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मेरी खुली चुनौती मेरे पति को

मैं अजित को ज्यादा पसंद नहीं करती थी। मुझे उसका देहाती रवैया वैसे भाता नहीं था, पर हाँ उसका यह खुरदरा पन और कर्कश बर्ताव मेरे जहन में कुछ अजीब सी हलचल पैदा करता था, जिससे मेरी उससे चुदाई करने की इच्छा प्रबल हो जाती थी। मेरा दिमाग कह रहा था की अजित चला जाए और मन कह रहा था की अजित रुक जाए और मुझ पर जबरदस्ती करे और मुझे चोदे।

मैंने कहा, "अजित यह बात ठीक नहीं है। तुम ऐसे शब्दों का प्रयोग मत करो। मुझे अच्छा नहीं लगता।"

अजित ने मेरी और देख कर कहा, "क्यों, इस में क्या बुराई है? क्या तुम अपने पति के साथ चुदाई नहीं करवाती हो? क्या वह तुम्हें चोदता नहीं है? हाँ इसी बात को तुम यह कह देती हो की हम सेक्स करते हैं। भला सेक्स कहीं किया जाता है क्या? सेक्स का मतलब है जातीयता। सेक्स नाम है, क्रिया नहीं। इंग्लिश में ही बोलना है तो फकिंग कहो। घुमा फिरा कर बात करना हमें आता नहीं। अगर चोदना है तो साफ़ साफ़ बोलो की चोदना है। क्यों ठीक है ना?" अजित ने मेरी और देखा और बोला। हालाँकि अजित की बात सच थी। पर उस समय के लिहाज से और मेरी उधेङबुन वाली मानसिकता के कारण मैं उसे आसानी से झेल नहीं पा रही थी। अजित के व्यक्तित्व में खेतों की मिटटी वाली मर्दाना खुशबू थी। वह सख्त और अनाड़ी था तो फिर सुडौल और आकर्षक भी था। मैं चुप रही। अजित ने कहा, "फिर तुमने तुम्हारे पति से पूछा की वह किसे चोद रहा था?"

मैंने कहा, "अजित मैं दुबारा कहती हूँ की ऐसी भाषा मत बोलो। यह सभ्यता वाली बात नहीं है।"

अजित ने कहा, "चलो भाई सॉरी। आगे अपनी बात चालु रखो।"

मैंने कहा, "उस समय तो मेरे पति ने लाइन काट दी। उसके बाद ना तो मैंने मेरे पति को फ़ोन किया ना ही साले मेर पति ने। बाद में जब वह घर आया तो मैंने उनके आते ही उसको आड़े हाथों लिया। हमारी काफी बहस हुई। आखिर में उसने माना की वह एक सेक्रेटरी को रात को होटल में बुलाकर चोद रहा था।"

अचानक मेरे मुंह से "चोदना" शब्द निकल गया, तो अजित ताली बजाते हुए खड़ा हो गया और बोला, "यह हुई ना बात?"

मैं पकड़ी गयी तो एकदम शर्मा गयी। लज्जा से मेरा चेहरा लाल हो गया। मैं रँगे हाथोँ पकड़ी गयी। मेरी मनोदशा अजित जान गए। चेहरे पर लज्जा देख कर अजित बोला, "बड़ी सभ्य बन रही थी ना? अब "चोदना" बोल पड़ी ना? इसमें शर्माना क्या? जो हकीकत थी वही तुमने बोली है।" मैं अजित की बात का जवाब ना दे पायी। मैंने अजित से कहा, "अजित अब काफी रात हो चुकी है। क्यों ना हम कल सुबह बात करें?"

अजित ने मेरी और आश्चर्य से देख कर कहा, "क्यों? अभी तो रात बहुत बाकी है। अभी तो सिर्फ ग्यारह बजे हैं। हम तो सुबह तक बात कर सकते हैं।"

मैंने कहा, "तुम भी थक गए होंगे। मैं भी थक गयी हूँ। क्यों ना हम इस बात को आज के लिए ख़त्म करें? कल फिर मिलेंगे। वैसे भी तुम्हें इतनी रात गए फिर टैक्सी भी मुश्किल से ही मिलेगी।"

अजित ने मेरी और देखते हुए टेढ़े सुर में कहा, "हाँ इतनी रात गए टैक्सी कहाँ मिलेगी? मैं रात को यहीं रुक जाता हूँ। तुम्हारी पूरी बात सुनूंगा और मेरी बात कहूंगा। फिर सुबह जल्दी ही मैं चला जाऊंगा जिससे मुझे कोई देख ना पाए।" बात बात में ही अजित ने मेरी दुखती रग दबा दी।

अब मैं अजित को कैसे कहूं की "गेट आउट?" मैंने अपने आपको लाचार पाया। मेरी उलझन देख कर अजित सामने आया और बोला, "क्यों परेशान हो रही हो? देखो प्रिया। तुम्हारी और मेरी कहानी एक जैसी है। मैं सच कहूं तो तुम्हें तुम्हारी चूत चोदने के लिए कोई अच्छा मोटा लण्ड चाहिए, और मेरे इस मोटे लम्बे लण्ड को एक अच्छी प्यारी चूत चाहिए। अब दोनों के पास जो एक दूसरे को चाहिए वह है तो फिर क्या प्रॉब्लम है?" अजित मेरी और आगे बढ़ा और मुझे खिंच कर कस के अपनी बाँहों में ले लिया। मैंने उसका हाथ हटाने की कोशिश की पर मेरी एक ना चली।

मैंने अजित से कहा, "अजित तुम यह क्या कर रहे हो? मुझे छोड़ दो।"

अजित ने कहा, "मुझे छोड़ दो नहीं, बोलो मुझे चोद दो।" अजित ने मुझे अपनी बाँहों इतना कस के पकड़ा की मेरी "फैं" निकल गयी। उसने आसानी से मुझे अपनी बाहों में पकड़ कर ऊपर की और उठाया। वह खुद कुर्सी पर बैठ गए और मुझे अपनी गोद में बिठाया। मैं बेचारी अजित का मुकाबला कहाँ कर सकती थी?

मैंने अजित से कहा, "अजित यह तुम क्या कर रहे हो? यह ठीक नहीं है। मुझे छोड़ दो।"

अजित ने कहा, "फिर वही छोड़ दो? मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं, मैं तुम्हें चोदुँगा। तुम भी तो यही चाहती हो ना?"

अजित ने मेरे मन की बात कैसे समझ ली यह मैं नहीं जानती? पर यह सच था की मैं भी अजित की खुरदरी और कर्कश भाषा से ज्यादा उत्तेजि हो रही थी। मैं चाहती थी की उस रात अजित मुझे ऐसे गालियाँ और गन्दी भाषा का प्रयोग करे और ऐसे चोदे जैसे मैं अपनी जिंदगी में कभी नहीं चुदी। मैंने कई देसी पोर्न वेब साइट में मर्दों को औरतों को गालियां और अपमान जनक शब्द प्रयोग करते हुए चोदते हुए देखा और पढ़ा था। इससे मैं उत्तेजित हो जाती थी और ऐसा कभी मेरे साथ भी हो यह सोचकर कल्पना में खो जाती थी। उस समय मेरी जाँघों के बिच में से इतना रस झरने लगता था और मेरी निप्पलेँ ऐसी फूल जाती थीं की मैं नहीं बता सकती। मेरे पके स्तनों और फूली हुई निप्पलोँ का स्पर्श अजित को पागल कर रहा था। मुझे इतने कस के बदन से चिपका ने के कारण जब अजित के पुरे बदन में कम्पन हुई सो मैंने भी महसूस की। मैंने देखा की अजित मेरे स्तनोँ को घूर घूर कर देख रहा था।

 
पतले गीले कपडे में से मेरे स्तन उसे साफ़ साफ़ दिख रहे होंगे। जरूर मेरी फूली हुई निप्पलेँ मेरे हाल की चुगली कर रही होंगीं। मैंने मेरे बदन में महसूस किया की अजित का लण्ड फुलता जा रहा था जो की मेरे जाँघों के बिच टक्कर मार रहा था। उसकी आँखों में कामुकता का पागलपन था जो साफ़ साफ़ संकेत दे रहा था की वह मुझे चोदे बगैर छोड़ेगा नहीं। अजित ने मेरी चिबुक अपनी उँगलियों में पकड़ी और मेरी गर्दन ऊपर की मेरी आँखों में आँखें डाल कर बोला, "मेरी बीबी मेरे भाई के लण्ड से खुश है और उससे चुदवा रही है। तुम्हारा पति उसकी सेक्रेटरी की चूत से खुश है और उसे चोद रहा है। फिर ऐसा करते हुए भला हमें अपने आपको दोषी क्यों समझना चाहिए? मैं और तुम क्यों ना एक दूसरे को चोद कर अपनी वासना की पूर्ति करें और उन सब को दिखा दें की हम भी कुछ कम नहीं।"

मैंने अजित से कहा, "वह सब छोडो और आप यहां से जाओ। देखो, यह ठीक नहीं है। मैं एक शादी शुदा औरत हूँ और तुम भी तो शादी शुदा हो?"

"क्या मेरी बीबी शादी शुदा नहीं है? क्या तुम्हारा पति शादी शुदा नहीं है? फिर वह क्यों दूसरे की चुदाई करने में लगे हुए हैं? क्या यह कानून तुम पर और मुझ पर ही लागू होता है? उन पर नहीं होता?" अजित ने मुझे पूछा।

मैंने कहा, "मैं यह सब नहीं जानती। पर तुम कुछ भी ऐसा नहीं करोगे बस, मैंने कह दिया तो कह दिया।"

तब मैंने अजित के चेहरे पर निराशा का भाव देखा। मैं मेरे दिल और दिमाग के बिच हो रहे संघर्ष से परेशान थी। मैंने अपनी नज़रे झुका दी। अजित ने फिर मेरी ठुड्डी पकड़ कर ऊपर उठायी और आँखों में आँखें डाल कर बोला, "प्रिया मैं जानता हूँ तुम मेरे लण्ड के लिए तरस रही हो। आज इसी लिए मैंने तुम्हें फ़ोन नहीं किया और तुम्हारे घर में घुस आया ताकि तुम्हें ना बोलने का मौक़ा नहीं मिले l क्यूंकि मैं जानता था की तुम्हारी इच्छा क्या है। पर मैं तुमपर कोई जबरदस्ती नहीं करना चाहता। मैं तुम्हारे मुंह से "हाँ या ना" सुनना चाहता हूँ। बोलो हाँ या ना?"

मैंने अजित की आँखों में आँखें मिलाई और फिर अपनी गर्दन झुका दी और कुछ नहीं बोली। मैंने सोचा मेरे नजरें झुकाने से अजित समझ जाएगा की मुझे उससे चुदवाने में कोई आपत्ति नहीं थी। पर मुझे लगा अजित मेरे मुंह से हाँ कहलवाना चाहता था। मैं भी तो भारतीय नारी थी। मैं अपने मुंह से कहाँ हाँ कहने वाली थी?

अजित ने फिर मेरी गर्दन ऊपर की और उठाई और मेरी और तीखी नजर से जब देखा तो मैंने कहा, "अरे छोडो भी। मैं क्यों हाँ कहूं? तुमने मुझे कोई रोड छाप वेश्या समझ रखा है? मेरी और ऐसी नजर से ना देखो। और दूसरी बात, तुम कठोर और खुरदरे ही अच्छे लगते हो। यह शहर की नकली सभ्यता तुन्हें जँचती नहीं है। तुम्हें मेरे साथ नकली सभ्यता से बात करने की जरुरत नहीं है। तुम्हारी बीबी ने तुम्हारे साथ धोखा किया है ना? तो मुझे तुम अपनी बीबी समझ कर खूब गालियाँ दो। मैं भी तुम्हें आज रात अपना पति समझ कर खूब गालियाँ दूंगी। इससे हमारा मन भी हल्का हो जाएगा।"

मेरी बातों से अजित भी उत्तेजित हो गया। मेरी बाँहें पकड़ कर उन्हें हिलाते हुए बोला, "साली राँड़, मैं तुम्हें वेश्या नहीं समझता। तू वेश्या ही है। वरना क्यों मेरे भाई से चुदवाती? शादी मुझसे और चुदाई मेरे भाई से?"

मैंने अजित की और ऊपर देखा और बोली, "साले भड़वे, तू अपनी बीबी को क्या समझता है? क्या मैं तेरी रखैल हूँ, की तू जब चाहे मुझे आकर चोद कर चला जाए और बाहर जा कर दूसरी औरत को चोदता रहे? साले तुझे अपने लण्ड के अलावा कुछ और दिखता है?"

मैंने बात बात में अजित को कह दिया की मैं उस रात उससे ना सिर्फ चुदवाना चाहती थी बल्कि मैं चाहती थी की वह मेरे साथ एक बाजारू औरत या एक रंडी की तरह बरते, क्यूंकि मैं ऐसा करने पर मैं ज्यादा ही गरम हो जाती हूँ और मेरी रगों में मेरे हॉर्मोन बड़ी फुर्ती से दौड़ने लगते हैं। अजित ने मुझे एक बाँह मेरी पीठ के निचे और दूसरी बाँह मेरे घुटनों के पीछे लगा कर बड़ी आसानी से पूरी तरह अपनी बाँहों में ऊपर उठा लिया और मुझे उठा कर बैडरूम में ले गया और बिस्तर पर धीरे से रख दिया.

वो बोला, "मैं तुम्हें आज एक रंडी की तरह चोदुँगा। तु साली राँड़ बड़े नखरे कर रही थी और यह दिखाने की कोशिश कर रही थी की तू बड़ी सभ्य और ऊँचे समाज की है। पर मैं जानता था की तेरी चूत मेरे मोटे लण्ड के लिये बड़ी मचल रही है। आज मैं तुझे न सिर्फ चोदुँगा बल्कि चोद चोद कर तेरी यह छोटी सी चूत का भोसड़ा बना दूंगा।"

किसी और जगह कुछ अलग परिस्थिति में ऐसी भाषा सुनकर शायद मैं गुस्से से तिलमिला उठती। पर अजित की ऐसी गन्दी गालियाँ सुनकर मेरी काम वासना और भड़क उठी।

मैंने भी ऐसी ही भाषा में जवाब देते हुए अजित से कहा, "ऐ भड़वे! तुझमें अगर दमखम है तो दिखा मुझे अपने लण्ड का जोश। तुम अपने आप को क्या समझते हो? क्या तुम मुझे आसानीसे चोदोगे और मैं तुमसे चुदवाउंगी? अरे जा रे! मुझे चोदने के सपने छोड़ दे।"

मैं बार बार अजित को चोदना, लण्ड ऐसे शब्द उपयोग करके यह इशारा देना चाहती थी की मैं मना तो करती रहूंगी पर मेरी ना में भी मेरी हाँ है। अजित मुझ पर जबरदस्ती करना नहीं चाहता था। वह मुझे अच्छा लगा। पर मैं चाहती थी की वह उस रात मुझे चोदे।

मैंने उसे चुनौती देते हुए कहा, "अरे तुम में दम ही कहाँ है? चोदने की बात तो दूर, अगर दम है तो मुझे पकड़ कर तो दिखाओ। तुम सिर्फ बातें करने वालों में से हो। चोदने वाले और होते हैं। वह बातें नहीं करते।" ऐसा कह कर मैंने उसे तिरछी भाषा में मुझे चोदने का आमंत्रण दे दिया।

मेरी ऐसी ही बराबरी की गन्दी और असभ्य भाषा सुनकर अजित काफी उत्तेजित हो गया। उसने भाग कर मुझे एक झटके में दबोच लिया। मैं बड़ी कोशिश की छूट कर भागने की, पर मेरी एक ना चली। अजित ने निचे झुक कर मेरा नाइट गाउन मेरे पाँव से उठाकर मेरे सर से पार कर के एक कोने में फेंक दिया और मुझे एकदम नंगी कर दिया। मैंने शर्म के मारे एक हाथ की हथेली से अपनी चूत और दूसरे हाथ से अपने दोनों स्तनों को ढकने की नाकाम कोशिश की।

 
मेरी यह कोशिश देख कर अजित मुस्कराया और बोला, "साली राँड़। मेरे भाई से चुदवाने में तो कुतिया को ज़रा सी भी शर्म नहीं आ रही थी और अब मैं तुझे चोदने जा रहा हूँ तो साली शर्माती है? इतना आगे बढ़ने के बाद शर्मा रही है?

पर जैसे जैसे अजित ने मेरे नंगे बदन को बिस्तर पर लेटे हुए देखा जो उससे चुदवाने के लिए बेताब था तो वह मुझे देखता ही रहा। उसकी तो जैसे बोलती ही बंद हो गयी। मेरे बदन की झलक तो उसने देखि थी। पर पूरी तरह निर्वस्त्र मचलता हुआ मेरा नंगा बदन वह पहली बार देख रहा था। उसकी आँखें मेरे नंगे बदन को एक तक ऊपर से निचे तक ताकती ही रही। शायद उसकी बीबी भी उसके सामने ऐसे हालात में नग्न नहीं पड़ी होगी। उसकी आँखें पहले तो मेरे उद्दंड स्तन मंडल पर पड़ीं जो इतने गोल फुले होने के बावजूद पूरी फूली हुई निप्पलोँ से सुसज्जित ऐसे अक्कड़ खड़े हुए थे, जैसा की अजित का लण्ड मेरे नंगे बदन को देख कर खड़ा था।

अजित ने हाथ बढ़ाया और मेरे फुले हुए स्तनों को दोनों हाथों में पकड़ा और बोला, "बापरे! कितनी सुन्दर तुम्हारी यह चूँचियाँ है! साली तेरे इस कमसिन और इतने खूबसूरत बदन पर अगर मेरे भाई की नियत बिगड़ी तो उस बेचारे का क्या दोष?"

फिर उसकी नजर मेरी पतली कमर और उसके बिच कुँए के सामान मेरी नाभि पर पड़ी। अजित ने मेरी नाभि में अपनी उंगली डाली और उस छेद में उंगली घुमाते हुए वह मेरी कमर के निचे वाले थोड़े से ऊपर उठे हुए बदन से होकर मेरी चूत से थोड़े से ऊपर वाले टीले को घूर घूर कर ताकता ही रहा। मेरी खूबसूरत और हलकी झाँटों की कलापूर्ण तरीके से की हुई छंटाई का मुझे बड़ा गर्व है। उसे देख कर तो अजित की सिट्टीपिट्टी गुम हो गयी। मेरी सुआकार जाँघों के बिच में मेरी छोटी सी चूत पर अजित की आँखें गड़ी ही रह गयीं। अजित ने धीरे से मेरे बदन को ऊपर उठाया और मुझे बिस्तर पर पलटा, जिससे मेरी गाँड़ को वह अपनी नज़रों से नंगी देख सके। अजित मेरे बाजू में बैठ गया और अपना हाथ मेरी करारी गाँड़ पर फिराने लगा। उसने मेरी गाँड़ के फुले हुए गाल दबाये और अपनी उंगली मेरी गाँड़ की दरार में जब डाली तो मैं उत्तेजना के मारे सिहर उठी। रोमांच से मेरे बदन के रोंगटे खड़े हो गए। काफी देर तक वह मेरी गाँड़ और मेरी गर्दन और पीठ की खाई को सहलाता रहा। फिर उसने दुबारा मुझे बिस्तर पर पलटा और मेरी चूत को बड़े गौर से देखने लगा। मैं शर्म से पानी पानी हो रही थी। मैंने फिर मेरा एक हाथ मेरे स्तन पर दुसरा हाथ मेरी चूत पर रखा।

थोड़ी देर ताकने के बाद अजित ने अपने आप को सम्हाला और बोला, "साली कुतिया, हटा अपने हाथों को और खोल दे अपनी टाँगों को। अब मैं तुझे अपने मोटे और लम्बे लण्ड से चोदुँगा। अब लेटी हुई क्या कर रही है? चल उठ मेरे लण्ड को पकड़ और बाहर निकाल।"

ऐसा कह कर अजित ने मेरा सर पकड़ा और मुझे बैठा दिया और उसके लण्ड को उसकी पतलून में से बाहर निकाल ने के लिए मुझे बाध्य किया। मैंने उसके पतलून की ज़िप खोली और उसमें हाथ डाल कर उसकी अंडरवियर में से उसका लण्ड बाहर निकाल ने की कोशिश की। पर अजित का लण्ड इतना मोटा और इतना फूल चुका था की उस छोटे से छेद में से उसे बाहर निकालना संभव नहीं था। मैंने फुर्ती से अजित के पतलून की बेल्ट खोली। अजित ने भी अपने बटन खोलकर अपनी पतलून पहले निचे गिरा दी और फिर अपनी अंडरवियर निचे खिसका कर अलग कर दी। अपनी शर्ट और बनियान भी अजित ने चंद सेकण्ड में ही निकाल फेंकी। मेरे सामने अजित पूरी तरह नंगा खड़ा हो गया। मैंने पहेली बार अजित का पूरा कड़क और फुला हुआ लण्ड देखा। अजित का लण्ड अच्छा खासा लंबा था। मेरे पति के लण्ड के मुकाबले थोड़ा ज्यादा लंबा था। मोटाई मेरे पति के लण्ड के जितनी ही होगी। पर ख़ास बात यह थी की उसक लण्ड चिकनाहट से पूरा सराबोर था। उसके लण्ड के छिद्र में से उसका पूर्व स्राव बून्द दर बून्द निकल रहा था। ऐसा लगता था की काफी समय से उसे चूत चोदने का मौक़ा नहीं मिला था। उसके लण्ड पर फैली हुई नसें उत्तेजना के कारण फड़क रही थीं। मैंने अजित के लण्ड के इर्दगिर्द मेरी मुठ्ठी की अंगूठी बनादि और अजित के लण्ड की ऊपर वाली चमड़ी को हलके से बड़े प्यार से उसके लंड पर सरकाने लगी। मेरा हाथ लगते ही अजित के बदन में सिहरन मैंने महसूस की। अजित ने मेरा सर पकड़ा और वह अपने लण्ड को मेरे मुंह के पास लाया। जैसे ही मैंने अपना मुंह खोला की अजित ने उसे मेरे मुंह में डाल दिया।

कुछ समय तक अजित मेरे मुंह को चोदता रहा। मेरे मुंह में दर्द होने लगा तो मैं पीछे हट गयी और अजित का लण्ड मैंने अपने मुंह से निकाल दिया तो अजित बोल पड़ा, "साली वेश्या, मेरा लण्ड चूसने में थक जाती है। मेरे भाई का लण्ड तो अच्छी तरह से चूसती होगी तू?"

मैंने अजित की और देखा और बोली, "अगर मैं तेरे भाई से चुदवा रही हूँ तो तू कौन सा तेरी उस प्रिया राँड़ को चोद नहीं रहा? साला बनता है हरीशचन्द्र! लण्ड चुसवाने के लिए तो बड़ा कूद रहा है? अब आजा और मेरी चूत को भी चूस और मेरी चूत का पानी पी।" मैंने यह कह कर अपनी टांगें खोली और अजित को मेरी चूत चूसने के लिए उकसाया। मैंने उस रात तक कभी मेरे पति को भी इस तरह बेशर्मी से मेरी चूत चाटने का आह्वान नहीं क्या था। मैंने कभी जिंदगी में ऐसी गन्दी गालीयाँ ना किसी को दी थी या ना किसी से सुनी थी। मैं खुद अपने इस बर्ताव से हैरान थी। अंदर ही अंदर मैं पागल हो रही थी। हमारे यह गंदे गाली गलौज से मेरे पुरे बदन में चुदवाने की इच्छा इतनी जबरदस्त हो रही थी की मैं सब्र नहीं कर पा रही थी। अपने पॉंव फर्श पर लटका कर मैं बिस्तर पर लेट गयी। मेरी चूत मैंने अजित की चुसाई करवाने के लिए छोड़ दी। अजित मेरी टाँगों के बिच मेरी जाँघों को थोड़ा चौड़ा कर के बैठ गया। उसने मेरी चूत को ध्यान से एकदम करीब से देखा और अपना मुंह मेरी चूत से सटा दिया। मेरी चूत की सबसे नाजुक जगह पर वह अपनी जीभ की नोक से चाटने लगा और मेरी चूत के होठोँ को अपनी जीभ से रगड़ कर मुझे उकसाने लगा। फिर अजित ने हलके से मेरी चूत में अपनी दो उंगलियां डाल दीं और मुझे अपनी उँगलियों से चोदने लगा।

 
हर औरत उँगलियों की चुदाई से बहुत ज्यादा उत्तेजित होती है यह मर्दों को पता होता है। उँगलियों से अगर अच्छी तरह आप किसी औरत को चोदते हो तो वह बेचारी आपके लण्ड से चुदवाने के लिए बेबाक हो जायेगी। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। जैसे जैसे अजित ने उँगलियों से चोदने की रफ़्तार बढ़ाई, मैं उसे लण्ड से चोदने के लिए मिन्नतें करने लगी।

मैंने उसे कहा, "अजित अब सब हो गया, अब मैं तुम्हारा यह लंबा लण्ड लेना चाहती हूँ। कई महीनों से मैं चुदी नहीं। मुझे अब तुम्हारे इस मोटे लम्बे लण्ड से मेरी चूत की भूख और प्यास मिटानी है। तुम जल्दी ही मेरे ऊपर चढ़ जाओ और तुम्हारा लण्ड मेरी चूत में पेलना शुरू करो। अब अगर देर करोगे तो मैं तो तुम्हारी उँगलियों की चुदाई से ही ढेर हो जाउंगी। फिर पता नहीं तुमसे चुदवाने की ताकत रहेगी या नहीं।"

पर अजित ने मेरी एक ना सुनी। वह उँगलियों से तेज रफ़्तार से मेरी चुदाई करता रहा। मैं अपने आप को रोक पाने में असमर्थ थी। मैं कामाग्नि से जल रही थी और अपनी उत्तेजना के चरम पर पहुँच रही थी। अजित ने थोड़ी देर और उँगलियों से मुझे चोदना जारी रखा तो मैं अजित का हाथ पकड़ कर, "अजित, गजब हो गया यार, आह... उफ़.... ओह... कराहते हुए मैं लुढ़क गयी और मेरी चूत मैं ऐसी मौजों की पुरजोश उठी की मेरा रोम रोम अकड़ गया और एक बड़ी आह के साथ मेरा छूट गया। मैं बिस्तर पर ही ढेर हो गयी। मुझे लुढ़कते हुए देख कर अजित ने अपनी उंगलियां मेरी चूत में से निकाल ली। उसकी उंगलियां मेरे स्त्री रस से पूरी तरह लबालब थीं। अजित ने एक उंगली खुद चाटी और एक उंगली मेरे मुंह में डाली। मैंने अपनी ही चूत के रस को चाट लिया। मेरी साँसे फूल रही थी। मेरी छाती तेजी से ऊपर निचे हो रही थी जिससे मेरे दोनों स्तन इधरउधर हिल रहे थे। अजित ने उन्हें अपनी हथेलियों में दबोच लिया और उन्हें कस के दबाने और मसलने लगा।

थोड़ी देर बिस्तर पर पड़े रहने के बाद मेरी साँसों की तेज रफ़्तार थोड़ी धीमी हुई। मैं अजित का लंबा और मोटा लण्ड मेरी चूत में डलवाने के लिए बेकरार थी। मैंने अजित को धक्का मार कर कहा, "चल साले चढ़ जा और दिखा अपनी मर्दानगी। मैं भी देखूं की आज तुझ में कितना दम है। देखती हूँ तेरा लण्ड कितनी देर मुझे चोद सकता है। जल्दी ढेर मत हो जाना। आज मैं पूरी रात तुझ से चुदवाना चाहती हूँ। तेरे में जितना दमखम है निकाल ले। पर हाँ, तु उस मेज के दराज में पीछे कण्डोम रखे हैं। उसमें से एक कंडोम अपने लंड पर लगा ले। मुझे डर है कहीं तू मुझे गर्भवती ना कर दे।" अजित ने फटाफट एक कंडोम निकाला और अपने लण्ड पर चढ़ा दिया। अब अजित का लण्ड उस प्लास्टिक की टोटी में अजीब सा लग रहा था। मैं अजित से कोई लंबा सम्बन्ध नहीं रखना चाहती थी। मैं नहीं चाहती थी की उस रात की चुदाई मेरी जिंदगी में कोई गजब ढाए। मैं अजित को चुदाई का आनंद देना चाहती थी। और कई महीनों से लण्ड की भूखी मेरी चूत की भूख मिटाना चाहती थी। बस इतनी ही बात थी। मुझ में और अजित के स्वभाव के बिच में बड़ा अंतर था। हमारी सोच अलग थी, हमारा रास्ता अलग था।

अजित मेरी दोनों टाँगों के बिच आ गया। उसने मेरी टाँगें अपने कंधे पे रखीं और अपना लण्ड मेरी चूत के छिद्र पर रख दिया। मैंने उसके लण्ड को अपनी उँगलियों में पकड़ा और अपनी चूत पर रगड़ने लगी ताकि मेरी चूत का द्वार और उसका लण्ड चिकनाहट से पूरी तरह स्निग्ध रहे जिससे अजित का लंड घुसने के समय मुझे ज्यादा तकलीफ ना हो। वैसे तो मेरी चूत में से मेरा स्त्री रस इतनी तेजी से रिस रहा था पर चूँकि अजित का लण्ड कंडोम में था इस लिए कंडोम को बाहर चिकना करना जरुरी था। मैंने अजित को इशारा किया की अपना लण्ड वह मेरी चूत में डाल दे। अजित ने एक धक्का मारा और उसका लण्ड मेरी फड़कती चूत में घुस गया।

 
इतनी सावधानी बरतने के बावजूद भी मेरी चूत में दर्द की टीस सी उठी। मेरी चूत का छिद्र छोटा होने के कारण मैं अक्सर चुदाई की शुरुआत में ऐसे ही परेशान रहती थी। मेरी दर्द भरी कराहट सुनकर अजित थोड़ी देर रुका। पर मैंने उसे चुदाई करने का इशारा किया तो उसने अपना लण्ड बाहर निकाला और एक और धक्का दे कर उसे फिर मेरी चूत में घुसेड़ा। धीरे धीरे अजितने अपना पूरा लण्ड मेरी चूत में घुसेड़ दिया। काफी महीनों के बाद मेरी चूत में लण्ड को पाकर मेरी चूत तेजी से फड़कने लगी। मेरी चूत के अंदर की नसें और स्नायु ने अजित को लण्ड को जकड लिया था। अजित के लण्ड को मेरी चूत की फड़कन शायद महसूस हो रही थी। यह उसे बता रही थी की मैं भी उससे चुदवाने के लिए कितनी बेताब थी। अजित के बड़े अंडकोष मेरी चूत और गाँड़ पर "छप छप" थपेड़ मार रहे थे। जैसे ही अजित ने चोदने के रफ़्तार तेज की, मेरा बदन अजित के धक्कों से पूरा इतनी तेजी से हिल रहा था की मेरा पलंग भी इधर उधर हो रहा था। अजित एक अच्छा चोदने वाला साबित हो रहा था। मुझे काफी अरसे के बाद इतनी बढिया चुदाई का अवसर मिला था।

अजित में टिकने की क्षमता देख कर मैं हैरान रह गयी। मेरे पति मुझे चोदते समय ज्यादा से ज्यादा दो या तीन मिनट तक टिक पाते थे। पर अजित तो लगा ही रहा। कम से कम दस से पंद्रह मिनट तक जरूर अच्छी तरह उसने मुझे चोदा। मुझे अजित के लण्ड की चुदाई से इतनी उत्तेजना हो रही थी की अजित से पहले ही मैं दुबारा ढेर होने वाली थी। पर मैं चाहती थी की मैं और अजित एक साथ ही अपना माल छोड़ें। मुझे अजित के माल छोड़ने की चिंता नहीं थी क्यूंकि मैंने उसे टोटी पहना रक्खी थी। मैंने अजित को निचे से ही ऊपर की और धक्का मारना शुरू किया। मैं अजित को जताना चाहती थी की मैं अब अपना पानी छोड़ने वाली हूँ। अजित ने जब यह देखा तो उसने अपनी रफ़्तार और तेज कर दी। अब मैं उत्तेजना से तार तार हो रही थी। मेरा दिमाग उत्तेजना और रोमाँच से घूम रहा था। मैं जैसे उत्तेजना के सैलाब में उल्लास की ऊँची ऊँची मौंजों पर एक काबिल गोताखोर की तरह पाँव में लकड़ी की पट्टी लेकर चरम की ऊँचाइयाँ छू रही थी। मेरे जहन में एक ही गजब का धमाका हुआ और मेरा पूरा बदन जैसे तनाव से झकझोर हो गया। मैं कामोन्माद की चरम सीमा पार कर चुकी थी। वह सम्भोग के चरम का उन्माद अवर्णनीय था। अजित कैसा भी हो, चुदाई का वह निष्णात था। मेरे छूटने के साथ साथ ही मुझे महसूस हुआ की उसकी टोटी में उसका गरम गरम वीर्य का फौव्वारा छूटा और वह थैली उसके माल से भर गयी। मुझे डर था की उसका वीर्य इतना ज्यादा ना हो की कहीं थैली ही ना फट जाए।

अपना माल छोड़ कर अजित मेरे ऊपर ही निढाल होकर गिरा। अब मुझे उसके बदन का भार लगा। चुदाई के पागलपन में तो मुझे उसके वजन का एहसास तक नहीं हुआ था। उस रात मैंने अजित से मेरी कई महीनों की चुदाई की भूख शांत हो इतनी चुदाई कराई। मैं उससे निचे रह कर एक बार तो एक बार उसके ऊपर चढ़ कर, एक बार मेरी पीछे से कुत्ता कुतिया जैसे तो एक बार टेढ़े होते हुए चुदाई करवाई। सुबह होते होते मेरी चूत सूझ गयी थी। मैं ठीक से चल ने की हालत में नहीं थी। पर मुझे संतोष था की मैंने मेरे पति की बेवफाई का उस रात पूरा बदला लिया। मेरे पति ने किसी और को चोदा था तो मैंने किसी और से चूदवाया। और एक बार नहीं, कई बार चुदवाया।

उस रात के बाद मैंने अजित को दो बार देर रात घर पर बुलाया और उससे मेरी अच्छी तरह चुदाई कराई। मुझे अब अच्छा लगने लगा था।

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समय बीतते मुझे महसूस होने लगा की अजित हमारी चुदाई के बाद से मुझे हीन नज़रों से देखने लगा था। वह मुझ पर अपना अधिकार जमाने की कोशिश करने लगा था। उसे लगा की जैसे मैं उसकी बपौती संपत्ति हूँ। मुझे यह कतई मंजूर नहीं था। मैं एक सम्मान के काबिल स्वतंत्र प्रोफेशनल महिला था। एक रात के वाकये से इंसान बदल तो नहीं जाता? मैंने कई बार अजित को बताने की कोशिश की जो उस रात को हुआ वह आवेश में हुआ था। उसे पीछे छोड़ कर हमें आगे बढ़ना चाहिए। मैं कोई राँड़ नहीं थी। पर अजित का मेरी तरफ रवैया नहीं बदला। वह मेरे साथ वही अपमान जनक तरीके से बात करने लगा। तो फिर मैंने तय लिया की अजित से नाता तोड़ दिया जाए। इतना ही नहीं, वह मुझसे अशिष्ट भाषा में बात करने लगा था। मुझे अपमान जनक शब्द वह आम बोलने लगा था। मुझे लगा की अजित को पहले से ही मुझे नियत्रण में रखना चाहिए था। पर तीर कमान से निकल चुका था।

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तीसरी बार अजित बिना बुलाये घर आ गया। वह काफी शराब पिए हुए था और मुझसे बड़ा ही अपमान जनक व्यवहार करने लगा और मुझे बड़े भद्दे शब्दों में गालियाँ देने लगा। उस रात अजित ने मुझ पर जबर दस्ती की। मेरे काफी मना कर ने पर भी उसने नशे में ही मुझे चोदा और मैंने उससे चुदाई तो करवाई पर मैंने तय किया की उस रात के बाद मैं अजित से कोई सम्बन्ध नहीं रखूंगी।

मैंने उसे सुबह जाते हुए कह दिया की अब हम नहीं मिलेंगे। उस रात के बाद मैंने उसके फ़ोन लेना बंद कर दिया। फिर भी वह मुझे फ़ोन करने से बाज नहीं आया तो मैंने उसे धमकी दी की अगर वह मुझे फ़ोन करेगा तो मैं पुलिस में शिकायत कर दूंगी। उसके बाद उसके फ़ोन आने बंद हो गए और उसके बाद हम नहीं मिले। उसके कई मैसेज आये। मैंने उसे एक ही मैसेज दिया की मैं अब उसमें इंटरेस्टेड नहीं हूँ।

उस रात के बाद मैं शाम को घर आते डरती थी। पर मुझे अजित ने और परेशान नहीं किया। मैंने मेरे ऑफिस जाने का समय भी बदल दिया। मैं अजित से दूर रहना चाहती थी।

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ऐसे ही कई महीने बीत गए। मुझे अजित नहीं दिखा। शायद उसने घर या जॉब बदल दिया था। अजित से चुदवाने के बाद मेरी चूत कुछ दिनों के लिए तो शांत हुई, पर फिर तो उसकी भूख और भी बढ़ गयी।

 
Ch. 03 - योगराज

मैं अब अपने पति की और से निश्चिंत हो चुकी थी। बल्कि मुझे उनसे बदला लेना था। मेरे पति को मुझ में कोई रस नहीं रहा था। मेरी चूत में बड़ी मचलन हो रही थी। मुझे किसी मोटे लण्ड से चुदवाने की ललक बढ़ गयी थी। जाते आते और ऑफिस में भी मुझे कई वीर्य वान और सुन्दर बदन वाले पुरुष हर रोज ताड़ते रहते थे। शायद उनके मन में भी मुझे चोदने की इच्छा जरूर छिपी हुई होगी। यह सोच कर मेरी दबी हुई सम्भोग की इच्छा भड़क उठी। मैं रोज रात को किसी ना किसी पुरुष से सम्भोग के सपने देखने लगी। पर सपने भला सच्चाई की जगह थोड़े ही ले सकते हैं? जाते आते मैं अब पुरुषों को ज्यादा पैनी नजर से देखने लगी। पर मेरी नजर में मुझे मेरे काबिल कोई भी पुरुष नहीं लगा।

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हाँ एक योगराज थे जो मुझे मेर काबिल लगे। वह मुझसे थोड़ा सीनियर थे। एकदम आकर्षक व्यक्तित्व, लंबा, गठा हुआ सुडौल कसरती बदन, भरी हुई मांसल भुजाएं, घने बाल, चौड़ा सीना और न जाने क्यों पर चेहरे पर एक अजीब सा खोया खोया सा भाव मेरे मन को छू गया। उसे देखते ही जैसे मेरे पाँव के बीच में से कुछ कुछ होने लगता। शायद मेरे मन में एक गुप्त भाव हुआ की वह जरूर मेरे बदन की गर्मी और भूख को शांत करने की क्षमता रखते थे। वह पहले व्यक्ति थे जिसको मैंने ध्यान से देखा था जब मैंने पहली बार मेरी कंपनी ज्वाइन की थी। पर उस समय मैं अपने पति के रंग में रंगी हुई थी। फिर भी जब पहली बार उनसे मिलने उनके कमरे में गयी तब उन्हें देख कर मैं देखती ही रह गयी। और आश्चर्य मुझे तब हुआ जब वह भी मुझे कितने लम्बे समय तक ताकते ही रहे। साधारणतः आपकी महिला साथीदार कितनी ही सुन्दर क्यों ना हो, पर आप उसे ताक कर देख नहीं सकते। यह असभ्य माना जाता है। पर योगराज मुझे ना सिर्फ ताकते रहे बल्कि मुझे देखकर उनका मुंह खुला का खुला ही रह गया। यह तो एक बड़ी अजीब बात थी।

मैंने गला खूंखार कर जब उन्हें इशारा किया तब उन्होंने अचानक अपने आपको सम्हाला और बोलै, " प्रिया, प्लीज आप को इस तरह ताकने के लिये मुझे माफ़ करें। आपकी शक्ल देख कर मैं थोड़ी देर के लिए धोका सा खा गया। आप कितनी खूब सूरत हो।" फिर एक गहरी साँस लेकर वह वहाँ से हट गए। शर्म के मारे मैं पानी पानी हो रही थी। सामान्यतः ऐसे प्रशंशा से भरे हुए वचन सुनकर मैं खुश हो जाती। पर उस दिन मुझे उनका यह वर्तन कुछ अजीब सा लगा। खैर वह समा चला गया और योगराज ने मुझे अपना परिचय दिया और उनकी टीम से मिलाया l शुरुआत के वह अजीब लम्हें को नजर अंदाज करें तो वह मीटिंग यादगार रही। मैं योगराज के बरबस आकर्षित करने वाले व्यक्तित्व से काफी प्रभावित या कहूं की आकर्षित हुई तो वह गलत नहीं होगा। वह हमेशा छोटी सी कटी हुई दाढ़ी रखते थे जो उनके आकर्षक व्यक्तित्व को कामुकता प्रदान करती थी।

पहले ही दिन से मैं महसूस कर रही थी की जब भी मौक़ा मिलता, योगराज मुझे ताकते ही रहते थे। जब हमारी नजरें मिलतीं तो वह शर्मिन्दा होकर अपनी नजर हटा दिया करते। उनकी नज़रों में मैं एक गहरा अजीब भाव देख रही थी। उन्होंने कभी भी मुझसे किसी तरह की कोई गलत हरकत नहीं की। समय के बीतते योगराज नजरें भी मेरे पुरे बदन पर घूमने लगीं। अब वह पहले वाला अजीब सा भाव जाता रहा था। अब हम दोनों एक दूसरे से नजरे मिलने पर जैसे कोई गुप्त सन्देश दे रहे थे। उनकी नजर इतनी शुक्ष्म और गुह्य थी की हमारे पुरे ऑफिस में कोई भी हमारी नज़रों का आदान प्रदान के बारे में समझ ही नहीं सका। शुरू से ही मैं भी उनकी नजरों का मेरी पैनी नजर से जवाब देना चाहती थी, पर चूँकि मैं शादी शुदा थी और उस समय शादी के कस्मे वादे बगैरह में मेरा अंध विश्वास था, मैं उनके इशारों को उपेक्षित करती रही। पर अजित से नाता तोड़ने के कुछ हफ़्तों के बाद से मैंने योग (योगराज) की नज़रों का मीठी सी मुस्कान देकर जवाब देना शुरू किया। जैसे ही मैंने योग को मीठी नजर से जवाब देना शुरू किया, की हम दोनों के बीच की आँखों आँखों की मस्ती बढ़ती गयी।

 
योग की कटार सी तीखी नजरें देखते ही मेरी हालत लड़खड़ा जाने लगी। उनकी कामुक नजर मेरे बदन पर पड़ते ही मेरे पुरे बदन में एक कम्पन सी होने लगती। अब मैं भी उनसे अकेले में मिलने के बेताब होने लगी थी। और मुझे ऐसे कुछ मौके अनायास मिल भी गए। ख़ास तौर से मैं उस सुबह को नहीं भूल सकती जब मुझे ऑफिस पहुँचने में थोड़ी देर हो गयी थी। भागते भागते मैं जब लिफ्ट में दाखिल हुई तो योगराज अकेले वहाँ पहले से ही खड़े थे। मैंने उन्हें "हेलो" कहा और उन्होंने भी थोड़ा सा मुस्का कर मुझे "हाई प्रिया!" कहा। मुझे साफ़ साफ़ याद है की उस दिन मैंने काला स्कर्ट और लूस सफ़ेद टॉप पहन रखा था। मेरे लिफ्ट में दाखिल होते ही लिफ्ट का दरवाजा बंद हुआ। लिफ्ट में मैं और योगराज ही थे। थोड़ा चलते ही अचानक बिजली गुल हो गयी और लिफ्ट में अन्धेरा हो गया। लिफ्ट बीच में ही रुक गयी। अँधेरा होते ही मेरी हालत खराब हो गयी। मेरी साँस घुटने लगी। मैं एकदम मारे डरके घबड़ा उठी और बिना सोचे समझे योगराज को अँधेरे में ढूंढने लगी और उनके बदन को छूते ही हाथ फैला कर उनको पकड़ कर अपने करीब लाने की कोशिश करने लगी। मेरी इस तरह की हरकतें देखकर योगराज भी बड़े अचम्भे में पड़े होंगे। पर मुझ में यह सब सोचने की क्षमता कहाँ थी? मैं तो अँधेरे के डर के मारे चिल्ला उठी, "योग, मुझे बचा लो। मुझे अपनी बाहों में लेलो। छोड़ना मत। मुझे अँधेरे से बहुत डर लगता है। मेरा दम घुट रहा है। तुम कहाँ हो?" यह कह कर मैं उनके बदन पर हाथ फिराने लगी, जिससे मुझे उनका हाथ मिले और उन हाथों के बंधन में मैं बँध जाऊं। उनके लिए तो यह एक सुनहरा मौक़ा था। उनके बदन पर घूम रहे मेरे हाथ को योग ने धीरे से पकड़ कर जैसे अनजाने में ही अपने दो पाँवों के बिच में रख दिया। उनकी पतलून में लटकता हुआ उनका आधा कड़क लण्ड मेरे हाथ में अनायास ही आ गया। मैंने अपने हाथ में योग का लण्ड लिया और उसे महसूस किया। बापरे! उनका आधा ही खड़ा लण्ड भी कितना लंबा और मोटा था यह मैंने बिच में कपड़ा होते हुए भी महसूस किया। मेरे पुरे बदन में एक सिहरन फ़ैल गयी।

मेरी गभराहट देख कर योगराज ने मुझे अपनी बाँहों में खिंच लिया और बोले, "बिलकुल चिंता मत करो प्रिया (मेरा नाम) डार्लिंग, मैं कहीं नहीं जाऊंगा। मैं यहीं हूँ।" उनका हाथ मैंने मेरी कमर के घिरावे पर रखा। उस समय मैं डर से कम और उन्माद भरी उत्तेजना से ज्यादा प्रभावित थी। मैं योग के लण्ड को अनजाने में अनायास ही कुछ देर तक सहलाती रही। मैं फिर यह सोच कर घबरा गयी की कहीं योग मेरे ऐसा करने को मेरी सम्मति ना मान ले। यदि उसे ज़रा सी भी भनक पड़ गयी की मैं भी योग से चुदवाने के लिए तैयार हूँ तो उसको मेरे स्कर्ट को ऊपर उठा कर और मेरी पैंटी को निचे खिसका कर अपनी पतलून की ज़िप खोल कर अपना मोटा लंड मेरी चूत में घुसेड़ने में कोई वक्त नहीं लगेगा। और अगर ऐसा हुआ तो वह मुझे वहीँ लिफ्ट में ही पकड़ कर चोदने लग जाएगा। फिर मैं भी उसे रोक भी नहीं पाउंगी। डर के मारे फ़ौरन मैंने अपना हाथ योग के लण्ड के ऊपर से हटा दिया। मुझे इतना करीब पाकर और ऐसी हरकतें करते हुए महसूस करने पर योग का लण्ड खड़ा हो जाना स्वाभाविक ही था। मेरे उन्नत उरोज उनकी चौड़ी छाती को रगड़ रहे थे। उनका लण्ड एकदम ना सिर्फ खड़ा हो गया बल्कि ऊँचा उठते हुए मेरे दो पॉंव के बिच में टक्कर मारने लगा। जैसे ही मैंने उनके खड़े लण्ड को मेरे पाँव के बिच में महसूस किया की मेरे बदन में डर की जगह उत्तेजना भरी काम की ज्वाला फ़ैल गयी।

मैं उनको जैसे कस कर दबा रही थी तो वह भी तो थोड़े टेढ़े हो कर उनके हाथ मेरी गाँड़ की गोलाई पर घुमाने और मेरे कूल्हों को बड़े प्यार से सेहला ने लगे। उनके टेढ़े होने से उनका लण्ड सीधा ही मेरी चूत में मेरे कपड़ों के बिच में से टोचने लगा। इस का अनुभव होते ही मेरी चूत में से जैसे मेरे स्त्री रस की धारा बहने लगी। तब शायद योगराज को ध्यान आया की उन्होंने अलार्म बटन तो दबाया ही नहीं था। वह मुझे थोड़ा बाजु में खिसकाते हुए बोले, "रुको, मैं ज़रा अलार्म बटन दबाता हूँ।" यह कह कर खिसक कर बटन दबाने के लिए उन्होंने हाथ बढ़ाया और वह अँधेरे में अलार्म का बटन ढूंढने लगे। उनके हटने से मैं एकदम डर गयी। पता नहीं, शायद मेरे मन की गहराईयों में मैं नहीं चाहती थी की वह अलार्म बटन दबाये जिससे की लिफ्ट के दरवाजे जल्दी से खुल जाए और हम बाहर निकल पाएं। मैं घूम गयी और उनका हाथ पकड़ कर अपने सीने से चिपका कर बोली, "नहीं, आप कहीं भी नहीं जाएंगे। मुझसे ज़रा भी दूर मत जाइये।" मैंने योगराज के बदन को मेरे पिछवाड़े से धक्का मार कर लिफ्ट की दिवार के साथ सटा दिया और उनके बदन को कस कर दबा कर खड़ी हो गयी।

तब मेरी गाँड़ उनके खड़े हुए लण्ड को दबा रही थी। उनके दोनों हाथ मेरी छाती पर मेरे उन्नत फुले हुए दो पके हुए आम के फल सामान मेरे स्तनों को जकड़े हुए थे।

इसी हफरा तफ़री में योग निचे फर्श पर फिसल पड़े। क्यूंकि हम दोनों ने एक दूसरे को अपनी बाहों में जकड रखा था तो मैं भी उनके साथ फर्श पर फिसल पड़ी। ।

तब मैं उनकी गोद मैं ही बैठ गयी थी। मेरे कूल्हे के निचे उनका खड़ा लण्ड दब रहा था। योग को इससे शायद परेशानी हो रही थी। योग ने मुझे कमर से पकड़ कर थोड़ा ऊपर उठाया। मुझे पता नहीं चला पर अँधेरे में ही शायद योग ने मेरे स्कर्ट को ऊपर की और खिसकाया और फिर अपना लण्ड मेरी पैंटी में छिपी मेरी चूत को निशाना बनाते हुए मेर दोनों पॉंव को फैला कर बिच में रख दिया और मुझे अपने दोनों पॉंव के बीच में अपनी गोद में बिठा दिया। अगर बिच में पैंटी नहीं होती तो शायद योग का लण्ड मेरी चूत में घुस जाना तय था। बापरे! मैं तो डर और उत्तेजना के मारे काँप रही थी। ऐसा अजीबो गरीब अनुभव जिंदगी में मुझे पहले कभी नहीं हुआ था, जब डर और उन्माद का ऐसा अनूठा मिश्रण हुआ हो। एक और मैं अँधेरे में डर के मारे मरी जा रही थी, तो दूसरी और योग मुझे लिफ्ट में ही चोदने की जैसे पूरी तैयारी कर रहे थे। योग ने इस मौके का फायदा उठाते अपने दोनों हाथ मेरे स्तनों पर रखे और मेरे स्तनों को मेरे टॉप के ऊपर से ही मुझे आश्वासन देते हुए मसलने लगे

 
एक तरफ योग का लण्ड मेरी गीली चूत को कुरेद रहा था, तो दुसरी और उनके हाथ मेरे स्तनों को मसलने और दबाने में लगे हुए थे। मुझे उस समय अँधेरे से बिलकुल डर नहीं लग रहा था, क्यूंकि मैं जानती थी की योग मुझे इस पोजीशन में छोड़ कर कहीं नहीं जाएंगे। बस वह मुझे यही कह कर सांत्वना देते रहे की, "प्रिया डार्लिंग, डरना मत। अब जल्द ही बिजली आ जायेगी और हम जल्द ही बाहर निकल सकेंगे।" मैं सच कह रही हूँ की अगर योगने उस समय लिफ्टमें मेरी पैंटी खिसका कर अपना मोटा लंड मेरी गीली चूत में डाल दिया होता तो मैं उनका ज़रा भी विरोध नहीं करती। क्योकि शायद मैं इंतजार कर रही थी की योग ऐसा कुछ करे। मेरी साँसे धमनी की तरह फूली हुई तेज चल रही थीं। योग के हाथ मेरे स्तनों का पूरा आनंद ले रहे थे। मैं उस समय ऐसे दिखावा कर रही थी जैसे मैं एकदम डरी हुई थी और योग की हरकतों को नजर अंदाज कर रही थी और योग ऐसे दिखावा कर मेरे स्तनों को जोर से दबा रहे थे जैसे वह मुझे पकड़ रख कर मेरी सहायता कर रहे हों। शायद हम दोनों के मन में बात तो एक ही थी। पर वह दिखावा ऐसा कर रहे थे जैसे वह मुझे सांत्वना देते हुए मेरी छाती पर ढाढस देने के लिए ही अपना हाथ फैला रहे थे। योग ने अपना दुरा हाथ खीसका कर धीरे से मेरी स्कर्ट के निचे मेरी पैंटी पर रखा। वह प्यार से मेरी जाँघों को सहलाने लगे और साथ में सांत्वना के बोल, "बिलकुल डरना नहीं। मैं तुम्हारे साथ हूँ।" बोलना भूलते न थे। मैंने अँधेरे में महसूस किया की योग अपने फुले हुए कड़क लण्ड को अपने हाथमें पकड़ कर सहलाते हुए मेरी पैंटी से रगड़ रहे थे। मुझे ऐसा लगने लगा की योग अपने आप पर नियत्रण नहीं रख पा रहे थे। मेरी चूत के टीले पर मेरी पैंटी के ऊपर वह अपना हाथ सहलाते तो कभी वह अप्पने लण्ड को सहलाते हुए मेरी पैंटी पर रगड़ते। मैं भी अपना आपा खोने लगी थी, की अचानक लिफ्ट में आँखें चौंधियाने वाला उजाला फ़ैल गया।

इसके पहले की योग और मैं सम्हल पाएं, लिफ्ट अगले माले पर जा रुकी और जब दरवाजा खुला तो कुछ लोग लिफ्ट का इंतजार करते हुए मुझे मेरा स्कर्ट ऊपर की और उठा हुआ और मेरी गीली पैंटी में योग की जांघों के बिच में बैठे हुए उसके लण्ड को मेरी पैंटी को टोचते हुए और योग को मेरे स्तनों को दबाते और मलते हुए देख कर आधे शर्म से और आधे शरारत से मुस्कुराने लगे। तब मैंने अपना स्कर्ट ठीक कर के राज की गोद में से उठकर फ़टाफ़ट लिफ्ट के बाहर भाग कर निकलना ही ठीक समझा।

उस दिन लिफ्ट से तो मैंने भाग निकली, परन्तु अगले कुछ दिनों में सारी कहानी अचानक पलट ही गयी। मुझे कई लोगों ने योगराज की बीमार मानसिकता के बारे में बताया। उन्होंने बताया की योगराज बड़ा ही घमंडी और अहंकारी था। वह सफल प्रोफेशनल काबिल महिलाओं से नफरत करता था। उसका मानना था की महिलाओं का स्थान या तो मर्दों की सेज सजाने के लिए है या फिर रसोई घर में। यदि कोई महिला को उसकी व्यावसायिक काबिलियत के लिए कोई सम्मान या प्रमोशन मिलता है तो उसका कारण उसकी काबिलियत नहीं बल्कि उस महिला की उच्च मैनेजमेंट को अपनी सुंदरता एवं सेक्स द्वारा खुश करने की क्षमता के कारण ही मिलता है। वह बार बार सबको यह कहते थे, की काबिल महिआएं रईस और पूंजी पति बॉस के लिए चुदाईके साधन मात्र थे। महिलायें बच्चों को पैदा करने के लिए और मर्दों के सेक्स की भूख को मिटाने के लिए ही होती हैं. उनमें बौद्धिक क्षमता की कमी होती है।

जब मैंने यह सूना तो पहले तो मैं विश्वास नहीं कर पायी, पर जब मैंने बार बार कई लोगों से सूना तो मैं हैरान रह गयी। आज के आधुनिक जमाने में भला एक पढ़ा लिखा इंसान ऐसा कैसे सोच सकता है? मैं भी तो एक सफल बुद्धि जीवी व्यावसायिक काबिल व्यक्ति थी। अगर मुझे कोई ऐसा कहे की मैं मंद बुद्धि औरत हूँ और मेरी सफलता का कारण यह था की मैं बॉस लोगों से सेक्स करने से परहेज नहीं रखती थी तो मुझे कैसा लगेगा? यदि कोई यह कहे की मैं मर्दों की चुदाई के लिए एक साधन मात्र हूँ तो मैं भला उसे कैसे बर्दाश्त करुँगी? मेरे मन में योगराज के प्रति जो कामुकता के भाव थे, उसकी जगह नफरत ने लेली। अगर योगराज का ऐसा सोचना था तो फिर मैंने तय किया की मैं उसे ऐसा पाठ पढ़ाऊंगी की जिंदगी भर वह औरतों को इतनी घटिया नजर से देखने की हिम्मत नहीं करेगा। मैं उन्हें यह बताउंगी की महिलायें सेक्स के खिलौने नहीं है। उनमें भी खूब क्षमता है और कई क्षेत्रों में तो वह मर्दों से भी आगे है। जैसे जैसे मैं योगराज के बारे में सोचती गयी उनके प्रति मेरी घृणा बढ़ती गयी। मैं मौक़ा ढूंढती थी की कब मुझे योगराज को खरी खोटी सुनाने का मौक़ा मिले और मैं उसे अच्छा पाठ पढ़ाऊँ। और मुझे वह मौका जल्द ही मिल भी गया।

 
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