S
StoryPublisher
Guest
लाजो के मुँह का स्वाद ! आह, स्वर्ग था ! लार की हल्की सोंधी मिठास और मुँह के अंदर की हवा में फूल सी गंध। उसने साँस लेने के लिए मुँह उठाया तो मैंने शेर के जबड़ों की तरह उसके गले पर मुँह जमा दिया और उसके नमकीन सुगंधित पसीने को जोर जोर चूसने लगा। वह हिरनी-सी छटपटाने लगी। मैंने सिर उठाकर उसकी छटपटाहट देखी और खुश होकर पुन: उसके मुँह पर हमला कर दिया।उसके लार को अपने मुँह में खींचकर पुन: उसके मुँह में ठेल दिया। उसके चेहरे को जकड़े उसके मुँह पर मुँह जमाए रहा जब तक कि वह उसे पी नहीं गई।
मन में खयाल आ गया कि ऐसे ही मैं इसे अपने लिंग से पिलाउंगा। आवेग में भरकर मैंने उसे बार-बार चूमा। फिर से उसके लार को चूसा और उसे पिलाया। उसका विरोध घटने लगा और फिर कभी मैं, कभी वो एक दूसरे को पीने लगे।
कुछ देर में उसकी बाँहें मेरी गर्दन में कस गईं और उसने अपने सामने के हिस्सों को मेरी नजरों से बचाने के लिए खुद को मुझमें चिपका लिया। क्या मजेदार बात थी। कहाँ तो नीचे अपनी योनि में मेरे लिंग को समाए थी और कहाँ ऊपर अपनी छाती दिखाने में भी शर्मा रही थी। उसने अपना चेहरा मेरे गले में घुसा लिया।
मैंने हँसकर उसके बालों को चूमा और उसके नितम्बों के नीचे हाथ डालकर उसे सम्हाल लिया। उसने दोनों पैर मेरी जांघों के पीछे लपेट दिए।
धक्के लगाने की तीव्र इच्छा को मैं किसी तरह दबाए था पर जब उसने अपने पैर मेरी जांघों पर लपेट दिए तो मारे खुशी और उत्तेजना के मैंने खुद को रोकने की कोशिश छोड़ दी। मैं उसके बदन पर आगे पीछे नाव की तरह हिचकोले खाने लगा। लिंग उसकी मखमली तहों में फिसलने लगा। ऐसी कसावट भरी मादक रगड़ थी कि शादी के बाद के शुरुआती दिनों की याद आ गई।
मैं उसके बदन पर प्यार के हल्के हिचकोलों को क्रमशः सम्भोग के धक्कों में बदलने लगा। योनि में अंदर फिसलते लिंग के आगे-पीछे होने की लम्बाई बढ़ने लगी। लाजो का मेरी पीठ पर पहले प्यार से घूमता हाथ आवेग में भरकर नाखूनों के खरोंच छोड़ने लगा। खरोंच के दर्द को मैं धक्के मारकर भुलाने की कोशिश करता। लाजो कभी दर्द से, कभी आनंद से कराह उठती। रह-रहकर उसकी बाँहें और जांघें मेरे शरीर पर भिंचने लगी। मुझे लगा वह अब अपने रंग में आ रही है। सही औरत का एकदम गर्म उत्तेजित रूप, जिसे चरम सुख की पूर्ण अवस्था तक पहुँचाना किसी भी पुरुष का दायित्व होता है।
मैंने उस दायित्व को पूरा करने के लिए गति बढ़ा दी। नरम, नाजुक लाजो को अपनी हट्टी-कट्ठी बहन की तरह जोरदार धक्कों की जरूरत नहीं थी। वह आहें भर रही थी और चरम सुख के करीब थी। एक मन हुआ कि अभी लिंग निकालकर उसको इस अंतिम सुख के लिए तड़पाऊँ, पर वह बेचारी इतनी देर से उत्तेजना और अपमान की यंत्रणा भुगत रही थी। हमने उसपर बहुत अत्याचार किया था। अब उसको न्याय देना जरूरी था। मैंने उसकी जांघों को फैला दिया ताकि लाजो का योनिछिद्र और चौड़ा हो जाए और उसको धक्कों में दर्द कम हो। लाजो बहुत कसी हुई थी। शायद ज्यादा संभोग नहीं कर पाई थी। शुक्र था, उसका अपना गीलापन उसकी मदद कर रहा था।
रेशमा से अलग, एक नया शरीर, नया अनुभव।
पेड़ू से पेड़ू टकराने की पनीली फच फच आवाजें। कमरे में गूंजती आहें… ओ माँ… ओओओओह… आआआह… !
रेशमा को तो सुनाई पड़ ही रहा होगा ना ! शायद वो तो कमरे के दरवाजे पर कान लगाए खड़ी होगी !
अभूतपूर्व आनन्द !
‘फच’ ‘फच’ ‘चट’ ‘चट’ को लांघती एक लम्बी सिसकारी। मेरे कंठ से भागती हुई ‘हुम्म’ ‘हुम्म’… मैंने लाजो को लाल आँखों से देखा। उसकी गुर्राहटें और फिर खुले मुख से एक लम्बी आआआआह ! उसने मुझे एकदम से भींच लिया और कंधे में दाँत गड़ा दिए। रस्सी की तरह बदन मरोड़ने लगी। मैंने उसको अपनी जाँघों के बीच जकड़ा और पेड़ू से पेड़ू को खूब दबाकर मसलने लगा ताकि भगांकुर की कली कुचले। इसके साथ ही मुझे लिंग पर उसकी योनि की हिचकियाँ महसूस होने लगीं।
थोड़ी ही देर में उस पर एक रस की फुहार आई। चरम सुख की मथानी से मथकर निकला रस। लाजो बेसुध होने लगी।
मेरा भी अंत आ गया था। मैं जानता नहीं था उसने गर्भ निरोध का क्या उपाय किया था। उसे किसी परेशानी में नहीं डालना चाहता था। इसलिए मैंने लिंग को बाहर निकाल लिया और उसे हाथ से झटके देते हुए वहीं तौलिये पर वीरगति को प्राप्त हो गया।
कुछ क्षण उसके आनन्द में डूबे चेहरे को देखता रहा। उसके सुंदर स्तनों पर, जांघों के बीच अंतरंग बालों पर, पूरे शरीर पर नजर डाली, फिर उसकी बगल में लेट गया।
मैं बेहद खुश था। जिंदगी किसी सुंदर सपने में थी।
मुझे रेशमा का ख्याल आया, मैंने एक चादर खींचकर लाजो को ओढ़ाया और किवाड़ पर हल्की दस्तक दी, रेशमा ने पलक झपकते ही दरवाजा खोल दिया।
“हो गया ना?” उसने पूछा।
“हाँ।” मैंने बाहर निकलते हुए सुख से गदगद स्वर में कहा।
“पूरा… कर दिया न उसको?”
मैंने सिर हिलाया।
रेशमा अंदर घुसी।
“सोई है।”।” मैं पीछे से फुसफुसाया।
लाजो के चेहरे पर तृप्ति थी। रेशमा ने थोड़ा सा चादर उठाकर देखा, अंदर से उसके स्तन झाँक रहे थे।
लाजो की निद्रा टूट गई। बहन को देखते ही उसने चादर खींचकर मुँह ढक लिया, रेशमा ने चादर के ऊपर से ही उसको चूम लिया।
मन में खयाल आ गया कि ऐसे ही मैं इसे अपने लिंग से पिलाउंगा। आवेग में भरकर मैंने उसे बार-बार चूमा। फिर से उसके लार को चूसा और उसे पिलाया। उसका विरोध घटने लगा और फिर कभी मैं, कभी वो एक दूसरे को पीने लगे।
कुछ देर में उसकी बाँहें मेरी गर्दन में कस गईं और उसने अपने सामने के हिस्सों को मेरी नजरों से बचाने के लिए खुद को मुझमें चिपका लिया। क्या मजेदार बात थी। कहाँ तो नीचे अपनी योनि में मेरे लिंग को समाए थी और कहाँ ऊपर अपनी छाती दिखाने में भी शर्मा रही थी। उसने अपना चेहरा मेरे गले में घुसा लिया।
मैंने हँसकर उसके बालों को चूमा और उसके नितम्बों के नीचे हाथ डालकर उसे सम्हाल लिया। उसने दोनों पैर मेरी जांघों के पीछे लपेट दिए।
धक्के लगाने की तीव्र इच्छा को मैं किसी तरह दबाए था पर जब उसने अपने पैर मेरी जांघों पर लपेट दिए तो मारे खुशी और उत्तेजना के मैंने खुद को रोकने की कोशिश छोड़ दी। मैं उसके बदन पर आगे पीछे नाव की तरह हिचकोले खाने लगा। लिंग उसकी मखमली तहों में फिसलने लगा। ऐसी कसावट भरी मादक रगड़ थी कि शादी के बाद के शुरुआती दिनों की याद आ गई।
मैं उसके बदन पर प्यार के हल्के हिचकोलों को क्रमशः सम्भोग के धक्कों में बदलने लगा। योनि में अंदर फिसलते लिंग के आगे-पीछे होने की लम्बाई बढ़ने लगी। लाजो का मेरी पीठ पर पहले प्यार से घूमता हाथ आवेग में भरकर नाखूनों के खरोंच छोड़ने लगा। खरोंच के दर्द को मैं धक्के मारकर भुलाने की कोशिश करता। लाजो कभी दर्द से, कभी आनंद से कराह उठती। रह-रहकर उसकी बाँहें और जांघें मेरे शरीर पर भिंचने लगी। मुझे लगा वह अब अपने रंग में आ रही है। सही औरत का एकदम गर्म उत्तेजित रूप, जिसे चरम सुख की पूर्ण अवस्था तक पहुँचाना किसी भी पुरुष का दायित्व होता है।
मैंने उस दायित्व को पूरा करने के लिए गति बढ़ा दी। नरम, नाजुक लाजो को अपनी हट्टी-कट्ठी बहन की तरह जोरदार धक्कों की जरूरत नहीं थी। वह आहें भर रही थी और चरम सुख के करीब थी। एक मन हुआ कि अभी लिंग निकालकर उसको इस अंतिम सुख के लिए तड़पाऊँ, पर वह बेचारी इतनी देर से उत्तेजना और अपमान की यंत्रणा भुगत रही थी। हमने उसपर बहुत अत्याचार किया था। अब उसको न्याय देना जरूरी था। मैंने उसकी जांघों को फैला दिया ताकि लाजो का योनिछिद्र और चौड़ा हो जाए और उसको धक्कों में दर्द कम हो। लाजो बहुत कसी हुई थी। शायद ज्यादा संभोग नहीं कर पाई थी। शुक्र था, उसका अपना गीलापन उसकी मदद कर रहा था।
रेशमा से अलग, एक नया शरीर, नया अनुभव।
पेड़ू से पेड़ू टकराने की पनीली फच फच आवाजें। कमरे में गूंजती आहें… ओ माँ… ओओओओह… आआआह… !
रेशमा को तो सुनाई पड़ ही रहा होगा ना ! शायद वो तो कमरे के दरवाजे पर कान लगाए खड़ी होगी !
अभूतपूर्व आनन्द !
‘फच’ ‘फच’ ‘चट’ ‘चट’ को लांघती एक लम्बी सिसकारी। मेरे कंठ से भागती हुई ‘हुम्म’ ‘हुम्म’… मैंने लाजो को लाल आँखों से देखा। उसकी गुर्राहटें और फिर खुले मुख से एक लम्बी आआआआह ! उसने मुझे एकदम से भींच लिया और कंधे में दाँत गड़ा दिए। रस्सी की तरह बदन मरोड़ने लगी। मैंने उसको अपनी जाँघों के बीच जकड़ा और पेड़ू से पेड़ू को खूब दबाकर मसलने लगा ताकि भगांकुर की कली कुचले। इसके साथ ही मुझे लिंग पर उसकी योनि की हिचकियाँ महसूस होने लगीं।
थोड़ी ही देर में उस पर एक रस की फुहार आई। चरम सुख की मथानी से मथकर निकला रस। लाजो बेसुध होने लगी।
मेरा भी अंत आ गया था। मैं जानता नहीं था उसने गर्भ निरोध का क्या उपाय किया था। उसे किसी परेशानी में नहीं डालना चाहता था। इसलिए मैंने लिंग को बाहर निकाल लिया और उसे हाथ से झटके देते हुए वहीं तौलिये पर वीरगति को प्राप्त हो गया।
कुछ क्षण उसके आनन्द में डूबे चेहरे को देखता रहा। उसके सुंदर स्तनों पर, जांघों के बीच अंतरंग बालों पर, पूरे शरीर पर नजर डाली, फिर उसकी बगल में लेट गया।
मैं बेहद खुश था। जिंदगी किसी सुंदर सपने में थी।
मुझे रेशमा का ख्याल आया, मैंने एक चादर खींचकर लाजो को ओढ़ाया और किवाड़ पर हल्की दस्तक दी, रेशमा ने पलक झपकते ही दरवाजा खोल दिया।
“हो गया ना?” उसने पूछा।
“हाँ।” मैंने बाहर निकलते हुए सुख से गदगद स्वर में कहा।
“पूरा… कर दिया न उसको?”
मैंने सिर हिलाया।
रेशमा अंदर घुसी।
“सोई है।”।” मैं पीछे से फुसफुसाया।
लाजो के चेहरे पर तृप्ति थी। रेशमा ने थोड़ा सा चादर उठाकर देखा, अंदर से उसके स्तन झाँक रहे थे।
लाजो की निद्रा टूट गई। बहन को देखते ही उसने चादर खींचकर मुँह ढक लिया, रेशमा ने चादर के ऊपर से ही उसको चूम लिया।