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यकीन करना मुश्किल है compleet

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Guest
यकीन करना मुश्किल है



दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक ओर नई कहानी लेकर हाजिर हूँ वैसे तो आप सब मेरे द्वारा पेश की गई कहानियो को पसंद करते हैं लेकिन अपने विचार बहुत कम प्रकट करते हैं दोस्तो अगर कहानी पढ़ने के साथ साथ अगर आप अपने कमेंट दें तो सोने पे सुहागा वाली बात होगी . क्योंकि किसी ने कहा है चरसी यार किसके दम लगा के खिसके .

इसका मतलब है कहानी पढ़ी पसंद भी आई लेकिन कोई कमेंट नही दिया . तो भाई अब तो ऐसा मत करो . दोस्तो आरएसएस ( राजशर्मास्टोरीज ) को अगर एक अच्छी और उम्दा साइट बनाना है तो अपना सहयोग ज़रूर दें . ताकि जो भी राइटर अपनी कहानी यहाँ पोस्ट करे उसे कमेंट मिलते रहे .

मेरा नाम आरा है. मैं उस वक़्त 21 साल की थी और उस वक़्त मैने बी.ए. पास कर लिया था. मेरे घर मे शुरू से ही लड़कियो को अकेले बाहर जाने की इजाज़त नही है. मैं एक लोवर मिड्ल क्लास की लड़की हूँ और बड़े ही साधारण से परिवार से हूँ. हम वही लोग हैं जो एक छोटे से कस्बे मे अपनी सारी उमर बिता देते हैं. हम मोटर साइकल ही अफोर्ड कर सकते है.

मैं भी एक आम लड़की जिसकी आम सी सहेलिया और आम सी ज़िंदगी थी. मैने बी.ए प्राइवेट किया है और मैं इंग्लीश मे अच्छी नही हूँ.

मेरी ज़िंदगी मे मैं अपने शौहर,देवर, ससुर और भाई से संबंध बना चुकी हूँ. इस बात पर यकीन करना बड़ा मुश्किल है लेकिन यही मेरी ज़िंदगी है. मैं तो सिर्फ़ अपने शौहर को ही अपना जिस्म देना चाहती थी लेकिन कुदरत के खेल मे फँस कर हार कर रह गयी.

आज जब मैं पीछे देखती हूँ तो सिर्फ़ तकलीफ़ के कुछ और नही पाती. रोना मेरी किस्मत और लुटना मेरी किस्मत की लकीर बन गयी है.

आज भी याद है मुझे सब मेरे ससुराल वाले मुझे देखने आए थे.

लालची लोग लेकिन बातो से शरीफ.

मैं अपने मा बाप की एकलौती लड़की हूँ और अपने बड़े भाई से छोटी हूँ.
 
ये बात करीब एक साल पहले की है, मेरे इम्तेहान का रिज़ल्ट आ चुका था. मैने बी.ए. पास कर लिया था, घर मे सब ने राहत की साँस ली. ऐसा नही था कि मेरी पढ़ाई पर ज़्यादा खर्चा हो रहा था लेकिन लड़कियो की पढ़ाई से फ़ायदा ही क्या होता है.

मैं खुश थी.

मेरी मा मुझे पढ़ाने के लिए बिल्कुल राज़ी ना थी. मैने भी ज़्यादा ज़िद्द नही की.

मा मेरी शादी के लिए बाबा को रोज़ कहने लगी,मेरे भी अरमान थे कि मैं कुछ बन जाउ लेकिन फिर मैं खामोश हो गयी.

फिर एक दिन ऐसा आया जब मुझे देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे. मैं थोड़ा घबरा सी गयी, मा तो मुझसे भी ज़्यादा घबराई हुई थी. मेरे पहनने के लिए कोई नये कपड़े भी ना थे. मैने अपनी खाला ज़ाद बहेन जो मेरी ही उमर और मेरे ही डील डौल की थी उससे कपड़े लिए. मेरी खाला जो मुझसे कई मकान दूर रहती थी घर पर आ गयी. उनका नाम हिना है. मेरी मा हयात उनको बहुत मानती हैं. खाला हिना पैसे के मामले मे हम से थोड़ा बेहतर हैं. उनके शौहर दिलशाद की सेमेंट की एजेन्सी है. मेरी खाला ने मेरी मा से कहा कि मुझसे कस्बे के ब्यूटी पार्लर भेज दें ताकि मैं खूबसूरत लगूँ. सुबह के 9 ही बजे थे. मेरी मा ने मुझे मेरे भाई के साथ कस्बे के एकलौते ब्यूटी पार्लर भेज दिया. मैं पहली बार ब्यूटी पार्लर गयी थी. वहाँ पर पहले से ही दो लड़किया थीं जिनके चेहरे पर कुछ लगा हुआ था. मैं अंदर दाखिल हुई तो, ब्यूटी पार्लर की लड़किया मुझे देखने लगी. उन्होने मुझे सर से पैर तक देखा और उनके चेहरे पर एक हसी सी आ गयी. शायद वो मुझपर और मेरी ग़रीबी पर हंस रही थी. एक लड़की जो लंबी सी थी उसने मुझे पूछा क्या करवाना है? क्या शादी के लिए तैय्यार होना है? मैने कहा की नही लड़के वाले देखने आ रहे हैं. मेरी इस बार पर वो दो लड़किया वो पहले ही से कुर्सी पर बैठी थीं खिलखिला कर हंस पड़ी. मैं शर्मसार सी हो गयी. जाने क्यूँ हम लोवर मिड्ल क्लास के लोग हर बात पर शर्मिंदा हो जाते हैं.चाहे हमारी ग़लती हो या ना हो. ये अमीर लोग और रुतबे वाले अगर कोई बात ज़ोर से कहें तो हम उनकी बात मान लेते हैं. हमारा मुल्क चाहे गुलामी से आज़ाद हो गया हो लेकिन हम अपनी ग़रीबी से अभी तक आज़ाद नही हुए.

मुझे कोने मे पड़े एक सोफे बार बैठ कर इंतेज़ार करना का इसारा किया गया. कुछ देर बाद एक और लड़की पार्लर मे दाखिल हुई. मुझसे एक खाली पड़ी कुर्सी पर बैठने को कहा गया. उस लड़की ने मुझसे वही सवाल किया ही था कि पहले से मौजूद दो लड़कियो मे से एक ने कहा कि मेडम को लड़के वाले देखने आ रहे हैं लेकिन इस बात पर इस लड़की हो हसी नही आई. वो तुनक कर बोली कि इन "लोगो ने लड़कियो को बाज़ार मे सजी हुई एक चीज़ समझ रखा है".

फिर वो शुरू हो गयी मेरी चेहरे,गर्दन,पैर के नाख़ून, हाथ के नाख़ून, पॅल्को और ना जाने क्या क्या. मुझे एहसास ही नही था कि ये सब भी होता है.

खैर काफ़ी टाइम बाद उन्होने मुझे 850 रुपये माँगे, जो मैने अपने भाई आरिफ़ जो बाहर खड़ा था उससे ले कर पार्लर वाली लड़कियो को दे दिए.

घर पहुँची तो घर को पहचान ना पाई, घर मे कुछ फूलों के गमले, नयी चद्दर,नया फर्निचर था. ये सब मेरी खाला के यहाँ से आया था.
 
कुछ ही देर मे लड़के वाले आ गये, मेरा तो मारे घबराहट के बुरा हाल था,

ये एक ऐसी फीलिंग होती है जो सिर्फ़ एक लड़की ही जान सकती है, ऐसा महसूस होता है कि हम लड़कियो की ज़िंदगी बाज़ार मे बिकती किसी बकरी की तरहा होती है जिसे देख कर टटोल का कोई कसाई पसंद करता है और अगर कसाई को ना पसंद आए तो बकरी का मालिक बकरी को ही लताड़ लगता है.

मुझे अपनी होने वाली सास और ननद के पास चाइ लेकर जाना था. मुझे सब कुछ मेरी खाला ने समझा दिया था, मैं जब जनानखाने मे पहुँची तो सब ही मुझे घूर कर देख रहे थे. मैने नाश्ता वगेरा रख और पास पड़ी एक कुर्सी पर बैठ गयी.

मेरी होने वाली सास एक मोटा चस्मा लगाए मेरी तरफ घूर रही थी, उसकी आँखे बड़ी बड़ी थीं और वो एक मोटी औरत थी, बालो मे सफेदी आ चुकी थी, सूट सलवार कुछ ख़ास नही था, हाथो मे सोने के कंगन और कानो मे मोटी मोटी बालिया. आँखो मे एक दम रुबाब, उसको अपनी तरफ घूरता हुआ देखा तो ऐसा लगा जैसे कोई दारोगा किसी मुजरिम की पहचान कर रहा हो.

उसके साथ उसी की शक्ल की उसकी बेटी थी जो बहुत ज़्यादा सज धज के आई थी, ये पतली दुबली सी लड़की थी जिसकी गोद मे कोई 2 साल का एक बच्चा था. ये थोड़ा खुश मिजाज़ लग रही थी, अपनी मा की तरहा इसके नयन नक्श तीखे थे.

इतने मे उसकी मा ने मुझसे पूछा कि "बेटी आरा कहाँ तक पढ़ी हो"

इसका जवाब मेरी खाला ने दिया "जी बी.ए किया है"

इसपर उस औरत ने मेरी खाला को घूरा जैसे कोई नापसंद बात कह दी गयी हो और लगभग फटकार लगाते हुए जवाब दिया की "बहेनजी ज़रा बच्ची को भी बोलने दीजिए"

फिर मेरी तरफ मुखातिब होकर कहा कि "बताओ मेरी बच्ची कहाँ तक पढ़ी हो"

मैने जवाब दिया "जी बी.ए. कर चुकी हूँ"

मेरी होने वाली सास "प्राइवेट किया है"

मैं: "जी"

मेरी होने वाली सास "आगे पढ़ना नही चाहती हो"

मैं: "जी इतना काफ़ी है"

मेरी होने वाली सास "क़ुरान पढ़ी हो"

मैं: "जी"

मेरी होने वाली सास: "खाना पकाना, कढ़ाई सिलाई जानती हो"

मैं: "जी"

मेरी होने वाली सास: "बहुत अच्छी बात है, अच्छा ज़रा मेरे लिए थोड़ा ठंडा पानी ले आओ"

मैं : "जी अभी लाती हूँ"

ये कहकर मैं बाहर आ गयी.

कुछ घंटो बाद वो लोग चले गये. मैं अपनी मा से जानना चाहती थी कि वो लोग क्या कह गये हैं लेकिन शर्म की वजह से कुछ ना पूंछ पाई. मा ना तो खुश थी और ना ही परेशान लग रही थी.

इसी तरहा कुछ दिन बीत गये और एक सुबह मेरी खाला हिना मेरी अम्मा के पास आई और बड़ी खुश लग रहीं थी. उन्होने आते ही मेरी मा को गले से लगा लिया और कहा "उन लोगो ने हां कह दी है और वो लोग जल्द तारीख पक्की करना चाहते है"

इसपर मेरी मा ने पूछा "उन लोगो की कोई ख़ास माँग वगेरा",

खाला "अर्रे नही, उन लोगो का यही कहना है कि बच्ची बड़ी खूबसूरत और सेहतमंद है और उन्हे कुछ ख़ास नही चाहिए".

अम्मा "चलो बड़े खुशी की बात है"

खाला "" और क्या, वरना आज कल तो 4 पहिए की गाड़ी का चलन निकल आया है"

मेरे आबू जो दूर बैठे थे कहने लगे "वो लोग तो हां कह गये लेकिन हमको भी एक बार लड़के को देख लेना चाहिए कि कैसा है"

मेरा भाई भी इस चर्चा मे जुड़ गया "बाबा बिकुल सही कह रहे हैं"

खाला "ठीक है तो मैं उनसे कहलवा देती हूँ कि हम लड़के से मिलना चाहते हैं"

कुछ दिनो बाद हमारे यहाँ के लोग वहाँ गये और शाम को जब लौट कर आए तो ज़्यादा खुश नही दिख रहे थे.

मैं कुछ पूछना मुनासिब नही समझा. रात को खाने के वक़्त भाई बोल पड़ा

"बाबा मुझे वो लड़का अच्छा नही लगा"

बाबा "क्यूँ,क्या ऐब है बेचारे में?"

आरिफ़ मेरा भाई "बाबा उसकी आँखें देखी, पूरा चरसी लगता है वो"

बाबा "तुझे कैसे यकीन है"

आआरिफ :"बाबा मैं कई ऐसे लड़को को जानता हूँ जो इसी आदत मे मुब्तिल हैं"

बाबा "अच्छा अच्छा खाना खा ले,बड़ा डाक्टर बना फिरता है"

अम्मा: "लड़के की बहेन बड़ी चालाक और लालची लग रही थी,कह रही थी कि लड़के के बड़े भाई के यहाँ से उसके मिया के लिए मोटर साइकल आई थी"

बाबा: "अर्रे खाक डालो उसपर, हमारे पास इतनी रकम नही है कि लड़के की बहेन को दहेज दे दें, मेरी आरा के ससुर से बात हो चुकी है वो सिर्फ़ लड़के के लिए मोटर साइकल और तमाम चीज़ें जो चलन मे है वही चाहते हैं"

अम्मा : "तो तारीक़ क्या तय हुई है?"

बाबा: "अगले महीने की 25 तारीख"

अम्मा: "यही लगभग एक महीना?"

बाबा: "हां इतना काफ़ी है,एक हफ्ते मे फसल के पैसे आ जायें गे और फिर तैयारी सुरू हो जाएगी"

अम्मा: "चलो ऊपर वाला खैर करे मेरी बच्ची पर"

 


फिर वो दिन भी आ गया जब मैं दुल्हन बनी थी, सुबह से ही कलेजा मूह को आ रहा था. मेरी खाला की शादी शुदा लड़की यानी मेरी बहेन मेरा पास अकेले मे कुछ कहने आई उसका नाम रीना है.रीना मुझसे 2 साल बड़ी है

रीना "आरा मैं तुझ से वो कुछ कहना चाहती हूँ जो तुझे मालूम होना चाहिए"

मैं: "ऐसा क्या कहना चाहती है कि मुझे अकेले मे ले आई"

रीना: "ध्यान से सुन और अपनी गाँठ बाँध ले"

मैं: "अब बक भी क्या कहना चाह रही है"

रीना: "आज की रात के बारे में" ये कहकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

मैं: "चल पगली, हट यहाँ से"

रीना: "ये कोई मज़ाक नही है अगर ये नही जानेगी तो हो सकता है रोना पड़े"

मैं:"मुझे नही जानना ये सब, तू दिमाग़ मत खा"

रीना: "शूकर कर मैं तुझे बता रही हूँ, ये बात मुझे मेरी सहेलियो ने बताई थी"

मैं "क्या बताई थी?"

रीना: "आज की रात मियाँ बीवी का मिलन होता है"

मैं : "तो इसमे कौनसी नयी बात है"

रीना: "पगली, दो जिस्मो का मिलन होता है और तुझे मालूम होना चाहिए कि मिया क्या क्या करता है और उसको क्या नही करना चाहिए"

मैं:"क्या बक रही है?"

रीना:"देख, आज की रात के बाद तू कुँवारी नही रहेगी और आज तेरा कुँवारापन चला जाएगा"

मुझे ठीक से तो नही पता था लेकिन रीना की बातो से मैने कुछ कुछ अंदाज़ा लगा लिया था.

रीना: "आज तेरी गुलाबो से हो सकता है खून निकल पड़े या थोड़ा ज़्यादा दर्द हो लेकिन तुझे आज सब बर्दाश्त करना पड़ेगा"

हम लड़किया अपनी शरमगाह को गुलाबो कह कर पुकारती थी, रीना पहले से ही मुझसे खुली हुई थी और अपनी सुहागरात की दास्तान मुझे पहले ही सुना चुकी थी, मैं ये सब नही सुनना चाहती थी लेकिन फिर भी मुझे सुनना पड़ा.

मैं: "मुझे तू पहले ही ये सब बता चुकी है"

रीना: "इतना ध्यान रखना कि तेरा मिया तेरे पिछवाड़े मे शरारत ना करे"

मैं: "तू जा अब, बहुत हो चुकी ये सब बातें"

शाम को शादी की सारी रस्मे ख़तम हो चुकी थीं और मैं विदा होकर अपने ससुराल के सजे हुए कमरे मे बैठी थी और वहाँ पर पहले से ही काफ़ी औरतें मौजूद थी, सब मुझे मूह दिखाई के नेग दे कर एक एक करके जा रहीं थी,

ये कमरा काफ़ी सज़ा हुआ था, ये कमरा घर के कोने मे था, ये एक बड़ा सा खुला हुआ घर था, जिसमे कई कमरे थे वो बरामदे मे आकर जुड़ते है,सभी कमरे एक ही लाइन मे थे और सबका एक ही कामन किचन था. घर के कई बाथरूम और टाय्लेट थे.

मुझे अपने मिया का नाम ही मालूम था. उनका नाम शौकत था और वो बॅटरी और इनवेर्टर का काम करते थे.

आख़िर देर रात तक मैने अपने मिया का इंतेज़ार किया करीब 12 बजे वो मेरे कमरे मे दाखिल हुए. वो एक औसत दर्जे की हाइट के दुबले पतले से इंसान थे.

जैसी ही वो कमरे मे दाखिल हुए मेरी साँसें तेज़ हो गयी,मुझे इतना याद है कि वो आते ही मेरी तरफ बैठ गये,

उनका पास से सख़्त बू आ रही थी जो शराब की थी.

मुझे शराब से नफ़रत थी लेकिन मैं आज की रात को बर्बाद नही करना चाहती थी.

उन्होने मेरा घूँघट हटाया और कहा "बला की खूबसूरत हो"

मैं ये सुनकर थोड़ी की खुश हुई और शर्म से लाल हो गयी लेकिन इससे पहले की कुछ हो पाता वो लुढ़क कर बिस्तर पर गिर गये.

मुझे एक झटका सा लगा और मैं सोच मे पड़ गयी कि क्या यही वो रात है जिसका हर लड़की इंतेज़ार करती है. अब मैं रोना चाहती थी लेकिन रो भी ना सकी, मेरे बेचारे मा बाप जिन्होने इतनी मेहनत के साथ मेरी शादी की रकम जमा की थी, मेरी मा जो बेचारी डाइयबिटीस की मरीज़ है, अपना इलाज करवाने की बजाई मेरे लिए कुछ ना कुछ जोड़ती रहती थी, बड़े अरमान से मेरी शादी कर चुकी थी, मेरा बाबा जिनके कंधे मे अक्सर दर्द रहता था क्यूंकी वो जब खेती का काम नही होता था तो ट्रक चलाया करते थे और दिन रात मेहनत करते थे.

उन सब लोगो का चेहरा मेरे सामने घूम रहा था. बड़ा भाई भी अपनी पढ़ाई बीच मे रोक कर मेरे दहेज के सामान के लिए काम कर रहा था, रात भर वो भी

अपनी कलम घिस कर अपनी किताबों मे गुम रहता.

इन सब लोगो की ज़िंदगी हमसे जुड़ी हुई थी. मैं किसी तरह अपने शराब मे डूबे शौहर को सुला कर सो गयी.

सुबह जब दरवाज़े पर मेरी ननद ने दस्तक दी तो मैं जाग गयी.

मैने उसे अंदर आने को कहा.उसका नाम सबा था.

ये वही लड़की थी जो मुझे मेरे घर मे अपनी मा के साथ देखने आई थी.
 
सबा ने आते ही अंदर बिस्तर पर चारो तरफ देखा और फिर मेरी तरफ देखा, उसके चेहरे पर मायूसी और थोड़ी परेशानी नज़र आई फिर मेरी पास आकर कहा कि नाश्ता तैयार है आप नाश्ता कर लीजिए.

मैं उठी और कमरे से जुड़े बाथरूम की तरफ बढ़ गयी, इस बाथरूम के लिए मुझे अपने कमरे से थोड़ा बाहर जाना पड़ा. बाहर मेरी सास तख्त पर बैठी क़ुरान पढ़ रही थीं.

मेरी नज़र उनसे मिली फिर मैं बाथरूम की तरफ बढ़ गयी. शादी वाला घर था, दूर से आए हुए मेहमान अभी भी घर मे ही थे, मैं अपने साथ कुछ कपड़े लाई थी जो मैने नहा कर पहेन लिए और जब कमरे मे वापस गयी तो मेरे मिया अभी भी सो रहे थे. मैं खामोश होकर बिस्तर के कोने मे बैठी रही. कुछ देर बाद मेरी सास मेरे कमरे मे आ गयी और अपने बेटे को उठाने लगी. लेकिन वो कहाँ उठने वाले थे.

मेरी सास मुझे दूसरे कमरे मे ले गयी और वहाँ मैने उनके साथ नाश्ता किया.

वालीमा का दिन था. ये दावत लड़के वालो की तरफ से लड़की वाले और तमाम रिश्तेदारो के लिए होती है. इसमे मेरी मा और मेरे घरवाले सभी आए.

मेरी बहन रीना मुझसे मिलने के लिए बेताब थी. लेकिन मैने किसी पर ये ज़ाहिर नही होने दिया कि मेरे साथ रात मे क्या हुआ था. ये एक शर्म और सदमे वाली बात थी जिसे मैं किसी से शेअर नही करना चाहती थी. बनावटी मुस्कान के पीछे रात की खलिख और भयानक अंधेरा छुप गया. रात के राज़ राज़ ही रहे और दुनिया मे एक और लड़की सब की खातिर क़ुरबान हो गयी. लड़किया हमेशा से ही क़ुरबान होती रही हैं, क़ानून और मज़हब चाहे कितना ही क्यूँ ना उन्हे हक़ दे लेकिन मर्दो के इस समाज मे औरतें हमेशा क़ुरबान ही होती रही हैं.

धीरे धीरे सब मेहमान जाने लगे. मेरी सास ज़्यादा तर खामोश ही रही.

शाम हो चुकी थी,मेरे मियाँ अब अपने दोस्तो के साथ आँगन मे बैठे बात चीत कर रहे थे.

रात को मेरी ननद सबा मेरे कमरे आ आई और कहने लगी.

"भाभी मैं जानती हूँ कि शायद आपकी पिछली रात ख़ुशगवार नही गुज़री थी,हमारे यहाँ मेरे भाई बड़ी परेशानी से गुज़र रहे है और शायद इसलिए वो शराब पी लेते हैं लेकिन यकीन मानो वो शराबी नही हैं, अब्बा तो उन्हे कई बार पीट भी चुके हैं लेकिन वो कभी कभी अपनी शराब वाली हरकत दोहरा ही देते हैं"

मैं: "शायद मेरी यही किस्मत है"

और मैं ये कहकर फूट फूट कर रोने लगी.सबा मेरे करीब आई और मुझे अपने सीने से लगा कर मुझे चुप करने लगी.

सबा "भाभी हम सब इस बात पर खुश नही हैं, अम्मा पर जैसे कहेर ही टूट पड़ा है, सुबह से उन्होने कुछ नही खाया है, हम ने ये सोचा कि एक खूबसूरत बीवी के प्यार से शायद शौकत (मेरे मिया का नाम) सुधर जाए,"

मैं "आप परेशान ना हो, शायद ऐसा ही हो"

सबा: "मेरी प्यारी भाभी, आप का कितना बुलंद हौसला हैं"

मैं: "और इस हालत मे एक लड़की कर भी क्या सकती है"

इतने मे बाहर से मेरी सास की आवाज़ आई तो मैं आँसू पोछ कर सही तरीके से बैठ गयी.

मेरी सास मेरे करीब आकर बैठ गयी, उन्होने इस वक़्त अपना मोटा चस्मा नही पहना था और वो बड़ी शर्मिंदा सी लग रहीं थी, ये वो औरत नही लग रहीं थी जो मुझे देखने आई थी, ये तो कोई मज़लूम बेसहारा सी एक ख़ौफजदा सी ज़माने की सताई औरत की तरहा लग रही थीं, उन्होने मेरी तरफ इस तरहा देखा जैसे वो अपने किसी गुनाह के माफी माँग रही हों.

उन्होने आते ही सबा को बाहर जाने का इशारा किया.

सबा के जाते ही वो भी मुझसे लिपट गयी. और एक मा की तरहा मेरे सर पर बोसा दिया.

फिर कहने लगी

"मेरी बच्ची मैं तुझे यकीन दिलाती हूँ कि मैं तेरी ज़िंदगी बर्बाद नही होने दूँगी बस यकीन रख और थोड़ा वक़्त दे"

मैं: "अम्मी आप इस तरहा रोए नही और कुछ खा लें , मुझे उम्मीद है कि मेरे साथ बुरा नही होगा"

सास "शाबाश बेटा, तुझसे यही उम्मीद है"
 
फिर रात आ गयी और मेरे शौहर फिर मेरे कमरे मे दाखिल हुए. मैं अभी लेटी ही थी कि उनकी आवाज़ आई "सो गयी क्या तुम?"

और मैं घबरा कर उठ गयी और उनकी तरफ देखा. आज मुझे कोई और इंसान नज़र आया. ये तो मेरे शौहर ही थे लेकिन आज नशे मे नही लग रहे थे. नशा इंसान को क्या से क्या बना देता है.

ये इंसान औसत कद काठी का था. नाक बिल्कुल लंबी और सीधी, आँखें लाल और बड़ी बड़ी और चेहरे पे हल्की सी मुस्कुराहट. ऐसा लगता था कि वो मुझसे कह रहा हो कि कहाँ सो गयी थीं. उनकी मुस्कुराहट ने जैसे मेरे सारे घाव भर दिए.

एक औरत को अपने शौहर से चाहिए ही क्या होता है, बस रो जून की रोटी और थोड़ा सा प्यार. इसमे ही वो अपनी जन्नत ढूँढ लेती है और इसके सिवा उसे किसी और चीज़ की चाहत नही होती.

मेरे शौहर मेरे सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे और मैं सर झुकाए बिस्तर पर खामोशी से दिल की धड़कन को रोकने मे लगी थी.

पता ही नही चला कि कब वो मेरे सामने आकर बैठ गये और मेरी ठोडी उठा कर मेरी गहरी डूबी हुई आँखो को फिर से उभारने लगे.

मैं खुश थी लेकिन थोड़ी घबराई हुई थी. एक एक पल जैसे पहाड़ मालूम पड़ रहा था,मैं कमरे मे सुई के गिरने की आवाज़ सुन सकती थी,

एक हसीन लम्हा धीरे धीरे मेरी पॅल्को के नीचे से गुज़र रहा था.इतने मे मुझे मेरे हसीन ख्वाब से मेरे शौहर ने जगा दिया.

उन्होने हल्के से लहजे मे कहा

"कितना बेवकूफ़ हूँ मैं जो शराब का नशा करता हूँ मुझे तो इन आँखो का नशा करना चाहिए"

"आरा हैं ना तुम्हारा नाम"

मैं: जी

शौकत: मुझे कल पी कर नही आना चाहिए था, दर असल मेरे दोस्तो ने मुझे ज़बरदस्ती पिला दी, कम्बख़्त कहीं के, तुम मुझसे नाराज़ तो नही हो?

मैं: नही तो

शौकत: "झूठी कहीं की, ऐसा भी कभी होता है कि,बीवी शौहर के पीने पर नाराज़ ना हो"

मैं:"मैं आपके शराब पीने पर नही बल्कि आपके मुझे गौर से देखे बिना ही सो जाने पर परेशान थी"

शौकत: "हां, होना भी चाहिए, आख़िर बीवी बन कर आई हो, लेकिन जानती हो मैं शराबी नही हूँ और किसी को मारना पीटना गाली गलोच करना मेरी फ़ितरत नही है"

मैं: जी

शौकत: बचपन से ही मैं लगातार हारता रहा हूँ, कई चीज़ें मैं जानबुझ कर हारा,कई चीज़ें ना चाहते हुए भी लेकिन मैं हारता ज़रूर रहा हूँ.

मैं: क्या मैं आपसे एक सवाल कर सकती हूँ

शौकत: क्यूँ नही, पूछो

मैं: क्या आप किसी और से मोहब्बत करते हैं?

शौकत: हां.

ये सुनकर मेरे पैरो तले ज़मीन खिसक गयी, अब यही इंसान जो मुझे प्यारा लगने लगा था, जो दो जुमलो से मुझे जन्नत दिखा रहा था, एक ही हां से मुझे और मेरे वजूद को हिला गया, मैं बेशख्ता ही अचानक सर उठा कर उन्हे देखने लगी,इसपर वो खिल खिला कर हंस पड़े और

शौकत: अर्रे भाई मैं अपने मा बाप, भाई बहेन, रिश्तेदार सब से मोहब्बत करता हूँ.

मैं: नहीं मैं कुछ और पूछ रही थी.

शौकत: जानता हूँ, मैने मोहब्बत की थी अपने स्कूल की एक लड़की से, लेकिन कभी ज़बान पर नयी आ पाई,वो बड़े घर की लड़की थी और दूसरे मज़हब की, बस दिल मे

था कि उससे बात करूँ, वो थी ही इतने खूबसूरत.

मैं: तो क्या मैं खूबसूरत नही हूँ

शौकत: तुम तो एक बला हो, मुझे तो यकीन ही नही होता कि एक इतनी खूबसूरत हसीन लड़की मेरी ज़िंदगी मे आई है, अब दिल चाहता है कि तुम्हारे दामन मे सर रख कर खूब रोया जाए और अपने दिल के सारे राज़ खोल दिए जायें, मैं तुममे अपनी ख़ुसी और ज़िंदगी तलाश करना चाहता हूँ, बोलो दोगि मेरा साथ

मैं: जी बिल्कुल

शौकत: मुझे इतनी जल्दी समझना आसान नही है, खैर अगर तुम्हे नींद आ रही है तो सो जाओ.

मैं खामोश रही.

शौकत: क्या तुम,,,,क्या मैं,,,

मैं: क्या कहना चाहते हैं?

शौकत: मुझसे नही कहा जाता,,उफ़फ्फ़

मैं: क्या नही कहा जाता

शौकत: मैं तुम्हे अपने सीने से लगा कर सोना चाहता हूँ.

मैं खामोश रही.

शौकत: शायद लड़की की खामोशी मे हां होती है.

ये बात उन्होने इतनी मासूमियत से कही कि मुझे हसी आ गयी.

शौकत: हँसी तो फँसी.

मैं अब खिल खिला का हंस पड़ी.

 
उन्होने मुझे अचानक से अपनी बाहों मे खींच लिया और सीधा मे गालो को चूमने लगे और फिर मुझे बिस्तर पर लिटा कर मुझसे कस कर चिपक गये, मैं इस के लिए तैयार ना थी और उनसे कहने लगी कि मैं अपने गहने उतार लेती हूँ.

इस पर उन्होने मुझे अलग कर दिया और मेरी तरफ देखने लगे, मैने उन्हे देखे बिना अपने सारे ज़ेवर उतार कर अलमारी मे रख दिए और बिस्तर पर उनके करीब आ कर लेट गयी. उन्होने मुझे फिर से बाहों मे कस लिया और उनके हाथ मेरी पीठ पर थे और धीरे धीरे वो मेरे टॉप के बटन खोलने लगे.मैने हाथ पीछे लेजकर उन्हे रोकना चाहा ही था कि उन्होने अपने एक हाथ से मेरे हाथ रोक लिए. अब चेहरे से अपने होंठ हटा कर उन्होने मेरे होंठो पर अपने होंठ रख दिए और मेरे निचले होंठ को अपने उपर के होंठ से चूसने लगे, मेरे सारे बदन मे झुरजुरी सी होने लगी, आज तक किसी ने मेरे होंटो पर इस तरहा किस नही किया था, मैं भी उनका साथ देने लगी, अब उन्होने मेरे टॉप के सारे बटन खोल दिए थे और अब मेरे टॉप को निकालना चाहते थे,इसके लिए उन्होने मुझे थोड़ा दूर किया तो मेरी आँखें उनकी आँखो से मिली और मैने शरमा कर अपनी आँखें बंद कर दी. एक झटके मे मेरा टॉप उतर गया और फिर दोबारा उन्होने उसी तरहा मेरी ब्रा के हुक भी खोल दिए और मेरी ब्रा को मेरे बदन से आज़ाद किया. मैने अपने दोनो हाथ अपने सीने पे लगा लिए लेकिन उन्होने फिर बड़ी तेज़ी से मेरे हाथ हटा दिए. मैं बहुत शर्म महसूस कर रही थी,

लेकिन अब उनका ध्यान मेरी आँखो पर नही बल्कि मेरे नंगे सीने पर था.

अब उनके हाथ मेरे नर्म सीने पर आ गये, जिससे मेरी मूह से अया सीईईईईई की आवाज़ आई.

अब उन्होने मुझे मेरी पीठ के बल लिटा दिया और मेरे निपल्स पर अपना मूह रख दिया, ऐसा अहसास मुझे पहले नही हुआ था, अब मैं अपने आपे मे ना रही और उनके सर को अपने सीने मे दबाने लगी ऐसा लगा जैसे मैं किसी तेज़ धारा मे बही जा रही हूँ. उनका एक हाथ मेरे दूसरे सीने पर था.

मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी शर्म गाह मे से कुछ रिस रहा है. अब उन्होने मेरी लहगे के नाडे मे हाथ डाला जिसके लिए मैं तैयार ना थी, एक झटके मे मेरा लहगा खुल गया.

वो अब उठ गये और मेरे लहगे को नीचे कर दिया. मेरे जिस्म पर पर मेरी पैंटी के अलावा कुछ ना था, उन्होने एक नज़र मेरी सफेद टाँगो को देखा और फिर मेरी पैंटी की एलास्टिक को पकड़ कर मेरी पैंटी नीचे करने लगे, मैने कस कर अपनी पैंटी को पकड़ लिया लेकिन उनकी ज़िद के आगे कुछ ना कर सकी.

तुरंत उन्होने मेरी टाँगो के बीच बैठ कर मेरी पैंटी नीचे सरका दी.

अब मैं बिस्तर पर बिल्कुल नंगी लेटी थी और दोनो हाथो से अपना मूह छिपाए थी. मैं शर्म से गढ़ी जा रही थी. आज तक मुझे किसी ने ऐसी हालत मे देखो हो ये मुझे याद नही है. कुछ देर वो इसी तरहा देखते रहे और एक उंगली मेरी टाँगो के बीच मे ले गये.मैं एक दम सिसक उठी, हाअइईई,उफफफफफफफफफ्फ़,सीईईईईई

शौकत: तुम्हारी चूत तो बड़ी शानदार है. इतनी गुलाबी और भरी हुई.

मैं कुछ बोल ही ना सकी, कुछ देर तक कोई हरकत ना हुई तो मैने अपने हाथ हटा कर देखना चाहा तो क्या देखती हूँ कि मेरे शौहर अपने सारे कपड़े उतार चुके

थे और बिल्कुल नंगे मेरी टाँगो के बीच मे आकर बैठ गये. मुझे अंदाज़ा नही था कि आदमी लोगो का इतना बड़ा हो सकता है.

अब उन्होने मेरी टाँगो को हवा मे उठाया और अपना औज़ार मेरे मुहाने पर रख दिया.

कुछ देर वो उसे इसी तरहा रगड़ते रहे और फिर अचानक उन्होने एक ज़ोर का झटका मारा और पूरी तरहा मेरे अंदर दाखिल हुए, ये इतनी ज़ोर का धक्का था कि मैं चीख उठी,ऐसा लगा कि किसी तेज़ ब्लेड ने मेरी खाल को चाक कर दिया हो. शौकत शायद इस बात के लिए तैय्यार थे और उन्होने धक्का देते ही मेरे मूह पर हाथ रख दिया जिससे मेरी चीख कमरे मे ही रही.अब वो लगातार धक्के दिए जा रहे थे और मैं जैसे सातवे आसमान मे थी, अब मैं खुल कर आवाज़ निकाल रही थी,, उफफफफफफफफफफफफफ्फ़,हइई

,आआआआआआअहह, सीईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई

ये लगभग कुछ देर चला होगा कि मुझे लगा की मुझमे से कोई फव्वारा फूटने वाला हो और अचानक मेरे अंदर से गाढ़ा चिपचिपा पानी निकल पड़ा, इस अनोखे से एहसास ने ना जाने मुझे शुरुआत मे हुआ दर्द भुला दिया था, मुझे अपनी बहेन रीना की बात याद आई कि "आज की रात के बाद तू कुँवारी नही रहेगी"

कुछ देर मे शौकत ने भी एक फव्वारे मेरे अंदर छोड़ दिया और मुझपर ही लेट कर वो अपनी सांसो को अपने क़ब्ज़े मे करने लगे. हम कुछ देर इसी तरहा लेटे रहे और

फिर अपने कपड़े पहेन कर सो गये.
 
Mera naam Aara hai. Main us waqt 21 saal ki thi aur us waqt maine B.A. paas kar liya tha. Mere ghar me shuru se hi ladkiyo ko akele baahar jaane ki ijazat nahi hai. Main ek lower middle class ki ladki hoon aur bade hi sadharan se pariwar se hoon. Hum wahi log hain lo ek chote se kasbe me apni saari umar bita dete hain. Hum motor cycle hi afford kar sakte hai.

Main bhi ek aam ladki jiski aam si saheliya aur aam si zindagi thi. Maine B.A private kiya hai aur main English me acchi nahi hoon.

Meri zindagi me main apne shauhar,devar, sasur aur bhai se sambandh bana chuki hoon. Is baat par yakeen karna bada mushkil hai lekin yahi meri zindagi hai. Main to sirf apne shauhar ko hi apna jism dena chahti thi lekin kudrat ke khel me fans kar haar kar reh gayi.

Aaj jab main peeche dekhti hoon to sirf takleef ke kuch aur nahi paati. Rona meri kismat aur lutna meri kismat ki lakeer ban gayi hai.

Aaj bhi yaad hai mujhe sab mere sasural wale mujhe dekhne aaye the.

Laalchi log lekin baato se shareef.

Main apne maa baap ki eklauti ladki hoon aur apne bade bhai se choti hoon.

Ye baat kareeb ek saal pehle ki hai, mere imtehaan ka result aa chuka tha. Maine B.A. pass kar liya tha, ghar me sab ne rahat ki saans li. Aisa nahi tha ki meri padhai par jyada kharcha ho raha tha lekin ladkiyo ki padhai se faiyda hi kya hota hai.

Main khush thi.

Meri maa mujhe padhane ke liye bilkul raazi na thi. Maine bhi jyada zidd nahi ki.

Maa meri shadi ke liye baba ko roz kehne lagi,mere bhi armaan the ki main kuch ban jaun lekin phir main khamosh ho gayi.

Phir ek din aisa aaya jab mujhe dekhne ke liye ladke waale aane waale the. Main thoda ghabra si gayi, maa to mujhse bhi jyada ghabrai huyi thi. Mere pahenne ke liye koi naye kapde bhi na tha. Maine apni khaala zad bahen jo meri hi umar aur mere hi deel daul ki thi usse kapse liye. Meri khaala jo mujhse kai makaan door rahti thi ghar par aa gayi. Unka naam Hina hai. Meri maa Hayaat unko bahut maanti hain. Khala Hina paise ke maamle me humse thoda behtar hain. Unke shauhar Dilshad ki Cement ki agency hai. Meri khala ne meri maa se kaha ki mujhse kasbe ke beauty parlor bhej dein taaki main khoobsurat lagoon. Subah ke 9 hi baje the. Meri maa ne mujhe mere bhai ke sath kasbe ke eklaute beuaty parlor bhej diya. Main pahli baar beauty parlor gayi thi. Wahan par pehle se hi do ladkiya theen jinke chehre par kuch laga hua tha. Main andar dhakhil huyi to, beauty parlor ki ladkiya mujhe dekhe lagi. Unhone mujhe sar se pair tak dekha aur unke chehre par ek hasi si aa gayi. Shayad wo mujhpar aur meri gareebi par hans rahi thi. Ek ladki jo lambi si thi usne mujhe poocha kya karwana hai? kya shaadi ke liye taiyyar hona hai? maine kaha ki nahi ladke wale dekhne aa rahe hain. Meri is baar par wo do ladkiya wo pehle hi se khursi par baithi theen khilkhila kar hans padi. Main sharmsaar si ho gayi. Jaane kyun hum lower middle class ke log har baat par sharminda ho jaate hain.Chahe hamari galti ho ya na ho. Ye ameer log aur rutbe waale agar koi baat zor se kahein to hum unki baat maan lete hain. Hamara mulk chahe ghulami se azaad ho gaya ho lekin hum apni ghareebi se abhi tak azaad nahi huye.

Mujhe kone me pade ek sofe bar baith kar intezar karna ka isaara kiya gaya. Kuch der baad ek aur ladki parlor me dakhil huyi. Mujhse ek khaali padi khursi par baitne ko kaha gaya. Us ladki ne mujhse wahi sawaal kiya hi tha ki pehle se maujood do ladkiyo me se ek ne kaha ki madam ko ladke wale dekhne aa rahe hain lekin is baat par is ladki ho hasi nahi aayi. Wo tunak kar boli ki in "logo ne ladkiyo ko bazar me saji huyi ek cheez samajh rakha hai".

Phir wo shuri ho gayi meri chehre,gardan,pair ke nakhoon, haant ke nakhoon, palko aur na jane kya kya. Mujhe ehsaas hi nahi tha ki ye sab bhi hota hai.

Khair kaafi time baad unhone mujhe 850 rupees mainge, jo maine apne bhai Aarif jo bahar khada tha ussse le kar parlor wali ladkiyo ko de diye.

Ghar pahunchi to ghar ko pehchaan na payi, Ghar me kuch phoolon ke gamle, nayi chaddar,naya furniture tha. Ye san meri khala ke yahan se aaya tha.

Kuch hi der me Ladke waale aa gaye, mera to maare ghabrahat ke bura haal tha,

ye ek aisi feeling hoti hai jo sirf ek ladki hi jaan sakti hai, aisa mehsoos hota hai ki hum ladkiyo ki zindagi bazar me bikti kisi bakri ki tarha hoti hai jise dekh kar tatol ka koi kasai pasand karta hai aur agar kasai ko na pasand aaye to bakri ka malik bakri ko hi lataad lagata hai.

Mujhe apni hone wali saas aur nanad ke paas chai lekar jaana tha. Mujhe sab kuch meri khaali ne samjha diya tha, main jab janaankhane me pahunchi to sab hi mujhe ghoor kar dekh rahe the. Maine naasta wagera rakh aur paas padi ek kursi par baith gayi.

Meri hone waali saas ek mota chasma lagaye meri taraf ghoor rahi thi, uski aankein badi badi theen aur wo ek moti aurat thi, baalo me safedi aa chuki thi, suit salwar kuch khaas nahi tha, haanto me soney ke kangan aur kaano me moti moti baaliya. AAnkho me ek dum rubaab, Usko apni taraf ghhorta hua dekha to aisa laga jaise koi daroga kisi mulzim ki pehchaan kar raha ho.

uske sath usi ki sakal ki uski beti thi jo bahut jyada saz dajh ke aayi thi, ye patli dubli se ladki thi jiski godh me koi 2 saal ka ek baccha tha. Ye thoda khush mijaz lag rahi thi, apni maa ki tarha iski nayan naksh teekha tha.

Itne me uski maa ne mujhse poonch ki "beti Aara kahan tak padhi ho"

Iska jawab meri Khala ne diya "ji B.A kiya hai"

ispar us aurat ne meri khala ko ghoora jaise koi napasand baat keh di gayi ho aur lagbhag phatkaar lagate huye jawab diya ki "bahenji zara bacchi ko bhi bolne dien"

Phir meri taraf mukhatib hokar kaha ki "batao meri bacchi kahan tak padhi ho"

Maine jawab diya "ji B.A. kar chuki hoon"

Meri hone waali Saas "private kiya hai"

Main: "ji"

Meri hone waali Saas "aaghe padhna nahi chahti ho"

Main: "ji itna kaafi hai"

Meri hone waali Saas "Quran padhi ho"

Main: "Ji"

Meri hone waali Saas: "khana pakana, kadhai silaai jaanti ho"

Main: "ji"

Meri hone waali Saas: "bahut acchi baat hai, accha zara mere liye thoda thanda paani le aao"

Main : "ji abhi laati hoon"

Ye kehkar main bahar aa gayi.

Kuch ghanto baad wo log chale gaye. Main apni maa se jaanna chahti thi ki wo log kya keh gaye hain lekin sharm ki wajah se kuch na poonch paayi. Maa na to khush thi aur na hi pareshan lag rahi thi.

Isi tarha kuch din beet gaye aur ek subah Meri khaala Hina meri amma ke paas aayen aur badi khush lag raheen thi. Unhone aate hi meri maa ko galey se laga liya aur kaha "un logo ne haan keh di hai aur wo log jald tareek pakki karna chahte hai"

ispar meri maa ne pooncha "un logo ki koi khaas maang wagera",

Khala "arrey nahi, un logo ka yahi kehna hai ki bacchi badi khoobsurat aur sehatmand hai aur unhe kuch khaas nahi chaiye".

Amma "chalo bade khushi ki baat hai"

Khala "" aur kya, warna aaj kal to 4 pahiye ki gaadi ka chalan nikal aaya hai"

Mere aabu jo door baithe the kehne lagey "wo log to haan keh gaye lekin humko bhi ek baar ladke ko dekh lena chahiye ki kaisa hai"

Mera bhai bhi is charcha me jud gaya "baba bikul sahi keh rahe hain"

Khala "theek hai to main unse kehalwa deti hoon ki hum ladke se milna chahte hain"

Kuch dino baad hamare yahan ke log wahan gaye aur shaam ko jab laut kar aaye to jyada khush nahi dikh rahe the.

Main kuch poonchna munasib nahi samjha. Raat ko khane ke waqt bhai bol pada

"baba mujhe wo ladka accha nahi laga"

Baba "kyun,kya aib hai bechare mein?"

Aarif mera bhai "baba uski aankhein dekhi, poora charsi lagta hai wo"

Baba "tujhe kaise yakeen hai"

AArif :"baba main kai aise ladko ko jaata hoon jo isi aadat me mubtila hain"

Baba "accha accha khana kha le,bada daaktar bana phirta hai"

Amma: "ladke ki bahen badi chalak aur laalchi lag rahi thi,keh rahi thi ki ladke ke bade bhai ke yahan se uske miya ke liye motor cycle aayi thi"

Baba: "arrey khaak daalo uspar, hamare paas itni rakam nahi hai ki ladke ki bahen ko dahej de dein, meri Aara se sasur se baat ho chuki hai wo sirf ladke ke liye motor cycle aur tamaan cheezein jo chalan me hai wahi chahte hain"

Amma : "to tareek kya tay huyi hai?"

Baba: "agle mahine ki 25 tarrekh"

Amma: "yahi lagbhag ek mahina?"

Baba: "haan itna kaafi hai,ek hafte me fasal ke paise aa jayein ge aur phir taiyyari suru ho jayeigi"

Amma: "chalo oopar wala khair karey meri bacchi par"

Phir wo din bhi aa gaya jab main dulhan bani thi, subah se hi kaleja mooh ko aa rah tha. Meri khala ki shadi shuda ladki yani meri bahen mera paas akele me kuch kehne aayi uska naam Reena hai.Reena mujhse 2 saal badi hai

Reena "Aara main tujh se wo kuch kehna chahti hoon jo tujhe maaloom hona chahiye"

Main: "Aisa kya kehna chahti hai ki mujhe akele me le aayi"

Reena: "dhyaan se sun aur apni gaanth baandh le"

Main: "ab bak bhi kya kehna chah rahi hai"

Reena: "aaj ki raat ke baare mein" ye kehkar uske chehre par muskaan aa gayi.

Main: "chal pagli, hat yahan se"

Reena: "ye koi mazaak nahi hai agar ye nahi jaanegi to ho sakta hai rona pade"

Main:"mujhe nahi jaana ye sab, tu dimag mat kha"

Reena: "sukar kar main tujhe bata rahi hoon, ye baat mujhe meri saheliyo ne batai thi"

Main "kya batai thi?"

Reena: "Aaj ki raat miyan biwi ka milan hota hai"

Main : "to isme kaunsi nayi baat hai"

Reena: "pagli, do jismo ka milan hota hai aur tujhe maloom hona chahiye ki miya kya kya karta hai aur usko kya nahi karna chahiye"

Main:"kya bak rahi hai?"

Reena:"dekh, aaj ki raat ke baad tu kunwari nahi rahegi aur aaj tera kunwarapan chala jayege"

mujhe theek se to nahi pata tha lekin Reena ki baato se maine kuch kuch andaza laga liya tha.

Reena: "aaj teri Gulabo se ho sakta hai khoon nikal pade ya thoda jyada dard ho lekin tujhe aaj sab bardhasht karna padega"

Hum ladkiya apni sharmgaah ko Gulabo keh kar pukarti thi, Reena pehle se hi mujhse khuli huyi thi aur apni suhagraat ki dasshtan mujhe pehle hi suna chuki thi, main ye sab nahi sunna chahti thi lekin phir bhi mujhe sunna pada.

MAin: "mujhe tu pehle hi ye sab bata chuki hai"

Reena: "itna dhyaan rakhna ki tera miya tere pichwade me shararat na kare"

Main: "tu jaa ab, bahut ho chuki ye sab batein"

Shaam ko shadi ki saari rasme khatam ho chuki theen aur main wida hokar apne sasural ke saze huye kamre me baithi thi aur wahan par pehle se hi kaafi aurtein maujood thi, sab mujhe muh dikhai ke neg de kar ek ek karke ja rahin thi,

Ye kamra kaafi saja hua tha, Ye kamra ghar ke kone me tha, Ye ek bada sa khula hua ghar tha, jisme kai kamre the wo baramde me aakar judte hai,sabhi kamre ek hi line me the aur sabka ek hi common kitchen tha. Ghar ke kai bathroom aur toilet the.

Mujhe apne miya ka naam hi maloom tha. Unka naam Shaukat tha aur wo Battery aur Invertor ka kaam karte the.
 
Aakhir der raat tak maine apne miya ka intezar kiya kareeb 12 baje wo mere kamre me daakhil huye. Wo ek ausat darje ji height ke duble patle se insaan the.

Jaisi hi wo kamre me daakhil huye meri saansein tez ho gayi,Mujhe itna yaad hai ki wo aate hi meri taraf baith gaye,

Unka paas se sakht boo aa rahi thi jo sharab ki thi.

Mujhe sharab se nafrat thi lekin main aaj ki raat ko barbaad nahi karna chahti thi.

Unhone mera ghoonghat hataya aur kaha "bala ki khoobsurat ho"

Main ye sunkar thodi ki khush huyi aur sharm se laal ho gayi lekin isse pehle ki kuch ho paata wo ludhak kar bistar par gir gaye.

Mujhe ek jhatka sa laga aur main soch me pad gayi ki kya yahi wo raat hai jiska har ladki intezar karti hai. Ab main rona chahti thi lekin ro bhi na saki, mere bechare maa baap jinhone itnki mehnat ke sath meri shaadi ki rakam jama ki thi, meri maa jo bechari diabetes ki mareez hai, apna ilaaj karwane ki bajai mere liye kuch na kuch jodti rahti thi, bade armaan se meri shadi kar chuki thi, mera baba jinke kandhe me aksar dard rehta tha kyunki wo jab kheti ka kaam nahi hota tha to truck chalaya karte the aur din raat mehnat karte the.

Un sab logo ka chehra mere saamne ghoom raha tha. Bada bhai bhi apni padhai beech me rok kar mere dahej ke saaman ke liye kaam kar raha tha, raat bhar wo bhi

apni kalam ghis kar apni kitabon me gum rahta.

In sab logo ki zindagi humse judi huyi thi. Main kisi tarah apne sarab me doobe shauhar ko sula kar so gayi.

Subah jan darwaze par meri nanad me dastak do to main jaag gayi.

maine usey andar aane ko kaha.Uska naam Saba tha.

Ye wahi ladki thi jo mujhe mere ghar me apni maa ke sath dekhne aayi thi.

Saba ne aate hi andar bistar par charo taraf dekh aur phir meri tarak dekha, uske chehre par mayoosi aur thodi pareshani nazar aayi phir meri paas akar kaha k naasta taiyaar hai aap nasta kar lijiye.

Mian uthi uar kamre je jude bathroom ki taraf badh gayi, is bathroom ke liye mujhe apne kamre se thoda bahar jana pada. Bahar meri Saas ke takht par baithi Qurna padh rahi theen.

Meri nazar unse mili phir mian Bathroom ki taraf badh gayi. Shadi waala ghar tha, door se aaye huye mehmaan abhi bhi ghar me hi the, Main apne sath kuch kapde layi thi jo maine naha kar pahen liye aur jab kamre me wapas gayi to mere miya abhi bhi so rahe the. Main khamosh hokar bistar ke kone me baithi rahi. Kuch der baad meri saas mere kamre me aa gayi aur apne bete ko uthane lagi. Lekin wo kahan uthna wale the.

Meri saas mujhe doosre kamre me le gayi aur wahan main unke sath naasta kia.

Waleema ka din tha. Ye dawat ladke waalo ki taraf se ladki waale aur tamaan rishtedaro ke liye hoti hai. Isme meri maa aur mere gharwale sabhi aaye.

Meri Bahen Reena mujse milne ke liye betaab thi. Lekin maine kisi par ye zahir nahi hone diya ki mere sath raat me kya hua tha. ye ek sharm aur sadme waali baat thi jise main kisi se share nahi karna chahti thi. Banawti muskaan ke peeche raat ki khalikh aur bayanak andhera chup gaya. raat ke raaz raaz ki rahe aur duniya me ek aur ladki sab ki khatir qurban ho gayi. Ladkiya hamesha se hi qurban hoti rahi hain, Kanoon aur Mazhab chahe kitna hi kyun ka unhe haq de lekin mardo ke is samaj me aurtein hamehsa qurban hi hoti rahi hain.

Dheere dheere sab mehmaan jaane lagey. Meri saas jyada tar khamosh hi rahi.

Shaam ho chuki thi,mere miyan ab apne dosto ke sath aangan me baithe bath cheeth kar rahe the.

Raat ko meri nanad Saba mere kamre aa ayi aur kehne lagi.

"Bhabhi main jaanti hoon ki shayad aapki pichli raat khushgawar nahi guzri thi,hamare yahan mere bhai badi pareshani se guzar rahain hai aur shayad isliye wo sharab pee lete hain lekin yakeen mano wo sharabi nahi hain, abba to unhe kai baar peet bhi chuke hain lekin wo kabhi kabhi apni sharab waali harkat dohra hi dete hain"

Main: "shayad meri yahi kismat hai"

aur main ye kahkar phoot phoot kar rone lagi.Saba mere kareeb aaayi aur mujhe apne seene se laga kar mujhe chup karane lagi.

Saba "bhabhi hum sab is baat par khush nahi hain, Amma par jaise kaher hi toot pada hai, subah se unhone kuch nahi khaya hai, humne ye soch ki ek khoobsurat biwi ke pyar se shayad shaukat (mere miya ka naam) sudhar jaye,"

Main "aap pareshan na ho, shayad aisa hi ho"

Saba: "meri pyari bhabhi, aap kitne buland hausla hain"

Main: "aur is haalat me ek ladki kar bhi kya sakti hai"

Itne me bahar se meri saas ki awaaz aayi to main aansu poch kar sahi tareeka se baith gayi.

Meri saas mere kareeb aakar baith gayi, unhone is waqt apna mota chasma nahi pehna tha aur wo badi sharminda si lag raheen thi, ye wo aurat nahi lag raheen thi jo mujhe dekhna aayi thi, Ye to koi mazloom besahara si ek khuafzada se zamane ki sataye aurat ki tarha lag rahi theen, unhone meri taraf is tarha dekha jaise wo apne kisi gunah ke maafi maang rahi hon.

Unhone aate hi Saba ko bahar jaane ka ishara kiya.

Saba ke jaate hi wo bhi mujhse lipat gayi. Aur ek maa ki tarha mere sar par bosa diya.

phir kehne lagi

"meri bacchi main tujhe yakeen dilati hoon ki main teri zindagi barbaad nahi hone doongi bas yakeen rakh aur thoda waqt de"

Main: "ammi aap is tarha roye nahi aur kuch kha lein , mujhe ummeed hai ki mere sath bura nahi hoga"

Saas "sabbas beta, tujhse yahi ummeed hai"

Phir raat aa gayi aur mere shauhar phir mere kamre me daakhil huye. Main abhi leti hi thi ki unki awaaz aayi "so gayi kya tum?"

aur main ghabra kar uth gayi aur unki taraf dekha. AAj mujhe koi aur insaan nazar aaya. Ye to mere shauhar hi the lekin aaj

nashe me nahi lag rahe the. Nasha insaan ko kya se kya bana deta hai.

Ye insan ausat kad kaathi ka tha. Naam bilkul lambi aur seedhi, aankhein laal aur badi badi aur chehre pe halki si muskurat.

Aisa lagta tha ki wo mujhse keh raha ho ki kahan so gayi theen. Unki muskurahat ne jaise mere saare ghaav bhar diye.

Ek aurat ko apne shauhar se chahiye hi kya hota hai, bas ro joon ki roti aur thoda sa pyar. Isme hi wo apni jannat dhoondh leti hai aur iske siwa

ussey kisi aur cheez ki chahat nahi hoti.

Mere shauhar mere saamne khade muskura rahe the aur main sar jhukaye bistar par khamoshi se dil ki thadkam ko rokne me lagi thi.

Pati hi nahi chala ki kab wo mere saamne aakar baith gaye aur meri thodi uhta kar meri gehri doobi huyi aankho ko phir se ubharne lagey.

Main khush thi lekin thodi ghabrayi huyi thi. Ek ek pal jaise pahad maloom padh raha tha,main kamre me suyi ke girne ki awaz sun sakti thi,

Ek haseen lamha dheere dheere meri palko ke neeche se guzar raha tha.Itne me mujhe mere haseen khwab se mere shauhar ne jaga diya.

Unhone halke se lehje me kaha

"Kitna bewakoof hoon main jo sharab ka nasha karta hoon mujhe to in aankho ka nasha karna chahiye"

"Aara hain na tumhara naam"

Main: ji

Shaukat: mujhe kal pi kar nahi aana chahiye tha, dar asal mere dosto ne mujhe zabardasti pila di, kambhakt kaheen ke, tum mujhse naraz to nahi ho?

Main: nahi to

Shaukat: "jhoothi kaheen ki, aisa bhi kabhi hota hai ki,biwi shauhar ke peene par naraz na ho"

Main:"main aapke sharab peene par nahi balki aapke mujhe gaur se dekhe bina hi so jane par pareshan thi"

Shaukat: "haan, hona bhi chahiye, aakhir biwi ban kar aayi ho, lekin jaanti ho main sharabi nahi hoon aur kisi ko maarna peetna gaali galuch karna meri fitrat nahi hai"

Main: Ji

Shaukat: bachpan se hi main lagatar haarta raha hoon, kai cheezein main janbhoojh kar haara,kai cheezein na chahte huye bhi lekin main haarta zarur raha hoon.

Main: kya main aapse ek sawal kar sakti hoon

Shaukat: kyun nahi, poocho

Main: kya aap kisi aur se mohabbat karte hain?

Shaukat: haan.

ye sunkar mere pairo taley zameen khisak gayi, ab yahi insaan jo mujhe pyara lagne laga tha, jo do jumlo se mujhe jannat dikha raha tha, ek hi HAAN se mujhe aur mere wajood ko hila gaya, main beshakhta hi achanak sar utha kar unhe dekhne lagi,ispar wo khil khila kar hans padey aur

Shaukat: arrey bhai main apne maa baap, bhai bahen, rishtedar sab se mohabbar karta hoon.

Main: nahin main kuch aur pooch rahi thi.

Shaukat: jaanta hoon, maine mohabbat ki thi apne school ki ek ladki se, lekin kabhi zaban par nayi aa payi,wo badey ghar ki ladki thi aur doosre mazhab ki, bas dil me

tha ki usse baat karoon, wo thi hi itne khoobsurat.

Main: to kya main khoobsurat nahi hoon

Shaukat: tum to ek balaa ho, mujhe to yakeen hi nahi hota ki ek itni khoobsurat haseen ladki meri zindagi me aayi hai, ab dil chahta hai ki tumhare daaman me sar rakh kar khoob roya jaye aur apne dil ke saare raz khol diye jayein, main tumme apni khusi aur zindagi talash karna chahta hoon, bolo dogi mera sath

Main: ji bilkul

Shaukat: Mujhse itni jaldi samajhna aasan nahi hai, khair agar tumhe neend aa rahi hai to so jao.

Main khamosh rahi.

Shaukat: kya tum,,,,kya main,,,

Main: kya kehna chahte hain?

Shaukat: mujhse nahi kaha jaata,,ufff

Main: kya nahi kaha jaata

Shaukat: main tumhe apne seene se laga kar sona chahta hoon.

Main khamosh rahi.

Shaukat: shayad ladki ki khamoshi me haan hoti hai.

ye baat unhone itni masoomiyat se kahi ki mujhe hasi aa gayi.

Shaukat: hassi to phansi.

main ab khil khila ka hans padi.

Unhone mujhe achanak se apni bahon me kheench liya aur seedha me galo ko choomne lagey aur phir mujhe bistar par lita kar mujhse kas kar chipak gaye, main is ke liye taiyaar na thi aur unse kehne lagi ki main apne gehne utaar leti hoon.

Is par unhone mujhe alag kar diya aur meri taraf dekhne lagey, maine unhe dekhe bina apne saare zevar utar kar almaari me rakh diya aur bistar par unke kareeb aa kar let gayi. Unhone mujhe phir se baahon me kas liya aur unke haanth meri peeth par the aur dheere dheere wo mere top ke button kholne lagey.Maij haanth peeche lejakar unhe rokna chaha hi tha ki unhone apne ek haanth se mere haanth rok liye. Ab chehra se apne honth hata kar unhone mere honton par apne honth rakh diye aur mere nichle honth ko apne upar se honth se choosne lagey, Mere saare badan me jhurjhuri si hone lagi, aaj tak kisi ne mere honto par is tarha kiss nahi kiya tha, main bhi unka sath dene lagi, ab unhone mere top se sare button khol diya the aur ab mere top ko nikalna chahte the,iske liye unhone mujhe thoda door kiya to meri aankhein unki aankho se mili aur maine sharma kar apni aankhein band kar di. Ek jhatake me mera top utar gaya aur phit dobara unhone usi tarha mere bra ke hook bhi khol diya aur mere bra ko mere badan se azaad kiya. Maine apne dono haanth apne seene pe laga liya lekin unhone phir badi tezi se mere haanth hata diya. Main bahut sharm mehsoos kar rahi thi,

lekin ab unka dhyan meri aankho par nahi balki mere nange seene par tha.

ab unke haanth mere narm seene par aa gaye, jisse meri muh se aaah siiiiiii ki awaz aayi.

ab unhone mujhe meri peeth ke bal lita diya aur mere nipples par apna mooh rakh diya, aisa eksaas mujhe pehle nahi hua tha, ab main apne aape me na rahi aur unke sar ko apne seene me dabane lagi aisa laga jaise main kisi tez dhaara me bahi ja rahi hoon. Unka ek haanth mere doosre seene par tha.

Mujhe aisa laga jaise meri sharm gaah me se kuch ris raha hai. Ab unhone meri lehge ka naare me haanth dala jiske liye main taiyaar na thi, ek jhatke me mera lehga khul gaya.

wo ab uth gaye aur mere lehge to neeche kar diya. Mere jism par par meri panty ke alawa kuch na tha, Unhone ek nazar meri safed taango ko dekha aur phir meri panty ki elastic ko padak kar meri panty neeche karne laget, Main kas kar apni panty ko pakad liya lekin unki zid ke agey kuch na kar saki.

turnat unhone meri taango ke beech baith kar meri panty neeche sarka di.

Ab main bistar par bilkul nangi leti thi aur dono haantho se apna muh chipaye thi. Main sharm se gadi jaa rahi thi. Aaj tak mujhe kisi ne aisi halat me dekho ho ye mujhe yaad nahi hai. Kuch deir wo isi tarha dekhte rahe aur ek ungali me taango ke beech me le gaye.Main ek dum sisak uthi, haaayeeeeeee,uffffffffff,siiiiiii

Shaukat: Tumhari choot to badi shaandaar hai. Itni gulabi aur bhari huyi.

Main kuch bol hi na saki, kuch deir tak koi harkat na huyi to main apne haant hata kar dekhna chaha to kya dekhti hoon ki mere shauhar apne saare kapde utaar chuke

the aur bilkul nange meri taango ke beech me aakar baith gaye. Mujhe andaza nahi tha ki aadmi logo ka itna bada ho sakta hai.

Ab unhone meri taango ko hawa me uthaya aur apne auzar mere muhana par rakh diya.

Kuch deir wo usey isi tarha ragadte rahe aur phir achanak unhone ek zor ka jhatka mara aur poori tarha mere andar daakhil huye, Ye itni zor ka dhakka tha ki main cheekh uth,aisa laga ki main kisi tez blade ne meri khaal ko chaak kar diya ho. Shaukat shayad is baat ke liye taiyyar the aur unhone dhakka dete hi mere muh par haanth rakh diya jisse meri cheekh kamre me hi rahi.Ab wo lagatar dhakke diye ja rahe the aur main jaise saatve aasman me thi, ab main khul kar awaaz nikal rahi thi,, uffffffffffffff,hayeeee

,aaaaaaaaaaaaahhhhhhhh, siiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii

Ye lagbhag kuch deir chala hoga ki mujhe laga ki mujhme se koi fawwara phootne wala ho aur achank mee andar se ghada chipchipa paani nikal pada, is anokhe se ehsaas ne na jaane mujhe shuruaat me hua dard bhula diya tha, mujhe apni bahen Reena ki baat yaad aayi ki "Aaj ki raat ke baad tu kunwari nahi rahegi"

Kuch deir me Shaukat ne bhi ek fawware mere andar chhod diya aur mujhpar hi let kar wo apni saanso ko apne kabze me karne lage. Hum kuch deir isi tarha lete rahe aur

phir apne kapde pahen kar so gaye.
 
मेरी ज़िंदगी की ये सुबह एक नया रंग और रूप लेकर आई थी.सुबह हो चुकी थी लेकिन फिर भी ये एक हसीन ठंडी रात की तरहा थी जिसमे चाँद और तारे चारो तरफ मीठी ठंडी रोशनी हर तरफ फैला रहे होते हैं. हर तरफ कोई रात रानी का पौधा खुसबु फैला रहा होता है. ठंडी हवा जैसे कोई मीठा राग गा रही होती है और जैसे कोई जोड़ा

बहुत दिनो बाद मिला होता है और उस रात मे बाहों मे बाहें डाले एक दूसरे से लिपटा हुआ चाँद की तरफ देख रहा होता है. वो ऐसा नज़ारा होता है जैसे वक़्त अब कोई

मायने नही रखता और ऐसा लगता है जैसे दुनिया की भाग दौड़ और दुख तकलीफे हमेशा के लिए ख़तम हो चुकी हैं. ऐसा लगता है कि जैसे अब दुख, तकलीफ़,घबराहट,बेचैनी,डर,दर्द सब फनाह हो चुके हैं और अब सिर्फ़ दो प्यार करने वाले जन्नत मे एक दूसरे के साथ हमेशा हमेशा के लिए खुश रहेंगे.

मैं इन्ही ख़यालों मे खोई हुई थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई तो मैं जाग गयी. देखती हूँ कि मेरी ननद दरवाज़े पर पर्दे के पीछे खड़ी दरवाज़ा नॉक कर रही है.

मैने ये भी देखा कि मेरे शौहर जा चुके हैं, मैने घड़ी की तरफ देखा तो सुबह के 10 बज चुके थे. मुझे ख़याल आया कि ना जाने घर वाले सब क्या सोचते होंगे.मैने अपनी ननद को अंदर आने को कहा.वो अंदर आई तो उसके चेहरे पर एक सवालिया निशान था लेकिन जब उसने मेरे चेहरे पर सुकून देखा तो वो थोड़ा सा मुस्कुरा दी. मेरी ननद ने अपने हाथ मे रखी चाइ की ट्रे वो बेड के साइड टेबल पर रख कर मेरे करीब बैठ कर सवाल किया.

ननद: क्यूँ भाभी आज तो चेहरे पर सुकून नज़र आ रहा है लगता है सफ़र की सारी थकान मिट गयी है और इसलिए देर तक सोती रही आप.

मैं: क्या मतलब.

ननद: रात बड़ी हसीन गुज़री है आप की.

मैं शरमा सी गयी, हलाकी की ये लड़की मुझसे उमर मे थोड़ी बड़ी होगी लेकिन अभी भी मैं इसके लिए नयी थी तो थोड़ा झिझक रही थी, इसलिए मैं कुछ बोल ना सकी.

ननद: बताओ ना भाभी कल रात क्या हुआ, क्या ये कली फूल बन पाई.

मैं अभी भी सर झुकाए अपने घुटने पर सर रखे अपना सर छुपा रही थी कि अचानक मुझे अपनी सफेद चद्दर पर खून के लाल धब्बे दिखाई दिए. ये वही खून के

धब्बे थे वो रात की कहानी कह रहे थे. ये निशान मेरे कली से फूल बनने की थे. मेरे चेहरे पर बेतहाशा शर्म और थोड़ी घबराहट के आसार नज़र आ गये जिसको

देख कर मेरी ननद की नज़रे जैसे मेरी नज़रो को टटोलते हुए उन धब्बो पर पहुँच गयी. मैने उसके चेहरे को देखा तो वो अब खुल कर हंस पड़ी.

ननद: तो ये बात है.चलो अच्छा हुआ खैर मैं आपको और परेशान नही करूँगी. आप नहा लीजिए और फिर नाश्ता कर लीजिए. बाद मे बात करेंगे.

मैं अब ये नही जानती थी कि इस चद्दर को बदलू कैसे और इसको छुपाऊ कहाँ. खैर मैं उसपर अपना तालिया रखकर फ्रेश होने चली गयी और जब लौट कर आई तो देखा कि

वो चद्दर गायब थी और उसकी जगह एक दूसरी नयी चद्दर बिछी हुई थी. मुझे एक झटका सा लगा. खैर नाश्ता किया और थोड़ा सा लेट गयी. ये बाहर का मौसम था, बाहर ठंडी मीठी हवा चल रही थी. इस घर के चारो तरफ एक बड़ी सी दीवार थी और अंदर बड़े बड़े दरख़्त थे. ये एक बड़ा सा पुश्तैनी घर था. चिड़ियो के चहकने की

आवाज़ आ रही थी और ये दिन आम दिनो से अलग बड़ा ही ख़ुशगवार लग रहा था.मैने आँखें बंद कर ली और मैं नींद मे जा चुकी थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई के मैं

जाग गयी. ये मेरी सास थी. मैने अपने आप को संभाला और उठ बैठी. मेरी सास मेरे करीब आकर बैठी और उन्होने मेरे माथे को चूम लिया और मेरे सर पर हाथ

रख कर बोली "शौकर चला गया काम पर ?"

मैं: हां शायद.

सास: अच्छा, और तुम बताओ ठीक हो?

मैं: हां खाला (दर असल हमारे यहाँ एक दस्तूर है सास को खाला कहने का)

सास: अच्छा लगा बेटी तुम्हारा चेहरा देख कर, दिल को तसल्ली सी हो गयी. तुमने नाश्ता कर लिया क्या?

मैं: जी

सास: तुम्हारी मा का फोन आया था सुबह,वो तुम्हे बाकी की रस्मो के लिए घर बुलाना चाहती हैं. मैने सोचा पहले तुमसे और शौकत से मशविरा ले लिया जाए. शौकत शाम को आएगा तो मैं उससे भी पूंछ लूँगी. तुम्हारे ससुर की भी यही राई है. तुम क्या कहती हो इस बारे में?

मैं: जैसा आप लोग ठीक समझें.

सास: तो ठीक है, तुम हो आओ अपने घर और इन्ही रस्मो के बहाने थोड़ा मज़ा भी कर लो.हम बूढो को तो ये सब खेल तमाशा ही लगता है.

मैं: जी

सास: अच्छा,अगर तुम चाहो तो मेरे साथ बैठक मे बैठ सकती हो, वहाँ बड़ी ठंडी हवा आती है और औरतो के सिवा वहाँ कोई आता भी नही है.

मैं: ठीक है.

और मैं फिर उनके पीछे चल पड़ी.

रात को शौकत आए और वो मुझे मेरे घर भेजने के लिए राज़ी थे. अगले दिन मैं घर पहुँच गयी.

घर पर मेरी मा, मेरा भाई,मेरे बाबा और मेरी खाला और उनकी बेटी सब मौजूद थे. शौकत को बैठक मे बिठाया गया. फिर वही सब रस्मो रिवाज और वही सब चीज़े.

सब लोग बहुत खुश थे. मैं गौर किया कि मेरी मा भी बड़ी खुश थी,बड़े दिनो के बाद उनके माथे की सिलवटें मिट गयी थी और उनका चेहरा ताज़ा ताज़ा सा लग रहा था.

एक लड़की का बोझ जो उनके सर से उतर गया था. अब मुझे अपना ही घर थोड़ा अंजाना सा लग रहा था. मैं पलट पलट कर हर चीज़ को देख रही थी. आज ये मुझे बेगाना बेगाना सा लगता था. मुझे अपने उपर यकीन नही आ रहा था. मेरे बाबा अब भी शौकत से बात कर रहे थे और मेरी खाला मेरी मा के साथ बैठ कर बातें कर रही थीं. इसी तरह शाम हो गयी और शौकत मुझे मेरे घर छोड़ कर अपने घर चले गये. मैं लगभग कुछ दिन ही अपने घर रही. ये दिन इतनी जल्दी बीत गये कि पता

ही ना चला. अब मुझे पहली बार की तरहा घर से जाते हुई रोना नही आ रहा था. एक हलचल सी ज़रूर हो रही थी अपने शौहर के साथ अपने ससुराल जाते हुए.

सब इसी तरहा चल रहा था. एक साल बीत गया. हर तरफ से बच्चे की फरमाइश होने लगी. शौकत धीरे धीरे फिर शराब पीने लगे. मिया बीवी मे ख़त फॅट सुरू हो गयी. मेरे सास ससुर उनको बहुत समझाते लेकिन वो कहाँ समझने वाले थे. आख़िर वो खौफनाक रात आ ही गयी जिसका किसी भी लड़की को इंतेज़ार नही होता. ये बारिश का महीना था और तेज़ बारिश हो रही थी. मैं अब भी शौकत का इंतेज़ार कर रही थी. वो आज भी पी कर आए थे. जैसे ही उनके छोटे भाई ने उन्हे मेरे कमरे मे अपने

कंधो के सहारे दाखिल किया मैं उनपर बरस पड़ी. लेकिन वो नशे मे इतने डूबे थे कि बिस्तर पर गिर कर सो गये.

मैं भी ना जाने कब सो गयी और सुबह उठते ही उनसे उलझ पड़ी ये ना जानते हुए कि आज जी मेरी क़यामत आने वाली हैं. हम दोनो की आवाज़ें चार दीवारो से टकरा रही थीं.

मेरी सास और ननद भी अब कमरे मे दाखिल हो चुकी थीं. अब मैं चुप हो चुकी थी और मेरी सास और मेरी ननद मेरी तरफ से शौकत से सवाल कर रही थीं उनके

पीने के मुतलिक. मुझे याद नही कि मेरी सास ने ऐसा क्या कहा कि मेरे शौहर ने अपना रिश्ता मुझसे तोड़ लिया. वो तीन लफ्ज़ ही मैं सुन पाई की धडाम से मुरझा कर

सख़्त फर्श पर गिर पड़ी. मुझे जब होश आया तो मेरे शौहर सर पकड़े सिसक रहे थे और मैं अपनी सास की गोद मे सर रखे अपने बिस्तर पर पड़ी थी. मेरी ननद भी

रो रही थी. मैने आँखें खोली और मुझे वो ज़हरीले लफ्ज़ याद आए तो मैं भी फफक कर रो पड़ी. मेरी सास उस औरत की तरहा आँसू बहा रही थी जिसकी गोद मे उसका बच्चा

आखरी साँसे गिन रहा होता है. रोते रोते शाम हो गयी थी.
 
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