रश्मि एक सेक्स मशीन पार्ट -48
गतान्क से आगे...
“ देवी आपने अपने पति देव से पर्मिशन लिया था?” सेवक राम जी ने मेरी रिक्वेस्ट पर मुस्कुराते हुए पूछा. उन्हों ने मेरे होंठो पर अपने होंठ रखते हुए कहा,
“ एक बार और सोच लो जब भी कहूँगा जिससे कहूँगा तुम्हे चुदवाना होगा. “
ऐसे समय मे मैं क्या किसी की भी सोचने समझने की छमता ख़त्म हो जाती है. मेरा जिस्म सेक्स की आग मे जल रहा था. निपल्स एग्ज़ाइट्मेंट मे खड़े खड़े दुखने लगे थे. योनि के दोनो होंठ उत्तेजना मे खुल बंद हो रहे थे. योनि के अंदर सिहरन खुजली का रूप ले ली थी. ऐसे समय मे तो बस एक ही चीज़ मुझे याद थी वो था उनका किसी खंबे की तरह खड़ा लंड. मेरी योनि तो बस एक चीज़ ही माँग रही थी…. जम कर ठुकाई, जिससे जिस्म की आग बुझ सके, चूत की खुजली मिटे. मेरा पति मेरा ग्यान मेरा परिवार सब धुंधले हो चुके थे दिमाग़ से. सेक्स मे तड़प्ते किसी जानवर जैसी हालत थी मेरी.
मैने कहा, “हाआँ हाआँ….आप जो कहोगे मैं करूँगी……जिससे कहोगे मैं कार्ओौनगी प्लीईससस्स मुझ पर रहम करो…..प्लीईसए इस अवस्था मे मुझे मत छ्चोड़ो. आअहह…… रतनाआआ……..ईनसीए कहूऊऊ मेरी चुउत पर चींतियाअँ चल रहिी हैं. ” मैं अपनी टाँगे मोड़ कर बार बार अपनी कमर को उनके लिंग को छ्छूने के लिए उचकाने लगी. अपने हाथों से उनके लिंग को पकड़ कर अपनी योनि मे डालने को छॅट्पाटा रही थी. मैने अपनी टाँगों को अपने सीने से चिपका लिया जिससे मेरी योनि उनके सामने हो गयी. मैने अपने ही हाथों से अपनी योनि की फांकों को फैला कर उनकी आँखो मे झाँका. हम दोनो की नज़रें एक दूसरे से चिपक गयी थी. मैने आँखो ही आँखो मे उनसे निवेदन किया कि अब और ना तरसाएँ.
सेवकराम ने मेरी योनि पर अपना लिंग रखा. रत्ना ने एक हाथ से उनके लिंग को थामा और दूसरे हाथ से मेरी चूत को खोल कर उनके लिंग को मेरी योनि के मुँह पर रखा. सेवकराम ने एक मजबूत धक्के मे अपना पूरा लिंग जड़ तक मेरी योनि मे पेल दिया. मेरी योनि रस से चुपड़ी हुई थी. उनका लिंग भी मेरे रस से गीला था लेकिन फिर भी उनके लिंग का साइज़ ऐसा था कि मेरे मुँह से “ आआआआआआआहह……….माआआ……..मर गइईईईईई” जैसी आवाज़े निकल पड़ी.
मैं छॅट्पाटा उठी. उनके अंडकोष मेरी योनि के नीचे मेरे जिस्म से चिपके हुए थे. फिर उन्हों ने एक झटके मे पूरा लिंग बाहर निकाला. ऐसा लगा मानो मेरे पेट से सब कुच्छ निकल कर बाहर आ गया और मेरी योनि एक दम खाली हो गयी हो. फिर उन्हों ने दोबारा अपने लिंग को एक झटके मे अंदर घुसा दिया. इस बार उन्हे अपने लिंग को योनि के मुँह पर सेट करने की ज़रूरत नही पड़ी. दोनो के बीच सामंजस्या ऐसा हो चुक्का था की धक्का मारते ही लिंग अपनी जगह ढूँढ कर अंदर चला गया.
मैने अपनी टाँगों को अपने सीने से चिपका कर अपनी कमर को उपर की ओर उठा रखा था इसलिए अपनी योनि मे प्रवेश करता हुआ उनका मोटा लिंग मुझे साफ साफ दिखा रा था. मैने जी भर कर अपनी ठुकाई देखने के बाद अपनी टाँगे नीचे कर के फैला दी.
उन्होने मेरे नग्न जिस्म पर लेट कर मेरे होंठों पर वापस अपना होंठ रख दिए. मैने अपने हाथों से उनके सिर को थाम कर उनके मुँह मे अपनी जीभ डाल दी और उनकी जीभ से अठखेलिया करने लगी. उनकी जीभ भी मेरी जीभ को सहला रही थी. उस वक़्त उनके हाथ मेरे दोनो स्तनो को बुरी तरह मसल रहे थे.
उसके बाद लगातार ज़ोर ज़ोर से धक्के मारने लगे. हर धक्के मे पूरे लिंग को टोपे समेत बाहर निकालकर वापस जड़ तक पेल देते थे. मैं उनके हर धक्के से उच्छल उच्छल जा रही थी. काफ़ी देर तक इसी तरह करने के बाद मुझे पीछे घुमाया और मेरी कमर को खींच कर उपर कर लिया. मेरा सिर तकिये मे धंसा हुआ था. वो पीछे से मेरी योनि मे धक्के मारने लगे.
एक…..दो…..तीन….. इस चुदाई के दौरान मैं तीन बार स्खलित हो चुकी थी. मगर उनकी रफ़्तार मे अभी तक कोई कमी नही आई थी. मेरी टाँगे थकान से काँपने लगी. मेरा मुँह खुल गया था और आँखे भी थकान से बंद हो गयी थी. घंटे भर तक बिना रुके, बिना रफ़्तार मे कोई कमी करे इसी तरह मुझे चोद्ते रहे.
“आआहह…गुउुुरुउुजिइीइ बुसस्स्स……बुसस्स्स..गुरुजिइइई बुसस्स…..अब मुझ पर्र्र्ररर रहम करूऊऊ”
लेकिन सेवकराम ने मेरी मिन्नतों पर कोई ध्यान नही दिया. करीब घंटे भर बाद उन्हों ने अपने लिंग को मेरी योनि से निकाला. रत्ना ने मुझे खींच कर सीधा किया और मेरे चेहरे को उनके लिंग के सामने ले आई. फिर उन्हों ने ढेर सारा वीर्य मेरे चेहरे पर मेरे स्तनो पर और मेरे बालों मे भर दिया. कुच्छ वीर्य मेरे मुँह मे भर गया था. मेरी नाक पर भी वीर्य लगा होने की वजह से मैं साँस नही ले पा रही थी. मैने अपनी हथेली से उनके वीर्य को सॉफ कर उसे अपनी जीभ से चाट लिया.
मैं अपने हाथों से पेट के नीचे अपनी दुखती कोख को दबाते हुए वहीं बिस्तर पर लुढ़क गयी. करीब पंद्रह मिनूट तक मैं इसी तारह बिना हीले दुले पड़ी रही. मानो अब शरीर मे कोई जान नही बची हो. पंद्रह मिनूट बाद जब आँखें खोली तो पाया कि सेवक राम जी जा चुके हैं. रत्ना मेरे सिरहाने पर बैठ कर मेरे बालों को सहला रही है.
“ कैसा लगा? मज़ा आया?” रत्ना ने पूछा.
“हाआँ डीडीिई……..बहुत मज़ा आया.” मैं अब तक उत्तेजना मे अपनी कमर उच्छाल रही थी. मगर अब अपनी नग्नता का अहसास और किसी गैर मर्द के साथ सहवास याद आते ही मैने शर्म से अपना चेहरा अपनी हथेलियों मे छिपा लिया.
“ कभी किसी और के साथ ऐसी खुशी ऐसी शांति ऐसा पूर्णता का अहसास हुया है क्या?”
“ नही…. रत्ना. आज तक मैने इतना सुख कभी हासिल नही किया था. दीदी मेरी सेक्स की भूख इन्होंने ऐसी मिताई कि मैं दीवानी हो गयी हूँ इनकी.”
“ मैं कहती थी ना कि एक बार इनके संपर्क मे आओगी तो जिंदगी भर की गुलाम बन जाओगी इनकी.” रत्ना ने मुस्कुरा कर कहा.
मैने उनकी सहायता से किसी तरह अपने कपड़े पहने और वहाँ से उठकर उनके बदन का सहारा लेकर लड़खड़ाते कदमो से घर आई.
आज मुझे इतना मज़ा आया था जितना मैने कभी महसूस नही किया था. मेरे बदन रोम रोम खुशी से काँप रहा था. मेरे बदन पर जगह जगह से मीठी मीठी कसक उठ रही थी. रात को पता नही कब तक मैं जागती रही अपने इस संभोग के बारे मे सोच सोच कर करवटें बदलती रही. जब तक ना मैने अपनी उत्तेजना को अपने ही हाथों से निकाल नही दिया मुझे नींद नही आई.
दो दिन तक मेरा बदन दुख़्ता रहा लेकिन मैं इस दर्द से बहुत खुश थी. ऐसी चुदाई के लिए अब हमेशा मन तड़पने लगा. अब तो शाम को मैं खुद हमारे बीच की डॉली को कूद कर सेवकराम जी के पास चली जाती थी. देव जब घर पर होता तो हम बहुत सांय्याम बरतते थे. जिसे उसके मन मे शक़ के बीज नही पैदा हों.
देव बहुत खुले विचारों का था. लेकिन मैं डर की वजह से उनको बता नही पाई. मैने सेवकराम जी से उनकी मुलाकात करवाई. सेवकराम जी ने उनके साथ मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया. फिर धीरे धीरे उन्हे भी आश्रम बुलाया. उनकी वहाँ की औरतों ने इतनी आवभगत की कि वो भी उस आश्रम से बँध कर रह गये. आश्रम की शिष्याओं का जादू ही ऐसा होता है कि किसी साधु महात्मा भी उनके प्रेम पाश मे फँसे बिना नही रह सकता.
रत्ना मुझे बाद मे चटखारे ले लेकर सुनाती थी. किस तरह उसने भी देव के साथ सेक्स किया. हम दोनो मे एक मूक समर्थन सा बन गया. दोनो साथ साथ आश्रम मे जाते फिर अंदर दोनो अलग अलग हो जाते. दोनो को पता ही नही रहता कि दूसरा कहा और किससे अपनी जिस्मानी भूख मिटा रहा है. धीरे धीरे हम अपने आपस के सेक्स के गेम के दौरान आश्रम मे घटी घटनाओ को फॅंटिज़ करने लगे. जब हम दोनो साथ बिस्तर पर होते तो एक दूसरे के साथ हुए सेक्स के गेम का वर्णन सुनते हुए सेक्स का आनंद लेते थे.
मैं तो सेवकरम की गुलाम बन ही चुकी थी. बिना उनके साथ संभोग किए मेरे बदन की आग नही बुझ पाती थी. उन्हों ने मुझे काम्सुत्र मे एक्सपर्ट बना दिया था. उन्हों ने मुझे ऐसे ऐसे आसान सिखाए जिनकी मैने कभी कल्पना भी नही की थी. लेकिन एक बात मुझे हमेशा कचोटती थी. उन्हों ने कभी मेरी योनि के अंदर डिसचार्ज नही किया था. वो हमेशा मेरे चेहरे पर मेरे मुँह मे मेरे स्तनो पर यहाँ तक की कई बार मेरे गुदा मे भी डिसचार्ज किया था मगर मेरी योनि मे डिसचार्ज के अहसास से मुझे हमेशा मरहूम रखा था.
एक दिन हम तीनो लंबी चुदाई के बाद नग्न बैठे बातें कर रहे थे तो मैने सेवकराम जी से पूछा, “ एक बात बताएँ गुरुजी, आप मेरी योनि के अंदर अपना रस क्यों नही भर देते. मेरी बहुत तमन्ना है कि आप ये ढेर सारा रस मेरी योनि मे डालें जिससे मेरी योनि की प्यास बुझ जाए. मैं चाहती हूँ कि आपका रस मेरी योनि से छलक छलक कर बाहर रिसे.”
“ नही दिशा हम ऐसा नही कर सकते. जब तक स्वामी जी का रस तुम्हारी कोख को भर नही देता और वो तुम्हे दीक्षा नही देदेते उनका कोई भी शिष्य ये काम नही कर सकता. हम सबसे पहले सब महिलाओं पर उनका अधिकार है. पहले उनका प्रसाद तुम्हे ग्रहण करना पड़ेगा. तुम्हारी योनि मे डिसचार्ज करने का पहला अधिकार सिर्फ़ और सिर्फ़ उनका है. फिर हम सबका.” सेवकराम जी ने कहा
रत्ना दीदी ने बताया कि कुच्छ दिनो मे आश्रम के सबसे बड़े गुरु श्री श्री त्रिलोकनंद जी पधार रहे हैं. वो ही मुझे दीक्षा देकर आश्रम मे शामिल करेंगे. मैं ये सुनकर बहुत खुश हुई.
क्रमशः............