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यमदूत की लापरवाही

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यमदूत की लापरवाही

(श्रेय: चन्दन सिंह राठौड़)

कहानी शुरू करने से पहले पाठकों से मैं रहस्य भरी इस दुनिया के बारे में कुछ चर्चा करना चाहूँगा. ये सृष्टि ऐसे रहस्यों से भरी पड़ी है जिनसे रुबरु हुए बिना शायद ही कोई विश्वास करेगा.

आज से चार या पाँच साल पहले वैज्ञानिकों की एक टीम ने जमीन के अन्दर और 27 किलोमीटर लम्बी महामशीन बना कर एक प्रयोग करने की कोशिश की थी. वैज्ञानिकों का दावा था कि इस पृथ्वी पर जो मोजूद वस्तुए है, उनका 5 % ही है देख पाते है, महसूस कर पाते है. बाकी 95 % हमारे आसपास होने के बावजूद भी, हम उन्हें देख नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते. लेकिन उस महामशीन के प्रोयोग से उन 95 % वस्तुओं पर जो रहस्य का जो पर्दा है, उनसे पर्दा हट जाएगा, हम उनके बारे में जान सकेंगे. लेकिन वो प्रयोग सफल होने से पहले ही वो महामशीन ही फ़ैल हो गई.

मैं जो कहानी पाठको के सामने पेश कर रहा हूँ, ये भी एक सच्ची घटना पर आधारित है. इस कहानी का रहस्य अंत में बताया जायेगा, ताकि पाठको में कहानी पढ़ने कि उत्सुकता बनी रहे. और कहानी पूरी होने पर उस सची घटना का जिक्र भी किया जायेगा, जिससे ये कहानी प्रेरित है.

मलूका इंडस्ट्री के मालिक मलूकदास का बेटा अजय अपनी कंपनी के मेनेजिंग डायरेक्टर का पदभार गृहण करने के बाद मजदूरों के समारोह को संबोधित करते हुए बोल रहा था.

“मलूका इंडस्ट्री के कर्मचारियों, और मजदूर भाईयो, आप सभी की मेहनत की बदौलत हमारी कंपनी देखते ही देखते जोजागढ़ शहर कि नंबर वन कंपनी बन गई है. आप सभी का इस कंपनी के लिए समर्पण देख कर में आपसे वादा करता हूँ कि आप सभी कि छोटी से छोटी तकलीफ भी मेरी तकलीफ है. और इसके बदले में आपसे ये उमीद करता हु कि आप अपनी मेहनत से इस कंपनी को तरक्की के रास्ते पर आगे बढाते रहे ताकि हम सभी का जीवन सही तरीके से चलता रहे.

मजदूरो का समारोह समाप्त होने के बाद मलूकदास का बेटा अजय अपनी कंपनी के ऑफिस के केबिन में कंपनी के काम काज के तौर तरीके सीख रहा था. उसके साथ में उसकी बीवी शीतल भी मौजूद थी

कंपनी का एक मजदूर जिसका नाम भी अजय ही था, पिछले तीन दिन से छुट्टी पर था. क्योंकि उसके पाँच साल के बेटे विकी को बुखार था. मजदूर अजय के पास उसके इलाज के लिए एक रुपया भी नहीं था. कंपनी के मालिक से वह पहले ही एडवांस ले चुका था. अब और माँगने कि उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी. लेकिन डर इस बात का भी था, कि अगर सही वक्त पर बच्चे का इलाज नहीं कराया तो बच्चे कि जान भी जा सकती है. इसलिए हिम्मत बटोरी और एक बार फिर मालिक से एडवांस लेने का फैसला किया. अपनी घरवाली गीता और बच्चे को साथ लिया और चल पड़ा इस उम्मीद में कि अगर मालिक ने कुछ मदद कर दी तो वहीँ से सीधा अस्पताल जा कर विकी का इलाज कराएगा. वह दबे कदमों से कंपनी के गेट में प्रवेश करके कंपनी के ऑफिस में जा कर मुनीम से मिला.
 
“मुनीमजी मुझे सेठजी से मिलना है”.

“सेठजी तो यहाँ नहीं है. अभी अभी गए है. कहो क्या काम है?” मुनीम ने जवाब दिया.

मुनीम का जवाब सुन कर मजदूर अजय की रही सही हिम्मत भी टूट गई. वह बड़ी उमीद ले कर आया था. लेकिन अब मालिक ही यंहा नहीं है तो कौन उसकी मदद करेगा? मजदूर अजय ने मायूसी भरी निगाहों से गीता कि तरफ देखा, गीता के चहरे पर भी मायूसी छा गई थी.

“अजय तुमने बताया नहीं. मालिक से क्या काम है तुमको?” मुनीम ने उससे फिर सवाल किया.

“जब मालिक ही यहाँ नहीं है तो बताने से क्या फायदा? मुनीम के दूसरी बार पूछने पर मजदूर अजय ने जवाब दिया.

“अरे भाई मालिक यंहा नहीं है तो क्या हुआ? उनका बेटा और बहु यंहा पर है. अपने केबिन में बैठे है. अभी बाहर आएंगे, कोई जरुरी काम हो, तो उनसे बात कर लेना.

“मुनीमजी मेरे बच्चे को बुखार है, लेकिन छोटे मालिक तो मुझे जानते ही नहीं, फिर में उनसे मदद केसे मांगूं मुनीमजी.?” मुनीम की बात सुन कर अजय ने कहा.

“अरे तो एस बोल न, तेरा बेटा बीमार है. तू चिंता मत कर, अभी मालिक बाहर आएंगे, तो में बात कराउंगा तेरी उनसे.

इस बार मुनीम का जवाब सुन कर मजदूर अजय को कुछ तसल्ली हुई. उसने गीता कि तरफ देखा तो गीता के चहरे पर भी कुछ राहत महसूस हो रही थी. वह गीता के कंधे पर हाथ रख कर बोला.

“चिंता मत करो गीता विकी को कुछ नहीं होगा. बिलकुल ठीक हो जाएगा”

सेठ अजय बीवी शीतल के साथ अपने केबिन से बाहर आ कर मुनीम से मुखातिब हो कर बोला.

“मुनीमजी जो प्रोडक्शन हमारे हाथ में है वो तयशुदा तारीख में पूरा हो जाना चाहिए. लेट नहीं होना चाहिए. में चलता हूँ. दो दिन तक आ नहीं सकूंगा. ख्याल रखना”

“एक मिनट मालिक. ये अजय और इसकी घरवाली अपनी ही कंपनी में ही काम करता है. आपसे कुछ कहना चाहता है” मुनीम ने अजय कि तरफ इशारा करके कहा.

“कहो क्या बात है?” सेठ अजय मुनीम कि बात सुनने के बाद मजदूर अजय से मुखातिब होते हुए बोला.

“जी मेरे बच्चे को बुखार है. अस्पताल ले जाना है, कुछ रुपयों कि मदद चाहिए मुझे” मजदूर अजय ने सेठ अजय के सामने अपनी समस्या कह दी.

“नाम क्या बताया तुमने अपना?” सेठ अजय ने मजदूर अजय से फिर सवाल किया.

“जी मेरा नाम अजय है”

“ओह माय नामेसेक. बच्चे को बुखार कबसे है?” सेठ ने फिर सवाल किया.

“जी तीन दिन से है. पास में रुपया नहीं होने की वजह से अस्पताल नहीं ले जा सका”

“फिक्र मत करो तुम्हारा बच्चा बिलकुल ठीक हो जायेगा. मुनीमजी इसे जो रुपया चाहिय इसे दे देना. इसके साथ जा कर इसके बच्चे का इलाज कराना” सेठ अजय मुनीम को सुझाव दे कर पत्नी शीतल के साथ रुख्सत हुआ.

मुनीम मजदूर अजय को रुपये दिए और उसके साथ जा कर उसके बच्चे को अस्पताल में दाखिल कराया.

जोजागढ़ के दुसरे सबसे बड़े धनी सेठ है, मनीराम. इनकी कंपनी शहर में कभी नंबर वन हुआ करती थी. लेकिन अब मलूका इंडस्ट्री ने इनका नंबर वन का ताज छीन लिया. मनीराम को आज भी इस बात का मलाल है. लेकिन मनीराम अपनी नंबर वन कि पोजीशन छिन जाने का जिम्मेदार मलूका इंडस्ट्री से ज्यादा अपने बेटे फूलचंद को मानते है. मनीराम को भ्रम है कि अगर फूलचंद ने मन लगा कर मेहनत की होती तो उनकी कंपनी आज भी नंबर वन होती. लेकिन फूलचंद ने कंपनी का कारोबार देखने के बजाय अपने दोस्तों के साथ मौजमस्ती में ही समय बर्बाद किया जिसका फायदा मलूका इंडस्ट्री को मिला.

फूलचंद को खबर लगी कि मलूकदास के बेटे अजय ने अपनी कंपनी का कारोबार अपने हाथ में ले लिया है. और अब वो कंपनी को तरक्की के रास्ते पर और भी तेज़ी से बढ़ाने लगा है. वह इसकी सूचना देने के लिए मनीराम के पास पहुंचा.और बोला.

 
“अब क्या होगा पापा?”

क्या हुआ शहर में भूचाल आ गया क्या?” फूलचंद कि बात पर मनीराम ने प्रतिक्रिया दी.

“अब हम नंबर वन कभी नहीं बन पायेंगे.” फूलचंद ने जवाब दिया.

“वो तो बनने का सवाल ही पैदा नहीं होता. तेरे जैसे नकारा को पैदा जो किया है.लेकिन तुम्हे अचानक ये एहसास केसे हो गया, कि हम नंबर नहीं बन सकते?”

“वो मलूका का बेटा है न, विदेश से बिजनेस कि पढाई करके आया है. वो मलूका इंडस्ट्री के लिए नए नए नियम बना रहा है.कंपनी बहुत तरक्की कर रही है”

“ओह तो ये दुश्मन के घर कि खुश खबरी मुझे सुनाने आया है. दूर हो जा मेरी नजरो से. मनीराम ने फूलचंद फटकारते हुए कहा.

“अरे क्यों डांट रहे है आप, मेरे फूलचंद को? फूलचंद कि माँ ने बेटे का पक्ष लेते हुए कहा.

“अरे भाग्यवान, ये फूलचंद नहीं भूलचंद है, भूलचंद. मेरी भूल का नतीजा. मेरी भूल हुई जो इस नालायक को पैदा किया.

“अरे बताइए तो सही हुआ क्या है?” फूलचंद कि माँ ने मनीराम से कहा.

“ये नालायक दुश्मन के घर कि खुशखबरी ला कर मुझे सुना रहा है, किसलिए? मेरे जख्मों पर नमक रगड़ने के लिए. मलूका के बेटे ने ये किया, वो किया, ये कर रहा है, वो कर रहा है. अरे नालायक, कुछ खुद के बारे में भी सोच, कि तू क्या कर रहा है. दिन भर अपने अवारा दोस्तों के साथ अवारा गिरी?” मनीराम ने अपनी घर वाली को जवाब देते हुए कहा.

“आखिर बेटा तो आपका ही है न. वही तो करेगा जो आपने किया है. आपके पिताजी ने इतना बड़ा कारोबार खड़ा करके दिया आपको. लेकिन आप इसे नहीं संभाल पाए. हमेशा नंबर बने रहने के चक्कर में कारोबार को आगे बढाने के बजाय, खुद से आगे निकलने वालों को गिराने का कम करते रहे.”

“वो तो में आज भी करता हूँ, और हमेशा करता रहूँगा. जो भी मेरा रास्ता काटने कि कोशिश करेगा उसे मैं मिटी में मिला दूंगा. लेकिन इस नालायक के लिए क्या नहीं किया मैंने? इसे पढाया लिखाया. सोचा बेटा पढ़ लिख कर कारोबार संभालेगा. लेकिन इसे तो अवारागर्दी से ही फुर्सत नहीं है.अवारागर्दी ही करनी थी तो फिर इस पढाई कि डिग्री का क्या करेगा, भोगली करेगा?.” मनीराम ने बेटे और बीवी पर गुस्सा हो कर कहा.

“बस बस, बहुत हो गया अब. बढती उम्र के साथ साथ आपमें बोलने कि तमीज़ भी नहीं रही”. मनीराम कि अंट शंट भाषा पर उसकी घर वाली ने प्रतिक्रिया दी.

दो दिन बाद, रविवार कि सुबह, शीतल पांच बजे ही उठ गई थी, लेकिन उसका पति अजय, और पांच साल कि बेटी कोमल सो रहे थे. शीतल नित्यकर्म से निवृत हो कर किचन गई. चाय बना कर सास ससुर को चाय दी. फिर अजय के लिए चाय ले कर अपने कमरे में गई. वह अजय को झिंझोड़ कर जगाने कि कोशिश करने लगी.
 
“अजय, छः बज गए है,. जल्दी उठ जाइये में चाय ले अई हूँ, चाय ठंडी हो जाएगी.”

“अरे मैडम आज तो सन्डे है. कहीं जाना भी तो नहीं. फिर इतना जल्दी क्यों जगा रही हो?” अजय ने अपने सर पर कम्बल खिंची और करवट बदलते हुए कहा.

“आपको कहीं नहीं जाना, लेकिन मुझे शोपिंग के लिए जाना है. और आपको साथ में चलना है.”

“अरे शोपिंग के लिए जाना है, लेकिन मार्केट तो खुलेगा तब न. सुबह इतना कौन मार्केट खोल कर बैठा है?” इस बार अजय कम्बल हटा कर उठा और शीतल से बात करने लगा.

“लेकिन पहले मंदिर जाना है.मंदिर में बहुत भीड़ होती है, लाइन में लगना पड़ता है, मंदिर में जायेंगे तब तक मार्केट भी खुल जाएगा” शीतल ने अपना प्लान अजय के सामने कह दिया.

“आपने शायद कसम ले रखी है.सन्डे के दिन भी मुझे नहीं सोने देना है.” अजय उठते हुए बोला.

अजय नित्यकर्म से निवृत हो कर शीतल के साथ मंदिर और मंदिर से मार्किट जाने के लिए तेयार हो गया.

“बहु, जल्दी आ जाना, कोमल जाग गई तो तुम्हे यंहा न पा कर मुझे परेशां करेगी” शीतल बाहर कि तरफ जा रही थी. तब उसकी सास शांति ने कहा.

“हाल में बैठे मलूकदास, अखबार पढ़ते हुए चाय सुरक रहे थे. अजय को देखते ही अखबार एक तरफ रखा, और अजय से मुखातिब हो कर बोले.

“बाहर जा रहे हो तो संभल कर जाना बेटे. हफ्ता वसूली गेंग का लीडर है शाकाल नाम है उसका. उसने मुझे फोन करके एक करोड़ रुपये कि मांग कि है. और नहीं देने पर अंजाम भुगतने कि धमकी दी है.”

“आप बेवजह परेशान हो रहे हाई पापा. जो थोड़ी भी आराम कि जिंदगी जीने लग गया, उनके बहुत सारे दुश्मन हो जाते है. लेकिन हमें इस तरह डरना नहीं चाहिए,” अजय ने प्रतिक्रिया दी और चल दिया.

अजय और शीतल मंदिर और उसके बाद शोपिंग के लिए निकल पड़े. मंदिर के रास्ते में एक फूलमाला वाले कि दूकान थी. उस दूकान पर फूलमाला के अलावा पूजा कि अन्य सामग्री भी मिलती थी. अजय ने उस दूकान के सामने कार रोकी, शीतल कार से निकल कर दूकान पर गई. फूलमाला और पूजा का सामान खरीद कर लाई. वहां से रवाना हो कर दोनों मंदिर पहुंचे. मंदिर के पार्किंग एरिया में कार पार्क करके दोनों मंदिर में चले गए. मंदिर में भीड़ थी. दोनों श्रद्धालुओं की लाइन में लग गए. करीब एक घंटा बाद में दोनों पूजा करके बाहर आये. मदिर से फ्री होने के बाद शोपिंग और फिर घर जाना था. मंदिर से थोड़ी ही दूर गए होंगे कि अजय के फोन कि घंटी बजने लगी. स्क्रीन पर नंबर देखा तो उसके चेहरे पर गुस्सा उभर आया. नंबर कंपनी के मुनीम का था. और मुनीम को सन्डे के दिन फोन नहीं करने के लिए मना किया हुआ था फिर भी मुनीम ने फोन किया. अजय ने कॉल रिसीव करके फोन कान से लगाया और बरस पड़ा मुनीम पर.

“मुनीमजी, कितनी बार बोला है आपको, कि सन्डे के दिन फोन मत किया करो” लेकिन मुनीम का जवाब सुनते ही अजय के चेहरे पर गुस्से के भाव गायब हो गए और अफ़सोस के भाव पसर गए. अचानक अजय के चेहरे का बदला मिजाज देखा कर शीतल का दिल किसी अनहोनी की आशंका में धड़कने लगा वह अजय के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करने लगी.

“लेकिन ये हुआ कब, और केसे हुआ? उन लोगो से बोलो, कि में एक घंटे बाद आ रहा हूँ,” मुनीम को सुझाव दे कर अजय ने फोन कट कर दिया.

“क्या हुआ?” शीतल ने पूछा.

“नहीं कुछ नहीं. अपनी कंपनी में काम करने वाला मजदूर था न अजय, जो परसों अपनी बीवी और बीमार बच्चे को ले कर हमारे पास आया था”

“क्या हुआ उसके बच्चे को? मर गया क्या?” शीतल अजय कि बात बीच में ही कटते हुए बोली.

“नहीं, उसके बच्चे को तो कुछ नहीं हुआ है. लेकिन उसकी खुद क़ी मौत हो गई” अजय ने शीतल के सवाल का जवाब दिया.

“क्या! उसकी मौत हो गई? लेकिन वो तो चंगा भला था क्या हुआ उसे?” शीतल ने अगला सवाल किया.
 
“उसे करंट लगा था. कल शाम को पांच बजे जब वो हमारी कंपनी में काम कर रहा था तब. उसे अस्पताल में भरती कराया गया. लेकिन आज तड़के पांच बजे उसकी मौत हो गई. इस वक्त हमारी कंपनी में पुलिस आयी हुई है. उसकी मौत क़ी जांच करने के लिए”

“ओह अजय. आपने तो मुझे डरा ही दिया था. आपको इस तरह बात करते देख कर किसी अनहोनी क़ी आशंका में मेरा तो कलेजा हलक में आ गया था” अजय का जवाब सुना कर शीतल ने राहत क़ी साँस ली.

“ये क्या किसी अनहोनी से कम है शीतल? बेचारे गरीब मजदूर का बच्चा अनाथ हो गया” अजय ने मजदूर क़ी मौत का दुःख व्यक्त करते हुए कहा, और कार को ब्रेक लगाया.

“ओफ़्हो, अब क्या हो गया, कार क्यों रोक दी?” शीतल ने कहा.

“आ गया शोपिंग मॉल. शोपिंग करनी है क़ी नहीं करनी आपको?” अजय ने शीतल से कहा.

” ओह, में तो भूल ही गई थी. चलो चलते है”

“नहीं में नहीं चलूँगा. आपको जो कुछ लाना है ले कर आइये, में आपका इंतज़ार करता हूँ.”

शीतल अकेली ही शोपिंग के लिए माल में चली गई. लगभग पंद्रह बीस मिनट बाद वह कपडे कोस्मेटिक और अन्य जरुरी सामान ले कर वापस आयी. उसने कार का पिछला दरवाजा खोल कर सामान पिछली सीट पर रखा. पिछला दरवाजा बंद करके वह आगे क़ी सीट पर बैठते हुए बोली.

“अब चलो जल्दी घर पहुँचाना है. कोमल जाग गई तो मुझे वहां नहीं पा कर मम्मीजी और बाबूजी को परेशान करेगी”

लेकिन अजय पर मानो शीतल क़ी बात का कोई असर ही नहीं हुआ हो. वह नज़रे झुकाए ड्राइविंग सीट पर खामोश बैठा रहा.

“कहाँ खो गए अजय? में आपसे कह रही हूँ. जल्दी कार स्टार्ट करो और चलो” इस बार शीतल ने अजय को झिन्झोड़ते हुए कहा.तो अजय ने घूरती निगाहों से नजरें उठा कर शीतल क़ी तरफ देखा. अजय द्वारा इस तरह घूर कर देखना शीतल को अजीब सा लगा.

“अरे ऐसे क्या देख रहे हो? जैसे पहली बार देख रहे हो.” अजय द्वारा घूर कर देखने पर शीतल ने सवाल किया.

“नहीं पहली बार नहीं में आपको दूसरी बार देख रहा हूँ” अजय ने शीतल के सवाल का जवाब दिया.

“ओह! अजय मजाक छोडो. और चलो, जल्दी घर जाना है”

“मुझे कार चलाना नहीं आता” अजय ने कहा.

“कार चलना नहीं आता! फिर यहाँ तक कार को कौन ले कर आया है? क्यों बार बार मजाक कर रहे हो ?” शीतल अजय क़ी तरफ हैरानी से देख कर कहने लगी..

“अगर आपको लगता है कि मैं मजाक कर रहा हूँ तो मजाक ही सही. पर कार में नहीं चलाऊंगा आपको ही चलानी पड़ेगी” अजय ने जवाब दिया.
 
“ठीक है, आप इस तरफ आ जाइये में चला लूंगी” शीतल कार से बाहर निकली, दूसरी तरफ ड्राइविंग सीट पर जा कर बैठ गई. अजय सरक कर दूसरी तरफ बैठ गया. शीतल कार चलाती रही, अजय दूसरी तरफ नजरें झुकाए बैठा रहा. शीतल से बात करना तो दूर, उसने शीतल क़ी तरफ नजरें उठा कर देखा तक नहीं. जेसे इन दोनों के बीच कोई रिश्ता ही नहीं हो. अजय में अचानक आया बदलाव व उसकी खामोशी शीतल को अटपटी लग रही थी. लेकिन शीतल इस ख़ामोशी के रहस्य को समझ नहीं पा रही थी. विचारों के भंवरजाल में गोते लगाते हुए, शीतल घर पहुँच गई. उसने कार पार्किंग में लगाई. कार का पिछला दरवाजा खोल कर सामान लिया. एक नजर अजय पर डाली अजय अब भी नज़रें झुकाए कार के अन्दर ही बैठा था.

“अब अन्दर भी चलेंगे या यही बैठे रहने का इरादा है. चलिए अंदर”

अजय कार से बाहर निकल कर खड़ा हो गया, लेकिन उसकी निगाहें अब भी जमीन की तरफ ही थी. वह न तो कुछ बोल रहा था. और न ही शीतल से नजरें मिला रहा था. शीतल रवाना हुई तो अजय भी शीतल के पीछे चलने लगा. लेकिन उसके चलने का तरीका भी बदल गया था. ऐसा लग रहा था जैसे वह इस जगह पहली बार आया हो. आगे कहाँ जाना है उसे कुछ पता ही न हो. शीतल ने फिर पीछे मुड़ कर देखा वह अजय के रूखे व्यवहार से आहत हो कर बोली.

“अजय! क्या हो गया है आपको? आप इस तरह उखड़े उखड़े क्यों है? अगर मुझसे कोई गलती हो गई है तो बताइए मुझे. में आपसे माफ़ी मांग लुंगी. लेकिन आपकी ये बेरुखी मुझसे बरदास्त नहीं होती.”

“नहीं तो, मैंने कब रुखा बर्ताव किया है आपके साथ. आपको ऐसे ही लग रहा है” इस बार शीतल की बात पर अजय ने अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी. अजय की बात सुन कर शीतल को कुछ तसल्ली हुई कि है तो सब ठीक. लेकिन अजय शीतल के पीछे चलते हुए घर के अन्दर तो चला गया, पर दरवाजे के अन्दर की तरफ जा कर फिर ठिठक गया. जैसे अन्दर जाने से डर लग रहा हो. कोई ये ना कह दे कि अरे अरे, अन्दर कहाँ चले आ रहे हो? वह इधर उधर देखने लगा. मानो सोच रहा हो अब किधर जाना है. उसके चहरे पर असहजता के भाव साफ़ नजर आ रहे थे. अजय को इस तरह खड़ा देख कर शीतल फिर हैरान हो कर उसक़ि तरफ देखने लगी. अजय की माँ शांति देवी भी उसे इस तरह खडा देख कर बोली.

“अजय बेटा,. वहां दरवाजे पर क्यों खडा है?” माँ ने पूछा, लेकिन अजय ने उसकी बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

कोमल “पापा आ गए पापा आ गए” कहती हुई दौड़ कर अजय के पास आइ, और अजय से लिपटते हुए बोली,

“पापा, कहाँ चले गए थे आप दोनों? मुझे बिना बताये ही. लेकिन मुझे मालूम है. आप दोनों मंदिर गए थे. मुझे साथ क्यों नहीं ले गए? में आप दोनों से कभी बात नहीं करुँगी.” कोमल अजय से सवाल कर रही थी. लेकिन अजय कोमल की बात पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था. बस खामोश खडा था. शांतिदेवी और शीतल अजय की खामोशी को हैरानी से देख रही थी. दोनों आश्चर्यचकित थी. क्योंकि हमेशा घर में घुसते ही अजय कोमल को पुकारता था. कोमल दौड़ कर आती थी. अजय कोमल को गोद में उठा लेता था. पूरा घर खुशियों से खिलखिलाने लगता था. लेकिन आज कोमल बार बार अजय से सवाल पूछ रही थी. और अजय खामोश खड़ा था. अजय की खामोशी से पूरा घर मरघट लग रहा था. कोमल अब भी सवाल पूछ रही थी.

“बताइए न पापा, आप मुझे साथ क्यों नहीं ले गए?” पापा का जवाब नहीं मिलाने पर कोमल अपनी मम्मी शीतल के पास जा कर बोली.

“मम्मी, पापा मुझसे बात क्यों नहीं करते मम्मी?” शीतल और शान्ति खामोश खड़े अजय को अब भी हैरानी से देख रही थी कि अचानक अजय के मोबाइल फोन की घंटी बजने लगी. लेकिन अजय ने फोन जेब से निकाला तक नहीं. अजय को खामोश खड़ा देख कर शीतल उसके पास आइ और बोली.

“अजय, आपके फोन की घंटी बज रही है” लेकिन शीतल की बात पर अजय ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

“कहाँ खो गए अजय? मैं आप से कह रही हूँ आपके फोन की घंटी बज रही है.” शीतल ने उसे झिंझोड़ते हुए फिर कहा.

 
“ये लो बात कर लो” अजय ने फोन जेब से निकाल कर शीतल की तरफ बढाते हुए कहा.

“अरे, मैं कैसे बात कर लूँ? कॉल आपके फोन पर आइ है. क्या बात करुँगी मैं?” शीतल ने काल रिसीव करने से इनकार कर दिया. तब तक पहली कॉल समाप्त हो गई थी. और फिर दुबारा कॉल आ गयी.

“ये लो, जो भी है उससे कह दो कि मेरी तबियत ठीक नहीं है” इस बार भी अजय ने कॉल रिसीव करने के बजाय फोन शीतल क़ि तरफ कर दिया. शीतल ने स्क्रीन पर नंबर देखा तो मालुम हुआ क़ि फोन उसके ससुर मलूकदास ने ही किया था. उसने कॉल रिसीव करके फोन कान से लगा लिया.

“हाँ बाबूजी बोलिए. मैं शीतल बोल रही हूँ.”

” बहू, अजय कहाँ है? वो फोन क्यों नहीं उठता?” सामने से मलूकदास की आवाज आयी,

“बाबूजी, अजय कह रहे है क़ि उनकी तबियत ठीक नहीं है. मुझे बोला कॉल रिसीव करने के लिए.”

“तबियत ठीक नहीं है! क्या हुआ उसे? ठीक है, में आ रहा हूँ. अभी. तुम अजय का ख्याल रखना” शीतल को सुझाव दे कर मलूकदास ने फोन कट कर दिया. शीतल फोन और मार्किट से लाइ शोपिंग का सामान अजय के हाथ में थमाते हुए बोली.

“ये लो, आपकी तबियत ठीक नहीं है, तो ये सामान पकड़ो, और कोमल को ले कर अपने कमरे में जाओ, में चाय बना कर लाती हूँ.”

“चलो पापा” कोमल अजय क़ि अंगुली पकड़ कर आगे चलने लगी, और अजय कोमल का अनुसरण करते हुए कोमल के पीछे चलने लगा. शीतल और शांति देवी फिर हैरान हो कर अजय को देखने लगी. क्योंकि हमेशा कोमल अजय क़ि अंगुली पकड़ कर उसके पीछे चलती थी, लेकिन आज कोमल अजय के आगे चलती थी जैसे घर में आये किसी अजनबी मेहमान को घर दिखाने के लिए आगे चल रही हो.

अजय अपने कमरे में जा कर सो गया. शीतल किचन में चली गयी, शान्ति देवी शीतल के पास जा कर अजय के बारे में पूछने लगी.

“बहू, अजय को हुआ क्या है? वो इस तरह खामोश क्यों है? तुम दोनों के बीच झगडा हो गया क्या?”

“नहीं मम्मीजी, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ है. में तो खुद नहीं समझ नहीं पा रही हूँ, क़ि आखिर हुआ क्या है. मैं शोपिंग के लिए मॉल में चली गयी, और अजय कार में ही बैठे थे. जब शोपिंग करके वापस आइ तो मैंने इस तरह ये बदलाव देखा. बात करना तो दूर नजरें तक नहीं मिलाते. कार में खुद चला कर लाई हूँ.” शीतल ने शान्ति देवी से बात करते हुए चाय बनायीं. तब तक मलूकदास आ गए. आते ही अजय के बारे ने सवाल किया. फिर शीतल और मलूकदास दोनों अजय के पास गए.

“अजय बेटे क्या हुआ?” मलूकदास ने अजय से सवाल किया. लेकिन अजय खामोश बैठा रहा. उसने मलूकदास के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया.

“अजय, बाबूजी आपसे कुछ पूछ रहे है. आप जवाब क्यों नहीं देते? क्या तकलीफ है आपको, जी मिचला रहा है, बदन दर्द हो रहा है, या कुछ और, आप बताइए बाबूजी को.”

“बैचेनी हो रही है.” शीतल द्वारा पूछने पर अजय ने जवाब दिया.

“कोई बात नहीं, मैंने डॉक्टर को फोन कर दिया है. वो आता ही होगा. अजय मैंने तुमको कल एक फाइल दी थी. वो फाइल मुझे दो. मुझे उसकी जरुरत है.”

“कौनसी फाइल?” मलूकदास ने फाइल के बारे में पूछा तो अजय ने मलूकदास से ही सवाल पूछ लिया.

“कौनसी फाइल का क्या मतलब? आप भूल गए, लेकिन मुझे मालुम है. आपने वो फाइल ब्रिफकेस में रखि है” शीतल ने फाइल क़ि जानकारी देते हुए कहा.

“तो आप निकाल कर दे दीजिये” अजय ने शीतल से कहा.

“अरे मैं कैसे दे दूँ? ब्रीफकेस का लॉक नंबर आपके पास है” शीतल इस बार बिफरने लगी थी.

 
“बहू रहने दे, फाइल बाद में ले लेंगे.. अभी इसकी तबियत ठीक नहीं है. अजय बेटा, तुम आराम करो” मलूकदास शीतल के साथ बाहर जाने लगा, तब कोमल दादा से पापा क़ि शिकायत करते हुए बोली.

“दादाजी, पापा मुझसे बात क्यों नहीं करते? आप समझाइए न पापा को दादाजी.”

“कोमल बेटी, पापा क़ि तबियत ठीक नहीं है. जब तबियत ठीक हो जायेगी न, तब बात करेंगे. अभी चलो बाहर चलते है. पापा को आराम करने दो.” मलूकदास कोमल को ले कर बाहर आ गया. तब तक डॉक्टर सक्सेना भी आ गया. डॉक्टर ने अजय क़ि प्राथमिक जांच क़ि और एक पर्ची पर दवाई लिख कर पर्ची मलूकदास के हाथ में थमाते हुए बोला.

“सेठजी, मैंने जांच कर के दवाई लिख दी है. कल तक इससे आपको फर्क नजर आये तो ठीक है. नहीं तो अजय को अस्पताल में दाखिल करना होगा.” डॉक्टर मलूकदास को सलाह दे कर चला गया. मलूकदास ने एक दिन तक अजय के ठीक होने का इंतज़ार किया लेकिन अजय क़ि सेहत में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा था. उसकी खामोशी ही उसकी सबसे बड़ी बिमारी थी.

अजय की सेहत में सुधार हुआ. मलूकदास अजय को ले कर अस्पताल पहुंचे शीतल और अजय की माँ शांति देवी भी साथ में थी. अजय को अस्पताल में दाखिल कराया गया.हर तरह की जांच होने के बाद जांच डॉक्टर ने बताया की अजय को किसी भी प्रकार की शारीरिक बिमारी नहीं है.

“ये क्या कह रहे है आप डॉक्टर? मेरा बेटा जीते जागते इंसान से खामोश बुत बन गया है और आप कह रहे है की इसे कोई बिमारी ही नहीं है. ये कैसे हो सकता है?” मलूकदास ने हैरान हो कर डॉक्टर से कहा.

“मैं आपकी बात समझ सकता हूँ सेठजी. लेकिन आप बिमारी के जो लक्ष्ण बता रहे है वो किसी शारीरिक बिमारी के नहीं बल्कि मानसिक बिमारी के है. जैसा की आपने बताया मरीज का खामोश और अकेले बैठे रहना, किसी से भी बात नहीं करना, ये लक्ष्ण मानसिक बिमारी के है. डॉक्टर ने अजय को मानसिक बिमारी होने की आशंका जाहिर की.

“लेकिन इसकी वजह क्या हो सकती है.? मलूकदास ने फिर सवाल किया.

“वजह कोई भी हो सकती है पूरा मालूम तो किसी मानसिक डॉक्टर से सलाह लेने पर ही होगा. लेकिन कोई बात जरुर है जो मरीज के दिलो दिमाग पर हावी है और इसे परेशान कर रही है. आप किसी मानसिक डॉक्टर से सलाह लीजिये. ये ही बेहतर रहेगा. अगर सही वक्त पर इलाज नहीं हुआ तो खतरनाक हो सकता है.”

डॉक्टर सक्सेना की सलाह मान कर मलूकदास मानसिक डॉक्टर से जा कर मिले. उस डॉक्टर ने जांच करके अगले दिन जांच रिपोर्ट देने की बात कही. उसके बाद मलूकदास अजय को ले कर घर आ गए. घर आते ही अजय अपने कमरे में जा कर सो गया.

“बाबूजी डॉक्टर ने कहा है की अजय के दिलो दिमाग पर कोई बात हावी हो गई है. जो इनको परेशान कर रही है. इस बात पर मुझे एक बात याद आ रही है. चार दिन पहले हमारी कंपनी में एक मजदूर काम करते हुए करंट लगने से मर गया था. जब हम शोपिंग के लिए गए थे तब अजय को फोन पर उसके मरने की खबर मिली और अजय ने कहा था की बेचारे गरीब मजदूर का बच्चा अनाथ हो गया”

“नहीं नहीं. ऐसे थोड़े ही हो सकता है. माना की मेरा बेटा दयालु है गरीबो का हितेषी है. लेकिन किसी गैर की मौत का सदमा अपने दिमाग पर क्यों लेगा.ये हो ही नहीं सकता” मलूकदास ने शीतल की बात से असहमत हो कर कहा.

“मैं इस बात का अंदाजा लगा रही हूँ इसलिए की उसके तुरंत बाद मैंने अजय में ये बदलाव देखा है.”

“नहीं शीतल बात तो कुछ और है. लेकिन है क्या ये मैं भी समझ नहीं पा रहा हूँ” मलूकदास ने फिर शीतल से असहमत हो कर कहा.

अजय की बिमारी की खबर जब उसकी बहिन आरती को लगी तो वह भी अपने के साथ भाई से मिलाने के लिए आई. शीतल के माता पिता भी आये. आरती घर में आते ही सीधी अजय के पास पहुंची.

कैसे हो भैया? कैसी है अब आपकी तबियत? आरती ने हमेशा की तरह चहकते हुए कहा. आरती को उमीद थी की उसे देखते ही अजय खुश होगा. उसे गले से लगा लेगा. क्योंकि आरती अजय की इकलौती बहिन थी. और अजय आरती को जान से भी ज्यादा प्यार करता था. उसकी हर ख़ुशी का ख्याल रखता था. लेकिन आज अजय की खामोशी ने आरती को मायूस ही किया. वह नज़ारे झुकाए बैठा रहा.

 
“मैं ठीक हूँ.”आरती के अनेक सवालों पर अजय ने इतनी ही प्रितिक्रिया दी.

“तो फिर बैठक हॉल में चलिये आपके सास ससुर और अन्य मेहमान आपसे मिलने आये हैं.” आरती ने अजय से बाहर चलने के लिए कहा.

“मैं नहीं चल सकता तुम जाओ” अजय ने बाहर चलने से इनकार कर दिया. शीतल और आरती हैरानी से देखती रही.

“आपकी तबियत ठीक नहीं होने की खबर सुन कर इतने मेहमान आपसे मिलने के लिए आये है. और आप बैठक में जा कर उनसे मिलना जरुरी नहीं समझते. आखिर हो क्या गया है आपको?” शीतल ने कड़कते हुए और ऊँची अजय से कहा.

“मुझे कुछ नहीं हुआ है. मुझे कुछ दिन के लिए एकांत चाहिए.” इस बार अजय की आवाज और भी तीखी थी. शीतल और आरती दोनों सहम गयी. वे दोनों बाहर चली गयी. अजय दूसरी तरफ करवट करके सो गया.

सब मेहमानों ने शाम का खाना खाया और अलग अलग कमरों में जा कर सब लोग सो गए. रात के बारह बजे होंगे सब लोग गहरी नींद में थे उस समय मलूकदास के फोन की घंटी बजने लगी. घंटी की आवाज सुन कर मलूकदास ने फोन हाथ में ले कर स्क्रीन पर नंबर देखा. अनजान नंबर से कॉल आया था. फिर भी कॉल रिसीव करके फोन कान से लगा लिया.

“मैं तो अच्छा ही हूँ लेकिन आप कौन बोल रहे है.?” मलूकदास ने कॉल करने वाले से पूछा.

“लगता तुमको भूलने की बिमारी है. लेकिन अपुन तेरे को आज फिर याद दिला रहेला है कि चार दिन पहले अपुन ने तेरे को फोन करके बताया था की अपुन को एक खोखा मांगता है. खोखा तैयार है की नहीं.?” सामने वाले की बात सुन कर मलूकदास ने उसे पहचान लिया था. ये वो ही हफ्ता वसूली गेंग का लीडर शाकाल था. जो मलूकदास को पहले भी कई बार फोन करके रुपये की मांग कर चुका था. लेकिन मलूकदास ने उसे फूटी कौड़ी भी नहीं दी. और आज भी नहीं देने का फैसला करके ऊँची आवाज में फोन पर ही भिड़ गया था शाकाल से.

“हरामखोर रात को बाहर बजे मुझे फोन करने की तेरी हिम्मत कैसे हुई? तुझे खोखा नहीं जेल की काल कोठरी मिलेगी शाकाल. तू जेल में चक्की पिसेगा चक्की.” मलूकदास की कड़कती और ऊँची आवाज सुन कर मलूकदास की घरवाली शांति देवी भी जाग गई वह भयभीत हो कर मलूकदास की तरफ देखने लगी.

“अपुन जेल की धमकी से डरने वाला नहीं है मलूकदास.अब तुम अपुन को एक खोखा नहीं दो खोखा दोगे. वरना तुम्हारे बेटे की लाश मिलेगी तुम्हे”

“क्क्क्या! क्या मतलब है तुम्हारा?” इस बार शाकाल की बात सुन कर मलूकदास के दिल में किसी अनहोनी की आशंका पसर गयी. उसके चेहरे पर भी गुस्से की जगह घबराहट पसर गयी.

“तुम्हारा बेटा अजय अपुन के कब्जे में है. अब तुम या तो अपुन को दो खोखा दोगे या फिर अपने बेटे की लाश ले कर जाओगे. फैसला तुम्हारे हाथ में है.” इस बार शाकाल की बात सुन कर मलूकदास को यकीन हो गया था की अजय का अपहरण हो गया है.

“क्या हुआ मलूकदास नानी मर गयी क्या?” शाकाल ने फिर कहा.

“एक मिनट मैं फोन कट करके दस मिनट बाद वापस करता हूँ.” इतना कह कर मलूकदास ने फोन कट कर दिया वह उठ कर कमरे से बाहर निकला और जोर से शीतल को आवाज लगाई. मलूकदास की आवाज सुन कर अपने कमरों में सो रहे सारे मेहमान भी जाग गए थे. शीतल नींद से जाग कर बाहर आ गयी थी.

“क्या बात है बाबूजी क्या हुआ?” शीतल ने मलूकदास से पूछा.

“शीतल अजय कहाँ है?” मलूकदास ने शीतल से पूछा लेकिन शीतल कोई जवाब नहीं दे पाई. शायद वो कुछ समझ ही नहीं पायी होगी.

“मैंने कहा अजय अपने कमरे में है की नहीं?” मलूकदास ने फिर जोर से पूछा

“एक मिनट में देख कर आती हूँ.” शीतल दौड़ कर वापस अपने कमरे में चली गयी.

“क्या बात है पापा?” आरती ने सवाल किया लेकिन मलूकदास ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.बाकी सब लोग हैरानी से मलूकदास की तरफ देख रहे थे.
 
“वे अपने कमरे में नहीं है बाबूजी.” शीतल ने वापस आ कर कहा. लेकिन शीतल की बात पर कोई प्रतिक्रिया दिए बिना ही मलूकदास बाहर की तरफ चल पड़े. बाकी सब लोग भी उनके पीछे थे. मलूकदास ने चौकीदार को आवाज लगाई चौकीदार उनके पास आया.

“अभी बंगले के अन्दर कौन आया था?” मलूकदास ने चौकीदार से सवाल किया.

“नहीं सेठजी यहाँ तो कोई नहीं आया.” चौकीदार ने जवाब दिया.

“तो फिर अजय बाहर गया?” मलूकदास ने अगला सवाल किया.

“हाँ छोटे मालिक तो घंटा भर पहले बाहर गए थे. लेकिन अभी तक आये नहीं. मुझे बताया की वे पान लेने जा रहे है” चौकीदार ने अजय के बाहर जाने कि जानकारी दी.

“ये पान कबसे खाने लगा.? और तुमने उसे रोका क्यों नहीं?” मलूकदास ने चौकीदार पर भड़कते हुए कहा.

“मैं उनको कैसे रोक सकता हूँ मालिक वो हमारे सेठ है” चौकीदार ने जवाब दिया.

“तो अब भुगतो सब. तुम्हारे सेठ का अपहरण हो गया है. और उसे छोड़ने के लिए दो करोड़ र्रुपये मांगे है” इस बार मलूकदास की बात सुन कर सबके दिलो पर जैसे बिजली टूट पड़ी हो.

“अपहरण! ये क्या कह रहे है आप?” शान्ति देवी ने आश्चर्य से कहा.

“अब क्या क्या होगा पापा?” आरती ने रुआंसी हो कर कहा”

“होगा क्या. छुड़ा कर लाना होगा उसे. मैं छुड़ा कर लूँगा उसे तुम लोगों को किसी को भी घबराने कि जरुरत नहीं है.” मलूकदास ने घर वालो को भरोसा दिलाया और फिर शाकाल के नंबर पर फोन लगाया. उधर घंटी जाने लगी.

“हाँ बोलो मलूकदास, अपून को विश्वास था कि तुम फोन जरुर करोगे” सामने से शाकाल कि आवाज आई.

“देखो शाकाल मैं तुम्हे दो करोड़ रुपया देने को तैयार हूँ. लेकिन मेरे बेटे को कुछ मत करना. बोलो रुपये कहाँ ले कर आना है. मैं अभी इसी वक्त आ रहा हूँ” मलूकदास ने शाकाल से विनती करते हुए कहा.

“गुड. अपून को पूरा यकीन था.तुम ऐसा ही करोगे लेकिन इतना जल्दी झुक जाओगे इस बात का यकीन नहीं था” मलूकदास कि बात पर शाकाल ने प्रतिक्रया दी.

“देखो शाकाल सुबह होने से पहले ही मै ये मामला निपटा लेना चाहता हूँ. क्योंकि अगर ये खबर पुलिस तक पहुँच गई तो पुलिस तुम्हे नहीं छोड़ेगी और तुम मेरे बेटे को नहीं छोड़ोगे”
 
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