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अब विक्रम सिंह ने निशा को खड़ा कर लिया और उसकी एक टांग को अपने कंधे पर ले लिया।
जिससे उसकी चूत बिल्कुल खुल सी गई । निशा को गिरने से संभालने के लिए उसके दूसरी तरफ उषा जाकर खड़ी हो गयी और निशा की चुचियों को अपने मुंह में ले कर चूसने लगी ।
इधर विक्रम सिंह ने भी अपना लंड निशा की चूत में सेट कर दोबारा एक जोरदार प्रहार किया। इस तरह चुदाई करने से निशा को और भी ज्यादा मजा आने लगा। विक्रमसिंह तेज गति से धक्के मारते हुए निशा को चोद रहा था। उसकी चूत में विक्रम सिंह के लंड का घर्षण दोनों को बहुत मजा दे रहा था। उषा बुरी तरीके से निशा की चुचियों को चूस रही थी ।वह बीच-बीच में उसकी घुंडीयों को मसल देती ।
करीब 10 मिनट तक इसी पोज़ में चुदाई करते हुए निशा दुबारा जोरदार तरीके से झड़ गई ।और उसका पानी उसकी जांघों पर रिसता हुआ घास पर गिरने लगा।
इस तरह झड़ने से निशा अपने आप को संभाल नहीं पाई और नीचे की तरफ गिरने लगी। विक्रम सिंह का लंड अभी भी निशा की चूत में था। निशा को गिरने से बचाने के लिए विक्रम सिंह ने निशा की कमर को जोर से पकड़ लिया परंतु वह भी अपने आप को संभाल ना सके और निशा के साथ ही घास पर गिर पड़े । उनके इस तरह गिरने से विक्रम सिंह का लन्ड निशा की चूत में पूरी जड़ तक घुस गया और उसकी बच्चेदानी से टकराने लगा ।निशा जोर जोर से आहें भरने लगी। विक्रम सिंह ने भी उसको चोदना जारी रखा और तब तक चोदता रहा जब तक कि निशा चौथी बार झड़ कर पूरी तरीके से शांत ना हुई हो।
अब बारी उषा की थी। विक्रम सिंह ने अपना लंड निशा की चूत से बाहर निकाला और उषा को अपने हाथों से पकड़कर घोड़ी बना लिया। फिर उन्होंने उषा की चूत के मुहाने पर अपने लंड को सेट किया और तुरंत धकाधक उसको चोदने लगे। निशा अभी भी बुरी तरीके से हांफ रही थी ।थोड़ी देर में उसने अपने आप को संभाला और देखा कि विक्रम सिंह उषा को घोड़ी बनाकर चोद रहा है ।
निशा ने तुरंत लपककर उषा की चुचियों को अपने हाथो में भर लिया। उषा भी तकरीबन 2 बार झड़ चुकी थी।
कुछ देर उषा की चुदाई करने के बाद विक्रम सिंह को लगा कि वह झड़ने वाला है ।उसने तुरंत अपना लंड उषा की चूत से बाहर निकाला और खड़ा होकर जोर-जोर से मुठ मारने लगा। उषा और निशा समझ गई कि विक्रम सिंह का पानी निकलने वाला है ।वो दोनों विक्रम सिंह के लंड की ओर मुंह करके बैठ गई ।थोड़ी ही देर में विक्रम सिंह का लंड माल उगलने लगा। जो उन दोनों बहनों के मुंह और चुचियों पर जा लगा। दोनों बहने विक्रम सिंह के माल को चटकारे ले कर खाने लगी। अब वो तीनो लोग थक चुके थे । तीनो वही घास पर लेट गए ।
लेटे-लेटे निशा विक्रमसिंह से बोली-- आपने हम दोनों बहनों को मिलाकर बहुत बड़ा एहसान किया है ।हम दोनों बहने पास होते हुए भी इतनी दूर थी ।पर आज के बाद हम हमेशा खुश रहेंगे यह सब आप ही की वजह से हुआ है। विक्रमसिंह -- मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया किया। किया तो तुम दोनों बहनों ने मेरे लिए है। जो इतनी खूबसूरत चुतें मुझे उपहार में दे दी। मैं जिंदगी भर इस चुदाई को नहीं भूलूंगा। इसी तरह बातें करते करते उन्हें हल्की हल्की नींद आने लगी ।
तो उषा बोली --अब हमें घर में जाना चाहिए।
उसकी बात सुनकर वो तीनो लोग घर में आ गए ।निशा और उषा जाकर अपने कमरे में लेट गयी। और इधर विक्रमसिंह घर के बाहर चारपाई पर आकर लेट गया ।और चुदाई का सुखद अहसास का आनंद करते-करते सो गया।
अगले दिन विक्रमसिंह को अपने राज्य के लिए भी रवाना होना था ।वह सुबह जल्दी उठ गया और थोड़ी देर में ही नित्य क्रिया कलापों से निवृत्त हो गया। घर के बाकी लोग भी उढ़ चुके थे ।
मोहन की मां ,मोहन और उसके मामा का सर नशीली पत्तियों की वजह से थोड़ा थोड़ा दुख रहा था परंतु उन लोगों ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
निशा और उषा भी रात की चुदाई के बाद सुबह उठी तो उनका रूप और भी ज्यादा निखर गया था। थोड़ी ही देर में विक्रमसिंह जाने के लिए पूरी तरीके से तैयार हो चुका था।
विक्रम सिंह बोला -- मोहन ,अब मुझे जाना होगा ।तुम लोगों ने इतने दिन जो मेरी आवभगत की है ,उसके लिए मैं तुम लोगों का हमेशा एहसानमंद रहूंगा। और फिर कभी इस राज्य में आना हुआ तो मैं वादा करता हूं कि मैं तुमसे मिलकर ही जाऊंगा ।
इसी तरीके से थोड़ी देर बातें करने के बाद अब विक्रम सिंह जाने लगा ।उषा और निशा ने नम आखों से विक्रम सिंह को विदाई दी। उनकी आंखों में विक्रमसिंह के लिए प्यार झलक रहा था । परंतु वो उन्हें रोक भी नहीं सकती थी। उन्हें इस बात की खुशी जरूर थी कि उन दोनों को विक्रम सिंह के साथ चुदाई करने का सुख मिला था और विक्रम सिंह की वजह से ही वह दोनों बहने दोबारा बहुत अच्छी सहेलियां बन गई थी।
विक्रम सिंह महल की ओर चलने लगा। उसने सोचा कि जाने से पहले एक बार राजकुमारी मीनाक्षी देवी से मिल लेना चाहिए। मीनाक्षी देवी ने भी विक्रम सिंह को यात्रा के लिए शुभकामनाएं दी और साथ ही साथ उनके जाने के लिए एक घोड़े का इंतजाम कर दिया
विक्रम सिंह करमपुर से जिस घोड़े पर सवार होकर निकले थे वह घोड़ा तो उन्होंने नदी किनारे ही छोड़ दिया था। जिसके बाद वह उन्हें दोबारा दिखाई नहीं दिया। परंतु अब मीनाक्षी देवी ने उनके लिए एक नए घोड़े का इंतजाम कर दिया था। अब विक्रम सिंह उस पर सवार होकर विक्रम नगर की ओर चल पड़े।
लंबी यात्रा करने के बाद विक्रम सिंह अपने राज्य में पहुंच गया। हिमालय की वादियों में बसा उसका राज्य, विक्रम नगर,जहां चारों तरफ हरियाली ही हरियाली और उन पर जमी हुई हल्की-हल्की बर्फ की परतें इस राज्य की सुंदरता को चार चांद लगा देती थी। यहां की जनता अपने राजा विजय सिंह और उनके पुत्र विक्रम सिंह से बहुत खुश थी ।
विक्रम सिंह अपने राज्य में पहुंचकर एक अजीब सा सुकून महसूस करने लगा ।
परंतु जैसे जैसे वह महल की ओर जा रहा था ,उसने महसूस किया कि हमेशा खुश रहने वाले उसके राज्य के लोग दुखी दिखाई दे रहे थे। जहां जाओ, वहां एक अजीब सा सन्नाटा दिखाई दे रहा था।
विक्रमसिंह अचरज में पड़ गया ।उसने सोचा कि उसके जाने के बाद आखिर यहां पर हो क्या गया है ?
विक्रमसिंह थोड़ी देर और चला तो उसने देखा कि बहुत सारे घर खाली पड़े हुए थे। कई जगह समान जला हुआ पड़ा था।और तो और कई जगह खून भी पड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे कि पूरी बस्ती ही किसी ने उजाड़ दी हो।जैसे जैसे वो आगे चले जा रहा था मंज़र और भी भयानक होता जा रहा था।अब वहाँ पर लाशो के ढेर नज़र आ रहे थे।
उसके जाने से पहले यहां पर हमेशा चहल पहल रहा करती थी ।परंतु अब यहां उसे गिनती के कुछ लोग ही नजर आ रहे थे। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि कुछ लोग बैलगाडी में अपने घर का सामान भर रहे हैं ।
विक्रम सिंह उन लोगों के पास गया और उनसे पूछा - तुम लोग इस तरह अपने घर का सामान भरकर कहां जा रहे हो । चूँकि विक्रम सिंह ने सामान्य नागरिक के कपड़े पहने हुए थे इसलिए लोग यह समझ नहीं सके कि यह राजा विक्रम सिंह है।
विक्रम सिंह के सवाल पूछने पर एक बंदा बोला तुम यहां से चले जाओ भाई।
हम आगे ही बहुत दुखी हैं ।हमें अपना काम करने दो ।हम जल्द से जल्द इस राज्य को छोड़कर दूसरी जगह जाना चाहते हैं।
विक्रम सिंह के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा ।
उसने सोचा कि इस सुंदर राज्य में आने के लिए तो देवता भी एक दूसरे से लड़ पड़े ,ऐसे में यह लोग यहां से जा क्यों रहे हैं?
विक्रमसिंह को आभास हो गया कि जरूर उसके जाने के बाद यहां पर कुछ गलत हुआ है ।उसने तुरंत घोड़े को महल की ओर दौड़ा दिया ।रास्ते में उसने देखा कि सभी जगह एक जैसे ही हालात है ।कई लोग सामान भर-भरकर बैलगाड़ी में लाद रहे हैं ।
विक्रम सिंह के दिलों की धड़कन और तेज बढ़ गई ।उसने घोड़े को और तेज दौडाया ।
और पलक झपकते ही वह महल के पास पहुंच गया ।जब विक्रमसिंह ने राज दरबार में प्रवेश किया तो उसने देखा की वहां पर उसके पिता विजय सिंह और सारे मंत्रीगण उपस्थित थे। परंतु फिर भी दरबार में एक सन्नाटा पसरा पड़ा था ।
सब लोग एक दूसरे की तरफ देख कर चिंता जता रहे थे। जब उद्घोषक ने विक्रम सिंह के दरबार में आने की घोषणा की तो सारे लोग एकाएक विक्रम सिंह की ओर देखने लगे ।और सभी मंत्रियों में एकाएक कोतूहल मच गया ।
उनमें से एक मंत्री अचानक खड़ा हुआ और बोला --भगवान ने हमारी सुन ली। महाराज विक्रमसिंह वापस आ गए ।अब जरूर इस समस्या का कुछ ना कुछ हल निकल जाएगा ।
विक्रम सिंह तेज कदमों से आगे बढ़ता हुआ अपने पिता विजय सिंह के सिंहासन की ओर बढ़ा ।
(दरबार में विजय सिंह और विक्रम सिंह के सिंहासन ऊंचाई पर थे जहां पर सीढियां भी थी। )
विक्रम सिंह सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ अपने पिता विजय सिंह के सामने जा खड़ा हुआ ।महाराज विजयसिंह अभी भी चिंता में दिखाई दे रहे थे ।इधर दरबार में कोतूहल बढ़ने लगा ।उनकी आवाज विक्रमसिंह को परेशान करने लगी ।जब थोड़ी देर बाद भी आवाज़ बन्द न हुई तो,,,
विक्रम सिंह गरज कर बोला -- सारे लोग अभी के अभी चुप हो जाओ।वरना मैं किसी की गर्दन उड़ा दूंगा।
विक्रम सिंह की दहाड़ सुनकर पूरा दरबार सुन्न हो गया। अब विक्रम सिंह बोला --सभी लोग इसी वक्त दरबार से चले जाओ ।मुझे अपने पिता से अकेले में बात करनी है।
इतने में पास खड़ा
सेनापति बोला -- पर महाराज,
वह इतना बोला ही था कि विक्रम सिंह ने उसकी तरफ देखकर आंखें दिखाई। सेनापति विक्रम सिंह के गुस्से से परिचित था ।
वो तुरंत बोला --माफ कीजिए ,महाराज हम अभी जाते है।
यह बोलकर सेनापति के साथ साथ सारे मंत्री गण दरबार से चले गए ।अब दरबार में केवल विक्रम सिंह और विजय सिंह ही बचे थे।
विजयसिंह अभी भी खामोश थे ।उनको इस तरह खामोश देखकर विक्रमसिंह बोला -- पिताजी ,आप इतने चुप क्यों है ?
आखिर यहां पर हुआ क्या है ?
अभी मैं जब महल की ओर आ रहा था तब भी मैंने देखा कि राज्य की हालत खराब हुई पड़ी है।जगह जगह सामान बिखरा पड़ा था। खून के धब्बे नज़र आ रहे थे। लाशो के ढेर लगे पड़े थे।और बहुत सारे लोग तो राज्य छोड़कर भी जा रहे हैं ।
आखिर ऐसा क्या हो गया मेरे यहां से जाने के बाद?
अब विजय सिंह ने अपने चुप्पी तोड़ी और बोले --बेटा ,तुम्हारे जाने के बाद मत्स्य नगर के राजा करण सिंह ने हमारे राज्य पर हमला कर दिया।
युद्ध के मैदान में तो हमारे सैनिक उनको मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। परंतु उस कपटी राजा ने अपनी एक तिहाई सेना हमारे राज्य की सीमा के अंदर प्रवेश करवा दी।
हमने तुरंत युद्ध के मैदान से हमारी आधी सेना को वापस राज्य के अंदर बुला लिया। राज्य के अंदर हमारी सेना ने उनकी सेना को हरा तो दिया परंतु इसका खामियाजा आम जनता को भी भुगतना पड़ा। सैकड़ों लोगों के घर उजड़ गए। बहुत सारे आम लोग भी इस लड़ाई में मारे गए। देखते ही देखते हमारा यह हरा-भरा सुंदर राज्य किसी उजाड़ की तरह नजर आने लगा। हमने राज्य के अंदर तो करण सिंह की सेना को हरा दिया परंतु ......
विक्रम सिंह -- परंतु क्या पिताजी,
विजय सिंह --परंतु युद्ध के मैदान में हमारी शक्ति आधी हो गई थी। शत्रु ने इस परिस्थिति का फायदा उठाकर हमारे हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। सैकड़ों सैनिकों को मजबूरन घायल होकर वहां से भागना पड़ा। और अब स्थिति यह है कि हमारे पास लगभग एक तिहाई सेना ही बची है जो लड़ने की हालत में है।
उधर करण सिंह ने भी हमारे राज्य के लोगों को चेतावनी दी है कि जल्द से जल्द इस राज्य को छोड़कर चले जाएं। क्योंकि वो जल्दी ही अपनी पूरी सेना लेकर हमारे राज्य पर आक्रमण कर देगा।
लोग बुरी तरीके से डरे हुए हैं और यही वजह है कि वो हमारा राज्य छोड़कर जा रहे हैं।
अपने पिता की बात सुनकर विक्रमसिंह गुस्से से तिलमिला गया। वह बोला -- पिता जी मैं आपसे वादा करता हूं कि जब तक करण सिंह का सर आपके चरणो में लाकर नहीं रख दूंगा, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।
विजयसिंह --बेटा, अब तू ही इस बिखरते राज्य की आखिरी आस हो।
विक्रमसिंह --आप चिंता मत कीजिए पिताजी ,मैं उस करण सिंह के सर को एक झटके में धड़ से अलगकर दूंगा।और उसेे हमारे राज्य की दीवार पर टांग दूंगा ।
विजय सिंह -- पर बेटा, करण सिंह के पास बहुत बड़ी सेना है ।हमारी एक तिहाई सेना उनकी इतनी बड़ी सेना का कैसे मुकाबला कर पाएगी ?
विक्रमसिंह -वो सब आप मुझ पर छोड़ दीजिए पिताजी ।परंतु मुझे एक बात बताइए।
विजयसिंह-- बोलो बेटा
विक्रम सिंह --करण सिंह की सेना हमारे राज्य के अंदर कैसे आ पाई? हमारा राज्य तो तीन तरफ से हिमालय की ऊंची ऊंची वादियों से घिरा है और चौथी तरफ हमने एक मजबूत दीवार बनाई हुई है। तो उनके सैनिक इतनी भारी संख्या में हमारे राज्य के अंदर कैसे आए ?
विजयसिंह --बेटा विश्वासघात बड़े से बड़े राज्यों को भी श्मशान बना देता है। हमारे साथ भी ऐसा ही विश्वासघात हुआ है।
विक्रम सिंह -- कैसा विश्वासघात पिताजी
विजय सिंह-- बेटा तुम्हें उस सुरंग के बारे में पता है ना जो दिवार के नीचे से होते हुए हमारे राज्य के अंदर तक आती है। उसी सुरंग के माध्यम से शत्रु के सैनिक हमारे राज्य के अंदर आ गए।
विजयसिंह -- परंतु पिताजी, सुरंग के बारे में या तो आप जानते थे या फिर मैं। फिर शत्रु को उसका पता किसने बताया।
विजय सिंह -बेटा मेरे और तुम्हारे अलावा उस सुरंग के बारे में तीन और लोग भी जानते थे । वो मेरे विश्वस्त व्यापारी थे जो समय समय पर दूसरे राज्य से हथियारों और अन्य गुप्त वस्तुओं का जखीरा हमारे राज्य के अंदर लाते थे । उनमें से एक व्यापारी ने हमारे साथ विश्वासघात किया और उस सुरंग के बारे में शत्रु को बता दिया। बस उसी की वजह से शत्रु के सैनिक हमारे राज्य के अंदर आ गए। हमने उस विश्वासघाती को पकड़ने के लिए अपने सैनिक भी भेजे थे परंतु तब तक वो और उसकी बेटी इस राज्य को छोड़कर भाग चुके थे।वो तुमसे नही मिले कभी इसलिए न तो वो तुम्हें ओर न तुम उन्हें उनके चेहरे से पहचान सकोगे , वो सिर्फ मुझे ही जानते है।
अब विक्रम सिंह गुस्से से लाल हो चुका था ।वह दहाड़ते हुए बोला - पिताजी मुझे उस विश्वासघाती ओर उसकी बेटी का बस नाम बताइये, मैं कहीं से भी उन दोनों को ढूंढ कर लाऊंगा और पूरी प्रजा के सामने उनका सर धड़ से अलग कर दूंगा।
विजय सिंह ----- बेटा, उस विश्वासघाती व्यापारी का नाम है...…..............
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जयसिंह,
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ओर उसकी बेटी का नाम है
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" उषा"
जब विक्रम सिंह ने यह सुना तो उसके तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसके राज्य का गुनहगार उसकी आंखों के सामने था फिर भी वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका। विक्रम सिंह की आंखें गुस्से से लाल हो चुकी थी। वह बस किसी भी तरह तुरंत जयसिंह को पकड़कर अपने राज्य में लाना चाहता था। परंतु उसके सामने समस्या यह थी कि अगर वह अपने राज्य को छोड़ कर गया तो पता नहीं पीछे से कोई और अनहोनी ना हो जाए । पूरे राज्य की आस अब सिर्फ विक्रम सिंह पर ही आन पड़ी थी, अगर वो भी राज्य को इस मुसीबत की घड़ी में छोड़कर कहीं और चला जाता, तो युद्ध में उनकी हार निश्चित थी। इसीलिए विक्रम सिंह ने सोचा की जय सिंह को तो वह कभी भी जाकर पकड़ सकता है । उससे पहले करण सिंह से युद्ध में जीतने की योजना तैयार करनी चाहिए।
यह सोचकर विक्रमसिंह अपने पिता विजयसिंह से बोला -महाराज अब आप राज्य की चिंता मुझ पर छोड़ दीजिए। विक्रम सिंह को हराने का मैं शीघ्र ही कोई तरीका ढूंढ निकलूंगा।
विजयसिंह - बेटा हमें भी तुमसे यही आशा है। परंतु हमारे पास समय बहुत ही कम है ।करण सिंह किसी भी समय हमारे राज्य पर हमला कर सकता है।
विक्रम सिंह - पिता जी आप मुझ पर भरोसा रखिए। मैं शीघ्र ही कोई रास्ता निकाल दूंगा।
फिर विक्रम सिंह ने विजय सिंह को आराम करने के लिए भेज दिया और एक पहरेदार को आदेश दिया कि तुरंत सेनापति को उनके पास भेजा जाए। शीघ्र ही सेनापति राजा के सामने हाजिर हो गया।
विक्रमसिंह - सेनापति इस समय हमारे पास कितने सैनिक मौजूद हैं?
सेनापति - महाराज, हम इस आक्रमण में हमारी तकरीबन दो-तिहाई सेना खो चुके हैं ।अब हमारे पास मात्र 10000 सैनिक ही बचे हैं ।
विक्रम सिंह -- करण सिंह की सेना में कितने लोग हैं ?
सेनापति - करण सिंह की सेना में अभी भी तकरीबन 40 से 45000 सैनिक है।
विक्रम सिंह - हमारी सेना ने उनकी सेना को राज्य के भीतर हरा दिया था यानि उनको भी काफी सैनिकों का नुकसान उठाना पड़ा है ।
सेनापति - आपकी बात बिल्कुल सही है महाराज
विक्रम सिंह - इसका मतलब वह अभी तुरंत हम पर हमला नहीं करेंगे। वह अपनी शक्ति को पुनर्गठित करने के बाद ही हम पर हमला करने के बारे में सोचेंगे ।
सेनापति - जी महाराज
विक्रमसिंह - इसका मतलब अभी भी हमारे पास 7 से 10 दिनों का समय है। सेनापति परंतु महाराज उनकी सेना का मुकाबला करने के लिए हमें कम से कम 25000 सैनिकों की और आवश्यकता होगी और इतने कम समय में हम कहां से इतने सैनिक ला पाएंगे।
विक्रम सिंह -- सेनापति शायद तुम भूल रहे हो जहां पर शस्त्र काम नहीं आता वहां पर बुद्धि काम आती है।
सेनापति -- मैं आप का मतलब नहीं समझा
विक्रमसिंह - वह हम तुम्हें बाद में बताएंगे ।सबसे पहले हमें जनता से मिलना होगा ।इस समय हमारी जनता में डर और दुख का माहौल है ।हमें उनसे मिलकर उनमें एक नया विश्वास जगाना होगा ।तुम तुरंत राज्य में ढिंढोरा पीटा दो कि महाराज विक्रम सिंह राज्य की सारी जनता से मिलना चाहते हैं ।वो तुरंत महल के सामने आकर एकत्रित हो जाए ।
विक्रम सिंह की बात सुनकर सेनापति तुरंत वहां से गया और आदेश दे दिया कि राज्य में महाराज के आदेश का ढिंढोरा पीट दिया जाए।
जिससे उसकी चूत बिल्कुल खुल सी गई । निशा को गिरने से संभालने के लिए उसके दूसरी तरफ उषा जाकर खड़ी हो गयी और निशा की चुचियों को अपने मुंह में ले कर चूसने लगी ।
इधर विक्रम सिंह ने भी अपना लंड निशा की चूत में सेट कर दोबारा एक जोरदार प्रहार किया। इस तरह चुदाई करने से निशा को और भी ज्यादा मजा आने लगा। विक्रमसिंह तेज गति से धक्के मारते हुए निशा को चोद रहा था। उसकी चूत में विक्रम सिंह के लंड का घर्षण दोनों को बहुत मजा दे रहा था। उषा बुरी तरीके से निशा की चुचियों को चूस रही थी ।वह बीच-बीच में उसकी घुंडीयों को मसल देती ।
करीब 10 मिनट तक इसी पोज़ में चुदाई करते हुए निशा दुबारा जोरदार तरीके से झड़ गई ।और उसका पानी उसकी जांघों पर रिसता हुआ घास पर गिरने लगा।
इस तरह झड़ने से निशा अपने आप को संभाल नहीं पाई और नीचे की तरफ गिरने लगी। विक्रम सिंह का लंड अभी भी निशा की चूत में था। निशा को गिरने से बचाने के लिए विक्रम सिंह ने निशा की कमर को जोर से पकड़ लिया परंतु वह भी अपने आप को संभाल ना सके और निशा के साथ ही घास पर गिर पड़े । उनके इस तरह गिरने से विक्रम सिंह का लन्ड निशा की चूत में पूरी जड़ तक घुस गया और उसकी बच्चेदानी से टकराने लगा ।निशा जोर जोर से आहें भरने लगी। विक्रम सिंह ने भी उसको चोदना जारी रखा और तब तक चोदता रहा जब तक कि निशा चौथी बार झड़ कर पूरी तरीके से शांत ना हुई हो।
अब बारी उषा की थी। विक्रम सिंह ने अपना लंड निशा की चूत से बाहर निकाला और उषा को अपने हाथों से पकड़कर घोड़ी बना लिया। फिर उन्होंने उषा की चूत के मुहाने पर अपने लंड को सेट किया और तुरंत धकाधक उसको चोदने लगे। निशा अभी भी बुरी तरीके से हांफ रही थी ।थोड़ी देर में उसने अपने आप को संभाला और देखा कि विक्रम सिंह उषा को घोड़ी बनाकर चोद रहा है ।
निशा ने तुरंत लपककर उषा की चुचियों को अपने हाथो में भर लिया। उषा भी तकरीबन 2 बार झड़ चुकी थी।
कुछ देर उषा की चुदाई करने के बाद विक्रम सिंह को लगा कि वह झड़ने वाला है ।उसने तुरंत अपना लंड उषा की चूत से बाहर निकाला और खड़ा होकर जोर-जोर से मुठ मारने लगा। उषा और निशा समझ गई कि विक्रम सिंह का पानी निकलने वाला है ।वो दोनों विक्रम सिंह के लंड की ओर मुंह करके बैठ गई ।थोड़ी ही देर में विक्रम सिंह का लंड माल उगलने लगा। जो उन दोनों बहनों के मुंह और चुचियों पर जा लगा। दोनों बहने विक्रम सिंह के माल को चटकारे ले कर खाने लगी। अब वो तीनो लोग थक चुके थे । तीनो वही घास पर लेट गए ।
लेटे-लेटे निशा विक्रमसिंह से बोली-- आपने हम दोनों बहनों को मिलाकर बहुत बड़ा एहसान किया है ।हम दोनों बहने पास होते हुए भी इतनी दूर थी ।पर आज के बाद हम हमेशा खुश रहेंगे यह सब आप ही की वजह से हुआ है। विक्रमसिंह -- मैंने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया किया। किया तो तुम दोनों बहनों ने मेरे लिए है। जो इतनी खूबसूरत चुतें मुझे उपहार में दे दी। मैं जिंदगी भर इस चुदाई को नहीं भूलूंगा। इसी तरह बातें करते करते उन्हें हल्की हल्की नींद आने लगी ।
तो उषा बोली --अब हमें घर में जाना चाहिए।
उसकी बात सुनकर वो तीनो लोग घर में आ गए ।निशा और उषा जाकर अपने कमरे में लेट गयी। और इधर विक्रमसिंह घर के बाहर चारपाई पर आकर लेट गया ।और चुदाई का सुखद अहसास का आनंद करते-करते सो गया।
अगले दिन विक्रमसिंह को अपने राज्य के लिए भी रवाना होना था ।वह सुबह जल्दी उठ गया और थोड़ी देर में ही नित्य क्रिया कलापों से निवृत्त हो गया। घर के बाकी लोग भी उढ़ चुके थे ।
मोहन की मां ,मोहन और उसके मामा का सर नशीली पत्तियों की वजह से थोड़ा थोड़ा दुख रहा था परंतु उन लोगों ने इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
निशा और उषा भी रात की चुदाई के बाद सुबह उठी तो उनका रूप और भी ज्यादा निखर गया था। थोड़ी ही देर में विक्रमसिंह जाने के लिए पूरी तरीके से तैयार हो चुका था।
विक्रम सिंह बोला -- मोहन ,अब मुझे जाना होगा ।तुम लोगों ने इतने दिन जो मेरी आवभगत की है ,उसके लिए मैं तुम लोगों का हमेशा एहसानमंद रहूंगा। और फिर कभी इस राज्य में आना हुआ तो मैं वादा करता हूं कि मैं तुमसे मिलकर ही जाऊंगा ।
इसी तरीके से थोड़ी देर बातें करने के बाद अब विक्रम सिंह जाने लगा ।उषा और निशा ने नम आखों से विक्रम सिंह को विदाई दी। उनकी आंखों में विक्रमसिंह के लिए प्यार झलक रहा था । परंतु वो उन्हें रोक भी नहीं सकती थी। उन्हें इस बात की खुशी जरूर थी कि उन दोनों को विक्रम सिंह के साथ चुदाई करने का सुख मिला था और विक्रम सिंह की वजह से ही वह दोनों बहने दोबारा बहुत अच्छी सहेलियां बन गई थी।
विक्रम सिंह महल की ओर चलने लगा। उसने सोचा कि जाने से पहले एक बार राजकुमारी मीनाक्षी देवी से मिल लेना चाहिए। मीनाक्षी देवी ने भी विक्रम सिंह को यात्रा के लिए शुभकामनाएं दी और साथ ही साथ उनके जाने के लिए एक घोड़े का इंतजाम कर दिया
विक्रम सिंह करमपुर से जिस घोड़े पर सवार होकर निकले थे वह घोड़ा तो उन्होंने नदी किनारे ही छोड़ दिया था। जिसके बाद वह उन्हें दोबारा दिखाई नहीं दिया। परंतु अब मीनाक्षी देवी ने उनके लिए एक नए घोड़े का इंतजाम कर दिया था। अब विक्रम सिंह उस पर सवार होकर विक्रम नगर की ओर चल पड़े।
लंबी यात्रा करने के बाद विक्रम सिंह अपने राज्य में पहुंच गया। हिमालय की वादियों में बसा उसका राज्य, विक्रम नगर,जहां चारों तरफ हरियाली ही हरियाली और उन पर जमी हुई हल्की-हल्की बर्फ की परतें इस राज्य की सुंदरता को चार चांद लगा देती थी। यहां की जनता अपने राजा विजय सिंह और उनके पुत्र विक्रम सिंह से बहुत खुश थी ।
विक्रम सिंह अपने राज्य में पहुंचकर एक अजीब सा सुकून महसूस करने लगा ।
परंतु जैसे जैसे वह महल की ओर जा रहा था ,उसने महसूस किया कि हमेशा खुश रहने वाले उसके राज्य के लोग दुखी दिखाई दे रहे थे। जहां जाओ, वहां एक अजीब सा सन्नाटा दिखाई दे रहा था।
विक्रमसिंह अचरज में पड़ गया ।उसने सोचा कि उसके जाने के बाद आखिर यहां पर हो क्या गया है ?
विक्रमसिंह थोड़ी देर और चला तो उसने देखा कि बहुत सारे घर खाली पड़े हुए थे। कई जगह समान जला हुआ पड़ा था।और तो और कई जगह खून भी पड़ा था। ऐसा लग रहा था जैसे कि पूरी बस्ती ही किसी ने उजाड़ दी हो।जैसे जैसे वो आगे चले जा रहा था मंज़र और भी भयानक होता जा रहा था।अब वहाँ पर लाशो के ढेर नज़र आ रहे थे।
उसके जाने से पहले यहां पर हमेशा चहल पहल रहा करती थी ।परंतु अब यहां उसे गिनती के कुछ लोग ही नजर आ रहे थे। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि कुछ लोग बैलगाडी में अपने घर का सामान भर रहे हैं ।
विक्रम सिंह उन लोगों के पास गया और उनसे पूछा - तुम लोग इस तरह अपने घर का सामान भरकर कहां जा रहे हो । चूँकि विक्रम सिंह ने सामान्य नागरिक के कपड़े पहने हुए थे इसलिए लोग यह समझ नहीं सके कि यह राजा विक्रम सिंह है।
विक्रम सिंह के सवाल पूछने पर एक बंदा बोला तुम यहां से चले जाओ भाई।
हम आगे ही बहुत दुखी हैं ।हमें अपना काम करने दो ।हम जल्द से जल्द इस राज्य को छोड़कर दूसरी जगह जाना चाहते हैं।
विक्रम सिंह के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा ।
उसने सोचा कि इस सुंदर राज्य में आने के लिए तो देवता भी एक दूसरे से लड़ पड़े ,ऐसे में यह लोग यहां से जा क्यों रहे हैं?
विक्रमसिंह को आभास हो गया कि जरूर उसके जाने के बाद यहां पर कुछ गलत हुआ है ।उसने तुरंत घोड़े को महल की ओर दौड़ा दिया ।रास्ते में उसने देखा कि सभी जगह एक जैसे ही हालात है ।कई लोग सामान भर-भरकर बैलगाड़ी में लाद रहे हैं ।
विक्रम सिंह के दिलों की धड़कन और तेज बढ़ गई ।उसने घोड़े को और तेज दौडाया ।
और पलक झपकते ही वह महल के पास पहुंच गया ।जब विक्रमसिंह ने राज दरबार में प्रवेश किया तो उसने देखा की वहां पर उसके पिता विजय सिंह और सारे मंत्रीगण उपस्थित थे। परंतु फिर भी दरबार में एक सन्नाटा पसरा पड़ा था ।
सब लोग एक दूसरे की तरफ देख कर चिंता जता रहे थे। जब उद्घोषक ने विक्रम सिंह के दरबार में आने की घोषणा की तो सारे लोग एकाएक विक्रम सिंह की ओर देखने लगे ।और सभी मंत्रियों में एकाएक कोतूहल मच गया ।
उनमें से एक मंत्री अचानक खड़ा हुआ और बोला --भगवान ने हमारी सुन ली। महाराज विक्रमसिंह वापस आ गए ।अब जरूर इस समस्या का कुछ ना कुछ हल निकल जाएगा ।
विक्रम सिंह तेज कदमों से आगे बढ़ता हुआ अपने पिता विजय सिंह के सिंहासन की ओर बढ़ा ।
(दरबार में विजय सिंह और विक्रम सिंह के सिंहासन ऊंचाई पर थे जहां पर सीढियां भी थी। )
विक्रम सिंह सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ अपने पिता विजय सिंह के सामने जा खड़ा हुआ ।महाराज विजयसिंह अभी भी चिंता में दिखाई दे रहे थे ।इधर दरबार में कोतूहल बढ़ने लगा ।उनकी आवाज विक्रमसिंह को परेशान करने लगी ।जब थोड़ी देर बाद भी आवाज़ बन्द न हुई तो,,,
विक्रम सिंह गरज कर बोला -- सारे लोग अभी के अभी चुप हो जाओ।वरना मैं किसी की गर्दन उड़ा दूंगा।
विक्रम सिंह की दहाड़ सुनकर पूरा दरबार सुन्न हो गया। अब विक्रम सिंह बोला --सभी लोग इसी वक्त दरबार से चले जाओ ।मुझे अपने पिता से अकेले में बात करनी है।
इतने में पास खड़ा
सेनापति बोला -- पर महाराज,
वह इतना बोला ही था कि विक्रम सिंह ने उसकी तरफ देखकर आंखें दिखाई। सेनापति विक्रम सिंह के गुस्से से परिचित था ।
वो तुरंत बोला --माफ कीजिए ,महाराज हम अभी जाते है।
यह बोलकर सेनापति के साथ साथ सारे मंत्री गण दरबार से चले गए ।अब दरबार में केवल विक्रम सिंह और विजय सिंह ही बचे थे।
विजयसिंह अभी भी खामोश थे ।उनको इस तरह खामोश देखकर विक्रमसिंह बोला -- पिताजी ,आप इतने चुप क्यों है ?
आखिर यहां पर हुआ क्या है ?
अभी मैं जब महल की ओर आ रहा था तब भी मैंने देखा कि राज्य की हालत खराब हुई पड़ी है।जगह जगह सामान बिखरा पड़ा था। खून के धब्बे नज़र आ रहे थे। लाशो के ढेर लगे पड़े थे।और बहुत सारे लोग तो राज्य छोड़कर भी जा रहे हैं ।
आखिर ऐसा क्या हो गया मेरे यहां से जाने के बाद?
अब विजय सिंह ने अपने चुप्पी तोड़ी और बोले --बेटा ,तुम्हारे जाने के बाद मत्स्य नगर के राजा करण सिंह ने हमारे राज्य पर हमला कर दिया।
युद्ध के मैदान में तो हमारे सैनिक उनको मुंहतोड़ जवाब दे रहे थे। परंतु उस कपटी राजा ने अपनी एक तिहाई सेना हमारे राज्य की सीमा के अंदर प्रवेश करवा दी।
हमने तुरंत युद्ध के मैदान से हमारी आधी सेना को वापस राज्य के अंदर बुला लिया। राज्य के अंदर हमारी सेना ने उनकी सेना को हरा तो दिया परंतु इसका खामियाजा आम जनता को भी भुगतना पड़ा। सैकड़ों लोगों के घर उजड़ गए। बहुत सारे आम लोग भी इस लड़ाई में मारे गए। देखते ही देखते हमारा यह हरा-भरा सुंदर राज्य किसी उजाड़ की तरह नजर आने लगा। हमने राज्य के अंदर तो करण सिंह की सेना को हरा दिया परंतु ......
विक्रम सिंह -- परंतु क्या पिताजी,
विजय सिंह --परंतु युद्ध के मैदान में हमारी शक्ति आधी हो गई थी। शत्रु ने इस परिस्थिति का फायदा उठाकर हमारे हजारों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। सैकड़ों सैनिकों को मजबूरन घायल होकर वहां से भागना पड़ा। और अब स्थिति यह है कि हमारे पास लगभग एक तिहाई सेना ही बची है जो लड़ने की हालत में है।
उधर करण सिंह ने भी हमारे राज्य के लोगों को चेतावनी दी है कि जल्द से जल्द इस राज्य को छोड़कर चले जाएं। क्योंकि वो जल्दी ही अपनी पूरी सेना लेकर हमारे राज्य पर आक्रमण कर देगा।
लोग बुरी तरीके से डरे हुए हैं और यही वजह है कि वो हमारा राज्य छोड़कर जा रहे हैं।
अपने पिता की बात सुनकर विक्रमसिंह गुस्से से तिलमिला गया। वह बोला -- पिता जी मैं आपसे वादा करता हूं कि जब तक करण सिंह का सर आपके चरणो में लाकर नहीं रख दूंगा, तब तक चैन से नहीं बैठूंगा।
विजयसिंह --बेटा, अब तू ही इस बिखरते राज्य की आखिरी आस हो।
विक्रमसिंह --आप चिंता मत कीजिए पिताजी ,मैं उस करण सिंह के सर को एक झटके में धड़ से अलगकर दूंगा।और उसेे हमारे राज्य की दीवार पर टांग दूंगा ।
विजय सिंह -- पर बेटा, करण सिंह के पास बहुत बड़ी सेना है ।हमारी एक तिहाई सेना उनकी इतनी बड़ी सेना का कैसे मुकाबला कर पाएगी ?
विक्रमसिंह -वो सब आप मुझ पर छोड़ दीजिए पिताजी ।परंतु मुझे एक बात बताइए।
विजयसिंह-- बोलो बेटा
विक्रम सिंह --करण सिंह की सेना हमारे राज्य के अंदर कैसे आ पाई? हमारा राज्य तो तीन तरफ से हिमालय की ऊंची ऊंची वादियों से घिरा है और चौथी तरफ हमने एक मजबूत दीवार बनाई हुई है। तो उनके सैनिक इतनी भारी संख्या में हमारे राज्य के अंदर कैसे आए ?
विजयसिंह --बेटा विश्वासघात बड़े से बड़े राज्यों को भी श्मशान बना देता है। हमारे साथ भी ऐसा ही विश्वासघात हुआ है।
विक्रम सिंह -- कैसा विश्वासघात पिताजी
विजय सिंह-- बेटा तुम्हें उस सुरंग के बारे में पता है ना जो दिवार के नीचे से होते हुए हमारे राज्य के अंदर तक आती है। उसी सुरंग के माध्यम से शत्रु के सैनिक हमारे राज्य के अंदर आ गए।
विजयसिंह -- परंतु पिताजी, सुरंग के बारे में या तो आप जानते थे या फिर मैं। फिर शत्रु को उसका पता किसने बताया।
विजय सिंह -बेटा मेरे और तुम्हारे अलावा उस सुरंग के बारे में तीन और लोग भी जानते थे । वो मेरे विश्वस्त व्यापारी थे जो समय समय पर दूसरे राज्य से हथियारों और अन्य गुप्त वस्तुओं का जखीरा हमारे राज्य के अंदर लाते थे । उनमें से एक व्यापारी ने हमारे साथ विश्वासघात किया और उस सुरंग के बारे में शत्रु को बता दिया। बस उसी की वजह से शत्रु के सैनिक हमारे राज्य के अंदर आ गए। हमने उस विश्वासघाती को पकड़ने के लिए अपने सैनिक भी भेजे थे परंतु तब तक वो और उसकी बेटी इस राज्य को छोड़कर भाग चुके थे।वो तुमसे नही मिले कभी इसलिए न तो वो तुम्हें ओर न तुम उन्हें उनके चेहरे से पहचान सकोगे , वो सिर्फ मुझे ही जानते है।
अब विक्रम सिंह गुस्से से लाल हो चुका था ।वह दहाड़ते हुए बोला - पिताजी मुझे उस विश्वासघाती ओर उसकी बेटी का बस नाम बताइये, मैं कहीं से भी उन दोनों को ढूंढ कर लाऊंगा और पूरी प्रजा के सामने उनका सर धड़ से अलग कर दूंगा।
विजय सिंह ----- बेटा, उस विश्वासघाती व्यापारी का नाम है...…..............
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जयसिंह,
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ओर उसकी बेटी का नाम है
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" उषा"
जब विक्रम सिंह ने यह सुना तो उसके तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। उसके राज्य का गुनहगार उसकी आंखों के सामने था फिर भी वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका। विक्रम सिंह की आंखें गुस्से से लाल हो चुकी थी। वह बस किसी भी तरह तुरंत जयसिंह को पकड़कर अपने राज्य में लाना चाहता था। परंतु उसके सामने समस्या यह थी कि अगर वह अपने राज्य को छोड़ कर गया तो पता नहीं पीछे से कोई और अनहोनी ना हो जाए । पूरे राज्य की आस अब सिर्फ विक्रम सिंह पर ही आन पड़ी थी, अगर वो भी राज्य को इस मुसीबत की घड़ी में छोड़कर कहीं और चला जाता, तो युद्ध में उनकी हार निश्चित थी। इसीलिए विक्रम सिंह ने सोचा की जय सिंह को तो वह कभी भी जाकर पकड़ सकता है । उससे पहले करण सिंह से युद्ध में जीतने की योजना तैयार करनी चाहिए।
यह सोचकर विक्रमसिंह अपने पिता विजयसिंह से बोला -महाराज अब आप राज्य की चिंता मुझ पर छोड़ दीजिए। विक्रम सिंह को हराने का मैं शीघ्र ही कोई तरीका ढूंढ निकलूंगा।
विजयसिंह - बेटा हमें भी तुमसे यही आशा है। परंतु हमारे पास समय बहुत ही कम है ।करण सिंह किसी भी समय हमारे राज्य पर हमला कर सकता है।
विक्रम सिंह - पिता जी आप मुझ पर भरोसा रखिए। मैं शीघ्र ही कोई रास्ता निकाल दूंगा।
फिर विक्रम सिंह ने विजय सिंह को आराम करने के लिए भेज दिया और एक पहरेदार को आदेश दिया कि तुरंत सेनापति को उनके पास भेजा जाए। शीघ्र ही सेनापति राजा के सामने हाजिर हो गया।
विक्रमसिंह - सेनापति इस समय हमारे पास कितने सैनिक मौजूद हैं?
सेनापति - महाराज, हम इस आक्रमण में हमारी तकरीबन दो-तिहाई सेना खो चुके हैं ।अब हमारे पास मात्र 10000 सैनिक ही बचे हैं ।
विक्रम सिंह -- करण सिंह की सेना में कितने लोग हैं ?
सेनापति - करण सिंह की सेना में अभी भी तकरीबन 40 से 45000 सैनिक है।
विक्रम सिंह - हमारी सेना ने उनकी सेना को राज्य के भीतर हरा दिया था यानि उनको भी काफी सैनिकों का नुकसान उठाना पड़ा है ।
सेनापति - आपकी बात बिल्कुल सही है महाराज
विक्रम सिंह - इसका मतलब वह अभी तुरंत हम पर हमला नहीं करेंगे। वह अपनी शक्ति को पुनर्गठित करने के बाद ही हम पर हमला करने के बारे में सोचेंगे ।
सेनापति - जी महाराज
विक्रमसिंह - इसका मतलब अभी भी हमारे पास 7 से 10 दिनों का समय है। सेनापति परंतु महाराज उनकी सेना का मुकाबला करने के लिए हमें कम से कम 25000 सैनिकों की और आवश्यकता होगी और इतने कम समय में हम कहां से इतने सैनिक ला पाएंगे।
विक्रम सिंह -- सेनापति शायद तुम भूल रहे हो जहां पर शस्त्र काम नहीं आता वहां पर बुद्धि काम आती है।
सेनापति -- मैं आप का मतलब नहीं समझा
विक्रमसिंह - वह हम तुम्हें बाद में बताएंगे ।सबसे पहले हमें जनता से मिलना होगा ।इस समय हमारी जनता में डर और दुख का माहौल है ।हमें उनसे मिलकर उनमें एक नया विश्वास जगाना होगा ।तुम तुरंत राज्य में ढिंढोरा पीटा दो कि महाराज विक्रम सिंह राज्य की सारी जनता से मिलना चाहते हैं ।वो तुरंत महल के सामने आकर एकत्रित हो जाए ।
विक्रम सिंह की बात सुनकर सेनापति तुरंत वहां से गया और आदेश दे दिया कि राज्य में महाराज के आदेश का ढिंढोरा पीट दिया जाए।