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रंगीला लाला और ठरकी सेवक

स्कर्ट के अंदर मुँह डाले शंकर की नज़र जैसे ही उसकी कच्छी में क़ैद छोटी सी मुनिया के उपर पड़ी, जिसकी पतली-पतली फांकों के बीच शंकर की नाक सटी हुई थी…!

पेशाब मिश्रित सलौनी के कामरस से भीगी कच्छी की खुसबु उसकी नाक में घुसने लगी जिसे सूँघकर वो मदहोश होने लगा,

आँख बंद करके लंबी-लंबी साँस लेकर उसकी चूत की खुसबु की मदहोशी में स्वतः ही उसके होंठ उसकी मुनिया के उपर पहुँच गये और उसने उसे कच्छी के उपर से ही चूम लिया…!

शंकर अपने होंठों को उसकी मुनिया के उपर ले जाने के लिए जैसे ही उसने अपने मुँह को थोड़ा उपर किया, उसकी नाक की नोक सलौनी की फांकों के बीच दबाब डालती चली गयी…

फिर जैसे ही शंकर ने उसकी मुनिया के होंठों को चूमा, सलौनी का पूरा शरीर, बिजली के झटके की तरह झन-झना उठा.., उसकी टाँगें शंकर के गले से लिपट गयी…,

शंकर ने अपने होंठों का दबाव कच्छी के उपर से ही उसकी मुनिया पर बढ़ा दिया और उसे एक बार ज़ोर्से चूस लिया…!

ना चाहते हुए सलौनी के मुँह से एक मादक सिसकी निकल पड़ी…सस्स्सिईईई…

आअहह….भैयाअ… साथ ही उसने अपने हाथ से उसका सिर और दबा दिया…

शंकर भी सब कुछ भूलकर उसकी पैंटी को अपनी जीभ से चाटने लगा, जो उसके कामरस से भीगति जा रही थी…

वो कहते हैं ना कि, आदमी को जितना मिलता है, उसे उससे आगे और ज़्यादा पाने की इच्छा होने लगती है..,

ऐसा ही कुछ शंकर के साथ हो रहा था, अब उसे अपनी बेहन की प्यारी मुनिया के दीदार करने की इच्छा होने लगी…, लेकिन उसके दोनो हाथ तो उसकी पीठ पर सहारा दे रहे थे…,

तभी उसके दिमाग़ में एक विचार आया, और उसने अपनी नाक उसकी कच्छी के किनारे फसाई, और उसे एक तरफ को कर दिया…!

टाँगें चौड़ी होने के कारण सलौनी की मुनिया के पतले-पतले होंठ, थोड़े से खुले हुए थे…, बालों के नाम पर तो अभी उसके रोंगटे ही थे,

चिकनी मुनिया के पतले होंठों के बीच की लालमी देखकर शंकर बौरा उठा, और उसने अपनी जीभ की नोक से उसकी मुनिया की अंदरूनी लालमी को कुरेद दिया…

अपनी बेहन के कुंवारे रस का स्वाद उसकी जीभ को भा गया, और वो उसे उपर से नीचे अच्छी तरह से जीभ से रगड़कर चाटने लगा…!

जैसे ही सलौनी को अपनी मुनिया के अंदर तक अपने भाई की जीभ का एहसास हुआ…उसकी गान्ड बुरी तरह से थिरकने लगी,

वो सिसकते हुए पीछे को दोहरी होगयि, और अपनी चूत को उसके मुँह पर चिपका दिया.. वो ज़ोर-ज़ोर्से साँस लेती हुई अपने भाई के मुँह पर झड़ने लगी…,

शंकर उसके सारे रस को चाट गया..,

जब वो पूरी तरह झड गयी, कुछ देर तक उसका शरीर झन-झनाता रहा, फिर कुछ सामान्य होते हुए बोली – भैया, अब मुझे नीचे उतार ले…

शंकर भी होश में आ चुका था, सो लंबी-लंबी साँस लेकर अपने आपको संयत करते हुए बोला – सारी जामुन तोड़ ली…

सलौनी के मुँह से बस हूंम्म..ही निकला…

उसने सलौनी को आराम से नीचे सरकाया, शंकर के कठोर बदन से रगड़ पाकर उसके अनार फिर से फड़कने लगे…,

शंकर ने उसे ज़मीन पर खड़ा किया और आवेश में उसने अपनी बेहन को अपने बदन से चिपका लिया…!

कुछ देर वो उसी सुखद एहसास में एक दूसरे से चिपके खड़े रहे, शंकर का लंड सलौनी की नाभि में घुसने लगा…!

सलौनी मन ही मन अपने भाई के लंड को अपनी नाभि की जगह अपनी मुनिया में फील करने लगी, ये सोचकर उसकी मुनिया फिर एकबार गीली हो उठी.. और वो गुदगुदी से भर उठी…!

उसने अपने भाई को कस कर अपनी बाहों में जकड लिया, और उसकी छाती पर अपने दहक्ते होंठ रखकर बोली – मेरा प्यारा भैया…!

सलौनी के मुँह से ये शब्द सुनते ही मानो शंकर होश में आ गया, उसने फ़ौरन सलौनी को अपने से अलग किया और बोला – ला कहाँ हैं जामुन…!

लेकिन जो जामुन उसने तोड़ी थी, वो भी इस खेल में ज़मीन पर गिर पड़ी थी, वो अपनी खाली झोली टटोलकर बोली –

सॉरी भैया, वो तो गिर पड़ी…, उसकी बात सुनकर शंकर को हसी आ गई, सलौनी झेंप गयी, और फिर वो भी मुस्करा उठी…!

मन में भाई – बेहन का भाव आते ही दोनो की नज़रें स्वतः ही झुक गयी, उन्होने मिलकर नीचे पड़े जामुन उठाए, और बिना कुछ बोले चुप-चाप साइकल उठाकर घर की तरफ चल दिए…..,

शंकर अब एकदम शांत गुम-सूम साइकल चला रहा था, उसके मन में कुछ देर पहले अपनी छोटी बेहन के अंगों के साथ खेलने और छेड़-छाड़ करने से उसका मन ग्लानि से भर उठा…

 
उधर सलौनी के मन में आनंद की तरंगें उठ रही थी, आज उसे अपने भाई के द्वारा अपने कोमलांगों के साथ हुई छेड़-छाड ख़ासकर उसकी मुनिया पर हुए भाई की जीभ के स्पर्श सुख से वो अभी भी गुद-गुदि से भरी हुई थी…,

दोनो ही अपनी-अपनी अलग-अलग सोच में डूबे खामोशी से घर आ गये…!

शंकर अब 12वी क्लास में आ चुका था, वो अपनी पढ़ाई के प्रति पूरी तरह सजग था…

उसे पता था कि इस बार के बोर्ड एग्ज़ॅम के रिज़ल्ट पर ही उसका आगे का भविष्य आधारित है…

एक दिन खाना पीना खाकर दोनो माँ बेटे ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सोने की तैयारी में थे,

लेटे हुए शंकर ने अपना एक हाथ अपनी माँ के पेट पर रखा और उसके ठंडे, मुलायम पेट पर हाथ से सहलाते हुए बोला –

माँ, मेरे क्लास टीचर कह रहे थे, कि तुम इस बार भी अच्छे नंबरों से पास कर जाओगे, थोड़ी और मेहनत करो, जिससे तुम्हें शहर के किसी भी अच्छे कॉलेज में बिना किसी खर्चे के दाखिला मिल जाएगा…!

ऐसे ही मेहनत करते रहे तो तुम अपने जीवन में बहुत आगे बढ़ सकते हो…!

शंकर के गरम हाथ का स्पर्श अपने ठंडे पेट पर महसूस कर रंगीली को गुदगुदी सी हो रही थी, उसकी बात सुनकर उसने उसका हाथ अपने पेट से उठाकर उसकी तरफ करवट बदली और फिर उसी हाथ को अपनी कमर पर रख लिया…!

अपने बेटे को बाहों में जकड कर उसका माथा चूमकर बोली – मेरा बेटा लाखों में एक है, मुझे पता है तू बहुत बड़ा आदमी बन सकता है…,

लेकिन बेटा क्या तू हम लोगों को छोड़कर शहर में अकेला रह पाएगा..?

शंकर ने अपना मुँह अपनी माँ के वक्षों के बीच दबाकर उसके बदन की खुश्बू सूंघते हुए बोला – अपने परिवार के भले के लिए अकेला रह लूँगा माँ, कॉलेज की फीस तो माफ़ ही हो जाएगी…

अपने रहने खाने के खर्चे लायक कोई काम कर लूँगा, तू मेरी चिंता मत कर..,

बातों के दौरान शंकर ने अपनी एक टाँग रंगीली की टाँग पर चढ़ा दी, दोनो के बदन इतने नज़दीक होने से गर्मी बढ़ना स्वाभिवीक ही था,

शंकर का लंड धीरे-धीरे गर्मी पाकर अपना सिर उठाने लगा था, और वो रंगीली की जाँघ से टच हो गया…!

अपनी चुचियों के बीच बेटे के सिर को दबाकर वो उसकी पीठ सहला रही थी, जैसे ही उसे उसका लंड अपनी जाँघ पर महसूस हुआ, उसके बदन में हलचल शुरू हो गयी…!

उसके एक मन ने उसे अलग होने को कहा, ये तू क्या कर रही है रंगीली, अपने ही बेटे के लिए मन में ऐसे गंदे भाव लाना ठीक नही है, ये सोच कर उसने उसकी टाँग को नीचे रख कर दूसरी तरफ करवट लेने की सोची…

तभी शंकर ने अपनी कमर आगे करते हुए कहा – तूने कोई जबाब नही दिया माँ, अब तो मे 18 साल का हो गया हूँ, अपनी देखभाल खुद कर सकता हूँ…!

कमर आगे करने से शंकर का लंड उसकी जांघों के बीच रगड़ता हुआ और अंदर उपर को चला गया, अब वो उसकी चूत से कुछ सेंटीमीटर की दूरी पर था…!

अपनी जांघों के बीच बेटे बेटे के मस्त कड़क लंड को महसूस करके रंगीली के दिमाग़ में उसकी छवि घूम गयी,

उसने उसकी जाँघ के पीछे हाथ लगाकर उसे और अपनी ओर करते हुए कहा – देखेंगे, अभी तो समय है तेरे इम्तिहान में…!

थोड़ा सा आगे सरकते ही शंकर का लंड उसकी चूत की फांकों पर जा टिका,

लंड का दबाब अपनी चूत के मोटे-मोटे होंठों पर महसूस करते ही उसकी चूत फडक उठी,

कपड़ों के उपर से ही वो लंड की गर्मी सहन नही कर पाई और गीली होने लगी…!

उधर शंकर धीरे-धीरे अपनी माँ के कूल्हे को सहला रहा था, उसका हाथ थोड़ा सा नीचे होते ही, उसके मुलायम गद्दे जैसे चूतड़ पर पहुँच गया, वो उसे दबाने लगा…!

आहह.. माँ, एक बात पुच्छू…?

रंगीली - हूंम्म…, क्या है..?

शंकर – तेरे चूतड़ इतने मुलायम क्यों हैं ? जबकि देख मेरे कितने कठोर हैं, दब्ते ही नही, और तेरे तो किसी स्पूंज की तरह दब जाते हैं, ये कहकर उसने उसके एक चूतड़ को ज़ोर्से दबा दिया…!

आअहह…बदमाश ज़ोर्से नही, दर्द होता है… रंगीली मीठी सी कराह लेकर बोली..

सॉरी माँ, मुझे अंदाज़ा नही था, ये कहकर उसने उसके कूल्हे को सहला दिया…!

अंजाने में ही उसके बेटे ने उसके बदन में आग पैदा करदी थी, वैसे भी लाला के लंड पर तो लाजो का कब्जा हो चुका था, पति रामू उसकी मनमर्ज़ी प्यास नही बुझा पा रहा था,

सो महीनों से अधूरी प्यास लिए रंगीली माँ बेटे के संबंध को भूलती जा रही थी, अब उसमें उसे एक जवान मर्द नज़र आ रहा था, जिसके पास एक ऐसा हथियार था, जैसा उसने आजतक कभी इस्तेमाल नही किया था…!

 
शंकर का लंड उसकी दोनो मोटी-मोटी जांघों के बीच फँसा था, उसके लंड को वहाँ गर्मी का एहसास हुआ जिससे वो और ज़्यादा फूलने लगा…

उत्तेजना में वो अपनी कमर को आगे पीछे करने लगा, रंगीली उसकी हरकत देख कर मन ही मन मुस्करा उठी,

वो उसे छेड़ते हुए बोली – क्यों रे बदमाश ये तू क्या कर रहा है…?

शंकर – माँ, मेरी एक इच्छा पूरी करोगी..?

रंगीली – क्या..?

शंकर – वो उस दिन जैसे आपने मेरे साथ किया था मेरा सू सू मुँह में लेकर, वैसे ही एक बार और करदो ना माँ, प्लीज़ माँ, उस दिन मुझे बहुत मज़ा आया था…!

रंगीली ने उसके सिर को उपर उठाया, कुछ देर अपनी वासना से भरी नशीली आँखों से उसे देखती रही, फिर एक झटके से उसने अपने बेटे के होंठों पर अपने तपते होंठ रख दिए…!

अपनी जीभ निकाल कर वो शंकर के होंठों को चाटने लगी..,

शंकर के लिए ये पहला अवसर था, जब किसी की जीभ उसके होंठों को इस तरह से चाट रही थी, उसने अपने बंद होंठों को खोल दिया और रंगीली की जीभ उसके मुँह में पेवस्त हो गयी…

वो उसके होंठों को चूसने लगी, कुछ देर तो शंकर को कुछ अंदाज़ा नही लगा कि वो उसके होंठों को चूस क्यों रही है, लेकिन जल्दी ही उसकी उत्तेजना बढ़ने लगी, और वो भी अपनी माँ के होंठों को चूसने लगा…!

अपनी माँ की लिजलीज़ी जीभ अपने मुँह में पाकर वो अपनी जीभ से उसके साथ खेलने लगा, दोनो को इस खेल में असीम आनद आ रहा था…!

कुछ देर बाद रंगीली ने अपना मुँह हटा लिया, और अपनी नशीली आँखों से शंकर की तरफ देख कर मुस्कराते हुए बोली – आज तुझे उस दिन से भी ज़्यादा मज़ा दूँगी मेरे लाल…

आज तुझे स्त्री और पुरुष के असल संबंधों के बारे में सब कुछ बताउन्गी,

अब मेरा बेटा भी जवान हो गया है, इसलिए अब तुझे वो सब बातें पता होनी चाहिए जो एक जवान मर्द को होती हैं…!

इतना कहकर उसने अपना हाथ उसकी कमीज़ के अंदर डाल दिया, और वो उसके कशरति बदन को सहलाने लगी…!

कुछ देर बाद उसने शंकर को अपनी कमीज़ निकालने को कहा, जिसे उसने फ़ौरन अपने बदन से अलग कर दिया…!

अपने बेट एके गोरे चिट्टे कशरति बदन को देखकर रंगीली की वासना में इज़ाफा होता जा रहा था…

वैसे तो वो उसे रोज़ ही देखती थी, लेकिन इस समय उसकी नज़र में वो मजबूत नौजवान था, जो आज उसकी काफ़ी दिनो दबी प्यास को बुझाने वाला था…!

बेटे की चौड़ी छाती पर अपने तपते होंठों से एक चुंबन लेकर उसने उसके पाजामा के नाडे को भी खींच दिया,

पाजामे को टाँगों से निकाल कर उसके मस्ती में झूम रहे घोड़ा पछाड़ नाग को अपनी हथेली में लेकर सहलाया, फिर मुट्ठी को कसते हुए उसकी सख्ती को परखने के लिए उसने उसे ज़ोर्से मरोड़ दिया…

शंकर के मुँह से आअहह… निकल गयी, जिसे सुनकर वो कामुकता से मुस्करा उठी, और उसके लौडे को चूमकर खड़ी हो गयी…!

बेटे के पैरों में खड़ी होकर उसने अपनी चुनरी हटा कर एक तरफ को फैंक दी, इसी के साथ वो एकदम से पलट गयी, और चार कदम उससे दूर जाकर उसकी तरफ पीठ करके उसने अपनी चोली के सारे बटन खोल डाले…

शंकर ये बिस्तर पर नंगा पड़ा अपनी माँ को देख रहा था, उसने जैसे ही अपनी चोली अपने बदन से अलग की, अपनी माँ की गोरी-गोरी पीठ जो उसने आज तक नही देखी थी उसके सामने थी…

ना जाने कैसा आकर्षण था जो अपनी माँ के उपरी भाग को पीछे से नंगा होते देख कर उसका लंड झटके लगाने लगा…

अब रंगीली के हाथ उसके लहंगे के नाडे पर थे, शंकर को पीछे से कुछ दिखा तो नही पर वो उसके हाथों से अनुमान लगा रहा था कि उसकी माँ अपना लहनगा भी उतारने जा रही है…!

कैसा होगा माँ का नीचे का बदन, इसी कल्पना मात्र से ही उसका बदन कमोवेश में आकर तपने लगा…!

नाडे की गाँठ खुलते ही उसका लहनगा सर्र्र्र्र्र्र्र्र्ररर… से नीचे उसके कदमों में जा गिरा जिसे उसने अपने पैर से दूर उछाल दिया…,

कमरे में जल रही लालटेन की पीली सी रोशनी में शंकर अपनी माँ के नंगे पिच्छवाड़े को देखकर उत्तेजना से भर उठा..

उसका घोड़ा पछड वास्तव में ही किसी फन फैलाए विषधर की तरह आगे पीछे लहराने लगा…!

आअहह…क्या मस्त नितंब थे रंगीली के.., मोटापा तो कहीं छू भी नही पाया था उसे अभी तक, संतुलित 30 की कमर के बाद उसकी गान्ड के दोनो उभार ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो दो अर्ध कलश आपस में मिलाकर रख दिए हों…

एकदम गोल मटोल, पीछे को उभरे हुए दोनो कलषों के बीच की गहरी दरार जो इस समय दोनो तरफ के दबाब के कारण एक मोटी लाइन सी दिख रही थी…

उन दो कलषों के नीचे चिकनी गोरी-गोरी जांघें एकदम गोलाई में किसी केले के मोटे तने जैसी, जो नीचे की तरह पतली होती चली गयी थी, किसी शंकु की तरह…!

कमर तक लहराते हुए उसके काले घने लंबे बाल, जिनमें से कुछ उसके सुंदर नितंबों को छुने की कोशिश भी कर रहे थे…

अपनी माँ के इस जान मारु पिछवाड़े को देख कर शंकर का लंड बुरी तरह से ऐंठने लगा..,

सामने दिख रहे अपने पसंदीदा बिल में जाने के लिए उतबला होकेर फड़फडा रहा था…, फूलकर किसी डंडे के तरह और ज़्यादा सख़्त हो गया, उसकी नसे उभर आई.

 
अभी शंकर बेचारा अपनी माँ के इस सुंदर पिच्छवाड़े के रूप जाल से उभर भी नही पाया था, कि तभी रंगीली ने यौंही खड़े-खड़े अपनी गर्देन को बड़े अनौखे अंदाज में झटका दिया…

उसके लहराते हुए खुले बाल, पीठ पर से उड़कर किसी काली स्याह घटा की तरह उसके दाई तरफ से होकर आगे पहुँच गये.., जिससे उसकी गर्देन से नीचे तक का संपूर्ण भाग नुमाया होने लगा…

एक हाथ से अपने बालों को संभालते हुए उसने गर्देन पीछे को घूमाकर मदभरी नज़रों से अपने बेटे की तरफ देखा..!

उसके तन्तनाये मस्ती में झूम रहे लंड पर नज़र पड़ते ही उसकी चूत में चींतियाँ सी रेंगने लगी,

एक हल्की सी सिसकारी लेकर उसने अपनी रसीली चूत पर हाथ फिराया जिसके मोटे-मोटे होंठों पर कामरस पसीने की बूँदों की तरह लगा हुआ था…!

उसने बड़ी कामुक अदा से अपने कदम आगे को बढ़ा दिए.., उसके चलते ही उसके कलश भी हरकत में आ गये,

जिस पैर पर दबाब होता वो कलश एकदम गोल शेप में आकर कुछ और ज़्यादा पीछे को दिखने लगता, उसके बाद दूसरा…!

मानो उन दोनो में हम बड़े या तुम बड़े होने की कोई प्रतियोगिता चल रही हो…

धीरे-धीरे कदम बढ़ाने से उसकी दोनो कलषों के बीच की दरार भी अपनी लय में उसी अनुसार इधर से उधर होने लगती और दोनो पाटों के बीच घर्षण पैदा होने लगा…!

अपनी माँ की इस अदा ने तो शंकर के लंड की माँ ही चोद डाली, वो बुरी तरह से ऐंठने लगा, उसके लंड में दर्द होना शुरू हो गया,

शंकर किसी महान मूर्ख की तरह नंगा पुंगा अपनी कुहनी टिकाकर लेटा हुआ अपनी माँ की मादक अदाओं से बिचलित होता जा रहा था, उसकी काम इचा पल-प्रतिपल बलवती होती जा रही थी..

अपने आप पर कंट्रोल रखना उसके बस से बाहर होने लगा… बेचारे को अभीतक मूठ मारना भी नही आता था..,

लेकिन उसका मन कर रहा था की अपने लंड को पकड़ कर मरोड़ दे… बस इसी आवेश में आकर पहली बार उसने अपने लंड को हाथ लगाया और उसे ज़ोर्से मरोड़ दिया…

लंड की ऐंठन से उसके मुँह से कराह निकल पड़ी…आआहह….माआ…

रंगीली अपने बेटे की कराह सुनकर एक दम से पलट गयी…, और दौड़ते हुए उसके पास आकर बोली – क्या हुआ मेरे लाल…?

सामने से अपनी माँ के नग्न शरीर पर नज़र पड़ते ही शंकर अपने लंड का दर्द भूलकर उसके यौवन में खो गया, उसका मुँह खुला का खुला रह गया…….,

शंकर को इस अंदाज से अपने सुंदर गोरे बदन को घूरते देखकर वो मंद मंद मुस्कराते हुए मद्धम गति से एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए उसकी तरफ आने लगी…,

उसकी एकदम चिकनी संपूर्ण गोलाई लिए हुए केले के तने जैसी मांसल जांघें मानो संगेमरमर के दो स्तंभ चले आ रहे हों..

जांघों के भीच का यौनी प्रदेश, जिस पर उसके पेडू तक हल्के हल्के काले बाल, जो शायद एक हफ्ते की फसल रही होगी,

उनके बीच माल पुए जैसी फूली हुई दो फांकों के बीच एक पतली सी दरार जो इस समय दोनो तरफ के जांघों के दबाब के कारण मात्र एक बारीक लाइन सी दिखाई दे रही थी..

उसने बड़ी कामुक अदा से अपनी हिरनी जैसी चंचल कजरारी आँखों से अपने बेटे की तरफ देखा, और उसके सामने खड़ी होकर बोली – अब बता मेरे लाल, कैसी है तेरी माँ…?

तेरे सपनों में आने वाली उस युवती जैसी है या नही…?

शंकर के चेहरे पर विश्मय के भाव सॉफ-सॉफ उजागर थे, वो फ़ौरन उठ खड़ा हुआ, और अपनी माँ के हाथों को अपने हाथों में लेकर उसने उसे उपर से नीचे तक अपनी भरपूर नज़र डालकर देखा…

रंगीली थी ही बहुत सुंदर, लेकिन आज उसे बिना कपड़ों के उसने पहली बार देखा था, वो म्रिग्नयनि अपनी चंचल कजरारी आँखों को नचाते हुए बोली – ऐसे कब तक देखता रहेगा, जल्दी बता ना मुझे शर्म आ रही है…

शंकर ने अपनी माँ के चेहरे को अपनी हथेलियों में भर लिया और उसकी नशीली आँखों में देखते हुए विस्मित स्वर में बोला –

वो तू ही थी माँ, मे उस दिन जिस परच्छाई को पहचान नही पा रहा था, आज तेरे इस रति स्वरूप को देख कर मेरे मन में अब कोई शंका नही है…!

लेकिन ये क्या है माँ, तेरा ये रूप तेरे अपने बेटे को क्यों आकर्षित करता रहा..? कोई और क्यों नही..?

रंगीली ने बड़े प्यार से अपने पंजों पर उचक कर अपने बेटे के ललाट को चूमते हुए कहा –

क्योंकि तेरे जन्म से लेकर बड़े होने तक, हर वक़्त मे तेरे सामने रही, हर सुख-दुख, दर्द, खुशी की तेरी साझेदार मे ही थी, तो स्वाभाविक है, कि तेरे हर भाव में मेरी ही छवि बस गयी…,

फिर चाहे वो माँ की ममता का स्वरूप हो या एक प्रेयशी का….!

फिर उसने अपने बेटे का हाथ पकड़ा और उसे अपने एक उरोज पर रखते हुए बोली – चल छोड़ ये बातें, और करले आज अपना सपना पूरा…!

जो स्त्री सुख तूने अपने सपने में लिया था, आज तुझे वो में जागते हुए दूँगी, मसल मेरे लाल इन चुचियों को जिन्हे चुस्कर तूने कभी अपनी भूख शांत की थी…!

शंकर ने उसके दोनो मक्खन जैसे मुलायम कसे हुए उरोजो को अपनी मुट्ठी में कस लिया, और ज़ोर्से मसल दिया…!

रंगीली सिसक कर उसके बदन से लिपट गयी, फिर उसने अपने बेटे के नंगे बदन को सहलाते हुए चूमना शुरू कर दिया…!

उसके होंठों से चूमना शुरू करके वो उसे नीचे तक चूमती चली गयी.., अपने बेटे का गोरा सुर्ख कसरती बदन किसी कामदेव से कम नही लग रहा था इस समय…

शंकर का अपनी उत्तेजना को संभाल पाना दूभर हो रहा था, जहाँ-जहाँ उसकी माँ के गीले लज़्ज़त भरे होंठ पड़ते, उसका वो हिस्सा थर-थरा उठता…!

चूमते हुए रंगीली अपने पंजों पर बैठ गयी, अपने बेटे की कसी हुई पत्थर के मानिंद सख़्त जांघों को सहलाते हुए उसने उसके डंडे जैसे कड़क लंड को अपने हाथ में पकड़ा, कुछ देर तक वो उसे चाहत भरी नज़रों से निहारती

रही,

उसके साइज़ को तौलती रही, जो किसी भी सूरत में लाला के लंड से 21 नही 22 था…, एकदम सुर्ख दहक्ता हुआ…!

उत्तेजना के कारण लंड की परिधि में नसें उभर आई थी, जो इस बात की गवाही दे रही थी, कि इस समय वो कितना शख्त हो चुका है…!

उसे देखकर रंगीली की चूत में चींतियाँ सी दौड़ने लगी...,

वो उसे अपनी चूत में फील करते हुए सोचने लगी, आअहह…जब ये मेरी चूत में होगा, तब क्या हाल करेगा उसका…?

उसने उसे एक बार उसकी खाल को खींच कर उसके सुपाडे को नंगा किया, जो पूरी तरह से खुल भी नही पा रहा था,

पहले उसने उसके दहक्ते हुए लाल सेब जैसे सुपाडे पर अपनी जीभ फिराई…!

शंकर की आँखें बंद हो गयी, मज़े की पराकाष्ठा में उसके मुँह से एक जोरदार सिसकी निकल गयी…,

आआहह….म्म्माआअ….और चाट इसे माआ…तू सच में काम देवी स्वरूपा है माआ….!

अपने बेटे की हर मनोकामना पूरण करने वाली मनोकामना देवी है तू….जल्दी से कुछ कर माँ, वरना मेरा बदन सुलग उठेगा….!

 
अपने बेटे की उत्तेजना पूर्ण आहें सुनकर रंगीली की चूत बिना कुछ किए ही टपकने लगी…

एक बार उसने अपने हाथ से अपनी चूत को सहलाया और उससे टपकते हुए शहद को अपनी उंगलियों पर लेकर अपने बेटे के लंड के सुपाडे पर चुपड दिया,

और फिर शंकर की आँखों में देखते हुए उसके गरम सोते जैसे कड़क लंड को अपने होंठों में क़ैद कर लिया…!

आअहह…मानो जलते तबे पर किसी ने पानी डाल दिया हो, शंकर का लंड अपनी माँ के मुँह में जाते ही गद-गद हो उठा..,

अंदर वो अपनी जीभ को उसके दहक्ते सुपाडे पर गोल-गोल घुमा रही थी जिससे उसके लंड में ठंड पड़ गयी…, स्वतः ही उसका हाथ अपनी माँ के सिर पर चला गया...,

वो अभी तक उसके गरम सुपाडे को ही ठंडा कर रही थी, लेकिन शंकर के हाथ के दबाब से उसने उसके लंड को अपने गले तक निगल लिया…!

उसके टट्टों को एक हाथ से सहलाते हुए वो उसे चूसे जा रही थी, शंकर का बदन किसी पत्थर की प्रतिमा की तरह कठोर होकर अकड़ने लगा,

आनंद की पराकाष्ठा में वो अपने पंजों पर खड़ा होकर अपनी कमर को आगे पीछे करके अपनी माँ के मुँह को चोदने लगा…!

रंगीली, आज उसे वो सारे मज़े से अवगत करना चाहती थी, जो उसे उसके आने वाले जीवन में मिलने वाले थे,

साथ ही साथ वो उसकी सहनशक्ति को भी परखना चाहती थी, जिससे वो जिसे चाहे अपने लंड की ताक़त से अपने वश में कर सके..,

शंकर का कामोत्तेजना से बुरा हाल हो रहा था, उसे लगा मानो उसके अंदर का लावा अब फूटने ही वाला है…

अपने हाथ का दबाब उसने अपनी माँ के सिर पर बढ़ा दिया,

रंगीली को जैसे ही ये महसूस हुआ कि उसके बेटे की चरम सीमा समाप्त होने वाली है, उसने झट से उसके लंड को अपने मुँह से बाहर निकाल लिया………!

शंकर इस झटके से आश्चर्य चकित होकर अपनी माँ की तरफ देखने लगा…!

वो उसे ही निहारे जा रही थी, आँखों में अपार वासना का समंदर लिए वो कामुक नज़रों से उसे देखते हुए बोली – आज तुझे और भी बहुत कुछ करना है मेरे शेर.., चल आजा मेरा राजा बेटा…

ये कहते ही वो उसका हाथ पकड़ कर बिस्तर पर आ गई, उसके होंठों को चूम कर बोली – अब तू अपनी माँ को भी ऐसा ही मज़ा दे जैसा अभी मेने तुझे दिया है,

ये कहकर उसने उसके हाथों को अपनी चुचियों पर टिका कर उसके होंठों को फिर से चूसने लगी…

स्वतः ही शंकर के हाथ उसके वक्षों पर कस गये, जिन्हें वो कभी मुँह से चुस्कर दूध पीता था, आज हाथों से मसल-मसल कर उनका रस निचोड़ने में लगा था…!

चुचियों की मींजन से उसकी चूत में इतनी ज़ोर्से खुजली हुई कि उसने अपनी दोनों मांसल जांघों को एक के उपर दूसरी चढ़ाकर अपनी चूत को जांघों से ही मसल्ने लगी…

धीरे-धीरे रंगीली उस बिस्तर पर लेट गयी, और उसे अपने उपर लेकर अपने बदन को चूमने चाटने का इशारा किया…!

अब वो भी अपनी मा के इशारों को समझने लगा था, सो अब उसके उपर च्चटे हुए पहले उसने अपनी मा के दोनो गालों को बारी-बारी से चूमा, उसके बाद वो उसके होंठों को चूमने लगा…

रंगीली ने उसे अपनी बाहों में कस लिया, उसके कड़क निपल अपने बेटे की पत्थर जैसी कठोर छाती से पिस्ने लगे…

चूमते हुए वो अपनी माँ के गले से होते हुए उसके उरोजो पर उसने जैसे ही अपने तपते होंठ रखे, रंगीली की सिसकी निकल गयी, वो कामुकता से भरी आहह.. भरते हुए बोली….

आआहह…मेरे राजा बेटा, चूस ले इन्हें फिर से…. मसल मेरे लाल, कम्बख़्त बहुत मचलते हैं तेरे हाथों के लिए…!

वो उसकी एक चुचि को पूरे मुँह में भरके चूसने लगा, दूसरे को अपने हाथ में लेकर मसल डाला, कुछ देर बाद उसने अदला बदली कर ली,

नीचे रंगीली ने उसके लंड को अपनी मुट्ठी में कस लिया था…

इस समय उसकी चूत बुरी तरह बहे जा रही थी, उसकी फांकों के बीच से लगातार कामरस की बूँदें बिस्तेर पर टपक रही थी…!

रंगीली को अब अपने उपर कंट्रोल करना मुश्किल होता जा रहा था, उसकी चूत में मानो ज्वालामुखी भड़कने लगा था, सो उसने शंकर के सिर को नीचे की तरफ दबाया…!

इशारा पाकर वो उसकी चुचियों को छोड़कर उसके पेट को चूमते हुए जब उसे उसकी नाभि का छेद दिखाई दिया, तो शंकर ने उसमें अपनी जीभ की नोक डाल कर जैसे ही घुमाई,

रंगीली का पेट थर-थर काँपने लगा…, वो अपनी कमर को इधर से उधर हिलाने लगी…, उसको इतनी गुदगुदी हुई कि ज़बरदस्ती उसके सिर को धकेलने लगी…

शंकर ने जब उसकी तरफ मुँह उठाकर देखा, तो रंगीली ने अपने खुश्क होंठों पर जीभ फिराते हुए उसे और नीचे की तरफ जाने का इशारा किया……!

इशारा पाकर वो जैसे ही नीचे बढ़ा, अपने उदगम स्थान को देख कर वो उसमें खो सा गया, एकटक अपनी माँ की बंद जांघों के बीच स्थित अपने जन्म स्थल को वो निहारने लगा…!

उसने कभी ख्वाब में भी नही सोचा होगा, कि जिस रास्ते से वो इस दुनिया में आया था, आज उसी पर दौड़ने का उसे शौभाग्य प्राप्त हो रहा है…!

शंकर आकर अपनी माँ के पैरों में बैठ गया, और दोनो पैरों को एक साथ अपने हाथों में लेकर उसने अपने घुटनो पर उसके पैरों की एडियाँ टिकाई,

और उसके पैरों के दोनो अंगूठों को एक साथ अपने मुँह में भरकर चूसने लगा…!

 
शंकर ने ये काम अपनी माँ के प्रति श्रद्धा जताने हेतु किया, वो अपनी माँ के पैर चूमकर आगे बढ़ना चाहता था…

लेकिन रंगीली के लिए ये अनुभव घातक सिद्ध हुआ, उसके पूरे शरीर में पैरों से लेकर छोटी तक एक करेंट की लहर सी दौड़ गयी…

सस्सिईईई….आअहह…ये क्या किया मेरे लाल…, मेरा बदन सुलग उठा है, अब देर मत कर बेटा, अपनी माँ की चूत में अपना लंड डाल कर चोद डाल निगोडे…!

बना ले अपनी प्रेमिका मुझे… ये कहकर उसने खुद ही अपनी टाँगों को खोलकर उसे रास्ता दे दिया…!

शंकर उसकी बाल विहीन मक्खन जैसी चिकनी टाँगों को सहलाते हुए उपर की तरफ बढ़ा, जहाँ पैरों के खुलने से उसकी चूत की फाकें खुलकर उसके लंड को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी…

उसने अपनी माँ की चूत को एक हथेली से सहलाया, फिर उसके होंठों को खोलकर जैसे ही उसके अंदुरूनी गुलाबी रंग के गुलकंद जैसे भाग को देखा,

उससे सबर नही हुआ और जांघों के नीचे हाथ डालकर उसकी चूत को अपने मुँह से लगाकर चाट लिया……

आहह…सस्सिईइ…शन्करा…मेरे लाल, चूस ले अपनी माँ की चूत… चाट इसे, बहुत सताती है निगोडी मुझे.., शांत कर्दे बेटा इसकी गर्मी…!

शंकर उसके फूले हुए होंठों को उपर से ही चाट रहा था, रंगीली अपनी चुचियों को अपने ही हाथों में लेकर उन्हें मसल्ते हुए बोली…

इसकी दरार को खोलकर अंदर अपनी जीभ से चाट निगोडे.., असली रस का खजाना तो इसके अंदर है…!

अपनी माँ की वासना से ओत-प्रोत आवाज़ मे लिपटे हुए शब्द सुनकर उसने अपने हाथों के अंगूठे उसकी यौनी के होंठों पर टिकाए और उन्हें विपरीत दिशा में फैला कर खोला…!

आअहह…क्या गुलाबी चूत थी उसकी माँ की, उसने फ़ौरन अपनी जीभ उसके गुलकंद के पिटारे में डाल कर उसे नीचे से उपर तक चाट लिया…!

अपने बेटे की खुरदूरी जीभ का घर्षण अपनी कोमल चूत की अन्द्रुनि दीवारों पर पाकर रंगीली बुरी तरह सिसक पड़ी…!

सस्स्सिईईईईईईईई………आआहह……..मीरररीई…लाअलल्ल्ल….घुसा दे अपनी जीब अंदर तक…उउउफफफ्फ़…. आअहह…थोड़ा उपर चूस…, देख एक चोंच जैसी होगी…

शंकर मुँह चूत से लगाए हुए ही, उसने अपनी माँ की तरफ देखा.., और आँख के इशारे से बताया कि हां दिखा..,

रंगीली – आअहह…बस उसे अपने दाँतों में दबा के चूस ले, बहुत रस निकलेगा उससे....,

शंकर ने ऐसा ही किया, उसके भज्नासे को दाँतों में दबाते ही रंगीली की कमर उपर उठने लगी.., आहह…सस्सिईई… नीचे छेद में अपनी उंगली डाल दे…

हाईए…हहानन्न…रामम…मार्रीि…उउउहह…गायईयीईई…………,

ये कहते हुए उसने अपनी कमर हवा में लहरा दी, उसकी पीठ धनुष के आकर में मुड़ती चली गयी, अपना सिर बिस्तर पर टिकाए वो बुरी तरह से झड़ने लगी…

शंकर अपनी माँ की चूत का खट्टा-मीठा जूस पीता रहा.., जब वो पूरी तरह से झड गयी, तो ऑटोमॅटिकली उसकी पीठ बिस्तर पे लॅंड हो गयी,

अब वो अपनी आँखें बंद किए पूरी तरह शांत पड़ी थी, शंकर अपने होंठों पर जीभ फिरा कर कामरस को चाटने के बाद माँ के अगले आदेश का इंतेज़ार करने लगा…!

कुछ देर तक वो अपनी माँ के खूबसूरत बदन को निहारता रहा, जब कुछ देर तक उसके शरीर में कोई हलचल नही हुई तो वो मन ही मन सोचने लगा, कहीं माँ उसे चूतिया बनाकर सो तो नही गयी…!

ये सोचकर वो उसके उपर झुकता हुआ उसके होंठों पर जा पहुँचा और अपने भीगे होंठों को रंगीली के होंठों पर रख दिया…!

उसने झट से अपनी आँखें खोल दी, और अपने बेटे को बुरी तरह अपने बदन के साथ कस लिया, उसके चुंबन का जबाब देकर बोली – कैसा लगा अपनी माँ का रस..?,

ये कहकर वो खुद ही शरमा गयी…

बहुत टेस्टी था माँ, पर अब मे क्या करूँ, ये मेरा लॉडा मुझे चैन से बैठने नही दे रहा,

अपने बेटे की मासूमियत से भरी बात सुनकर रंगीली मुस्करा उठी, और उसके मूसल जैसे लंड को अपनी मुट्ठी में लेकर अपनी गीली चूत की फांकों पर घिसते हुए बोली –

तो डाल ना इसे अपनी माँ की चूत में, कोई ताला तो नही लगा दिया ना मेने, ये कहकर उसने अपनी दोनो टाँगें उपर करके अपने पैर उसकी कमर के दोनो तरफ रख दिए..

फिर उसके लंड को अपने हाथ से पकड़कर उसके गरमा-गरम सुपाडे को दो-चार बार अपनी गीली चूत के उपर घुमाया, और फिर ठीक चूत के छेद पर उसे भिड़ाकर बोली…

देख बेटा अब मेने तो अपना काम कर दिया है, तेरे लंड को उसका रास्ता दिखा दिया, अब आगे की मंज़िल तो तुझे ही तय करनी है…

अब धीरे से धक्का लगा दे, शाबास… धीरे से मेरे लाल, ज़ोर्से नही, तेरे जितना मोटा लंड अभी तक नही लिया मेने अपनी चूत में.. ठीक है..

शंकर ने हां में गर्दन हिलाकर अपनी कमर में हल्की सी जुम्बिश दी, जिससे उसके लंड का सुपाडा उसकी माँ की चूत में अच्छे से सेट हो गया…,

लंड के सुपाडे को गीली गरम चूत में जाते ही शंकर की मज़े में आँखें बंद हो गयी, और वो उसी अवस्था में लंड डाले अपनी माँ के गले से चिपक गया…..!

लंड का सुपाडा अंदर जाते ही रंगीली की चूत की फाँकें बुरी तरह फैल गयी, मोटा टमाटर जैसा सुपाडा उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो उसकी चूत के मुँह को कॉर्क का ढक्कन लगा कर सील कर दिया हो…

उसकी चूत अंदर ही अंदर कुलबुलाने लगी…, उसकी फाँकें बुरी तरह से लंड के टोपे को जकड़े हुए थी,

लेकिन बहुत देर तक शंकर को यौंही पड़ा देख कर वो सिसकते हुए बोली –

अब यूँही पड़ा रहेगा निगोडे या कुछ करेगा भी …, आअहह…बेटा..अब और मत सता अपनी माँ को, डाल भी दे अपना मूसल जैसा लंड अपनी माँ की चूत के अंदर…,

ये कहकर उसने खुद ही अपने पैरों की केँची उसकी गान्ड पर डालकर उसे अपनी तरफ खींचा.., उसका सुपाडा माँ की सुरंग में समाया हुआ ही था…!

उसकी कमर को अपने पैरों में कसते हुए बोली - आअहह….सस्सिईइ…अब कस कर धक्का लगा दे मेरे राजा बेटा..…और बन जा मादरचोद…!

अपनी माँ की तड़प देख कर, उसकी कामुकता से भरी बातें सुनते ही, अनादि शंकर ने एक ताक़त से भरपूर धक्का अपनी कमर में लगा दिया…!

आआईयईईईईईईईईईईईई….एक साथ दोनो की ही चीखें निकल पड़ी, कड़क डंडे जैसा लंड रंगीली की चूत की दीवारों को चीरता हुआ उसकी बच्चेदानी में जा घुसा…!

अब जाके रंगीली को पता चला कि उसके बेटे के लंड में क्या ख़ासियत है…, दो बच्चे पैदा करने के बाद भी उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े…,

बिस्तर की चादर को मुत्ठियों में जकड़कर दर्द से बिल-बिला उठी वो…!

 
उधर अपनी पहली चुदाई कर रहे शंकर ने ताक़त लगाकर लंड पूरा अंदर डाल तो दिया, लेकिन उसके सुपाडे की सील जो अभी तक लंड से चिपकी हुई थी वो टाइट चूत की दीवारों की रगड़ से खुल गयी…

दर्द की एक तेज लहर उसके पूरे बदन में दौड़ गयी, और उसके मुँह से चीख निकल गयी…! वो दोनो बहुत देर तक एक दूसरे से यौंही चिपके पड़े रहे…!

हाईए रे शंकर.. बहुत बड़ा है रे तेरा.. उउउफफफ्फ़….मेरी तो दम ही निकाल दिया रे तूने बेटा… अपने दर्द पर काबू करते हुए रंगीली उसके गाल से अपना गाल घिसते हुए बोली – पर बेटा तू क्यों चीखा..?

पता नही माँ, मेरी भी सू-सू में बहुत तेज दर्द हुआ, मानो किसी ने उसे ब्लेड से काट दिया हो..!

वो समझ गयी, कि उसके लंड का कुँवारापन दूर हुआ है, वो मुस्काराकार उसे चूमते हुए बोली –

मुबारक हो मेरे लाल, आज तू मर्द बन गया, वो भी अपनी माँ की चूत फाड़कर..

अब दर्द तो नही हो रहा ना..? शंकर ने ना में अपनी गर्दन हिला दी..,

रंगीली – तो अब धीरे धीरे बाहर करके फिर से अंदर डाल, लेकिन आराम से हां.., वरना तेरी माँ का मूत निकल जाएगा, ये कहकर वो खुद ही शरमा गयी और अपने बेटे की चौड़ी छाती में अपना मुँह छिपा कर हँसने लगी..!

शंकर अपनी माँ के उपर से उठकर अपने घुटनों पर बैठ गया, और उसने धीरे-धीरे अपना लंड बाहर निकाला, उसका लंड खून से लाल हो गया था, जो उसी के लंड की खाल टूटने से निकला था…!

उसने डरते हुए कहा – माँ ये खून कैसा…?

रंगीली ने अपना सिर उठाकर उसके लंड की तरफ देखा और बोली – कुछ नही रे, ये तेरे लंड की सील टूट गयी है, अब नही कुछ होगा, अंदर डाल अब आराम से…!

माँ की बात मानकर उसने धीरे-धीरे अपना मूसल उसकी सुरंग में डाल दिया…!

धीरे-धीरे कसे हुए लंड के अंदर चलने से चूत की दीवारें एकदम कसी हुई थी जिसके मज़े में रंगीली की सिसकी निकल पड़ी, आअहह….सस्स्सिईइ….

हां..शाबाश ऐसे ही, अब धीरे-धीरे..फिर से बाहर निकालकर डाल..…!

आअहह…सस्सिईई…उउफ़फ्फ़…कितना कसा हुआ जा रहा है…ऐसे ही अंदर बाहर कर..उउउंम्म…मैयाअ…बहुत मज़ा आ रहा है…

दो-चार बार अंदर बाहर करने के बाद ही शंकर समझ गया, अब कुछ..कुछ उसे भी मज़ा आने लगा था सो अब वो खुद से ही उसे अंदर बाहर करने लगा…

रंगीली की चूत रस छोड़ने लगी, वो सिसकते हुए बोली – सस्स्सिईइ…आअहह…अब थोड़ा जल्दी-जल्दी कर मेरे लाल…

उसे भी अब मज़ा आने लगा था, सो खुद ही उसकी स्पीड बढ़ने लगी.. दोनो को अब दीन दुनिया से कोई वास्ता नही था…!

रंगीली अपनी गान्ड उच्छाल उच्छाल कर अपने बेटे को अपनी बातों से उत्साहित करते हुए और तेज चोदने के लिए बोलती हुई चुदाई का आनद लूटने लगी…!

शंकर का पिस्टन अपनी माँ के सिलिंडर में बुरी तरह से अंदर बाहर हो रहा था, साथ ही सिलिंडर से ग्रीस की फुआर भी फूटने लगी थी जिससे उसका पिस्टन पूरी तरह चिकना होकर आसानी से अंदर बाहर हो रहा था…!

शंकर के धक्कों की मार रंगीली ज़्यादा देर तक नही झेल पाई, और उसकी पिस्टन ने दम तोड़ते हुए, ढेर सारा आयिल पिस्टन के उपर छोड़ दिया, वो अपने बेटे के लंड से चिपक कर बुरी तरह से झड़ने लगी…!

शंकर को इस बात का कोई भान नही था, हां उसके लौडे को ज़रूर कुछ ज़्यादा गीलेपन का एहसास हुआ जिससे उसके मज़े में और इज़ाफा हो गया…

उसके धक्के बदस्तूर जारी थे, फुच्च..फुच्च…की आवाज़ के साथ चूत का सारा पानी बाहर निकल गया और अब वो सूखने लगी…

रंगीली की चूत में ग्रीसिंग कम हो गयी, और उसमें जलन सी होने लगी…

वो कराह कर बोली – थोड़ा रुक जा बेटा, अब तुझे दूसरे तरीके से मज़ा लेना सिखाती हूँ.., अपना लंड बाहर निकाल…

ना चाहते हुए भी बेचारे को रुकना पड़ा और अपना लंड बाहर खींच लिया…, जबकि उस पर तो इस समय जैसे चुदाई का भूत सवार हो चुका था…!

अब रंगीली, अपने घुटने टेक कर बिस्तर पर घोड़ी बन गयी, माँ की पीछे को निकली हुई मक्खन जैसी मुलायम चिकनी गान्ड के पाटों को देख कर शंकर ने अपना मुँह दोनो पाटों के बीच में डाल दिया…

आअहह…बेटे.. चाट .. ऐसे ही चाट अपनी माँ की गान्ड को…सस्सिईइ… देख वो एक छोटा सा छेद दिख रहा है ना,

उसको अपनी जीभ से कुरेद मेरे रजाअ..…हान्ं…ऐसे ही शाबास मेरे शेर… अब थोड़ा मेरी चूत को भी चाट के गीला करले …हहूऊंम्म…आअहह…सस्सिईईई….. अब डाल दे अपना लंड इसमें…

शंकर ने अपना एक घुटना बिस्तर पर टिकाया और अपना लोहे की रोड बन चुके लंड को अपनी माँ की गरम चूत में पीछे से डाल दिया…,

रंगीली ऊंटनी की तरह मुँह उपर करके अपनी चुचियों को मसल्ने लगी…,

लेकिन वो शंकर के ताक़तवर धक्कों को झेल ना सकी, और औंधे मुँह बिस्तर पर गिर पड़ी,

शंकर अपने मज़े में ये भी भूल गया कि उसके लंड के नीचे कॉन है, उसने उसके सिर को तकिये पर दबा कर दे दनादन उसकी उभरी हुई गान्ड देख कर चूत में धक्के लगाता रहा…

 
20-25 मिनिट तक चोदने के बाद शंकर को लगा, कि उसका वीर्य अब निकलने वाला है, सो हुंकार मारते हुए बोला – हहुउऊंम्म.. माआ..आहहा….मेरा निकल रहा है… क्या करूँ…?

पेलता रह बेटा.. निकलने दे…भर्दे अपनी माँ की चूत अपने बीज़ से… बनले अपनी माँ को अपनी रखैल…चोद बेटा…आअहह.. मे फिर से गायईयीई….रीए….

दो चार धक्कों के बाद दोनो ही पूरी शिद्दत के साथ झड़ने लगे.. शंकर लास्ट जोरदार धक्का लगा कर माँ की गान्ड से चिपक गया…!

रंगीली उसका भारी वजन झेल नही पाई और वो औंधे मुँह बिस्तर पर गिर पड़ी, शंकर उसकी पीठ पर पसर कर अपनी साँसें इकट्ठी करने लगा…!

10 मिनिट बाद दोनो अगल बगल में लेटे एक दूसरे को किस कर रहे थे, शंकर का लंड अभी भी खड़ा ही था, जो रंगीली की जांघों के बीच अठखेलिया कर रहा था..

रंगीली उसकी हलचल देख कर मुस्करा उठी, और मन ही मन अपने बेटे की मर्दानगी पर गद-गद हो रही थी, वो ये देख कर बड़ी खुश थी कि वो जैसा चाहती थी, उसका बेटा वैसा ही निकला…!

रंगीली अपने बेटे के माथे को चूमकर बोली – कैसा लगा बेटा अपनी माँ को चोदकर..? सपने में ज़्यादा मज़ा आया था, या अभी..?

वो अपनी माँ की गान्ड को अपने हाथ से भींचते हुए उसे अपनी तरफ खींच कर बोला – थॅंक यू माँ, मेरी अच्छी माँ, तूने आज मुझे इस सुख से रूबरू कराकर मुझे धन्य कर दिया…!

सपना सपना ही होता है, जिसका हक़ीकत से कोई मेल नही..! आज मे कसम लेता हूँ माँ, तेरी खुशी के लिए तेरा ये बेटा अपनी जान तक दे देगा…!

रंगीली ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए, बहुत देर तक दोनो एक दूसरे के होंठों को चूस्ते रहे…!

फिर वो उसके सोते जैसे लंड को मसल कर बोली – आआहह…बेटा मुझे तेरी जान ही तो प्यारी है, मे जो भी कर रही हूँ, उसी के लिए तो कर रही हूँ..!

तू बस अपनी माँ की बात मानता जा, और देखता जा अपनी माँ का कमाल..., फिर वो उसके लंड को आगे पीछे करते हुए बोली – और चोदना है अपनी माँ को..?

वो उसकी गोल-गोल चुचियों को सहलाते हुए बोला – हां माँ, एक बार और करने दे ना..!

रंगीली उसके लंड को अपनी गीली चूत की फांकों पर रगड़ते हुए बोली – क्या करने दूँ, खुलकर बोल ना…!

शंकर – वो अभी जैसा किया था, ववो.. चुदाई, करने दे ना…!

रंगीली ने कामुकता से मुस्कराते हुए उसे चित्त लिटा दिया,

उसके कड़क लंड को मुँह में लेकर कुछ देर चुस्कर अपनी लार से अच्छी तरह गीला करने लगी..

फिर खुद उसके उपर आकर उसके दोनो तरफ घुटने मोड़ कर लंड को अपने हाथ में पकड़ा और अपनी चूत के छेद पर रख कर खुद उसके खूँटे जैसे लंड पर बैठती चली गयी…..,

इस बार भी पूरा लंड एक साथ लेने में उसे नानी याद आ गई थी, आँखें बंद किए वो कुछ देर उसके सुपाडे को अपनी सुरंग के अंतिम सिरे पर महसूस करती रही,

बिना कुछ किए ही उसकी चूत अपना कामरस छोड़ने लगी, फिर धीरे-धीरे रंगीली ने लंड को सुपाडे तक बाहर निकाला, और अपनी आँखें बंद करके फिर से उसपर बैठती चली गयी….!

दूसरे दिन शंकर सलौनी को अपनी साइकल पर आगे बिठाकर स्कूल जा रहा था,

उसके अंगों में भी भराब आने लगा था, उसके कच्चे नीबू अब अमरूद बन चुके थे, गोल-गोल गान्ड भी 30 की हो गयी थी, जो 24 की कमर के नीचे बॉल जैसी थोड़ी पीछे को निकली हुई दिखने लगी थी…!

सहेलिओं के बीच छेड़-चाड और पुरुष आकर्षण की बातें वो सुनती ही रहती थी, लेकिन उसके मन-मस्तिष्क में अपने भाई के अलावा और किसी की एंट्री नही हो पाई थी…!

शंकर अपनी धुन में मगन साइकल भगाए जा रहा था…, वो साइकल चला ज़रूर रहा था, लेकिन उसका ध्यान तो बीती रात माँ के साथ बिताए हुए पलों में ही अटका हुआ था…

अपनी माँ की निवस्त्र छवि उसकी आँखों में घूम रही थी, उसकी गोल-गोल मस्त सुडौल चुचियाँ, जिन्हें वो कैसे मज़े लेकर चूस रहा था…

हल्के बालों वाली चिकनी फूली हुई मालपूए जैसी चूत उसके मन-मश्तिश्क में समाई हुई थी…

अपने ही ख़यालों में गुम शंकर को पता ही नही चला कि उसका लंड कब अकड़ कर सोटे में बदल गया है..

वो तो अच्छा था कि अब वो पॅंट के नीचे अंडरवेर पहनने लगा था, वरना ना जाने आगे बैठी सलौनी का क्या हाल होता…?

फिर भी जब वो पैडल पर ज़ोर देता, तब वो उसके बगल से टच हो जा रहा था, सलौनी को अपनी कमर में कुछ अटकता सा लगा, एक दो बार उसने उसे समझने की कोशिश की…!

 
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