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राजमाता कौशल्यादेवी

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उधर महाराज कमलसिंह के बिस्तर से उठकर चन्दा ने अपने कपड़े पहने... महाराज तो मरे हुए मुर्गे की तरह पड़े हुए थे.. पिछली रात चन्दा ने अपनी चुत की मजबूत मांसपेशियों में राजा के लंड को दबोच कर ऐसा मरोड़ा था की उनके लंड में मोच आ गई थी... उसके बाद उनका लंड पिचक कर बाहर निकल गया और चन्दा को अपने भगांकुर को मसलकर झड़ना पड़ा था.. महाराज के साथ चन्दा को जरा सी भी तृप्ति का एहसास नहीं होता था पर क्या करती..!! महाराज के हुकूम की अवहेलना भी तो नहीं कर सकती थी..

बचपन से ही तगड़े कदकाठी वाली चन्दा के दोस्त सारे लड़के ही रहे थे... लड़कियों वाले खेल उसने कभी खेले ही नहीं थे... जवान होने के बाद वह इतनी शक्तिशाली और बलिष्ठ बन गई थी की ना ही उसमें लड़कियों वाली नजाकत थी और ना ही छरहरा बदन... अमूमन कोई पुरुष उसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता था... इसलिए वह काफी लंबे अरसे तक अनछुई ही रही थी.. ज्यादातर उसे हस्तहमैथुन से ही अपने आप को संतुष्ट करना पड़ता था..

आधे घंटे बाद नाश्ता करने महाराज और महारानी मेज पर बैठे थे तब दोनों के बीच साहजीक बातें हो रही थी... थोड़ी देर बाद लँगड़ाते हुए राजमाता आती दिखाई दी.. उनके चेहरे पर थकान की रेखाएं थी.. हर कदम चलने पर उन्हे दर्द होता प्रतीत हो रहा था।

"क्या हुआ माँ... आप ऐसे लँगड़ाते हुए क्यों चल रही है?" आश्चर्यसह महाराज ने पूछा

अब क्या बताती राजमाता? कल रात को शक्तिसिंह ने उनकी गांड के ऐसे तोते उड़ा दिए थे की एक कदम चलने में उन्हे भारी दर्द हो रहा था.. मन ही मन में शक्तिसिंह को कोसते हुए वह कराहकर कुर्सी पर बैठ गई।

"कल पूरा दिन हाथी पर बैठे बैठे कमर जकड़ गई थी... आदत नहीं है ना मुझे!! दो दिन मालिश करवाऊँगी तो ठीक हो जाएगा.." राजमाता ने उत्तर दिया

फिर उन्होंने महारानी की तरफ मुड़कर कहा

"दासियों ने मुझे सूचित किया की कल आप अकेले ही नदी किनारे सैर पर निकल गई थी?"

"जी वो कल अकेले बैठे बैठे ऊब सी गई थी... सोचा नदी के निर्मल जल को देखकर मन को थोड़ा सा प्रसन्न कर दूँ.."

"पर तुम्हारा ऐसे अकेले जंगल में घूमना ठीक नहीं है.. अब से तुम बिना किसी को साथ लिए कहीं नहीं जाओगी" कड़े सुर में राजमाता ने कहा

"जी नहीं जाऊँगी" आँखें झुकाकर महारानी ने उत्तर दिया

"और बेटा... आज नहीं जाओगे शिकार पर?" राजमाता ने कमलसिंह से पूछा

"नहीं माँ... मेरा भी शरीर आज दर्द कर रहा है... और गर्मी भी काफी हो रही है.. सोच रहा था की आज का दिन विश्राम ही कर लूँ" शरीर तो नहीं पर महाराज का लंड दर्द कर रहा था... पगलाई घोड़ी की तरह चन्दा ने कल उन पर ऐसी चढ़ाई कर दी थी की महाराज कुछ करने के काबिल बचे नहीं थे...

नाश्ता करने के बाद तीनों अपने तंबू की ओर लौट गए ।

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उस रात महाराज बड़ी ही बेचैनी से अपने तंबू में बैठे शराब पी रहे थे... रात का वक्त हो चला था और हवसी मन में इच्छाएं प्रकट होने लगी थी.. पर लंड अभी भी कल की चुदाई के दर्द से नहीं उभरा था... पिछली रात चन्दा ने अपनी फौलादी चुत से लंड को ऐसे निचोड़ा था की लंड को मोच सी आ गई थी... लिंग की मांसपेशियाँ दर्द कर रही थी... ऐसी बलवान जिस्म वाली स्त्री अगर लंड पर कूदेगी तो और क्या होगा!!

दर्द के बावजूद महाराज व्यग्र थे... उन्होंने चन्दा को आवाज लगाई... चंद तुरंत हाजिर हुई

"अरी चन्दा... कल तूने मेरे लंड के साथ क्या कर दिया?? सुबह से दर्द कर रहा है" महाराज के चेहरे पर दर्द की रेखाएं उभर आई

"जी मैंने तो वही किया जो हम पिछली दो रातों से करते आ रहे है.." भोली बनने का अभिनय करते हुए चन्दा ने कहा... जबकी उसे भलीभाँति मालूम था उसकी चुत की गिरफ्त में महाराज के लंड का यह हाल हुआ है।

महाराज ने चन्दा के सामने अपनी धोती खोल दी... अंदर सा उनका मरा हुआ लंड प्रकट हुआ... सूखी हुई भिंडी जैसा लंड देखकर चंद को मन में ही हंसी छूट गई।

"देख इसका हाल... अब तू है कर कुछ इलाज... "

"महाराज में कोई वैद्य तो हूँ नही जो इसका इलाज कर सकूँ... "

"जानता हूँ... पर इसे मुंह में लेकर चूस तो सकती है ना... "

सुनकर चन्दा का मुंह उतर गया... उसे लंड चूसना बिल्कुल पसंद नहीं था... घिन आती थी उसे... और कोई फौलादी तगड़ा लंड होता तो बात अलग थी.. यहाँ तो महाराज का मरे हुए चूहे जैसा लंड चूसना था...

"सोच क्या रही है!!! चल बैठ नीचे और चूसना शुरू कर दे... " कुर्सी पर बैठे महाराज ने अपनी टाँगे खोली

बेमन से झिझकते हुए चन्दा अपने घुटनों के बल, महाराज की कुर्सी के सामने बैठ गई.. महाराज के मुरझाए लंड को हाथ में लेकर थोड़ी देर खेलती रही.. लंड की चमड़ी को हल्का सा नीचे उतारते ही छोटे से कंचे जैसा महाराज का सुपाड़ा डरते हुए बाहर निकला... अब इस विचित्र जीव को कैसे मुंह में ले यही सोच रही थी चन्दा...

"क्या सोच रही है, मुंह में लेकर चूसना शुरू कर... "आदेशात्मक आवाज में महाराज ने कहा

अब चन्दा के पास चूसने के अलावा और कोई चारा न था... उसने मुंह बिगाड़कर महाराज के लंड के मुख को अपने होंठों से लगाए... उसके मोटे होंठों के बीच महाराज का मुरझाया लंड बीड़ी जैसा लग रहा था... वह उनके सुपाड़े को चूसना शुरू ही कर रही थी तब महाराज ने उसके सिर को अपने लंड पर दबा दिया... उनका पूरा लंड चन्दा के मुंह में चला गया...

महाराज की इस हरकत से चन्दा को बड़ा गुस्सा आया... फिर भी वह अपने मुंह को आगे पीछे करते हुए चूसती गई... करीब पाँच मिनट तक चूसने के बाद भी महाराज के लंड में जरा सी भी सख्ती नहीं आई...

"रुक जा... और अपनी छातियाँ खोल दे... " महाराज ने उसका सिर पकड़कर रोकते हुए कहा

चन्दा यंत्रवत खड़ी हो गई और अपना कवच निकालने लगी... भीतर पहना हुआ वस्त्र जो पसीने से गीला हो चला था... उसे भी उसने उतार दिया... भरे हुए मोटे साँवले बैंगन जैसे उसके दोनों स्तन यहाँ वहाँ झूलने लगे... उसकी दोनों निप्पल दबी हुई थी क्योंकी इस गतिवधि में उसे रत्तीभर भी उत्तेजना नसीब नही हुई थी।

महाराज उसके दोनों उरोजों को हथेलियों में भरकर मसलने लगे.. चन्दा को अपनी ओर खींचकर उसके स्तनों को चाटने और चूमने लगे... अपने एक हाथ को उन्होंने चन्दा की घाघरी के अंदर डाल दिया... उसकी लंगोट को सरकाकर चुत में उंगली करने का प्रयास करने लगे... चन्दा का पूरा योनिमार्ग सूखा और ऋक्ष था... फिर भी महाराज अपनी उंगली अंदर घुसेड़ने का प्रयास कर रहे थे जिससे चन्दा को हल्की सी पीड़ा का एहसास हो रहा था... वह चाहती थी की महाराज जल्द से जल्द निपट जाएँ ताकि उसका छुटकारा हो...

चन्दा के मजबूत शरीर की निकटता प्राप्त कर महाराज का लंड हरकत में आने लगा... पूर्णतः खड़ा तो नही हुआ पर उसमें सख्ती जरूर दिखने लगी थी.. महाराज भी यह देख खुश हुए और मन में राहत भी हुई की उनके लंड में अभी भी जान बची थी...

अब उन्होंने चन्दा को खींचकर वापिस नीचे बैठा दिया और अपना लंड उसके मुंह में फिर से दे दिया... जल्दी निपटारा चाहती चन्दा ने भी तेजी से अपना मुंह ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया... पुरुषों की शरीर-रचना से परिचित चन्दा ने उनके टट्टों को पकड़कर हल्के से दबाया... और महाराज उसके मुंह में ही झड़ गए... उनके स्खलन से गिनकर तीन-चार बूंद वीर्य की निकली जिसका स्वाद मुंह में लगते ही चन्दा का स्वाद बिगड़ गया... ऐसे बेजान पानी जैसे अल्प मात्रा में निकलते वीर्य से आखिर महाराज ने महारानी को कैसे गर्भवती किया होगा, चन्दा सोचती रही...

अपने मुंह पर हाथ दबाकर वह खड़ी हो गई... और तंबू के कोने में जाकर उसने वह वीर्य थूक दिया... मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए उसने पास पड़े मेज से शराब की सुराही उठाई और उसे सीधे अपने मुंह में उंडेल दिया... तीन-चार घूंट पीकर उसे कुछ अच्छा लगा.... स्खलन के बाद महाराज गहराई आँखों से कुर्सी पर अपना सिर टिकाए सुस्त पड़े थे... चन्दा ने घृणित नजर से महाराज को देखा, अपने वस्त्र पहने और वहाँ से चली गई...

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दूसरे दिन शिकार यात्रा का खेमा जंगल से सूरजगढ़ लौट आया...

एक दिन सब ने विश्राम करने में ही व्यतीत कर दीया.. उस दिन शाम के समय राजमाता अपने कक्ष में कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रही थी तभी दासी ने आकर सूचित किया की उनसे मिलने दीवान जी आए थे। राजमाता ने तुरंत उन्हे अंदर बुलाने को कहा..

थोड़ी ही देर में, थुलथुले शरीर वाले दीवानजी अंदर पधारे... गले में मोतियों की माला और सिर पर सुनहरे रंग की पग़डी पहने दीवानजी की उम्र लगभग ५५ साल के करीब थी... राजमाता को सलाम कर वह उनके इशारे पर सामने रखी कुर्सी पर बैठ गए।

"कहिए दीवानजी, कैसे आना हुआ..?" राजमाता ने पूछा

"राजमाता जी, कल सुबह से दरबार की गतिविधियां आरंभ हो रही है... में चाहता हूँ की आप इस बार दरबार का संचालन करें... काफी सारे प्रश्न है जिनका समाधान ढूँढना है.. कर व्यवस्था में बदलाव करना है... राज्य की आय का ब्योरा भी करना है.. और सुरक्षा से लेकर भी काफी निर्णय करने है.. इस लिए आपकी मौजूदगी अनिवार्य है" दीवानजी ने बड़े ही अदब के साथ कहा

"पर ये रोजमर्रा की गतिविधियां तो महाराज को ही संभालनी चाहिए... तुम उनसे क्यों नही बात करते?"

राजमाता की बात सुनकर दीवानजी का मुंह उतर गया

"राजमाता जी, आपसे मिलने आने से पहले में उनसे ही मिलने गया था... वह प्रायः उनकी प्रवृत्तियों में काफी व्यस्त है और दरबार में पधार नही सकते.. इसलिए में यह दरख्वास्त आप के पास लेकर आया.. "

यह सुनकर राजमाता ने एक गहरी सांस ली.. अपने पुत्र को वह भलीभाँति जानती थी.. उसकी प्रवृत्तियाँ मतलब भोग-विलास और मदिरापान... ज्यादातर महत्वपूर्ण बातों को राजमाता ही संभालती आई थी.. इसलिए महाराज कमलसिंह का राज्य के कारभार में कुछ ज्यादा योगदान कभी नही रहा था... जब कमलसिंह युवा थे तब राजमाता सोचती थी की समय के साथ वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम बन जाएगा... पर वह तो किसी भी प्रकार की जवाबदेही से बचता ही रहता था... गनीमत थी की सूरजगढ़ में खेती और व्यापार काफी मात्रा में होता था इसलिए कर की आय से राज्य का खजाना कभी खाली नही रहता था... पर किसी भी राज्य के दिन-ब-दिन के प्रशासन और व्यवस्थापन के काम का मुआयना करना अति-आवश्यक होता है...

राजमाता सोच में पड़ गई... इतना समय व्यतीत होने पर... और काफी बार समझाने के बावजूद महाराज कमलसिंह अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नही ले रहे थे... और अब कुछ ही समय में महाराज का उत्तराधिकारी भी आने वाला था... ऐसी सूरत में राज्य की स्थिरता बड़ी ही महत्वपूर्ण थी... राजमाता अब फिरसे राज्य की बागडोर को संभालने का निर्णय ले चुकी थी... पर उनके अकेले से यह जिम्मेदारी निभा पाना थोड़ा कठिन था..

काफी सोच-विचार के पश्चात, राजमाता ने उत्तर दिया

"ठीक है... आप तैयारी कीजिए.. कल दरबार का संचालन हम करेंगे"

दीवानजी यह सुनकर चिंता मुक्त हो गए... सारे मंत्री गण और दीवानजी खुद राजमाता की कुशलता के बारे में आश्वस्त थे.. दीवानजी ने कुर्सी से खड़े होकर राजमाता को सलामी दी... और उनके कक्ष से चले गए...

दूसरे दिन सुबह राजमाता की अगुवाई में दरबार की कार्यविधि को शुरू किया गया... राजमाता सिंहासन पर बिराजमान थी और उनके दोनों तरफ लगे आसनों पर सारे मंत्री, दीवानजी और सेनापति बैठे हुए थे...

एक के बाद एक समस्या और मसले पेश किए गए और राजमाता ने उन सबका त्वरित निराकरण भी कर दिया.. राजमाता की इस कुशलता के सारे मंत्रीगण कायल थे.. इसी कारणवश राजसभा में महाराज से ज्यादा राजमाता का रुतबा था।

इसी अवधि के दौरान एक भटकते हुए पुरुष ने राजमाता से मिलने की मांग की। आम नागरिकों के लिए राजमाता से मिलना और अपनी शिकायतें बताना बिल्कुल भी असामान्य नहीं था। वास्तव में उन्होंने इसका स्वागत किया और इसके लिए समय भी निश्चित कर दिया। लेकिन मुलाकात के पहले मिलने का उद्देश्य बताना आवश्यक रहता था ताकि अधिकारी राजमाता को मुलाकात की तैयारी में मदद करने के लिए पहले से ही प्रासंगिक जानकारी इकट्ठा कर सकें। राजमाता सभी की बातें विस्तार से सुनती थी और वास्तव में इन बैठकों को गंभीरता से लेती थी।

हालाँकि इस पुरुष ने मुलाकात का उद्देश्य बताने से इनकार कर दिया; सिवाय यह बताने के कि वह राजमाता की मदद करने के लिए यहां आया था और उससे अकेले में बात करेगा, किसी भी निम्न अधिकारी या मंत्री से नहीं। और इसलिए, निस्संदेह, अधिकारियों ने उसे राजमाता तक पहुंचने से वंचित रखा। अपने अहंकार के अलावा ऐसा नहीं लगता था कि उनके पास देने के लिए और कुछ है। वह लंबा, गौर वर्ण का आकर्षक और रहस्यमयी व्यक्तित्व का स्वामी था। उसका लंबा पतला शरीर और लंबा ललाट, उसके ज्ञानी और तपस्वी होने की पुष्टि कर रहा था। उसने बेदाग सफेद धोती पहन रखी थी, उनके नंगे धड़ पर रंगबिरंगी पत्थरों से बनी माला लटक रही थी। उसकी सारी सांसारिक संपत्ति कपड़े के एक छोटी सी गठरी में एकत्रित थी जो उसके दूसरे कंधे से लटक रही थी।

मुलाकात का अवसर ना मिलने पर वह हड़बड़ाकर वहाँ से चला गया और महल के द्वार के सामने डेरा लगाकर बैठ गया और इंतजार करने लगा। एक तपस्वी सदैव प्रतीक्षा कर सकता है क्योंकि उसकी इच्छाएँ और जरूरतें कम होती हैं। इस पुरुष के मामले में उन आवश्यकताओं की पूर्ति वहाँ से गुजरने वाले सामान्य लोगों द्वारा की जाती थी जो ऐसे तपस्वी ज्ञानी की सलाह और आशीर्वाद का सम्मान करते थे। आते जाते लोग भोजन और दैनिक जीवन के लिए आवश्यक अन्य वस्तुएँ छोड़ जाते थे।

कई दिनों के पश्चात राजमाता को इस दिव्य पुरुष के अस्तित्व के बारे में पता चला। फिर, जिज्ञासावश उसे मिलने की अनुमति देने के लिए प्रेरित किया। बुलावा भेजने पर सैनिक उसे लेकर हाजिर हुए। वह भावहीन चेहरे के साथ राजमाता के सामने खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा। न कोई प्रणाम, न कोई अभिवादन, बस सिर्फ मूक दृष्टि!!!

आख़िरकार राजमाता ने कहा, "तुम मुझसे क्यों मिलना चाहते थे?"

"यह तय करने के लिए की क्या आप साम्राज्ञी बनने के लिए तैयार है या अभी भी केवल राजमाता ही बनी रहना चाहती है!!"

उस व्यक्ति के इस अत्यधिक अहंकार को देखकर दरबारियों में हंगामा मच गया और एक सैनिक तो उस पर हमला करने के लिए भी उठा, लेकिन राजमाता ने इशारे से उसे रोक दिया गया। इस व्यक्ति में राजमाता को रुचि जगी। शायद उसके पास अपने हास्यास्पद दावे का समर्थन करने के लिए कुछ था या शायद वह सिर्फ एक अहंकारी मूर्ख था। राजमाता ने सोचा, चलो पता लगाएं!!

"हम्म.. तो तुम्हारे आने का प्रयोजन तो पता चल गया... अब अपने बारे में भी तो कुछ बताओ"

"मेरा नाम विद्याधर है... और में विंध्य पर्वतों की तलहटी में बसे एक गाँव से आया हूँ"

"अच्छा विद्याधर, ये बताओ की यहाँ मेरे पास आना कैसे हुआ?" राजमाता को इस पुरुष में दिलचस्पी बढ़ने लगी

"में ज्ञानशीला नगर में शास्त्रों का अभ्यास कर रहा था... आए दिन कोई न कोई राजा उस नगर पर हमला कर देता और मेरे अभ्यास में बाधा पड़ती... तब मेरी रुचि इस भूगोल की राजनैतिक विषमताओ पर पड़ी.. यह प्रदेश कई राज्यों में बंटा हुआ है और सक्षम नेतृत्व के अभाव के कारण सारे राजा एक दूसरे से हमेशा लड़ते रहते है.. जरूरत है एक ऐसे सबल नेता की जो अपनी छाँव में सारे राज्यों को संभालकर एकता से जीना सीखा सके.. उन राजाओं के अहंकार और झूठी शान के खातिर सेंकड़ों सैनिकों की मृत्यु हो जाती है.. उनके परिवार अनाथ हो जाते है... आम जनता का जीवन भी व्याकुलता से भर जाता है... सक्षम राजाओं के लिए युद्ध अपना राज्य बढ़ाने का जरिया होगा पर आम प्रजाजनों का जीवन इससे नरक बन जाता है.. किसान खेती नही कर पाते, व्यापारी अपना उद्योग चला नही पाते... आवश्यक चीजें नही मिल पाती... महंगाई आसमान छु जाती है.. काफी गहन विचार के बाद में इस निष्कर्ष पर पहुंचा की अगर किसी सक्षम राज्य के नेतृत्व में अगर इन सारे कुनबों को ला दिया जाए तो इस खून खराबे का अंत हो जाएगा... प्रजाजन अपना जीवन खुशाली से व्यतीत कर पाएंगे... खेती और व्यापार बढ़ेगा तो सबका फायदा होगा!! काफी अध्ययन के बाद मुझे सूरजगढ़ की राजमाता में वह सारे गुण नजर आए जो में ढूंढ रहा था...में चाहता हूँ की आपके नेतृत्व में एक मजबूत साम्राज्य स्थापित किया जाए, फिर एक ऐसा राजवंश स्थापित होगा जो सैकड़ों वर्षों तक फैला रहेगा। मैं जानता हूं कि यह हमेशा के लिए नहीं रहेगा लेकिन यह मेरा उद्देश्य नहीं है। मेरा उद्देश्य, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यही है की इस खूनखराबे और युद्धों को रोका जाएँ!!"

राजमाता इस पुरुष की अस्खलित वाक छटा से काफी प्रभावित होकर सुनती ही रही... !!!

"जैसे चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को योग्य तालिम देकर एक सक्षम महाराजा बनाया था उसी तरह में आपको एक महान साम्राज्ञी बनने में आपकी सहायता करूंगा... और वो भी तब जब मुझे यह विश्वास हो जाएँ की आप इसके लिए योग्य हो!!"

उस पुरुष की बातें सुनते ही पूरी सभा आक्रोश से भर गई... यह टुच्चे आदमी की यह जुर्रत की वह राजमाता की योग्यता तय करेगा?? सेनापति अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्होंने अपनी तलवार निकाल ली। वह क्रोध से थरथर कांप रहे थे।

"राजमाता जी, आप आदेश करें तो एक पल में इस अहंकारी का सिर, धड़ से अलग कर दूँ"

राजमाता ने उत्तर नही दिया... वह इस तेजस्वी पुरुष की आँखों की चमक देखती रही... कुछ तो बात थी उसमें.. इतना विश्वास किसी इंसान में ऐसे ही नही प्रकट होता... किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले राजमाता उसकी बात को विस्तारपूर्वक सुनना चाहती थी... उन्होंने इशारा कर सभा को बर्खास्त करने का आदेश दिया... थोड़ी ही देर में पूरा सभाखण्ड खाली हो गया... बच गए तो सिर्फ विद्याधर और राजमाता।

"अब बताओ," राजमाता ने कहा, अब वह दोनों अकेले थे, "मैं तुम्हें गंभीरता से क्यों लूं? अशिष्टता और दंभ के अलावा तुम्हारे पास ऐसा क्या है, जो मुझे विश्वास दिलाएगा कि तुम इस कार्य में मेरी मदद कर सकते हो?"

"मेरे पास ज्ञान है, और उस ज्ञान को व्यावहारिक उपयोग में लाने की बुद्धि है," उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "मैंने सभी शास्त्रों का सविस्तार पठन किया है। कई शास्त्र तो मुझे कंठस्थ है। मैंने लगन से ऐसे गुरुओं की तलाश की है जो न केवल मुझे प्राचीन ग्रंथ या शास्त्र पढ़ाएं बल्कि उनके पीछे की सच्चाई भी समझाएं। मैंने सीखा है कि महान चीजें अलौकिक या परग्रहवासी प्राणियों के कृत्यों से हासिल नहीं की जाती हैं, बल्कि उन विचारों के कठिन अनुप्रयोग से होती हैं जिनके बारे में कोई मानता है कि वे अलौकिक शक्तियों से आते हैं और इन तथाकथित पवित्र ग्रंथों या 'शास्त्रों' में निहित हैं। और जिसे आप अहंकार मानते हैं," विद्याधर ने आगे कहा, "वह असल में अहंकार नही है, मुझ पर, मेरे ज्ञान पर और अपने ज्ञान की व्याख्या करने और उसे क्रियान्वित करने की मेरी बुद्धिशक्ति पर पूर्ण विश्वास है। मैं अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हूं और मुझे पूरा यकीन है कि मैं इसे हासिल कर सकता हूं अगर मुझे इसके लिए योग्य व्यक्ति मिलें।"

"और मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं कि वह योग्य व्यक्ति में स्वयं हूं?" राजमाता ने आँखों में चमक लाते हुए पूछा क्योंकि उन्हें यह पुरुष पसंद आने लगा था।

"मेरे कुछ सवालों का उत्तर देकर.. " विद्याधर ने जवाब दिया

"सवाल पूछो," राजमाता ने कहा और इंतजार करने लगी। उन्होंने नाटकीय ढंग से अपनी ठुड्डी के नीचे एक हाथ रखा और अपने चेहरे पर जिज्ञासा के भाव धारण कर लिए। वह इस अहंकारी पुरुष के साथ मानसिक द्वंदयुद्ध करने के लिए तैयार थी।

"सच और झूठ में क्या अंतर है?"

"कोई अंतर नहीं है," उन्होंने तुरंत कहा, "वह परिणाम ही है जो सच और जूठ को परिभाषित करता है।" यह कोई मौलिक उत्तर न था... शास्त्रों में इस विषय पर विस्तृत लेखन किया जा चुका है

"शक्ति का सही अर्थ क्या है?"

"यह उन साधनों में से एक है जिसके द्वारा आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं। इसे प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए व्यक्ति को इसका प्रतिरूपण करने में सक्षम होना चाहिए। उपयोग किए जाने पर शक्ति दिखाई देती है। मुख्य रूप से इसके उपयोग का खतरा इसे एक उपयोगी साधन बनाता है।

और मैं साधन शब्द पर जोर दे रही हूं, क्योंकि वही सब कुछ है - खुद को अभिव्यक्त करने और अपनी इच्छा थोपने का एक उपकरण। हम सभी के भीतर क्रूरता है, और जो चीज हमें एक दूसरे से अलग करती है,और यह वह है की हम किस हद तक इसे खुद को व्यक्त करने देते हैं।

एक शासक के रूप में यदि मैं इसका अत्यधिक उपयोग करती हूँ तो यह मुझे एक अत्याचारी भी बना सकता है। लेकिन मुझे उससे कोई फरक नही पड़ता, मुझे इसका उपयोग करना होगा फिर भले ही कुछ लोगों के लिए में अत्याचारी बन जाऊँ।"

काफी लंबा-चौड़ा उत्तर था.. राजमाता खुद अचंभित थी की यह सब उनके मन में त्वरित प्रकट कैसे हो रहा है!!

"अच्छे और बुरे में क्या अंतर है?" अगला प्रश्न आया

"कोई अंतर नहीं है," फिर से तुरंत जवाब आया, क्योंकि राजमाता ने स्वयं इस बारे में सोचा था और कुछ समय पहले एक उत्तर तैयार किया था, "यह व्याख्या का विषय है। एक व्यक्ति को मारना बुरा हो सकता है और एक हजार को मारना अच्छा हो सकता है। यह आपकी व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है... अगर कहना चाहे तो कह सकते है की अंतर केवल दृष्टिकोण का है"

"क्या आप ऊपर वाले की शक्ति को मानते हैं?"

"हाँ, मानती हूँ... " दृढ़तापूर्वक राजमाता ने कहा

"तो अगर आपके गुरु आपसे कुछ न करने के लिए कहें क्योंकि ऊपरवाला नहीं चाहता की ऐसा हो, तो आप क्या करेंगे?"

"यह ऊपरवाले की इच्छा की उनकी व्याख्या होगी और यदि मेरी व्याख्या अलग है तो मैं जैसा चाहूँगी वैसा ही करूंगी।"
 
"तो फिर ऊपरवाले के क्रोध का क्या करेगी, जिसके बारे में ज्ञानी पुरुष कहते हैं कि यदि आप उसकी इच्छा का पालन नही करेंगे तो आप पर उनका कहर टूट पड़ेगा!!"

"मैंने काफी रीति रिवाजों का पालन नही किया है जिसके बारे में बताया गया था और चेतावनी भी दी गई थी की इसका परिणाम बहुत बुरा होगा और ऊपरवाला मुझे सज़ा देगा। पर देखो, में यहाँ तुम्हारे सामने खड़ी हूँ, चुस्त दुरस्त और एक राज्य की राजमाता...!!" मुसकुराते हुए राजमाता ने उत्तर दिया

वह अपनी बाहों को अपनी छाती पर रखकर खड़ा रहा और बोला "आप बुद्धिमान हैं और स्वतंत्रता से सोचने में सक्षम हैं। आप शिक्षित भी हैं और मुद्दों को निष्पक्षता से देखने में निपुण हैं। आपकी आँखों में देखकर मुझे यह सहज रूप से लगता है कि आप में दया भी है। आपके पास वह सारे महान गुण हैं जो एक काबिल शासक में होने चाहिए।"

"बस इतना ही...!!" राजमाता ने उसकी चुटकी लेते हुए कहा "मैंने कुछ प्रश्नों के उत्तर क्या दे दिए... तुम्हें मेरी योग्यता पर विश्वास हो गया!!"

यह सुनते ही उस पुरुष के कठोर चेहरे पर मुस्कान की झलक दिखाई दी।

अपने हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर उसने कहा "कृपया मुझे अपना गुरु बनने की अनुमति दीजिए ताकि मैं अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकूं और अपने जीवन को अर्थपूर्ण बना सकूं।"

उस पुरुष के अहंकार से विनम्रता की ओर अचानक हुए इस बदलाव ने राजमाता को आश्चर्यचकित कर दिया। आखिर वह चाहता क्या था? उन्होंने सोचा। हालांकि उस पुरुष को पारदर्शी नजर में ईमानदारी झलक रही थी।

"ठीक है," राजमाता ने उत्तर दिया, "देखते हैं तुम क्या कर सकते हो। लेकिन अभी तुम महल के बाहर ही रहो। में सोच के बताऊँगी इस बारे में"

विद्याधर ने हाथ जोड़कर राजमाता को नमन किया और वहाँ से चल दिया...

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सुबह अपनी दिनचर्या निपटाकर राजमाता अपने कक्ष में विविध कसरत कर रही थी... वह हमेशा से कसरत करती ताकि उनकी योनि की मांसपेशियाँ ढीली ना पड़ जाएँ और पेट के इर्दगिर्द चर्बी का जमावड़ा ना हो। उनकी कसरत में तब बाधा आई जब उन्हे अपने कक्ष के बाहर हंगामा सुनाई दिया। प्रतीत हो रहा था कि विद्याधर ने तय कर लिया था कि अब राजमाता को प्रशिक्षित करने का समय आ गया था और उसने पहरेदारों से नजर बचाकर महल में घुसने का प्रयास किया था।

शारीरिक रूप से रोके जाने पर उसने संस्कृत में पहरेदारों को गालियां देना शुरू कर दिया था। इससे पहरेदार डर गए क्योंकि एक तपस्वी के श्राप से निश्चित रूप से हर कोई डरता था। सारे पहरेदार अपने मुख्य सैनिक की तलाश में यहाँ वहाँ दौड़ने लगे।

कुछ ही पलों में उनका मुखिया प्रकट हुआ... वह और कोई नहीं पर शक्तिसिंह था... उस पर इस तपस्वी की गालियों का कोई असर नही हुआ.. उसने एक पल में विद्याधर को कंधे से उचक लिया और धमकाकर चुप करा दिया... बलवान शक्तिसिंह की आग उबलती नजर को देखते ही विद्याधर के तोते उड़ गए। अब वह गालियां देने के बजाय डर के कारण जोर जोर से चीखने लगा...

राजमाता इस हंगामे से त्रस्त और परेशान हो गई। बाहर आकर उन्हों ने शक्तिसिंह को चिल्लाते विद्याधर को छोड़ देने का आदेश दिया। फिर उन्हों ने अपने महल के पहरेदारों को बुलाया और उनसे कहा कि वे विद्याधर को पहचानें और उसे हर समय अंदर आने की अनुमति दें।

आने वाले सप्ताहों में, विद्याधर राजमाता का करीबी बन गया था। वह उन्हे मार्गदर्शन और सलाह देने, कानून पारित करने में मदद करने और निजी तौर पर एक-एक सत्र में उन्हे शासन करने की कला सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहता था। किसी भी समय राजमाता को मिलने में कठिनाई न हो इसलिए उसे महल में निजी कक्ष भी दे दिया गया था।

एक दिन, ऐसा ही एक शिक्षण सत्र चल रहा था जो की कर व्यवस्था पर केंद्रित था।

यह सत्र में दोनों के बीच काफी गहमा-गहमी हुई क्योंकि विद्याधर इस बात से चिढ़ गया था कि राजमाता को वह बात समझ में नहीं आ रही थी जो वो उन्हें सिखा रहा था। मामला तब तूल पकड़ गया जब उसने पूछा, "कर बढ़ाए बिना मैं अच्छी तरह से राज्य का संचालन कैसे कर सकती हूँ?"

इससे वह क्रोधित हो गया, "क्या आप सुन नहीं रहे कि मैं क्या कह रहा हूं? क्या आप एक अच्छी शासक और राजवंश के संस्थापक बनना चाहती हो या सिर्फ एक छोटे से राज्य की राजमाता बनी रहना चाहती हो? मुझे बताओ, क्या आप ठीक से सीखना चाहते हो? यदि नहीं, तो बता दीजिए और मेरा समय बर्बाद करना बंद कीजिए।"

"उफ़," राजमाता ने हताशा में कहा, "तुम्हारा अपने गुस्से पर कोई नियंत्रण ही नहीं है। इतने प्रतिभाशाली व्यक्ति होकर भी तुम्हारी भावनात्मक स्थिरता दो साल के बच्चे जितनी है।"

राजमाता के व्यंग्य को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हुए, उसने तीखेपन से कहा, "मैं आपके उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूं।"

हताश राजमाता उसकी बात सुनना चाहती थी, उन्हों ने कहा, "हाँ, हाँ, मैं सुन रही हूँ, मुझे बताओ।"

अपना गुस्सा जाहिर करने के बाद उसने अधिक सौहार्दपूर्ण स्वर में कहा, "इसका निराकरण प्रसाशन का स्थानीयकरण करने में है। आप लोगों को यह तय करने दें कि वे छोटे स्थानीय स्तर पर क्या चाहते हैं। स्थानीय अधिकारियों को लोगों द्वारा चुना जाना चाहिए; चुने गए लोगों को जवाबदेह होने दें और शासक इन झमेलों से दूर ही रहे। आप एक बड़े क्षेत्र के लिये पर्यवेक्षकों को नियुक्त करते हो। उनके चुनाव में आप काफी सावधान रहें कि आप किसे नियुक्त करते हैं और सुनिश्चित करें कि वे स्थानीय राजनीति से दूर रहें। जैसे-जैसे आपका राज्य बढ़ेगा, यह और अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा। इन पर्यवेक्षकों को कभी भी अत्यधिक शक्तिशाली न होने दें। और अपनी सरकार की सबसे छोटी इकाई तक सीमित रखे। हमेशा याद रखें जहां लोग महसूस कर सकें कि वे अपने भाग्य को नियंत्रित करने के लिए सशक्त हैं। अपने करों का बड़ा हिस्सा स्थानीय रखें और सुनिश्चित करें कि लोग स्थानीय स्तर पर खर्च हो रहें पैसों का प्रभाव देख सकें।"

अपनी बात का विचारपूर्वक निष्कर्ष निकाल कर उसने कहा, "अच्छी सरकार प्रदान करने के लिए, अपना राजस्व बढ़ाने के कई तरीके हैं। कर बढ़ाना हर समस्या का हल नही होता।"

"अब काफी अभ्यास हो गया, मेरी राजमाता," विद्याधर ने कहा, और फिर वह नीचे की ओर खिसकते हुए राजमाता के करीब आया जहां वह मुलायम तकियों पर बैठी थी, "अब कुछ आनंद भी कर लिया जाए।"

विद्याधर ने एक झटके में, उनके घाघरे को ऊपर उठा दिया, उनकी जाँघों को अलग कर दिया और अपना चेहरा राजमाता की जांघों में छिपा दिया।

अचानक हुए इस हमले से राजमाता एकदम ही स्तब्ध रह गई. इतने सप्ताहों की इस रिश्ते में अब तक ऐसा कुछ भी नही हुआ था जो विद्याधर को ऐसा करने पर प्रेरित करें!!!

इससे पहले कि वह दूर हट पाती, या विरोध भी कर पाती, विद्याधर की जीभ राजमाता की योनि की परतों को कुरेदने लगी और उस अनुभूति ने राजमाता के मन को झकझोर कर रख दिया। विद्याधर अपनी जीभ से चुत को टटोलने में काफी निपुण था।

प्रत्येक बार जब उसकी जीभ चलती, पर्याप्त मात्र में चुत के होंठों पर जोर लगता... वह राजमाता को उत्तेजित करने के लिए सही मात्रा में दबाव लगाता और वह भी बिल्कुल सटीक समय पर। वह जीभ चलाना तभी रोक देता जब उसे महसूस होता था कि राजमाता उत्तेजना के चरमोत्कर्ष पर पहुँच रही है... और जैसे ही राजमाता के स्खलन का उबाल नीचे बैठ जाता वह पुनः चाटना शुरू कर देता। यह बिल्कुल वैसे ही था जैसे चाय का उबाल ऊपर तक आ जाने पर आंच को धीमा कर दिया जाता है ताकि चाय पतीले से बाहर ना गिर जाए... जैसे ही उबाल नीचे बैठ जाता है, आंच को वापिस तेज कर दिया जाता है। विद्याधर की इस कला की राजमाता कायल हो गई।

पिछले कई सप्ताहों से वह अभ्यास में इतनी व्यस्त रही थी की शक्तिसिंह को भी भूल गई थी। मुश्किल से तीन चार बार रात को चुदवाया था। विद्याधर ने उनकी सोई हुई वासना को फिर से जागृत कर दिया जो उनके राजसी मुखौटे के नीचे हमेशा उबलती रहती थी। वह बस लेटी रही और यह भूल गई कि कौन उसके साथ ऐसा कर रहा था। उन्होंने उस अनुभूति का आनंद लेते हुए राजमाता ने यह सोचा की इससे उत्पन्न होती जटिलताओं से बाद में निपटा जाएगा।

विद्याधर उनकी भगांकुर की ओर बढ़ा, उसे उसके चमड़ीरूपी छत्र में से जीभ से कुरेदते हुए छेड़ा। फिर उसने राजमाता की जाँघों को अलग किया और अपनी जीभ को उनकी योनि में आसानी से प्रवेश कराया, धीरे-धीरे इसे और अंदर तक ले गया।

लेटी हुई राजमाता ने महसूस किया कि उसकी जीभ से चुदाई कला में संगीत के राग जैसी उतार-चढ़ाव की एक लयबद्धता थी। शक्तिसिंह की जंगली चुदाई से बिल्कुल ही अलग - यह सुसंस्कृत था और इतनी कुशलता से चुत चुसाई कर रहा था कि वह अभी से ही एक चरमसीमा की शुरुआत महसूस कर रही थी।

वह स्खलन के बेहद करीब पहुँच ही चुकी थी तभी... ठीक उसी क्षण, उसने अपना चेहरा उनकी चुत से हटा लिया और सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा,

"शक्तिसिंह से बिल्कुल अलग लग रहा है, है ना?"

शक्तिसिंह का उल्लेख राजमाता के लिए इतना चौंकाने वाला और अप्रत्याशित था कि उनकी सांस गले में अटक गई और वह घबरा कर विद्याधर की ओर देखने लगी और अपनी खुली जांघें फड़फड़ाते हुए दूर जाने की कोशिश करते बोली , "क.. क्या..... क्या कहा तुमने...?"

"चिंता मत कीजिए, मेरी राजमाता," उसने सांत्वना देते हुए कहा, "आपका रहस्य मेरे ह्रदय में सुरक्षित है," उसने राजमाता के घुटनों को मजबूती से पकड़ लिया और उन्हे दूर जाने से रोक लिया।

"आप बड़ी ही सावधानी से शक्तिसिंह के साथ खेल रही थी। मुझे इस बारे में केवल इसलिए पता चला क्योंकि आपके बारे में सब कुछ जानना मेरा काम है। और वैसे भी मुझे इस बारे में केवल संयोग से ही पता चला। वैसे आप दोनों नियमित रूप से नही मिलते है.. कभी अपने स्नेह का सार्वजनिक प्रदर्शन भी नही करते है.. उल्टा मैंने तो आपको शक्तिसिंह से बड़ी सख्ती से पेश आते ही देखा है.. कमाल का आयोजन है आप दोनों का!!

राजमाता ने विद्याधर की ओर देखा, उनका मुंह अभी भी सदमे के कारण खुला हुआ था। फिर उन्होंने तुरंत खुद को संभाला

"ठीक है, तो तुम यह बात जान गए हैं। तो उस ज्ञान के साथ तुम क्या करने वाले हो?" राजमाता के मन में इस युवक को कैसे नियंत्रित करके अपना गलत फायदा उठाने से रोकने की योजना बनने लगी थी।

विद्याधर ने राजमाता के एक पैर को अपने दोनों हाथों से धीरे से पकड़ लिया और उनके पैर की उंगलियों को चूमने लगा! उसने राजमाता की ओर देखा और कहा

"मेरी प्यारी राजमाता, मैं आपका सेवक हूं, आपका गुलाम हूं। आपके अस्तित्व से ही मेरे जीवन को अर्थ मिला है। इत्मीनान रखिए, मैं आपको कभी कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता।"

राजमाता हतप्रभ थी!! यह वही आदमी था जिसका अहंकारी स्वभाव उससे छोड़े ना छूटता था... अचानक से ऐसा पूर्ण परिवर्तन!! राजमाता विद्याधर की ओर देखकर उसके इस बदलाव को भांपने की कोशिश करने लगी।

किसी कारणवश सारे पुरुष उनके प्रति आकर्षित हो जाते थे। इससे उनकी नज़रों में उन पुरुषों का कद कम या ज्यादा नहीं होता था और ना ही इससे कुछ अतिरिक्त फायदा मिलता था। पर इससे उन्हे सुरक्षा का भाव महसूस होता था। यह आश्वासन भी मिलता था की वह पुरुष अपना सब कुछ बलिदान करने के लिए हमेशा तैयार रहेंगे और कभी उन्हे किसी भी तरह चोट या नुकसान नही पहुचाएंगे। आख़िरकार, सुरक्षा की प्राथमिकता या यूँ कहें कि उसकी तलाश ही वह शक्ति थी जिसने जिसने राजमाता को हमेशा प्रेरित किया था। यह उसकी साम्राज्य निर्माण की महत्वाकांक्षा का सबसे बड़ा स्तंभ भी था।

लेकिन किसने सोचा होगा कि इस आत्मविश्वासी विद्याधर का हृदय इतना रसिक भी था! अपने सारे अहंकार, अपनी अशिष्टता, अपनी अहंकारी प्रलाप के बावजूद, वह एक रूमानी पुरुष था! या फिर शायद नही था और केवल प्रपंच कर रहा हो?

"जो भी हो," राजमाता ने सोचा "चलो देखते हैं कि ये कहाँ तक जाता है" विद्याधर की संगति में उन्हे अब पहले से कहीं अधिक आराम और आनंद महसूस हो रहा था।

विद्याधर ने राजमाता की चुत को फिर से चाटना शुरू कर दिया था। केवल अपनी जीभ का उपयोग करते हुए, धीरे-धीरे और लयबद्ध तरीके से, वह धीरे-धीरे उसे उबाल के बिंदु पर ला रहा था। उसके बाएँ हाथ को उनका बायाँ स्तन मिल गया। राजमाता ने उसकी सहूलियत की खातिर अपनी चोली उतार दी और अपने दोनों हाथों से अपने दाहिने स्तन को दबाना शुरू कर दिया, जबकि वह बारी-बारी से उसके बाएं निपल को भींचता रहा और उसके दूसरे स्तन को दबाता रहा। वह जोर से कराह उठी और अपने दोनों हाथों से उसके सिर को पकड़कर, उसके चेहरे पर अपने कूल्हों को उछालने लगी।

इस चटाई के दौरान विद्याधर आश्चर्यचकित होकर अपने सामने पड़े उस दिव्य हुस्न समान शरीर का सर्वेक्षण करने से रोक नही पाता था। पूरी तरह से सुडौल जांघें, घुँघराले काले बालों वाली झाड़ी अपने पीछे नरम, गुलाबी होंठों को छुपा रही थी और उनकी उत्तेजना के कारण रीस रहे तरल पदार्थ से चमक भी रहे थे। मदमस्त पेट और सुडौल कमर और उनके ऊपर वह दिव्य स्तन, जिनके गुलाबी निपल्स उत्तेजना से खड़े थे, और फिर वह चेहरा, जिसकी सुंदरता मजबूत से मजबूत पुरुषों के घुटने कमजोर बना देता था और कमजोर पुरुषों को लार टपकाने पर मजबूर कर देता था।

राजमाता के गुलाबी अधर खुले हुए थे, उनकी साँसें गहरी पर असमान थी और उनकी आँखें बंद थीं क्योंकि उसका मस्तिष्क अविश्वसनीय संवेदनाओं का स्वाद ले रहा था। विद्याधर के अचानक चुसाई रोक देने से उत्तेजना की कमी होने के कारण उन्होंने अपनी आँखें खोलीं तो पाया कि विद्याधर उसे आश्चर्य से देख रहा था।

राजमाता की नज़रों से नजर मिलते ही विद्याधर ने तुरंत योनि और भगांकुर पर अपनी जीभ से तथा उनके स्तनों पर हाथों से हमला शुरू कर दिया। राजमाता एक बार फिर अद्भुत अनुभूति के सागर में डूब गई। विद्याधर की जीभ ने अपना जादू चलाया और इस बार वह तब तक नहीं रुका जब तक कि राजमाता स्खलित नही हो गई। धीमी-धीमी कराहों की एक तेज आवाज ने उसके संभोग सुख की घोषणा कर दी हांफते हुए राजमाता ने चरमोत्कर्ष को प्राप्त किया। विद्याधर का पूरा चेहरा उनके योनि-रस से सन गया। राजमाता को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह चरमसूख के इंद्रधनुष की सवारी अनंत काल तक करती रही और फिर धीरे-धीरे वास्तविकता की धरती पर उतर आई।

राजमाता के यौन जीवन का यह सबसे गहरा संतुष्टिदायक चरमोत्कर्षों में से एक था। उन्हे अपनी साँसों और इंद्रियों पर नियंत्रण पाने में थोड़ा समय लगा। उनके घुटने अभी भी स्खलन सुख के कारण कमज़ोर थे, इसलिए वह अपने स्थान पर ही लेटी रही।

जब उन्हों ने अपनी आँखें खोलीं, तो देखा की विद्याधर अभी भी उसी स्थिति में, उनके पैरों के बीच में, उनकी ओर देख रहा था, जैसे कोई वफादार कुत्ता अपनी जीभ लटकाकर कृतज्ञता से मालिक की ओर देखता है!!

“आपको मज़ा आया, मेरी राजमाता?” यह सारे मर्द हमेशा ऐसा मूर्खतापूर्ण प्रश्न क्यों पूछते हैं? राजमाता ने शब्दों के स्थान पर संभोगसुख से लिप्त मुस्कान से उत्तर दिया।

"तुमने यह जादू कैसे किया? मेरे तो होश ही उड़ गए।" ऐसा नहीं था कि वह शारीरिक सुख से वंचित थी या संभोग सुख के लिए मरी जा रही थी!! अभी कुछ रात पहले ही शक्तिसिंह ने तीन बार अपना वीर्य उनकी चुत में स्खलित भी किया था। उनके मुँह में, चुत में और एक बार उनकी गांड में भी। शक्तिसिंह को अब राजमाता की गांड से बेहद प्यार हो गया था!

"यह तंत्र का जादू है," विद्याधर ने कहा, और तुरंत व्याख्याता की भूमिका में वापस आ गया, "मैंने तांत्रिक काम क्रीडा का गहन पठन किया है। अपनी यात्राओं में मैं ऐसे लोगों से मिला भी हूं जो सक्रिय रूप से इसका अभ्यास करते हैं। तंत्रविद्या के यौन पहलुओं को मुझे एक दासी ने सिखाया था जो तांत्रिक-संभोग की विषय में काफी ज्ञानी मानी जाती है। यह ज्ञान में आपको भी काफी आसानी से सिखा सकता हूँ।"

और फिर उसने अपना आध्यात्मिक स्वर खो दिया और अजीब चुप्पी के साथ राजमाता के सामने खड़ा हो गया। उनकी चकाचौंध कर देने वाली नग्न सुंदरता इस तांत्रिक तपस्वी को अपने मोह के गिरफ्त में लेने के लिए जरूरत से कहीं अधिक थी। विद्याधर के अंदर का कामुक पुरुष वापिस जाग उठा। उसने अपनी धोती उतार दी और अपनी पीठ के पीछे हाथ रखकर खड़ा हो गया। उसका तना हुआ लिंग राजमाता की नज़रों के सामने निकला हुआ था, उसकी लिंग बड़ी ही उम्मीद से राजमाता की गीली चुत को ताक रहा था।
 
राजमाता ने उसकी ओर देखा और मन ही मन मुस्कुराई। खड़े लंड को देखकर वह हमेशा उत्तेजित हो जाती थी। वह धीरे से उठकर विद्याधर की ओर आई और उसके लंड की नोक को गीले होंठों से घेर लिया और अपनी जीभ उसके लिंग के निचले हिस्से पर फेरने लगी।

अब कराहने की बारी विद्याधर की थी। उसने नीचे देखा और सुंदर राजमाता को अपने लंड को चूसते हुए देख वह अपना होश गंवा बैठा। अपने पूरे आत्मविश्वास के बावजूद उसने वास्तव में कभी नहीं सोचा था कि वह इस मुकाम तक पहुँच पाएगा।

यह सच था की वह इस राज्य की ओर इसलिए आकर्षित हुआ था क्योंकि उसने सोचा था कि वह इसका उपयोग युद्धों को रोकने के लिए कर सकता है। इसके अलावा राजमाता की सुंदरता की अफवाहें सुनकर उसके मन में उन्हे भोगने की तीव्र इच्छा भी जागृत हुई थी वह भी एक प्रमुख कारण था।

विद्याधर वाकई में एक बेहद कामुक व्यक्ति था। उसने पूरे मुल्क में शिक्षा पाने के उद्देश्य से यात्रा करते वक्त अनेक राज्यों में अपना जौहर दिखाया था, कथित तौर पर सेंकड़ों बांज महिलाओं को गर्भवती किया था। वह घूमता हुआ जिस राज्य में भी जाता उसके सरहद पर डेरा डालकर बैठ जाता.. तपस्वी होने के कारण लोग अपनी समस्याओं का समाधान पाने के उद्देश्य से उसके पास आते... उन में से वह छानकर उन महिलाओं को रात के समय अपने पास बुलाता... जो संतान-प्राप्ति की इच्छुक हो.. सारी महिलाओं को तो नही, पर उसकी पारखी नजर वासनापूर्ण स्त्रीऑ को बहाली भांति पहचान लेती.. उसकी काम-कला की ख्याति महिलाओं में फैलते ही सारी औरतें उस पर ऐसे मंडराती जैसे गुड पर मक्खियाँ!!!

उन महिलाओं से वह अपना लंड और अंडकोष धुलवाता और फिर वह गंदा पानी इकट्ठा कर उन्हे पीने को कहता! इसे वह संतान-प्राप्ति की विधि का हिस्सा बताता। फिर उन महिलाओं को वह जंगल में ले जाकर जमकर चोदता । उसने तो एक ही समय में तीन तीन को एक साथ चोदा था!

उन सभी औरतों के मुकाबले, राजमाता का सौन्दर्य स्वर्ग समान था... वह अलौकिक सौंदर्यवती उसका लंड चूस रही थी और यह एहसास उसे अभिभूत कर रहा था। राजमाता को पहली दफा देखते ही वह उनसे बेहद आकर्षित हो गया था... प्रश्न यह था की उनके करीब पहुंचा कैसे जाए!! ना ही उसके पास वह शारीरिक सौष्ठव था... ना ही धन और ना ही वह किसी राज्य का महाराज था... उसके पास थी तो बस विलक्षण बुद्धि और शहद टपकाती जीभ... जिस जीभ ने आजतक सेंकड़ों महिलाओं को अपने शब्दों की जाल में फँसाकर उनकी चुत को चाट रखा था..

उसी जीभ का सहारा लेकर वह राजमाता की चुत तक पहुँच चुका था। एक तरह से वह उनके प्यार में बेतहाशा पड़ चुका था ऐसा कहें तो भी अतिशयोक्ति नही होगी।

काफी मशक्कत के बाद आखिर वह क्षण आ ही गई जिसका उसे बेसब्री से इंतज़ार था। बड़े ही हल्के हाथों से उसने राजमाता का मुख अपने लंड से हटाया और उन्हे पीठ के बल लिटा दिया।अब वह उनके पैरों के बीच बैठ गया और अपने लंड को हाथ में लेकर उनकी योनी में डाल दिया।

धीरे से उसके लंड ने शहद टपकाते उन चुत के होठों को अलग कर दिया और बड़ी आसानी से राजमाता की गीली और चिपचिपी यौन-गुफा में उसका लंड समा गया। जब उस दिव्य-द्वार के अंदर और बाहर धक्के लगा रहा था तब उसने अपने शरीर का सारा वज़न अपने हाथों को जमीन पर टिकाकर संभाला हुआ था। अब भी अपने शरीर को राजमाता के शरीर पर डालने की उसकी हिम्मत नही हो रही थी।

निश्चित रूप से विद्याधर का लंड शक्तिसिंह के लिंग जितना बड़ा नहीं था, फिर भी उसके लिंग के अंदर और बाहर होने वाली हर हरकत ने उन्हे बहुत उत्तेजित कर दिया था। उन्होंने अपने हाथ लंबे किए और उसे अपने ऊपर खींचा। राजमाता के होंठ उसके होंठों से मिल गए और दोनों की जीभ एक दूसरे में उलझ सी गई। बस इतनी सी हरकत से विद्याधर की सहनशक्ति की सीमा का अंत आ गया। वह राजमाता की योनी में ज्वालामुखी की तरह स्खलित हो पड़ा और अपने गुनगुने वीर्य से पूरे योनिमार्ग को भर दिया!!!

और इसी के साथ राजमाता और विद्याधर के चुदाई के शानदार दिनों की शुरुआत हो गई।

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निश्चित रूप से विद्याधर का लंड शक्तिसिंह के लिंग जितना बड़ा नहीं था, फिर भी उसके लिंग के अंदर और बाहर होने वाली हर हरकत ने उन्हे बहुत उत्तेजित कर दिया था। उन्होंने अपने हाथ लंबे किए और उसे अपने ऊपर खींचा। राजमाता के होंठ उसके होंठों से मिल गए और दोनों की जीभ एक दूसरे में उलझ सी गई। बस इतनी सी हरकत से विद्याधर की सहनशक्ति की सीमा का अंत आ गया। वह राजमाता की योनी में ज्वालामुखी की तरह स्खलित हो पड़ा और अपने गुनगुने वीर्य से पूरे योनिमार्ग को भर दिया!!!

और इसी के साथ राजमाता और विद्याधर के चुदाई के शानदार दिनों की शुरुआत हो गई। इस बात का शक्तिसिंह को भी इल्म था (क्योंकि राजमाता ने ही उसे बताया था) लेकिन इससे उसे कोई परेशानी न थी। उसे तो बस अपनी राजमाता को चोदने में दिलचस्पी थी! वह तो बस इतना चाहता था की राजमाता असहाय अवस्था में पेट के बल लेटी हो और वह बेदर्दी से उनकी गांड चोद दे... इतना मिलने पर वह खुश था। विद्याधर भी समय समय पर इस अप्सरा समान सौंदर्यवान शरीर को भोगकर तृप्त रहता था.. राजमाता और शक्तिसिंह के संबंध से उसे कोई फरक नही पड़ता था। वह उनके व्यक्तित्व और हुस्न के प्यार में पागल था और जब भी राजमाता उसे अपने ऊपर चढ़ने का संकेत तब वह वास्तव में आभारी महसूस करता था। राजमाता उसकी बुर चाटने की कला की कायल हो गई थी। जब भी वह अपनी चुत फैलाती तब विद्याधर अपने सम्पूर्ण कौशल से उस जिम्मेदारी को निभाकर उनके भोसड़े को पर्याप्त मात्रा में द्रवित करके ही दम लेता!

लेकिन जब भी वे संभोग में व्यस्त नही होते थे, तब उनका संबंध पुनः गुरु और शिष्या का बन जाता था। ऐसे ही एक दिन राजमाता, विद्याधर के साथ एक अभ्यास के संलग्न बहस में मशरूफ़ थे।

"युद्ध कभी अच्छाई बनाम बुराई का नहीं होता।" विद्याधर ने कहा, "वास्तव में अच्छाई बनाम बुराई जैसा कुछ नहीं है क्योंकि कौन जानता है कि पूर्णतया अच्छा क्या है और पूर्णतया बुरा क्या है। अच्छाई और बुराई सापेक्ष हैं और इसकी व्याख्या हर व्यक्ति के लिए अलग अलग होती हैं। इतिहास गँवाह है... हमने बुरे लोगों को अच्छे काम करते देखा है और अच्छे लोगों का बुरा करते हुए भी देखा है। यदि आप अपनी व्याख्या का पर्याप्त लोगों को यकीन दिला सकते हैं तो आपकी व्याख्या सत्य है।"

राजमाता इस भारी ज्ञान का संभाषण सुनते सुनते थक गई; उसने बहुत पहले ही अच्छी बनाम बुरी चीजों के विषय पर गहरा पठन कर लिया था, लेकिन एक बार ये विद्याधर बोलना शुरू कर देता था तो उसे कोई रोक नहीं सकता था।

उन्होंने विद्याधर के सामने एक मदहोश अंगड़ाई ली और फिर अपने घाघरे को दोनों हाथों से उठा लिया... एक पल में उन्होंने अपने अंतर्वस्त्र उतार दिए अपनी योनी को खुली हवा का आनंद लेने का अवसर दिया। विद्याधर पुस्तक में सिर झुकाए अपने भाषण में खोया हुआ और तभी राजमाता अपनी चुत के साथ उंगलियों से शरारत करने में जुट गई थी। उसकी बातों का राजमाता के तरफ से कोई उत्तर ना मिलने पर विद्याधर ने अपनी नजर किताब से ऊपर की और बाज की तरह पंख फैलाए राजमाता को देखकर वह स्तब्ध रह गया।

अब राजमाता ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और नंगी होकर बिस्तर पर लेट गई। उन्होंने अपनी जाँघों को फैलाया और बिस्तर के किनारे पर खिसक गई और अपनी चुत को फैलाकर, विध्यधार को उसका छेदन करने के लिए आमंत्रित करने लगी।

किताब को फेंककर वह जल्दी से राजमाता की ओर आगे बढ़ा। वह उनकी झांटेदार चुत के सामने घुटनों के बल बैठ गया और उनकी गोरी मांसल जाँघों को और भी फैलाकर उसकी जीभ उस झाड़ी में छिपी चुत पर प्यार से फिरने लगी। धीरे-धीरे उसने अपनी जीभ को राजमाता की पनियाई चुत में अंदर बाहर चलाना शुरू कर दिया।

विद्याधर की जीभ का जादू फिर से चल पड़ा। राजमाता एक बार फिर उस अविश्वसनीय अनुभूति के आगे पस्त हो गई और अपनी आँखें बंद करके दूसरी दुनिया की यात्रा पर निकल। विद्याधर ने फिर से अपनी कला का उपयोग किया और उसकी जीभ ने वासना और पूर्ति के बीच सही संतुलन पैदा किया।

राजमाता के भगांकुर को गुदगुदाते हुए, उनकी योनि की परतों को छेड़कर, वह बड़े ही साहसपूर्वक उनकी चुत में अपनी लपलपाती जीभ को धकेलता गया। पर आज राजमाता को कुछ तो अलग महसूस हो रहा था। विद्याधर की जीभ हिलाने के अलावा उसके बाकी शरीर की हलचल को भी वह महसूस कर पा रही थी।

उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और देखा कि विद्याधर ने अपने सारे कपड़े (मुख्य रूप से अपनी धोती) उतार दिए थे और अपनी जीभ उनकी चुत में डाले हुए वह अपने हाथ से हस्तमैथुन भी कर रहा था। इस समय वह ऐसा दिख रहा था जैसे कोई तरुण युवक ने प्रथम बार अपने गुप्तांगों को सहलाकर आनंद करना सीखा हो!!!

विद्याधर की इस दिलचस्प हरकत को थोड़ी देर देखने के बाद वह फिरसे उसकी चुत चुसाई के आनंद की शरण में लौट गई और अपनी आँखें बंद कर चरमोत्कर्ष की प्रतीक्षा करने लगी। थोड़ी ही देर में स्खलन की प्रखरता ऐसे टकराई जैसे लहरे किनारे से टकराती है... एक बार फिर शानदार और मन को झकझोर देने वाला चरमोत्कर्ष प्राप्त कर राजमाता धन्य हो गई।

राजमाता ने आँखें खोली और पाया कि विद्याधर अभी भी अपने लंड को पागलों की तरह हिलाने में व्यस्त था। वह सहसा बीच में रुक गया और खड़ा हो गया। अपने पैर चौड़े कर वह तीव्र गति से अपना लंड हिलाने लगा और फिर एक झटके में स्खलित हो गया... उसके लंड की पिचकारी राजमाता के स्तनों और पेट पर हर जगह फैल गई और फिर जब उसे लगा कि वीर्य का बहाव ख़त्म हो रहा है तब उसने अपना लंड राजमाता की चुत में डाल दिया और आखिरी कुछ झटके उनकी गीली चुत में लगा दिए।

उनकी चुत में उसका लंड अभी भी सख्ती से गड़ा हुआ था। विद्याधर के वीर्य और उनके योनि-रस के चिपचिपे मिश्रण में लंड अंदर बाहर फिसल रहा था। राजमाता के विशाल स्तनों के सुडौल रूप को देख उसके सिर पर वासना फिर से हावी हो गई। वह बस राजमाता की चुत को रौंदना चाहता था।

विद्याधर का तंत्र का सारा ज्ञान तथा उसकी सुसंस्कृतता सब ख़त्म हो गईं!! अब वह बस एक मर्द था जो बेरहमी से अपने नीचे लेटी स्त्री को जमकर चोदना चाहता था ताकि फिरसे परमसुख को प्राप्त कर सके। जिस चुत के वो सपने देखता था उस चुत में उसका लंड लिपटा हुआ था और यह एहसास उसके अंदर-बाहर होते लिंग को और सख्त कर रहा था। अब उसके दिमाग में केवल एक ही विचार था - अपने बीज को राजमाता की चुत में भीतर तक स्थापित करना। निःसंदेह ऐसा करने से राजमाता गर्भवती नहीं होने वाली थीं क्योंकी वह काफी समय से गर्भ-निरोध की जड़ी-बूटियों का सेवन कर रही थी... जो उनके गर्भाशय को बंजर बनाए रखती थीं। वरना अब तक शक्तिसिंह ने उन्हे कब का गर्भवती बना दिया होता..

विद्याधर ने राजमाता की चुत में भीतर तक धक्के लगाने के उद्देश्य से उनके पैरों को और अधिक फैला दिया। हर धक्के के साथ उसके झांट महारानी की घुँघराले काले झांटों से उलझते जा रहे थे। उसके कामुक धक्को ने राजमाता को उत्तेजना की प्रखर सीमा पर पहुंचा दिया। वे दोनों एक ही समय पर झड़ गए।

राजमाता नाजुक कराहों के साथ सिसकते हुए झड़ रही थी.. विद्याधर के साथ हुआ हर स्खलन, पिछले स्खलन से बेहतर होता जा रहा था।

यह सिलसिला चलता गया... उनके मुलाकात के सत्रों के दौरान वह अभ्यास और चुदाई के बीच अदला बदली करते रहते थे..

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एक दिन बातचीत की शुरुआत विद्याधर से हुई, हमेशा की तरह, उसने एक सवाल पूछा

"दक्षिण में स्कन्ध पर्वत, सर्वकोशल और झालरगढ़ क्षेत्र हैं जहां प्राचीन आदिवासी लोग रहते हैं जिन्हें नोक कहा जाता है। मान लीजिए आप अपना साम्राज्य फैलाते हुए उनके प्रदेश तक पहुँच जाती है... पर वह नोक आदिवासी आपके राज्य से जुड़ना नही चाहते। ऐसी स्थिति में आप क्या करेंगे उनके साथ?"

"मैं उन्हें अपने हाल पर ही छोड़ दूंगी," राजमाता ने तुरंत कहा, "मैं उनके आसपास के सारे क्षेत्रों को जीत लूंगी पर उन्हें शांति से जीने दूंगी।"

"गलत जवाब," विद्याधर ने कहा।

विद्याधर का यह उत्तर सुन राजमाता उलझन में लग रही थी और इसलिए उन्होंने स्पष्ट किया, "आपको उनकी जमीन पर कब्ज़ा करना होगा। वह जमीन खनिज और सुवर्ण से समृद्ध है और नोक आदिवासी बेहद मेहनती लोग हैं। उन्हें खेती और मवेशी पालने वाले समुदायों में संगठित किया जा सकता है। इसके अलावा, वे खूंखार लड़ाकू कोम हैं जो आधुनिक हथियारों पर भरोसा नहीं करते बल्कि अपने परंपरागत शस्त्रों से अपने दुश्मन की आत्मा पर वार कर उन्हे ध्वस्त कर देते है। सही समय पर उन्हें किसी बेखबर दुश्मन पर छोड़ दिया जाए तो उनकी सेना शक्तिशाली हथियार का रूप धारण कर सकती है।"

"तो फिर ऐसे खूंखार लड़ाकू समुदाय पर में कैसे विजय प्राप्त कर सकती हूँ?"

"उन्हे अपना दोस्त बनाकर... "

"तुम मुझे उलझा रहे हो विद्याधर... में आखिर उन्हे अपना दोस्त कैसे बनाऊ?"

"आप उन्हें परेशान करने के लिए भाड़े के सैनिकों को काम पर लगा दे, और फिर आप अपनी सेना के साथ कूच करते हुए उन भाड़े के सैनिकों को कुचल दे। पैसों के लिए काम करते सैनिकों कमी नही है, उनका इंतेजाम बड़ी आसानी से हो सकता है। मैं इसकी व्यवस्था करूंगा। फिर उन सैनिकों से आप नोक समुदाय की रक्षा करेगी और वह आपके मित्र बन जाएंगे.. ! देखा कितना आसान है!!"

थोड़ा सा विचार कर विद्याधर ने कहा, "उस समुदाय की महिलाएं गजब की होती हैं। लंबा कद, लंबी टाँगे, गेहुआ रंग...सूडोल बदन और तो और उनमें संभोग की अविश्वसनीय भूख भी होती है।नोक आदिवासी महिला के चार या पांच तथाकथित पति होना कोई असामान्य बात नहीं है। सदियों से राजाओ द्वारा उनका अपहरण कर लिया जाता रहा है और उन्हें सर्वश्रेष्ठ दासियां बना दिया जाता है।"

राजमाता अब इस शिक्षा सत्र से ऊब सी गई थी और उभासियाँ लेने लगी थी...

उनकी इस स्थिति को भांपते हुए विद्याधर ने मुसकुराते हुए कहा...

"और अब आप के लिए कुछ ऐसा पेश करने जा रहा हूँ जो आपको अचरज में डुबो देगा.."

उसने बड़ी ही उत्साह से दरवाज़ा खोला और एक आदमी और औरत के जोड़े ने अंदर प्रवेश किया। पुरुष के पास टेबल की जोड़ी थी और उस महिला के पास वीणा थी। उस महिला ने सबसे पहले राजमाता का ध्यान अपनी ओर खींचा। उसकी मदहोश नशीली लचकदार चाल ही थी जिसने राजमाता को बेहद आकर्षित किया। लंबे कद और लंबी टांगों वाली वह महिला, किसी शास्त्रीय नर्तकी की लयबद्ध सुंदरता के साथ चलती हुई आई। उसके हर कदम के साथ पैरों में पहने घुँघरूओ की खनक उस खंड में गूंजने लगी थी।

वह दूध की तरह गोरी थी और उसकी काली आँखें झुकी हुई थीं जिससे पता चलता था कि वह हिमालय के क्षेत्र से थी। लेकिन उस क्षेत्र के मूल निवासियों जैसी चपटी नाक के विपरीत उसकी नाक लंबी और तीखी थी। वह पुरुष मजबूत कदकाठी वाले पहाड़ी पुरुषों जैसा ही था।

बैठने से पहले वह पुरुष और महिला ने सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर राजमाता को प्रणाम किया। वह पुरुष ने तबले की जोड़ को योग्य स्थान पर जमाया और थाप देकर तबले की ताल को समायोजित करने लगा। वह महिला वीणा के तने के नीचे पैर मोड़कर बैठ गई और उसके वीणा के तारों को झनकारने लगी।

विद्याधर चुपचाप उस ओर चला गया जहाँ राजमाता बिस्तर पर लेटी हुई थी और उनकी बगल में बैठ गया। राजमाता ने पूछा, "ये लोग कौन हैं और वह क्या तत्व है जो मुझे आश्चर्य में डुबो देगा?"

संगीत वाद्ययंत्रों के शोर के बीच विद्याधर उनके कान में फुसफुसाया, "यह दोनों तंत्र में विशेषज्ञ हैं। विशेष रूप से तांत्रिक संभोग में उनकी निपुणता है," राजमाता की ओर अर्थपूर्ण ढंग से मुसकुराते हुए वह बोला।

राजमाता को यह विशेषता बड़ी खास लगी.. । हालांकि अभी उस जोड़े को देखकर कुछ खास प्रतीत नही हो रहा था। वह दोनों अपने वाद्य यंत्रों को नियंत्रित करने में व्यस्त थे। उनकी हरकतों में यौन-संबंधों के संलग्न कुछ भी नजर नही या रहा था।

राजमाता ने विद्याधर से पूछा, "क्या यह दोनों पति-पत्नी है?"

"यह तो मुझे नहीं पता," विद्याधर ने कहा, " हो सकता है की पति-पत्नी हो या फिर भाई-बहन भी हो सकते हैं। हकीकत कोई नहीं जानता। पर यह दोनों बहुत ही विवेकशील है और उनकी सेवा प्राप्त करने के लिए बड़ा महंगा मोल चुकाना पड़ता है। उनकी असलियत जानने से हमे कोई फरक नही पड़ेगा.. पर यकीन मानिए, इन दोनों के बारे में मैंने जो सुना है उसके मुताबिक, आपकी हर खर्ची हुई मुद्रा का पूरा लाभ देंगे।"

राजमाता ने अपना ध्यान वापस उस जोड़े की ओर लगाया। वाद्य यंत्रों का संरेखण ख़त्म हो चुका था. अब वह स्त्री वीणा के तारों को लयबद्ध तरीके से छेड़े जा रही थी। वह आदमी चुपचाप बैठा उसकी ओर देखता रहा।

धीरे-धीरे वीणा के मधुर स्वर में एक ठुमरी की शुरुआत की गई, जिसे राजमाता पहचान गई। शास्त्रीय संगीत में पारंगत होने के बावजूद भी वह राग को पहचान नही पा रही थी।

राजमाता की मनोदशा को भांपकर विद्याधर उनके कान में फुसफुसाया, "यह ऐसे संगीत सुर और राग है जिसे आपने पहले कभी नहीं सुना है। इसे अपनी इंद्रियों पर हावी होने दें और अपनी चेतना को उस पर केंद्रित करें तभी आप इसका पूर्ण आनद ले पाएंगे। आप को महसूस होगा कि आप जितना इन सुरों को सुनेंगे उतना अंदर डूबते जाएंगे। इन्हे सुनते हुए संभोग व यौन रति क्रीडा पर ध्यान केंद्रित करें और आप इतने उत्तेजित हो जाएंगे कि यदि आप संभोग करते हुए इस संगीत को सुनेंगे तो आप हर छोटी अनुभूति को बढ़ा हुआ महसूस करेंगे, हर छोटी भावना इतनी मजबूत होगी कि जब आप तृप्ति और चरमोत्कर्ष पर पहुंचेंगे तब ऐसा दिव्य अनुभव होगा जो इस सृष्टि के किसी मानव ने नही महसूस किया होगा!"

इस समय राजमाता के मन में संभोग संबंधित कोई विचार नही था। पर पूरे वातावरण में उन्हे कुछ अजीब सी कमी खल रही थी। उनका मन ऐसी कल्पना करने लगा की कहीं से शक्तिसिंह अचानक प्रकट हो जाए और अपने नग्न लंड को उनके सामने प्रदर्शीत करें... लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, उस खंड का महोल काफी ठंडा और निष्क्रिय लग रहा था।

उनके सामने था तो बस वह विद्याधर और वह भी अपने नंगे लंड का प्रदर्शन नहीं कर रहा था बल्कि उनकी बगल में आँखें बंद कर के बैठा था और जाहिर तौर पर संगीत के सुरों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा था।

आखिर राजमाता ने विद्याधर की बात का अनुसरण करने का फैसला किया। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और वीणा की ध्वनि को अपनी इंद्रियों पर हावी होने दिया।

संगीत के उस जादू का असर देखने के लिए राजमाता ने अपने मन में ही एक पीपल के पेड़ पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया। कोई साधारण पीपल का पेड़ नहीं बल्कि वह पीपल का पेड़ जो उन्हों ने अमरकंटक में देखा था, जहां पवित्र नदी नर्मदा का उद्गम होता था। उन्होंने कभी-कभी इस कल्पना का उपयोग अपने योगिक अभ्यास और प्राणायाम के एक भाग के रूप में किया था।

राजमाता ने अदृश्य रूप से अपने मन को पेड़ के उपर पहुंचते हुए पाया। पेड़ ने अपना एक अलग चरित्र धारण कर लिया था। पेड़ की पत्तियाँ हवा में कांप रही थीं और साथ साथ जन्म, मृत्यु और पुनर्जनन की कहानी को चरितार्थ कर रही थी। उस पेड़ के शक्तिशाली तने पर जीवनदायी रस का रिसाव होते देख सकती थी; वह पृथ्वी की प्रचुरता का स्वाद चखने वाली और पानी के छोटे-छोटे तालाबों में चुस्कियाँ लेने वाली एक जड़ का खोजी हुआ अंकुरण अंत बन गई। उस पेड़ के एक पत्ते के झड़ने पर भी उसका दर्द राजमाता महसूस कर रही थी... पेड़ की शाखों के लहराने पर वह प्रसन्नता और पूर्णता के एहसास को प्राप्त कर रही थी... मानो उन्हे जीवन का अर्थ और अपने अस्तित्व का उद्देश्य हासिल हो गया हो!!!!!

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और तभी उनकी एकाग्रता का भंग हुआ. अचानक संगीत बंद हो गया था। राजमाता ने अपनी आँखें खोलीं और पाया कि विद्याधर अपने चेहरे पर मुस्कान के साथ उन्हे देख रहा था

"मैंने कहा था न आपसे, यह बड़ा ही शक्तिशाली संगीत है, इसे सुनते ही ऐसा प्रतीत होता है मानों वह सुर नेतृत्व कर रहे हो और आप उसका अनुसरण कर रहे है। इनके श्रवण से आपका मस्तिष्क अपनी बेड़ियों से मुक्त हो जाता है। अब इस खुले हुए मस्तिष्क से आप उन सभी चीजों का अनुभव करने का प्रयास करें जो आपका भौतिक मन अनुभव करने में सक्षम है। कुछ तपस्वी इसे अवस्था को दर्द या हठयोग के माध्यम से भी हासिल करते हैं। यह एक ऐसी अनोखी दिव्य अवस्था है जिसे प्राप्त करना हर किसी के बस की बात नही है!! व्यक्तिगत रूप से मेरा यह मानना है की संगीत के माध्यम से भी वही हासिल किया जा सकता है जैसा आपने अभी अनुभव किया है। और इस अवस्था को प्राप्त करने का दूसरा मार्ग है उच्च कोटी के संभोग द्वारा हासिल किया गया चरमोत्कर्ष"

विद्याधर ने इस विषय पर थोड़ी ओर रोशनी डाली

"जब उत्तेजना को एक निश्चित सीमा तक प्रखरता पर ले जाया जाए, तो दर्द या संगीत से पैदा होती अनुभूतियों के समान परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। और यही तो कामसूत्र का सही अर्थ है। यह पुस्तक केवल यह नहीं बताती है कि कैसे चोदना है, बल्कि अपने आपको कैसे ऊपर उठाकर उस स्तर पर लाएं की आप संभोग के माध्यम से उच्च चेतना की ओर का सफर तय कर सकें। यहीं कामसूत्र पुस्तक की असली सिख है"

विद्याधर ने आगे कहा, "मुझे आपकी आत्मा और आध्यात्मिकता को उच्च अस्तित्व तक ले जाने में कोई दिलचस्पी नहीं है, बल्कि मैं आपको उस क्रिया का चरम आनंद लेने के लिए आपके दिमाग को तैयार करना चाहता हूँ, जिस क्रिया से आपको बेहद लगाव है - संभोग!!!"

अब उस पुरुष ने तबले पर थाप देना शुरू कर दिया - हल्के लम्बे तबले पर थाप की एक व्यापक ध्वनि, बड़े ही लयबद्ध से विराम और संपर्क का समन्वय व संकलन कर रही थी।

वह महिला अब खड़ी हुई और अपनी साड़ी को चारों ओर से व्यवस्थित किया। पहली बार राजमाता ने अच्छी तरह उसकी ओर देखा। उनके आगमन के बाद ऊपर ऊपर से निरीक्षण के बाद उन्हों ने वास्तव में उसकी ओर नहीं देखा था। अब महिला ने अपनी ओर राजमाता का ध्यान आकर्षित किया।

उसने सुनहरे पट्टे वाली चमकीले नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी। उस साड़ी को अपने पैरों से इस तरह कलात्मकता से लपेटकर पहना हुआ था जिससे की नृत्य करने और चलने में कोई तकलीफ ना हो। शास्त्रीय नर्तकियों की तरह उसकी काली आँखों को आकर्षक रूप से उजागर किया गया था। उसके लंबे काले बाल छोटी चमेली कलियों के गजरों से गूंथे हुए थे और उसकी चोटी पीठ से लेकर उसके नितंबों तक लटक रही थी।

उसने तबले की ताल पर थिरकना शुरू किया - शुरुआत में केवल छोटी-छोटी हरकतें, गर्दन और हाथ के अलग-अलग भ्रमण का प्रदर्शन करते हुए।

राजमाता की नजर उसकी सुडौल कमर, तंग चोली और नीचे लटकती साड़ी पर चिपक गई। और उस कमर एक अत्यंत आकर्षक नाभि सबका ध्यान अपनी ओर खींच रही थी।

संगीत और नृत्य की गति धीरे-धीरे बढ़ती गई। सहजता से, नर्तकी अपने नृत्य के आंतरिक अर्थ को अपने दर्शकों को पहुचाने के उद्देश्य से आगे बढ़ी। उसका नृत्य इतना कुशल था कि राजमाता ने न केवल उस नृत्य के भौतिक आयामों का आनंद लिया, बल्कि अपने मन को ईर्ष्या, प्रेम, ऊर्जा, कुरूपता, सौंदर्य और हवस के इर्द-गिर्द एक कहानी लिखते हुए पाया।

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हवस???? राजमाता को अचानक इस बात का एहसास हुआ कि वह महिला नग्न थी!! उसके शरीर पर एकमात्र आवरण चमेली की कलियाँ से बने गजरें ही थे जो उसके बालों को ढँक रहे थे। उसने अपने कपड़े कब उतारे? क्या वह जादू था या भ्रम, या उस नर्तकी की अत्यधिक निपुणता?

अब उसके नृत्य में भी निश्चित तौर पर मदहोशी नजर आ रही थी। तबले की ताल के हिसाब से वह नृत्य थोड़ा सा सुस्त था; पर अब वह स्त्री अपने अंग-संचालन से और उसके चेहरे के भाव से शास्त्रीय नृत्य की गहनता के बदले शुद्ध वासना व्यक्त कर रही थी।

अब वह नृत्य की हरकतें ऐसी प्रतीत हो रही थी जो विभिन्न स्थितियों में चुदाई की नकल करने बराबर हो, वह अपने सुंदर और आकर्षक स्तनों के हिलने-डुलने पर ज्यादा ध्यान दे रही थी। उसके हाथ उसके भरे हुए यौवन के चारों ओर घूमते हुए ऐसी मुद्रा बना रहे थे जैसे की वह राजमाता को अपनी घटादार बालों वाली योनि की ओर आकर्षित कर रही हो।

इसमें कोई संदेह नहीं था की वह महिला राजमाता को बहका कर अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास कर रही थी। और आश्चर्य की बात तो यह थी कि इससे राजमाता भी उत्तेजित हो गयीं। उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी महिला के साथ संभोग की कल्पना नहीं की थी। आज तक उन्होंने सिर्फ कड़े लंड की ही कामना की थी जो उनके यौन छिद्रों में घुसकर उन्हे अत्यधिक आनंद दे। लेकिन अभी तो वह एक नग्न महिला का मादक नृत्य देखते हुए अपनी योनी में उस परिचित गीलेपन को महसूस कर रही थी!

राजमाता अब अधिक उत्तेजित हो ही रही थी की तब वह नर्तकी उनसे दूर चली गई और तबले पर ताल के साथ फिर से सामान्य शास्त्रीय करने लगी। ऐसा काफी समय तक चलता रहा और राजमाता एक बार फिर नृत्य नाटिका में इस हद तक शामिल हो गईं कि उस नर्तकी की नग्नता को संपूर्णतः भूल गई।

अचानक तबले का ताल बदल गया और काफी तेज़ और जटिल लय में बजने लगा। नर्तकी ने तीव्र हरकतों के साथ जवाब दिया जिसने राजमाता की चेतना को झकझोर दिया क्योंकि उसके नृत्य में फिरसे मदहोशी का रस टपकने लगा। नृत्य के परिश्रम से नर्तकी को अब पसीना आ रहा था और उसके चेहरे और अंगों पर पसीने की चमक ने उसकी कामुकता को और बढ़ा दिया था।

वह अपने थिरकते पैरों के साथ राजमाता के सामने घुटनों के बल बैठ गई, उसकी जांघें इतनी चौड़ी हो गईं कि उसकी चुत के होंठ उसकी झांटों की झाड़ियों से बाहर निकल गए। उसके शरीर का हर हिस्सा हिल रहा था - उसका सिर, आँखें, स्तन, कमर, हाथ और बेशक पैर, अलग-अलग फिर भी एक साथ। इन हरकतों से राजमाता ऐसे उत्तेजित हो गई जैसे खुले नग्न सख्त लंड को अपनी ओर आता देख लिया हो।

यह हरकतें और नृत्य मादक होते हुए भी यह अश्लील नही थे - इसका प्रभाव काफी कलात्मक और आध्यात्मिक था! राजमाता विस्मय से हांफने लगीं। वह उस नीचे बैठी नर्तकी की खुली चुत से आ रही उत्तेजक गंध को सूँघ सकती थी। वह स्त्री राजमाता से शारीरिक संसर्ग चाहती थी!!! और राजमाता को इससे किसी भी प्रकार की कोई घृणा महसूस नहीं हुई, केवल प्रत्याशा की सुखद अनुभूति हुई।

तभी वह महिला खड़ी हो गई और पलट गई। तबले की ताल के साथ वह फिर से थिरकने लगी। अपने जिस्म को कामुक रूप से लचकाते हुए वह इस तरह हिलाने लगी की देखने वालों का ध्यान उसके लहराते सुडौल नितंबों पर केंद्रित हो जाए। उसके दोनों कूल्हें अपनी मस्ती में ऐसे थिरक रहे थे की उन्हे देखकर उत्तेजनावश राजमाता की सांस अटक गई।

अब वह अचानक से पलटी... और मचलते हुए राजमाता की ओर आगे बढ़ी... उनके बिल्कुल करीब आकार, बिना किसी डर या संकोच के उसने राजमाता की चोली की गांठ खोलकर उनकी चोली उतार दी... फिर उसने राजमाता के दोनों हाथों को अपने हाथों से पकड़ा और उन्हे खड़ा किया... संगीत के ताल पर राजमाता उसके संग झूम रही थी तब उसने उनके घाघरे के नाड़े को खोल दिया... !! और उनके नग्न शरीर को हल्के से इस तरह धक्का दिया की राजमाता बिस्तर पर पीठ के बल लेट गई... और उस स्त्री का चेहरा राजमाता की दोनों जांघों के बीच चला गया। अब तबले की ताल पर उसकी जीभ राजमाता की गीली चुत पर चलने लगी।

अब वह अचानक से पलटी... और मचलते हुए राजमाता की ओर आगे बढ़ी... उनके बिल्कुल करीब आकार, बिना किसी डर या संकोच के उसने राजमाता की चोली की गांठ खोलकर उनकी चोली उतार दी... फिर उसने राजमाता के दोनों हाथों को अपने हाथों से पकड़ा और उन्हे खड़ा किया... संगीत के ताल पर राजमाता उसके संग झूम रही थी तब उसने उनके घाघरे के नाड़े को खोल दिया... !! और उनके नग्न शरीर को हल्के से इस तरह धक्का दिया की राजमाता बिस्तर पर पीठ के बल लेट गई... और उस स्त्री का चेहरा राजमाता की दोनों जांघों के बीच चला गया। अब तबले की ताल के साथ उसकी जीभ राजमाता की गीली चुत पर चलने लगी।

इस अचानक हमले ने, राजमाता को विद्याधर के पहले हमले की याद दिलाते हुए स्तब्ध कर दिया, लेकिन केवल थोड़ी देर के लिए। थोड़ी ही क्षणों के पश्चात अपनी चुत पर लहराती उस जीभ का प्रभाव ऐसा पड़ा की राजमाता वासना के सागर में हिलोरे लेने लगी।

राजमाता को इस महिला की जीभ गीली, लचीली, फिर भी कठोर महसूस हुई और सब से विशेष यह था की उसकी जीभ तबले की लय पर ही चल रही थी। सब से अनोखा एहसास वह था जब उसने राजमाता के चुत के होंठों पर जीभ से चाबुक मारने की एक अविश्वसनीय तरकीब का इस्तेमाल किया जिससे उनकी चुत और भगांकुर को तीव्र अनुभूति का एहसास हुआ।

और इस दौरान उस नर्तकी के हाथ राजमाता के अंग अंग पर घूम रहे थे... उनके पेट से लेकर स्तनों तक... और नीचे जंघाओं के मूल को वह कामुकतापूर्वक मालिश कर रही थी।

राजमाता ने स्वयं को उन संवेदनाओ के समक्ष समर्पित कर दिया। कुछ ही समय में उनकी उत्तेजना ऊपर, और ऊपर चढ़ती गई, जब तक कि वह एक अद्भुत चरमसुख की अवस्था में नहीं पहुंच गई।

जब राजमाता उस स्खलन के नशे से उभरी तो उन्होंने पाया कि वह नर्तकी अभी भी उनके गुप्तांगों पर जीभ फेरने में व्यस्त थी। फिर वह आगे बढ़ी और राजमाता के स्तनों को चूसने से पहले उनके होंठों की ओर बढ़ने लगी और मुंह के अंतरालों में अपनी लाल जीभ से चुंबन दिया।

राजमाता अब बेहद गरम हो गई थी। अब वह नर्तकी राजमाता के बेपरवाह शरीर पर चढ़ गई और अपनी चुत को फैलाकर राजमाता के मुख पर रख दिया। जैसे वो राजमाता पर हावी होना तो चाहती थी पर ऐसे की जैसे उनसे, अपने प्रति ध्यान देने की भीख मांग रही हो!!

राजमाता ने आज से पहले कभी कोई चुत नहीं चाटी थी. असल में उसने पहले कभी किसी चुत को इतने करीब से देखा भी नहीं था। इस नर्तकी की योनी बड़ी ही प्यारी लग रही थी... बालों वाली, लाल और गीली.. और उसमें से उत्तेजक रस की गंध भी बड़ी ही अनोखी सी आ रही थी।

इशारे से उस नर्तकी ने राजमाता को अपनी चुत चाटने के लिए कहा और उन्होंने तुरंत उसका पालन किया। उनकी जीभ का स्पर्श चुत पर महसूस होते ही उस स्त्री के शरीर में कम्पन सा दौड़ गया और वह धीरे-धीरे किसी सूत्र का पठन करने लगी। तबला अभी भी बज रहा था और उसके साथ सूत्र का पठन भी हो रहा था।

यह पहली बार था कि राजमाता ने उस नर्तकी की आवाज सुनी। उसकी आवाज गहरी, मधुर और मोहक थी। वह जिस सूत्र का पठन कर रही थी उसे भी राजमाता ने पहली बार सुना था। यह सूत्र कोई आम सूत्र नही थे बल्कि मन को मुक्त करने आहवाहन दे रहे थे ताकि मन स्वतंत्र रूप से विचरण कर सके, उसे वहां ले जा सके जहां कल्पना उसे ले जाती है।

और राजमाता ने इसका योग्य जवाब भी अपनी हरकतों से दिया-उस मोहक आवाज में हो रहे पठन से राजमाता का मन एक हिमखंड से मुक्त होकर बर्फीले ठंडे पानी से कलकल करती साफ धारा की ओर उड़ गया। उनकी जीभ उस स्पष्ट धारा में घुस गई और गति के प्रतिरूप में अपनी प्यास बुझाने लगी।

यह एहसास भ्रामक होने के साथ बेहद जटिल भी था। वह महिला उनके मुख के ऊपर सवारी करते करते हांफ रही थी और अपने कूल्हों को राजमाता की जीभ के ऊपर पर बार-बार ठोक रही थी। यह सिलसिला तब तक चला जब तक कि वह नर्तकी संभोग की पराकाष्ठा पर पहुँच ना गई।

स्खलन के बाद उसने राजमाता के चेहरे से अपनी चुत को हटाया और उनके पास बैठ गई। तबला तो बज ही रहा था और अब वीणा की बजने की ध्वनि भी इसमें शामिल हो गई। राजमाता ने ऊपर देखा तो विद्याधर को वीणा बजाते हुए देखकर आश्चर्यचकित रह गईं! वह काफी अच्छी वीणा बजा रहा था।

अब धीरे से उस नर्तकी ने राजमाता के जिस्म को हल्का सा उठाया और अपनी ओर तब तक खींचती रही जब तक की राजमाता उसकी गोद में बैठ ना गई। अब वह धीरे से राजमाता के शरीर को अपने साथ लेते हुए बिस्तर पर लेट गई। वह इस तरह से लेटे हुए थे की राजमाता की पीठ नर्तकी के सामने आ रही थी।

राजमाता उस नर्तकी के शरीर की कोमलता से अभिभूत हो गई। वह राजमाता के शरीर के अंगों को सहलाते हुए उनके स्तनों तक पहुंची और उनकी निप्पलों को छुआ। उस स्त्री के चुत के बाल राजमाता के चूतड़ों पर चुभते हुए अजीब स्पंदन पैदा कर रहे थे। दोनों की जांघें आपस में प्रेमालाप करने लगी।

राजमाता की निप्पलों से खेलते हुए वह उनके कानों को चूमने और चूसने लगी.. वह सूत्रों का पठन फिर से शुरू हो गया जो राजमाता को पिछली बार हिमखंड के यात्रा पर ले गया था। एक बार फिर उन सूत्रों को सुनकर राजमाता का मन एक ओर यात्रा पर निकल पड़ा।

इस बार एक पहाड़ी की चोटी पर, जहां गर्म हवा का हर झोंका, चाकू की नोक की तरह महसूस हो रहा था, जो उनके चेहरे, उनके कानों, उनके स्तनों, उनकी जांघों, उनकी चुत और चुत के अंदर के लाल गुलाबी उत्तेजित मांस पर थपेटे मार रहा था... वह स्त्री अपनी लंबी उंगलियों से जब जब राजमाता के चुत के होंठों को फैलाती, वह गरम हवाओं का एहसास राजमाता को सराबोर कर देता।

तभी उन्हे अचानक ठंडी बारिश गिरती हुई महसूस हुई, बूंद के बाद बूंद टपके जा रही थी और यह उस नर्तकी की गीली जीभ नहीं थी, बल्कि बारिश की फुहारें थीं जो उनके निप्पल, उनके भगांकुर और उनकी चुत के होंठों पर गिर रही थीं।

फिर जैसे ही वह नर्तकी, रानी को अपनी गोद में बिठाकर अपनी पूर्व स्थिति में लौटी, एक बार फिर उसकी उंगलियों का प्रत्येक स्पर्श, उनके झांट के बालों की प्रत्येक रगड़, रानी की पीठ पर उसके खड़े निपल्स की प्रत्येक खरोंच, जलन की तरह महसूस हुई, सिवाय इसके कि ये कामुक जलनें थीं, इतनी रोमांचक कि अगली अनुभूति की प्रत्याशा वासना को उन शिखरों पर ले गई जो राजमाता ने कभी महसूस नही की थी।

और वह सूत्रों का पठन जारी रहा और राजमाता का मन उन शब्दों के जादू में बँध गया। उन्होंने अपनी आँखें खोलीं और अपने सामने एक आदमी को देखा। वह एक बहुत ही तने हुए लंड के साथ नग्न अवस्था में था, जिसे वह आराम से सहला रहा था।

संगीत अब बंद हो गया था लेकिन राजमाता का दिमाग अब वह राजमहल के कक्ष में नही था... पर दूर आग और बर्फ की भूमि में था। उन्होंने देखा कि वह आदमी अब उनकी जाँघों के बीच आ गया था और अपने लंड को उनकी चुत में डाल रहा था।

उस आदमी के लंड डालते ही राजमाता को ऐसा महसूस हुआ जैसे चिलचिलाती गर्मी ने उनकी चुत की हर नस को जला दिया था। उन्हों ने कभी भी इतना जीवंत और इतना ग्रहणशील कभी महसूस नहीं किया था। लंड का अंदर और बाहर जाने वाला प्रत्येक धक्का उनके मन को झकझोर देने वाला और अत्यधिक गर्म था, इतना गर्म कि उन्हे लगता था की उनकी चुत उस गर्मी से जल जाएगी पर फिर भी वह जानती थी कि ऐसा नहीं होगा। उनकी चुत की हर नस, हर संवेदना उनके मस्तिष्क को एक उग्र और संतुष्टिदायक संदेश भेज रही थी।

सूत्रों का पठन जारी रहा और वह शब्द राजमाता के जिस्म की गर्मी को बढ़ाते जा रहे थे। अब वह अचानक उस गरम मॉसम से बर्फ की भूमि पर या गई जहां सब कुछ ठंडा था। उनकी चुत में जलन होनी बंद हो गई थी, राजमाता ने आँखें खोलीं तो देखा कि वह आदमी ने अपना लंड उनकी चुत से बाहर निकाल लिया था और अब विद्याधर उन्हें चोदने के लिए तैयार हो रहा था।

जब विद्याधर ने अपना तना हुआ लंड राजमाता के अनुभवी भोसड़े में अंदर डाला तब राजमाता को ऐसा प्रतीत हुआ जैसे अंदर किसी ने बर्फ की कुल्फी घुसेड़ दी हो!!! बेहद ठंडा एहसास...!!! इतना ठंडा की ठंड के कारण उनकी रोंगटे खड़े हो गए। फिर भी उस छेदन और धक्कों में एक अजीब स सुकून और ताजगी थी... वैसी ही ताजगी जो पहली बारिश के बाद प्रकृति को महसूस होती है!!

सूत्रों के शब्दों ने राजमाता के दिमाग का कब्जा ले लिया था... वह शब्द उन्हे उत्तेजित कर रहे थे... उकसा रहे थे.. की वह उस कुल्फी जैसे ठंडे लंड पर अपनी गरम वासनाभरी चुत से ऐसे झपटे की उस कुल्फी का सारा रस चूस निकालें।

राजमाता की चुत ने बिल्कुल वैसा ही किया... चुत की मांसपेशियों ने मरोड़ खाकर विद्याधर के लंड को ऐसा दबोचा की लंड का बीज एक पल में बाहर निकल गया... और उस ठंडे ठंडे वीर्य की बौछार ने राजमाता को स्खलित कर उनकी जलती हुई ऊर्जा को गीली करके शांत कर दिया।

पर यह क्या हुआ?? अमूमन स्खलन की कुछ उत्कृष्ट क्षण बीत जाने पर मन और शरीर शांत हो जाता था.. यह स्खलन तो रुकने का नाम ही नही ले रहा था!! राजमाता ऐसा महसूस कर रही थी जैसे की वह लगातार स्खलित होती ही जा रही थी... चरमसीमा का आनंद खतम ही नही हो रहा था!!

तब वह आदमी फिर खड़ा हुआ और विद्याधर को हटाकर अपना लंड पेलकर राजमाता की चुत में धक्के लगाने लगा.. और उन दोनों के संभोग के बीच वह नर्तकी ने, उस आदमी के लंड के साथ अपनी एक उंगली भी राजमाता की चुत में घुसा दी थी... राजमाता को अपनी चुत काफी भरी हुई और भारी भारी सी लग रही थी... भ्रम की अवस्था में होने के बावजूद राजमाता ने देखा की वह नर्तकी ने अपनी पहली, दूसरी, तीसरी उंगली और अपना हाथ भी लंड के साथ अंदर घुसा दिया!! उसने राजमाता की चुत के अंदर उस आदमी के लंड को पकड़ लिया और उसे राजमाता की चुत के अंदर ही हिलाने लगी..!! फिर भी राजमाता को कोई दर्द नहीं हो रहा था बल्कि परिपूर्णता का बड़ा ही अद्भुत एहसास हो रहा था।

उस आदमी ने राजमाता की चुत और नर्तकी की मुठ्ठी में कुछ धक्के लगाने के बाद अपना लंड बाहर निकाल लिया... उस स्त्री की चार उँगलियाँ अभी भी चुत के अंदर थी जब की उसका अंगूठा उनके भगांकुर को रगड़ रहा था। वह सूत्रों के शब्द राजमाता के मस्तिष्क को एक और जलजले के लिए तैयार होने को कह रहे थे तभी उस उस आदमी ने अपने लंड पर थोड़ी सी लार लगाकर राजमाता की गांड के छेद पर अपना लंड रख दिया।

वह स्त्री अपनी उँगलियाँ चुत में चलाती जा रही थी और वह आदमी राजमाता की गांड पर बेरहमी से प्रहार कर रहा था। वह शब्द राजमाता को नर्तकी के हाथ और उस आदमी के लंड के हर धक्के पर ध्यान केंद्रित करने पर मजबूर कर रहे थे जो उनकी गांड और भोसड़े को रगड़ रहे थे, फिर भी दर्द का कोई एहसास न था... थी तो बस हवस से भरी उत्तेजना!!

अब राजमाता को एक और मन को झकझोर देने वाले चरमोत्कर्ष की शुरुआत महसूस हुई, वह आदमी जुनून पूर्वक घुरघुराने लगा और आहें भरने लगा और उनकी गांड में जोरदार और बेरहमी से तब तक धक्के मारता रहा जब तक कि उन्हे अपनी गांड में उसकी गर्म फुहारें महसूस नहीं हुईं। राजमाता भी एक चीख के साथ झड़ गई... और फिर वह हाथ और लंड धीरे से बाहर निकल गए और आख़िरकार सूत्रों का पठन भी बंद हो गया।

इस अनुभव से राजमाता इतनी थक गई थी कि वह वहीं पड़ी रही और गहरी नींद सो गई। जब उनकी आँखें खुली तब अँधेरा हो चुका था और वह अपने कक्ष में अकेली थी। उनका दिमाग यह तय नही कर पा रहा था की जो कुछ भी उन्होंने देखा, सुना या महसूस किया वह वास्तविकता थी या फिर केवल एक भ्रम था... उनका पूरा शरीर निढाल हो चुका था और मस्तिष्क हिल चुका था। इस अनुभव का आयोजन करने के लिए वह मन ही मन विद्याधर की आभारी हो गई। निःसंदेह विद्याधर भी बहुत खुश था कि वह राजमाता को ऐसा अद्वितीय अनुभव करवा सका और उनके चेहरे की खुशी, उसके लिए किसी इनाम से कम नही थी।

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इस अनुभव से राजमाता इतनी थक गई थी कि वह वहीं पड़ी रही और गहरी नींद सो गई। जब उनकी आँखें खुली तब अँधेरा हो चुका था और वह अपने कक्ष में अकेली थी। उनका दिमाग यह तय नही कर पा रहा था की जो कुछ भी उन्होंने देखा, सुना या महसूस किया वह वास्तविकता थी या फिर केवल एक भ्रम था... उनका पूरा शरीर निढाल हो चुका था और मस्तिष्क हिल चुका था। इस अनुभव का आयोजन करने के लिए वह मन ही मन विद्याधर की आभारी हो गई। निःसंदेह विद्याधर भी बहुत खुश था कि वह राजमाता को ऐसा अद्वितीय अनुभव करवा सका और उनके चेहरे की खुशी, उसके लिए किसी इनाम से कम नही थी।

वह आदमी और नर्तकी और कुछ सप्ताह राजमहल में रुकें.. और उस समय के दौरान राजमाता ने वह सुख हासिल किया जो उन्होंने स्वप्न में भी कभी नही सोचा था। राजमाता की विनती पर वह तांत्रिक जोड़ी कभी कभार राजमहल में आते रहते। इस तरह शक्तिसिंह, विद्याधर और उस तांत्रिक जोड़ी के बीच राजमाता ने एक भरपूर संभोग से परिपूर्ण जीवन का आनंद लिया। नियमित जीवन में शक्तिसिंह और विद्याधर दोनों मन भरकर उन्हे चोदते... दोनों ही अलग अलग तरीके से राजमाता को तृप्त करते। दोनों ही राजमाता की वासना को संतुष्ट करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते और जैसे यह पर्याप्त नहीं था... वह तांत्रिक जोड़ी भी उन्हे आश्चर्यचकित करने के लिए कभी भी आ टपकती।

इसका मतलब यह था कि अब वह संभोग-साथी ढूंढने की चिंता से मुक्त हो गई थी और अब वह अपने अंतिम लक्ष्य की और आगे बढ़ने के लिए मुक्त और तैयार थी और वह था अपने बढ़ते राज्या को एक मजबूत और स्थिर साम्राज्य में बदलना!!!

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पूर्ण समय पर महारानी पद्मिनी ने एक स्वस्थ राजकुमार को जन्म दिया.... पूरा राज्य इस समाचार को सुनकर आनंद में डूब गया... महाराज की उत्तेजना की कोई सीमा न थी... पूरे राजमहल को फूलों से सजाया गया... सभी सेवक-सेविकाओ को आभूषण भेट में दिए गए... उत्सव का आयोजन किया गया जिसमे महाराजा कमलसिंह ने मुठ्ठीयां भर भर कर सुवर्ण मुद्राएं नगर जनों में बांटी गई.. सारी प्रजा आपस में मिठाइयां बाँट रहे थे... सब की खुशी का कोई ठिकाना न था...

अपने प्रयोग मे सफल हुई राजमाता भी खुश थी... अब वह सूरजगढ़ की सीमाओ का विस्तार कर एक ऐसे साम्राज्य का गठन करना चाहती थी जिसे वह इस नई पीढ़ी को भेंट दे सके... और साथ ही साथ इतिहास के सुवर्ण पन्नों पर उनकी कामयाबी की गाथाएं लिखी जाएँ...

अगले ६ महीनों में राजमाता कौशल्यादेवी के सैन्य ने पड़ोसी मुल्कों को या तो अपने घुटने टेक देने पर मजबूर कर दिया या फिर कुचल दिया.. उनकी विशाल पैदल सेना अपने रास्ते में आने वाले हर रजवाड़े को तहस नहस कर आगे बढ़ रही थी... इस उद्देश्य मे महारानी पद्मिनी के पिता के राज्य का सैन्य भी जुड़ चुका था... राजमाता की अपने सैन्य को स्पष्ट सूचना थी की हमला सिर्फ प्रतिद्वंदी सैन्य पर किया जाए... उस नगर की प्रजा को या उनके घर और खेत को जरा सी भी आंच नही आनी चाहिए... आखिर उस राज्य को जीत लेने के बाद वह लोग उनके प्रजागण मे ही शामिल होने वाले थे। वह नही चाहती थी की वे उन्हे नफरत भरी निगाह से देखें।

राजमाता को इस अभियान के लिए तैयार कर विद्याधर ने उनसे इजाजत मांगी... वह हिमालय के उत्तुंग शिखरों मे बसे हुए गुरुओं से अपनी आगे की शिक्षा प्राप्त करने हेतु जाना चाहता था। ना चाहते हुए भी राजमाता को उसे जाने देना पड़ा... विद्याधर ने राजमाता को संभोग की उन ऊंचाइयों का अनुभव दिलाया था जिसके बारे मे उन्होंने कभी सोचा नही था... राजमाता के काफी समझाने के बावजूद विद्याधर न रुका और अपनी राह पर चल दिया... अपने इस अनोखे संभोग साथी को गँवाने पर राजमाता काफी व्यथित थी।

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पूरे दिन सैन्य की गतिविधियों पर नजर रखकर और आगे का आयोजन करते हुए, शाम ढलने तक राजमाता मानसिक थकान से चूर हो गई थी। उन्होंने महसूस किया की युद्ध के दौरान वह इतनी मशरूफ़ रही थी की अपने आप के लिए वक्त निकाल ही नही पा रही थी। विद्याधर के जाने के बाद वह तांत्रिक जोड़ी भी काफी महीनों से आई नही थी... और शक्तिसिंह को राजकुमार की सुरक्षा के लिए तैनात करने के बाद मिलना ही नही होता था... कभी कभार जब वह नवजात शिशु को देखने के लिए जाती तब द्वार पर खड़े शक्तिसिंह से नजरें चार हो जाती... अमूमन शक्तिसिंह का मन भी महारानी के कक्ष के इर्दगिर्द मंडराता रहता... वह नन्हा राजकुमार आखिर उसका पुत्र जो था...

राजमाता अपने कक्ष की ओर जा रही थी... उनका अंग-अंग आज संसर्ग के लिए बिलख रहा था... उनकी चुत को राजमाता की यह अनदेखी कतई बर्दाश्त नही हो रही थी... उनके विराट मदमस्त स्तन आज कुछ ज्यादा ही भारी लग रहे थे.. और उनकी निप्पलों ने कड़ी होकर चोली को फाड़ देने की धमकी सी दे रखी थी...

अपने इन शारीरिक बदलावो को महसूस करते हुए राजमाता को इस समस्या का बस एक ही समाधान पता था... और वो था शक्तिसिंह!! काफी महीने बीत गए थे शक्तिसिंह से मिले... आज वह किसी भी सूरत मे अपने जिस्मानी आवेगों को रोकना नही चाहती थी। उन्होंने शक्तिसिंह को बुलावा भेजा...

बुलावा मिलते ही शक्तिसिंह हाजिर हुआ... राजमाता ने सबसे पहेले उसे कक्ष का द्वार अंदर से पूर्णतः बंद करने का निर्देश दिया... जैसे ही शक्तिसिंह किवाड़ बंद कर आया, राजमाता ने उसे गिरहबान से पकड़कर अपने साथ बिस्तर पर सुला दिया...

कुछ पलों तक वह शक्तिसिंह को चूमती रही... उसके बलिष्ठ भुजाओं की मांसपेशियों को सहलाते हुए राजमाता बड़ा ही सुरक्षित महसूस कर रही थी... उनके होंठ शक्तिसिंह के होंठों से मिलकर एक घनिष्ठ चुंबन मे तब्दील हो चुके थे। शक्तिसिंह भी राजमाता की गर्दन को जकड़कर चूमे जा रहा था... उसने अपनी एक टांग को राजमाता की जांघों के ऊपर चढ़ा रखा था...

कुछ देर तक चले इस चुंबन के बाद राजमाता के होंठों ने शक्तिसिंह को मुक्त किया...

"क्यों रे... तू तो जैसे मुझे भूल ही गया... " शिकायती स्वर मे राजमाता ने शक्तिसिंह से कहा

"राजमाता जी, आप युद्ध की व्यवस्था मे इतनी व्यस्त रहते है और मे राजकुमार की सुरक्षा मे... वैसे दिल तो बहुत करता था आप से मिलने का... पर क्या करता... अपने कर्तव्य के चलते मजबूर था... " शक्तिसिंह ने अपनी मजबूरी जाहीर की

"याद रहे शक्तिसिंह... तुम्हें वहाँ सिर्फ सुरक्षा के लिए स्थापित किया गया है.. अपने जज़्बातों को काबू मे ही रखना... इस राज को तुम्हें अपने दिल की किसी कोने मे दफन कर देना है... इसी मे इस राज्य की और तुम्हारी भलाई है... " थोड़े से तीखे सुर में राजमाता ने कहा

"यकीन मानिए राजमाता जी... इस सेवक पर आपने जो विश्वास रखा है... उसे मे हरगिज नही भूल सकता हूँ.. निश्चिंत रहिए.. इस तथ्य के बारे मे आपके, महारानी के और मेरे अलावा किसी को पता नही चलेगा... " आँखें झुकाए शक्तिसिंह ने उत्तर दिया

"हम्ममम... विश्वास तो मुझे पूरा है तुझ पर... बस कभी कभार तुझे याद दिलाने से अपने आप को नही रोक पाती... खैर छोड़ वो सब बातें... " शक्तिसिंह का हाथ अपने उन्नत स्तनों पर रखते हुए वह बोली "तुझे इनकी याद नही आई इतने महीनों मे?"

शक्तिसिंह के चेहरे पर मुस्कान आ गई...

"कैसे नही आती याद? इनकी यादों के सहारे तो मेरी रातें कटती है... "

"अच्छा... तो फिर रात को इन दोनों को याद करते हुए तू क्या करता था?" राजमाता का शरारती मन शक्तिसिंह के मजे ले रहा था

"जी... वो.. अब क्या बताऊँ... अकेला आदमी बिस्तर पर लेटे हुए, और क्या कर सकता है?" थोड़ा सा शर्मा गया शक्तिसिंह

"नही नही... तू बता मुझे... क्या करता था तू...?"

"जी मे बस... खुद ही.. अपने हाथों से.. "

राजमाता ठहाका लगाकर हंस दी... और शक्तिसिंह की धोती के ऊपर से उसके लंड को पकड़ लिया

"हाये... कितने वक्त बाद इसे हाथ मे लेने का मौका मिला है... यह तो पहले के मुकाबले मे बड़ा हो गया है!! लगता है रोज रात को तेरी मालिश और मर्दन के कारण इसका कद और परिधि दोनों ही बढ़ गए है... काफी मोटा तगड़ा हो गया है ये तो... " राजमाता कराहते हुए उसके लंड को वस्त्र के ऊपर से ही अपनी हथेली से दबाने लगी... शक्तिसिंह का लंड भी काफी समय बाद, स्त्री की गरम हथेली का स्पर्श पाकर धन्य हो गया... शक्तिसिंह के लंड की नसों मे तेजी से खून दौड़ने लगा... और लंड ने तुरंत ही कडा रूप अख्तियार कर लिया...

शक्तिसिंह ने अपनी उँगलियाँ राजमाता की चोली में डालकर चूचियों के ऊपर उनकी निप्पल तक पहुंचा दी.. अब वह दो उंगलियों से उनकी निप्पल के साथ खेलने लगा... बहुत दिनों से प्यासी बैठी राजमाता इस छेड़छाड़ से उत्तेजित होने लगी...

वह बड़ी ही भारी आवाज मे शक्तिसिंह के कानों मे फुसफुसाई "आह बहुत दिन बाद मौका मिला है... जरा आराम से करना"

उन्होंने धीरे-धीरे एक-दूसरे को चूमा और इस हद तक सहलाया कि वे दोनों मुख्य कार्यक्रम के लिए तैयार हो गए।

शक्तिसिंह ने धीरे-धीरे राजमाता को निर्वस्त्र कर दिया और फिर अपने कपड़े भी उतार फेंके। उसने बड़े ही प्यार से राजमाता के स्तनों को चूमा, फिर उनके पेट को चाटते हुए उनकी टाँगे चौड़ी कर बीच मे पहुँच गया... अपनी जीभ फेरते हुए वह राजमाता की नाभि तक पहुंचा... गोलाकार मे जीभ घुमाकर वो राजमाता की आहें निकालने लगा... काफी देर तक वह राजमाता की नाभि मे जीभ घुमाता रहा... राजमाता तड़प रही थी... छटपटा रही थी... उत्तेजना के मारे अपने पैर बिस्तर पर पटक रही थी...

जैसे उनके इशारे को भांप लिया हो वैसे शक्तिसिंह अब उनके शरीर के निचले हिस्से तक गई.. गरमाई हुई चुत के होंठ सिकुड़कर खुल रहे थे... जैसे भूख मुंह खाने को ताक रहा हो... शक्तिसिंह ने उनकी चुत के इर्दगिर्द सब जगह चूमा... योनि के ऊपर की चर्बी पर... जांघों पर.. जांघों के मूल पर... चूमते हुए वह अपनी जीभ से चाटने भी लगा... सब जगह चूमने और चाटने के बावजूद उसने राजमाता की तड़पती चुत को ही छोड़ दिया!! राजमाता कराह रही थी... उनकी चुत को अब शक्तिसिंह की लपलपाती जीभ की कड़ी आवश्यकता थी... पर शक्तिसिंह भी आज राजमाता के धैर्य की परीक्षा ले रहा था... ऐसी हरकतें करते हुए राजमाता को तड़पाने उसे बड़ा मज़ा आ रहा था।

"क्या कर रहा है कब से? डाल दे मेरे छत्ते मे तेरी जीभ... आह्हह.. !!" राजमाता के चेहरे की तड़प देखते ही बनती थी

शक्तिसिंह ने शैतानी मुस्कान के साथ राजमाता की आँखों मे देखा... और फिर अचानक बिस्तर पर खड़ा हो गया.. !! दो कदम चलकर वह राजमाता के मुख के ऊपर खड़ा हो गया... और धीरे से नीचे झुकते हुए अपने लँड को राजमाता के मुख के समक्ष पेश कर दिया। संकेत स्पष्ट था... बिना वक्त बर्बाद किए, उत्सुक राजमाता ने उसके लँड को लपक लिया... हाथ से उसका लंड पकड़े वह सुपाड़े को लॉलीपॉप की तरह चूसने लगी... एक ही पल मे शक्तिसिंह धरती से सीधे स्वर्ग की यात्रा पर निकल गया... राजमाता के मुख के गरम अंदरूनी हिस्से का नरम स्पर्श होते ही वह खिल गया... थोड़ी देर तक लंड चूसते रहने के बाद राजमाता बेकरार हो गई।

उन्होंने फिर से धीरे-धीरे एक-दूसरे को चूमा और इस हद तक सहलाया कि वे दोनों मुख्य कार्यक्रम के लिए तैयार हो गए। शक्तिसिंह ने धीरे से और बड़े प्यार से अपनी जीभ से राजमाता की चुत को एक त्वरित स्खलन की भेंट दे दी। वह ठीक से जानता था कि किस समय राजमाता के भगांकुर को उकसाया जाए.. उनके चिकने योनि मार्ग में प्रवेश करते समय राजमाता की योनि के होठों को कैसे उत्तेजित किया जाए!!

धीरे-धीरे उसने अपने महीनों के अनुभव का उपयोग करते हुए, अपनी जीभ फेरने की गति को बढ़ाया, जब तक कि वह खुशी से चिल्लाने नहीं लगी। फिर जब वह ठीक हो गई तो उसने उस पर चढ़ने और अपना लंड उसकी उत्तेजित योनी में घुसाने में कोई समय बर्बाद नहीं किया, ठीक उसी तरह जैसे राजमाता को पसंद था।

आमने-सामने से वे विभिन्न आसनों में और कई स्खलनों के बाद उस पड़ाव तक पहुंचे, जो अब राजमाता का सबसे पसंदीदा तरीका बन गया था - पीछे से लेने का!!

वह तुरंत उलटी घूम गई.. वह जानती थी कि आगे क्या होगा और उसके लिए तैयार भी थी। राजमाता के निर्दोष नितंबों का दृश्य हमेशा इतना उत्तेजक था की किसी को भी उनकी गांड को चोदने के लिए प्रेरित कर देता। अपने चूतड़ों को थोड़ा सा और ऊपर उठाने के उद्देश्य से वह अब अपने चार पैरों पर हो गई... किस जानवर की तरह!! वह अपने हाथों और घुटनों पर धैर्यपूर्वक इंतजार करती रही... शक्तिसिंह अपने लंड को लार से चिकना करने के बाद धीरे से लेकिन उद्देश्यपूर्ण तरीके से राजमाता की गांड के छिद्र के अंदर तब तक डालता गया जब तक कि वह पूरी तरह से अंदर समा न गया।

राजमाता के मदमस्त कूल्हों को पकड़कर शक्तिसिंह ने धीरे-धीरे अपने धक्कों की गति बढ़ा दी, उनके तने हुए गुलाबी नितंबों के दृश्य का आनंद लेते हुए... राजमाता के नितंब उसके धक्कों का सामना करने के लिए हर धक्के के साथ पीछे की ओर बढ़ जाते थे। इतना मज़ा आ रहा था शक्तिसिंह को की वह चाहता था की यह स्वर्गीय आनंद देने वाली गांड चुदाई बस चलती ही रहे!!!

लेकिन अफ़सोस, उसकी उत्तेजना उस पर हावी हो गई और वह ज़ोर से कराहने लगा और बड़ी मात्रा मे वीर्य राजमाता के पिछले मार्ग में जमा कर दिया। हमेशा की तरह एक बार की चुदाई उन दोनों के लिए पर्याप्त नहीं थी और वह रात भी कोई अपवाद नहीं थी। शक्तिसिंह ने विभिन्न स्थितियों में राजमाता की गांड को बार-बार चोदा!!

सुबह जब राजमाता उठी तो शक्तिसिंह का लिंग उनकी गांड में ही था और उन्हे अब भी परेशान कर रहा था। शक्तिसिंह को जगाकर राजमाता ने एक बार और अपनी गांड और चुत मरवाई और तब कहीं जाकर शक्तिसिंह का छुटकारा हुआ.. !!

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सूरजगढ़ का फौलादी सैन्य, अपने राह मे आने वाले हर रोड़े को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा था... अब तक करीब ६ राज्यों को और १०० से भी अधिक रजवाड़ों को अपने साम्राज्य मे मिलाते हुए सैन्य की विजयकूच जारी रही... समय समय पर संदेशवाहक सैनिक सूरजगढ़ की ओर प्रयाण करते और सैन्य की सारी गतिविधियों का ब्योरा राजमाता को विस्तार से देते... आगे बढ़ने की रणनीति और योजना का पूर्णतः आयोजन कर सेनापति को सूचित किया जाता... अब तक सफल रहे इस अभियान से राजमाता काफी खुश थी।

सतना नदी के तट के रास्ते आगे बढ़ते हुए जो राज्य स्थित था उसका नाम था शौर्ययगढ़..!! यह राज्य काफी शक्तिशाली और समृद्ध था... उनकी समृद्धि का असली रहस्य था उनके नगर की सोने की खान... शौर्यगढ़ की धरती सोना उगलती थी.. और उस सुवर्ण के दम से वह राज्य वैभव और संपन्नता के शिखर पर था.. शौर्ययगढ़ के महाराजा बलवानसिंह शक्तिशाली सुशासक थे.. वह निडर, साहसी और प्रशासन मे काफी कुशल थे.. उन्होंने पूरे शौर्ययगढ़ की सुरक्षा हेतु एक मजबूत किला बनवाया था जिसकी मोटी-मजबूत दीवारों के बीच सारे नगरजन सलामती के साथ सुख शांति से अपना जीवन व्यतीत करते...

सूरजगढ़ का सैन्य कूच करते हुए शौर्यगढ़ की सरहद के नजदीक पहुंचा.. दिन ढलने को था इसलिए सैन्य ने वहीं पर छावनी बनाकर रात गुजारने का प्रयोजन किया। सुबह होते ही सेना के गुप्तचर शौर्यगढ़ की सारी जानकारी हासिल कर, सेनापति को सूचित करने पहुंचे। जो समाचार आए थे वह उत्साहित करने वाले नही थे... गुप्तचरों के मुताबिक, शौर्यगढ़ का किला अभेद्य था... दीवार ३० फुट चौड़ी और ३ किलोमीटर लंबी थी.. ऊंचाई १०० फुट से भी ज्यादा थी और किले की दीवारों पर हर ५० फुट के अंतर पर बुर्ज बने थे जिस पर २४ घंटे तीरंदाज तैनात रहते... किले की दीवार के बाहर चारों ओर गहरी खाई थी जो पानी से भरी हुई थी... उस पानी मे सेंकड़ों मगरमच्छ गस्त लगाते हुए शिकार की ताक मे बैठे रहते... किले के फौलादी द्वार तक पहुँचने के लिए लकड़ी के सेतु का उपयोग होता था जो हस्त संचालित था और तभी गिराया जाता था जब शौर्यगढ़ से कोई बाहर जाना चाहे.. काम खतम होने के बाद उस सेतु को ऊपर की तरफ रस्सी से खींच लिया जाता था.. बिना सेतु उस मगरमच्छ से भरी खाई को तैरकर जाने के अलावा ओर कोई मार्ग नही था।

पूरी स्थिति का मुआयना करने के बाद, सेनापति को स्थिति काफी गंभीर प्रतीत हुई.. अब तक जीतने भी किले उन्होंने जीते, उस पर लकड़ी से निर्मित सीढ़ियों से सैनिक मध्यरात्री को दीवार पर चढ़ जाते और दुश्मन को चकमा देकर अचानक हमला कर देते... अब तक के सारे हमलों मे सूरजगढ़ की सेना अपने संखयाबल के आधार पर दुश्मन सेना पर हावी हो जाती और थोड़े से प्रतिरोध के बाद उन्हे जीत मिल जाती।

शौर्यगढ़ के मामले मे वह तरीका किसी काम का न था... मगरमच्छ की खाई तैर कर अगर सैनिक दीवार तक पहुँच भी जाए तो बुर्ज के तीरंदाजों के नुकीले बाणों से बचने की कोई उम्मीद न थी.. किले के अंदर पर्याप्त मात्रा मे अन्न और जल का संग्रह था.. इसलिए युद्ध होने की सूरत मे वह किले का दरवाजा अमर्यादित समय तक बंद रख सकते थे। जबतक वह खुद दरवाजा खोलकर सेतु न लगाए, अंदर घुसना नामुमकिन था..

बहादुर सेनापति ने दूसरी सुबह किले की खाई के नजदीक पहुंचकर, जलते हुए तीर छोड़कर शौर्यगढ़ के सेंकड़ों तीरंदाजों की लाशें गिरा दी.. और इस तरह युद्ध का खुला आहवाहन दे दिया.. उसके बाद उनकी सेना पीछे हट गई... योजना यह थी की उन्हे उकसाया जाए और फिर उनकी सेना को बाहर निकालकर, आरपार की लड़ाई की जाए।

हुआ भी बिल्कुल वैसा ही... थोड़ी ही देर मे युद्ध के बिगुल बजे... गढ़ का दरवाजा खुला... सेतुबंध को गिराया गया... और आंधी की तरह २०० घुड़सवार योद्धाओं का दस्ता, सूरजगढ़ की सेना पर टूट पड़ा... घमासान लड़ाई हुई.. दोनों ही दल बहादुर, साहसी और लड़ाकू थे... आरपार की लड़ाई हुई.. शाम होने तक सूरजगढ़ के १५० से ज्यादा सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए.. और शौर्यगढ़ का आधे से ज्यादा दस्ता मारा गया.. ना किसी की हार हुई और ना किसी की जीत.. जिस गति से शौर्यगढ़ के सैनिक आए थे... उसी त्वरित गति से बचे हुए सैनिक वापिस किले के अंदर लौट गए।

सूरजगढ़ का दस्ता भी मरे हुए सैनिक के मृतदेह उठाए हुए, घायल सैनिकों को लेकर छावनी पर वापीस लौटा... बड़ा ही भारी नुकसान हुआ था.. अपने सैनिकों की इस दशा को देखकर सेनापति भी चौंक गए...!! उनके अभियान मे उन्हे पहली बार शिकस्त का सामना हुआ था... और हार के वह आदि न थे। दूसरे दिन नई योजना के साथ उन्होंने हमले की योजना बनाई। इस योजना के तहत, सैनिकों को तीन हिस्सों मे बाँट दिया गया... एक दल सामने से लड़ाई शुरू करेगा... और जब दुश्मन के सैनिक मैदान के बिल्कुल मध्य मे पहुँच जाए तब बाकी के दो दल, दायें और बायें से उन पर हमला मोल दे.. तीन तरफ से होने वाले हमले से फिर दुश्मन का बचना मुश्किल हो जाएगा...

सुबह की पहली किरण के साथ ही फिर से सूरजगढ़ के अंगारों वाले तीर, शौर्यगढ़ के तीरंदाजों पर बरसने लगे... फिर से द्वार खुला.. और इस बार ५०० से भी अधिक सैनिकों ने धाबा मोल दिया... सेनापति की योजना ने शुरुआत मे तो असर दिखाया पर शौर्यगढ़ के योद्धाओं की आक्रामकता के आगे उनकी एक न चली... भीषण रक्तपात हुआ.. दोनों पक्षों का काफी नुकसान हुआ... अनगिनत सैनिक अपनी जान गंवा बैठे... शाम होते होते दोनों तरफ के खेमों ने भारी नुकसान झेला था...

सूरजगढ़ के सेनापति अब सकते मे आ गए.. दुश्मन उनके अनुमान से कई ज्यादा शक्तिशाली था... और बहादुर भी..!! पारंपरिक तरीकों से उनसे जीतना मुमकिन नही लग रहा था.. आने वाले कुछ दिनों मे योजनाबद्ध तरीके से उन्होंने गेरीला युद्ध प्रणाली का प्रयोग किया... कुछ हमले सफल भी रहे, पर ज्यादातर वह दुश्मन का कुछ बिगाड़ न पाए। सप्ताहों की मेहनत के बाद आखिर सेनापति ने संदेशवाहक सैनिक द्वारा राजमाता को परिस्थिति का विवरण करते हुए संदेश भेजा.. वह सैनिक को सख्त हिदायत दी गई थी की वह कहीं भी विराम न ले और जितना जल्दी हो सके, राजमाता के हाथ मे इस संदेश को पहुंचाए...

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मध्य रात्री का समय हो चुका था.. पूरे रानी महल मे सन्नाटा था... महल के आखरी छोर पर स्थित राजमाता के कक्ष की दीवारों के बीच घमासान संभोग का दौर चल रहा था...

दोनों हाथ दीवार पर टिकाए राजमाता अपने चूतड़ों को उठाकर नंग-धड़ंग खड़ी थी... उनके पीछे शक्तिसिंह अपने लंड पर थूक मलते हुए उसे लसलसित कर रहा था... अपने हाथ से लार मलते हुए ऐसा दिख रहा था जैसे लंड की धार निकाल रहा हो!! अब उसने दोनों हाथों से राजमाता को चूतड़ों को चौड़ा किया और गांड के सुराख पर अपना लंड रखकर हल्का सा धक्का दिया..

"आहह.. " हल्की सी कराह उठी राजमाता..

"देखा कितने आराम से घुस गया... "शक्तिसिंह ने मुसकुराते हुए कहा

"इतने दिनों से मार मारकर तूने छेद चौड़ा जो कर दिया है" राजमाता ने चुटकी लेते हुए कहा

"आप कहें तो इसे बाहर निकाल लूँ " शक्तिसिंह भी मजे ले रहा था। यह कहने के बावजूद उसने राजमाता की गांड मे धक्के लगाना जारी रखा

"ज्यादा होशियारी मत झाड मेरे सामने... धूर्त तूने ही मुझे यह आदत लगा दी है... पर कुछ भी कहे.. मज़ा बड़ा आता है इस स्थिति मे पीछे से लेने मे... आहहहह... जरा मेरे स्तनों को रगड़ दे.. " राजमाता ने सिसकियाँ लेते हुए शक्तिसिंह से कहा

शक्तिसिंह ने तुरंत अपने दोनों हाथों से उनके स्तनों को और फिर स्तनाग्र (निप्पलों) को पकड़ लिया... राजमाता की धूँड़ियाँ मसलते हुए वह हुचक हुचक कर धक्के लगाने लगा... फैल गए होने के बावजूद राजमाता की गांड का छेद उनके भोसड़े के मुकाबले काफी कसा हुआ था...

"चल अब बहुत हुआ... बिस्तर पर चल.. और आगे घुसाकर मेरी आग बुझा दे" राजमाता खड़े खड़े मरवाते हुए थक सी गई थी

"बस थोड़ी देर और... फिर चलते है" शक्तिसिंह का मन थोड़ा और धक्के लगाने का था...

"कहा ना मैंने... बिस्तर पर चल.. " किसी की बात सुनने की आदि थोड़ी ही थी राजमाता!!

शक्तिसिंह ने हार मान ली.. और "पुचुक" की आवाज के साथ अपना लोडा राजमाता की गांड से बाहर निकाल लिया

राजमाता लड़खड़ाते हुए बिस्तर पर गई और अपनी टांगें फैलाकर पीठ के बल लेट गई...

शक्तिसिंह ने अपना फनफनाता हुआ लोडा उनकी चिपचिपी बुर के अंदर कस के दे मार...

"हाये... आज कसकर चोद मुझे... बड़ी चुदासी चढ़ी है... आग बुझा दे मेरी" राजमाता ने अपनी बाहों मे शक्तिसिंह को जकड़ लिया

शक्तिसिंह ऐसे धक्के लगाने लगा जैसे प्राइमस मे पंप लगाते है... राजमाता ने दो जिस्मों के बीच अपना हाथ घुसाया और अपने दाने का हवाला ले लिया... धक्कों के बीच वह अपने भगांकुर को रगड़कर मज़ा दोगुना कर रही थी।

उनके दोनों वक्षों को दबोचकर शक्तिसिंह उनकी निप्पलों को चूसते हुए धमाधम धक्के लगा रहा था.. राजमाता ने भी अपनी दोनों जांघें भींचकर शक्तिसिंह के लंड पर अपने भोसड़े की मांसपेशियों को कस दिया था... इतना जबरदस्त घर्षण हो रहा था की दोनों स्खलित होने की कगार पर पहुँच चुके थे...

तभी अचानक राजमाता के कक्ष के बंद दरवाजे पर दस्तक पड़ी...

दोनों चोंक गए.. रात्री के इस समय पर किसी की भी हिम्मत नही थी की राजमाता की नींद मे खलल डाले...

"तुम धक्के लगाना चालू रखो... मे झड़ने के बेहद करीब हूँ... आहह... मेरा पानी बस निकलने ही वाला है... लगा धक्के.. आहह" राजमाता इस यात्रा को बीच मे रोकना नही चाहती थी

शक्तिसिंह को भला क्या हर्ज होगा!! वह राजमाता की एक निप्पल को चूसते हुए कसकर धक्के लगाता रहा..!!

दरवाजे पर फिर से दस्तक पड़ी... और इस बार तो खटखटाने वाला रुका ही नही..!!

राजमाता ने दस्तक को अनसुनी किया और अपने दोनों पैरों की ऐसी कुंडली मारी की उसके दबाव के कारण शक्तिसिंह भी हांफते हुए झड़ गया और उनकी चुत ने भी इस्तीफा दे दिया... शक्तिसिंह उनकी चूचियों पर ढेर हो गया... और अपनी साँसे पूर्ववत होने का इंतज़ार करने लगा...

पर राजमाता के दिमाग से चुदाई का असर तब उतर गया जब दरवाजे की दस्तक रुकने का नाम ही नही ले रही थी... उन्हे मामला गंभीर प्रतीत हुआ... उन्होंने तुरंत शक्तिसिंह को अपने शरीर पर से हल्का सा धक्का देते हुए हटाया... और अपने होंठ पर उंगली रखकर उसे चुपचाप पीछे के रास्ते निकल जाने का इशारा किया... शक्तिसिंह ने अपने कपड़े पहने और आनन फानन मे पीछे के रास्ते भाग गया.. राजमाता ने हड़बड़ी मे अपनी चोली और घाघरा पहनकर, सर पर चुनर ओढ़ी... और दरवाजे का किवाड़ खोलने पहुंची...

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राजमाता के दिमाग से चुदाई का असर तब उतर गया जब दरवाजे की दस्तक रुकने का नाम ही नही ले रही थी... उन्हे मामला गंभीर प्रतीत हुआ... उन्होंने तुरंत शक्तिसिंह को अपने शरीर पर से हल्का सा धक्का देते हुए हटाया... और अपने होंठ पर उंगली रखकर उसे चुपचाप पीछे के रास्ते निकल जाने का इशारा किया... शक्तिसिंह ने अपने कपड़े पहने और आनन फानन मे पीछे के रास्ते भाग गया.. राजमाता ने हड़बड़ी मे अपनी चोली और घाघरा पहनकर, सर पर चुनार ओढ़ी... और दरवाजे का किवाड़ खोलने पहुंची...

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दरवाजा खुलते ही सामने उनकी दासी और एक सैनिक, सिर झुकाए खड़े थे...

"ऐसी कौन सी आफत आ पड़ी की तुम दोनों नगाड़े की तरह दरवाजा पीट रहे थे?" थोड़े से क्रोध के साथ राजमाता ने कहा

"क्षमा कीजिए राजमाता... पर युद्धभूमि से सेनापति जी का महत्वपूर्ण संदेश लेकर आया हूँ.. मुझे यह आदेश दिया गया था की उसे जल्द से जल्द आपको सुपुर्त किया जाए " दासी से पहले वह संदेशवाहक सैनिक ने उत्तर दिया

बड़े ही आश्चर्य और उत्सुकता से राजमाता ने बेलनाकार नली मे बंद सनेश को अपने हाथों मे लिया और इशारे से उन दोनों को जाने के लिए कहा...

"ऐसी कौन सी विपदा आ गई होगी जो सेनापति ने इस वक्त संदेश भेजा...!!" मन ही मन सोचते हुए राजमाता ने संदेश पत्र खोला..

संदेश को पढ़ते ही उनके ललाट की रेखाएं तंग हो गई... युद्धभूमि पर सूरजगढ़ की यह अवदशा के बारे मे जानकर वह व्यथित हो गई.. और गुस्सा भी आया...

वह तुरंत अपने वस्त्र ठीक किए... और दरबार की ओर गई...

दरबार मे पहुंचते ही उन्होंने सेवक को महाराज कमलसिंह को तुरंत बुलाने के लिए भेजा... काफी देर के बाद वह सेवक अपना उतरा हुआ मुंह लेकर हाजिर हुआ...

"महाराज को संदेश दिया की नही?" राजमाता का क्रोध सातवे आसमान पर था

"जी... मे.. जी.. वो.. " सेवक की हिम्मत नही हो रही थी

"अरे बोलता क्यों नही? मुंह मे दही जमा रखा है क्या!!" राजमाता चिल्लाई

"जी, मुझे द्वारपाल ने अंदर जाने ही नही दिया.. कहा की महाराज व्यस्त है और मिल नही सकते" सेवक ने गर्दन झुकाकर जवाब दिया

राजमाता अब क्रोध से थरथर कांप रही थी... वह पैर पटकते हुए महाराज कमलसिंह के कक्ष की ओर गई... बंद दरवाजे के बाहर द्वारपाल के सामने देखा... उनकी आँखों के क्रोध को देखते ही द्वारपाल ने तुरंत दरवाजा खोल दिया...

अंदर घुसते ही प्रथम कक्ष खाली था.. वह तेजी से चलते हुए महाराज के शयनकक्ष मे घुस गई...

शयनकक्ष का द्रश्य अपेक्षित था पर फिर भी उनकी आँखें शर्म से झुक गई... किसी गोरी चीट्टी महिला की (जो की एक वेश्या थी) जांघें फैलाकर महाराज कमलसिंह किसी कुत्ते की तरह जीभ लपलपाते हुए चुत चाट रहे थे... राजमाता उनके पीठ के पीछे थी इसलिए वह उन्हे देख न पाए पर उस वेश्या ने राजमाता को देखते ही अपने स्तन ढँक लिए और चुत पर हाथ रख दिया... वेश्या की इस हरकत से चौंककर महाराज ने उसके सामने देखा... और उसकी डरी हुई शक्ल को देखकर वह पीछे मुड़े...

क्रोध से लाल चेहरा लिए खड़ी राजमाता को देखकर कमलसिंह के होश उड़ गए.. उन्हों ने तुरंत अपनी धोती उठाई और जैसे तैसे कमर पर बांधते हुए पूछा

"राजमाता आप? इस वक्त? कुछ अघटित तो नही हुआ?" महाराज के पसीने छूट गए

"तुरंत वस्त्र पहनो... और मुझे राजदरबार मे आकर मिलों... अभी..!!" बिना उनके सामने देखे राजमाता मुड़कर वहाँ से चली गई

थोड़ी ही देर मे महाराज दरबार मे दौड़ते हुए पहुंचे... राजमाता ने कुछ बोलने के बजाए, सेनापति का संदेश उनके हाथों मे थमा दिया

पढ़कर महाराज कमलसिंह सोच मे पड़ गए। सिर खुजाते हुए वह सिंहासन पर बैठे रहे

"कुछ बोलो कमल, अब इस समस्या का हल कैसे निकाला जाए!!" व्यग्र राजमाता ने पूछा

"माँ, मेरे हिसाब से तो इसका हल काफी आसान है... शौर्यगढ़ से अपनी सेना को वापिस बुला लिया जाए.. वैसे भी हम काफी राज्य और रजवाड़े तो जीत ही चुके है ना" महाराज ने कायरों वाली जुबान मे कहा

सुनकर राजमाता क्रोधित हुई... ऐसी नाकारा संतान को जन्म देने के लिए व्यथित भी हुई...

"हमारी सेना के ५०० से अधिक सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए... उसके बावजूद मैं उसे छोड़ दूँ?? तुम्हें ऐसा विचार आ भी कैसे सकता है!! अब बात राज्य जीतने की नही है... बदला लेने की है... अब या तो वह अपने घुटने टेकेगा... या फिर उसका सिर कलम कर दिया जाएगा... कमल, तुम अभी के अभी अतिरिक्त सेना को लेकर शौर्यगढ़ जाने की तैयारी करो" राजमाता की आवाज मे जबरदस्त जोश था।

सुनकर महाराज बॉखला गए... इस ऐशोंआराम का जीवन छोड़कर युद्धभूमि पर वह जाना नही चाहते थे...

"माँ, क्या आवश्यकता है मेरे जाने की? वहाँ सेनापति तो है ही ना.. में यहाँ से सेना के ४ दस्ते और भेज देता हूँ.." महाराज बहाना बनाने लगे

"बात केवल संखयाबल की नही है.. इस संदेश का मतलब यह है की सैनिकों और सेनापति के हौसले पस्त हो चुके है... तुम्हारे वहाँ रहने से उनका आत्मविश्वास बढ़ जाएगा... जोश बढ़ेगा... युद्ध में शौर्य से ज्यादा विश्वास जरूरी है... एक राजा होने के नाते यह तुम्हारा फर्ज बनता है" महाराज की बहानेबाजी से राजमाता तंग आ गई

"पर माँ.. पद्मिनी और राजकुमार को इस स्थिति में छोड़कर जाना उचित नही होगा... युद्ध तो होते रहेंगे... मेरा फिलहाल राजमहल में रहना अधिक आवश्यक है" महाराज के पास बहाने कम नही थे

राजमाता ने एक गहरी सांस ली और अपने सिर पर हाथ रखकर अपने कायर अय्याश बेटे को देखती रही... फिर कुछ सोचकर वह दृढ़ता से खड़ी हो गई

"ठीक है तुम नही जाना चाहते तो... युद्धभूमि पर में स्वयं जाऊँगी... " राजमाता के चेहरे पर तेज और खुमारी नजर आ रही थी। उन्होंने पास खड़े सेवक को सूचित किया "जाओ, जाकर सैनिकों को सूचित करो... तैयारी शुरू करें... परसों सुबह हम शौर्यगढ़ के लिए रवाना होंगे"

बिना महाराज कमलसिंह की ओर देखे राजमाता दरबार से चली गई। महाराज कमलसिंह ने चैन की सांस ली.. अब वह वापिस उस गणिका की पुष्ट योनि में अपनी जीभ घुसेड़ सकते थे... अपने लंड को मसलते हुए वह कक्ष की ओर चल दिए।

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दूसरे दिन सूरजगढ़ की सेना सक्रिय हो गई थी... संरक्षित सेनाबल ने अभ्यास शुरू कर दिया और उनके लिए धारदार शस्त्र तैयार किए जाने लगे.. फिलहाल सेना का जो दस्ता शौर्यगढ़ पहुंचा था वह केवल पैदल सैनिकों का दल था.. अब वहाँ अश्वदल और हस्तिदल को भी भेजा जाने वाला था... फौज की तीनों शृंखला के गठन से सूरजगढ़ की ताकत तिगुनी हो जाने वाली थी.. फिर उस प्रचंड सैन्य के सामने टीक पाना लगभग नामुमकिन सा था... अश्वदल का सरदार होने के नाते शक्तिसिंह भी तालिम में मशरूफ़ था... राजमहल के पीछे वाले मैदान में तलवार की कलाबाज़ियाँ करते शक्तिसिंह को देखना एक अवसर के बराबर था... उसकी बलिष्ठ भुजाओं की मांसपेशियों पर पसीने की धराएं बह रह थी.. वह बेंतहाँ जुनून के साथ तलवार घुमा रहा था... उसका रौद्र स्वरूप बड़ा ही डरावना प्रतीत हो रहा था...

यंत्र शस्त्रों मे शक्ति, तोमर, पाश, बाण सायक, शण, तीर, परिघ, भिन्दिपाल, नाराच आदि थे तो हस्त शस्त्र में ऋष्टि, गदा, चक्र, वज्र, त्रिशूल, असि, खंजर, खप्पर, खड्ग, चन्द्रहास, फरसा, मुशल, परशु, कुण्टा, शंकु, पट्टिश, वशि, तलवार, बरछा, बरछी, कुल्हाड़ा, चाकू, भुशुण्डी और भाला आदि की भरमार थी.. सारे अश्वों और हाथियों को भी उनके खास कवच से सुरक्षित किया गया था। इसके अलावा भोजन, औषध और अन्य वैद्यकीय सामग्रियों को भी विपुल मात्रा में इकट्ठा किया गया..

अपनी तालिम पूरी कर छाँव में बैठे बैठे शक्तिसिंह विश्राम कर रहा था... पसीने से तरबतर शरीर को कपड़े से पोंछते हुए वह अपने घोड़े के पास बैठा सैनिकों की तालिम पर नजर रखे था... तभी एक दासी ने आकर उसे यह संदेश दिया की उसे राजमहल में बुलाया गया है

"किसने बुलाया है मुझे!!" शक्तिसिंह ने थोड़े से आश्चर्य से पूछा

"वो तो हम नही बता सकते... तुम्हें रानी महल के पीछे पुराने महल में जाना है" दासी ने बिना रहस्य को उजागर किए शक्तिसिंह को सूचित किया

"पुराने महल में? वह तो काफी अरसे से बंद पड़ा है... " शक्तिसिंह को समझ में नही आया

"वो मैं कुछ नही जानती.. तुम्हें संदेश देना था तो मैंने दे दिया... आगे तुम जानो" दासी ने मुंह चढ़ाते हुए कहा

"देख री.. में बता रहा हूँ.. अगर यह तेरी कोई शरारत हुई तो अभी से बता दे.. वरना वापिस आकर में तेरा वो हश्र करूंगा की ठीक से चल भी नही पाएगी" थोड़े से गुस्से के साथ शक्तिसिंह ने कहा

"हाये में मर जाऊँ.. मैं तो इसी पल के इंतज़ार में हूँ की कब तुम मेरा ऐसा हश्र करोगे" खिलखिलाकर हँसते हुए दासी ने कहा

"चल भाग यहाँ से.. " कृत्रिम क्रोध के साथ शक्तिसिंह ने कहा

शक्तिसिंह सोच में पड़ गया... पुराने महल में कोई उसको क्यों बुलाएगा!! वह महल तो सालों से बंद पड़ा था... राजमाता को तो वह कल रात को ही तृप्त कर चुका था... और वह दोनों तो जब चाहे धड़ल्ले से उनके कक्ष में ही मिल सकते थे.. फिर यह कौन हो सकता था!!

१०० साल से भी अधिक पुराना महल, नया राजमहल बनने के बाद उपयोग में नही लिया गया था... आस पास घनी झाड़ियाँ भी थी... देखकर ही प्रतीत हो रहा था की यह महल अवहेलना का शिकार था.. इसके रखरखाव पर ध्यान नही दिया गया था... साल में एकाध बार महल की साफ सफाई होती थी..

शक्तिसिंह राजमहल को पार कर पुराने महल की ओर चलता गया... बीच में फैली झाड़ियों की लताओं को अपनी तलवार से हटाते हुए वह महल के प्रवेश द्वार तक पहुंचा... प्राचीन नक्काशीदार भव्य प्रवेशद्वार, स्थापक राजा वीरप्रताप सिंह की पुरानी रियासत की समृद्धि को दर्शाता था... यहाँ वहाँ मकड़ी के जाले लगे हुए थे... सूखे पत्तों से पूरा फर्श भरा पड़ा था... बरामदे से अंदर जाते ही एक बड़ा सा गलियारा पड़ता था जिसके दोनों तरफ अलग अलग कक्ष के दरवाजे थे। यहाँ वहाँ पंछियों के घोंसले बने हुए थे... और उड़ते पंछियों के अलावा पुराने महल में कोई भी हलचल नही थी।

असमंजस से गुजरते हुए शक्तिसिंह ने एक के बाद एक कमरे के दरवाजे को खोलकर देखा... सभी खाली पड़े थे.. हालांकि पुराना सामान, असबाब, मेज-कुर्सियाँ, बिस्तर और साज-सज्जा, वैसे के वैसे ही छोड़ दिए गए थे...

"यहाँ आओ शक्तिसिंह... " अचानक कहीं से एक मधुर आवाज आई..

शक्तिसिंह चोंक उठा... चारों तरफ देखने पर उसे कोई नजर नही आया... आश्चर्यसह वह चलता गया... पत्थर से बने एक बड़े कलात्मक स्तंभ के पीछे एक दरवाजा बना था... जो गलियारे से नजर नही आ रहा था... उस स्तंभ के पीछे का दरवाजा खोलते ही शक्तिसिंह की आँखें अचंभित हो गई... महारानी पद्मिनी उस कक्ष में कुर्सी पर पैर पर पैर चढ़ाए बैठी थी..

आसमानी नीले रंग की जालीदार साड़ी और चांदी के जरीकाम वाली चोली पहने बैठी महारानी बेहद खूबसूरत लग रही थी.. प्रसव के बाद उनके शरीर पर हल्की सी चर्बी का जमावड़ा उन्हे और सुंदर बना रहा था.. उनके पुष्ट पयोधर स्तन और भी बड़े हो गए थे... जिसका कारण समझा जा सकता था... घेरदार घाघरे और चोली के बीच से नजर आता उनका मांसल पेट और गहरी नाभि इतने सुंदर लग रहे थे के देखने वाले का मन मोह ले..

"तुम तो जैसे मुझे भूल ही गए... " बड़ी प्यारी सी मुस्कान के साथ महारानी ने कहा

शक्तिसिंह अभी भी सकते में था... हालांकि महारानी के मकसद के बारे में तो उसे पता ही था.. पर इस तरह पुराने महल में यूं बुलाएगी ऐसा उसे जरा भी अंदेशा न था।

"ऐसी बात नही है... में थोड़ा व्यस्त था... राजमाता की नजर से बचकर आपसे मिलने आना भी बहुत मुश्किल था.. ऊपर से इस अवस्था में आपको भला मेरी क्या जरूरत!! " शक्तिसिंह ने उत्तर दिया

"मुझे भला क्यों नही पड़ेगी तुम्हारी जरूरत... !! और अपने पुत्र को मिलने तो आ ही सकते थे.. " महारानी ने शिकायत के स्वर में कहा

"जी वो... राजकुमार के जन्म के बाद से राजमाता मेरे ऊपर कड़ी नजर रख रही है... वह नही चाहती की में आपको या राजकुमार से मिलूँ.. उन्हे डर है की कहीं मेरे अंदर पिता के जज़्बात ना जग जाए.. हालांकि मैंने उनको पूरा आश्वासन दिया की ऐसा कुछ नही होगा पर फिर भी... आप तो जानती ही है राजमाता का स्वभाव... " शक्तिसिंह ने जवाब दिया

"हम्ममम... खैर छोडो वो सब बातें.." कहते हुए महारानी खड़ी हो गई और शक्तिसिंह की गर्दन में अपनी बाहें डाल दी... और उनके नाजुक गुलाबी होंठ शक्तिसिंह के होंठों पर लगा दिए... उनकी भारी भरकम चूचियाँ शक्तिसिंह की छातियों पर दबाव बना रही थी... उस गरमागरम राजसी खूबसूरत जिस्म का स्पर्श होते ही शक्तिसिंह सिहर उठा..

"में अभी अभी अभ्यास से लौटा हूँ.. इसलिए थोड़ा सा थका हुआ हूँ महारानी जी" अपने पसीने से तर शरीर का स्पष्टीकरण देते हुए उसने कहा

"मेरे पास एक तरीका है... जिससे तुम अभी तरोताजा हो जाओगे" हँसते हुए महारानी ने शक्तिसिंह को छोड़ा और बिस्तर पर बैठ गई।

शक्तिसिंह सोचता रहा की महारानी किस तरीके की बात कर रही थी... महारानी ने अपना पल्लू हटाया और अपनी चोली की गांठ खोलने लगी.. काफी अरसे के बाद शक्तिसिंह ने महारानी की गोरी चिट्टी विशाल चूचियों को खुला देखा... बड़े बड़े पपीते जैसे स्तन चोली के खुलते ही बाहर झूलने लगे... पहले के मुकाबले चूचियाँ काफी भारी भरकम लग रही थी और उनकी निप्पल भी हल्की सी लंबी हो गई थी... देखने में इतने आकर्षक थे वह स्तन के शक्तिसिंह को उन्हे पकड़कर मसलने की इच्छा हो गई.. पर वह जानता था की वैसे भी वह दो खरबूजे थोड़ी ही देर में उसके हाथों मे होंगे।

"करीब आओ, शक्तिसिंह" महारानी ने प्यार से पुचकारते हुए शक्तिसिंह को बुलाया

धीमी चाल से वह महारानी के करीब गया.. अब वह बिस्तर पर बैठी महारानी के बिल्कुल सामने खड़ा था.. महारानी का चेहरा बिल्कुल उसके लंड के सामने था... ऊपर से द्रश्यमान उनकी दोनों चूचियों का जादू देखते ही बनता था... महारानी अब सरककर बिस्तर के मध्य में पैरों की कुंडली मारकर बैठ गई.. और इशारे से शक्तिसिंह को लैटने के लिए कहा...

हिचकिचाते हुए शक्तिसिंह बिस्तर पर आकर बैठा.. महारानी ने उसे कंधे से पकड़कर खींचा और इस तरह लिटा दिया की शक्तिसिंह का सिर उनकी गोद में आ जाएँ.. शक्तिसिंह अब वह दो बड़े स्तनों के नीचे सिर रखे महारानी को गोदी में था... चूचियों की विशालता के कारण अब उसे महारानी का चेहरा भी नजर नही आ रहा था.. महारानी अपनी उँगलियाँ शक्तिसिंह के बालों में फेरने लगी... वह इस वात्सल्य का अर्थ समझ नही पा रहा था..

धीरे से महारानी ने अपनी एक निप्पल को पकड़कर दबाया.. और सफेद रंग की पिचकारी ने शक्तिसिंह के चेहरे को भिगो दिया.. अब उसे समझ में आया की महारानी किस तरीके से उसे तरोताजा करने वाली थी... शक्तिसिंह को यह बेहद अजीब और अटपटा सा लग रहा था पर इस नए अनुभव की अपेक्षा से उसका लंड तनकर धोती में खड़ा हो गया था और वह उसे छिपाने की कोशिश भी नही कर रहा था..

अपनी दो उंगलियों के बीच निप्पल को दबाकर वह अपने दाहिने स्तन को शक्तिसिंह के मुख के करीब ले गई.. फिर अपनी निप्पल को शक्तिसिंह के होंठों पर दबाकर उसकी आँखों में देखने लगी... महारानी की आँखों में देखते हुए शक्तिसिंह ने अपने होंठ खोले... और तुरंत निप्पल का स्वीकार किया... उसके मुख में गरम तरल मीठे पदार्थ की जैसे रसधार सी गिरने लगी... पुच पुच की आवाज करते हुए वह महारानी के थनों से दूध पीने लगा... दुग्धपान करते करते वह दोनों हथेलियों से उनके स्तनों को सहला भी रहा था..

शक्तिसिंह की चुसाई के कारण महारानी को अनहद आनंद मिल रहा था... वह आँखें बंद कर इस स्वर्गीय एहसास का मज़ा लेने लगी.. वह उत्तेजनावश अपनी दूसरी निप्पल को मरोड़ने लगी.. और उस निप्पल से दूध की धार निकलकर शक्तिसिंह के ललाट पर गिरने लगी...

शक्तिसिंह को अपने सिर के नीचे महारानी की चुत की गर्मी का एहसास भी हो रहा था... इस अनूठे अनुभव के कारण वह भी अत्यंत उत्तेजित हो चुका था.. कुछ ही मिनटों में चूस चूसकर उसने महारानी के एक स्तन का दूध खाली कर दिया... जैसे ही उसने मुंह से निप्पल छोड़ी की तुरंत महारानी ने उसे दूसरी निप्पल दे दी... चूस चूसकर उस स्तन से भी वह निपट लिया..

संसर्ग को अब दूसरे चरण में ले जाने के लिए वस्त्र उतारने की आवश्यकता थी... महारानी की गोद से उठकर अब वह बैठ गया... महारानी ने बैठे बैठे ही अपने घाघरे के नाड़े को खोल दिया.. और अपनी साड़ी भी उतार फेंकी... इस दौरान शक्तिसिंह भी अपने वस्त्र त्याग चुका था।

अब शक्तिसिंह महारानी के समीप आकर बैठ गया और धीरे धीरे उनके नंगे बदन को छूने लगा। महारानी को मीठी मीठी गुदगुदी होने लगी.. इस गुदगुदी का असर उनकी चुत पर भी पड़ रहा था। झनझनाहट उनके शरीर में रह रह कर कंपन पैदा कर रही थी। शक्तिसिंह ने धीरे से.. एकदम हल्के हाथों से उनके दूसरे नंगे मम्मे को छुआ.. एक सिहरन सी दौड़ पड़ी जिसने महारानी के शरीर को झकझोर के रख दिया।

महारानी ने अपनी आँखें खोलते हुए कहा.. "शक्तिसिंह, तुम्हारी ये हल्की हल्की छुअन कभी मेरी जान ही ले लेगी.. उफ्फ़फफ... सहन नही होता.. पूरे जिस्म में सनसनाहट होने लगती है... एक स्त्री को कैसे और कहाँ छूना चाहिए, यह तो कोई तुमसे सीखे..."

शक्तिसिंह का लिंग पूरी तरह उत्तेजित हो कर तन गया। उसने अपने हाथ में लेकर लंड को सहलाते हुए अपना सिर फिरसे महारानी की गोद में रख लिया और बड़े ही धीमे धीमे उनके स्तनों को चूसने लगा... एक बार की चुसाई से उसका मन ही नही भरा था.. उसके मुंह का स्पर्श महारानी की दूध से भरी बिटकनियों पर मात्र एक हल्की सी छुअन और हल्की सी चुसाई भर से ही महारानी के शरीर में नए सिरे से कंपन चलने लगे। वह तड़प उठी, उनके लिए अब यह असहनीय था, वह चाहती थी की शक्तिसिंह उनकी निप्पलों को फिर से पूरी तरह अपने मुंह में भर कर चूसे। लेकिन शक्तिसिंह को अब तरसाने में महारथ हासिल हो गई थी। इस तरह वह महारानी को उकसाकर संभोग के लिए अधिक उत्तेजित कर रहा था।

महारानी ने अपने होंठ शक्तिसिंह के होंठों पर रख दिए और हल्के हल्के चूमने लगी। उस चुंबन से शक्तिसिंह तुरंत मुक्त हो गया और दोबारा उसने अपना ध्यान उन रसभरी चूचियों पर केंद्रित किया। महारानी के स्तनों को अपने मुंह में पूरी तरह भरकर उनकी निपल पर अपनी जीभ से गोलाकार बनाते हुए धीरे धीरे हर भाग को चूसने लगा। निप्पल को जीभ और डाँट के बीच में दबाकर हल्के से काटने लगा.. महारानी की आँखें फिर से बांध हो गई। उनकी चुत अब गीली होने लागि। शक्तिसिंह अपने लंड को सहलाने लगा और धीरे धीरे मसलते हुए उसको आगे पीछे हिलाने लगा।

महारानी ने अपनी गोद को फैलाते हुए अपनी जांघों के बीच जगह बनाई और फिर अपनी चुत में उंगली डाल कर अपने आप को मजे देने लगी। तभी अचानक नगाड़े बजने की आवाज आई... यह इस बात का संकेत था की अभ्यास का दूसरा चरण थोड़ी ही देर में शुरू होने वाला था।

महारानी अब टांगें फैलाए बिस्तर पर लेट गई और शक्तिसिंह उनकी गोद से खड़ा हो गया.. वह अब महारानी पर सवार हो गया और उनकी दूध भरी चूचियों के बीच अपने सख्त लंड को टिकाकर रगड़ने लगा.. शक्तिसिंह के लंड को अपने स्तनों से टकरा टकरा कर उसका मूठ मारना और अपनी निप्पल से उसके सुपाड़े को आड़ा कर रगड़ने में महारानी को बड़ा मज़ा आ रहा था। शक्तिसिंह अपने कड़े लंड को हथेली में पकड़ कर जैसे महारानी के स्तनों को एक एक कर लंड से दायें बायें कर हिला रहा था।

महारानी ने अपने हाथ से शक्तिसिंह के अंडकोशों को पकड़ लिया और उसकी नरम नरम थैलियों के बीच में मसलने लगी। वह कभी एक उंगली से धीरे धीरे अंडकोश को सहलाती तो कभी अपनी उंगलियों के बीच सिर्फ उसकी त्वचा को लेकर मसलती, तो कभी अपनी मुठ्ठी में दोनों आँड़ों को लेकर भींच लेती। शक्तिसिंह की तो झुरझुरी सी छूटने लगी थी.. अंडकोशों को अंदर उसका वीर्य बाहर निकलने के लिए उछल रहा था।

दो चार झोर के झटके महारानी के मम्मों पर मारते हुए शक्तिसिंह का शरीर अकड़ने लगा, होंठ टेढ़े हो गए और चरम सुख की प्राप्ति की स्वर्गीय अनुभूति को ज्यादा से ज्यादा लंबे समय तक महसूस करने के लिए, उसने अपने शरीर में एक कसाव सा पैदा किया, लेकिन फुस्ससससस... एक तेज पिचकारी की धार, गरमागरम लस्सेदार वीर्य, महारानी के स्तनों और मुंह पर छिड़क गया... उसका लंड और भी पिचकारियाँ मारता उससे पहले ही, महारानी ने शक्तिसिंह का लंड अपने मुंह में ले कर उसका बाकी वीर्य चूस लिया..

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दो चार झोर के झटके महारानी के मम्मों पर मारते हुए शक्तिसिंह का शरीर अकड़ने लगा, होंठ टेढ़े हो गए और चरम सुख की प्राप्ति की स्वर्गीय अनुभूति को ज्यादा से ज्यादा लंबे समय तक महसूस करने के लिए, उसने अपने शरीर में एक कसाव सा पैदा किया, लेकिन फुस्ससससस... एक तेज पिचकारी की धार की तरह, गरमागरम लस्सेदार वीर्य, महारानी के स्तनों और मुंह पर छिड़क गया... उसका लंड और भी पिचकारियाँ मारता उससे पहले ही, महारानी ने शक्तिसिंह का लंड अपने मुंह में ले कर उसका बाकी वीर्य चूस लिया..

शक्तिसिंह के लंड का वीर्य पूर्णतः चूसने के बाद भी महारानी ने चूसना जारी रखा... उद्देश्य स्पष्ट था.. अभी उनकी चुत की प्यास कहाँ बुझी थी..!! लंड चूसते हुए महारानी ने अपने गोरे चिकने हाथों को शक्तिसिंह की मर्दाना पीठ पर फेरना शुरू कर दिया। साँसे तेज होने लगी। स्तनों पर दबाव पड़ने से बीच बीच में दूध की धराएं निकलकर स्तनों की दोनों ओर बहती जा रही थी।

महारानी के मुंह का लसलसित गरमागरम स्पर्श, आँड़ों के नीचे दबी उनकी गोलमटोल चूचियों की छुअन, शक्तिसिंह का लंड अब फिर से सख्ती धारण करने लगा.. महारानी की चुत तो कब से गीली हो रखी थी...पानी की द्रव्यता का एहसास उनके गुप्तांग में खलबली मचा रहा था.. और अब शक्तिसिंह का लंड भी फिर से नई उचाई प्राप्त कर चुका था।

शक्तिसिंह ने अपना लंड महारानी के मुंह से बाहर निकाला और अब अपना पूरा शरीर सटाकर उनके बगल में लेट गया। उसका लंड फनफनाते हुए निचले चुतनुमा द्वार में प्रवेश करने के लिए व्याकुल था। शरीर के गरम होने से जो ऊर्जा पैदा हो रही थी वह खिड़की के रास्ते आती ठंडी हवा के साथ दोनों शरीरों को ठंडा और शीतल कर रही थी। रह रह क दोनों एक दूसरे को भींच रहे थे और कोशिश कर रहे थे की उनके जिस्म जो एक दूसरे से पूरी तरह से सटे हुए थे उनको और ज्यादा आपस में सटा दे। मानो एक दूसरे के अंदर ही प्रवेश हो जाए और दो बदन एक जान की बजाए दो जान एक बदन हो जाए।

एक दूसरे की मादकता और कामुकता में ऐसी कशिश थी की मानों यह दोनों जिस्म एक दूसरे से संभोग करने के लिए इस धरती पर अवतरित हुए हो!! होंठ सूखने लगे थे, गला अवरुद्ध हो रहा था... अपनी पीठ पर हल्का मखमली एहसास जो कभी कभी नितंबों तक पहुँच जाता था वह शक्तिसिंह को मदहोशी की चरमसीमा का एहसास करवाता था।

शक्तिसिंह ने अब एक भूखे भेड़िये की तरह महारानी की गर्दन और कान के पीछे चूमना और चाटना शुरू कर दिया। वह सिसकारियाँ भरने लगी और उनका शरीर एक नागिन की तरह अकड़ने और लोटने लगा.. जैसे ही कान का निचला हिस्सा मुंह में कैद हुआ तो महारानी के मुख से हल्की सी आह निकल गई। गर्दन से नीचे जाते हुए दो सुंदर बड़े मम्मों के ऊपरी छोर पर शक्तिसिंह के होंठ अपना चमत्कार दिखाने लगे।

महारानी की चूचियों से दूध चूसते हुए और कुछ मिनटों दोनों पहाड़ियों का रसपान करते हुए अब वह उनकी नाभि तक पहुँच गया। नाभि की गहरी खाई को चूमकर उसने जीभ को उस छिद्र में घुमाना शुरू किया। सिसकारियों की गूंज पूरे कमरे में सुनाई दे रही थी। अब उसने नाभि के आसपास के कमर के हिस्से को जैसे ही चूमना शुरू किया की नागिन के रेंगने की गति बहुत तेज हो गई।

जैसे ही जीभ का स्पर्श नाभि के नीचे कमर के पास होता तो जैसे वह बर्दाश्त ही नही कर पाती और शक्तिसिंह के सिर के बालों को जोर से पकड़ कर, मानों न चाहते हुए हटाना चाहती थी। लेकिन इतना मज़ा आ रहा था की खुद ही फिर से उसके सिर को अपने शरीर से दबा लेती। चुत के ऊपर के हल्के रेशमी बालों पर जीभ फेरते हुए वह उन्हे भिगो रहा था। महारानी ने अपनी दोनों टांगों को उठाकर शक्तिसिंह की कमर के ऊपर एक फंडा बना दिया और अपने दोनों पाँवों को उसकी कमर के पीछे जोड़ दिया।

अब महारानी की चुत इतनी गीली हो चुकी थी की नारी-रस की कुछ बूंदें बाहर के होंठों पर दिखाई देने लगी थी। शक्तिसिंह के होंठ जैसे ही फुली हुई दोनों गुलाबी पंखुड़ियों पर पड़े की उनके मुंह से "आह्हहहहहह" का उदगार निकल गया। शक्तिसिंह ने महारानी के बुर की फाँकों को चूस चूस कर इतना मस्त कर दिया की फिजा में गंगा-यमुना बहने लगी।

महारानी के दाने पर जैसे ही शक्तिसिंह की जीभ टकराई, "मैं मर जाऊँगी... हाययय... ईशशशश... आहहह.. " की आवाज़े उनके मुंह से निकलती ही रही। शक्तिसिंह ने अपने दांतों के बीच भींचते हुए बड़े प्रेम से दाने को हल्का सा काटा तो महारानी के सब्र का बांध टूट गया...

झर्झराती, अटखेलियाँ करती स्त्री-वीर्य की नदी सी बहने लगी.. शरीर अकड़ कर मानों सिकुड़ सा गया और भूकंप से झटके खाने लगा.. कपकपाते हुए शरीर ने दर्जनों झूले झूल लिए और रह रह कर महारानी कराहते हुए झड़ गई.. शक्तिसिंह ऐसे उनकी चुत का रस चाट रहा था जैसे बिल्ली बर्तन से दूध चाट रही हो..

महारानी की चुत को पूर्णतः साफ कर तृप्त होकर शक्तिसिंह ऊपर उठा... स्खलन से थकी हुई पर मुसकुराती महारानी ने आँखों से ही, अगले चरण को शुरू करने का न्योता दिया.. जैसे इसी संकेत का इंतज़ार कर रहा हो वैसे शक्तिसिंह ने महारानी की दोनों जंघाओं को पकड़ा और अपने पैर के ऊपर सटाकर अपने लंड को बिल्कुल उनकी चुत के सामने लाकर रख दिया..

लंड को चिकना करने की कोई आवश्यकता नही थी... महारानी की चुत ऐसे पानी छोड़ रही थी जैसे बांध से पानी को छोड़ा जा रहा हो..!! जैसे ही उसने अपने सुपाड़े को महारानी की चुत के गुलाबी होंठों के बीच रखा, उन्होंने खुद ही अपने चूतड़ उठाकर एक मजबूत झटका लगाया और शक्तिसिंह का आधे से ज्यादा लंड उनकी लसलसित चुत के अंदर घुस गया..!!

महारानी की दोनों टांगों को अपने कंधे पर जमाकर शक्तिसिंह ने धक्के लगाने का दौर शुरू कर दिया। महारानी की योनि के गिलेपन की वजह से उसका लंड छपाक छपाक की आवाज़े करता हुआ चुत की गहराइयों को नापने लगा। नाचती उछलती हुई चूचियों को हाथों से दबोच दबोच कर शक्तिसिंह मजबूत धक्के लगाने लगा.. महारानी की उछलकूद बहुत तेज हो गई थी। वह लंड को अपने भीतर चुत की दीवारों की मांसपेशियों से भींचते हुए जोर जोर से निचोड़ने और दबाने लगी। अपने लंड की ऐसी मरम्मत पाकर शक्तिसिंह भी धन्य हो रहा था।

महारानी के शरीर में सैलाब सा उमड़ रहा था। संभोग का हर धक्का उनके शरीर को ऊपर से नीचे तक झकझोर कर रख देता.. प्रत्येक धक्के के साथ उनके पेट की चर्बी बड़ी ही मादकता से थिरक रही थी। शक्तिसिंह के धक्कों का वह माकूल जवाब दे रही थी... अपने चूतड़ उछाल उछाल कर...!!

शक्तिसिंह अब महारानी के शरीर पर झुककर प्रायः उनके स्तनों तक पहुँच गया... और अपना प्रिय दुग्धपान करने लगा... साथ ही साथ उसने महारानी के सख्त दाने को रगड़ना शुरू कर दिया.. इस तीन तरफा हमले के सामने महारानी और टीक नही पाई... बल खाता हुआ उनका शरीर बुरी तरह से अकड़कर हांफने लगा... शक्तिसिंह की पीठ पर अपने नाखूनों से खरोंचती हुई वह जोर से चीखी... और पराकाष्ठा तक पहुँच गई...

शक्तिसिंह भी अपनी मंजिल की ओर अग्रेसर था और उसने धमाधम धक्के लगाते हुए महारानी की चुत में अपने उपजाऊ वीर्य का अभिषेक कर दिया... हर धक्के के साथ पिचकारी महारानी की बच्चेदानी के मुख पर जाकर टकरा रही थी... करीब आठ दस ऐसे धक्के लगाने के बाद वह पस्त हो गया और महारानी के बाजू में लाश की तरह गिर गया... दोनों की स्थिति ऐसी थी जैसे मल्लयुद्ध करके लौटे हो!!

अपने स्खलन से उभरकर महारानी लैटे लैटे शक्तिसिंह की ओर मुड़ी.. और उसके सिर के बालों में अपने हाथ फेरने लगी। दो बार चरमसीमा पर पहुंचकर वह थक चुका था... और आँखें बंद कर वह अपनी सांसें नियंत्रित होने का इंतज़ार कर रहा था... थोड़ी देर बाद उसने अपनी आँखें खोली और महारानी के सामने देखकर मुस्कुराया..

"मुझे अब चलना चाहिए... काफी देर हो गई... " शक्तिसिंह ने उठकर अपने वस्त्रों की ओर हाथ बढ़ाएं

"इतनी जल्दी!! थोड़ी देर और रुक जाओ... इतने समय बाद मिले हो.. मुझे मन भरकर देखने तो दो तुम्हें" बड़े ही प्यार से महारानी ने कहा

"महारानी जी, तालिम पूरे जोर से चल रही है, कल सुबह तो हमे सैन्य के साथ शौर्यगढ़ के लिए निकलना है... बहुत सारी तैयारियां अभी बाकी है.. मेरा दल मेरा इंतज़ार कर रहा होगा.. कृपया मुझे जाने की अनुमति दे" शक्तिसिंह ने विनती करते हुए कहा

"नहीं शक्तिसिंह... में तुम्हें नही जाने दूँगी... थोड़ी देर ओर रुक जाओ" महारानी ने नैन मटकाते हुए कहा

महारानी के इस प्यार भरे न्योते को शक्तिसिंह मना न कर पाया... वह फिरसे उनकी बगल में लेट गया और अपनी हथेली से महारानी के सुंदर चेहरे को सहलाने लगा...

"मेरी छातियों में फिर से दूध भर गया है... पी लो थोड़ा सा.. मेरा बोझ हल्का हो जाएगा" शैतानी मुस्कुराहट के साथ महारानी ने कहा

इसके लिए शक्तिसिंह को किसी आमंत्रण की जरूरत नही थी। वह महारानी के बगल में ही लेटे हुए थोड़ा सा नीचे की तरफ आ गया, इस तरह की महारानी की चुची बिल्कुल उसके मुंह के सामने आ जाए... करवट लेकर सोई महारानी की पहाड़ जैसी चूचियाँ थोड़ा सा ढह गई थी। श्वेत स्तनों पर गुलाबी निप्पलें बेहद सुंदर दिख रही थी!! दूध के भराव के कारण निप्पल पर सफेद बूंदें उमड़ आई थी...

अब उसने दाहिनी निप्पल को अपने मुंह में लिए और बच-बच चटकारे लेते हुए चूसने लगा.. महारानी से मिलने से लेकर अब तक वह काफी मात्रा में उनका दूध चूस चुका था फिर भी उसका मन नही भर रहा था.. पीते पीते वह दाईं और के स्तन को हथेली से गोल गोल घुमाते हुए मसल रहा था। महारानी की हथेलियों ने शक्तिसिंह के लंड को ढूंढ निकाला और उसे मुरछावस्था से बाहर निकालने की भरसक कोशिश करने लगी। दो स्खलन के बाद वह बेजान मुर्दे की तरह शक्तिसिंह की जांघों पर आराम कर रहा था।

महारानी ने अब लेटे लेटे ही अपनी चुत के मांसल हिस्से को शक्तिसिंह के लंड पर रगड़ना शुरू किया.. कुछ समय तक तो उसके हथियार ने जीवंत होने के कोई आसार नही दिए पर धीरे धीरे हरकत में आने लगा... जैसे बेहोश व्यक्ति प्याज सूंघते ही होश में आ जाता है वैसे ही शक्तिसिंह का लंड महारानी की चुत की गंध सूंघते हुए अंगड़ाई लेकर खड़ा होने की तैयारी करने लगा था...

मुंह में लिए स्तन का सारा दूध चूस लेने के बाद शक्तिसिंह ने दूसरी चुची को गिरफ्त में लिया... दूध पीने से ताकत आती है यह तो हम सदियों से सुनते आ रहे है... इसका जीवंत उदाहरण यहाँ नजर आ रहा था.. शक्तिसिंह का लंड अब सख्त रूप धारण कर रहा था... और महारानी की चुत को दोबारा से भेदने के लिए तैयार हो गया था...

शक्तिसिंह ने अपने हाथ से महारानी के भगोष्ठ को मलना शुरू कर दिया... दो बार झड़ चुकी महारानी का दाना, अंगूर जितना बड़ा और चिपचिपा सा था... उसके छूने भर से ही महारानी कराहने लगी.. एक तरफ निप्पल की चुसाई और दूसरी तरफ क्लिटोरिस की रगड़न.. शक्तिसिंह ने देखा की महारानी अब धीरे धीरे बेकाबू होती जा रही थी...

उसने अपने एक हाथ को महारानी की दोनों जांघों के बीच डाल और उन्हे फैलाने की कोशिश की.. ताकि वह वापिस उनकी यौन गुफा में लिंग प्रवेश करने की तैयारी कर सके... पर महारानी ने अपनी जांघें खोली ही नही... इस पर अचंभित होकर जब शक्तिसिंह ने महारानी की और देखा तो वह हौले हौले मुस्कुराने लगी..

शक्तिसिंह का लंड अब तन्ना गया था... उस राक्षस की तरह जो जागने पर शिकार माँगता है... वह महारानी के शरीर के ऊपर सवार होने गया तो महारानी ने उसे रोक लिया.. वह समझ नही पा रहा था की वह आखिर क्या चाहती थी!! अगर फिर से चुदवाना नही था तो लंड को जागृत क्यों किया!!

इस पहेली का उत्तर उसे तब मिल जब महारानी करवट लेकर पेट के बल टांगें फैलाकर लेट गई.. शक्तिसिंह के जड़ दिमाग में अचानक बत्ती जल गई.. उसके चेहरे पर कुटिल मुस्कान आ गई.. वह अब धीरे से महारानी के चूतड़ों के दोनों तरफ घुटने टेक कर सवार हो गया... अपनी हथेलियों से वह महारानी के मदमस्त चरबीदार कूल्हों को गोल गोल सहलाने लगा.. फिर धीरे से उसने चूतड़ों को फैलाया और उनके बादामी रंग के गांड के छिद्र को उजागर किया।

आखिरी बार महारानी की गांड मारे हुए काफी समय बीत चुका था.. शक्तिसिंह तय नही कर पा रहा था की वापिस वह उसका लंड अपने छेद में बर्दाश्त कर पाएगी या नही... पर जब महारानी ने ही पहल की थी फिर उसके लिए पीछे हटने का कोई सवाल ही पैदा नही होता था..

सबसे बड़ी दिक्कत यह थी की यहाँ तेल या तो और कोई चीकना पदार्थ उपलब्ध नही था जिससे की वो महारानी की गांड को लसलसित कर सके.. अपनी मुंह की लार के अलावा ओर किया जरिया उसके दिमाग में नही आया इसलिए उसने वही इस्तेमाल करने का निश्चय किया...

पहले तो उसने विपुल मात्र में लार से अपने लंड को पूर्णतः गीला कर दिया... और फिर हथेली में लार लेकर उसने महारानी के छेद को रोग़न लगाया... अब लंड को छेद पर रखके उसने बड़ी ही बेरहमी से एक ही झटके में पूरा लंड अंदर दे मारा...

"हाये दइयाँ... मर गई... ऊईईई माँ... " महारानी के कंठ से चीख निकल गई

दोनों हाथों को बिस्तर पर टिकाकर उन्होंने अपने जिस्म के ऊपरी हिस्से को उठा लिया.. दर्द के मारे वह अपने छेद की मांसपेशियों को शक्तिसिंह के लंड के आकर के साथ अनुकूलित करने का प्रयास करने लगी ताकि दर्द की मात्रा कम हो जाए...

"थोडी क्षणों तक यूं ही लेटे रहिए महारानी जी, अभी दर्द कम हो जाएगा" ढाढ़स बांधते हुए शक्तिसिंह ने कहा

महारानी वापिस बिस्तर पर लेटकर दर्द कम होने का इंतज़ार करने लगी.. पर कसे हुए छेद में घुसाने के बाद शक्तिसिंह की धीरज न रही.. उसने हल्के हल्के धक्के लगाने शुरू कर दिए..

"अरे थोड़ा सा रुको भी... शुरू हो गए तुम तो... " महारानी ने कराहते हुए कहा

"थोड़ा सा आगे पीछे करूंगा तो आपका शरीर मेरे लिंग के आकार से अभ्यस्त हो जाएगा... फिर कष्ट नही होगा" शक्तिसिंह जानता था की कितना भी इंतज़ार कर ले दर्द तो होने ही वाला था... दर्द को सिर्फ अधिक आनंद से कम किया जा सकता था.. और वह आनंद तभी मिलता अगर घर्षण शुरू हो जाए... इसके अतिरिक्त महारानी के अंगों को भी उकसाना आवश्यक था ताकि वह पूर्णतः सहयोग दे सके..

उसने बिस्तर और महारानी के बीच फंसे दोनों स्तनों को दबोचना शुरू कर दिया.. हर बार दबाने पर स्तनों से दूध की पिचकारी निकलती.. स्तनों के इर्दगिर्द दूध गिरने से बिस्तर पर दो धब्बे बन गए थे...

महारानी अब सिहरने लगी.. दर्द तो हो रहा था पर शक्तिसिंह के संसर्ग के आनंद ने उस दर्द से उभरने में काफी मदद मिली। शक्तिसिंह के हर धक्के पर उनके गोलमटोल कूल्हे पिचक जाते.. और लंड बाहर की तरफ जाते ही फिर से उभर आते...

फिर से एक बार नगाड़े बजने की आवाज सुनाई दी.. तालिम के दो चरण खतम हो चुके थे और तीसरा शुरू होने की तैयारी स्वरूप नगाड़ा बज रहा था.. शक्तिसिंह ने धक्कों की गति बढ़ाई... पर ज्यादा तीव्र धक्के लगाने पर महारानी सह नही पा रही थी... इसलिए अब वह ना ही धीरे, ना ही तेज, ऐसे धक्के लगाते हुए अनुकूलतम संतुलन साधने का प्रयत्न कर रहा था..

महारानी के कूल्हों पसीने से तर हो गए थे.. शक्तिसिंह ने धक्के लगा लगा कर उनके बादामी छिद्र को लाल कर दिया था... उनका छिद्र अपनी पराकाष्ठा तक चौड़ा हो चुका था... दो जांघों के बीच नजर आ रही चुत के रस से उनके झांट गीले हो चुके थे... दो बार वीर्य-स्खलन कर चुके शक्तिसिंह को चरमसीमा पर पहुँचने का रास्ता थोड़ा कठिन लग रहा था...

आखिरकार तेज धक्कों से महारानी की कसी हुई गांड में शक्तिसिंह के लंड ने वीर्य-विसर्जित कर दिया... आखिरी ५-६ धक्के लगाकर वह उनकी पीठ पर ढेर हो गया... थकान, उत्तेजना और दर्द के कारण महारानी लगभग मूर्छित अवस्था में चली गई...

सांसें सामान्य होने पर शक्तिसिंह ने महारानी के चूतड़ों के बीच से अपने लंड को बाहर निकाला और बगल में लेट गया... अब वह और आराम कर सके ऐसी स्थिति में न था.. उसने तुरंत कपड़े पहने और चुपके से पुराने महल के बाहर निकल। किसी की नजर न पड़े इसलिए वह झाड़ियों के रास्ते होते हुए तालीमशाला पहुँच गया...

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सूरजगढ़ की दूसरी सुबह जबरदस्त चहल-पहल से भरी थी... २००० सैनिकों की फौज तैयार खड़ी राजमाता के आदेश का इंतज़ार कर रही थी जिसमे ५० हाथी और १००० अश्व भी सामील थे.. वाध्यवादक दुंदुभि और युद्धबिगुल बजाते हुए सबका होसला बढ़ा रहे थे.. घोड़ों की हिनहिनाहट और हाथियों की तुरही से वातावरण गूंज रहा था.. सारे प्रजाजन इकठ्ठा होकर अपनी फौज को विदा करने आए थे..

सब से आगे दो हाथी पर सवार सैनिकों से दस्ते की शुरुआत हुई.. तीसरे हाथी की पालखी पर राजमाता बिराजमान थी.. हाथियों के पीछे अश्वदल चला आ रहा था जिसकी अगुवाई शक्तिसिंह कर रहा था.. बड़ी ही खुमारी के साथ, एक हाथ में भाला और दूसरे हाथ में सूरजगढ़ का ध्वज लिए वह काले अश्व पर सवार होकर अपने दल का नेतृत्व कर रहा था... घोड़ों की शृंखला के पीछे पैदल सेना और जरूरी हथियार और सामान का दस्ता था...

थोड़ी ही दे में यह दस्ता सूरजगढ़ के मुख्यद्वार से होकर बाहर निकला... और आधे घंटे में वह क्षितिज पर ओजल हो गया.. उनके विजयी होकर लौटने की प्रार्थना करते हुए सारे प्रजाजन घर लौट गए.. गढ़ के ऊंचे मिनारे पर बैठे यह नजारा देख रहे महाराज कमलसिंह ने चैन की सांस ली.. अब वह फिरसे अपने चुदाई के कार्यक्रम को आरंभ कर सकते थे। उन्हे और किसी चीज में कोई दिलचस्पी नही थी... हाँ, चन्दा जरूर सेना के साथ चली गई थी पर उसका स्थान लेने के लिए उनके पास अनेक विकल्प मौजूद थे।

सूरजगढ़ से शौर्यगढ़ का रास्ता दो दिन का था... पहला दिन ढलते ही सुरक्षित पड़ाव पर छावनी स्थापित कर दी गई.. सेनापति भी युद्धभूमि से आधे रास्ते राजमाता का स्वागत करने आ पहुचे थे..

रात के अंधकार ने समग्र वन को अपने आगोश में भर लिया था। चारों और मशाले जलाई गई थी। भोजन के पश्चात शक्तिसिंह टहलते हुए तंबुओं से काफी दूर एक पत्थर पर जा बैठा.. यह वह वक्त था जब वो राजमाता के कक्ष में जाकर उनके साथ भरसक ठुकाई करता था... पर आज राजमाता और सेनापति के बीच युद्ध की रणनीति के बारे में विचार-विमर्श का दौर चल रहा था..

यहाँ शिकार का समय होते ही शक्तिसिंह का लंड जागृत हो गया... ठंडी हवा चल रही थी और पत्थर पर लैटे शक्तिसिंह का लंड उसकी धोती में तंबू का आकार बनाकर खड़ा हो गया... अब शक्तिसिंह अपने लंड को कैसे समझाए भला!! अपने हथियार की उग्रता को शांत करने के लिए वह धोती के ऊपर से ही अपने लंड को पकड़कर हिलाने लगा... जंगल के इस खुले माहोल में, ठंडी हवा और शीतल चाँदनी की छाँव में शक्तिसिंह को अपना लंड हिलाने में अति आनंद प्राप्त हो रहा था...

तभी पीछे से किसी की ठहाका लगाकर हंसने की आवाज आई... घबराहट में शक्तिसिंह से अपना लंड छूट गया और वह पत्थर पर उठ खड़ा होकर पीछे देखने लगा... सुरक्षा के लिए गश्त लगाती चन्दा को देखकर वह शर्मा गया... हँसते हँसते चन्दा उसके करीब आ गई..

"क्यों रे शक्ति, तलवार की बजाए ये किस चीज की धार निकाल रहा है तू?" उसकी चुटकी लेते हुए चन्दा ने कहा

"अरे चन्दा तुम... इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हो?" बेवकूफों वाला सवाल पूछा शक्तिसिंह ने.. दिमाग काम नही कर रहा था उसका

"मुझे जो काम सौंपा गया है वही कर रही हूँ... सोच रही हूँ तुम्हें किसने ऐसा काम सौंप दिया?" वह फिर से हंसने लगी..

"बस बस... ज्यादा हंस मत.. वरना एक झटके में तेरी सारी हंसी निकाल दूंगा" शक्तिसिंह गुर्राया

"हाथ लगाकर तो देख... एक ही बार में तुझे उठाकर पटक न दिया तो मेरा भी नाम चन्दा नही" चन्दा ने छाती चौड़ी कर शक्तिसिंह को ललकार दिया... बात भी सही थी.. चन्दा की कदकाठी और बलिष्ठ शरीर शक्तिसिंह को पटक देने जितना सशक्त था.. यह बात शक्तिसिंह भी जानता था

"लगता है आज तेरी तलवार को राजमाता की म्यान नसीब नही हुई है" आँखें छोटी कर चन्दा ने हथोड़ा मार दिया

शक्तिसिंह के पैरों तले से जमीन सरक गई... चन्दा को यह कैसे मालूम चला!! यह बात राजमाता, महारानी और उसके अलावा केवल विद्याधर ही जानता था.. कहीं विद्याधर ने तो उसे नही बता दिया?? कहीं चन्दा और विद्याधर भी... !!! शक्तिसिंह का दिमाग चकराने लगा

"लगता है तुम्हें कोई भ्रम हुआ है... राजमाता के बारे में ऐसी ऊटपटाँग बातें करते हुए शर्म नही आती?" अपने जुर्म को छुपाने की कोशिश करने लगा शक्तिसिंह

"अब ज्यादा बन मत तू... मैंने कई बार तुझे रात को राजमाता के कक्ष में जाते हुए देखा है... और उनकी खिड़की पर कान लगाकर सुना भी है.. आवाजों से तो प्रतीत हो रहा था की राजमाता को बड़े अच्छे तरीके से संतुष्ट करता होगा.. " शरारती नज़रों के साथ चन्दा ने कहा

"चुप कर.. और धीरे से बोल.. सैन्य के साथ यहाँ गुप्तचर का दस्ता भी मौजूद है, तेरी मुंहफट लापरवाही के चक्कर में, मैं मारा जाऊंगा" अब छुपाने का कोई अर्थ नही था... चन्दा के पास पर्याप्त प्रमाण थे।

"ठीक है, ठीक है... चिंता मत कर, मैं किसी को नही बताऊँगी... अगर बताना होता तो अब तक सूरजगढ़ की गलियों के कुत्ते भी यह बात जान गए होते" चन्दा ने कहा

शक्तिसिंह की जान में जान आई.. उसकी साँसे अब नियंत्रित हो गई.. वह वापिस उस पत्थर पर जा बैठा.. चन्दा भी उसके बगल में आकर बैठ गई।

"बेचारा... मेरे डर के कारण बैठ गया" शक्तिसिंह के लंड का मज़ाक उड़ाते हुए चन्दा ने उसकी धोती की ओर इशारा करते हुए कहा

"तू बाज नही आने वाली... रुक.. तुझे अभी दिखाता हूँ.. " कहते ही शक्तिसिंह ने चन्दा को पत्थर पर गिरा दिया और उसके दोनों कंधों को हाथों से दबाकर उसपर सवार हो गया...

"बड़ी हंसी आती है ना तुझे... अब हंस ना... हँसती क्यों नही.. " चन्दा पर अस्थायी विजय प्राप्त कर शक्तिसिंह बोला

जवाब में चन्दा गुर्राई... और शक्तिसिंह को जोर से धक्का दिया.. अपना संतुलन गँवाकर शक्तिसिंह जमीन पर गिर गया.. चारों खाने चित्त.. !! वह संभलता उससे पहले चीते की तरह झपटकर चन्दा उसकी छाती पर बैठ गई.. और उसके दोनों हाथों को जमीन पर दबा दिया..

शक्तिसिंह पड़े पड़े सोच रहा था.. यह कोई उसकी दुश्मन तो थी नही.. यह केवल एक मैत्रीपूर्ण द्वंद था.. फिर क्यों बेकार में ऊर्जा को जाया किया जाए!! वह उसी अवस्था में पड़ा रहा.. और प्रतिरोध करने का जरा भी प्रयास नही किया...

"क्या बात है चन्दा... बड़ा जोश है तुझमें... " शक्तिसिंह शरारत करने लगा। चन्दा अभी भी हांफ रही थी.. और उसके ललाट पर पसीने की बूंदें जम गई थी...

"अब उठ के दिखा... ताकत नही है क्या... या सिर्फ सारी ताकत तेरे हथियार को उठाने में ही खर्च हो जाती है तेरी!! " मुसकुराते हुए चन्दा ने कहा

इतनी आक्रामक स्त्री का यह पहला अनुभव था शक्तिसिंह का... शारीरिक रूप से कोई भी व्यक्ति उस पर इस हद तक हावी कभी नही हुआ था.. शक्तिसिंह की छाती के दोनों तरफ चन्दा की खुली पुष्ट जांघें जमी हुई थी.. उसका सपाट पेट और उस पर दिख रही मांसपेशियाँ चन्दा के बलिष्ठ होने का प्रमाण दे रही थी.. चूचियाँ तो कवच तले दबी हुई थी फिर भी ध्यान से देखने पर उनका उभार साफ दिख जाता था.. लंबी पतली गर्दन और लंबी तीखी नाक वाला सांवला चेहरा... और उसपर तेजस्वी ललाट... शक्तिसिंह उसे बस देखता ही रह गया... आज से पहले कभी भी उसने चन्दा का इतनी बारीकी से निरीक्षण नही किया था

"क्या हुआ? कुछ बोलता क्यों नही" शांति से पड़े हुए शक्तिसिंह से चन्दा ने पूछा

"सोच रहा हूँ की तेरा यह कातिल हुस्न अब तक मेरी नज़रों से बच कैसे गया?" अब मुस्कुराने की बारी शक्तिसिंह की थी

शर्म से चन्दा की आँखें झुक गई... पर फिर भी उसने शक्तिसिंह के हाथों पर अपनी पकड़ बनाए रखी

"तू जल्द ही विवाह कर ले... ताकि तेरी नजर को काबू करने वाली कोई मिल जाए... " चन्दा ने कहा

"तू हाँ कहे तो अभी के अभी... इस बीहड़ जंगल में तुझसे ब्याह कर लूँ" शक्तिसिंह ने हँसते हुए कहा

यह सुनकर गुस्साई चन्दा ने अपनी पकड़ और सख्त कर दी.. छोटी सी घघरी पहनी चन्दा का वस्त्र उसकी जंघामूल तक ऊपर चढ़ गया था.. उसकी लंगोट में छुपी चुत का हिस्सा शक्तिसिंह की छाती से सटा हुआ था। वस्त्र में कैद चन्दा की चुत को इतनी नजदीक से देखकर शक्तिसिंह का लंड मचलने लगा...

"हाय री चन्दा.. तू मेरे हथियार की बात कर रही है... पर तेरी म्यान भी तो कितनी गरम हो चुकी है!!" चन्दा की चुत के तरफ आँखों से इशारा करते हुए शक्तिसिंह ने कहा

चन्दा लज्जित होकर बेध्यान बनी उसी दौरान शक्तिसिंह ने जोर लगाया और चन्दा को जमीन पर पटककर खुद उस पर सवार हो गया

"बड़ा ही निर्लज्ज है तू... " हांफते हुए चन्दा ने कहा.. वह शक्तिसिंह की पकड़ से छूटने की भरसक कोशिश कर रही थी..

"और तू बड़ी ही कटिली और उत्तेजक है चन्दा..." कहते हुए शक्तिसिंह ने नीचे झुककर उसकी गर्दन को चूम लिया..

एक पल के लिए उस चुंबन से सिहर उठी चन्दा... पहली बार उसे किसी मजबूत पुरुष ने कामावेश में चूमा था..

"छोड़ दे मुझे... " चन्दा निरर्थक प्रयत्न करती रही। शक्तिसिंह को यह प्रतीत हुआ की विरोध करने के बावजूद वह अपना पूरा जोर नही लगा रही थी.. मतलब की चन्दा को अच्छा लग रहा था!!

बिना कुछ कहें शक्तिसिंह उसकी गर्दन और कान के निचले हिस्से को चूमता ही गया... चन्दा के होंठों पर शब्दों का स्थान कराहों ने ले लिया था.. वह लंबी भारी सांसें लेती हुई उन चुंबनों का आनंद लेने लगी... प्रायः उसका जोर ना के बराबर हो गया... जैसे उसने शक्तिसिंह को समर्पण कर दिया हो

वह आँखें बंद कर अपने चेहरे को यहाँ वहाँ घुमा रही थी... जैसे शक्तिसिंह को अलग अलग जगह चूमने का न्योता दे रही हो... चूमते हुए शक्तिसिंह ने चन्दा के कवच को निकाल दिया... अंदर पहने काले तंग कपड़ों में कैद उसके सुगठित स्तनों को ऊपर से दबाने लगा... उसकी उंगलियों ने चन्दा की कड़ी निप्पलों को वस्त्र के ऊपर से ही ढूंढ लिया... और वह बारी बारी उसकी निप्पलों को मींजने लगा.. चन्दा को अब अपनी लंगोट में गिलेपन का एहसास होने लगा था...

गर्दन को चूमते हुए शक्तिसिंह थोड़ा सा नीचे आया.. और कपड़े के ऊपर से ही उसके स्तनों को चूमने लगा... चन्दा ने उस वस्त्र की गांठ खोलकर अपने दोनों कसे हुए स्तनों को मुक्त कर दिया... शक्तिसिंह ने अब तक महारानी के गोल मटोल और राजमाता के गोरे ढले हुए स्तन देखे थे.. चन्दा के स्तन उनसे बिल्कुल अलग थे... पास में पड़ी चन्दा की मशाल की रोशनी में साँवली चिकनी त्वचा में लिपटे सख्त माँस के गोले बड़े ही अद्भुत लग रहे थे... और उसपर काले रंग की निप्पल... शक्तिसिंह ने उन नुकीली निप्पलों को मुंह में भरकर तुरंत चूसना शुरू कर दिया...

चन्दा बुरी तरह छटपटाती हुई कराहने लगी... वह जमीन पर अपने पैर पटक रही थी... उसकी काली चुत में आग सी लग गई थी... शक्तिसिंह ने अब उसके दोनों हाथों को मुक्त कर दिया था... उसने अपना एक हाथ शक्तिसिंह की धोती में डाल दिया... पहले से ही खड़े लंड ने चन्दा की हथेली का बड़े ही प्यार से अभिवादन किया... चन्दा की इस गर्मी के प्रतीत होते ही शक्तिसिंह ने अपनी धोती की गांठ लेटे लेटे ही छोड़ दी... अब चन्दा ने बड़ी ही आसानी से शक्तिसिंह के मूसल को अपने हाथों में ले लिया... वह इस हथियार की लंबाई और मोटाई अनुभवित कर धन्य हो गई!!

चन्दा की चूचियों को पूरी तरह चूस लेने के बाद वह उसके पेट को चूमते हुए दो जंघाओं के बीच आ गया... चन्दा आँखें बंद कर जमीन पर सोये सिहर रही थी... शक्तिसिंह ने चन्दा की लंगोट की गांठ खोकर एक ही झटके में उसे कमर से नीचे नंगा कर दिया...

मशाल की रोशनी में चन्दा की चुत के घुँघराले बालों पर लगी नमी देखकर शक्तिसिंह खुश हो गया... वह चन्दा की चुत के करीब गया... अंदर से पसीने से मिश्रित मांसल गंध आ रही थी.. फिलहाल शक्तिसिंह इतना उत्तेजित था की इससे उसे कोई फरक नही पड़ा... उसने अपनी जीभ को चन्दा की चुत में घुसेड़ दिया... शक्तिसिंह की जीभ का स्पर्श अपनी चुत पर पाते ही चन्दा ने अपने चूतड़ उठा लिए... यह उसके लिए प्रथम और बड़ा ही अनोखा अनुभव था।

चन्दा की चुत की मादक सुगंध में डूबते हुए, शक्तिसिंह का सिर उसकी अनोखी गंध वाले शहद के छत्ते में दब गया और उसकी जीभ उसमें से रिस रहे रस का स्वाद लेने के लिए आगे बढ़ी। शक्तिसिंह ने उसकी चूत के मोटे होंठों पर, चुत के नीचे के भाग पर , आंतरिक भगोष्ठ और भगनासा पर अच्छी तरह से जीभ फेरी।

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"अहह... आहहह ...उम्म्म्म," चन्दा खुशी से कराही.. उसके अंदर जुनून पैदा हो गया था... पर शक्तिसिंह को चिंता थी कि गश्त लगाते हुए कोई सैनिक यहाँ आ सकता है और चन्दा की आवाजों के कारण उन दोनों को चोदते हुए रंगेहाथों पकड़ सकता था।

वह जमीन पैर लेटे लेटे छटपटाने लगी तब शक्तिसिंह ने उससे पूछा, "तू कहे तो मैं अब रुक जाऊं?" यह जानते हुए कि उत्तर क्या होगा, और उसने अनियंत्रित वासना से कराहते हुए दृढ़ता से अपना सिर हिलाकर शक्तिसिंह को चाटते रहने का इशारा किया।

जब शक्तिसिंह की जीभ चन्दा की गीली रसदार योनि में घुसी और जीभ से उसकी भगोष्ठ पर प्रहार किया तो वह उत्तेजना से चिल्लाने लगी। उसने अपने मजबूत हाथों में शक्तिसिंह का सर जकड़ लिया... उसकी बांह की मांसपेशियां चमक उठीं और उसके साँवले शरीर में परमानंद की लहरें दौड़ गईं।

संभोग के पारंपरिक तौर तरीकों से चन्दा अनजान थी.. क्योंकी उसे इस बारे में ज्यादा अनुभव नही था... वह चाहती थी की इस चुदाई को अब आगे के पड़ाव पह पहुंचाया जाए... पर वह कैसे करें, उसका उसे ज्ञान न था... वह शक्तिसिंह से अपनी चुत चटवाते हुए, अपने गीले सुराख में परिपूर्ण प्रवेश करवाने की इच्छा मन मे दबाए बैठी थी..

आखिर उससे रहा न गया... सहसा उसने शक्तिसिंह के सर को अपनी चुत से अलग किया... और अपनी मजबूत बाहों से शक्तिसिंह के शरीर को अपने ऊपर खींच लिया... अब शक्तिसिंह का कठोर मूसल उसकी काले इस्पात जैसी जांघों के बीच गोते खाने लगा... चन्दा की चुत के होंठ फड़फड़ाते हुए भूखी मछली की तरह चारा तराशने लगे... शक्तिसिंह उसकी कठोर चूचियों को बड़ी ही बेरहमी से मसल रहा था.. उसकी उत्तेजना में भी सिर चढ़कर बोलने लगी। जमीन पर लेटी चन्दा के जिस्म के इर्दगिर्द पैर जमाकर वह खड़ा हो गया... और अपने लंड की चमड़ी को आगे पीछे कर, टमाटर जैसे बड़े शिश्नमणि को उजागर कर दिया... उसके सुपाड़े के कद को अचंभित होकर चन्दा देखती ही रही...

शक्तिसिंह ने अपने घुटनों को मोड़ा और झुककर अपने लंड को चन्दा के मुंह के आगे झूला दिया... एक पल के लिए चन्दा तय नही कर पाई की वह क्या चाहता था..

"चन्दा... मुंह में लेकर मस्त कर दे इसे.. " सिसकते हुए शक्तिसिंह ने कहा

"हट.. में नही लूँगी मुंह में... तुझे डालना है तो नीचे डाल... जहां डाला जाता है... " चन्दा को चूसना बिल्कुल ही पसंद नही था... अब तक उसने केवल महाराज कमलसिंह की सुखी भिंडी जैसी नून्नी को चूसा था... और वह अनुभव कैसा रहा था यह तो आप सब जानते ही है... हो सकता है इसी कारणवश उसे मुखमैथुन से घिन हो गई हो!!

"नखरे मत कर अभी... मेरा तन्न कर खड़ा हो गया है.. एक बार लेकर तो देख... मज़ा आएगा" शक्तिसिंह ने एक बार ओर कोशिश की

"मैंने मना किया न एक बार... समझ में नही आता क्या तुझे?" चन्दा ने गुर्रा कर जवाब दिया

कामवेश में आकर शक्तिसिंह ने बल का प्रयोग करने की ठान ली.. उसने दोनों हाथों से चन्दा के सिर को पकड़ा.. और उसके दोनों होंठों के बीच लंड का सुपाड़ा रखकर दबाने की कोशिश की... चन्दा ने तुरंत अपना मुंह खोला.. सुपाड़े को अंदर लिया और मध्यम दबाव से शक्तिसिंह के लंड को काट लिया.....!!!

"मूर्ख दृष्टा... क्या... किया... तूने !!!" शक्तिसिंह दोनों हाथों से अपना लंड पकड़कर जमीन पर लोट गया... दर्द के मारे उसके चेहरे पर शिकन पड़ गई थी और वह आँखें बंद कर कराह रहा था...

"एक बार जब मना कर दिया था तब क्यों जबरदस्ती की तूने!!" नग्न चन्दा जमीन पर बैठ गई.. उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया था

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बिना उत्तर दिए शक्तिसिंह जमीन पर पड़ा रहा... चन्दा के दांतों से उसके शिश्नमणि पर निशान बन गए थे... उसे कुछ वक्त लगा अपने दर्द से उभरने में.. उसका लंड सिकुड़कर लटक गया था.. लगभग शुरू हो रही चुदाई वहीं रुक गई.. चन्दा को यह विलंब बिल्कुल भी राज न आया क्योंकी वह काफी गरम हो चुकी थी.. पर उसने अपने स्वमान को वासना से अधिक प्राथमिकता दी थी.. और उसका फल भुगत रही थी।

थोड़ी देर बाद शक्तिसिंह सामान्य हो गया.. उसके गुस्से से लाल डोरे चन्दा को तांक रहे थे... चन्दा ने उसे पूर्ववत करने के लिए उसकी पीठ पर हाथ सहलाया जिसे शक्तिसिंह ने झटके से हटा दिया..

"अब छोड़ दे अपना क्रोध... तूने मेरी इच्छा के विरुद्ध बलप्रयोग कीया और मैंने उसका उत्तर दिया... हिसाब बराबर हो गया.. चल फिर शुरू करते है.. " चन्दा फिर से जमीन पर लेटने ही जा रही थी..

"नही करना मुझे कुछ... तेरा विश्वास करना कठिन है.. पता नही और कहाँ कहाँ काट लेगी मुझे... " शक्तिसिंह का क्रोध अभी भी कम नही हुआ था

चन्दा हंस पड़ी... "नही काटूँगी... वचन देती हूँ... में बस मुख में नही लूँगी तेरा लिंग.. बाकी तुझे जो करना है कर सकता है... अब तो आजा.. "

"पक्का जो करना है कर सकता हूँ तेरे साथ?" शक्तिसिंह का शातिर दिमाग काम पर लग गया

"हाँ.. एक बार कहा ना... उसके अलावा जो भी करना है कर.. पर अब मुझसे ज्यादा धीरज नही रखी जाती ..." चन्दा वापिस जमीन पर लेट गई

शक्तिसिंह खुश होकर वापिस उस पर सवार हो गया... मूर्छित लंड को खड़ा करने के लिए फिरसे थोड़ी पूर्व-क्रीडा आवश्यक थी.. उसने चन्दा के स्तनों के चूचकों को चूसने लगा... चन्दा भी अब आखें बंद कर वापिस अपनी वासना के तार जोड़ने लगी... अपनी हथेलियों से शक्तिसिंह के लंड को सहलाते हुए वह देख रही थी की वह कब खड़ा होता है... ताकि योनि प्रवेश किया जा सकें..

तभी अचानक दोनों को दूरसे आते हुए कदमों की आहट सुनाई दी... दोनों चौकन्ना हो गए... शक्तिसिंह ने तुरंत मशाल को बुझा दिया और दोनों नजदीकी पेड़ के पास अपने वस्त्र लेकर छुप गए... तीन सैनिकों का दल गश्त लगाते हुए वहाँ पहुंचा... और वहीं पत्थर पर विश्राम करने बैठ गया...

चन्दा ने शक्तिसिंह की हथेली को दबाते हुए वहाँ से निकल जाने का इशारा किया

"थोड़ी देर रुक जा... हो सकता है थोड़ी देर में यह लोग चले जाएँ.. " शक्तिसिंह चन्दा के कानों में फुसफुसाया

"नही, अब मुझसे और प्रतीक्षा नही की जाती... इस बीहड़ वन की झाड़ियों के बीच चले जाते है... वहाँ किसी के आने की संभावना भी नही होगी और हम निश्चिंत होकर संभोग कर पाएंगे... !!" चन्दा ने धीरे से कहा

शक्तिसिंह को चन्दा की बात उचित लगी.. सैनिक कब लौटते वह कह पाना मुश्किल था... और छावनी से ज्यादा देर गायब रहना भी मुनासिब नही था.. उसने चन्दा का हाथ खींचा और नग्नावस्था में ही जंगल की ओर चल दिए...

पूर्णिमा का चंद्र आसमान के बीचोंबीच प्रकाशित होकर इन वासना से जुड़े प्रेमियों को मार्ग दिखा रहा था... कंटीली झाड़ियाँ इन दोनों के शरीरों को कुरेद रही थी... काफी देर चलने के बाद दोनों जंगल के बीच खुली जगह में आ पहुंचे... चारों ओर देखकर तसल्ली करने के बाद दोनों ने वहीं पड़ाव डालने का निश्चय किया... एक गहने पेड़ के नीचे, सूखे घास के ऊपर थकी हुई चन्दा लेट गई... और शक्तिसिंह को अपनी तरफ खींचने की कोशिश की... पर शक्तिसिंह ज्यों का त्यों खड़ा रहा

"अब क्या हो गया तुझे?" व्यग्र चन्दा ने पूछा

"कुछ नही... सोच रहा था हम खड़े खड़े ही संभोग करें तो ज्यादा आनंद मिलेगा... लेटकर करने पर मेरे घुटने जमीन से घर्षण खाकर छील जाते है"

चन्दा को भी यह बात उचित लगी... "ठीक है... वैसे भी इस बीहड़ वन में हमें आरामदायक बिस्तर तो मिलने से रहा..." कहकर खड़ी हो गई

जैसे ही वह खड़ी होकर शक्तिसिंह के सामने की तरफ आई की तुरंत शक्तिसिंह ने उसे पलटा दिया... और उसकी गर्दन पर पीछे से चूमने लगा...

"अममम क्या कर रहा है तू.. " मुसकुराते हुए चन्दा मचलने लगी।

अपने दोनों हाथों को आगे ले जाकर वह चन्दा के स्तनों को आटे की तरह गूँदने लगा... उसके दोनों सुदृढ़ स्तन मर्दानी मसलाहट पाकर धन्य हो रहे थे। चन्दा ने अपनी गर्दन को पीछे की ओर घुमाया और शक्तिसिंह के होंठ से अपने होंठ मिला लिए... शक्तिसिंह ने चूमते हुए अपना एक हाथ उसकी दो जांघों के बीच मदनमणि पर लगा दिया... जामुन सा बड़ा भगांकुर उत्तेजना के कारण सख्त हो गया था... चमड़ी की परत के नीचे छुपे उस दाने को शक्तिसिंह की उंगलियों ने टटोलकर उजागर किया और उसे हौले हौले रगड़ना शुरू कर दिया।
 
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