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लिसलिसी चुनमुनिया

शहर से आने के बाद सुगना बेहद खुश थी। खाना खिलाते हुए वह लापरवाही से अपनी चुचियों के दर्शन सरयू सिंह को करा रही थी। खाना खाने के पश्चात सुगना ने अपनी दवाइयां खाई और सोने चली गई पर उसकी आंखों में नींद कहां थी। आज उसने ठान लिया था कि किसी भी हाल में वह अपनी सास कजरी की चुदाई जरूर देखेगी।

उसने जानबूझकर आज कजरी की कोठरी में लालटेन उचाई पर रख दी थी जिसे बुझाने के लिए चारपाई से उठकर थोड़ी मेहनत करनी पड़ती। सुगना के कमरे का दिया बंद होते ही कजरी और सरयू सिंह खुस हो गए। थोड़ी देर इंतजार करने के बाद कजरी अपने कमरे में आ गई ।

सरयू सिंह ने भी अपना लंगोट खोला और कजरी के पीछे पीछे कमरे में आ गए।

कजरी ने कहा...

"कुंवर जी लाई रहुआ के तेल लगा दीं दिन भर चल ले बानी थक गइल होखब"

कजरी सचमुच कुंवर जी का ख्याल रखती थी वह उनके पैरों में तेल लगाने लगी।

सुगना बेसब्र मन से झरोखे से अपनी सास और उनके कुँवर जी कर रास लीला देख रही थी।

कजरी के हाँथ धीरे धीरे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे….

कजरी के हाथ सरयू सिंह के लंड तक पहुंच गए । कजरी ने उनकी जांघों पर लंगोट न पाकर पूछा

"पहिलही तैयारी कर के आइल बानी"

वह मुस्कुराने लगे उनका लंड अब तनाव में आ चुका था। कजरी ने उनके लंड को बाहर निकाल लिया और अपने हाथों में तेल लेकर उसे सहलाने लगी। जैसे जैसे कजरी के हाथ उस पर चल रहे थे लंड का तनाव बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में वह अपने पूर्ण आकार में आ गया। काला लंड तेल लग जाने से चमक रहा था। उसका मुखड़ा चुकंदर के जैसा लाल था।

सुगना अपने झरोखे से वह दृश्य देख रही थी उसका बहुप्रतिक्षित जादुई यंत्र उसके आंखों के सामने था जिस पर उसकी सास ने अधिकार जमा रखा था। कजरी के गोरे हाथों में उस काले लंड को देखकर वह सिहर उठी। कितना सुंदर था वह लंड । वह उसे छूना चाहती थी उसे महसूस करना चाहते थी। उसके सुपारे पर बना हुआ छोटा छेद सुगना को बेहद आकर्षक लग रहा था। यही वह द्वार था जहां से प्रेम रस आता होगा वह लंड की कल्पना में खोई हुई थी उधर उसकी हथेलियां अपने बुर तक पहुंच गयीं।

वह कभी उसे सहलाती कभी थपथपाती कभी उसे पकड़ने की कोशिश करती। बुर ने प्रेम रस छोड़ना शुरू कर दिया था जो उसकी हथेलियों को भिगो रहा था।

उधर कजरी ने लंड को तेजी से आगे पीछे करना शुरू कर दिया। सरयू सिंह की आंखें बंद हो रही थी। सरयू सिंह के हाँथ हरकत में आ गए उन्होंने कजरी की साड़ी खींचना शुरू कर दी। कजरी भी उनका साथ दे रही थी। कुछ ही देर में कजरी सिर्फ पेटीकोट में चारपाई पर थी।

सरयू सिंह ने कहा

"एकरो के खोल द"

"पहले तेल त लगा दी"

" हमु लगाइब"

कजरी खुश हो गई वह चारपाई से नीचे उतरी और अगले ही पल उसका पेटीकोट जमीन पर आ गया। लालटेन की रोशनी में सुगना के बाबूजी और उसकी सास जन्मजात नग्न अवस्था में आ गए थे।

कजरी ने कहा

"लालटेनवा त बुता (बंद) दीं"

"जरे द तहर बुर देखले ढेर दिन हो गइल बा"

सरयू सिंह के इस उदगार वाक्य में आलस और उत्तेजना दोनो का ही अंश था।

सुगना, कजरी की सुंदरता देख कर आश्चर्यचकित थी। इस उम्र में भी उसके बदन खासकर चूँचियों और नितंबों का आकार और कसाव कायम था।

कजरी अब सरयू सिंह के पेट पर बैठ चुकी थी। उसका चेहरा उनके पैरों की तरफ और सुगना की कोठरी कि तरफ था। उसकी बुर ठीक सरयू सिंह की नाभि पर थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे सरयू सिंह की नाभि कजरी की बुर से रिस रहे लार को इकठ्ठा करना चाह रही हो।

सुगना अपनी सास का चेहरा देख पा रही थी जो अब वासना से ओतप्रोत था। अब सरयू सिंह का चेहरा देखना उसके लिए संभव नहीं था फिर भी सुगना को सरयू सिंह के जिस अंग से सबसे ज्यादा प्यार था वह उसकी आंखों के ठीक सामने था।

कजरी फिर अपने हाथ एक बार उस लंड पर लायी और उसे सहला दिया। वह आगे बढ़कर उनके पैरों की मालिश करने लगी।

कजरी मालिश करने के लिए जैसे ही उनके पैरों तक पहुंचती उसकी चूचियां सरयू सिंह के लंड से टकरा जाती। सरयू सिंह का लंड भी उन मुलायम चूँचियों के स्पर्श से उछल जाता। लंड की उछाल सुगना अपनी आंखों से देख रही थी ऐसा लग रहा था जैसे कजरी की चूचियाँ सरयू सिंह के काले नाग को छेड़ रही हैं वह बार-बार उछलकर चुचियों के निप्पल से टकराने की कोशिश करता तब तक कजरी आगे बढ़ जाती।

उधर सरयू सिंह कजरी की फूली हुई बुर् का दीदार कर रहे थे। जब कजरी उनके पैरों तक पहुंचती कजरी की बुर थोड़ा सिकुड़ जाती पर वापस आते समय उसका बुर के होठों में छुपा पनियाया गुलाबी मुख सरयू सिंह की आंखों के सामने आ जाता। सरयू सिंह को वह गुलाबी गुफा बेहद प्यारी थी।

आखिर में कजरी की बुर सरयू सिंह की नाभि पर आकर टिक जाती। कजरी की बुर से बह रहा चिपचिपा रस सरयू सिंह की नाभि में भर चुका था।

जब कजरी आगे बढ़ती एक पतली चिपचिपी लार नाभि और बुर के बीच में बन जाती सरयू सिंह को स्त्री उत्तेजना का यह प्रतीक बेहद आकर्षक लगता जितना ज्यादा रस बुर से निकलता सरयू सिंह उतना ही खुश होते ।

सरयू सिंह से अब और बर्दाश्त ना हुआ उन्होंने अपनी हथेलियों में तेल लिया और कजरी की पीठ पर लगाने लगे कुछ ही समय में हथेलियों ने अपना रास्ता खोज लिया और वो कजरी की चुचियों को मीसने लगे। ऐसा लग रहा था जैसे सरयू सिंह मैदे की दो बड़ी-बड़ी गोलाइयों को अपने हाथों से गूंथ रहे थे।

सुगना सिहर उठी उनकी मजबूत हथेलियों में अपनी सास कजरी की चूँची को देखकर वह वासना से भर गई। वह अपने हाथों से ही अपनी चूचियां दबाने लगी। सुगना की चूचियां पूरी तरह तनी हुई और कड़ी थी वह चाह कर भी अपनी चुचियों को उतनी तेजी से नहीं दबा पा रही थी जितनी तेजी से सरयू सिंह कजरी की खुशियों को मसल रहे थे। सुगना के कोमल हाथ उसकी चूचियों को वह सुख दे पाने में नाकाम थे जो सरयू सिंह की हथेलियां कजरी को दे रही थी।

सरयू सिंह कजरी की चूचियों को तेजी से मसल रहे थे। कजरी ने कहा

"कुंवर जी तनी धीरे से ……..दुखाता"

सरयु सिंह ने कजरी को और पीछे खींच लिया. अब कजरी के गदराये नितंब उनके चेहरे के पास आ चुके थे। कजरी जैसे ही तेल लगाने के लिए आगे की तरफ झुकी उसने अपनी कमर पीछे कर दी। उसकी बुर सरयू सिंह के होठों पर बिल्कुल करीब आ गयी। सिंह ने देर न की और अपने होंठ अपनी भौजी कजरी के बुर् के होठों से सटा दिए।

कजरी चिहुँक उठी उसने सरयू सिंह की तरफ देखा। पर वह तो अपना चेहरा उसके नितंबों में छुपाए हुए थे। होंठ कजरी की बुर चूस रहे थे और नाक कजरी की गांड से छू रही थी।

सुगना अपने बाबू जी का चेहरा तो नहीं देख पा रही थी पर कजरी की कमर में हो रही हलचल से वह अंदाज जरूर लगा पा रही थी। तभी एक पल के लिए कजरी ऊपर उठी। सुगना को सरयू सिंह की ठुड्डी दिखाई पड़ गई। कजरी की भग्नासा सरयू सिंह की ठुड्डी से टकरा रही थी। कजरी की बुर् सरयू सिंह के होठों से सटी हुयी थी। सरयू सिंह बुर के होठों को चूसे जा रहे थे बीच-बीच में उनकी लंबी जीभ दिखाई पड़ती जो कजरी की बुर में न जाने कहां गुम हो जा रही थी।

सुगना तड़प उठी एक पल के लिए उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे सरयू सिंह के होंठ उसकी अपनी ही बुर पर आ गए हों. बुर के अंदर एक मरोड़ सी उठी। उसने अपनी जांघों को तेजी से सिकोड लिया बुर को सहला रही उसकी हथेलियां स्वतः ही सिकुड़ गई और छटक कर बाहर आ गयीं.

सरयु सिंह की जीभ अपना कमाल दिखाने लगी और कजरी की कमर तेजी से हिलने लगी। वह स्वयं अपनी बुर को अपने कुंवर जी के चेहरे पर रगड़ने लगी। कजरी ने अपने होंठ खोलें और अपने कुंवर जी के मोटे लंड को अपने होंठों के बीच ले लिया।

सुगना से अब और बर्दाश्त ना हो रहा था। सुगना को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसकी सासु मां ने उसका लॉलीपॉप छीन लिया हो। बात सही थी चुदने की उम्र सुगना की थी और चुद कजरी रही थी। नियति का यह खेल निराला था। सुगना के लॉलीपॉप पर उसकी सास ने कब्जा कर रखा था।

सुगना अपनी चिपचिपी बुर को अपनी उंगलियों से फैला रही थी वह अपनी उंगली को बुर के अंदर प्रवेश कराना चाहती थी पर उसकी कौमार्य झिल्ली उसे रोक रही थी। वह जैसे ही अपनी उंगलियों का दबाव बढ़ाती एक दर्द की लहर उसकी बुर में उठती। अपनी उंगलियों को हटा लेती। इस खुशी के मौके पर वह दर्द सहने के मूड में नहीं थी। उसने अपना ध्यान बुर् की भग्नासा पर लगा दिया। उसे सहलाने में उसे अद्भुत आनंद मिलता था।

उधर कजरी सरयू सिंह के लंड को तेजी से चूसने लगी। कजरी के मुंह में उनके लंड का एक चौथाई भाग ही जा पाता इससे ज्यादा जाना संभव भी नहीं था। कजरी के मुख से लार बहने लगा था जिसमें सरयू सिंह के लंड से रिस रहा वीर्य भी शामिल था। कजरी की हथेलियां उसे लंड पर बराबरी से लगा रही थी। वह उनके अंडकोशो को भी सहला रही थी जो लंड के साथ सहबाला ( विवाह के समय दूल्हे के साथ जाने वाला छोटा बच्चा जो सामान्यतः छोटा भाई या रिश्तेदार होता है ) की तरह सटे हुए थे।

कुछ देर सरयु सिंह का लंड चूसने के बाद अचानक कजरी सरयू सिंह के ऊपर से उठ गयी। यह दृश्य देख रही सुगना अचानक हुए दृश्य परिवर्तन से हड़बड़ा गयी। वह जिस डिब्बे पर खड़ी होकर यह दृश्य देख रही थी असंतुलित होकर उसके पैरों से हट गया एक टनाक………. की आवाज आई कजरी और सरयू सिंह सचेत हो गए. आवाज सुगना के कमरे से आई थी।

कजरी ने कहा

"जाकर देखी ना का भईल बा"

"तू ही चल जा"

"हमरा कपड़ा पहिने कें परि आप धोती लपेट के चल जायीं।"

सरयू सिंह का लंड पूरी तरह तना हुआ था वह कजरी की बुर का इंतजार कर रहा था पर अचानक आई इस आवाज ने उनकी उत्तेजना में विघ्न डाल दिया था।

सुगना को देखना जरूरी था। उसके हाथ में प्लास्टर पहले से लगा हुआ था वह किसी अप्रत्याशित घटना को सोचकर घबरा गए।

तभी कजरी ने वहीं से आवाज दी

"सुगना….., सुगना……"

सुगना अपनी सास की आवाज सुन रही थी पर उसने कोई जवाब न दिया वह अपने जगे होने का प्रमाण नहीं देना चाह रही थी कजरी ने फिर कहा

"एक हाली जाके देख आयीं"

उन्होंने अपनी धोती कमर में लपेटी पर वह अपने लंड को धोती से नहीं छुपा पाये। उसे अपने हाथों से अपने पेट से सटाए हुए अपनी टॉर्च लेकर आगन में आ गए और सुगना के दरवाजे पर पहुंचकर उन्होंने टॉर्च जला दी। अंदर का दृश्य देखकर वह सन्न रह गए।

सुगना अपनी चारपाई पर लेटी हुई थी। उसकी ब्लाउज सामने से पूरी तरह खुली हुई थी दोनों चूचियां खुली हवा में सांस ले रहीं थीं। टॉर्च की रोशनी से सुगना ने आंखे मीच ली थीं जिसे सरयू सिंह ने देख लिया। कमर के नीचे सुगना के शरीर पर सिर्फ पेटीकोट था जो उसकी कमर और जाँघों को ढका हुआ था। सुगना की चूचियां उसकी सांसों के साथ ऊपर नीचे हो रही थी वह अपनी सांसों को सामान्य रखने की कोशिश कर रही थी पर यह संभव नहीं था उत्तेजना अपना अंश छोड़ चुकी थी।

कजरी के कमरे से आ रही लालटेन की रोशनी सरयू सिंह की आंखो को नजर आ गई उस झरोखे के ठीक नीचे टीन का डिब्बा लुढ़का हुआ पड़ा था।

सरयू सिंह को सारा माजरा समझ में आ गया वह यह जान चुके थे कि सुगना उनके और कजरी के बीच में चल रही रासलीला को देख रही थी और उत्तेजित होकर अपनी चुचियों और हो सकता है जांघों के बीच छुपी कोमल बुर् का मर्दन कर रही थी।

शायद इसी दौरान असंतुलित होकर वह डिब्बे से फिसल गई और अपनी लज्जा बचाने के लिए वह तुरंत ही चारपाई पर लेट गई थी।

सरयू सिंह अपनी बहू की इच्छा जान चुके थे वह हमेशा उसे खुश करना चाहते थे आज उन्होंने मन ही मन फैसला कर लिया और चुपचाप कजरी के कमरे में वापस आ गए।

उनके लंड ने उछल कर उनके फैसले पर मुहर लगाई और वह तन कर कजरी की बुर में जाने के लिए तैयार हो गया।

सरयू सिंह मन ही मन मुस्कुरा रहे थे कजरी अपनी जांघें फैलाए लेटी हुई थी। सरयू सिंह को देखते ही उसने पूछा

"सुगना ठीक बिया नु?"

"हां आराम से सुतल बिया एगो टीन के डिब्बा बिलरिया गिरा देले रहे" सरयू सिंह ने अपना उत्तर कुछ तेज आवाज में ही दिया था। सुगना ने भी सरयू सिंह का वह उत्तर सुन लिया और अपनी चोरी न पकड़े जाने से वह खुश हो गयी। खुशी ने उसकी उत्तेजना को फिर जागृत कर दिया और वह एक बार फिर टिन के डब्बे पर चढ़कर अपनी सास की चुदाई देखने आ गयी।

सुगना की चूचियों को देखने के बाद सरयू सिंह सिंह की उत्तेजना नए आयाम पर जा पहुंची थी। उनके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ सुगना घूम रही थी।

कजरी अचानक उन्हें सुगना दिखाई पड़ने लगी। कजरी की दोनों जाँघों के बीच उस फूली हुई चूत में वह सुगना की बुर ढूंढने लगे। उनके मन से सुगना के प्रति बहू और पुत्री का भाव बिल्कुल खत्म हो चुका था। वह उन्हें कामोत्तेजना से भरी एक युवा नारी के रूप में दिखाई पड़ने लगी जो अब से कुछ देर पहले उनकी और कजरी की रासलीला देख रही थी।

सरयू सिंह ने जब सुगना की मां पदमा को चोदा था तब उसकी उम्र भी सुगना के लगभग बराबर थी। सुगना की कामुकता और मादकता ने सरयू सिंह के मन में सुगना को एक भोगने योग्य नारी के रूप में प्रस्तुत कर दिया था। रिश्तो की मर्यादा को तार-तार कर जब सुगना स्वयं ही उनके करीब आना चाहती थी तो उनका यह कर्तव्य बनता था कि वह कामोत्तेजना से भरी उस सुंदरी की इच्छा पूरी करें।

उधर कजरी और सरयू सिंह के बीच हुआ वार्तालाप सुगना ने सुन लिया था उसने अपने न पकड़े जाने पर ऊपर वाले का शुक्रिया अदा किया और एक बार फिर उसी टीन के डिब्बे पर चढ़कर कजरी और सरयू सिंह की रास लीला देखने लगी।

सरयू सिंह का दिमाग लंड के आधीन हो चुका था। उन्होंने मन ही मन यह सोच लिया की उनकी बहू सुगना एक बार फिर झरोखे से उनकी चुदाई देख रही होगी इस ख्याल मात्र से ही उनकी उत्तेजना भड़क उठी वह अपनी सुगना बहू को अद्भुत नजारा दिखाने के लिए बेताब हो उठे। उन्होंने झुककर कजरी की बुर को चूम लिया।

उन्होंने कजरी की जांघों को फैला कर उसके बुर को सुगना की निगाहों के ठीक सामने कर दिया। वह अपनी उंगलियों से कजरी की बुर फैलाने लगे। सुगना सिहर रही थी। सरयू सिंह कजरी के बगल में थे उन्होंने अपनी जीभ कजरी के भगनासे पर रगड़ना शुरू कर दिया।

कजरी अपनी जाँघें कभी फैला रही थी और कभी सिकोड रही थी।

सरयू सिंह अपनी एक हथेली से अपने लंड को सहला रहे थे वह बार बार उस झरोखे को देख रही थे। सुगना वह दृश्य देख रही थी कभी-कभी उसे लगता जैसे आज कुछ नया हो रहा है। कभी-कभी वह सोचती कहीं उसके बाबूजी को उसकी इस चोरी का पता तो नहीं चल गया? परंतु उसकी उत्तेजना इस संभावना को नजरअंदाज कर उसे झरोखे पर बनाए रखती।

उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि उसके बाबू जी उसकी इस चोरी को पकड़ चुके थे। उधर कजरी अब पूरी तरह गर्म हो चुकी थी उसने कहा

"कुंवर जी अब तड़पाई मत आ जायीं"

सरयू सिंह ने कहा

"का जाने काहें आज तहरा के खूब चोदे के मन करता"

" का बात बा शहर में कोनो नया छोकरी पसंद आई गइल हा का?"

सुगना को अचानक ही उस होटल में हुयी रात की घटना याद आ गई जब उसके बाबूजी ने उसकी चुचियों पर टॉर्च मारा था और आज एक बार फिर उसकी चूचियां उसकी बाबूजी के टॉर्च से प्रकाशमान हो गई थीं। सरयू सिंह ने कजरी की चारपाई को खींचकर इस तरह व्यवस्थित कर दिया जिससे सुगना को चुदाई स्पस्ट दिखाई पड़े।

कजरी सरयू सिंह के उत्साह को देखकर आश्चर्यचकित हो गयी उसने पूछा

" चारपाई काहे खींच तानी" उन्होंने उत्तर दिया

"आज शुभ दिन भर पूरब ओरे मुंह करके चोदला पर ढेर मजा मिली"

कजरी और सुगना दोनों को यह बात कतई समझ ना आई पर सुगना मुस्कुरा रही थी अब कजरी की बुर उसे और अच्छे से दिखाई देने लगी थी।

सरयू सिंह ने अपना लंड अपनी कजरी भौजी की चूत में डालना शुरू कर दिया। कजरी की आंखें बड़ी होती चली गई। दस पंद्रह साल चुदने के बाद भी जब सरयू सिंह का मूसल कजरी की ओखली में प्रवेश करता उसकी आंखें फैल जाती। वह आज भी एक नवयौवना की तरह चुदने का आनंद लेती सरयू सिंह भी अपनी कजरी भौजी की चूत के मुरीद थे।
 
सुगना इस बात से घबरा रही थी कि जब उसकी सास की फूली हुई चुदी चुदाई बुर सरयू सिंह के लंड को आसानी से नहीं ले पा रही थी तो वह अपनी छोटी सी कोमल बुर में यह मोटा मुसल कैसे ले पाएगी। वह सिहर रही थी। उसकी उत्तेजना ने उसके डर को नजरअंदाज कर दिया था। वह उसकी आंखों के सामने हो रही इस चुदाई से अभिभूत थी। सरयू सिंह ने अपना लंड आगे पीछे करना शुरू कर दिया। वह कजरी की चूचियों को अपने होंठों में लेकर चूसने लगे।

कमरे में घपा... घप ….घपा….घप... की आवाजें गूंजने लगी. कजरी के कहा…

"कुंवर जी तनी धीरे धीरे……"

सरयू सिंह उसे लगातार चोद रहे थे। बीच-बीच में वह अपनी निगाह झरोखे के तरफ ले जाते जैसे वह सुगना से पूछना चाहते हों

"सुगना बाबू ठीक लगा ता नु"

जब भी सुगना उन्हें अपनी तरफ देखते हुए पाती वह सिहर उठती। उसके मन में एक बार फिर डर आ जाता कि कहीं बाबूजी उसकी असलियत जान तो नहीं रहे हैं। जितना ही वह सोचती उतना ही वह सिहर उठती पर उत्तेजना ने उसे अब बेशर्म बना दिया था। सुगना अपनी बुर को तेजी से सहलाए जा रही थी। वह इस अद्भुत चुदाई को देखकर सुध बुध खो बैठी थी। एक हाथ से कभी वह अपनी चूची सहलाती कभी बुर। दूसरा हाँथ प्लास्टर लगे होने के कारण अपनी उपयोगिता खो चुका था।

कजरी की जाँघे तनने लगीं। वह " कुंवर जी….. कुंवर जी… आह…..ईईईई।।।।आ।।ई…..हुऊऊऊ हम्म्म्म। की आवाजें निकालते हुए स्खलन के लिए तैयार हो गयी। सरयू सिंह ने आज अपने मन में अपनी बहू सुगना को कमर के नीचे भी नग्न कर लिया था। वह उसकी कोमल बुर के आकार की कल्पना तो नहीं कर पा रहे थे और उन्होंने मन ही मन उसकी खूबसूरती को जरूर सोच लिया था। कजरी की बुर चोदते समय उनके दिमाग में कभी सुगना की मां पदमा आ रही थी कभी स्वयं सुनना ।

सरयू सिंह सुगना को अपने जहन में रखकर कजरी की बुर चोद रहे थे इसी कारण अब वह उस झरोखे की तरफ देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे। आज उन्होंने कजरी के साथ साथ अपनी बहू सुगना को भी अपनी वासना के दायरे में ले लिया था।

कजरी की हिलती हुई चूचियां उन्हें सुगना की चूचियां प्रतीत होने लगी। सरयू सिंह से अब बर्दाश्त ना हुआ। उन्होंने झुक कर सुगना ( कजरी) की चुचियों को मुंह में भर लिया उनकी आत्मग्लानि एक पल के लिए गायब हो गयी। कजरी की चुचियों को चूसते हुए उन्हें सुगना की चूचियां ही याद आती रहीं। वह मन ही मन सुगना की चूचियों को चूसते रहें और अपने ख्वाबों में अपनी बहू सुगना की बुर चोदते रहे। कुछ पलों के लिए वासना पूरी तरह उनके दिमाग पर हावी हो चली थी।

कजरी सरयू सिंह के इस उत्तेजक व्यवहार से आश्चर्यचकित थी । सरयू सिंह की अद्भुत चुदाई और चूची पीने के अंदाज से वह अद्भुत तरीके से झड़ने लगी। वह कभी अपनी जांघों को फैलाती कभी सिकोडती कभी उनकी कमर पर लपेट लेती।

वह हांफ रही थी और उनकी पीठ पर नाखून गड़ा रही थी। वह सरयू सिंह के विशाल शरीर में समा जाना चाहती थी। कजरी के शरीर की हलचल कम होते ही सरयू सिंह ने अपना लंड बाहर निकाल लिया। लंड से वीर्य की धार फूट पड़ी। कजरी के गोरे शरीर पर लंड से निकल रहा सफेद वीर्य गिर रहा था। कभी वह कजरी के चेहरे पर जाता कभी गर्दन पर कभी चुचियों पर। सरयू सिंह अपने हाथों से अपने लंड को पकड़ कर अपनी भाभी के हर अंग को सींच रहे थे।

उत्तेजना से भरे उनके मन में एक बार आया कि वह वीर्य की एक धार अपनी बहू सुगना के लिए झरोखे की तरफ भी उछाल दें पर वह ऐसा नहीं कर पाए।

उत्तेजना का खेल खत्म हो रहा था वीर्य की आखिरी बूंद निकल चुकी थी तना हुआ लंड सरयू सिंह अपनी कजरी भाभी के भग्नासे पर अभी भी पटक रहे थे। कजरी अपनी हथेलियों से अपनी बुर को ढक कर उस प्रहार से बचना चाह रही थी। उसकी बुर अब संवेदनशील हो चली थी।

उधर सुगना आज अपनी उंगलियों से ही स्खलित हो गई थी। आज देखे गए दृश्य उसके जेहन पर छा गए थे। सरयू सिंह अब उसकी ख्वाबों के शहजादे बन गए थे। उसने मन ही मन सरयू सिंह से चुदने के लिए ठान लिया था। वह उसके आदर्श और अपेक्षित पुरुष बन गए थे। रिश्ते नाते त्याग कर सुगना अपनी जांघें फैलाकर अपने बाबू जी का स्वागत करने को तैयार हो रही थी। वह सरयू सिंह से मिलन के लिए भगवान से प्रार्थना कर रही थी।

नियति मुस्कुरा रही थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वह ससुर और बहू को मिलाने का प्रण कर चुकी थी।

शेष अगले भाग में......
 
सुबह सुबह दालान में बैठे हुए सरयू सिंह धूप सेंक रहे थे। कजरी ने जो तेल कल रात उनके शरीर पर लगाया उसका अंश अब भी उनके शरीर पर था। वह अपने घर की बदली हुई परिस्थितियों के बारे में सोच रहे थे।

सुगना को ससुराल आए को चार-पांच महीने बीत चुके थे। सुगना जब इस घर में आई थी उन्होंने उसे एक बहू और पुत्री के रूप में ही माना था। उसके प्रति उनके मन में कामुकता कतई न थी। ऐसा नहीं था की सुगना की कद काठी उन्हें दिखाई नहीं पड़ती थी। वह तो नारी शरीर के पारखी थे पर जब मन में भाव गलत ना हो तो यह आवश्यक नहीं कि सुंदरता हमेशा उत्तेजना को जन्म दे।

परन्तु पिछले एक दो महीनों में सुगना के व्यवहार में परिवर्तन आया था। वो उस परिवर्तन के बारे में खो गए। कैसे उन्होंने हैण्डपम्प पर बर्तन धोते समय उसकी चूँचियों का उपरी भाग देखा वो भी एक बार नहीं की कई बार। क्या सुगना उन्हें वह दिखाना चाहती थी? क्या वह अकस्मात हुआ था ? पर कई बार? यह महज संयोग था या सुगना उन्हें उकसा रही थी? प्रश्न कई थे और उत्तर सरयू सिंह के विवेकाधीन था। उत्तेजना और पारिवारिक संबंध दो अलग-अलग पलड़ों पर थे तराजू की डंडी सरयू सिंह के हाथ में थी। दिमाग पारिवारिक संबंधों का साथ दे रहा था पर लंड उत्तेजना की तरफ झुक रहा था। नियति समय-समय पर उत्तेजना का पलड़ा भारी कर रही थी। उनके और सुगना के बीच दूरियां तेजी से कम हो रही थीं।

विशेषकर होटल में बितायी गयी उस रात जब उन्होंने सुगना की चूँचियों को नग्न देखा था उनकी उत्तेजना ने सुगना से पुत्री का दर्जा छीन लिया। और कल की रात …. वो उत्तेजना की पराकाष्ठा थी… सारे संबंध कामुकता की भेंट चढ़ गए थे।

कैसे वह अपनी भौजी कजरी को चोद रहे थे वह भी सुगना को दिखा दिखा कर और तो और उत्तेजना के उत्कर्ष पर वह अपने मन मे अपनी पुत्री समान बहु को चोदने लगे थे।

उन्हें एक बार फिर आत्मग्लानि होने लगी। सुगना जवान थी उसे सम्भोग सुख प्राप्त नहीं हो रहा था इसके कारण भी वही थे जिन्होंने बिना रतन की सहमति से उसका विवाह सुगना से कर दिया था। ऐसी युवती यदि किसी जोड़े को सम्भोग करते हुए यदि देखती भी हो तो उसमें क्या बुराई थी? क्या इस देखने मात्र से वह उनकी बहू बेटी न रहेगी?

सरयू सिंह की दुविधा कायम थी। तभी सुगना की पायल की आवाज आई वो पास आ रही थी…

"बाबुजी दूध ले लीं" सुगना ने अपनी नजरें झुकाई हुई थी कल रात के दृश्य के बाद वह अभी उनसे बात कर पाने की स्थिति में नहीं थी।

सरयू सिंह ने दूध ले लिया। सुगना वापस जा रही थी और सरयू सिंह की निगाहें उसकी गोरी और बेदाग पीठ से चिपक गयीं जब तक वो निगाहें फिसलते हुए नितंबो तक पहुंचतीं सुगना निगाहों से ओझल हो गयी।

सुगना जिस आत्मीयता से उन्हें बाबूजी कहती थी वह भाव सरयू सिंह के विचारों पर तुरंत लगाम लगा देता। सरयू सिंह की कामुक सोच तुरंत ठंडी पड़ जाती। उन्हें यह प्रतीत होने लगता कि सुगना उनके बारे में कभी कामुक तरीके से नहीं सोच सकती। वह कभी-कभी दुखी भी हो जाते। परंतु मन के किसी कोने में उनकी कामुकता ने सुगना को अपनी मलिका का दर्जा दे दिया था।

कुछ ही दिनों बाद दशहरा आने वाला था. सुगना का पति रतन सुगना के आने के कुछ दिनों बाद मुंबई चला गया था जो अभी तक नहीं लौटा था वह साल में दो बार आया करता एक बार दशहरा या दिवाली पर दूसरी बार होली के अवसर पर।

शहर में उसकी महाराष्ट्रीयन पत्नी बबीता एक होटल की रिसेप्शनिस्ट थी वह अनुपम सुंदरी थी और शहर की आधुनिकता में ढली हुई थी।

होटल के रिसेप्शन पर रहने के कारण उसे हमेशा टिपटॉप रहना पड़ता था। रतन से उसकी मुलाकात भी उसी होटल में हुई थी जब वह अपने बॉस के साथ उस होटल में किसी कार्य के लिए गया हुआ था। रतन एक आकर्षक व्यक्तित्व का धनी था। वह सरयू सिंह का भतीजा था और सरयू सिंह के परिवार का अंश था। उसमें सरयू सिंह जैसी मर्दानगी तो नहीं थी पर कम अभी नहीं थी।

बबीता और रतन करीब आते गए । बबीता की गोरी चिकनी चूत में अपना लंड डालकर रतन सारी दुनिया भूल गया था। उसे एक पल के लिए भी सुगना का ख्याल नहीं आया था। जब एक बार बबीता की मलाईदार चूत का चस्का रतन को लग गया वह दिन प्रतिदिन उसके करीब आता गया। गांव के भोले भाले रतन को दुनिया का अनोखा सुख प्राप्त हो चला था। उसका भोलापन बबीता ने हर लिया और उसे एक शहर का इंसान बना दिया चतुर और चालाक।

बबीता ने रतन पर विवाह करने का दबाव बढ़ाया तब जाकर रतन को सुगना का ख्याल आया। रतन दुविधा में फंस गया अंत में वह बबीता का आग्रह न ठुकरा पाया और सरयू सिंह और कजरी से अनुमति लिए बिना विवाह कर लिया। उसने मन ही मन अपने और सुगना के बीच हुए बाल विवाह को नकार दिया था।

बबीता सच में सुंदर थी छोटी-छोटी मझौली चूचियां और छोटे चिकने गोलनितंब लिए हुए वह शहर की एक सुंदर लड़की थी। रतन उसकी खूबसूरती में पूरी तरह खो गया था यही कारण था कि जब वह गवना के बाद अपनी पत्नी सुगना को देखा तो ग्रामीण और शहरी लड़की का जो अंतर स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है उसमें बबीता सुगना से कहीं ज्यादा खूबसूरत दिखाई पड़ी। रतन वैसे भी व्यभिचारी नहीं था। उसने सुगना को हाथ तक नहीं लगाया और वह उसे सुहाग की सेज पर अकेला छोड़कर वापस चला गया.

कजरी के मन में अभी भी उम्मीद कायम थी कि शायद इस बार रतन और सुगना के बीच कुछ नजदीकियां बढें और सुगना को पत्नी सुख की प्राप्ति हो जिसके लिए वह अब अधीर हो चली थी।

कजरी को इस बात की भनक न थी की सुगना और सरयू सिंह इस तरह करीब आ रहे हैं। वह उन्हें घुल मिलकर बात करते हुए देखती और सुगना की खुशी देखकर वह बेहद प्रसन्न हो जाती पर इन नज़दीकियों में उसे कामुकता की उम्मीद कतई न थी। उसे यह भी ज्ञात नहीं था कि कल रात नियति ने उसे भी अपनी साजिश का एक हिस्सा बना लिया था।

सुगना के हाथ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था कजरी ने उसे पूरा आराम करने के लिए कहा. वैसे भी एक हाथ से कोई काम होना संभव न था. वह सरयू सिंह के पास ज्यादा समय व्यतीत करती. सरयू सिंह को भी उसका साथ अच्छा लगता था। वह उनकी नई नई प्रेमिका बन रही थी। सरयू सिंह ने अब उसे पदमा के रुप में देखना शुरू कर दिया था। वह एक विवाहिता थी जो उनके भतीजे की पत्नी थी। यह नियति का खेल था कि वह अब तक कुंवारी थी अन्यथा यह वही अवस्था थी जब पद्मा ने उनके साथ पहली बार संभोग किया था। सरयू सिंह का हृदय परिवर्तन हो रहा था। अभी दो-चार दिन पहले ही उन्होंने कजरी को सुगना बनाकर अपनी वासना शांत की थी और सुगना ने अपनी सास को उन्हें चोदते हुए देखा था.

घर के पिछवाड़े में अमरूद के पेड़ पर फल आये हुए थे। सुबह-सुबह सुगना नहा कर लहंगा और चोली पहने टहल रही थी।

लहंगे का कपड़ा बेहद मुलायम था। सुगना को कभी-कभी यह एहसास होता जैसे वह नग्न ही घूम रही हो हाथ मे लगे प्लास्टर को छोड़कर उसका कमनीय शरीर बेहद आकर्षक लग रहा था। सरयू सिंह अचानक घूमते हुए सुगना के पास आ गए। सुगना चहक उठी। उसकी निगाह एक अमरुद पर टिकी थी जो लगभग पक चुका था। उसने सरयू सिंह से कहा

"बाबूजी उ अमरुदवा तूर दी"

सरयू सिंह ने उसे अपने हाथों से तोड़ने की कोशिश की पर उसकी ऊंचाई कुछ ज्यादा थी. वह अगल-बगल किसी उचित लकड़ी की तलाश करने लगे। तभी सुगना ने कहा "बाबू जी हमरा के उठायीं हम तूर लेब"

सरयू सिंह को एक पल के लिए यह अजीब लगा अपनी जवान बहु को उपर उठाने का मतलब उसके शरीर को बेहद करीब से छूना पड़ता।

सुगना अपने दोनों हाथ ऊपर कर अमरूद की डाली को पकड़ने की कोशिश करने लगी। वह सरयू सिंह को उसे उठाने के लिए आमंत्रित कर रही थी। सरयू सिंह ने कोई रास्ता न देख सुगना को पीछे जाकर उसकी जांघों को पकड़ लिया और ऊपर उठाने लगे। सुगना आगे की तरफ गिरने लगी। सुगना ने फिर कहा

"बाबूजी आगे से पकड़ीं ना त हम गिर जाइब"

अब तक सरयू सिंह में पिस्टन में लहू भरना प्रारंभ हो चुका था। कामुकता जाग चुकी थी।

सरयू सिंह ने सुगना को सामने से पकड़ लिया। उनकी मजबूत बांहों ने सुगना के नितंबों के नीचे अपना घेरा बना लिया और सरयू सिंह सुगना को लेकर खड़े हो गए। सुगना के मुलायम और कोमल नितंब उनकी मजबूत भुजाओ पर टिक गए। लहंगे का मुलायम कपड़ा सरयू सिंह और सुगना के नितंबों के बीच कोई अवरोध उत्पन्न नहीं कर पा रहा था सरयू सिंह को एक पल के लिए ऐसा एहसास हुआ जैसे उन्होंने नंगी सुगना को अपनी गोद में उठा लिया हूं उनका लंड थिरक उठा।

सरयू सिंह का चेहरा सुगना की नंगी नाभि से टकरा रहा था। सरयू सिंह को एक साथ सुगना के कई अंगों का स्पर्श मिल रहा था। एक तरफ सुगना के कोमल नितम्ब उनकी भुजाओं से छूकर एक सुखद एहसास दे रहे थे वहीं वह अपने गालों और चेहरे से सुगना ने चिकने और नग्न पेट को महसूस कर रहे थे।

अचानक उन्होंने अपने होंठ उसकी नाभि से सटा दिए। सुगना सिहर उठी। उसने अपने हाथ अपने बाबूजी के सर पर रख दिए। वह इस दुविधा में थी कि अपने बाबूजी के सर को अपने पेट की तरफ खींचे या बाहर की धकेले। दरअसल सरयू सिंह के नाक के नीचे खुजली हुयी थी जिसे उन्होंने सुगना के पेट से रगड़ कर शांत करने की कोशिश की थी। सुगना तो अब सरयू सिंह की हर हरकत से ही उत्तेजित जो जाती थी चाहे वह अकस्मात ही क्यों न हुआ हो।

सुगना ने कहा

"बाबू जी थोड़ा और ऊपर उठायीं"

सरयू सिंह ने अपनी भुजाएं और ऊपर कर दी. सुगना और ऊपर उठ गई। सरयू सिंह का चेहरा सुगना की जाँघों के जोड़ पर आ गया। सरयू सिंह के होंठ अब ठीक सुगना की बूर के उपर थे यदि लहंगा न होता तो सरयू सिंह अपनी बहू की पवित्र गुफा का न सिर्फ स्पर्श महसूस कर लेते अपितु उस पर आए मदन रस का स्वाद भी ले लेते।

सुगना की वह अद्भुत दरार गीली हो चुकी थी। उसकी खुसबू सरयू सिंह के नथुनों से टकरा रही थी। चुदी हुयी चूत की खुश्बू सरयू सिंह बखूबी पहचानते थे पर सुगना वह तो पाक साफ और पवित्र थी।

वो सुगना की बुर पर ध्यान लगा कर आंनद लेने लगे। उनकी उत्तेजना जागृत हो चली थी। धोती के नीचे लंड लंगोट फाड़कर बाहर आने को तैयार था। सुगना सरयू सिंह की गर्म सांसे अपनी बुर पर महसूस कर रही थी।

वह जान बूझ कर अमरूद तोड़ते हुए अपनी जांघो के जोड़ को अपने बाबुजी चेहरे पर रगड़ रही थी।

नियति यह प्रेमालाप देख रही थी। सरयू सिंह इस अद्भुत पल का आनंद ले रहे थे तभी सुगना ने वह अमरुद पकड़ लिया। उधर सुगना ने अमरुद पकड़ा और उधर सुगना की बुर का भग्नासा सरयू सिंह की नाक से टकरा गया। ससुर और बहू दोनों इस छुअन से सिहर उठे।

सुगना खिलखिला कर हंसी और बोली "बाबूजी अमरूद मिल गईल अब उतार दीं"
 
सरयू सिंह ने सुगना को धीरे-धीरे नीचे करते गए. नीचे उतरते उतरते एक बार सुगना की चूँचियां उनके चेहरे से छूती हुई नीचे चली गई। उनकी हथेलियों में भी सुगना के नितंबों का स्पर्श महसूस कर लिया था। एक पल के लिए सरयू सिंह की उंगलियों ने सुगना के मुलायम नितंबों को दबाना चाहा पर सरयू सिंह ने दिमाग ने रोक लिया।

यह उत्तेजना सरयु सिंह के लिए बिल्कुल नयी थी। वह बेहद खुश थे। जब सुगना नीचे उतर रही थी वह भी पूरी तरह सचेत थी सरयू सिंह के लंड में आया उभार सुगना ने भी महसूस कर लिया था। ससुर और बहू तेजी से करीब आ रहे थे। नियति मुस्कुरा रही थी उसकी साजिश कामयाब होने वाली थी.

इधर सरयू सिंह सुगना से अंतरंग हो रहे थे उधर उनका दुश्मन सुधीर वकील जिंदगी की जंग लड़ रहा था……..

शेष अगले भाग में।

इधर सरयू सिंह सुगना से अंतरंग हो रहे थे उधर उनका दुश्मन सुधीर वकील जिंदगी की जंग लड़ रहा था……..

हरिया बाहर दरवाजे पर खड़ा सरयू भैया... सरयु भैया... पुकार रहा था।

"का भईल हो."

"हम शहर जा तानी। तू हूँ चलके.. सुघीरवा के देख आवा। ओकरा होश आ गईल बा का जाने पुलिस ले तोहरा के मत फसा दे"

बात सच थी। सुधीर वकील था जितना चतुर उतना ही हरामी। संयोग से उस दिन सरयू सिंह भी शहर में थे जिस दिन सुधीर की कुटाई हुई थी। यदि वह पुलिस के सामने उनका नाम ले लेता तो सरयू सिंह के लिए नई मुसीबत खड़ी हो जाती। उन्होंने हरिया का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

"ठीक बा हम तैयार हो के आवतानी"

वह आगन में आ गए और कजरी और सुगना को शहर जाने की सूचना दी। वह दोनों झटपट उनके लिये नाश्ते की तैयारी में लग गयीं। उन्हीने कजरी और सुगना से पूछा

"शहर से कुछ ले आवे के बा?"

सुगना चाहती तो बहुत कुछ पर उसने कहा "कब ले आइब"

सुगना के मुंह से यह शब्द सुनकर सरयू सिंह खुश हो गए. उनकी प्यारी सुगना अब उनका इंतजार किया करती है यह बात इनके दिल को छू गई.

कजरी ने कहा

"देखीं सुगना बेटी राउर केतना ख्याल राखे ले"

यह कह कर कजरी ने किए धरे पर पानी फेर दिया। सुगना की कुवारी बुर सूंघने के बाद सरयू सिंह ने सुगना से बेटी का दर्जा छीन लिया था।

रास्ते भर वो सुगना के साथ अपनी रेल यात्रा के दौरान उसके स्पर्श को याद करते रहे। धोती के अंदर लंड परेशांन होकर उन्हें गरिया रहा था। लेना एक नया देना दो, वो बेचारा खामखां परेशान हो रहा था।

दोपहर तक सरयू सिंह हरिया के साथ अस्पताल पहुंच चुके थे। उन्हें अस्पताल दुनिया की सबसे गंदी जगह लगती थी जहां सिर्फ और सिर्फ दर्द था। यहां भी वह अपना दर्द लेकर ही आए थे पर यह दर्द उनके डर के कारण जन्मा था और उन्हें मजबूरन सुधीर से मिलने आना पड़ा था।

हॉस्पिटल के बेड पर लेटा हुआ सुधीर अपनी आंखें खोल कर टुकुर-टुकुर देख रहा था। उसने सरयू सिंह और हरिया को पहचान लिया। सरयू सिंह ने पूछा

"कैसे हो गईल हो?"

तभी सुधीर की पत्नी ने घुंघट के अंदर से कहा

"इहे चारों ओर केस करत चलेले। रामपुर के तीन चार गो लड़का मरले रहले हा सो"

सरयू सिंह को यह जानकर हर्ष हुआ की सुधीर को मारने वाले लोग पहचान लिए गए थे और उनका इस केस से कोई संबंध नहीं था। सुधीर की आंखों में भी नफरत कम दिखाई पड़ रही थी। सरयू सिंह का हॉस्पिटल आना लगभग सफल हो गया था।

वह कुछ देर सुधीर के साथ रहे साथ में लाया हुआ फल उन्होंने सुधीर की पत्नी को पकड़ाया और बोले

"भगवान इनका के जल्दी ठीक करो फेर केस भी त लड़े के बा।"

उन्होंने सुधीर को हंसाने की कोशिश की थी। सुधीर की नफरत निश्चय ही घट चुकी थी वह मुस्कुराने लगा। घुंघट के अंदर से सुधीर की पत्नी की हंसी सुनाई दी।

सरयू सिंह खुश हो गए और हरिया के साथ हॉस्पिटल से बाहर आ गए। आज का दिन शुभ हो गया था। उन्होंने खेती किसानी से संबंधित शहर के कुछ और कार्य निपटाए और वापसी में स्टेशन जाने के लिए निकल पड़े। रिक्शे पर आज सुगना की जगह हरिया बैठा हुआ था।

एक वह दिन था जब उत्तेजना चरम पर थी और एक आज का दिन था। वह रास्ते में फिर सुगना की यादों में खो गए। उन्हें वह होटल दिखाई दे गया जिसमें उन्होंने सुगना के साथ रात गुजारी थी और उसकी मदमस्त चूचियों के दर्शन किए थे। होटल से कुछ ही दूर पर वह कपड़े की दुकान भी दिखाई पड़ी। उस दुकान के बगल में लटके हुए औरतों के अंग वस्त्र देखकर सरयू सिंह का मन ललच गया। वह मॉडल उन्हें सुगना दिखाई देने लगी। उनके मन में आया कि वह रिक्शा रोककर अपनी सुगना के लिए वह अंतर्वस्त्र ले लें और उसे मॉडल की तरह सजा कर …...आगे वह स्वयं शर्मा गए। उनकी सोच पर दिमाग का नियंत्रण कायम था परंतु उनकी लंगोट में हलचल होने लगी लगी। लंड का तनाव बढ़ रहा था उन्हें दर्द का एहसास होने लगा।

हरिया ने कहा

"कहां भुलाईल बाड़ा भैया"

सरयू सिंह चाह कर भी हरिया को हकीकत नहीं बता सकते थे. जहां उनका सुखचैन खोया था वह उनकी अपनी बहू सुगना की बुर थी। उन्होंने बात टाल दी।

स्टेशन पर उतरने के बाद उन्होंने सुगना और कजरी के लिए उनकी पसंद की मिठाइयां लीं और वापस ट्रेन पकड़ने के लिए चल पड़े.

उधर सुधीर की पत्नी रानी ने कहा

"सरयू जी.. केतना अच्छा आदमी हवे आपके देखे आईल रहले हा"

सुधीर ने रानी की बात से सहमति जताई उसे अब सच में अफसोस हो रहा था कि उसने सरयू सिंह पर बिना मतलब केस कर दिया था। उस विवाद का समाधान बैठकर भी निकाला जा सकता था जिसमें हर व्यक्ति को अपना अपना रुख थोड़ा नरम करना था। रानी सरयू सिंह के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गई थी। मजबूत कद काठी के सरयू सिंह वैसे भी स्त्रियों के पसंदीदा थे।

जिस तरह सुंदर स्त्री हर वर्ग के पुरुषों को पसंद आती है वही हाल सरयू सिंह का था जिस स्त्री के योनि से प्रेम रस बहता हो वह सरयू सिंह को देख कर एक बार जरूर उनकी कद काठी की तारीफ करती होगी। उनसे अंतरंग होना या ना होना वह स्त्री की मानसिकता पर निर्भर था पर शरीर सिंह का व्यक्तित्व स्त्रियों को प्रभावित करने में सक्षम था.

घर पहुंच कर सुगना थाली में पानी लेकर अपने बाबुजी के पैर धोने लगी। उसकी कोमल हथेलियां उनके पैरों को पानी से धुलते हुए मालिश भी कर रहीं थीं।

सरयू सिंह की निगाह उसकी चूचियों पर टिकी थी। सुगना का ध्यान पैर धोने पर लगा हुआ था और उसका आंचल छाती से हट गया था चूँचियों की झलक सरयू सिंह के मन में उत्तेजना पैदा कर रही थी उधर सुगना की निगाह बीच बीच मे सरयू सिंह के लंगोट पर जा रही थी उसके अंदर छुपा जीव अपना आकार बढ़ा रहा था। सुगना अब समझदार हो चली थी। उसने अपनी चूचियों पर नजर डाली और आँचल खींच लिया।
 
कजरी गुड़ और पानी लेकर आ गयी थी। सरयू सिंह के झोले में सिर्फ मिठाई देखकर सुगना थोड़ा मायूस हो गई। अपने मन के किसी कोने में उसने कल्पना की थी कि उसके बाबुजी उसके लिए वह अंतर्वस्त्र खरीद लाएंगे पर यह सिर्फ और सिर्फ उसकी कोरी कल्पना थी। उसे पता था यह संभव नहीं होगा फिर भी मन तो मन होता है खुद ही बेतुकी चीजें सोचता है और उनके पूरा न होने पर स्वयं दुखी हो जाता है।

नियति ने सुगना को निराश न किया। आज सुगना का जन्मदिन था. उसने आज सुबह सुबह ही घर के सारे काम निपटाये और स्नान करके अपनी वही खूबसूरत लहंगा चोली पहन ली जो सरयू सिंह ने उसे होली के दिन उपहार स्वरूप दिया था। जब भी सुगना सुंदर कपड़े पहनती वह खुद को उस मॉडल के रूप में देखती पर उसके पास अंतर्वस्त्र नहीं थे लहंगे के नीचे उसे अपनी नग्नता का एहसास होता वह सिहर उठती और मन ही मन आनंदित होती। कपड़े पहन कर वह घर के पिछवाड़े में बाल सुखाने लगी।

सरयू सिंह सब्जियों की क्यारी में कार्य कर रहे थे। कजरी रसोई में सुगना के लिए मालपुआ बना रही थी। आज घर में खुशी का माहौल था। सरयू सिंह सुगना को मुस्कुरा कर देख रहे थे वह आज बहुत सुंदर लग रही थी। ससुर और बहू में कुछ नजदीकियां तो आ ही चुकी थीं दोनों मन ही मन एक दूसरे के प्रति कामुकता लिए हुए थे।

नियति ने तरह-तरह की परिस्थितियां बनाकर उन दोनों को इतना करीब ला दिया था और आज फिर नियत ने अपनी एक चाल चल दी थी। एक उड़ने वाला कीड़ा सुगना के लहंगे में घुस गया। फर्रर्रर... फुर्ररर….की आवाजें आने लगी सुगना परेशान हो रही थी। आवाज उसके बिल्कुल करीब से आ रही थी पर वह जीव उसे दिखाई नहीं पड़ रहा था तभी वह उसकी नग्न जांघों से छू गया। वह कीड़ा स्वयं एक अनजाने घेरे में आ चुका था। वह कभी सुगना के घुटने को तो कभी उसके कोमल जाँघों को छू रहा था।

सुगना अपने हाथों से उसे पकड़ना चाहती पर वह अपनी जगह लगातार बदल रहा था। सुगना ने उसे पकड़ने का प्रयास किया पर असफल रही वह बेचैन थी। वो अपने हाथ इधर-उधर कर रही थी तभी सरयू सिंह की निगाह उस पर पड़ गई उन्होंने पूछा

"का भईल सुगना "

उसने कहा

"लागा ता कोनो कीड़ा घुस गईल बा"

सरयू सिंह क्यारी छोड़कर सुनना के पास आ गये और उस कीड़े को पकड़ने का प्रयास करने लगे। सुगना ने अपने हाथों से अपने लहंगे को घुटनों तक उठा लिया था उसके कोमल पैर सरयू सिंह की आंखों के सामने थे। इस प्रक्रिया में उनके हाथ सुगना के पैरों से छूने लगे। वह कभी उसकी जांघों को छूते कभी घुटनों को। सुगना परेशान तो थी अब उत्तेजित भी हो चली थी। उसे मन ही मन यह डर भी था कि कहीं वह कीड़ा उसे काट ना ले अंततः सुगना ने स्वयं ही वह कीड़ा पकड़ लिया। वह उसकी दाहिनी जांघ के ठीक ऊपर था जिसे सुगना ने अपनी उंगलियों में पकड़ रखा था।

कीड़े और सुगना के उंगलियों के बीच सुगना का खूबसूरत लहंगा था । अब मुश्किल यह थी कि उस कीडे को बाहर कैसे निकाला जाए। उसके हाथ में प्लास्टर बधे होने की वजह से वह अपने दूसरे हाथ का प्रयोग नहीं कर पा रही थी. उसने कहा

"बाऊजी हम पकड़ ले ले बानी इकरा के निकाल दी" सरयू सिंह उत्साहित हो गए वह पास आकर सुगना का लहंगा ऊपर उठाने लगे. सुगना की निगाह अपने लहंगे की तरफ जाते वह सिहर उठी सरयू सिंह जमीन पर उकड़ू बैठे हुए थे और सुगना का लहंगा घुटनों के ठीक ऊपर आ चुका था। सरयू सिंह इसी पसोपेश में थे कि वह लहंगे को और ऊपर उठाएं या नहीं पर कीड़ा पकड़ने के लिए उन्हें अपने हाथ तो अंदर ले ही जाने थे।

सरयू सिंह ने सुगना की तरफ देखा और सुगना ने अपनी आंखें शर्म से बंद कर लीं। अब तक नैनों की भाषा सरयू सिंह और सुगना समझने लगे थे ।

सरयू सिंह ने लहंगा और ऊपर उठा दिया उनकी निगाहें पहले तो कीड़े को देख रहीं थीं पर उन्हें सुगना की जांघों के बीच का जोड़ दिखाई पड़ गया। वह कीड़े को एक पल के लिए भूल ही गए सुगना की हल्की रोयेंदार कमसीन बुर को देखकर को वह मदहोश हो गए। उनका ध्यान कीड़े पर से हट गया।

बाहर बहती हुई हवा ने जब सुगना की कोमल बुर को छुआ सुगना भी सिहर उठी। उसे अपनी नग्नता का एहसास हो गया उसने यह महसूस कर लिया कि उसके बाबूजी उसकी कोमल बुर को देख रहे हैं यह सोचकर वह थरथर कांपने लगी।

उसके हाथों की पकड़ ढीली हो रही थी. सरयू सिंह उस कीड़े को पकड़ने का प्रयास करने लगे। उन्होंने अपनी उंगलियां कीड़े को पकड़ने के लिए लहंगे के अंदर की उसी समय उनकी हथेलियों का पिछला भाग सुगना की जांघों के ऊपरी भाग से छू गया। आज पहली बार किसी मर्द ने सुगना की जांघों को छुआ था। सुगना सिहर गई उसके हाथ से वह कीड़ा छूट गया और लहंगा भी।

एक बार फिर वह कीड़ा सुगना के लहंगे में गुम हो गया और सुगना का लहंगा उसके बाबूजी के हाथों पर टिक गया। फुर्ररर…फर्रर्रर ….. की आवाजें आने लगी. सरयू सिंह और सुगना दोनों कीड़े को पकड़ने का प्रयास करने लगे. अंततः सरयू सिंह ने सुगना के लहंगे को स्वयं ही ऊपर उठा दिया जांघों तक आते-आते उनकी उत्तेजना चरम पर पहुंच गई.

सरयू सिंह सुगना की कोमल बुर को निहार रहे थे उसी समय कीड़ा सुगना की जांघों के बीच से निकलकर उनके माथे को छूता हुआ उड़ गया पर जाते-जाते उनके माथे पर अपना दंश दे गया। सरयू सिंह के माथे पर लाल निशान दिखने लगा उन्हें अपनी कुंवारी बहू की कोमल चूत देखने का नियति ने अवसर भी दिया था और दंड भी।

परन्तु सरयू सिंह का लंड इस दंश के दंड को भूल कर उदंड बालक की तरह घमंड में तन कर खड़ा था आखिर उसके एक सुकुमारी की कोमल बुर में प्रवेश होने की संभावना योगबल ही रही थी।

सरयू सिंह ने लहंगा छोड़ दिया। सुगना अपने बाबूजी का माथा सहलाये जा रही थी। सुगना झुक कर उस जगह पर फूंक मारने लगी जहां कीड़े ने काटा था।

उसकी इस गतिविधि ने उसकी कोमल चूचियों को एक बार फिर सरयू सिंह की निगाहों के सामने ला दिया जो चोली में से झांकते हुए उन्हें ललचा रही थीं।

सरयू सिंह कीड़े का दर्द भूल चुके थे वह सुगना के प्यार में खो गए थे। आज सरयू सिंह ने सुगना का खजाना देख लिया था। और वह मन ही मन प्रसन्न थे।

सुगना भी मन ही मन प्रसन्न थी उसकी कोमल बुर उत्तेजना से पनिया गई थी पर उस पर लहंगे का आवरण आ चुका था उसके बाबूजी ने उसकी कुंवारी बुर तो देख तो ली थी पर वह उसकी उत्तेजना न देख पाए थे। सुगना ऊपर वाले को धन्यवाद दे रही थी।

आंगन में आने के बाद मालपुआ खाते समय कजरी ने सरयू सिंह से पूछा

ई माथा प का काट लेलस हा?"

सुगना भी अब हाजिर जवाब को चली थी. सुगना ने हंसते हुए बोला..

"बाबूजी मालपुआ में भुलाईल रहले हा तबे कीड़ा काट लेलस हा"

सरयू सिंह मुस्कुराने लगे. वह सच में आज अपनी बहू सुगना की कोमल बुर में खोए हुए थे। सुगना की बूर मालपुए से किसी भी तरह कम न थी वह उतनी ही मीठी, उतनी ही रसीली और मुलायम थी। सरयू सिंह की जीभ मालपुए में छेद करने के लिए लप-लपाने लगी।

कजरी भी मालपुए का नाम सुनकर शर्मा गयी। उसके कुँवर जी उसकी बुर को भी कभी कभी मालपुआ बुलाया करते थे।

सुगना ने अनजाने में सरयू सिंह के तार छेड़ दिए थे...
 
अपने जन्मदिन के दिन सुगना ने अनजाने में ही अपनी कोमल और रसीली बुर सरयू सिंह को दिखा दी थी

जिसका एहसास सुगना को भी था। सरयू सिंह तो पूरी तरह उस मालपुए में मगन हो गए थे। सुगना का नशा आंखों और दिमाग पर चढ़ चुका था। सुगना उन्हें अब हर जगह दिखाई पड़ने लगी। उनके सपनों पर अब सुगना का एकाधिकार हो चला था।

सरयू सिंह कि अब वह उम्र न थी जब उन्हें कामोत्तेजक सपने आते पर उनके सपनों में मचलती हुई सुगना अवश्य आती। कभी उसकी चूचियां झलक जाती कभी सुगना की कोमल बूर। वह आज भी सपनों में सुगना को पूरा नग्न नहीं देख पाए थे। पर अब वह सुगना को अपनी खुली आंखों से नग्न कर पाने में सक्षम थे।

सुगना के शरीर का लगभग हर भाग उन्होंने देख लिया था पर एक भाग अभी भी बाकी था वह थी सुगना के नितंब और उनके बीच छुपा सुगना का वह अपवित्र द्वार।

इन दो जादुई अंगों के अलावा सुगना का खजाना सरयू सिंह देख चुके थे। उस खजाने को छू पाने की अभी न अनुमति थी न हीं सुगना की तरफ से कोई निमंत्रण। नियति दोनों तरफ आग सुलगा कर तमाशा देख रही थी। जैसे ही आग धीमी पड़ती नियति अपना खेल कर देती…

सुगना के हाथ में चढ़ा हुआ प्लास्टर कटने का समय आ गया था। एक बार फिर सुगना अपने बाबुजी के साथ शहर जाने को तैयार थी। सरयू सिंह ने जाने की तारीख मुकर्रर कर दी पर इस बार दाव उल्टा पड़ गया था।

पिछली बार उन्होंने कजरी को चलने का न्योता सामने से दिया था पर इस बार कजरी ने स्वयं शहर चलने की इच्छा जाहिर कर दी। सरयू सिंह पसोपेश में थे पिछले दो-तीन दिनों से वह बस सुगना के साथ शहर घूमने का मन बनाए हुए थे और उसे हर तरीके से खुश करना चाहते थे. खैर कजरी उनकी दुश्मन नहीं थी उन्होंने और कजरी ने जीवन के कई सुखद वर्ष एक साथ गुजारे थे सरयू सिंह कजरी और सुगना को लेकर शहर के लिए निकल पड़े। इस बार भी ट्रेन पर चढ़ते उतरते समय उन्हें सुगना को छूने का अवसर मिला पर कजरी की मदद से सुगना आसानी से चढ़ गई।

सरयू सिंह ने पिछले दो-तीन दिनों में जिन परिस्थितियों की कल्पना कर सुगना को छूने का मन बनाया था वह सब धरी की धरी रह गयीं।

सुगना अपने बाबूजी का मर्म समझ रही थी। उसे इतना तो ज्ञात हो ही चुका था की सरयू सिंह की उत्तेजना में उसका स्थान आ चुका था। सुगना ने उनकी उदासी दूर करने की सोच ली थी। जैसे ही साईकिल रिक्शा पर बैठने का वक्त आया सुगना जानबूझकर सरयू सिंह और कजरी के बीच बैठ गयी। सुगना की कोमल जाँघें सरयू सिंह की मांसल जांघों से सट गई। जैसे-जैसे रिक्शा उछलता गया उनकी जांघों के बीच घर्षण बढ़ता गया। सुगना बीच-बीच मैं उनकी जांघों को पकड़कर अपना संतुलन बनाए रखती। सरयू सिंह के लिए तो सुगना का यह स्पर्श वियाग्रा की गोली के समान था। उसके स्पर्श मात्र से उनके लंड में तनाव आ जाता था और इस समय तो सुगना अपने बाबूजी पर लगभग लदी हुई थी। कजरी ने कहा

" ए सुगना ठीक से बैठ बाबूजी के दिक्कत होत होइ"

सरयू सिंह का बस चलता तो वह सुगना को अपनी गोद में ही बैठा लेते. उन्हें सुगना के किसी भी कार्यकलाप से दिक्कत होना असंभव था। वह उनकी करिश्माई बहु थी जो अब प्रेमिका बन रही थी। सुगना थोड़ा संभल कर बैठ गयी पर उसने अपने बाबूजी को निराश ना किया वह अपनी जाँघे अभी भी सटाए हुए थी। जब कभी सुगना अपना हाँथ इधर उधर हटाती सरयू सिंह की कोहनी सुगना की चूँचि से सट जाती। उन्हें लगता जैसे उन्होंने किसी गर्म मक्खन को छू लिया हो। कितनी कोमलता थी सुनना की चूचियों में। सरयू सिंह उसकी कोमलता में खो गए…

" बाबुजी अस्पताल आ गइल" सुगना ने सरयू सिंह की जांघों को पकड़कर हिलाया उसने अनजाने में उसकी उंगलियों ने लंगोट में छुपे पालतू नाग को छू लिया जो संयोग से जगा हुआ था। सुगना भी सिहर उठी….

हॉस्पिटल पहुंचकर सुगना का प्लास्टर काट दिया गया। उसके कोमल हाथ एक बार फिर आजाद हो गए। सुगना ने अपने हाथ और कलाइयां हिलाई। सरयू सिंह की प्रसनन्ता की सीमा न रही उन्होंने सुगना के हाथों को चूम लिया। आखिर इन्ही हांथों में सरयू सिंह के लंड को खेलना था।

कजरी भी बेहद खुश थी डॉक्टर ने एक क्रीम दी और कहा इसे हर 10 - 15 मिनट पर लगाते रहिएगा. सरयू सिंह कजरी और सुगना को लेकर मंदिर गए फिर उन्होंने कजरी के लिए उसकी जरूरत की चीजें खरीदी और एक बार फिर रिक्शे पर बैठकर वापस आने लगे.

सुगना उस होटल को देखकर तुरंत पहचान गई उसने खुशी से कजरी को बताया

"हमनी के येही होटल में ठहरल रहनी जा।"

"ह तहरा नींद ना लागल, रात भर सपनात रहलु"

सरयू सिंह ने सुगना को छेड़ दिया।

सुगना शर्म से पानी पानी हो गयी उसने अपनी कोमल मुठ्ठीयों से सरयू सिंह की जांघ पर प्रहार कर अपनी नाराजगी जतायी साथ ही साथ वह अपना स्वप्न याद करने लगी।

उसके सपनों का मर्द उसके ठीक बगल में बैठा अपनी जाँघे उसकी कोमल जांघों से रगड़ रहा था। कजरी ने सुगना का पक्ष लिया और कहा

"हां नया जगह में सुते में सपना अइबे करेला"

सुगना पिछली बार जिस दुकान पर अपने बाबुजी के साथ जाने की हिम्मत न जुटा पाई थी उसने इस बार उस दुकान में जाने की ठान ली थी। वह मन ही मन अपनी सुंदर काया की तुलना उस मॉडल से करने लगी थी जिसने सिर्फ और सिर्फ अंग वस्त्र ही पहने हुए थे। ब्रा और पेंटी में वह मॉडल बेहद खूबसूरत थी पर सुगना उससे कतई कम न थी।

आज कजरी उसके साथ थी दुकान सामने दिखाई देते ही सुगना ने कजरी के पैर दबा कर इशारा कर दिया। कजरी ने कहा

" ए रेक्सा एहिजे रुका हमनी के कुछ सामान खरीद कर आवतानी जा"

कजरी और सुगना दुकान की तरफ पर बढ़ चले। पहले तो सुगना और कजरी उसी दुकान में गए जहां से सरयुसिंह ने पिछली बार साड़ी खरीदी थी।

फिर कुछ ही देर बाद दोनों सास बहू बगल वाली दुकान में चली गयीं जहां पर ब्रा और पेंटी टंगी हुई थी। सरयू सिंह सुगना को उस दुकान में जाते हुए देख रहे थे वह मन ही मन सुगना को उस मॉडल की जगह रख कर देखने लगे। काश वह सुगना के लिए अपनी पसंद के कपड़े खरीद पाते।

उधर दुकानदार एक 28 - 30 वर्ष का युवक था जो इन 2 सुंदरियों को देखकर प्रसन्न हो गया उसने कहा

"दीदी का दिखाएं"

सुगना और कजरी ने आज तक अंतर्वस्त्र नहीं खरीदे थे. उन्हें ब्रा और पेंटी के बारे में बिल्कुल भी जानकारी न थी। गांव में वैसे भी यह सब कौन पहनता है। यह तो सुगना थी जिसने वह खरीदने की जिद कर ली थी और कजरी को लेकर यहां तक आ गई थी।

कजरी ने खुद को समझदार दिखाते हुए उस मॉडल की चूचियों की तरफ इशारा किया. दुकानदार कजरी की शर्म को समझ गया और उसने नमूने के तौर पर कुछ ब्रा बाहर निकाल दीं। सुगना की आंख तो उसी मॉडल पर गड़ी हुई थी उसने कहा

"वइसन ही दिखायीं ना"

"ठीक बा दीदी निकाला तानी"

दुकानदार ने पूछा

"कउन साइज पहिने नी"

यह प्रश्न बेहद कठिन था. उत्तर न मिलने पर दुकानदार ने कजरी और सुगना की असलियत पहचान ली पर उसने उन्हें शर्मसार न किया और अपनी आंखें सुगना की छाती पर गड़ा दीं। साड़ी के भीतर से वह सूचियों का आकार नापने लगा अपने अनुमान से उसने 34 साइज की वही ब्रा निकाल दी जो मॉडल ने पहनी हुई थी उसने कहा

"दीदी ई बिल्कुल ठीक आई। छोट बड़ होइ त बदल देब।"

सुगना ने कहा वह

"नीचे वाला भी दिखायीं" दुकानदार समझ चुका था साइज पूछने का कोई मतलब ना था. उसने सुगना की कमर पर निगाह डाली और 30 साइज की पैंटी निकाल कर रख दी यह ठीक वही पेंटी थी जो मॉडल ने पहनी हुई थी ब्रा और पेंटी दोनों ही जालीदार नेट से बनी हुई थी और बेहद खूबसूरत थी.

कजरी मन ही मन सुगना की मनोदशा के बारे में सोच रही थी उस बेचारी के भाग्य में पति का सुख न था और वह एक कामुक युवती की भांति अपने अंतर्वस्त्र खरीद रही थी। कजरी को क्या पता था एक सुकुमारी अपने नए प्रेमी उसके बाबुजी के लिए तैयार हो रही थी।

दुकानदार ने कजरी से कहा

"दीदी आप भी कुछ ले लीं"

दुकानदार ने कजरी के मन की बात कह दी. कजरी तो आज भी सरयू सिंह के दिल की रानी थी। उसकी जांघों के बीच खिला गुलाब सरयू सिंह कभी सूंघते, कभी चूमते कभी उस की गहराइयों में अपनी उंगलियां फिराते कभी अपना जादुई लंड।

सुगना ने दुकानदार की बात का समर्थन किया और एक बार फिर कजरी का नाप होने लगा। दुकानदार ने 36 साइज की ब्रा और 32 साइज की पेंटिंग निकाल कर बाहर कर दीं। सुगना सोच रही थी यह व्यक्ति चूँचियों और कमर का कितना बड़ा ज्ञानी है। इसने कैसे हमारे मन की बात समझ ली और उचित साइज की ब्रा निकालकर दे दी।

कजरी और सुगना ने सामान लिया और पैसे देकर बाहर आ गए दुकानदार पीछे पीछे कुछ और पैसे मांगते रह गया पर कजरी ने उसे समझाते हुए कहा

"भैया हम लोग हमेशा ले जानी, इतना में ही मिलेला'

कजरी में अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय दे दिया पर दुकानदार असलियत जान रहा था. वह मन ही मन उन दोनों युवतियों के बारे में सोचने लगा उसके अनुसार निश्चय ही दोनों की रात गुलजार होने वाली थी पर उसे क्या पता था नियत ने तो कजरी के भाग्य में तो सरयू सिंह का लंड रखा था पर प्यारी सुगना के भाग्य में इंतजार का दंड.

घर आने के बाद कजरी और सुगना ने अपने नए नए अंतर्वस्त्र को पहन कर देखना चाहा। पहल कजरी ने ही की थी वह सुगना को नग्न देखना चाहती थी। वह भी सुगना की खूबसूरती की कायल हो रही थी।
 
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