी करे, चाहे कितनी भी देर में समझे कोई बात, वसीम कभी उस पर झुँझलाया नहीं था आज तक, पीटने की तो बात ही दीगर है। उसे गुस्सा नहीं आ रहा था, फिक्र हो रही थी भाईजान के लिए। उसने अम्मी से कहा भी था, अम्मी भाईजान की तबीयत तो ठीक है न... क्यूँ, क्या हो गया? कुछ नहीं... बस ऐसे ही... ऐसे ही क्या... सुबह-सुबह पिटाई लगी इसलिए...? अम्मी हँसी थीं... अरे मैंने ही कहा था सख्ती बरते तेरे साथ। तेरे अब्बू घर पर रहते नहीं और वह तुझे बस लाड़ ही करता रहता है...। अरे तुझ पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। आठवीं की परीक्षा देनेवाला है और पढ़ाई में बिल्कुल भी जी नहीं लगाता। ऐसे कैसे चलेगा। तुझ पर कड़ाई तो करनी होगी न...

नसीम मूल सवाल के बीच में ही कही गुम हो जाने को देखता चुप रह गया था। आखिरकार वह था तो बच्चा ही। इससे ज्यादा चीजें न उसे समझ में आती थी और न ही इससे ज्यादा सवाल करने का हक ही उसे था। वह चुपचाप बाहर की तरफ निकल पड़ा।

नसीमा ने देखा था उस छोटे से बच्चे के चेहरे पर भाई को लेकर एक सवाल... इसी सवाल से जूझती रही थी वह पिछले कई दिनों से। उसका वसीम कहीं खो गया था। उसका वह बच्चा जो मेले-ठेले, भीड़-भाड़ में कहीं भी उसकी उँगलियाँ नहीं छोड़ता था कभी... अम्मी मैं अगर खो गया तो... अम्मी मैं आपसे अलग नहीं रह पाऊँगा, मुझे कभी खोने नहीं देना। और उसके आँसू भरे चेहरे को वह सीने से चिपका लेती... नहीं मेरे लाल... वही वसीम कहीं खो गया था और वह देख रही थी बस चुपचाप खड़ी-खड़ी। वही बच्चा जिसे सब कहते कि वह सिर्फ उसका बच्चा है। वह खोज रही थी अपने उस बच्चे को वापस। पर कोई छोर ही नहीं मिला रहा था उसे, कहीं से। ऐसे में उसने नसीम की परेशानी को भले ही हवा में उड़ा दिया था पर वह बवंडर गोल-गोल घूम रहा था उसी के इर्द-गिर्द। ऐसे में रात का वह सपना। रात का नहीं भोर का। वह खुद भी परेशान थी बेतरह। सब कुछ ठीक-ठाक होता तो चुपके से वसीम से ही बतियाती इस सपने के बाबत और बतिया लेने के बाद उसकी वह एक हँसी में भूल भी जाती शायद। पर उसकी हँसी भी कहीं गुम हो गई थी वसीम के साथ-साथ। वह देखती अब्बू के पीठ पीछे वह उनके कमरे और लाइब्रेरी में जाता है और ढेर की ढेर किताबें उठाकर ले आता है। फिर न जाने क्या पढ़ता रहता है दिन-रात। पहले तो उसने सोचा था पढ़ाई कर रहा होगा अपनी, पर नहीं उसे पता था इतिहास की किताबें उस कमरे में बहुत कम हैं। वह जानती थी वहाँ कला और साहित्य है बस। उर्दू-हिंदी शायरी और कविताएँ, कला संबँधी पुस्तकें, कुछ मनोविज्ञान और दर्शन की भी। ये वो किताबें थी जिसे झोंके में खरीद लिया था हनीफ मियाँ ने कभी। पर बाद में इन्हे छुआ तक नहीं। उन्होंने देखा था वसीम के कमरे में वो भी किताबें थी और उन्हें वहाँ देख कर हैरत तो होनी ही थी। पगला गया है क्या वसीम? उनके दिमाग में एक ही सवाल उठा था उस वक्त। परीक्षा के एक-दो दिन पहले ही किताब खोलनेवाला और उसमे ही ठीक-ठाक ढंग से पास होनेवाला वसीम अभी बेमौसम और बेमतलब की किताबों में डूबा पड़ा था, कि डूबने कि कोशिश कर रहा था। उसने सोचा, सारे काम निबटाने के बाद वह इत्मीनान से वसीम से बात करेगी आज। आखिर उसे क्या हुआ है? वह जरूर उसे सब कुछ बता देगा सच-सच। पर वह यह तय नहीं कर पा रही थी कि वसीम को अपने सपने की बाबत बताए या नहीं। उसने सोचा तब का तब देख लेंगी वह और फटाफट काम निबटाने में उलझ पड़ी थी।

वसीम फैज की शायरी में डूबा हुआ था। उसे कहीं चैन था तो बस इसी ठौर, इसी तरह। हालाँकि यह बात अलग है कि यह चैन उसे और बेचैन ही कर देता था। वह डूबा रहता किताबों में, न कोई कूल न कोई किनारा। उसे लगता जैसे सब कुछ उसी के लिए लिखा गया है... 'न आज लुत्फ कर इतना कि कल गुजर न सके / वो रात जो कि तेरे गेसुओं की रात नहीं। / ये आरजू भी बड़ी चीज है मगर हमदम / विसाल-ए-यार फकत आरजू की बात नहीं।' उसने आगे पढ़ा... 'गर बाजी इश्क की बाजी है / जो चाहे लगा दो डर कैसा? / गर जीत गए तो क्या कहना / हारे भी तो बाजी मात नहीं।' पहले की तरह डायरी में नोट करने या फिर उन्हें अंडरलाइन करने की बजाय, जो कि वह बहुत डर-डर के करता है कि अब्बू कहीं बिगड़ न पड़ें कि किताब का नाश कर दिया, उसने फटाफट एसएमएस टाइप किया था - 'एक बार मिलो नंदी। बस एक बार... मैं तुमसे मिलना चाहता हूँ, केवल एक बार... तेरी नजरों को मुहब्बत की तमन्ना न सही / तेरी नजरें मेरी हमराज तो बन सकती हैं / चार दिन की तकलीफें मुरव्वत करके / एक नए दर्द का आगाज तो बन सकती हैं।' एसएमएस भेज कर वसीम एक नामालूम से इंतजार में डूब गया था यह जानते हुए भी कि उधर से कोई जवाब नहीं आनेवाला। वह एकटक मोबाइल की स्क्रीन पर देख रहा था जैसे उसके इस तरह देखने भर से ही कोई चमत्कार हो जाए शायद... घंटी बजी थी और वह लपका था जैसे कोई और न उठा ले उसका फोन, हालाँकि वह जानता था कि वह अकेले ही था उस कमरे में... उसने हिम्मत न हारते हुए दूसरा मैसेज टाइप किया था। अबकि साहिर की पंक्तियाँ थी... 'मुझे तुम्हारी जुदाई का कोई रंज नहीं / मेरे खयालों की दुनिया में मेरे पास हो तुम / ये तुमने ठीक कहा है तुम्हें मिला न करूँ / मगर इतना तो बता दो कि क्यों उदास हो तुम / खफा न होना मेरी जुर्रते तखातुब पर / तुम्हें खबर हो मेरी जिंदगी की आस हो तुम' मैसेज भेजने के बाद वह वहाँ से उठ कर चलता बना था। जैसे यह कोई दूसरा टोटका हो कि उसके न होने से ही शायद जवाब आ जाए।

पर जवाब नहीं आना था और नहीं आया। वह नहाकर निकला और उसने खाना भी खा लिया था इस बीच। फिर वह चुपचाप आकर दर्शनशास्त्र की कि कोई किताब पलटने लगा था बेवजह।

हाँ, होने को इस बीच और भी कुछ नया हुआ था... एमीलिया के कई फोन आए थे उसके पास। यह उसी की दी हुई हिम्मत थी कि वह एक बार फिर नंदिता से संवाद स्थापित करना चाहता था... वरना उसके व्यवहार से तो वह हिम्मत हार ही चुका था। एमी ने ही कहा था उससे, नंदी को उससे बेहतर शायद ही कोई दूसरा जानता हो... उसने वसीम का नाम आते ही उन आँखों को चमकते देखा है, चाहे वह जितना भी इन्कार कर ले। नंदी भी पसंद करती है उसे पर उसकी जिद या कि झिझक उसे यह स्वीकार नहीं करने देते। तुम अपनी तरफ से कोशिश करते रहो। और हर दो-चार घंटे पर वह फोन कर ही डालती... क्या हुआ? कुछ नया? अब तो एमी के फोन से भी डरने लगा है वह, क्या कहे वह उससे कि हार रहा है वह धीरे-धीरे कि उसकी हिम्मत थकने लगी है अब। ...कहेगी वह - सिर्फ तीन दिनों में... तीन ही दिन तो बीते हैं इस बीच। पर उसके लिए तो ये तीन दिन नहीं जैसे तीन सदियाँ हो गईं...

...एमीलिया का फोन आने के कारण ही वह उठा था। सिग्नल कमजोर था भीतर, बात करते-करते वह बाहर तक चला आया था। अम्मी अभी तक किचेन समेटने में लगी थी... अब्बू के कमरे की खिड़की वहीं खुलती थी। उसने सुना अब्बू किसी से कह रहे थे... किस से... तैयारी पूरी कर के रखना। परसों सुबह की ट्रेन है... बस तीन-चार सूट रख लेना इतना काफी है। बाद की बाद में देखेंगे। वहाँ के कपड़े वैसे भी तुम्हें बहुत भाएँगे। खूब तेज चटकीले रंग... वसीम पर नजर पड़ते ही जैसे वे झिझक से गए थे अचानक और उन्होंने दूसरी तरफ के व्यक्ति से कहा था... मै बाद में बात करता हूँ। उसे तब तक कुछ भी नहीं लगा था। खला भी कुछ नहीं था लेकिन उसने अचानक सोचा कि अब्बू किस से बात कर रहे होंगे और दिमाग में एक नाम कौंधा - नंदिता। उसके बोल जैसे कहीं भीतर ही दुबक गए थे हठात। वह चुप हो गया था बिल्कुल। शब्द जैसे उसका साथ छोड़कर चल दिए थे कहीं...

12

हनीफ ने एक ही निगाह में देख लिया था, नंदिता बहुत कमजोर हो चली है। नंदिता जब बाथरूम से निकली हनीफ एक बारगी फिर चौंके थे। उन्होंने खुद को झिड़का... ऐसा कैसे संभव हो सकता है। उसने चेहरा धोया है अभी-अभी इसीलिए उसकी बारीक रेखाएँ भी साफ-साफ दिख रही हैं, आँखों के नीचे का स्याहपन भी। होंठों की रुखाई, कलाइयों का दुबलापन... चेहरे की कांति जैसे कहीं गुम सी हो गई है... उन्हें इस लड़की की चिंता हो आई, पहले से भी ज्यादा। लगता है बुखार का असर इस पर बहुत ज्यादा हुआ है। पर उन्होंने कहा कुछ भी नहीं। सिर्फ बैग खोला था अपना। कुछ किताबें और कुछ नोट्स उसके सामने रख दिए थे... तुम्हारे लिए।

नंदिता को इंतजार था कि सर उससे इतनी देर तक बाथरूम में रहने का कारण पूछेंगे और वह भीतर ही भीतर इसका जवाब तलाश रही थी। लेकिन सर ने कुछ नहीं पूछा था। हनीफ सर हमेशा कुछ न कुछ अप्रत्याशित सा जरूर करते हैं, उसकी सोच और धारणा के खिलाफ। इतने दिनों के बाद लौटने के बावजूद... इतना लंबा इंतजार... पर मुँह से एक शब्द भी नहीं। शिकायत करने की उनकी आदत ही नहीं है और वो तो सोच रही थी कि वे कुछ पूछें और वह फूट पड़े किसी बहाने से...। कह दे सब कुछ सच-सच और हल्की हो जाए।

उसके हाथ अब भी नहीं बढ़े थे तपाक से। सर ने ही कहा था कुछ नोट्स हैं, तुम्हारे काम आएँ शायद। और ये किताब... तुम्हीं ने कहा था न एक बार कि मैं कैसे जानता हूँ इतना सब कुछ अपने मजहब के बारे में। फिर मैंने कहा था तुमसे अपने मजहब को जानना खुद को जानना है। खुद को एक नई दृष्टि से परखना, पहचानना भी। अपने वजूद को एक नया आयाम और विस्तार देना... दर असल धर्म कभी गलत नहीं होता न ही छोटा, उसे हम अपनी कैंची-छेनी से काट-कूट कर, अपने मनोनुकूल कुछ खोज पहचान कर छोटा कर देते हैं। मैं ये किताबें इसलिए ढूँढ़ कर लेता आया कि तुम भी अपने मजहब के बारे में जान सको... तुम भी तो ऐसा ही चाहती थी न...? हालाँकि कभी सीधे-सीधे कहा नहीं था तुमने ऐसा पर मैं जान तो लेता ही हू न तुम्हारे मन की बात। हनीफ की हथेलियाँ उसकी हथेलियों पर आ थमी थी, कुछ तलाशती-ढूँढ़ती सी। पर उसे लगा यह स्पर्श बहुत नया था, अनपहचाना सा... वह सोचना चाहता था, ऐसा क्यों सोच रहा है वह, कि नंदिता ने उसकी सोच को पुख्तगी देते हुए अपनी हथेलियाँ उसकी हथेलियों के नीचे से सरका ली थी। वह हतप्रभ था, ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। बल्कि जब भी कभी पढ़ाता होता वह, नंदिता हौले से अपनी हथेलियाँ उसकी हथेलियों पर डाल देती, भारहीन-दवाबहीन... और एक बारगी रुक जाता पढ़ने-पढ़ाने का क्रम... वे डूबे रहते एक दूसरे की आँखों में... वजूद में। पल छिन कब-कैसे गुजर जाते वह जान भी नहीं पाता। चेत तो कभी-कभी तब आता था जब कुछ न कुछ घटता अप्रत्याशित। कभी किचेन में दूध का उफन कर गिरना... कभी डोरबेल का बजना या कि घड़ी की घंटियाँ बज उठती टन...टन... समय के बीतने और इस कदर बीतने का संकेत देती हुई... पर नंदिता ने अपनी हथेलियाँ खींच ली थी आज... वह सोचता रहा था क्यों...। पर जवाब नहीं था कोई उसके पास। उसने गौर से नंदिता को देखा था, वह आज भी वैसी ही थी जैसी हमेशा होती है...। पर उसे लगा कुछ तो था उसके व्यक्तित्व में अलग सा जो पहले नहीं था। कुछ मजबूत - कड़ा सा जो नंदिता के भोलेपन और असमंजस के भाव को दबा रहा था, कुछ दृढ़, मजबूत और निर्णयात्मक। वे चौंक उठे थे। क्यों... वे यही तो चाहते थे हमेशा, नंदी ऐसी हो... पर आज जब नंदी वैसी दिख रही थी तो उनको यह झटका सा क्यूँ लगा था।

वे देख रहे थे इसी प्रकाश में सब कुछ। नंदी आते ही लपक कर उनके सीने से नहीं लगी थी... उसने आज उनके लिए पानी का गिलास भी नहीं रखा था...। बीते दिनों की सारी बातें नहीं सुनाई थी एक-एक कर के... और अब यूँ हथेलियों का खींच लेना।

वे चाहते थे दिल ही दिल में नंदी ऐसी हो जाए... वह मजबूत हो और इतनी हो कि चुपचाप दूर चली जाए उनसे। वे चाहते थे ऐसा हो, वे मनाते रहते थे ऐसा हो, खासकर के तब जब वे नसीमा के साथ होते थे... कि उन्हें कुछ नहीं करना पड़े... कि कोई इल्जाम उनके सिर पर नहीं आ सके।

उन्हें याद आया वसीम भी बहुत बदला-बदला लगा था उन्हें। कल वह उनकी स्टडी में था और उनकी किताबें पलट रहा था। उन्हें हैरत हुई थी, वसीम और कविता-शायरी की किताबें। वे हँस पड़े थे। तुम और ये किताबें... क्या करोगे तुम इनका... पढ़ूँगा। उसका स्वर दृढ़ और गंभीर था, हमेशा की तरह। वे फिर मुस्कुराए थे, अच्छी बात है। मैं तो पहले भी कहता था पोयट्री हमें इनसान बनाए रखती है, हमारे भीतर के भोलेपन और मासूमियत की परत को बचाए रखती है। वह फिर भी गंभीर था, हूँ...। और किताबों के उस जखीरे को लेकर अपने कमरे की तरफ चला गया था। उम्र है उसकी भावुक होने की, शायरी पढ़ने की, पर उस वक्त की तरह अब वे हँस नहीं पा रहे थे इन बातों पर...। क्या इस सब का तार कहीं नंदिता से जुड़ता है? क्या नंदिता तक उसे भेज कर उन्होंने कोई गलती कर दी? वे एक बारगी सिहर से उठे थे यह सोच कर ही। अगर गलती की भी तो... अब हैरत में नहीं पड़ेंगे वे। अगर नंदी और वसीम उनके भरोसे के योग्य नहीं हैं तो गलती उनकी होगी उनकी नहीं। पर यह सोच भी उन्हें सब्र नहीं दे पा रही थी। उन्होंने सोचा था यूँ ही कयास लगा रहे हैं वह... दिमागी घोड़े से इतनी कसरत कराने की जरूरत नहीं।

उन्होंने नंदिता से पूछा था, एक सेमिनार के सिलसिले में जयपुर और आगरा जा रहा हूँ, तुम भी चलोगी मेरे साथ? नंदिता अप्रत्याशित रूप से चुप रही थी कितने पलों तक। फिर कहा था सोच कर बताऊँगी... जल्दी तो नहीं है? उन्होने सोचा था नंदी किलक पड़ेगी, हुलस कर पूछेगी, कब... किस दिन...? और सामानों की फेहरिस्त तय करने लगेगी। पर ऐसा नहीं हुआ। पहले जैसा कुछ भी तो नहीं हो रहा था सुबह से... पर वे थे कि अपनी जिद पर अड़े थे। नंदी से कहा था। थीसिस निकालो, अनुक्रमणिका बताओ पढ़कर। नंदी ने पढ़ा था - लक्ष्मीबाई, कस्तूरबा गांधी, अरुणा आसफ अली, कुर्जाबाई देशमुख, कैप्टन लक्ष्मी, सरोजनी नायडू, रुक्मिणी लक्ष्मीपति...

हनीफ सर ने नंदिता को इशारे से रुकने को कहा था...। फिर थोड़ा रुक कर कहा था... बस सात चैप्टर... और अभी कितने लिखने हैं... कम से कम पाँच और। नंदी ने धीमे से कहा था। तुम्हें लगता है तुम पूरा कर लोगी इसे... नंदी चुप थी। इसीलिए तुम्हें कहा था विषय नहीं बदलो। कला में तुम्हारी अभिरुचि है, उसी में आगे की पढ़ाई करो। पर तुम्हें तो... तुम और तुम्हारी एमी। जाओ उसी से कहो कि मदद करे तुम्हारी। उन्हें उस वक्त नंदिता के साथ-साथ एमीलिया पर भी गुस्सा आया था... या कि ऐसा वे दिखाना चाह रहे थे सिर्फ।

उन्होंने कहा था नोटबुक खोलो... पर नंदी बैठी थी चुपचाप, जड़वत। उन्हें एक बार फिर सब कुछ अजनबीयत से भरा लगा। वे पहले ऐसे झिड़कते तो नंदी खिलखिला देती, दुलार से लदी चली आती उनके कंधे पर और उनका गुस्सा पल भर में काफूर हो जाता...। बल्कि कभी-कभी सोचते थे वे कि क्या वे इसीलिए गुस्से का अभिनय करते हैं कि नंदी उनके करीब आए, हँसे... खिलखिल...

अबकि वे ही गए थे उसके पास, हल्के से उसे कंधे से हिलाया था, नंदी... नंदी... क्या सोच रही हो... चुप क्यों हो गई आखिर...। तुम्हारे लिए ही तो कहता हूँ न... पीएचडी पूरी हो गई तो अपने पैरों पर खड़ी हो पाओगी तुम... और तुम हो कि...। बिल्कुल भी ध्यान नहीं देती...

नंदी ने चुपचाप नोटबुक खोल लिया था... वे बोल रहे थे... भीकाजी कामा, जीवनकाल 1861-1936, मुंबई। इस पारसी महिला ने भारत की स्वतंत्रता के लिए बहुत काम किया है। शुरुआती शिक्षा मुंबई के पारसी लड़कियों के लिए अलग बने पाठशाला में। फिर लंदन गईं और लंदन को ही अपना कर्मक्षेत्र बनाते हुए वहाँ रहनेवाले क्रांतिकारी युवकों की मदद की। वे हिंसा की पक्षधर नहीं थीं पर उनका यह विश्वास था कि यदि हम भीषण संग्राम नहीं करें तो अंग्रेजों की मजबूत पकड़ से हमारा छूटना मुश्किल है। क्रिसमस के तोहफे के रूप में उन्होंने भारतीय युवकों के लिए जो उपहार भेजतीं वह ऊपर से तो एक खिलौना होता था पर भीतर से पिस्तौल।

स्त्रियों को समान अधिकार मिले इस बात पर मैडम कामा का जोर बहुत ज्यादा था। वे कहती थीं 'पालना झुलानेवाले हाथों को बेकार या कमजोर मत समझो। इन्हीं हाथों ने तुम्हें शूर-वीर बनाया है। देश की स्वतंत्रता के लिए इन हाथों के योगदान को कम मत आँको... इनकी मृत्यु 13 अगस्त 1936 को अपनी जन्मभूमि मुंबई में हुई।

हनीफ सर कह रहे थे, जरूरी बातें मैने इनके संदर्भ में बता दी है, उम्मीद है तुम अब इसे विस्तार दे ही दोगी। दूसरी महिला हैं - वै.मु. कोदैनायकी... नंदिता ने इशारे से थोड़ी देर रुकने को कहा था। वह अपने विचारों से उलझ रही थी। कहीं इस बीच कुछ छूट चला तो... हनीफ सर कितना कुछ करते है उसके लिए। कहाँ-कहाँ से ढूँढ़-ढूँढ़ कर नोट्स लाना, किताबें लाना। उसे पढ़ाना और वह... फिर अचानक शर्मिंदगी का यह स्वरूप बदल गया था। हालाँकि शर्मिंदा अभी भी वह खुद से ही थी... लेकिन उसका मन हुआ था वह कुछ भी न लिखे, हनीफ सर का बताया-समझाया तो कुछ भी नहीं। वह इतनी कमजोर, दीन-हीन सी क्यों है? क्यों नहीं होता उससे खुद ही कुछ भी। थीसिस उसे लिखनी है, ढूँढ़े, मेहनत करे... आखिर हनीफ सर क्यों करें उसकी मदद... वह सोच रही थी और सोच-सोच कर और भी ज्यादा शर्मिंदगी में डूबी जा रही थी... इतने-इतने साल पहले की ये औरतें आजादी के संघर्ष में खुलकर सामने आई। मर्दों के कंधा से कंधा मिला कर लड़ीं... और वह, आज के जमाने की एक लड़की... उसे सब कुछ रेडीमेड चाहिए। धूप, धूल हवा सब से बचाए रखेगी अपने आप को और तुर्रा यह कि थीसिस भी पूरी करनी है। कोई दे दे थाली में उसे सब कुछ परोसकर...। उसने देखा वे सारी औरतें हँस रही थी उस पर... फिर उसे लगा वे उस पर नहीं खुद पर हँस रही हैं कि इन्हीं की खातिर... इन्हीं की आजादी के लिए... समानता के इसी अधिकार के लिए...

वह शर्मिंदा थी खुद पर और उसने इस शर्मिंदगी को कम करने के लिए खुद से कहा और सच्ची-मुच्ची दिल से कहा, अब इसके बाद किसी की भी हेल्प नहीं हनीफ सर, वसीम यहाँ तक कि एमी से भी नहीं...। सच्ची-मुच्ची... उसने मन ही मन अपना कान पकड़ा था...

पता नहीं क्या होता जा रहा है उसे... अल्ल-बल्ल सोचती रहती है हर वक्त... और इस सोचते रहने का परिणाम देख ही चुकी है वह... फिर उसने मन बदलने के लिए सोचना चाहा था... यह मैडम भीकाजी कामा रही कैसी होंगी... कुछ देर सोचती रही थी वह पर कोई नक्श ठीक-ठीक नहीं उभर के आया था उसके आगे। उसने कभी फ्रॉक पहने एक सुंदर सी महिला की कल्पना की, कभी साड़ी में लिपटा एक शालीन सा चेहरा। पर नक्श फिर भी उभर कर नहीं आ रहे थे ठीक-ठीक। अचानक उसे खुशी हुई चेहरा अब साफ हो चुका था। पर फिर वह जोर से हँस पड़ी थी... कल्पना में आया वह चेहरा एमीलिया का था। धत तेरे की, उसने सोचा... उसने अपनी दुनिया कितनी सीमित कर रखी है। गिने-चुने लोग... गिनी-चुनी जगहें, गिने-चुने पल। यह सच है कि एमी अपने तई क्रांतिकारी है, अपने आप में अलग सी... पर उसके सिवा कोई और भी... उसने अपने दिमाग की स्लेट से भीकाजी कामा का चेहरा मिटाया, इस तरह एमी का भी... उसने नोट्स लेने के लिए खुद को तैयार किया और उसे हतप्रभ देखते हनीफ सर से कहा, वह भी इशारे में ही 'सर, अब ठीक... आप बोलें'...

व.मु. कौदेनायकी गांधी जी के अहिंसा की पक्षधर थीं। वे मूल रूप में लेखिका थीं। उस जमाने में जब किसी महिला का लिखना तुच्छ या कि बुरी बात समझा जाता था उन्होंने सोलह उपन्यास लिखे। इसके अलावे बच्चों के लिए पत्रिका भी निकाली। पूरे 26 वर्ष तक 'जगतमोहिनी' नाम की इस पत्रिका को निकालकर उन्होंने यह साबित किया कि महिलाएँ भी अच्छी संपादक हो सकती हैं।

जिस हिम्मत से वे अपने लेखन के अधिकार के लिए लड़ी थी उसी हिम्मत से उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी भाग लिया। गांधीजी की प्रार्थना सभा में वे भक्ति गीत गाती थीं और आजादी के भी। उनकी लेखनी की तरह उनकी वाणी में ओज और मिठास का समन्वय था।
 
Back
Top