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मैं अपने माँ पापा की इकलौती संतान हूँ, मेरे पापा का गांव में खुद का बहुत बड़ा बिज़नेस है। मेरी हाइट 5’4″ है, रंग गोरा है, आँखें नशीली हैं, गुलाबी उभरे हुए गाल है, मखमली होंठ है, मेरे बाल लंबे हैं, लंबी नुकीली नाक है, छाती 34 की कमर 28 और नितम्ब 35 के हैं। मैं अपनी कमर में एक चांदी की चैन पहनती हूँ, पैरों में पायल और नाक में छोटी सी नथ पहनती हूँ।
बारहवीं की परीक्षा होने के बाद मेरा रिजल्ट आया। अच्छे मार्क्स होने की वजह से मेरा अच्छे कॉलेज में कॉमर्स शाखा में एडमिशन मिलना तय था। मैंने और मेरे परिवार ने दो तीन कॉलेज शॉर्टलिस्ट किये थे। बहुत सोचने के बाद मेरी माँ ने शहर के एक कॉलेज में मेरा एडमिशन कराने का फैसला किया।
उसकी दो वजह थी, एक तो उस शहर में मेरी मौसी रहती थी तो मुझे रहने की कोई प्रॉब्लम नहीं थी। और दूसरी बात के मेरी दादी अक्सर बीमार रहती थी तो मेरी मौसी हमेशा उसकी देखभाल करने गांव चली जाती थी, मेरे वहां होने से उनके पति के खाने पीने की टेंशन दूर हो जाती और मौसी भी ठीक से दादी का ख्याल रख पाती।
फिर एक दिन मैं और पापा एडमिशन लेने के लिए शहर आ गए। रात को ट्रेन में बैठ गए और सुबह शहर पहुँच गए। मेरे मौसी के पति जिन्हें मैं कर्नल अंकल बुलाती थी वह हमें लेने स्टेशन पर आ गए। फिर हम तीनों घर गए वहाँ फ्रेश हो कर कॉलेज एडमिशन लेने पहुंच गए, एडमिशन होने के बाद हम घर वापिस आ गए। हम सबने रात का खाना साथ में खाया, फिर पापा उसी रात की गाड़ी से वापस गांव चले गए।
मेरी मौसी स्कूल में टीचर थी पर दादी की बीमारी की वजह से उन्होंने स्वेच्छा से रिटायरमेंट ले ली, मौसाजी आर्मी में कर्नल रह चुके थे और अब रिटायर हो गए थे। उनका एक बेटा था उसकी शादी हो गयी थी, वो और उसकी बीवी दोनों अमेरिका में बस गए थे।
शहर में आने के बाद मैं, मौसी और मौसा जी पहले दो तीन दिन शहर घूमे, वाटर पार्क गए बहुत एन्जॉय किया।
फिर अगले हफ्ते से मैंने कॉलेज जॉइन किया और धीरे धीरे शहर की जिंदगी में घुलमिल गयी।
कर्नल अंकल की वजह से घर का माहौल बहुत स्ट्रिक्ट था। समय पर कॉलेज जाना, समय पर वापस आना, वो मेरी पढ़ाई पर भी काफी ध्यान देते थे। इस बीच दो तीन महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला, मौसी भी दो तीन बार छह सात दिन के लिए दादी के घर भी गयी थी। मैं शहर आयी उसी दौरान मौसी ने एक नौकरानी संगीता को काम पर रखा था, जिस वजह से मुझ पर काम का कोई बोझ ना पड़े और मेरी पढ़ाई अच्छे से हो सके।
पर जिस लड़की को हफ्ते में तीन चार बार चुदने का चस्का लगा हो उसको बिना चुदे नींद कैसे आएगी। मुझे अपने तीन चार बायफ़्रेंडस के मोटे लंड चुत में लेने की आदत सी हो गयी थी। कर्नल अंकल के स्ट्रिक्ट स्वभाव की वजह से मेरा लैंगिक कुपोषण हो रहा था। मेरी जवान बुर को लंड की जरूरत थी और वह ना मिलने से मैं मायूस रहने लगी थी। चुत में लगी आग को सहन ना होने के पर मैं स्टडी टेबल से उठ कर सीधा बाथरूम में गयी।
क्या दिन थे जब मैं मेरे बॉयफ़्रेंडस के साथ होटल के बाथरूम में शावर के नीचे भी चुदती थी और क्या आज का दिन है, मेरी चुत को तुरन्त लंड की जरूरत थी। चुदाई के ख्याल आते ही मैंने पहनी हुई नाईटी उतार दी, अंदर पहनी हुई डिजाईनर ब्रा और पैंटी में बहुत मादक लग रही थी। ब्रा से बाहर निकलने को बेताब हो रहे मेरे स्तनों को आईने में देख कर मैं खुद ही उनको ब्रा के ऊपर से मसलने लगी, जोश मैं मैंने ब्रा का हुक निकाल दिया।
मेरा दूसरा हाथ अपने आप ही मेरी पैंटी में घुस गया और मैं अपनी उंगली चुत में डाल कर अंदर बाहर करने लगी। धीरे धीरे मुझे पैंटी भी चुभने लगी, मैंने उसे भी उतार दिया। मैं बाथ टब में बैठ कर पूरे जोश में चुत में उंगली करने लगी, पर मेरी नाजुक उंगलियाँ मुझे वह सुख नहीं दे रही थी जो एक मजबूत लंड देता है। पर लंड ही तो नहीं था मेरे पास तो उंगली से ही मेरी चुत में लगी आग को शांत करने लगी, पर आग शांत होने का नाम नहीं ले रही थी।
क्या करूँ समझ नहीं आ रहा था, चुत की आग बढ़ने ही लगी थी, उसको लंड या लंड जैसी कोई चीज चाहिए थी। पर क्या??? कुछ समझ नहीं आ रहा था, बड़ी बैचनी हो रही थी। कुछ तो करना बहुत जरूरी था, अंदर क्या डालूं जिससे लंड वाली फीलिंग आये?
मैं सोच ही रही थी कि तभी मुझे ख्याल आया अंकल आज ही बाजार से कुछ सब्जियां लाये हैं। येस … येस … वह चीज बिल्कुल लंड के जैसी थी, और उसको मैं आराम से मेरी बुर के अंदर डाल सकती थी।
मैंने झट से पैंटी पहनी, ब्रा ढूंढी पर कहाँ फेंकी थी, पता ही नहीं चला तो बिना ब्रा के ही गाउन पहन लिया। मन तो कर रहा था कि नंगी ही किचन में चली जाऊँ और फ्रिज से वह चीज लेकर के रूम में आऊँ, घर में अंकल और मेरे अलावा कोई भी नहीं था, और अंकल भी जल्दी ही सोते हैं।
पर रिस्क न लेते हूए मैंने कपड़े पहन लिए।
बारहवीं की परीक्षा होने के बाद मेरा रिजल्ट आया। अच्छे मार्क्स होने की वजह से मेरा अच्छे कॉलेज में कॉमर्स शाखा में एडमिशन मिलना तय था। मैंने और मेरे परिवार ने दो तीन कॉलेज शॉर्टलिस्ट किये थे। बहुत सोचने के बाद मेरी माँ ने शहर के एक कॉलेज में मेरा एडमिशन कराने का फैसला किया।
उसकी दो वजह थी, एक तो उस शहर में मेरी मौसी रहती थी तो मुझे रहने की कोई प्रॉब्लम नहीं थी। और दूसरी बात के मेरी दादी अक्सर बीमार रहती थी तो मेरी मौसी हमेशा उसकी देखभाल करने गांव चली जाती थी, मेरे वहां होने से उनके पति के खाने पीने की टेंशन दूर हो जाती और मौसी भी ठीक से दादी का ख्याल रख पाती।
फिर एक दिन मैं और पापा एडमिशन लेने के लिए शहर आ गए। रात को ट्रेन में बैठ गए और सुबह शहर पहुँच गए। मेरे मौसी के पति जिन्हें मैं कर्नल अंकल बुलाती थी वह हमें लेने स्टेशन पर आ गए। फिर हम तीनों घर गए वहाँ फ्रेश हो कर कॉलेज एडमिशन लेने पहुंच गए, एडमिशन होने के बाद हम घर वापिस आ गए। हम सबने रात का खाना साथ में खाया, फिर पापा उसी रात की गाड़ी से वापस गांव चले गए।
मेरी मौसी स्कूल में टीचर थी पर दादी की बीमारी की वजह से उन्होंने स्वेच्छा से रिटायरमेंट ले ली, मौसाजी आर्मी में कर्नल रह चुके थे और अब रिटायर हो गए थे। उनका एक बेटा था उसकी शादी हो गयी थी, वो और उसकी बीवी दोनों अमेरिका में बस गए थे।
शहर में आने के बाद मैं, मौसी और मौसा जी पहले दो तीन दिन शहर घूमे, वाटर पार्क गए बहुत एन्जॉय किया।
फिर अगले हफ्ते से मैंने कॉलेज जॉइन किया और धीरे धीरे शहर की जिंदगी में घुलमिल गयी।
कर्नल अंकल की वजह से घर का माहौल बहुत स्ट्रिक्ट था। समय पर कॉलेज जाना, समय पर वापस आना, वो मेरी पढ़ाई पर भी काफी ध्यान देते थे। इस बीच दो तीन महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला, मौसी भी दो तीन बार छह सात दिन के लिए दादी के घर भी गयी थी। मैं शहर आयी उसी दौरान मौसी ने एक नौकरानी संगीता को काम पर रखा था, जिस वजह से मुझ पर काम का कोई बोझ ना पड़े और मेरी पढ़ाई अच्छे से हो सके।
पर जिस लड़की को हफ्ते में तीन चार बार चुदने का चस्का लगा हो उसको बिना चुदे नींद कैसे आएगी। मुझे अपने तीन चार बायफ़्रेंडस के मोटे लंड चुत में लेने की आदत सी हो गयी थी। कर्नल अंकल के स्ट्रिक्ट स्वभाव की वजह से मेरा लैंगिक कुपोषण हो रहा था। मेरी जवान बुर को लंड की जरूरत थी और वह ना मिलने से मैं मायूस रहने लगी थी। चुत में लगी आग को सहन ना होने के पर मैं स्टडी टेबल से उठ कर सीधा बाथरूम में गयी।
क्या दिन थे जब मैं मेरे बॉयफ़्रेंडस के साथ होटल के बाथरूम में शावर के नीचे भी चुदती थी और क्या आज का दिन है, मेरी चुत को तुरन्त लंड की जरूरत थी। चुदाई के ख्याल आते ही मैंने पहनी हुई नाईटी उतार दी, अंदर पहनी हुई डिजाईनर ब्रा और पैंटी में बहुत मादक लग रही थी। ब्रा से बाहर निकलने को बेताब हो रहे मेरे स्तनों को आईने में देख कर मैं खुद ही उनको ब्रा के ऊपर से मसलने लगी, जोश मैं मैंने ब्रा का हुक निकाल दिया।
मेरा दूसरा हाथ अपने आप ही मेरी पैंटी में घुस गया और मैं अपनी उंगली चुत में डाल कर अंदर बाहर करने लगी। धीरे धीरे मुझे पैंटी भी चुभने लगी, मैंने उसे भी उतार दिया। मैं बाथ टब में बैठ कर पूरे जोश में चुत में उंगली करने लगी, पर मेरी नाजुक उंगलियाँ मुझे वह सुख नहीं दे रही थी जो एक मजबूत लंड देता है। पर लंड ही तो नहीं था मेरे पास तो उंगली से ही मेरी चुत में लगी आग को शांत करने लगी, पर आग शांत होने का नाम नहीं ले रही थी।
क्या करूँ समझ नहीं आ रहा था, चुत की आग बढ़ने ही लगी थी, उसको लंड या लंड जैसी कोई चीज चाहिए थी। पर क्या??? कुछ समझ नहीं आ रहा था, बड़ी बैचनी हो रही थी। कुछ तो करना बहुत जरूरी था, अंदर क्या डालूं जिससे लंड वाली फीलिंग आये?
मैं सोच ही रही थी कि तभी मुझे ख्याल आया अंकल आज ही बाजार से कुछ सब्जियां लाये हैं। येस … येस … वह चीज बिल्कुल लंड के जैसी थी, और उसको मैं आराम से मेरी बुर के अंदर डाल सकती थी।
मैंने झट से पैंटी पहनी, ब्रा ढूंढी पर कहाँ फेंकी थी, पता ही नहीं चला तो बिना ब्रा के ही गाउन पहन लिया। मन तो कर रहा था कि नंगी ही किचन में चली जाऊँ और फ्रिज से वह चीज लेकर के रूम में आऊँ, घर में अंकल और मेरे अलावा कोई भी नहीं था, और अंकल भी जल्दी ही सोते हैं।
पर रिस्क न लेते हूए मैंने कपड़े पहन लिए।