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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

अभी वो अपने होश ठिकाने भी नही कर पाया था कि वो अपने अनारों को उसके बदन से रगड़ती हुई किसी नागिन की तरह लहराती हुई , उपर को बढ़ने लगी,

अपने मुलायम उभारों को उसकी कठोर छाती से रगड़ते हुए उसके लंड को अपनी मुट्ठी में लेकर अपनी काले बालों के बीच बनी सुरंग के द्वार पर रख लिया…

उसकी सुरंग के वे दोनो दरवाजे अपने आप खुल गये और उसके नाग का फन उसमें समा गया,

सुरंग अंदर से किसी भट्टी की तरह दहक रही थी, उसे अपना लंड पिघलता सा महसूस होने लगा…!

वो युवती धीरे-धीरे अपना वजन रख कर उसके उपर बैठती चली गयी, शंकर को अपना लिंग किसी गरम गहरी और अंधेरी गुफा के अंदर जाता हुआ महसूस हुआ…!

पूरा नाग बिल में जा चुका था, उस युवती की आँखें मज़े के कारण बंद हो गयी, कुछ देर वो यूँही बैठी रही, फिर उसने अपनी आँखें खोल कर उसकी आँखों में झाँका…

और एक मादक स्माइल देकर अपनी मरमरी बाहें उसके गले में डाल दी…!

वो अब उसके उपर एक लयबद्ध तरीक़े से उठ-बैठ रही थी, शंकर को इतना मज़ा आ रहा था, मानो वो कहीं हवा में तैर रहा हो…!

उत्तेजना पल-प्रतिपल अपनी चरम सीमा को पार करती जा रही थी, वो भी अनायास ही अपनी गान्ड को नीचे से उठाकर उसकी सुरंग की था लेने निकल पड़ा…

फिर एक क्षण ऐसा आया कि वो युवती बुरी तरह हाँफती हुई उसके बदन से जोंक की तरह चिपक गयी,

उसी क्षण शंकर को अपने अंदर से कुछ लावा सा तीव्र गति से उबलता सा प्रतीत हुआ और वो उसके लंड के रास्ते किसी पिचकारी की तरह बाहर निकलने लगा…

दे-दनादन अनगिनत राउंड उसकी एके-47 से निकलते चले गये…, जब उसकी पूरी मॅगज़ीन खाली हो गयी तब जाकर उसका लंड शांत हुआ…!

उसका पूरा बदन जैसे हवा में तैरता हुआ ज़मीन पर आ टिका हो, और वो उस युवती के बदन को अपने सीने से चिपकाए यूँ ही पड़ा रह गया….!

शंकर की दिनचर्या : सुवह 4 बजे उठकर वो शौन्च के लिए खेतों में जाता था, वही से 5-6 किमी की दौड़ लगा कर 6 बजे तक हवेली लौटता,

उसके बाद उसकी माँ अपने सामने उससे जमकर कशरत करती, कुछ देर पसीना सूखने के बाद तेल और बेसन से उसके बदन का रगड़-रगड़ कर उबटन करती…

तब तक उसकी छोटी बेहन सलौनी भी स्कूल के लिए तैयार होकर वहाँ आ जाती, और फिर नहा धोकर, नाश्ता वग़ैरह लेकर वो दोनो उसकी साइकल से स्कूल को निकल जाते…,

लेकिन आज साडे 6 बज गये, शंकर का अभी तक कहीं अता-पता नही क्योंकि वो उसे बिना देखे ही रोजमर्रा की तरह अपने काम-काज में लग गयी,

रंगीली उसकी वाट जोह रही थी, वो अपने मन ही मन बुद-बुदाई…

कहाँ चला गया ये लड़का, अब तक तो उसे आ जाना चाहिए था, आख़िर में वो उसे सोने के कमरे में देखने गयी…!

उसे अभी तक सोता हुया देख कर उसको बहुत गुस्सा आया, और वो पैर पटकती हुई, उसकी चारपाई के पास पहुँची…

अभी वो अपना हाथ बढ़ाकर उसको झकझोर कर उठाना ही चाहती थी, कि तभी उसकी नज़र उसके पाजामे पर पड़ी, जो आगे से बहुत ज़्यादा गीला हो रहा था,

उसके लंड का सुपाडा उस गीलेपन से चिपका हुआ था जो अभी भी किसी बंदूक की नाल की तरह खड़ा ही था…!

उसने सोचा, ये कैसे गीला हो रहा है, लगता है नालयक ने पाजामा में ही पेसाब कर लिया, लेकिन ऐसा पहले तो इसने बचपन में भी कभी नही किया तो आज कैसे…?

ये चेक करने के लिए उसने वहाँ पर अपना हाथ लगाकर देखा, सपने में हुए अत्यंत ही सुखद एहसास के बाद वो सकुन भरी नींद में सो रहा था…

अपनी माँ के हाथ लगाने से उसकी नींद पर तो कोई फरक नही पड़ा, लेकिन उसका लंड झटके मार उठा…, रंगीली ने झटके से अपना हाथ खींच लिया…!

उसकी उंगलियाँ उसके ताज़ा तरीन माल से चिप चिपा गयी, जिन्हें उसने अपनी नाक से लगाकर सूँघा,

अपने बेटे की पहली मलाई की खुश्बू से वो मदहोश हो उठी, वो टक टॅकी लगाए उसके उठे हुए लंड और उस गीलेपन को देखने लगी,

उसकी अपनी चूत में चीटियाँ सी काटने लगी, और वो दो मिनिट में ही गीली हो गयी,

वो समझ गयी, कि अब उसका बेटा जवान हो रहा है, इसको रोकना मुश्किल है, लेकिन उसने जो फ़ैसला लिया था उसके चलते वो उसका ग़लत उपयोग नही होने दे सकती…!

वो सोचने लगी, कि अगर अभी इसे सही और ग़लत में फ़र्क करना नही बताया, और यूँ ही इसे जबरदस्त अपने पर काबू रखने के लिए रोकती रही, तो ये कभी भी ग़लत राह पर जा सकता है,

हो सकता है वो मुझसे झूठ बोलने लगे, और वो करने लगे जो उसे अच्छा लगता है…

तो अब इसे कैसे सब कुछ समझाऊ..? इसे समझाने के लिए मुझे ही कुछ करना होगा, लेकिन अपने बेटे के साथ वो एक सीमा तक ही जा सकती थी,

अब तक वो जो करती आ रही थी वोही अब दोनो को ग़लत लगने लगा था..,

इसलिए उसने वो सब बंद कर दिया था, तो अब उसे कुछ सिखाने के लिए या उसकी उत्सुकता को शांत करने के लिए तो मुझे और आगे तक बढ़ना पड़ेगा…!

अपनी इन्ही सोचों में गुम उसकी नज़र एक बार फिर अपने बेटे के पाजामे पर चली गयी,

वो ये देखकर हैरान हो गयी कि सोते हुए भी उसका लंड ठुमके से लगा रहा था…!

अपने बेटे के लंड की मालिश बंद किए उसे 6-8 महीने से भी ज़्यादा समय हो गया था, तब भी उसके मतवाले हथियार को देख कर वो गरम हो जाती थी, फिर अब तो वो कुछ और ही दमदार हो गया होगा…!

सोचकर ही उसकी मुनिया रस छोड़ने लगी, और स्वतः ही उसका हाथ अपनी जाघो के बीच चला गया, उसने लहंगे के उपर से ही उसे कस कर मसल दिया…!

अपने बेटे के हथियार की ताज़ा जानकारी लेने की लालसा ने उसे उसके पास जाने पर मजबूर कर दिया, वो उसकी चारपाई के किनारे पैर लटकाकर बैठ गयी…!

किसी स्वचालित मशीन की तरह उसकी उंगलियों ने उसके नाडे की गाँठ खोल दी, बड़ी सावधानी से उसके पाजामे को नीचे करके उसने उसके लंड को बाहर कर लिया.

लंड अभी भी पूरी तरह चिप-चिपा रहा था, आहिस्ता से उसने उसके टोपे पर लगी मलाई को अपनी उंगली पर लिया, अपनी नाक के पास लाकर उसे सूँघा,

आहह…. पहली धार की मलाई की खुशुबू सूंघ कर वो रोमांचित हो उठी, उसके ताज़ा-ताज़ा वीर्य से किसी कस्तूरी के समान उठती तरंगें उसके मन मस्तिष्क पर छा गयी, और उसने वो उंगली अपने मुँह में डाल ली…!

आअहह…उउउम्म्मन्णनचह…. क्या मस्त स्वाद है मेरे बेटे के वीर्य का, वो उंगली को ऐसे चूसने लगी मानो वो उसके लंड को ही चूस रही हो…!

इस एहसास के होते ही उसके उपर वासना हावी होने लगी, उसके सोचने समझने की शक्ति क्षीण पड़ने लगी, और उसकी गर्दन अपने आप नीचे को झुकती चली गयी…!

शंकर का लंड सीधा छत की तरह सिर उठाए तन्कर खड़ा था, बिना किसी सहारे के, रंगीली ने बिना हाथ लगाए उसके सुपाडे के चारों ओर अपने जीभ से चाट लिया…!

 
उसके गाढ़े वीर्य में इतनी चिपक थी, कि जीभ हटते हुए भी वो लाट बनकर उसकी जीभ तक किसी तार की तरह खिंचता चला गया…!

बेटे के वीर्य का स्वाद लेते ही उसकी रही सही समझ जाती रही, और उसने उसे अपनी मुट्ठी में कस कर पकड़ लिया…!

अपने लंड पर किसी के हाथ की पकड़ महसूस करके शंकर की नींद खुल गयी, अपनी माँ को पास बैठकर अपने लंड को पकड़े देख कर वो झटके से उठते हुए बोला-

माँ ! तू ये क्या कर रही है…?

अपने बेटे को उठते हुए देख कर रंगीली एक दम से हड़बड़ा गयी, उसकी चोरी पकड़ी गयी थी, लेकिन अपनी झेंप मिटाने के लिए उसने उसी पर पलट वार करते हुए कहा –

पहले तो तू ये बता, कि अभी तक सो क्यों रहा था, और ये तेरा पाजामा इतना गीला क्यों हो रहा है, मे तुझे उठाने आई थी, और जब ये देखा तो देखने लगी कि ये कैसे हुआ…?

शंकर ने उठते हुए पहले अपना हाथ बढ़ाकर अपने पाजामे को उपर करने की कोशिश की, तो रंगीली ने एक थप्पड़ उसके हाथ पर जड़ दिया और कड़क कर बोली…

इसे यहीं रहने दे, पहले मुझे इसका जबाब दे ये गीला क्यों हुआ…?

उसने अपने पाजामे को देखा जो वाकई में चिप चिपा सा हो रहा था, इससे पहले ऐसा कभी नही हुआ था उसके साथ, तो फिर आज क्यों..?

वो सोच में पड़ गया, फिर उसे अपने सपने के बारे में कुछ धुंधली सी बातें याद आई, और उसके चेहरे पर सकुन से भरी स्माइल आ गयी, जिसे देख कर रंगीली बोल पड़ी….

अब ऐसे मुस्करा क्यों रहा है, बता ना क्या बात है…?

वो उसे टालते हुए बोला – कुछ नही माँ, हो सकता है ज़्यादा देर सोने की वजह से मेरा मूत निकल गया होगा…!

रंगीली – अच्छा ! मूत ऐसा गाढ़ा-गाढ़ा, चिप चिपा होता होगा.. क्यों..? सही सही बता, वरना बहुत मारूँगी…!

शंकर अब कैसे बताए कि उसने रात सपने में क्या-क्या देखा और क्या-क्या किया..? सो अपनी माँ को टालते हुए बोला – मार ले माँ, अगर तुझे मेरी बात पर विश्वास नही है तो…!

रंगीली थोड़े गुस्से वाले लहजे में बोली – हां..हां.. खिला खिला के सांड जो कर दिया है, अब तुझे अपनी माँ की मार का क्या असर होना है…

फिर अपनी रोनी सी सूरत बना कर बोली – अब तो तू बड़ा हो गया है, अपनी माँ से बातें छिपाना सीख रहा है, कोई बात नही बेटा, यही तो होता आया है इस जगत में…

बच्चे बड़े होते ही अपने माँ बाप को दरकिनार करने लगते हैं, तू कॉन्सा नया काम कर रहा है…!

शंकर अपनी माँ की बात सुनकर तड़प उठा, उसके गले लगते हुए बोला, अपने बेटे को तू दूसरों की तरह समझती है माँ…!

तेरा बेटा तेरी एक आवाज़ पर अपनी जान कुर्बान कर सकता है…!

रंगीली ने उसके मुँह पर अपना हाथ रख दिया, और उसे अपने सीने से कसते हुए बोली – जान देने की बात नही करते मेरे बच्चे, ठीक है तू नही बताना चाहता है तो ना सही…!

शंकर – वो माँ मुझे शर्म आ रही है, जो सपना मुझे रात को आया उसके बारे में बोलते हुए, बस और कोई बात नही है…!

सपने की बात सुनकर रंगीली समझ गयी, कि रात उसके बेटे ने कोई ऐसा हसीन सपना देखा है, जिसे देख कर वो अपनी उत्तेजना पर काबू नही कर पाया और उसका वीर्य छूट गया…!

अब उसकी जिग्यासा और बढ़ गयी ये जानने की, कि आख़िर उसने सपने में ऐसा क्या देखा जो वो इतना उत्तेजित हुआ होगा…?

उसने फिलहाल उसे इस बारे में ज़्यादा कुछ नही कहा और बोली – चल ठीक है, अभी नही पुछति इस बारे में, तू जल्दी से उठ स्कूल जाना है, सलौनी आती ही होगी…

 
सपने की बात सुनकर रंगीली समझ गयी, कि रात उसके बेटे ने कोई ऐसा हसीन सपना देखा है, जिसे देख कर वो अपनी उत्तेजना पर काबू नही कर पाया और उसका वीर्य छूट गया…!

अब उसकी जिग्यासा और बढ़ गयी ये जानने की, कि आख़िर उसने सपने में ऐसा क्या देखा जो वो इतना उत्तेजित हुआ होगा…?

उसने फिलहाल उसे इस बारे में ज़्यादा कुछ नही कहा और बोली – चल ठीक है, अभी नही पुछति इस बारे में, तू जल्दी से उठ स्कूल जाना है, सलौनी आती ही होगी…

अभी ये शब्द उसके मुँह से निकले ही थे कि बाहर से सलौनी की आवाज़ सुनाई दी…भैया…, कहाँ हो…?

बड़ी लंबी उमर है इस लड़की की, नाम लेते ही हाज़िर, चल जल्दी उठ बेटा, वरना वो इधर आ धम्केगि…, रंगीली ने उसे बाजू पकड़कर उठाते हुए कहा!

उसे उठाकर उसने सलौनी को आवाज़ दी, आई बेटा, तेरे इस सांड़ भाई को उठा रही थी, बाहर आते आते उसने कहा..

सलौनी – क्या..? भैया अभी तक सो रहा है..? ये आज उल्टी गंगा कैसे बहने लगी, ऐसा तो आज तक नही हुआ मा…?

रंगीली – तू ही देखले, जैसे जैसे बड़ा हो रहा है, आलसी होता जा रहा है तेरा भाई…

खैर तू बैठ मे तेरे लिए कुछ खाने को लाती हूँ, आज इस लड़के के चक्कर में सब कुछ भूल गयी, ये कहकर वो कमरे के एक कोने की तरफ बढ़ गयी जहाँ खाने पीने का समान रखा था…!

थोड़ा बहुत नाश्ता करके भाई बेहन स्कूल निकल जाते हैं, उधर रंगीली अपनी गीली चूत लेकर सोचने लगी, हाए राम शंकर का हथियार तो अभी से कैसा तगड़ा हो गया है…!

मे तो लाला जी का ही समझ रही थी कि इससे बड़ा भला किसी का क्या होता होगा, इसका तो अभी बिना किसी की चूत में गये ही ऐसा है, जब चलने लगेगा तो क्या होगा ?……

ये सोचकर ही उसके शरीर में सनसनी सी फैल गयी, ना चाहते हुए भी उसका हाथ अपनी गीली चूत पर चला गया जो ये सोचकर और ज़्यादा गीली हो गयी थी,

अपने ही बेटे के बारे में इस तरह से सोचना उसे कुछ अजीब सा लगा, लेकिन वो अपनी चूत की सुरसूराहट की आगे बेबस थी जो लगातार बह-बहकर उसको परेशान किए हुए थी,..

अब उसे किसी भी तरह लंड मिलना चाहिए था, जिससे उसके पानी को अच्छे से निकलवा सके, ये सोचकर वो लाला की गद्दी की तरफ चल दी…!

बैठक के बाहर से ही उसे अंदर से कई सारे लोगों की आवाज़ें सुनाई दी, वो उल्टे पाँव लौट गयी, और खेतों की तरफ अपने पति रामू के पास चल दी…

रामू इस समय एक खेत में कुछ काम कर रहा था, उसके साथ और भी मजदूर लगे थे, रंगीली को खेतों की तरफ आते हुए देखकर वो उसकी तरफ लपका…

इशारे से उसे पास ही बनी झौंपड़ी की तरफ आने के लिए कहा…!

इशारे को समझ रामू भी उसके पीछे-पीछे लपका, वाकी के मजदूर अपनी धोती के अंदर अपने अपने लौडे को मसालते ही रह गये, ये सोच सोच कर कि काश इस रामू की जगह वो होते…,

रामू तो बेचारा उसके हुकुम का गुलाम था, सो कई दीनो बाद मिली अपनी रसीली पत्नी की चूत पाकर धन्य हो गया…!

रंगीली की मटकती गान्ड का पीछा करते हुए उसका लंड खड़ा हो गया…

झोंपड़ी में पहुँचते ही रंगीली ने फटाफट अपना लहंगा उपर चढ़ाया, और टाँगें चौड़ी करके ज़मीन पर पड़े पुआल पर उसके आगे लेट गयी,

अपनी बीवी की गीली चूत देखकर रामू का 6” लंबा लॉडा और अच्छे से खड़ा हो गया, उसने उसकी गोरी-गोरी मुलायम जांघें सहलाते हुए उसे उसकी चूत में उतार दिया…

छोटे कद का रामू उसके उपर मेढक की तरह फुदक फुदक कर उसे चोदने लगा,

रंगीली के प्रयासों से वो कुछ हद तक इस काबिल हो गया था, कि उसका पानी निकलवा देता था..!

सांड़े के तेल की मालिश से उसका लंड लंबा तो ज़्यादा नही हुआ था, लेकिन मोटाई ज़रूर अच्छी ख़ासी हो गयी थी, सो अब वो उसकी चूत में कसा कसा जा रहा था…

रंगीली भी अपनी कामुक सिसकियों से उसे और ज़्यादा उत्तेजित करती हुई, अपनी कमर उचका-उचका कर चुदवाने लगी…!

आअहह…सस्सिईईई….और ज़ोर्से चोदो मेरे राजा…हाआंणन्न्…ऐसे ही, उउफ़फ्फ़…. मेरे दूधों को मस्लो… ज़ोर्से…और.. पेलो….आआयईी….उउउफ़फ्फ़…बहुत मज़ा आरहा है..हुउंम्म…

रामू अपनी पूरा दम-खम लगाकर अपनी लुगाई को तृप्त करने के प्रयास में जुटा रहा…!

15 मिनिट बाद अपनी चूत की गर्मी निकल्वाकर वो वहाँ से हवेली की तरफ लौट गयी…,

 
उसे अपनी गान्ड मटकाते हुए जाते देखकर वाकी के मजदूर रामू के नसीब पर रस्क करते हुए अपने अपने काम में लग गये…!

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उधर स्कूल में आज शंकर का पढ़ने में बिल्कुल भी मन नही लगा, किताब को खोलते ही लेटर्स की जगह उसे वो सपने वाला दृश्य बार बार उसकी आँखों के सामने आ जाता…!

उसकी परिकल्पना करते ही उसका लंड थुनक कर पाजामे के अंदर तंबू बनाकर खड़ा हो जाता, वो उसे बार-बार नीचे को दबाकर बिठाने की कोशिश करता,

लेकिन बजाय बैठने के वो और ज़्यादा तन्तनाने लगता, दबाते-दबाते उसके लंड में ऐंठन सी होने लगी, उसका मन करने लगा कि यहीं क्लास में ही इसे बाहर निकल कर खूब ज़ोर ज़ोर्से हिलाए..

उसके साथ वाली ब्रेंच पर बैठी उसकी क्लास की एक लड़की उसकी ये गति विधियाँ गौर से देख रही थी, उसके लंड को ठुमकते हुए देख देख कर और फिर उसे मसल कर बिठाने की कोशिश कर रहे शंकर को देख कर उसकी मुनिया में चुनचुनी सी होने लगी..

उसने च्चिि…चिि.. करके शंकर का ध्यान अपनी तरफ खींचा,

जैसे ही उसने उस लड़की की तरफ देखा, उसे अपने लंड की तरफ ताकते देख वो बुरी तरह झेंप गया, और एक के उपर दूसरी टाँग चढ़ाकर उसने उसे दोनो टाँगों के बीच दबाकर उसका गला घोंट दिया…!

उस लड़की ने शंकर को दिखाकर अपनी चूत को खुज़ाया और अपनी नशीली आवाज़ में फुसफुसा कर बोली – क्यों गला घोंट रहा है बेचारे का, तू कहे तो मे कुछ मदद करूँ…!

शंकर ने उसकी बात का कोई जबाब नही दिया, और किताब खोलकर पढ़ाई में मन लगाने की कोशिश करने लगा…!

वो लड़की मन ही मन मुस्कराते हुए बोली – बेचारा ब्रह्मचारी…,

शंकर को आज अपनी माँ पर बहुत गुस्सा आरहा था, क्यों उसने अभी तक उसको अंडरवेर पहनने को नही दिया था…!

कम से कम पाजामा के नीचे अंडरवेर होता तो वो इतना परेशान नही होता जितना अभी हो रहा था, उसे अपने खड़े लंड को छिपाना बहुत मुश्किल हो रहा था…!

जैसे तैसे स्कूल का समय पूरा करके शंकर अपने स्कूल बॅग को आगे रखकर सीधा स्कूल के पीछे की झाड़ियों की तरफ भागा, उसने पाजामा खोलकर मूत की धार मारी, तब जाकर उसे कुछ शांति मिली…

फिर जैसे ही गेट की तरफ आया, सलौनी खड़ी उसका इंतेज़ार कर रही थी…,

उसे आगे बिठाकर वो वहाँ से चल दिया, अपने पीछे उसे कुछ लड़कियों की

खिल-खिलाने की आवाज़ सुनाई दी, उन्हें अनसुना करके उसने साइकल में पेडल मार दिए…!

थोड़ा आगे चलते ही रास्ते में लोगों की भीड़ दिखाई दी, उत्सुकता बस वो दोनो भी उस भीड़ को देख कर खड़े हो गये…

भीड़ के बीचो बीच घेरे के अंदर सबका ध्यान था, मानो कोई मदारी खेल दिखा रहा हो और आस-पास खड़े लोग उसका आनंद ले रहे हों,

ऐसा ही कुछ सोच कर वो दोनो बेहन भाई भी खड़े हो गये और बीच में क्या हो रहा है ये देखने की कोशिश करने लगे,

लागों के पीछे से सलौनी को तो कुछ दिखा नही, लकिन अच्छी लंबाई की वजह से शंकर की नज़र अंदर के नज़ारे पर पड़ गयी…!

अंदर का सीन देख कर उसकी आँखें चौड़ी हो गयी, गुस्से से शरीर थर-थर काँपने लगा,

सलौनी साइकल पकड़, इतना कहकर उसने साइकल अपनी छोटी बेहन को थमायी और वो लोगों की भीड़ को हटाता हुआ अंदर घुसता चला गया…..,

कल्लू और उसके दो दोस्त, शराब के नशे में धुत्त बाइक पर सवार, रास्ते चलती हुई कॉलेज की लड़कियों को छेड़ रहे थे,

एक लड़की ने उनका विरोध करते हुए उनमें से एक के गाल पर चाटा जड़ दिया, नतीजा कल्लू ने अपनी बाइक टिकाई और वो तीनों उन लड़कियों के साथ बदतमीज़ी करते हुए छेड़खानी करने लगे…

इतने में वहाँ उनके ही कॉलेज के कुछ लड़के आ गये, उन्होने कल्लू और उसके दोस्तों के साथ झगड़ा करना शुरू कर दिया,

कल्लू नशे में तो था ही, उन लड़कों को उल्टी सीधी माँ-बेहन की गालियाँ देने लगा, उनमें से एक ने जो कुछ तगड़ा सा भी था उसका गला पकड़ लिया, इस पर कल्लू ने उसके थोबडे पर एक मुक्का जड़ दिया…!

फिर क्या था, उन 5-6 लड़कों ने उनकी धुनाई शुरू करदी, कल्लू के वो दोनो गान्डु यार अपनी दुम दबाकर खिसक लिए, और उन लड़कों ने चूतिया कल्लू को वही ज़मीन पर पटक कर दे लात दे घूँसा बना दिया भूत…

इतने में वहाँ शंकर आ पहुँचा, कल्लू को इस तरह पीटते देख उसके तन बदन में आग भर गयी, अपनी बेहन को साइकल थमाकर वो भीड़ में घुसता चला गया…

पीछे से सलौनी चिल्लाति ही रह गयी, अरे भैया सुन तो, क्या हुआ..? कहाँ जा रहा है…?

लेकिन उसकी आवाज़ सुनने के लिए अब शंकर वहाँ नही था, जाते ही उसने दो-तीन लड़कों को पीछे से पकड़ कर कल्लू से दूर धकेला और चिल्लाते हुए बोला –

क्यों मार रहे हो कल्लू भैया को, छोड़ो इन्हें…!

जबतक शंकर वहाँ पहुँचा तब तक उन 5-6 लड़कों ने मार-मार कर कल्लू का कचूमर बना दिया था, वो किसी पिलपिले कद्दू की तरह ज़मीन पर पड़ा लात घूँसे खा रहा था…

अगर इस समय वो शराब के नशे में नही होता तो शायद इतनी मार झेल भी नही पाता…,

 
वो लड़के कल्लू को छोड़ कर शंकर से बोले – तू बीच से हट जा लौन्डे, आज इस मादरचोद को सबक सिखा कर ही मानेंगे…,

शंकर – लेकिन इन्होने किया क्या है, क्यों मार रहे सब लोग..?

एक लड़का – ये साला अपने दारुबाज़ दोस्तों के साथ मिलकर हमारे कॉलेज की लड़कियों को छेड़ता है, जब लड़की ने विरोध किया तो उसके साथ बदतमीज़ी करने लगा…!

इतना कहकर वो उसे फिर से मारने दौड़े, तब तक शंकर उनके बीच आकर खड़ा हो गया, और बोला – अब बस करो बहुत पीट लिया तुम लोगों ने, अब और नही…

लड़का – तू रोकेगा लौन्डे हमें, जा जाकर अपनी माँ की गोद में बैठकर उसका दूध पी, अभी तेरी उमर नही है इन सब बातों के लिए…!

ये कहते हुए वो लोग जैसे ही कल्लू को मारने लपके, शंकर ने उनमें से दो लड़कों के गले पकड़ कर एक एक हाथ से ही उपर उठा लिया और अपने से दूर उछाल दिया…!

अब उन लड़कों को समझ में आया, जिसे वो दूध पीता बच्चा समझ रहे थे वो कोई साधारण लड़का नही है, सो वो सब एक साथ मिलकर उसके उपर टूट पड़े…!

शंकर ने भी उल्टे-सीधे अपने लात घूँसे जैसे भी उसको समझ आया चलाने लगा, सिर्फ़ अपना बचाव करने के लिए…

लेकिन जिसके भी उसका हथौड़े जैसा हाथ पड़ जाता, वो फिर पलट कर वार करने की स्थिति में जल्दी से नही आ पाता…

चाँद मिनटों में ही शंकर ने उन्हें नानी याद दिला दी, जब वो सब उससे अलग हुए तो उसने कल्लू की तरफ ध्यान दिया,

अभी वो उसे उठाने ही वाला था कि उनमें से एक लड़के ने पीछे से आकर उसकी पीठ में अपने दाँत गढ़ा दिए,

वो दर्द से बिल-बिल्लाकर सीधा खड़ा हुआ ही था क़ी दूसरे ने आगे से आकर उसकी जाँघ में अपने दाँत गढ़ा दिए,

दो तरफ़ा के दर्द को किसी तरह सहन करते हुए उसने सामने वाले लड़के जो उसकी जाँघ को काट रहा था, उसके दोनो कानों को पकड़कर उसे अपनी जाँघ से अलग किया.

उसके बाद दूसरे को पीछे हाथ करके उसके बाल पकड़ कर पीठ से अलग करते हुए सामने लाया, और फिर दोनो की मुन्डी आपस में दे मारी…!

फडाक की आवाज़ के साथ ही उन दोनो लड़कों की खोपडियाँ फट गयी, और उनमें से खून बहने लगा…!

उन्हें दूर फेंक कर अपने दर्द पर काबू करते हुए शंकर ने एक हुंकार भरी, और अपने तमतमाए सुर्ख चेहरे को लेकर वो उन लड़कों की तरफ दहाडा…

आओ हरम्जादो, आओ लडो मुझसे हरमियों पीछे से काटते क्यों हो.. सालो…, हिम्मत है तो सामने से लडो…

उसके इस रौद्र रूप को देख कर वहाँ खड़ी तमाम भीड़ भी एक बारगी ख़ौफ़ में आ गई, उसके चेहरे से आग सी बरस रही थी जिसे देखकर वो लड़के डर के मारे वहाँ से दुम दबाकर भाग लिए…!

शंकर ने कल्लू को किसी अनाज के बोरे की तरह अपनी बाहों में उठा लिया, और भीड़ को चीरता हुआ अपनी बेहन सलौनी की तरफ बढ़ गया…!

तभी भीड़ से एक आवाज़ आई - इस ताक़त का सही इस्तेमाल कर बेटा…, ऐसे नीच आदमी को बचाकर कोई अच्छा काम नही किया है तूने…!

उसने मुड़कर उस आवाज़ वाले आदमी की तरफ देखा, वो एक 60-65 साल का बुजुर्ग था,

उसे घूरते हुए शंकर ने कहा – मुझे अच्छे बुरे की पहचान नही है बाबा…

मेने बस अपने मालिक की रक्षा करके अपना फ़र्ज़ निभाया है, इतना कहकर वो उसे लेकर अपनी साइकल के पास पहुँचा…

कल्लू की हालत ऐसी नही थी कि उसे साइकल पर आसानी से बिठाया जा सकता हो, बाइक उसे चलानी आती नही थी, सो उसे उसने वहीं छोड़ा, फिर जैसे तैसे कल्लू को साइकल के कॅरियर पर बिठाया,

उसके शरीर को सलौनी की रस्सी कूदने वाली डोरी से अपने शरीर के साथ बँधा, और बेहन को आगे बिठाकर वो अपने गाओं की तरफ चल दिया….!

हवेली में कदम रखते ही सेठानी ने अपने लाड़ले कल्लू की हालत देख कर कोहराम मचाना शुरू कर दिया, आवाज़ सुनकर लाला जी भी चौक में आ गये,

साइकल से खोलकर कल्लू को चारपाई पर लिटा दिया, मुँह से शराब की गंध आरहि थी सो किसी को ये बताने की ज़रूरत ही नही पड़ी कि ये सब शराब के कारण हुआ है…

लेकिन सेठानी ने शंकर को कोसने का एक भी मौका नही छोड़ा, और वो उसे बुरा भला कहने लगी, कल्लू की इस हालत का ज़िम्मेदार सीधा सीधा उसने उसे ठहरा दिया…!

शंकर बेचारा नीचे गर्दन किए हुए खड़ा रहा, लेकिन उसने अपनी सफाई में एक शब्द भी नही कहा…!

लाला जी उसके पास आए और उन्होने उसके कंधे पर हाथ रखकर उससे पुछा – तू बता शंकर असल बात क्या है…?

सेठानी – उससे क्या पुछते हो, वो तो अपने आप को बचाने के लिए कोई भी कहानी गढ़ेगा ही, मे पुछति हूँ इसने कल्लू पर हाथ उठाया तो उठाया कैसे…?

लाला जी – तुम थोड़ा शांत रहो भगवान, आज अपने बेटे की हालत की तुम खुद ज़िम्मेदार हो, तुमने इसे इतनी छूट दे दी कि ये अपना अच्छा बुरा सब कुछ भूल गया है…

हां शंकर बता बेटा क्या हुआ था… ? शंकर ने अपना सिर उठाकर सेठ जी की तरफ देखा…!

अभी वो कुछ कहता कि उससे पहले सेठानी हाथ नचाते हुए बोली –

आहहहाहा…बेटा..! वो बेटा हो गया, अपने बेटे से तो कभी इतने प्यार से बात नही की, दोष मुझे मढ़ दिया…!

तुम अपनी ज़ुबान बंद रखो पार्वती, वरना हमसे बुरा कोई नही होगा…

हमें पता तो चले कि असल माजरा क्या है, बिना सोचे समझे तुम उसपर कैसे दोष मढ़ सकती हो…!

सेठानी के द्वारा कहे गये कटु शब्द सुनकर शंकर की आँखों में पानी आ गया,

उसने दबदबाई आखों से अपनी माँ की तरफ देखा जो इस आस से चुप-चाप खड़ी थी कि भगवान करे इसमें उसके बेटे का कोई दोष ना हो…….!

शंकर सेठ धरम दस के आगे हाथ जोड़े हुए अपनी गर्दन झुकाए खड़ा था…,

लाला जी ने फिर पुच्छा..

बता शंकर क्या हुआ है कल्लू के साथ.., किसने मारा है इसे और क्यों..?

इससे पहले कि शंकर कुछ बोलता, रंगीली के पास खड़ी सलौनी बोल पड़ी –

ये कुछ नही कहेगा मालिक, क्योंकि ये तो आपका पालतू है, मे बताती हूँ क्या हुआ था कल्लू भैया के साथ…!

रंगीली ने अपनी बेटी को डाँटते हुए कहा – ये तू किस तरह से बात कर रही है मालिक से, अपने बड़ों से इस तरह बात करते हैं..?

लाला जी – कोई बात नही रंगीली बच्ची है, बोलने दो उसे, हां बता बेटा तू ही बता, लगता है इसके मुँह में तो ज़ुबान ही नही है…

सलौनी घटना को विस्तार से बताने लगी –

भरे बाज़ार में कल्लू भैया और इनके दो दोस्तों ने शराब के नशे में कॉलेज की लड़कियों के साथ छेड़खानी की, उनके साथ बदतमीज़ी की…,

फिर उसने सारा वृतांत ज्यों का त्यों बयान कर दिया, सेठ की आँखें सलौनी के मुँह से ये सब सुनकर नम हो गयी, उसकी माँ रंगीली का सिर अपने बेटे की बहादुरी सुनकर गर्व से उँचा हो गया…!

सेठ जी ने शंकर के सिर पर प्यार से हाथ रख कर उसे आशीर्वाद देते हुए कहा –

जीता रह बेटे, आज तूने साबित कर दिया कि तू इस घर का सेवक नही रक्षक है.., तूने इस नालयक की जान बचाकर बहुत बड़ा काम किया है…!

फिर वो अपनी झगड़ालू पत्नी को संबोधित करते हुए बोले -

देखा पार्वती, इसे कहते हैं स्वामी भक्ति, ये जानते हुए कि तेरे इस नालयक बेटे ने भरे बाज़ार में कितनी नीच और गिरी हुई हरकत की है, उसके बबजूद भी वो इसे बचाकर यहाँ लाया है…!

अगर वो चाहता तो भीड़ की तरह ही वो भी खड़े-खड़े तमाशा देख सकता था, और यूँ ही इसको वहीं पड़ा छोड़ आता, तब किसे दोष देती तुम…?

वजाय उसका अहसान मानने के हर समय उसे कोसना बंद करो…, और कोशिश करो अपने बेटे को समझाने की,

ऐसा ना हो कि इसकी गंदी हरकतों की वजह से एक दिन हमारा इलाक़े में निकलना ही मुश्किल हो जाए…!

तभी रंगीली की नज़र शंकर की पीठ पर लगे खून के धब्बों पर पड़ी,

माँ का दिल तड़प उठा, दौड़कर वो उसके पास गयी और उससे पुछा – ये खून कैसा शंकर…?

कुछ नही माँ, उन हरामजादो ने मुझे काट खाया है, फिर जब रंगीली ने उसकी कमीज़ उठाकर देखी, तब उसका घाव दिखाई दिया जो काफ़ी ज़्यादा जगह का मास कुचल सा गया था दाँतों के काटने से…!

लाला – हम अभी हाक़िम को बुला कर इन दोनो की दवा दारू का इंतेज़ाम करते हैं, तुम शंकर को ले जाओ रंगीली और इसके बदन को सॉफ करो…

रंगीली – इसे हाक़िम की ज़रूरत नही है मालिक, हम अपने घरेलू इलाज़ कर लेंगे, आप कल्लू भैया को सम्भालो, ये बात उसने सेठानी को देख कर कही, जबाब में सेठानी ने अपना मुँह बीसूर कर उउउन्न्ह…ही किया…!

लेकिन सेठानी के अलावा और चार आखें ऐसी थी, जिनमें शंकर के प्रति अलग-अलग तरह के भाव थे, कहीं कृतघनता के तो कहीं वासना पूर्ति के…!

हाक़िम जी कल्लू की मलम पट्टी करके चले गये, लेकिन उसको चोटें अंदर से लगी थी, जो कुछ दिन कसकने वाली थी…

लाला जी ने हाक़िम जी को शंकर की मलम पट्टी के लिए भी कहा लेकिन रंगीली ने उन्हें मना कर दिया, और अपने बेटे को अपने नौकरों वाले कमरे में ले गयी…!

आते ही उसने अपने बेटे को कलेजे से लगा लिया, और उसके माथे को चूमकर बोली –

शाबाश मेरे शेर, ऐसे ही अपने हौसले और ताक़त के दम पर इस परिवार को अपने अहसानों के नीचे दबाना है तुझे…!

आज अंजाने में ही सही तूने अपनी माँ को उसकी मंज़िल की एक सीढ़ी और चढ़ा दिया है…!

शंकर – ये तू क्या बोल रही है माँ, मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा…?

रंगीली – सब समझ जाएगा मेरे लाल, समय आने दे तुझे सब समझा दूँगी…. ला मुझे दिखा तो कहाँ कहाँ चोट लगी है तुझे…!

फिर उसने उसकी कमीज़ उतार कर गुनगुने पानी से उसका धूल-धूसीर शरीर सॉफ किया, और उसके पीठ के घाव पर सरसों का तेल लगाकर हल्दी लगाकर पट्टी बाँध दी,

हल्दी से उसके घाव में जलन होने लगी, जब उसने अपनी माँ से शिकायत की तो वो बोली – इतनी सी जलन सहन नही हो रही तुझे,

तेरी माँ का दिल तो बुरी तरह ज़ख्मी हुआ पड़ा है, सोच उसे कितनी जलन होती होगी.., ये कहकर उसकी आँखें भीग गयी…!

वो अवाक अपनी माँ की अन्सुझि वेदना को समझने की कोशिश करता हुआ बोला – अपने बेटे को अपने गमों के बारे में कुछ नही बताएगी तू…?

रंगीली – तू अभी बच्चा है मेरे लाल, मेने कहा ना बस समय का इंतेज़ार कर, और कहाँ चोट लगी है तुझे ये बता…!

शंकर ने झिझकते हुए अपनी जाँघ की तरफ इशारा किया, तो रंगीली उसका पाजामा उतरवाने लगी,

 
उसे अब अपनी माँ को अपना लिंग दिखाने में शर्म महसूस होने लगी थी, सो बोला – रहने दे माँ, एक दो दिन में अपने आप ठीक हो जाएगा…!

रंगीली – बेकार की बहस मत किया कर मुझसे, चल उतार इसे, अपनी माँ को अंग दिखाने में शर्म नही करते.., ये कहकर उसने ज़बरदस्ती उसके पाजामे को उतरवा दिया…!

यहाँ पीठ जितना घाव तो नही था, लेकिन था तो सही, वो भी उसके लौडे के एकदम नज़दीक, हालाँकि अभी उसका लिंग सोया हुआ था,

अपनी माँ के लिए उसके मन में केवल और केवल श्रद्धा के भाव थे, सो बस एक थोड़ी सी झिझक के अलावा और कोई भावना नही थी जिसके कारण वो उत्तेजित होता..

शंकरा का मुरझाया हुआ लिंग भी रामू के खड़े लंड की बराबर लंबा था, रंगीली ने उसे अपनी टाँगें चौड़ी करके बैठने को कहा, फिर वो उसकी टाँगों के बीच अपने घुटने मोड़ कर बैठ गयी…

एक हाथ से उसने उसके लिंग और गोटियों को साइड में किया और दूसरे हाथ की उगलियों से उसके घाव पर तेल लगाने लगी,

ना जाने क्यों रंगीली जब भी अपने बेटे के लिंग को छूति थी, उसका शरीर उत्तेजित होने लगता था, और वो अपनी चूत में गीलापन महसूस करने लगती थी…!

अब भी जब उसने उसके लिंग और वाकी समान से हाथ लगाया, तो वो फिर से उत्तेजित होने लगी, जैसे तैसे करके उसके तेल लगाकर हल्दी लगाई, और उसे एक कपड़े की पट्टी से बाँध दिया…!

लेकिन इतनी देर वो अपने हाथ से उसके लिंग को सहलाती रही, जिससे शंकर का लिंग धीरे-धीरे अपना आकार बढ़ने लगा था, जिसे देख कर रंगीली की उत्तेजना और बढ़ गयी,

मलम पट्टी तो हो गयी, लेकिन रंगीली का मन उसके लिंग की सुंदरता को देखने से नही भरा, सो वो उसे प्यार से सहलाते हुए बोली – बेटा, तेरा ये इतना बड़ा कैसे हो जाता है…!

शंकर शरमाते हुए बोला – छोड़ ना माँ, ला अब मुझे पाजामा पहनने दे…!

रंगीली – नही थोड़ी देर हवा लगने दे घाव को…!

शंकर – लेकिन माँ, तूने तो पट्टी बाँध दी, फिर हवा कैसे लगेगी, शंकर के जबाब से वो लाजबाब हो गयी, लेकिन फिर अपनी बात को संभालते हुए बोली –

वही तो, एक तो ये मुई पट्टी, उपर से तू पाजामा और पहन लेगा तो और ज़्यादा गर्मी रहेगी और घाव सही नही हो पाएगा…!

शंकर – माँ ! पाजामा के अंदर पहनने को अंडरवेर दिला दे ना, बड़ा अजीब सा लगता है, स्कूल में सब लड़के-लड़कियाँ मेरी हिलती हुई सू सू देखकर हँसते हैं…!

रंगीली – अच्छा ठीक है, कल स्कूल से लौटते वखत ले आना, कितने के आते हैं..? पैसे ले जाना मेरे से…!

फिर जैसे उसे कुछ याद आया हो, सो वो बोली – अरे हां बेटा, मे तो भूल ही गयी थी, तू सुवह कुछ अपने सपने के बारे में कह रहा था…!

वो क्या सपना था, जिसकी वजह से तेरा पाजामा इतना ज़्यादा गीला हो गया था…?

अपनी माँ की बात सुनकर शंकर को एकदम से झटका सा लगा, वो जिस बात को लेकर स्कूल में अच्छे से पढ़ भी नही पाया था, उसी बात को छेड़कर माँ ने एक तरह सोए हुए नाग को फिर से जगा दिया…!

सपने में आई उस युवती के कामुक संगेमरमरी किसी अप्सरा जैसे बदन के एहसास से ही उसका लंड ठुमकने लगा, उपर से रंगीली ने उसे पाजामा भी नही पहनने दिया था….

उसके लंड को ठूमकते देख, रंगीली ने उसे फिर से उकसाया, बता ना.. क्या देखा था सपने में…?

शंकर – ऐसा कुछ नही था माँ, मुझे ठीक से याद भी नही रहा कि मेने क्या देखा था…, तू जा अब मुझे थोड़ा पढ़ाई करनी है…!

रंगीली उसके लिंग को हाथ में लेकर बोली – देख बेटा, सुवह तेरे इसके रस से तेरा इतना ज़्यादा पाजामा गीला हुआ ना, उसे देख कर मुझे बड़ी चिंता होने लगी है,

मे जो तेरी इतनी परवाह करके अच्छा-अच्छा खिलाती पिलाती हूँ, वो सब ऐसे ही बरवाद ना हो जाए, इसलिए जानना चाहती थी कि आख़िर ऐसा क्या देखा मेरे बेटे ने सपने में जिससे इतना सारा रस छोड़ दिया…!

लेकिन तुझे अगर मेरी चिंता की कोई परवाह नही है तो ठीक है, आज से तू खुद अपना ख़याल रखना, जो मिले खा लेना, पीना हो पी लेना, मे क्यों खम्खा अपना खून सुखाऊ तेरी चिंता में…

इतना कहकर वो उसके पास से उठ खड़ी हुई, और वहाँ से जाने के लिए जैसे ही पलटी, की शंकर ने उसकी कलाई थाम ली…………..!

शंकर ने अपनी माँ की कलाई थामकर उसे जाने से रोका.., जो उसे उलाहना देकर जाने लगी थी…, रंगीली ने प्रश्नसूचक निगाह उस पर डाली….

शंकर कहने लगा.. माँ तू तो जानती है, मेने आज तक तेरी किसी बात को नही टाला है, और मे ये भी जानता हूँ, कि मेरी माँ सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरे भले के लिए ही सोचती और करती है,

पर माँ, … ना जाने क्यों मुझे ये सपने वाली बात तुझे बताने में शर्म सी महसूस हो रही है, जो मेने सपने में देखा था उसे अपनी माँ के सामने कैसे बयान करूँ…?

रंगीली – अच्छा ठीक है तू अपनी माँ को नही बताना चाहता है तो मत बता, लेकिन ये तो बता सकता है कि इस बात का जिकर अपनी माँ के अलावा ऐसा कोई तो होगा जिसके सामने तू कर सकता है…?

शंकर कुछ देर चुप रहा फिर कुछ सोचकर बोला – हां अगर मेरा कोई दोस्त होता तो ये बात मे उसके साथ सांझा कर सकता था, लेकिन मेने अभी तक ऐसा कोई दोस्त बनाया ही नही जिसके साथ साझा कर सकूँ…!

रंगीली – तो क्या तू कभी भी कोई दोस्त बनाएगा ही नही…?

शंकर – अगर कोई मुझे समझने वाला मिल गया तो ज़रूर बनाउन्गा…!

रंगीली उसकी आँखों की भाषा पढ़ने की कोशिश करते हुए बोली – मे तुझे थोड़ा बहुत समझती हूँ…?

शंकर – हां माँ, तेरे अलावा और कॉन है जो मुझे समझता है…!

रंगीली – तो समझ ले आज से मे तेरी वो दोस्त हूँ,

शंकर अपनी माँ की तरफ देखता ही रह गया, उसे कोई जबाब देते नही बन रहा था, उसे चुप देख वो फिर से बोली – क्यों माँ एक दोस्त नही हो सकती…?

शंकर – क्यों नही, तू तो मेरी सबसे अच्छी और सच्ची दोस्त है माँ…!

रंगीली – तो फिर अपने सुख-दुख, ख्वाब, सपने अपने दोस्त के साथ भी सांझा नही कर सकता…?

अपनी माँ के तर्क सुनकर शंकर लाजबाब हो गया, उसके मुँह पर जैसे ताला लटक गया हो.. रंगीली खड़ी-खड़ी सिर्फ़ उसके चेहरे पर नज़र गढ़ाए देखती रही…!

शंकर उसका हाथ पकड़कर बोला – चल बैठ, अब जब हम दोनो दोस्त ही हैं तो मे बताता हूँ अपने सपने की बात की मेने क्या देखा था…

वो उसके बगल में पालती मारकर बैठ गयी, शंकर नज़र नीची करके अपने रात वाले सपने के बारे में बताने लगा…

वो जैसे-जैसे अपने सपने के बारे में बताता जा रहा था, रंगीली पर उत्तेजना का भूत सवार होता जा रहा था, उसकी चूत में चींटियाँ सी रेंगने लगी,

रस गागर छलक्ने लगी, उधर शंकर भी बताते बताते सपने में मानो खो ही गया, उत्तेजना में उसका लंड कड़क होकर सीधा भेलचा की तोप की तरह तन गया,

 
भले ही उसने अपनी कमीज़ से उसे ढँक रखा था, लेकिन उसने उसकी कमीज़ को छप्पर की तरह अपने सिर पर उठा रखा था,

रंगीली की नज़र जैसे ही उसके कमीज़ के बाहर मुँह चम्काते खड़े लंड पर पड़ी, उसकी चूत की सुरसूराहट और तेज हो गयी, और उसकी सुरंग के स्रोत अपने आप खुलने लगे…!

उसने चुपके से अपने लहंगे से अपनी चूत के रस को बाहर बहने से पहले ही सोख लिया, ना जाने क्यों वो सपने में उस युवती की जगह अपने को रख कर सोच रही थी….

जब शंकर ने अपनी कहानी को विराम दिया, और अपनी माँ की तरफ देखा, वो तो जैसे अभी भी सपने में ही खोई हुई, शंकर की बाहों में अपने को महसूस कर रही थी…!

जब कुछ देर उसने कोई रिक्षन नही दिया, तो शंकर ने उसके कंधे को पकड़ कर हिलाया…माँ… क्या हुआ, कहाँ खो गयी…?

वो मानो नींद से जागी हो, हड़बड़ा कर बोली –आअंन्न…हां, कुछ नही, बस तेरे सपने के बारे में सोच रही थी,

फिर कुछ सोचकर बोली – वो सपने वाली युवती कॉन थी..? क्या तू उसे जानता है..?

शंकर ने अपनी नज़रें नीचे कर ली, लेकिन कुछ जबाब नही दे पा रहा था…

रंगीली ने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा – बता ना शंकर.. क्या तू उस युवती को पहचानता है..? कैसी थी वो…?

शंकरा – वो कहानियों में बताई हुई किसी इन्द्रलोक की अप्सरा जैसी थी, मे ठीक से उसे पहचान तो नही पाया था कि वो कॉन थी, लेकिन वो..वऊू..उूओ…,

इसके आगे वो कुछ बोल ना सका तो रंगीली बोली – बता ना वो..वो..क्या कर रहा है..

वो..वऊू.. बहुत सुंदर थी माँ, बिल्कुल तेरे जैसी………….!

अपने बेटे के मुँह से ये शब्द सुनते ही रंगीली सन्न रह गयी, कितनी ही देर वो अपने मुँह पर हाथ रखे हुए उसके चेहरे को ताक्ति रही, जबकि वो अपना मुँह नीचे किए हुए उसके सामने बैठा रहा…!

रंगीली ने उसके चेहरे के नीचे हाथ लगाकर उसे उपर किया, फिर उसकी आँखों में झाँकते हुए बोली – तू अपनी माँ के लिए ऐसी गंदी सोच रखता है नालयक, शर्म नही आई तुझे…!

शंकर झट से अपनी मा के पैरों में लोट गया, उसके पैर पकड़कर बोला – मुझे ग़लत मत समझ माँ, तेरा दर्जा मेरे जीवन में भगवान से भी उपर है…!

मेने तो तुझे पहले ही कहा था, कि मुझे उस युवती की धुंधली सी पहचान है, अब जब तूने पुछा की वो कैसी थी, तो उसकी सुंदरता की तुलना करने के लिए मुझे तुझसे सुंदर और कोई स्त्री नही दिखी आज तक…!

अपने बेटे के मुँह से अपने लिए भगवान से उपर का दर्जा, और सुंदरता में उसके लिए उससे बढ़कर कोई और नही है, ये सुनकर रंगीली का दिल मों की तरह पिघल गया,

वो उसे लेकर चारपाई पर बैठ गयी, और उसके सिर को अपनी गोद में रख कर उसके घुंघराले काले बालों में अपनी उंगलियों को पिरोते हुए बोली…

तुझे मे इतनी सुंदर लगती हूँ शंकर, कि कोई और औरत तुलना करने के लायक दिखी ही नही तुझे आज तक…? इतना कहकर उसने झुक कर अपने बेटे के माथे पर किस कर दिया…!

शंकर ने अपनी माँ की पतली सी लेकिन मांसल कमर में अपनी बाहें लपेट ली, और अपना मुँह उसके वक्षों में घुसाकर बोला – मेरी माँ किसी अप्सरा से कम नही है, तो किसी और की उपमा कैसे दे सकता था…!

लेकिन जैसे ही उसे अपने चेहरे पर दबे अपनी माँ के सुडौल और मक्खन जैसे मुलायम वक्षों का स्पर्श हुआ, उसे सपने में आई युवती के उभारों की याद आ गई,

उसपर उत्तेजना हावी होने लगी, और उसका लंड फिर से सिर उठाने लगा…! उसने उसकी कमीज़ को फिर उठा लिया जिसकी वजह से रंगीली की नज़र उसपर फिर पड़ गयी…!

वो सोचने लगी कि अगर इसके मान में अपनी माँ के लिए ग़लत भावना नही है, तो फिर इसका हथियार यूँ बार-बार खड़ा क्यों हो रहा है ?

उसकी सोचों पर विराम तब लगा, जब शंकर ने अपने मुँह का दबाब उसके उभारों पर बढ़ा दिया, वो भी उत्तेजना से भरने लगी, और धीरे-धीरे उसका हाथ अपने बेटे के फुल खड़े लंड पर पहुँच गया…

आहह…माआ…उसे मत छेड़… मुझे कुछ कुछ होने लगता है…वो एक साथ उन्माद में भरते हुए बोला..

रंगीली – लेकिन पहले तो तुझे कुछ नही होता था, फिर अब क्या हुआ ? और कैसा लगता है तुझे, उसके लंड को सहला कर पुछा उसने…

शंकर – आहह… बहुत अच्छा…स्ाआहह…थोडा ज़ोर्से मसल माँ इसको… हां.. जल्दी जल्दी.. प्लीज़ माँ, कुछ कर ना.. थोड़ा जल्दी जल्दी उपर नीचे कर…!

रंगीली बेकाबू होने लगी थी, शंकर के मूसल को हाथ में लेते ही वो उन्माद से भरने लगी, उसकी चूत को बहने पर मजबूर कर दिया उसके स्पर्श ने, वो सब कुछ भूल कर उसके लंड को मुत्ठियाने लगी...

वो ज़ोर-ज़ोर्से उसके लंड को हिलाकर एक तरह से उसकी मूठ ही मारने लगी…

जब उसका हाथ थक गया, तो उसने शंकर को चारपाई पर लिटा दिया, और बोली – ठहर, तुझे हाथ से भी ज़्यादा मज़ा देती हूँ, ये कहकर उसने उसके लंड को अपनी जीभ से चाट लिया…

शंकरा कराहते हुए बोला – हाए.. माँ ये क्या किया तूने… मेरी सू सू से जीभ लगा दी… च्चिि…च्चीी… बहुत गंदी है तू…

वो आगे कुछ और कहने ही जा रहा था कि तभी उसने उसके लंड को अपने होंठों में क़ैद कर लिया…, शंकर ये देख कर बुरी तरह से हैरान रह गया, कि मूतने वाले लंड को उसकी माँ ने अपने मुँह में ले लिया है…

लेकिन उसे एक तेज झटका तब लगा, जब उसके मुँह में जाते ही उसका लंड बुरी तरह से सख़्त होने लगा, उसे इतना ज़्यादा मज़ा आया कि वो सब कुछ भूलकर अपनी आँखें बंद करके माँ के सिर पर हाथ रखकर उसे अपने लंड पर दबाने लगा…!

 
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