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उधर महाराज कमलसिंह के बिस्तर से उठकर चन्दा ने अपने कपड़े पहने... महाराज तो मरे हुए मुर्गे की तरह पड़े हुए थे.. पिछली रात चन्दा ने अपनी चुत की मजबूत मांसपेशियों में राजा के लंड को दबोच कर ऐसा मरोड़ा था की उनके लंड में मोच आ गई थी... उसके बाद उनका लंड पिचक कर बाहर निकल गया और चन्दा को अपने भगांकुर को मसलकर झड़ना पड़ा था.. महाराज के साथ चन्दा को जरा सी भी तृप्ति का एहसास नहीं होता था पर क्या करती..!! महाराज के हुकूम की अवहेलना भी तो नहीं कर सकती थी..
बचपन से ही तगड़े कदकाठी वाली चन्दा के दोस्त सारे लड़के ही रहे थे... लड़कियों वाले खेल उसने कभी खेले ही नहीं थे... जवान होने के बाद वह इतनी शक्तिशाली और बलिष्ठ बन गई थी की ना ही उसमें लड़कियों वाली नजाकत थी और ना ही छरहरा बदन... अमूमन कोई पुरुष उसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता था... इसलिए वह काफी लंबे अरसे तक अनछुई ही रही थी.. ज्यादातर उसे हस्तहमैथुन से ही अपने आप को संतुष्ट करना पड़ता था..
आधे घंटे बाद नाश्ता करने महाराज और महारानी मेज पर बैठे थे तब दोनों के बीच साहजीक बातें हो रही थी... थोड़ी देर बाद लँगड़ाते हुए राजमाता आती दिखाई दी.. उनके चेहरे पर थकान की रेखाएं थी.. हर कदम चलने पर उन्हे दर्द होता प्रतीत हो रहा था।
"क्या हुआ माँ... आप ऐसे लँगड़ाते हुए क्यों चल रही है?" आश्चर्यसह महाराज ने पूछा
अब क्या बताती राजमाता? कल रात को शक्तिसिंह ने उनकी गांड के ऐसे तोते उड़ा दिए थे की एक कदम चलने में उन्हे भारी दर्द हो रहा था.. मन ही मन में शक्तिसिंह को कोसते हुए वह कराहकर कुर्सी पर बैठ गई।
"कल पूरा दिन हाथी पर बैठे बैठे कमर जकड़ गई थी... आदत नहीं है ना मुझे!! दो दिन मालिश करवाऊँगी तो ठीक हो जाएगा.." राजमाता ने उत्तर दिया
फिर उन्होंने महारानी की तरफ मुड़कर कहा
"दासियों ने मुझे सूचित किया की कल आप अकेले ही नदी किनारे सैर पर निकल गई थी?"
"जी वो कल अकेले बैठे बैठे ऊब सी गई थी... सोचा नदी के निर्मल जल को देखकर मन को थोड़ा सा प्रसन्न कर दूँ.."
"पर तुम्हारा ऐसे अकेले जंगल में घूमना ठीक नहीं है.. अब से तुम बिना किसी को साथ लिए कहीं नहीं जाओगी" कड़े सुर में राजमाता ने कहा
"जी नहीं जाऊँगी" आँखें झुकाकर महारानी ने उत्तर दिया
"और बेटा... आज नहीं जाओगे शिकार पर?" राजमाता ने कमलसिंह से पूछा
"नहीं माँ... मेरा भी शरीर आज दर्द कर रहा है... और गर्मी भी काफी हो रही है.. सोच रहा था की आज का दिन विश्राम ही कर लूँ" शरीर तो नहीं पर महाराज का लंड दर्द कर रहा था... पगलाई घोड़ी की तरह चन्दा ने कल उन पर ऐसी चढ़ाई कर दी थी की महाराज कुछ करने के काबिल बचे नहीं थे...
नाश्ता करने के बाद तीनों अपने तंबू की ओर लौट गए ।
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उस रात महाराज बड़ी ही बेचैनी से अपने तंबू में बैठे शराब पी रहे थे... रात का वक्त हो चला था और हवसी मन में इच्छाएं प्रकट होने लगी थी.. पर लंड अभी भी कल की चुदाई के दर्द से नहीं उभरा था... पिछली रात चन्दा ने अपनी फौलादी चुत से लंड को ऐसे निचोड़ा था की लंड को मोच सी आ गई थी... लिंग की मांसपेशियाँ दर्द कर रही थी... ऐसी बलवान जिस्म वाली स्त्री अगर लंड पर कूदेगी तो और क्या होगा!!
दर्द के बावजूद महाराज व्यग्र थे... उन्होंने चन्दा को आवाज लगाई... चंद तुरंत हाजिर हुई
"अरी चन्दा... कल तूने मेरे लंड के साथ क्या कर दिया?? सुबह से दर्द कर रहा है" महाराज के चेहरे पर दर्द की रेखाएं उभर आई
"जी मैंने तो वही किया जो हम पिछली दो रातों से करते आ रहे है.." भोली बनने का अभिनय करते हुए चन्दा ने कहा... जबकी उसे भलीभाँति मालूम था उसकी चुत की गिरफ्त में महाराज के लंड का यह हाल हुआ है।
महाराज ने चन्दा के सामने अपनी धोती खोल दी... अंदर सा उनका मरा हुआ लंड प्रकट हुआ... सूखी हुई भिंडी जैसा लंड देखकर चंद को मन में ही हंसी छूट गई।
"देख इसका हाल... अब तू है कर कुछ इलाज... "
"महाराज में कोई वैद्य तो हूँ नही जो इसका इलाज कर सकूँ... "
"जानता हूँ... पर इसे मुंह में लेकर चूस तो सकती है ना... "
सुनकर चन्दा का मुंह उतर गया... उसे लंड चूसना बिल्कुल पसंद नहीं था... घिन आती थी उसे... और कोई फौलादी तगड़ा लंड होता तो बात अलग थी.. यहाँ तो महाराज का मरे हुए चूहे जैसा लंड चूसना था...
"सोच क्या रही है!!! चल बैठ नीचे और चूसना शुरू कर दे... " कुर्सी पर बैठे महाराज ने अपनी टाँगे खोली
बेमन से झिझकते हुए चन्दा अपने घुटनों के बल, महाराज की कुर्सी के सामने बैठ गई.. महाराज के मुरझाए लंड को हाथ में लेकर थोड़ी देर खेलती रही.. लंड की चमड़ी को हल्का सा नीचे उतारते ही छोटे से कंचे जैसा महाराज का सुपाड़ा डरते हुए बाहर निकला... अब इस विचित्र जीव को कैसे मुंह में ले यही सोच रही थी चन्दा...
"क्या सोच रही है, मुंह में लेकर चूसना शुरू कर... "आदेशात्मक आवाज में महाराज ने कहा
अब चन्दा के पास चूसने के अलावा और कोई चारा न था... उसने मुंह बिगाड़कर महाराज के लंड के मुख को अपने होंठों से लगाए... उसके मोटे होंठों के बीच महाराज का मुरझाया लंड बीड़ी जैसा लग रहा था... वह उनके सुपाड़े को चूसना शुरू ही कर रही थी तब महाराज ने उसके सिर को अपने लंड पर दबा दिया... उनका पूरा लंड चन्दा के मुंह में चला गया...
महाराज की इस हरकत से चन्दा को बड़ा गुस्सा आया... फिर भी वह अपने मुंह को आगे पीछे करते हुए चूसती गई... करीब पाँच मिनट तक चूसने के बाद भी महाराज के लंड में जरा सी भी सख्ती नहीं आई...
"रुक जा... और अपनी छातियाँ खोल दे... " महाराज ने उसका सिर पकड़कर रोकते हुए कहा
चन्दा यंत्रवत खड़ी हो गई और अपना कवच निकालने लगी... भीतर पहना हुआ वस्त्र जो पसीने से गीला हो चला था... उसे भी उसने उतार दिया... भरे हुए मोटे साँवले बैंगन जैसे उसके दोनों स्तन यहाँ वहाँ झूलने लगे... उसकी दोनों निप्पल दबी हुई थी क्योंकी इस गतिवधि में उसे रत्तीभर भी उत्तेजना नसीब नही हुई थी।
महाराज उसके दोनों उरोजों को हथेलियों में भरकर मसलने लगे.. चन्दा को अपनी ओर खींचकर उसके स्तनों को चाटने और चूमने लगे... अपने एक हाथ को उन्होंने चन्दा की घाघरी के अंदर डाल दिया... उसकी लंगोट को सरकाकर चुत में उंगली करने का प्रयास करने लगे... चन्दा का पूरा योनिमार्ग सूखा और ऋक्ष था... फिर भी महाराज अपनी उंगली अंदर घुसेड़ने का प्रयास कर रहे थे जिससे चन्दा को हल्की सी पीड़ा का एहसास हो रहा था... वह चाहती थी की महाराज जल्द से जल्द निपट जाएँ ताकि उसका छुटकारा हो...
चन्दा के मजबूत शरीर की निकटता प्राप्त कर महाराज का लंड हरकत में आने लगा... पूर्णतः खड़ा तो नही हुआ पर उसमें सख्ती जरूर दिखने लगी थी.. महाराज भी यह देख खुश हुए और मन में राहत भी हुई की उनके लंड में अभी भी जान बची थी...
अब उन्होंने चन्दा को खींचकर वापिस नीचे बैठा दिया और अपना लंड उसके मुंह में फिर से दे दिया... जल्दी निपटारा चाहती चन्दा ने भी तेजी से अपना मुंह ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया... पुरुषों की शरीर-रचना से परिचित चन्दा ने उनके टट्टों को पकड़कर हल्के से दबाया... और महाराज उसके मुंह में ही झड़ गए... उनके स्खलन से गिनकर तीन-चार बूंद वीर्य की निकली जिसका स्वाद मुंह में लगते ही चन्दा का स्वाद बिगड़ गया... ऐसे बेजान पानी जैसे अल्प मात्रा में निकलते वीर्य से आखिर महाराज ने महारानी को कैसे गर्भवती किया होगा, चन्दा सोचती रही...
अपने मुंह पर हाथ दबाकर वह खड़ी हो गई... और तंबू के कोने में जाकर उसने वह वीर्य थूक दिया... मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए उसने पास पड़े मेज से शराब की सुराही उठाई और उसे सीधे अपने मुंह में उंडेल दिया... तीन-चार घूंट पीकर उसे कुछ अच्छा लगा.... स्खलन के बाद महाराज गहराई आँखों से कुर्सी पर अपना सिर टिकाए सुस्त पड़े थे... चन्दा ने घृणित नजर से महाराज को देखा, अपने वस्त्र पहने और वहाँ से चली गई...
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दूसरे दिन शिकार यात्रा का खेमा जंगल से सूरजगढ़ लौट आया...
एक दिन सब ने विश्राम करने में ही व्यतीत कर दीया.. उस दिन शाम के समय राजमाता अपने कक्ष में कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रही थी तभी दासी ने आकर सूचित किया की उनसे मिलने दीवान जी आए थे। राजमाता ने तुरंत उन्हे अंदर बुलाने को कहा..
थोड़ी ही देर में, थुलथुले शरीर वाले दीवानजी अंदर पधारे... गले में मोतियों की माला और सिर पर सुनहरे रंग की पग़डी पहने दीवानजी की उम्र लगभग ५५ साल के करीब थी... राजमाता को सलाम कर वह उनके इशारे पर सामने रखी कुर्सी पर बैठ गए।
"कहिए दीवानजी, कैसे आना हुआ..?" राजमाता ने पूछा
"राजमाता जी, कल सुबह से दरबार की गतिविधियां आरंभ हो रही है... में चाहता हूँ की आप इस बार दरबार का संचालन करें... काफी सारे प्रश्न है जिनका समाधान ढूँढना है.. कर व्यवस्था में बदलाव करना है... राज्य की आय का ब्योरा भी करना है.. और सुरक्षा से लेकर भी काफी निर्णय करने है.. इस लिए आपकी मौजूदगी अनिवार्य है" दीवानजी ने बड़े ही अदब के साथ कहा
"पर ये रोजमर्रा की गतिविधियां तो महाराज को ही संभालनी चाहिए... तुम उनसे क्यों नही बात करते?"
राजमाता की बात सुनकर दीवानजी का मुंह उतर गया
"राजमाता जी, आपसे मिलने आने से पहले में उनसे ही मिलने गया था... वह प्रायः उनकी प्रवृत्तियों में काफी व्यस्त है और दरबार में पधार नही सकते.. इसलिए में यह दरख्वास्त आप के पास लेकर आया.. "
यह सुनकर राजमाता ने एक गहरी सांस ली.. अपने पुत्र को वह भलीभाँति जानती थी.. उसकी प्रवृत्तियाँ मतलब भोग-विलास और मदिरापान... ज्यादातर महत्वपूर्ण बातों को राजमाता ही संभालती आई थी.. इसलिए महाराज कमलसिंह का राज्य के कारभार में कुछ ज्यादा योगदान कभी नही रहा था... जब कमलसिंह युवा थे तब राजमाता सोचती थी की समय के साथ वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम बन जाएगा... पर वह तो किसी भी प्रकार की जवाबदेही से बचता ही रहता था... गनीमत थी की सूरजगढ़ में खेती और व्यापार काफी मात्रा में होता था इसलिए कर की आय से राज्य का खजाना कभी खाली नही रहता था... पर किसी भी राज्य के दिन-ब-दिन के प्रशासन और व्यवस्थापन के काम का मुआयना करना अति-आवश्यक होता है...
राजमाता सोच में पड़ गई... इतना समय व्यतीत होने पर... और काफी बार समझाने के बावजूद महाराज कमलसिंह अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नही ले रहे थे... और अब कुछ ही समय में महाराज का उत्तराधिकारी भी आने वाला था... ऐसी सूरत में राज्य की स्थिरता बड़ी ही महत्वपूर्ण थी... राजमाता अब फिरसे राज्य की बागडोर को संभालने का निर्णय ले चुकी थी... पर उनके अकेले से यह जिम्मेदारी निभा पाना थोड़ा कठिन था..
काफी सोच-विचार के पश्चात, राजमाता ने उत्तर दिया
"ठीक है... आप तैयारी कीजिए.. कल दरबार का संचालन हम करेंगे"
दीवानजी यह सुनकर चिंता मुक्त हो गए... सारे मंत्री गण और दीवानजी खुद राजमाता की कुशलता के बारे में आश्वस्त थे.. दीवानजी ने कुर्सी से खड़े होकर राजमाता को सलामी दी... और उनके कक्ष से चले गए...
दूसरे दिन सुबह राजमाता की अगुवाई में दरबार की कार्यविधि को शुरू किया गया... राजमाता सिंहासन पर बिराजमान थी और उनके दोनों तरफ लगे आसनों पर सारे मंत्री, दीवानजी और सेनापति बैठे हुए थे...
एक के बाद एक समस्या और मसले पेश किए गए और राजमाता ने उन सबका त्वरित निराकरण भी कर दिया.. राजमाता की इस कुशलता के सारे मंत्रीगण कायल थे.. इसी कारणवश राजसभा में महाराज से ज्यादा राजमाता का रुतबा था।
इसी अवधि के दौरान एक भटकते हुए पुरुष ने राजमाता से मिलने की मांग की। आम नागरिकों के लिए राजमाता से मिलना और अपनी शिकायतें बताना बिल्कुल भी असामान्य नहीं था। वास्तव में उन्होंने इसका स्वागत किया और इसके लिए समय भी निश्चित कर दिया। लेकिन मुलाकात के पहले मिलने का उद्देश्य बताना आवश्यक रहता था ताकि अधिकारी राजमाता को मुलाकात की तैयारी में मदद करने के लिए पहले से ही प्रासंगिक जानकारी इकट्ठा कर सकें। राजमाता सभी की बातें विस्तार से सुनती थी और वास्तव में इन बैठकों को गंभीरता से लेती थी।
हालाँकि इस पुरुष ने मुलाकात का उद्देश्य बताने से इनकार कर दिया; सिवाय यह बताने के कि वह राजमाता की मदद करने के लिए यहां आया था और उससे अकेले में बात करेगा, किसी भी निम्न अधिकारी या मंत्री से नहीं। और इसलिए, निस्संदेह, अधिकारियों ने उसे राजमाता तक पहुंचने से वंचित रखा। अपने अहंकार के अलावा ऐसा नहीं लगता था कि उनके पास देने के लिए और कुछ है। वह लंबा, गौर वर्ण का आकर्षक और रहस्यमयी व्यक्तित्व का स्वामी था। उसका लंबा पतला शरीर और लंबा ललाट, उसके ज्ञानी और तपस्वी होने की पुष्टि कर रहा था। उसने बेदाग सफेद धोती पहन रखी थी, उनके नंगे धड़ पर रंगबिरंगी पत्थरों से बनी माला लटक रही थी। उसकी सारी सांसारिक संपत्ति कपड़े के एक छोटी सी गठरी में एकत्रित थी जो उसके दूसरे कंधे से लटक रही थी।
मुलाकात का अवसर ना मिलने पर वह हड़बड़ाकर वहाँ से चला गया और महल के द्वार के सामने डेरा लगाकर बैठ गया और इंतजार करने लगा। एक तपस्वी सदैव प्रतीक्षा कर सकता है क्योंकि उसकी इच्छाएँ और जरूरतें कम होती हैं। इस पुरुष के मामले में उन आवश्यकताओं की पूर्ति वहाँ से गुजरने वाले सामान्य लोगों द्वारा की जाती थी जो ऐसे तपस्वी ज्ञानी की सलाह और आशीर्वाद का सम्मान करते थे। आते जाते लोग भोजन और दैनिक जीवन के लिए आवश्यक अन्य वस्तुएँ छोड़ जाते थे।
कई दिनों के पश्चात राजमाता को इस दिव्य पुरुष के अस्तित्व के बारे में पता चला। फिर, जिज्ञासावश उसे मिलने की अनुमति देने के लिए प्रेरित किया। बुलावा भेजने पर सैनिक उसे लेकर हाजिर हुए। वह भावहीन चेहरे के साथ राजमाता के सामने खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा। न कोई प्रणाम, न कोई अभिवादन, बस सिर्फ मूक दृष्टि!!!
आख़िरकार राजमाता ने कहा, "तुम मुझसे क्यों मिलना चाहते थे?"
"यह तय करने के लिए की क्या आप साम्राज्ञी बनने के लिए तैयार है या अभी भी केवल राजमाता ही बनी रहना चाहती है!!"
उस व्यक्ति के इस अत्यधिक अहंकार को देखकर दरबारियों में हंगामा मच गया और एक सैनिक तो उस पर हमला करने के लिए भी उठा, लेकिन राजमाता ने इशारे से उसे रोक दिया गया। इस व्यक्ति में राजमाता को रुचि जगी। शायद उसके पास अपने हास्यास्पद दावे का समर्थन करने के लिए कुछ था या शायद वह सिर्फ एक अहंकारी मूर्ख था। राजमाता ने सोचा, चलो पता लगाएं!!
"हम्म.. तो तुम्हारे आने का प्रयोजन तो पता चल गया... अब अपने बारे में भी तो कुछ बताओ"
"मेरा नाम विद्याधर है... और में विंध्य पर्वतों की तलहटी में बसे एक गाँव से आया हूँ"
"अच्छा विद्याधर, ये बताओ की यहाँ मेरे पास आना कैसे हुआ?" राजमाता को इस पुरुष में दिलचस्पी बढ़ने लगी
"में ज्ञानशीला नगर में शास्त्रों का अभ्यास कर रहा था... आए दिन कोई न कोई राजा उस नगर पर हमला कर देता और मेरे अभ्यास में बाधा पड़ती... तब मेरी रुचि इस भूगोल की राजनैतिक विषमताओ पर पड़ी.. यह प्रदेश कई राज्यों में बंटा हुआ है और सक्षम नेतृत्व के अभाव के कारण सारे राजा एक दूसरे से हमेशा लड़ते रहते है.. जरूरत है एक ऐसे सबल नेता की जो अपनी छाँव में सारे राज्यों को संभालकर एकता से जीना सीखा सके.. उन राजाओं के अहंकार और झूठी शान के खातिर सेंकड़ों सैनिकों की मृत्यु हो जाती है.. उनके परिवार अनाथ हो जाते है... आम जनता का जीवन भी व्याकुलता से भर जाता है... सक्षम राजाओं के लिए युद्ध अपना राज्य बढ़ाने का जरिया होगा पर आम प्रजाजनों का जीवन इससे नरक बन जाता है.. किसान खेती नही कर पाते, व्यापारी अपना उद्योग चला नही पाते... आवश्यक चीजें नही मिल पाती... महंगाई आसमान छु जाती है.. काफी गहन विचार के बाद में इस निष्कर्ष पर पहुंचा की अगर किसी सक्षम राज्य के नेतृत्व में अगर इन सारे कुनबों को ला दिया जाए तो इस खून खराबे का अंत हो जाएगा... प्रजाजन अपना जीवन खुशाली से व्यतीत कर पाएंगे... खेती और व्यापार बढ़ेगा तो सबका फायदा होगा!! काफी अध्ययन के बाद मुझे सूरजगढ़ की राजमाता में वह सारे गुण नजर आए जो में ढूंढ रहा था...में चाहता हूँ की आपके नेतृत्व में एक मजबूत साम्राज्य स्थापित किया जाए, फिर एक ऐसा राजवंश स्थापित होगा जो सैकड़ों वर्षों तक फैला रहेगा। मैं जानता हूं कि यह हमेशा के लिए नहीं रहेगा लेकिन यह मेरा उद्देश्य नहीं है। मेरा उद्देश्य, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यही है की इस खूनखराबे और युद्धों को रोका जाएँ!!"
राजमाता इस पुरुष की अस्खलित वाक छटा से काफी प्रभावित होकर सुनती ही रही... !!!
"जैसे चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को योग्य तालिम देकर एक सक्षम महाराजा बनाया था उसी तरह में आपको एक महान साम्राज्ञी बनने में आपकी सहायता करूंगा... और वो भी तब जब मुझे यह विश्वास हो जाएँ की आप इसके लिए योग्य हो!!"
उस पुरुष की बातें सुनते ही पूरी सभा आक्रोश से भर गई... यह टुच्चे आदमी की यह जुर्रत की वह राजमाता की योग्यता तय करेगा?? सेनापति अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्होंने अपनी तलवार निकाल ली। वह क्रोध से थरथर कांप रहे थे।
"राजमाता जी, आप आदेश करें तो एक पल में इस अहंकारी का सिर, धड़ से अलग कर दूँ"
राजमाता ने उत्तर नही दिया... वह इस तेजस्वी पुरुष की आँखों की चमक देखती रही... कुछ तो बात थी उसमें.. इतना विश्वास किसी इंसान में ऐसे ही नही प्रकट होता... किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले राजमाता उसकी बात को विस्तारपूर्वक सुनना चाहती थी... उन्होंने इशारा कर सभा को बर्खास्त करने का आदेश दिया... थोड़ी ही देर में पूरा सभाखण्ड खाली हो गया... बच गए तो सिर्फ विद्याधर और राजमाता।
"अब बताओ," राजमाता ने कहा, अब वह दोनों अकेले थे, "मैं तुम्हें गंभीरता से क्यों लूं? अशिष्टता और दंभ के अलावा तुम्हारे पास ऐसा क्या है, जो मुझे विश्वास दिलाएगा कि तुम इस कार्य में मेरी मदद कर सकते हो?"
"मेरे पास ज्ञान है, और उस ज्ञान को व्यावहारिक उपयोग में लाने की बुद्धि है," उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "मैंने सभी शास्त्रों का सविस्तार पठन किया है। कई शास्त्र तो मुझे कंठस्थ है। मैंने लगन से ऐसे गुरुओं की तलाश की है जो न केवल मुझे प्राचीन ग्रंथ या शास्त्र पढ़ाएं बल्कि उनके पीछे की सच्चाई भी समझाएं। मैंने सीखा है कि महान चीजें अलौकिक या परग्रहवासी प्राणियों के कृत्यों से हासिल नहीं की जाती हैं, बल्कि उन विचारों के कठिन अनुप्रयोग से होती हैं जिनके बारे में कोई मानता है कि वे अलौकिक शक्तियों से आते हैं और इन तथाकथित पवित्र ग्रंथों या 'शास्त्रों' में निहित हैं। और जिसे आप अहंकार मानते हैं," विद्याधर ने आगे कहा, "वह असल में अहंकार नही है, मुझ पर, मेरे ज्ञान पर और अपने ज्ञान की व्याख्या करने और उसे क्रियान्वित करने की मेरी बुद्धिशक्ति पर पूर्ण विश्वास है। मैं अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हूं और मुझे पूरा यकीन है कि मैं इसे हासिल कर सकता हूं अगर मुझे इसके लिए योग्य व्यक्ति मिलें।"
"और मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं कि वह योग्य व्यक्ति में स्वयं हूं?" राजमाता ने आँखों में चमक लाते हुए पूछा क्योंकि उन्हें यह पुरुष पसंद आने लगा था।
"मेरे कुछ सवालों का उत्तर देकर.. " विद्याधर ने जवाब दिया
"सवाल पूछो," राजमाता ने कहा और इंतजार करने लगी। उन्होंने नाटकीय ढंग से अपनी ठुड्डी के नीचे एक हाथ रखा और अपने चेहरे पर जिज्ञासा के भाव धारण कर लिए। वह इस अहंकारी पुरुष के साथ मानसिक द्वंदयुद्ध करने के लिए तैयार थी।
"सच और झूठ में क्या अंतर है?"
"कोई अंतर नहीं है," उन्होंने तुरंत कहा, "वह परिणाम ही है जो सच और जूठ को परिभाषित करता है।" यह कोई मौलिक उत्तर न था... शास्त्रों में इस विषय पर विस्तृत लेखन किया जा चुका है
"शक्ति का सही अर्थ क्या है?"
"यह उन साधनों में से एक है जिसके द्वारा आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं। इसे प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए व्यक्ति को इसका प्रतिरूपण करने में सक्षम होना चाहिए। उपयोग किए जाने पर शक्ति दिखाई देती है। मुख्य रूप से इसके उपयोग का खतरा इसे एक उपयोगी साधन बनाता है।
और मैं साधन शब्द पर जोर दे रही हूं, क्योंकि वही सब कुछ है - खुद को अभिव्यक्त करने और अपनी इच्छा थोपने का एक उपकरण। हम सभी के भीतर क्रूरता है, और जो चीज हमें एक दूसरे से अलग करती है,और यह वह है की हम किस हद तक इसे खुद को व्यक्त करने देते हैं।
एक शासक के रूप में यदि मैं इसका अत्यधिक उपयोग करती हूँ तो यह मुझे एक अत्याचारी भी बना सकता है। लेकिन मुझे उससे कोई फरक नही पड़ता, मुझे इसका उपयोग करना होगा फिर भले ही कुछ लोगों के लिए में अत्याचारी बन जाऊँ।"
काफी लंबा-चौड़ा उत्तर था.. राजमाता खुद अचंभित थी की यह सब उनके मन में त्वरित प्रकट कैसे हो रहा है!!
"अच्छे और बुरे में क्या अंतर है?" अगला प्रश्न आया
"कोई अंतर नहीं है," फिर से तुरंत जवाब आया, क्योंकि राजमाता ने स्वयं इस बारे में सोचा था और कुछ समय पहले एक उत्तर तैयार किया था, "यह व्याख्या का विषय है। एक व्यक्ति को मारना बुरा हो सकता है और एक हजार को मारना अच्छा हो सकता है। यह आपकी व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है... अगर कहना चाहे तो कह सकते है की अंतर केवल दृष्टिकोण का है"
"क्या आप ऊपर वाले की शक्ति को मानते हैं?"
"हाँ, मानती हूँ... " दृढ़तापूर्वक राजमाता ने कहा
"तो अगर आपके गुरु आपसे कुछ न करने के लिए कहें क्योंकि ऊपरवाला नहीं चाहता की ऐसा हो, तो आप क्या करेंगे?"
"यह ऊपरवाले की इच्छा की उनकी व्याख्या होगी और यदि मेरी व्याख्या अलग है तो मैं जैसा चाहूँगी वैसा ही करूंगी।"
बचपन से ही तगड़े कदकाठी वाली चन्दा के दोस्त सारे लड़के ही रहे थे... लड़कियों वाले खेल उसने कभी खेले ही नहीं थे... जवान होने के बाद वह इतनी शक्तिशाली और बलिष्ठ बन गई थी की ना ही उसमें लड़कियों वाली नजाकत थी और ना ही छरहरा बदन... अमूमन कोई पुरुष उसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता था... इसलिए वह काफी लंबे अरसे तक अनछुई ही रही थी.. ज्यादातर उसे हस्तहमैथुन से ही अपने आप को संतुष्ट करना पड़ता था..
आधे घंटे बाद नाश्ता करने महाराज और महारानी मेज पर बैठे थे तब दोनों के बीच साहजीक बातें हो रही थी... थोड़ी देर बाद लँगड़ाते हुए राजमाता आती दिखाई दी.. उनके चेहरे पर थकान की रेखाएं थी.. हर कदम चलने पर उन्हे दर्द होता प्रतीत हो रहा था।
"क्या हुआ माँ... आप ऐसे लँगड़ाते हुए क्यों चल रही है?" आश्चर्यसह महाराज ने पूछा
अब क्या बताती राजमाता? कल रात को शक्तिसिंह ने उनकी गांड के ऐसे तोते उड़ा दिए थे की एक कदम चलने में उन्हे भारी दर्द हो रहा था.. मन ही मन में शक्तिसिंह को कोसते हुए वह कराहकर कुर्सी पर बैठ गई।
"कल पूरा दिन हाथी पर बैठे बैठे कमर जकड़ गई थी... आदत नहीं है ना मुझे!! दो दिन मालिश करवाऊँगी तो ठीक हो जाएगा.." राजमाता ने उत्तर दिया
फिर उन्होंने महारानी की तरफ मुड़कर कहा
"दासियों ने मुझे सूचित किया की कल आप अकेले ही नदी किनारे सैर पर निकल गई थी?"
"जी वो कल अकेले बैठे बैठे ऊब सी गई थी... सोचा नदी के निर्मल जल को देखकर मन को थोड़ा सा प्रसन्न कर दूँ.."
"पर तुम्हारा ऐसे अकेले जंगल में घूमना ठीक नहीं है.. अब से तुम बिना किसी को साथ लिए कहीं नहीं जाओगी" कड़े सुर में राजमाता ने कहा
"जी नहीं जाऊँगी" आँखें झुकाकर महारानी ने उत्तर दिया
"और बेटा... आज नहीं जाओगे शिकार पर?" राजमाता ने कमलसिंह से पूछा
"नहीं माँ... मेरा भी शरीर आज दर्द कर रहा है... और गर्मी भी काफी हो रही है.. सोच रहा था की आज का दिन विश्राम ही कर लूँ" शरीर तो नहीं पर महाराज का लंड दर्द कर रहा था... पगलाई घोड़ी की तरह चन्दा ने कल उन पर ऐसी चढ़ाई कर दी थी की महाराज कुछ करने के काबिल बचे नहीं थे...
नाश्ता करने के बाद तीनों अपने तंबू की ओर लौट गए ।
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उस रात महाराज बड़ी ही बेचैनी से अपने तंबू में बैठे शराब पी रहे थे... रात का वक्त हो चला था और हवसी मन में इच्छाएं प्रकट होने लगी थी.. पर लंड अभी भी कल की चुदाई के दर्द से नहीं उभरा था... पिछली रात चन्दा ने अपनी फौलादी चुत से लंड को ऐसे निचोड़ा था की लंड को मोच सी आ गई थी... लिंग की मांसपेशियाँ दर्द कर रही थी... ऐसी बलवान जिस्म वाली स्त्री अगर लंड पर कूदेगी तो और क्या होगा!!
दर्द के बावजूद महाराज व्यग्र थे... उन्होंने चन्दा को आवाज लगाई... चंद तुरंत हाजिर हुई
"अरी चन्दा... कल तूने मेरे लंड के साथ क्या कर दिया?? सुबह से दर्द कर रहा है" महाराज के चेहरे पर दर्द की रेखाएं उभर आई
"जी मैंने तो वही किया जो हम पिछली दो रातों से करते आ रहे है.." भोली बनने का अभिनय करते हुए चन्दा ने कहा... जबकी उसे भलीभाँति मालूम था उसकी चुत की गिरफ्त में महाराज के लंड का यह हाल हुआ है।
महाराज ने चन्दा के सामने अपनी धोती खोल दी... अंदर सा उनका मरा हुआ लंड प्रकट हुआ... सूखी हुई भिंडी जैसा लंड देखकर चंद को मन में ही हंसी छूट गई।
"देख इसका हाल... अब तू है कर कुछ इलाज... "
"महाराज में कोई वैद्य तो हूँ नही जो इसका इलाज कर सकूँ... "
"जानता हूँ... पर इसे मुंह में लेकर चूस तो सकती है ना... "
सुनकर चन्दा का मुंह उतर गया... उसे लंड चूसना बिल्कुल पसंद नहीं था... घिन आती थी उसे... और कोई फौलादी तगड़ा लंड होता तो बात अलग थी.. यहाँ तो महाराज का मरे हुए चूहे जैसा लंड चूसना था...
"सोच क्या रही है!!! चल बैठ नीचे और चूसना शुरू कर दे... " कुर्सी पर बैठे महाराज ने अपनी टाँगे खोली
बेमन से झिझकते हुए चन्दा अपने घुटनों के बल, महाराज की कुर्सी के सामने बैठ गई.. महाराज के मुरझाए लंड को हाथ में लेकर थोड़ी देर खेलती रही.. लंड की चमड़ी को हल्का सा नीचे उतारते ही छोटे से कंचे जैसा महाराज का सुपाड़ा डरते हुए बाहर निकला... अब इस विचित्र जीव को कैसे मुंह में ले यही सोच रही थी चन्दा...
"क्या सोच रही है, मुंह में लेकर चूसना शुरू कर... "आदेशात्मक आवाज में महाराज ने कहा
अब चन्दा के पास चूसने के अलावा और कोई चारा न था... उसने मुंह बिगाड़कर महाराज के लंड के मुख को अपने होंठों से लगाए... उसके मोटे होंठों के बीच महाराज का मुरझाया लंड बीड़ी जैसा लग रहा था... वह उनके सुपाड़े को चूसना शुरू ही कर रही थी तब महाराज ने उसके सिर को अपने लंड पर दबा दिया... उनका पूरा लंड चन्दा के मुंह में चला गया...
महाराज की इस हरकत से चन्दा को बड़ा गुस्सा आया... फिर भी वह अपने मुंह को आगे पीछे करते हुए चूसती गई... करीब पाँच मिनट तक चूसने के बाद भी महाराज के लंड में जरा सी भी सख्ती नहीं आई...
"रुक जा... और अपनी छातियाँ खोल दे... " महाराज ने उसका सिर पकड़कर रोकते हुए कहा
चन्दा यंत्रवत खड़ी हो गई और अपना कवच निकालने लगी... भीतर पहना हुआ वस्त्र जो पसीने से गीला हो चला था... उसे भी उसने उतार दिया... भरे हुए मोटे साँवले बैंगन जैसे उसके दोनों स्तन यहाँ वहाँ झूलने लगे... उसकी दोनों निप्पल दबी हुई थी क्योंकी इस गतिवधि में उसे रत्तीभर भी उत्तेजना नसीब नही हुई थी।
महाराज उसके दोनों उरोजों को हथेलियों में भरकर मसलने लगे.. चन्दा को अपनी ओर खींचकर उसके स्तनों को चाटने और चूमने लगे... अपने एक हाथ को उन्होंने चन्दा की घाघरी के अंदर डाल दिया... उसकी लंगोट को सरकाकर चुत में उंगली करने का प्रयास करने लगे... चन्दा का पूरा योनिमार्ग सूखा और ऋक्ष था... फिर भी महाराज अपनी उंगली अंदर घुसेड़ने का प्रयास कर रहे थे जिससे चन्दा को हल्की सी पीड़ा का एहसास हो रहा था... वह चाहती थी की महाराज जल्द से जल्द निपट जाएँ ताकि उसका छुटकारा हो...
चन्दा के मजबूत शरीर की निकटता प्राप्त कर महाराज का लंड हरकत में आने लगा... पूर्णतः खड़ा तो नही हुआ पर उसमें सख्ती जरूर दिखने लगी थी.. महाराज भी यह देख खुश हुए और मन में राहत भी हुई की उनके लंड में अभी भी जान बची थी...
अब उन्होंने चन्दा को खींचकर वापिस नीचे बैठा दिया और अपना लंड उसके मुंह में फिर से दे दिया... जल्दी निपटारा चाहती चन्दा ने भी तेजी से अपना मुंह ऊपर नीचे करना शुरू कर दिया... पुरुषों की शरीर-रचना से परिचित चन्दा ने उनके टट्टों को पकड़कर हल्के से दबाया... और महाराज उसके मुंह में ही झड़ गए... उनके स्खलन से गिनकर तीन-चार बूंद वीर्य की निकली जिसका स्वाद मुंह में लगते ही चन्दा का स्वाद बिगड़ गया... ऐसे बेजान पानी जैसे अल्प मात्रा में निकलते वीर्य से आखिर महाराज ने महारानी को कैसे गर्भवती किया होगा, चन्दा सोचती रही...
अपने मुंह पर हाथ दबाकर वह खड़ी हो गई... और तंबू के कोने में जाकर उसने वह वीर्य थूक दिया... मुंह का स्वाद ठीक करने के लिए उसने पास पड़े मेज से शराब की सुराही उठाई और उसे सीधे अपने मुंह में उंडेल दिया... तीन-चार घूंट पीकर उसे कुछ अच्छा लगा.... स्खलन के बाद महाराज गहराई आँखों से कुर्सी पर अपना सिर टिकाए सुस्त पड़े थे... चन्दा ने घृणित नजर से महाराज को देखा, अपने वस्त्र पहने और वहाँ से चली गई...
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दूसरे दिन शिकार यात्रा का खेमा जंगल से सूरजगढ़ लौट आया...
एक दिन सब ने विश्राम करने में ही व्यतीत कर दीया.. उस दिन शाम के समय राजमाता अपने कक्ष में कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रही थी तभी दासी ने आकर सूचित किया की उनसे मिलने दीवान जी आए थे। राजमाता ने तुरंत उन्हे अंदर बुलाने को कहा..
थोड़ी ही देर में, थुलथुले शरीर वाले दीवानजी अंदर पधारे... गले में मोतियों की माला और सिर पर सुनहरे रंग की पग़डी पहने दीवानजी की उम्र लगभग ५५ साल के करीब थी... राजमाता को सलाम कर वह उनके इशारे पर सामने रखी कुर्सी पर बैठ गए।
"कहिए दीवानजी, कैसे आना हुआ..?" राजमाता ने पूछा
"राजमाता जी, कल सुबह से दरबार की गतिविधियां आरंभ हो रही है... में चाहता हूँ की आप इस बार दरबार का संचालन करें... काफी सारे प्रश्न है जिनका समाधान ढूँढना है.. कर व्यवस्था में बदलाव करना है... राज्य की आय का ब्योरा भी करना है.. और सुरक्षा से लेकर भी काफी निर्णय करने है.. इस लिए आपकी मौजूदगी अनिवार्य है" दीवानजी ने बड़े ही अदब के साथ कहा
"पर ये रोजमर्रा की गतिविधियां तो महाराज को ही संभालनी चाहिए... तुम उनसे क्यों नही बात करते?"
राजमाता की बात सुनकर दीवानजी का मुंह उतर गया
"राजमाता जी, आपसे मिलने आने से पहले में उनसे ही मिलने गया था... वह प्रायः उनकी प्रवृत्तियों में काफी व्यस्त है और दरबार में पधार नही सकते.. इसलिए में यह दरख्वास्त आप के पास लेकर आया.. "
यह सुनकर राजमाता ने एक गहरी सांस ली.. अपने पुत्र को वह भलीभाँति जानती थी.. उसकी प्रवृत्तियाँ मतलब भोग-विलास और मदिरापान... ज्यादातर महत्वपूर्ण बातों को राजमाता ही संभालती आई थी.. इसलिए महाराज कमलसिंह का राज्य के कारभार में कुछ ज्यादा योगदान कभी नही रहा था... जब कमलसिंह युवा थे तब राजमाता सोचती थी की समय के साथ वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में सक्षम बन जाएगा... पर वह तो किसी भी प्रकार की जवाबदेही से बचता ही रहता था... गनीमत थी की सूरजगढ़ में खेती और व्यापार काफी मात्रा में होता था इसलिए कर की आय से राज्य का खजाना कभी खाली नही रहता था... पर किसी भी राज्य के दिन-ब-दिन के प्रशासन और व्यवस्थापन के काम का मुआयना करना अति-आवश्यक होता है...
राजमाता सोच में पड़ गई... इतना समय व्यतीत होने पर... और काफी बार समझाने के बावजूद महाराज कमलसिंह अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से नही ले रहे थे... और अब कुछ ही समय में महाराज का उत्तराधिकारी भी आने वाला था... ऐसी सूरत में राज्य की स्थिरता बड़ी ही महत्वपूर्ण थी... राजमाता अब फिरसे राज्य की बागडोर को संभालने का निर्णय ले चुकी थी... पर उनके अकेले से यह जिम्मेदारी निभा पाना थोड़ा कठिन था..
काफी सोच-विचार के पश्चात, राजमाता ने उत्तर दिया
"ठीक है... आप तैयारी कीजिए.. कल दरबार का संचालन हम करेंगे"
दीवानजी यह सुनकर चिंता मुक्त हो गए... सारे मंत्री गण और दीवानजी खुद राजमाता की कुशलता के बारे में आश्वस्त थे.. दीवानजी ने कुर्सी से खड़े होकर राजमाता को सलामी दी... और उनके कक्ष से चले गए...
दूसरे दिन सुबह राजमाता की अगुवाई में दरबार की कार्यविधि को शुरू किया गया... राजमाता सिंहासन पर बिराजमान थी और उनके दोनों तरफ लगे आसनों पर सारे मंत्री, दीवानजी और सेनापति बैठे हुए थे...
एक के बाद एक समस्या और मसले पेश किए गए और राजमाता ने उन सबका त्वरित निराकरण भी कर दिया.. राजमाता की इस कुशलता के सारे मंत्रीगण कायल थे.. इसी कारणवश राजसभा में महाराज से ज्यादा राजमाता का रुतबा था।
इसी अवधि के दौरान एक भटकते हुए पुरुष ने राजमाता से मिलने की मांग की। आम नागरिकों के लिए राजमाता से मिलना और अपनी शिकायतें बताना बिल्कुल भी असामान्य नहीं था। वास्तव में उन्होंने इसका स्वागत किया और इसके लिए समय भी निश्चित कर दिया। लेकिन मुलाकात के पहले मिलने का उद्देश्य बताना आवश्यक रहता था ताकि अधिकारी राजमाता को मुलाकात की तैयारी में मदद करने के लिए पहले से ही प्रासंगिक जानकारी इकट्ठा कर सकें। राजमाता सभी की बातें विस्तार से सुनती थी और वास्तव में इन बैठकों को गंभीरता से लेती थी।
हालाँकि इस पुरुष ने मुलाकात का उद्देश्य बताने से इनकार कर दिया; सिवाय यह बताने के कि वह राजमाता की मदद करने के लिए यहां आया था और उससे अकेले में बात करेगा, किसी भी निम्न अधिकारी या मंत्री से नहीं। और इसलिए, निस्संदेह, अधिकारियों ने उसे राजमाता तक पहुंचने से वंचित रखा। अपने अहंकार के अलावा ऐसा नहीं लगता था कि उनके पास देने के लिए और कुछ है। वह लंबा, गौर वर्ण का आकर्षक और रहस्यमयी व्यक्तित्व का स्वामी था। उसका लंबा पतला शरीर और लंबा ललाट, उसके ज्ञानी और तपस्वी होने की पुष्टि कर रहा था। उसने बेदाग सफेद धोती पहन रखी थी, उनके नंगे धड़ पर रंगबिरंगी पत्थरों से बनी माला लटक रही थी। उसकी सारी सांसारिक संपत्ति कपड़े के एक छोटी सी गठरी में एकत्रित थी जो उसके दूसरे कंधे से लटक रही थी।
मुलाकात का अवसर ना मिलने पर वह हड़बड़ाकर वहाँ से चला गया और महल के द्वार के सामने डेरा लगाकर बैठ गया और इंतजार करने लगा। एक तपस्वी सदैव प्रतीक्षा कर सकता है क्योंकि उसकी इच्छाएँ और जरूरतें कम होती हैं। इस पुरुष के मामले में उन आवश्यकताओं की पूर्ति वहाँ से गुजरने वाले सामान्य लोगों द्वारा की जाती थी जो ऐसे तपस्वी ज्ञानी की सलाह और आशीर्वाद का सम्मान करते थे। आते जाते लोग भोजन और दैनिक जीवन के लिए आवश्यक अन्य वस्तुएँ छोड़ जाते थे।
कई दिनों के पश्चात राजमाता को इस दिव्य पुरुष के अस्तित्व के बारे में पता चला। फिर, जिज्ञासावश उसे मिलने की अनुमति देने के लिए प्रेरित किया। बुलावा भेजने पर सैनिक उसे लेकर हाजिर हुए। वह भावहीन चेहरे के साथ राजमाता के सामने खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा। न कोई प्रणाम, न कोई अभिवादन, बस सिर्फ मूक दृष्टि!!!
आख़िरकार राजमाता ने कहा, "तुम मुझसे क्यों मिलना चाहते थे?"
"यह तय करने के लिए की क्या आप साम्राज्ञी बनने के लिए तैयार है या अभी भी केवल राजमाता ही बनी रहना चाहती है!!"
उस व्यक्ति के इस अत्यधिक अहंकार को देखकर दरबारियों में हंगामा मच गया और एक सैनिक तो उस पर हमला करने के लिए भी उठा, लेकिन राजमाता ने इशारे से उसे रोक दिया गया। इस व्यक्ति में राजमाता को रुचि जगी। शायद उसके पास अपने हास्यास्पद दावे का समर्थन करने के लिए कुछ था या शायद वह सिर्फ एक अहंकारी मूर्ख था। राजमाता ने सोचा, चलो पता लगाएं!!
"हम्म.. तो तुम्हारे आने का प्रयोजन तो पता चल गया... अब अपने बारे में भी तो कुछ बताओ"
"मेरा नाम विद्याधर है... और में विंध्य पर्वतों की तलहटी में बसे एक गाँव से आया हूँ"
"अच्छा विद्याधर, ये बताओ की यहाँ मेरे पास आना कैसे हुआ?" राजमाता को इस पुरुष में दिलचस्पी बढ़ने लगी
"में ज्ञानशीला नगर में शास्त्रों का अभ्यास कर रहा था... आए दिन कोई न कोई राजा उस नगर पर हमला कर देता और मेरे अभ्यास में बाधा पड़ती... तब मेरी रुचि इस भूगोल की राजनैतिक विषमताओ पर पड़ी.. यह प्रदेश कई राज्यों में बंटा हुआ है और सक्षम नेतृत्व के अभाव के कारण सारे राजा एक दूसरे से हमेशा लड़ते रहते है.. जरूरत है एक ऐसे सबल नेता की जो अपनी छाँव में सारे राज्यों को संभालकर एकता से जीना सीखा सके.. उन राजाओं के अहंकार और झूठी शान के खातिर सेंकड़ों सैनिकों की मृत्यु हो जाती है.. उनके परिवार अनाथ हो जाते है... आम जनता का जीवन भी व्याकुलता से भर जाता है... सक्षम राजाओं के लिए युद्ध अपना राज्य बढ़ाने का जरिया होगा पर आम प्रजाजनों का जीवन इससे नरक बन जाता है.. किसान खेती नही कर पाते, व्यापारी अपना उद्योग चला नही पाते... आवश्यक चीजें नही मिल पाती... महंगाई आसमान छु जाती है.. काफी गहन विचार के बाद में इस निष्कर्ष पर पहुंचा की अगर किसी सक्षम राज्य के नेतृत्व में अगर इन सारे कुनबों को ला दिया जाए तो इस खून खराबे का अंत हो जाएगा... प्रजाजन अपना जीवन खुशाली से व्यतीत कर पाएंगे... खेती और व्यापार बढ़ेगा तो सबका फायदा होगा!! काफी अध्ययन के बाद मुझे सूरजगढ़ की राजमाता में वह सारे गुण नजर आए जो में ढूंढ रहा था...में चाहता हूँ की आपके नेतृत्व में एक मजबूत साम्राज्य स्थापित किया जाए, फिर एक ऐसा राजवंश स्थापित होगा जो सैकड़ों वर्षों तक फैला रहेगा। मैं जानता हूं कि यह हमेशा के लिए नहीं रहेगा लेकिन यह मेरा उद्देश्य नहीं है। मेरा उद्देश्य, सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण यही है की इस खूनखराबे और युद्धों को रोका जाएँ!!"
राजमाता इस पुरुष की अस्खलित वाक छटा से काफी प्रभावित होकर सुनती ही रही... !!!
"जैसे चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को योग्य तालिम देकर एक सक्षम महाराजा बनाया था उसी तरह में आपको एक महान साम्राज्ञी बनने में आपकी सहायता करूंगा... और वो भी तब जब मुझे यह विश्वास हो जाएँ की आप इसके लिए योग्य हो!!"
उस पुरुष की बातें सुनते ही पूरी सभा आक्रोश से भर गई... यह टुच्चे आदमी की यह जुर्रत की वह राजमाता की योग्यता तय करेगा?? सेनापति अपने आसन से उठ खड़े हुए और उन्होंने अपनी तलवार निकाल ली। वह क्रोध से थरथर कांप रहे थे।
"राजमाता जी, आप आदेश करें तो एक पल में इस अहंकारी का सिर, धड़ से अलग कर दूँ"
राजमाता ने उत्तर नही दिया... वह इस तेजस्वी पुरुष की आँखों की चमक देखती रही... कुछ तो बात थी उसमें.. इतना विश्वास किसी इंसान में ऐसे ही नही प्रकट होता... किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले राजमाता उसकी बात को विस्तारपूर्वक सुनना चाहती थी... उन्होंने इशारा कर सभा को बर्खास्त करने का आदेश दिया... थोड़ी ही देर में पूरा सभाखण्ड खाली हो गया... बच गए तो सिर्फ विद्याधर और राजमाता।
"अब बताओ," राजमाता ने कहा, अब वह दोनों अकेले थे, "मैं तुम्हें गंभीरता से क्यों लूं? अशिष्टता और दंभ के अलावा तुम्हारे पास ऐसा क्या है, जो मुझे विश्वास दिलाएगा कि तुम इस कार्य में मेरी मदद कर सकते हो?"
"मेरे पास ज्ञान है, और उस ज्ञान को व्यावहारिक उपयोग में लाने की बुद्धि है," उसने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ कहा, "मैंने सभी शास्त्रों का सविस्तार पठन किया है। कई शास्त्र तो मुझे कंठस्थ है। मैंने लगन से ऐसे गुरुओं की तलाश की है जो न केवल मुझे प्राचीन ग्रंथ या शास्त्र पढ़ाएं बल्कि उनके पीछे की सच्चाई भी समझाएं। मैंने सीखा है कि महान चीजें अलौकिक या परग्रहवासी प्राणियों के कृत्यों से हासिल नहीं की जाती हैं, बल्कि उन विचारों के कठिन अनुप्रयोग से होती हैं जिनके बारे में कोई मानता है कि वे अलौकिक शक्तियों से आते हैं और इन तथाकथित पवित्र ग्रंथों या 'शास्त्रों' में निहित हैं। और जिसे आप अहंकार मानते हैं," विद्याधर ने आगे कहा, "वह असल में अहंकार नही है, मुझ पर, मेरे ज्ञान पर और अपने ज्ञान की व्याख्या करने और उसे क्रियान्वित करने की मेरी बुद्धिशक्ति पर पूर्ण विश्वास है। मैं अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त हूं और मुझे पूरा यकीन है कि मैं इसे हासिल कर सकता हूं अगर मुझे इसके लिए योग्य व्यक्ति मिलें।"
"और मैं तुम्हें कैसे विश्वास दिलाऊं कि वह योग्य व्यक्ति में स्वयं हूं?" राजमाता ने आँखों में चमक लाते हुए पूछा क्योंकि उन्हें यह पुरुष पसंद आने लगा था।
"मेरे कुछ सवालों का उत्तर देकर.. " विद्याधर ने जवाब दिया
"सवाल पूछो," राजमाता ने कहा और इंतजार करने लगी। उन्होंने नाटकीय ढंग से अपनी ठुड्डी के नीचे एक हाथ रखा और अपने चेहरे पर जिज्ञासा के भाव धारण कर लिए। वह इस अहंकारी पुरुष के साथ मानसिक द्वंदयुद्ध करने के लिए तैयार थी।
"सच और झूठ में क्या अंतर है?"
"कोई अंतर नहीं है," उन्होंने तुरंत कहा, "वह परिणाम ही है जो सच और जूठ को परिभाषित करता है।" यह कोई मौलिक उत्तर न था... शास्त्रों में इस विषय पर विस्तृत लेखन किया जा चुका है
"शक्ति का सही अर्थ क्या है?"
"यह उन साधनों में से एक है जिसके द्वारा आप अपने लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं। इसे प्रभावी ढंग से उपयोग करने के लिए व्यक्ति को इसका प्रतिरूपण करने में सक्षम होना चाहिए। उपयोग किए जाने पर शक्ति दिखाई देती है। मुख्य रूप से इसके उपयोग का खतरा इसे एक उपयोगी साधन बनाता है।
और मैं साधन शब्द पर जोर दे रही हूं, क्योंकि वही सब कुछ है - खुद को अभिव्यक्त करने और अपनी इच्छा थोपने का एक उपकरण। हम सभी के भीतर क्रूरता है, और जो चीज हमें एक दूसरे से अलग करती है,और यह वह है की हम किस हद तक इसे खुद को व्यक्त करने देते हैं।
एक शासक के रूप में यदि मैं इसका अत्यधिक उपयोग करती हूँ तो यह मुझे एक अत्याचारी भी बना सकता है। लेकिन मुझे उससे कोई फरक नही पड़ता, मुझे इसका उपयोग करना होगा फिर भले ही कुछ लोगों के लिए में अत्याचारी बन जाऊँ।"
काफी लंबा-चौड़ा उत्तर था.. राजमाता खुद अचंभित थी की यह सब उनके मन में त्वरित प्रकट कैसे हो रहा है!!
"अच्छे और बुरे में क्या अंतर है?" अगला प्रश्न आया
"कोई अंतर नहीं है," फिर से तुरंत जवाब आया, क्योंकि राजमाता ने स्वयं इस बारे में सोचा था और कुछ समय पहले एक उत्तर तैयार किया था, "यह व्याख्या का विषय है। एक व्यक्ति को मारना बुरा हो सकता है और एक हजार को मारना अच्छा हो सकता है। यह आपकी व्यक्तिगत सोच पर निर्भर करता है... अगर कहना चाहे तो कह सकते है की अंतर केवल दृष्टिकोण का है"
"क्या आप ऊपर वाले की शक्ति को मानते हैं?"
"हाँ, मानती हूँ... " दृढ़तापूर्वक राजमाता ने कहा
"तो अगर आपके गुरु आपसे कुछ न करने के लिए कहें क्योंकि ऊपरवाला नहीं चाहता की ऐसा हो, तो आप क्या करेंगे?"
"यह ऊपरवाले की इच्छा की उनकी व्याख्या होगी और यदि मेरी व्याख्या अलग है तो मैं जैसा चाहूँगी वैसा ही करूंगी।"