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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

जन्माष्टमी के दो दिन बाद ही रंगीली अपने पति रामू के साथ अपनी ससुराल आ गयी, अब वो पहले से ज़्यादा खुश और खिली हुई थी…!

उस रात उसने अपने पति को हर संभव खुशी देने की कोशिश की, उसको दुनिया दारी के कुच्छ गुण बताए, अपनी पत्नी के प्रति उसके क्या कर्तव्य हैं बताती रही..

अपनी एकाध सहेली का उदाहरण देकर उसे समझाया…, परिणाम स्वरूप आज रामू ने अपनी यथाशक्ति अनुसार उसके साथ दो बार सहवास किया…!

लेकिन बात वही थी, पन्चर टाइयर में हवा भरने का कोई ज़्यादा लाभ नही होता..

खैर दो दिन अपने घर रहकर तीसरे दिन वो लाला की हवेली पहुँची, सुबह-सुबह उसका खिला स्वरूप देख कर लाला का दिन ही बन गया…

उनके मन में रंगीली के मिलन को लेकर लड्डू फुट रहे थे…!

मौका देख कर उन्होने उससे बात की, उसने आज रात को आने का वादा किया और सारे दिन उनके बताए कामों में लगी रही….!

आज रंगीली थोड़ा जल्दी अपने घर आगयि, जल्दी-जल्दी अपना काम धंधा निपटाया, सास ससुर और अपने पति रामू को समय से पहले ही उसने खाना खिला दिया…!

लाला ने उसे चुपके से नींद की दवा दे दी थी, जिसे उसने उचित मात्रा में सबके खाने में मिला दिया…

9 बजते ही सारे घर में ख़र्राटों की आवाज़ें गूंजने लगी, उसका पति तो बेचारा वैसे ही काम से थक जाता था,

उसे तो इस दवा की भी ज़रूरत नही थी, लेकिन फिर भी एहतियातन उसने खिला ही दी, ताकि बीच में उसकी नींद ना खुले…!

उसके बाद रंगीली जितना सज-संवर सकती थी, उतना अपने को सजाया, आज उसने घाघरा चोली नही पहनी, अपने शादी के जोड़े में वो किसी दुल्हन जैसी लग रही थी.

अपने को छोटे से शीशे में निहारा, वो अपनी ही सुंदरता पर मोहित हो उठी…मन ही मन खुश होकर बुदबुदाई….

आज मे भी देखती हूँ लाला जी, मर्द की हवस जीतती है, या एक औरत का यौवन ?

आज उसने लाला को पूरी तरह अपने रूप यौवन का रस्पान करके अपने जाल में फँसाने का मन बना लिया था…!

पूरी तरह सज-सँवरने के बाद उसने एक सरसरी नज़र अपने पल्लेदार पति पर डाली, और बुदबुदाते हुए बोली – माफ़ करना पतिदेव, अब मे और अपनी इस चढ़ती जवानी का अपमान नही कर सकती…

फिर वो अपने कोठे से बाहर आई, और चौक में पड़े अपने बूढ़े सास ससुर पर नज़र डाली, वो दोनो भी घोड़े बेचकर सोए हुए थे…

पागल जेठ तो जानवरों के बाडे में ही पड़ा रहता था..,

लगभग 10 बजे का वक़्त रहा होगा, गाओं की अंधेरी गलियों में इतनी रात गये किसी के मिलने की तो कोई संभावना ही नही थी,

वो दबे पाँव घर से निकली, बाहर से दरवाजे की सांकल लगाई और चल दी लाला जी के पास, जहाँ वो अपनी प्रेयशी का बड़ी बेसब्री से इंतेज़ार कर रहे थे…

आज रंगीली उनके आगोस में आने वाली है, इसी एहसास से उनका नाग, उनके घुटन्ने में रह-रह कर फुंफ़कारें मार रहा था,

और मारे भी क्यों ना, आज उसे रोज़ की तुलना में ज़्यादा खुराक जो मिल चुकी है, आज लाला ने 8-10 बादाम और ज़्यादा जो घोंट लिए थे दूध के साथ…!

जब वो ज़रूरत से ज़्यादा बबाल मचाने लगा, तो लाला ने अपना घुटन्ना ही उतार दिया, और खाली धोती पहन ली…!

अपने लौडे को बिठाते लाला, रंगीली का इंतेज़ार करते हुए बैठक में इधर से उधर किसी पिंजरे में बंद शेर की तरह टहल रहे थे…!

बॉक्सिंग के कोर्ट जितनी गद्दी पर लाला ने आज नये गद्दे और एक भक्क सफेद चादर बिच्छवा दी थी, शहर से मँगवाए ताजे फूलों के गुलदुस्ते गद्दी के आजू-बाजू महक रहे थे…

बैठक इस समय इंद्र लोक सी प्रतीत हो रही थी…, एक तरफ दीवार से सटा टेबल जहाँ केपर मिश्रित तेल के दिए जगमगा रहे थे…

जल्दी से आजा रंगीली मेरी जान, क्यों इतना तडपा रही है, देख तेरे इंतेज़ार में मेरे लंड की क्या हालत हो रही है, साला मरोड़-मरोड़ के दर्द करने लगा है…!

थक कर लाला, गद्दी पर अपनी गांद टिकाए ही थे कि दरवाजे पर हल्के से दस्तक हुई...! जिसे सुनकर लाला का मन मयूर नाच उठा…!

लपक कर दरवाजा खोला, सामने सोलह शृंगार किए हुए अपने सपनों की रानी को खड़े देखकर मानो उनकी हृदय गति ही थम सी गयी…

वो टक-टॅकी लागाय उसके सुंदर रूप लावण्य में खो गये…, उन्हें ये भी होश नही रहा कि दरवाजा चौपट खुला हुआ है…!

 
रंगीली कुच्छ देर बाबलों की तरह उसे घूर रहे सेठ को देखती रही, फिर हल्की सी मुस्कान अपने होंठों पर लाकर वो मूडी और खुद ही उसने दरवाजे को बंद किया…

लाला की तंद्रा भंग हुई, और वो जैसे ही उनकी तरफ मूडी, लपक कर उन्होने उसे अपनी बाहों में लेना चाहा…

रंगीली ने अपने हाथ का इशारा करके उन्हें रुकने को कहा, लाला अपनी जगह ठिठकते हुए बोले –

अब मत रोको हमें रंगीली रानी, बहुत सब्र कर लिया, अब नही कर पाएँगे…!

रंगीली – मे भी अपना तन-मन आपको सौंपने ही आई हूँ मालिक, लेकिन सबसे पहले अपना वादा तो पूरा करिए…!

धरमदास – कॉन सा वादा…? ओह्ह्ह्ह…वो..! अभी लो, इतना कहकर वो गद्दी की ओर मुड़े, और अपनी डेस्क के उपर रखे कुच्छ बही-खाते उन्होने रंगीली के हाथ पर रख दिए…

लो ये रहे तुम्हारे दोनो घरों के लेन-देन का हिसाब-किताब, देख लो बराबर है कि नही, और जो जी में आए वो इनका करो…!

रंगीली बेचारी ज़्यादा पढ़ी-लिखी तो नही थी, बस पाँचवी तक अपने गाओं के मदरसे में गयी थी,

फिर भी उसने लाला को दिखाने के लिए वो बही खाते खोल लिए, और यूँही पन्ने उलट-पलट कर कुच्छ देर देखती रही…!

लाला – विश्वास करो हमारा रानी, हम तुम्हारे साथ कोई धोखा नही करेंगे…

बही खातों को पकड़े हुए वो मेज की तरफ बढ़ गयी, खातों को बैठक के एक कोने में पटका, वहाँ से एक दिया उठाकर उसका तेल उनपर छिड़का और उसी दिए से उनमें आग लगा दी…!

फिर उन्हें जलता देखकर उसने एक गहरी साँस ली, मानो उसके दिल से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो…!

उसने आज अपने दोनो परिवारों को लाला के क़र्ज़ से मुक्त करा लिया था…!

उसके बाद वो लाला के पास लौटी, और उनकी आँखों में आँखें डालकर बोली – अब ये दासी आपकी गुलाम है मालिक, जैसे जी में आए वैसे भोग सकते हैं…!

लाला ने उसकी कमर में हाथ डालकर अपने सीने से चिपका लिया, उनका मूसल जो अभी भी किसी बॉर्डर के जवान की तरह सीना ताने जंग लड़ने के लिए तैयार खड़ा था, उसकी कमर में जा अड़ा…

उसकी सख्ती महसूस कर रंगीली के मूह से सिसकी निकल गयी…!

लाला ने प्यार से उसके होंठों पर अपनी उंगली घूमाते हुए कहा – तुम हमारी दासी नही हो रंगीली, हमारे दिल की मलिका हो… आज से हमें अकेले में कभी मालिक मत कहना…!

रंगीली सेठ के चौड़े चाकले सीने से लगी उनकी छाती के बालों में अपनी उंगलियाँ फेरती हुई बोली –

मे तो आपकी नौकर हूँ, और अब अपना तन भी आपको सौंप रही हूँ, तो आप मेरे मालिक ही हुए ना…!

लाला – ओह्ह्ह..रानी, छोड़ो ये मालिक नौकर का झंझट, आओ गद्दी पर चलते हैं, इतना कहकर उन्होने उसे किसी बच्ची की तरह अपनी गोद में उठा लिया, और उसे लेकर गद्दी पर आकर बैठ गये…

वो अभी भी उनकी गोद में सिकुड़ी सिमटी सी बैठी थी…, लाला ने उसके हल्की सी लाली लगे होंठों को चूमते हुए उसके कठोर उरोजो को सहला कर कहा –

हम तुम्हारे लिए कुच्छ लेकर आए हैं, ये कहकर पास के ही डेस्क से एक पॅकेट निकाल कर उसे थमाते हुए बोले – इसमें तुम्हारे लिए अधोवस्त्र हैं,

हमारी इच्छा है कि तुम गुसल खाने में जाकर इन्हें पहनो, और उन्ही में हमारे पास आओ…!

जी मालिक हम अभी आए, और पॅकेट लेकर वो बैठक की साइड में बने गुसलखाने में चली गयी…!

लाला बड़ी बेसब्री से गुसलखाने की तरफ दृष्टि जमाए उसके निकलने का इंतेज़ार करने लगे…!

उधर गुसलखाने में जब रंगीली ने वो पॅकेट खोलकर देखा, उसमें गुलाबी रंग की नये जमाने की अंगिया और कच्छी (ब्रा-पेंटी) को देखकर खुद ही उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया…

हाए राम, इतने छोटे कपड़े पहन कर हम मालिक के सामने कैसे जा पाएँगे..? नही नही हमसे ये नही हो पाएगा…!

पर अब तो हम अपना सबकुच्छ सौंपने आही गये हैं, ये भी कपड़े तो निकालने ही पड़ेंगे, तो फिर इन्हें पहनने में ही क्या हर्ज़ है..

देखें तो सही इनमें लगते कैसे हैं…? लेकिन ये बताएगा कॉन…? इसी उधेड़-बुन में उसने अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया…,

एक-एक करके सारे कपड़े उसके बदन से अलग हो गये, आज उसने अपने यौनि

प्रदेश को भी साफ किया था, सो अपनी छोटी सी मुनिया के पतले-पतले चिकने होंठों को सहलाते हुए वो खुद ही शर्म से पानी-पानी होने लगी…!

फिर जी कड़ा करके उसने वो अधोवस्त्र पहन लिए और उपर से बिना पेटिकोट और ब्लाउस के ही साड़ी लपेटकर वो बाहर आ गयी….!

लाला ने उसे देखते ही झुँझलाकर कहा – ओहू.., तुम तो उन्ही कपड़ों में हो अभी भी, हमारी ज़रा सी इच्छा पूरी नही कर सकती…!

वो धीरे-धीरे चलते हुए उनके पास तक आई, और उनके गले में अपनी पतली-पतली बाहें डालकर, नीचे के होंठ को दाँतों तले दबाकर बोली –

अब ये परदा तो आपको ही उठाना पड़ेगा हुज़ूर, लीजिए.. ये कहकर अपनी साड़ी का एक छोर उन्हें पकड़ा दिया…!

लाला उसकी बात समझ गये, और उसकी साड़ी को उसके बदन से अलग करने के लिए दुशासन की तरह खींचने लगे…!

उनके सारी खींचते ही वो भी गोल-गोल घूमने लगी, और दूसरे ही पल उसकी साड़ी द्रौपदी के चीर की तरह उसके बदन से अलग हो गयी, जिसे लाला ने दूर उछाल दिया…

अब उनकी आँखों के सामने जो रंगीली खड़ी हुई थी, वो किसी मेनका से कम नही थी, जो किसी भी विश्वामित्र तक का तप भंग कर्दे, यहाँ तो एक लंपट लाला था…!

उसे पिंक कलर की ब्रा-पैंटी में देखकर लाला की बान्छे खिल उठी और उन्होने उसे अपनी बाहों में भर लिया…………!

धरम दास, अपने सपनो की रानी को मात्र दो छोटे से कपड़ों में देखकर बाबला हो उठा, कितनी ही देर वो उसके रूप को निहारता रहा,

लंबे काले घने बालों के बीच उसका गोल सुंदर पूनम के चाँद सा चेहरा, जिसपर पहली बार नज़र पड़ते ही वो मर मिटा था,

बड़ी बड़ी हिरनी जैसी कजरारी आँखों के बीच माथे पर छोटी सी बिंदिया…, यौं तो रंगीली उसे बहुत सुंदर लगती थी, लेकिन आज वो कुच्छ बन संवर के भी आई थी, इस वजह से उसकी सुंदरता में और चार चाँद लग गये थे…

लंबी सुराइदार गर्दन के नीचे एक छोटी सी ब्रा में क़ैद उसके छोटे-छोटे अमरूद, एकदम गोलाई लिए हुए…, लंबा सपाट पतला सा पेट…जिसपर एक कतरा भी मास का नही था…

हल्की गहराई लिए उसकी नाभि, और उसके नीचे नज़र डालते ही लाला दीन दुनिया ही भूल गये…, एकदम पतली कमर जिसे लाला जैसा मर्द अपने हाथों के बीच समा सकता था…

दो पतली-पतली मक्खन जैसी कोमल जांघों के बीच उसका यौनी प्रदेश जो इस समय उस चार अंगुल की पैंटी में क़ैद था,

उसकी यौनी की पतली-पतली फाँकें हल्की सी उठान लिए उस पैंटी में अपनी उपस्थिति का आभास करा रही थी…!

 
कमर को दोनो हाथों के बीच लेकर लाला ने रंगीली को पलटा दिया, और उसके छोटे-छोटे, गोल मटोल नितंबों को सहला कर अपनी मुट्ठी में भींच लिया…

आआहह………मालिक…. दर्द होता है, बोली रंगीली….!

लाला ने फिर से उसे अपनी बाहों में भर लिया… और चारों ओर घूमते हुए, बैठक के चक्कर लगाते हुए खुशी से नाचने लगे…!

रंगीली की सारी हिचक अबतक जा चुकी थी, खिल-खिलाकर वो बोली – मालिक हमें उतारिये, आपको चक्कर आ जाएँगे….!

एक दो चक्कर लगाकर धरम दास उसे अपनी गोद में लेकर गद्दी पर बैठ गये, उनका लंड अपनी पूरी क्षमता के साथ रंगीली की गान्ड के नीचे अटका पड़ा था…

लगता था, जैसे उसने अपने लिए ज़मीन चुनकर उसपर कब्जा जमा रखा हो…!

किसी बच्ची की तरह गोद में बिठाए लाला ने रंगीली के होंठों को चूमते हुए कहा…, आज तुम्हें पाकर हमारी सारी तमन्ना पूरी होगयि…

औरतों के पीछे भागने वाली हमारी दौड़ आज यहीं ख़तम हो गयी.., हम तुमसे वादा करते हैं, आज के बाद तुम्हारे अलावा, किसी दूसरी औरत के पास नही जाएँगे…!

रंगीली – सच मालिक ! आप हमें इतना चाहते हैं, लाला ने हूंम्म करके जबाब दिया तो वो बोली – तो आज के बाद हम भी आपको कभी निराश नही होने देंगे…!

लेकिन वादा करिए, हमारा ये मिलन हमेशा पर्दे में ही रहेगा…!

लाला – हम तुम्हें वचन दे चुके हैं मेरी रानी, ये कहकर लाला ने उसे गद्दी पर लिटा दिया, और उसके माथे से शुरू करते हुए पैरों तक चूमते चले गये…

रंगीली के बदन में सनसनी सी दौड़ रही थी, उसे अपनी सहेली चमेली के शब्द याद आने लगे…

एक बार उपर से नीचे तक चूमने चाटने के बाद उन्होने उसे पलटा दिया…और वो उसके उपर आगये…

लाला ने एक मात्र अपनी धोती को भी निकाल फेंका, अब उनका कोब्रा, पूरी तरह आज़ाद खुली हवा में साँस लेकर खुलकर फुफ्कार रहा था,

इस समय वो अपने लिए बिल की तलाश में लाला के शरीर के साथ साथ इधर से उधर घूम रहा था, लाला ने अस्थाई तौर पर उसे रंगीली की मुलायम केले के तने जैसी जांघों के बीच वाली खाली जगह दे दी…

वो उसकी गर्दन को चूमते हुए नीचे की तरफ बढ़े, पीठ को चूम कर उन्होने उसकी ब्रा के हुक्स को अपने दाँतों में कस लिया, और बिना हाथ की मदद के दाँतों से उसके हुक्स खोल दिए…!

अपने गले और फिर पीठ पर लाला के लिजलिजे होंठों का स्पर्श पाकर रंगीली का बदन थरथरा उठा, वो किसी नागिन की तरह लहरा उठी…,

उन्माद में उसकी आँखें बंद हो चुकी थी, वो बंद आँखों से सोचने लगी, कि काश ये सुख वो अपने पति के साथ अपनी सुहाग सेज पर ले पाती…!

पर ये वक़्त अब ये सब सोचने का नही था, और वो फिर से मस्ती की रेल में हिचकोले खाने लगी…!

लाला ने उसकी कमर को चूमते हुए उसके गोल-गोल नितंबों को सहलाया और कमर के दोनो तरफ उसकी पैंटी की एलास्टिक में अपनी उंगलिया फँसा दी…!

रंगीली के बदन से ये आख़िरी आवरण भी हटने जा रहा था, ये सोचकर उसकी मुनिया ने अपने होंठ कस कर बंद कर लिए, जिससे उसके अंदर की पासीजन इकट्ठा होकर बूँदों के रूप में उसके बंद होंठों से बाहर टपकने लगी…!

लाला ने पैंटी को नीचे करना शुरू किया, रंगीली की कमर अपने आप उपर हो गयी, जो पैंटी को नीचे आने में सहायक सिद्ध हुई…

पैंटी को घुटनो तक लाकर लाला के हाथ उसके नितंबों की गोलाई और पुश्टता देख कर रुक गये, और उन्होने झुक कर उसके नितबो के शिखर को बारी-बारी से चूम लिया…

लाला का मन किया कि इन खरबूजों को चखा जाए, सो उसने हल्के से अपने दाँत उसके नितंब के शिखर पर गढ़ा दिए….

आआययययीीई….काटटू..मत मालिक…,

लाला ने मुस्करा कर उस जगह को जीभ से चाट लिया…, फिर वो उसकी जांघों को चूमते हुए उन्हें सहलाने लगे…

जांघों को सहलाते हुए उनका हाथ बीच में चला गया, और उसकी मुनिया के पास पहुँचते ही वो उसके कामरस से सन गया…!

अनुभवी लाला समझ गये कि रंगीली कितनी गरम हो चुकी है, खुद उनका भी हाल बहाल था, पल-पल कंट्रोल रखना भारी हो रहा था…

लेकिन वो अपने प्रथम मिलन को यादगार बनाना चाहते थे, नही चाहते थे, उन दोनो के मज़े में कोई कमी रह जाए…!

अब उन्होने रंगीली को पलटा कर सीधा कर दिया…, वो कठपुतली की तरह अपनी आँखें बंद किए हुए पड़ी थी…,

उपरवाले की इस असाधारण कारीगरी को लाला कुच्छ देर तक उसके पैरों में बैठे निहारते रहे…, शारीरिक तौर पर रंगीली अभी भी एक कमसिन कली जैसी ही थी…

 
जब कुच्छ देर लाला की तरफ से कोई हरकत नही हुई तो उसने हौले से अपनी आँखें खोल कर देखा, लाला से नज़र मिलते ही वो बुरी तरह शरमा गयी, और उसने फ़ौरन अपनी आँखें कस कर बंद करली…

लाला उसके चेहरे पर झुके, साथ ही उनका कालिया, जिसका फन अब कुछ गीला-गीला सा होने लगा था, उसकी जांघों से होता हुआ कमर तक रगड़ता चला गया…!

उन्होने रंगीली के होंठों पर अपने दहक्ते होंठ रख दिए, आज चमेली की सीख उसके काम आ रही थी, सो उसने भी अपने होंठों को हल्का सा खोल दिया, और वो दोनो एक दूसरे के होंठों को चूमने चाटने लगे…

लाला का एक हाथ उसके उभारों पर चला गया, और उसने उसके कच्चे अमरूदो को मसल डाला…!

रंगीली चिंहूक कर रह गयी, उसे आज तक उसके उभारों को इस तरह किसी ने नही मसला था, हल्के से दर्द के एहसास के साथ उसके शरीर के तार झंझणा उठे…!

लाला लगातार उसके अनारों को कभी प्यार से सहला देते, तो कभी ज़ोर्से मींज देते.., जिससे उसकी एडीया गद्दी पर अपने आप रगड़ने लगती…,

अब उसकी मुनियाँ में खुजली सी होने लगी थी…, उसे लगने लगा मानो हज़ारों च्चेंटियाँ मिलकर उसकी रसगागर के अंदर इधर से उधर चल रही हों…,

वो अपनी जांघों को कसते हुए बोली – आआहह….मालिकक्कक…अब कुछ करो...

अनुभवी लाला को ये समझते देर नही लगी, कि लौंडिया अब पूरी तरह उनका मूसल लेने के लिए तैयार है, लोहा दहकने लगा है, अब चोट मारने में ही फ़ायदा है…!

ये सोचकर वो उसकी टाँगों के बीच आकर बैठ गये…, एक बार अपने चौड़े से हाथ से उसकी रसीली मुनिया को सहलाया…., रंगीली की सिसकी तेज हो गयी…!

आअहह…..म्म्मलिकक्कक….अब जल्दी से डालो नाअ….,

लाला ने उसकी केले जैसी जांघों को अपने मजबूत पाटों पर रखा, फिर उसके पेट से सहलाते हुए हाथों से उसकी छोटी सी चुचियों को मुट्ठी में लेकर मसल्ते हुए बोले – क्या डालूं रानी,

रंगीली शरमा कर बोली – हमें नही पता…, जानबूझ कर सता रहे हैं, सब समझते हैं आप…, प्लीज़ अंदर करो ना… आहह…सबर नही होता अब…

लाला ने मुस्कराते हुए उसकी मुनियाँ के होंठों को खोलकर एक हाथ से अपने लौडे को एक-दो बार आगे पीछे करके, उसकी चूत के होंठों पर रखकर आगे पीछे करके दोनो की अच्छे से पहचान कराई…

फिर अपने मोटे टमाटर जैसे सुपाडे को उसके छोटे से छेद के उपर रख कर एक जोरदार धक्का अपनी कमर में लगा दिया….!

आअर्र्र्ृिई…..आआमम्म्माआअ…..माररररर…गायईयीई…र्ररिइ….,

वो लाला की छाती पर अपना हाथ अड़ाते हुए कराह कर बोली – आहह…मालिक…थोड़ा रूको…वरना हमारी जान चली जाएगी…!

रंगीली की इतनी कसी हुई चूत देखकर लाला आश्चर्य में पड़ गये…, एक शादी सुदा लड़की की चूत इतनी कसी हुई कैसे, ये तो एकदम कोरी ही लग रही है…

फिर उन्होने नीचे नज़र डालकर अपने लंड की तरफ देखा, जो लगभग 3-4थाई उसके बिल में चला गया था,

उन्होने रंगीली के बगलों में हाथ डालकर उसे गद्दी से उपर उठा कर अपने सीने से लगा लिया और उसके होंठों को चूमते हुए बोले – दर्द ज़्यादा हो रहा है मेरी रानी को…

दर्द के मारे उसकी पलकों की कोरों में आँसुओं की बूँदें छलक आई थी, उन्होने उसकी आँखों के खारे पानी को चाट कर उसकी पलकों को चूम लिया…!

लाला उसकी पीठ सहलाते हुए बोले – तुम्हें इतना दर्द क्यों हुआ, क्या अभी तक तुम्हारे पति ने तुम्हें नही भोगा…?

वो उनके चौड़े सीने में मूह छिपा कर बोली – उनका बहुत छोटा सा है, बिल्कुल आपकी उंगली के बराबर का, और आपका ये…, इतना कहकर वो शरमा गयी…!

लाला का सर फक्र से उँचा हो गया, वो मन ही मन अपने आपको दाद देने लगे…

वाह रे धरमदास, क्या किस्मत पाई है, एक कोरी कन्या आज तेरी बाहों में है…!

फिर उन्होने उसे फिर से गद्दी पर लिटा दिया, और उसकी कच्चे अनार जैसी कठोर चुचियों को सहलाने लगे, उसके निपल्स को उंगली में पकड़ कर हल्के हाथों से खेलने लगे..

रंगीली को ना जाने और कितना सीखना वाकी था, लाला उसके बदन के साथ जो जो करतब करते, उसे उतने ही प्रकार का अलग ही मज़ा मिलने लगता…

लिहाजा अब उसका चूत फटने का दर्द कम हो गया था…,

लाला ने अब अपना मूसल जैसा लंड धीरे से बाहर निकाला…अपने लंड पर खून के धब्बे देखकर वो समझ गये कि रंगीली की झिल्ली सही मायने में आज ही फटी है.

उन्हें उसपर और प्यार आया, और उसके होंठ चुस्कर उन्होने फिर से एक धक्का लगा दिया…, लंड एक इंच और पहले से ज़्यादा अंदर चला गया, रंगीली के मूह से एक बार फिर से कराह निकल गयी…

कुच्छ देर धीरे-धीरे वो उतनी ही लंबाई को अंदर बाहर करते रहे…, एकदम कसी हुई चूत ने उनके लंड को जैसे जकड रखा था, इस वजह से उनका लंड जबाब देता जा रहा था…!

वैसे उसकी भी बेचारे की क्या ग़लती थी, पिछले एक घंटे से वो अपने लिए बिल की आस लगाए हुए था, अब जाकर मिला तो आराम करने की सोचेगा ही…

लेकिन सेठ नही चाहते थे कि ये साला बीच रास्ते में धोका दे जाए, और उनकी इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ जायें, अगर ऐसा हुआ तो वो रंगीली के सामने कभी नज़र नही मिला पाएँगे…!

आज वो उसके उद्घाटन समारोह में अच्छी ख़ासी धूम मचाना चाहते थे, जिसे रंगीली जीवन भर याद करे, और हमेशा उसके लंड का लोहा मानती रहे,

इसलिए उन्होने उसे बाहर खींच लिया…, रंगीली को तो अभी थोडा-थोड़ा मज़ा आना शुरू हुआ था, तो जैसे ही उन्होने अपने नाग को उसकी बांबी से बाहर निकाला, एक प्रश्नवाचक निगाहों से वो उन्हें देखने लगी…!

 
उन्होने उसकी मुनिया के होंठों पर लगे खून के धब्बों को उसकी पैंटी से सॉफ किया, और अपनी जीभ लगाकर उसे चाट लिया…!

आअहह…रंगीली को जैसे ठंडक पड़ गयी…, दहकती चूत पर जीभ लगते ही

वो सिसक उठी….सस्स्सिईईई…आआहह…यईए…क्य्ाआ कर रहे हैं..आप्प्प्प…?

धरम दास ने मुस्कुराकर उसकी तरफ देख और बोले – तुम बस देखती जाओ हमारा कमाल, ये कह कर उन्होने अपने उपर के होंठों को उसके नीचे के होंठों पर टिका दिया….!

मस्ती से रंगीली की आँखें बंद हो गयी, और उसने अपने आपको लाला के हवाले कर दिया, क्योंकि अब तक वो जो भी कर रहे थे उनसे वो आनंद की नयी-नयी उँचाइयों को पार करती जा रही थी,

जिनके बारे में उसने ना तो कभी सोचा था और ना ही सुना था….!

लाला ने एक बार उसकी मुनिया को बड़े प्यार से किस किया, और फिर उसकी फांकों को जुदा करके उसके अंदर की लाल सुर्ख परतों को जीभ से चाट लिया….

सस्सिईईईई….आआहह…..म्माल्ल्लीइीकककक….बहुत मज़ाअ…आअत्त्ताअ…है ऐसे…तो..,,

कुच्छ देर इसी तरह चाटने के बाद उन्होने उसके भज्नासा जो अब कुच्छ कड़क होकर उसकी फांकों से बाहर निकल आया था, को अपने होंठों में दबाकर चूस डाला…!

यही नही, अपनी मोटी वाली उंगली भी उसके सुराख में डाल कर उसे अंदर बाहर करने लगे…

रंगीली की मज़े के कारण कमर थिरकने लगी, और वो अपनी गान्ड उचका-उचका कर उनकी उंगली को और अंदर तक लेने की कोशिश करने लगी…!

इस तरह से वो जल्दी ही अपनी चरम सीमा पर पहुँच गयी, और अंत में एक मस्ती की किलकारी मारते हुए उसने अपनी कमर को धनुष की तरह उठा लिया,

उसकी चूत ने अपना कामरस छोड़ दिया था, जिसे लाला जलेबी की चासनी समझ कर चाट गये…!

रंगीली इतने से मज़े की खुमारी से ही तृप्त होकर आँखें बंद किए सुकून से पड़ी थी, की तभी लाला ने फिर से उसकी टाँगें उठाकर अपनी जांघों पर रख ली और उसके उपर पसर कर उसके होंठों को चूमकर बोले –

कैसा लग रहा है मेरी जान…?

उसने एक बार उनकी आँखों में देखा, और फिर शरमा कर अपना सर एक तरफ को करके बोली – हमें नही पता…!

लाला ने मुस्करा कर उसके अमरूदो को मसल दिया…और उसके निप्प्लो को अंगूठे से मसल्ते हुए एक हाथ से अपने शेर को फिर से उसकी गुफा के द्वार तक ले गये…

अब वो कुच्छ खुल चुका था, सो अपने गरम दहक्ते सुपाडे को जगह तलाश करने में ज़्यादा परेशानी नही हुई…!

हल्का सा धक्का देकर लाला ने अपने 2” मोटे सुपाडे को उसकी सन्करि गुफा में प्रवेश करा दिया…,

थोड़ी देर पहले हुए छिड़काव के कारण अब उसे पहले जितनी मुश्किल नही आ रही थी, सो वो प्रथम प्रयास में की गयी खुदाई तक आराम से पहुँच गया…!

लाला कुच्छ देर तक उसी गहराई तक हल्के हल्के धक्के लगाते रहे, रंगीली की चूत में फिर से संकुचन शुरू होने लगा, और वो मस्ती से भर उठी…

अब उसकी भी कमर नीचे से उठने का प्रयास करती दिखी, तभी लाला ने एक और फाइनल स्ट्रोक मार दिया और उनका लंड जड़ तक उसकी चूत में समा गया…

एक साथ हुए हमले से रंगीली एक बार फिर बिल-बिला उठी, लेकिन इस बार उसने अपनी चीख को होंठों से बाहर नही आने दिया…!

अब वो नही चाहती थी, कि मालिक अब रुकें, आज वो अपने जिस्म की प्यास को पूरी तरह से शांत कर लेना चाहती थी…!

लाला का लंड वो अपनी गुफा के अंतिम छोर तक महसूस कर रही थी, जहाँ पहुँच कर उसने अपनी ठोकर से उसके काम श्रोत का ढक्कन हिला दिया…

अब उसकी मुनिया कुच्छ ज़्यादा ही तर होती लग रही थी…, रसीली दीवारों की चिकनाई पाकर लाला का लंड खुशी से झूम उठा, और अब वो पूरी लंबाई तक सतसट अपने सफ़र को तय करने लगा…

रंगीली का दर्द ना जाने कब छूमनतर हो चुका था, और ना जाने कब और कैसे उसकी कमर उचक-उचक कर लाला के लंड को अपने अंदर और अंदर तक लेने की कोशिश करने लगी…!

लाला की चतुराई काम आगयि थी, अब वो पूरी सिद्दत से उसकी प्यास बुझाने में लगे हुए थे, इधर रंगीली भी मज़े की पराकाष्ठा तक पहुँचने की कोशिश में थी…

दोनो ही एक दूसरे को संतुष्ट करने का भरसक प्रयास कर रहे थे, और इसी प्रयास में दोनो के मूह से अजीब अजीब सी आवाज़ें, कराहें निकल रही थी..

वो दोनो पसीने से तर हो चुके थे…

 
20-25 मिनिट की धुआँधार चुदाई के बाद रंगीली को लगा कि उसकी चूत के अंदर का बाँध खुलने लगा है, उसके गले की नसें अकड़ने लगी, चेहरा लाल भभूका हो गया…

उसकी पीठ धनुष की तरह उपर उठ गयी, मूह खुल का खुला रह गया…

और उसने अपनी पतली-पतली टाँगें लाला की कमर के इर्द-गिर्द लपेट दी, वो गद्दी से आधार होकर लाला के बदन से जोंक की तरह चिपकते हुए चिल्लायईयी…

आआययययीी…म्म्माअलिकक्क…और ज़ॉर्सीई…काररूव…उूउउऊऊहह… मईए…आआययईीीई….गायईयीईईईई…..आअहह…,

वो बुरी तरह हान्फते हुए झड़ने लगी…

इधर लाला का भी नाग अपना जहर छोड़ने को तैयार था, सो एक भरपूर धक्का देकर अपने नाग का फन उसकी रस गागर के अंतिम सतह तक पहुँचकर अपने वीर्य की पिचकारियाँ मारने लगा…

दोनो की जांघों के बीच का भाग इस कदर एक दूसरे से चिपक गया, मानो फेविकोल का मजबूत जोड़ लगा दिया हो, जो कभी छूटेगा नही…

दो मिनिट तक रंगीली अपनी कमर उठाए लाला के लंड पर अपनी मुनिया को दबाए रही, फिर जब उसकी एक एक बूँद नीचूड़ गयी, तब उसकी पीठ बिस्तर से टच हुई…

वो बेसूध हो चुकी थी, उसे इतना भी होश नही रहा कि एक 80+ केजी का मर्द उसके नाज़ुक बदन के उपर पड़ा है…

उधर लाला भी ऐसी जानदार लगभग कोरी करारी चूत पाकर पूरी शक्ति लगाकर झड़े थे, सो वो भी उसके उपर पसर कर हाँफने लगे…..!

कुछ देर बाद लाला को होश आया, तो वो रंगीली के होंठों पर एक किस करके उसके बगल में लुढ़क गये…,

लंड के बाहर आते ही, ढेर सारा मसाला भल्भलाकर उसकी चूत से बाहर निकल पड़ा, और लाला की गद्दी उसे सोखती रही..

करवट से लेते लाला, अपने सर को एक हाथ का सहारा देकर, रंगीली के शांत पड़े मासूम चेहरे को बड़े प्यार से ताक रहे थे…!

वो इस समय अपनी जिंदगी के पहले ऐसे जबरदस्त स्खलन को पाकर एकदम शांत चित्त आँखें बंद किए हुए, इतनी मासूम किसी गुड़िया सी पड़ी हुई थी…!

उसके मासूम चेहरे पर नज़र गढ़ाए, एक बारगी लाला जैसे ठर्की आदमी के मन में भी आत्मग्लानि सी होने लगी.., उनके दिल ने कहा –

तूने इस मासूम को छल से पाया है धरम दास, अपने आप से वादा कर कि कभी इसे धोका नही देगा…!

उसने मन ही मन अपने आप से ये वादा किया कि अपने जीते जी, वो कभी भी इस मासूम को कोई दुख नही होने देगा…!

ये सोचकर उसने उसके गाल को सहला कर उसके माथे को चूम लिया, रंगीली की आँखें खुल गयी, जब उसने लाला को अपने उपर झुके हुए पाया, तो अपनी पतली-पतली बाहें उसके गले में डाल दी…

आगे से एक किस उनके होंठों पर लेकर बोली – धन्यवाद मालिक हमें एक संपूर्ण औरत होने का एहसास दिलाने के लिए…!

लाला ने उसके गाल चूमकर कहा – तुम्हें कोई दुख या ग्लानि तो नही हमारे साथ ये सब करके..?

वो उनके गले लगकर बोली – इन सब बातों का समय अब बीत चुका है मालिक…, अब मेरा सुख-दुख, जीना-मरना सब आपके हाथ में है..

लाला ने बड़े प्यार से उसके बदन को सहलाते हुए कहा – अब हम तुम्हें कोई दुख नही होने देंगे रंगीली, तुमने हमारा प्यार अपनाकर हमें अपना बना लिया है…

लेकिन अब तुम्हें हमारी एक बात माननी होगी…

उसने सवालिया निगाहों से उन्हें देखा…

लाला – अब तुम हमें मालिक कहना बंद करदो.., तुम्हारे मूह से अब ये शब्द हमें अच्छा नही लगता…

हम महसूस करते हैं, जैसे कोई गुलाम हमारे शरीर की ज़रूरतें पूरी कर रही हो…!

रंगीली – तो आप ही बताइए हम आपको क्या कहें..?

लाला – कुच्छ भी, जो तुम्हारा मन कहे…!

रंगीली – तो ठीक है, आज से हम अकेले में आपको धरमजी या लाला जी कहेंगे, लेकिन दूसरों के सामने मालिक ही कहना पड़ेगा, वरना लोगों को शक़ पैदा हो सकता है..

लाला – ठीक है, तुम्हारी ये बात हमें जायज़ लगी… और हां तुम्हारे मूह से धरमजी सुनना हमे अच्छा लगेगा…एक बार और बोलो ना.…!

ओह धरमजी… धन्यवाद.. ये कहकर वो उनकी चौड़ी छाती में समा गयी…!

कुच्छ देर बाद लाला के हाथ एक बार फिर शरारत पर उतर आए, और कुच्छ ही देर पहले गुजरा हुआ तूफान फिर से वापस आने लगा…!

लाला ने उसे अपने उपर ले लिया, और उसके होंठों को चूस्ते हुए उसकी पीठ सहलाते रहे, फिर उनके हाथ नीचे को उतरते हुए उसके गोल-गोल छोटे लेकिन सुडौल नितंबों पर पहुँच गये…

नितंबों को सहलाते हुए उन्होने उन्हें अपने हाथों में लेकर मसल दिया…!

आअहह…धराममजि…ज़ोर्से नहिी…राजाजी…..!

 
Mani wrote: ↑ 17 Feb 2018 04:06
लाला की किस्मत बुलन्दी पे है
 
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