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वापसी : गुलशन नंदा

(12)

रशीद सुबह सवेरे तैयार होकर जब नाश्ते के लिए मेज पर बैठा, तो अपने आपको अकेला पाकर अर्दली से पूछ बैठा, “गुरनाम नाश्ता नहीं करेगा क्या?”

“नहीं वे तो चले गये।” आअर्दली ने प्लेटें साफ करके उसके सामने रखते हुए कहा।

“कहाँ?” रशीद चौंक पड़ा।

“किसी होटल में। कह रहे थे अब मैं वही रहूंगा।”

“लेकिन तुमने उन्हें जाने क्यों दिया?”

“मैंने तो बहुत रोका जनाब, लेकिन वह नहीं रुके। जब आप को जगाने के लिए जाने लगा, तो उन्होंने रोक दिया और बोले साहब को सोने दो, रात देर से लौटे हैं।”

“ओह! लेकिन तुमने उनकी सुनी क्यों? जगा देना था मुझे।”

“क्या करता जनाब! नहीं सुनता, तो गुस्सा करते और फिर उन्होंने कहा रात में आपसे इज़ाजत ले चुके हैं।”

“नॉनसेंस!” वह गुस्से में झुंझलाया और प्लेट में से दो डबल रोटी का पीस लेकर उस पर मक्खन लगाने लगा। अर्दली चाय लेने के लिए किचन में चला गया।

इसी झुंझलाहट में रशीद का हाथ अचानक गले में लटकी उस जंजीर पर पड़ गया, जिसमें ओम का लॉकेट लटक रहा था। उसे झट पूनम की याद आ गई और वह उन भावों का अनुमान लगाने लगा, जो उसे बिछड़ने के बाद उसके मन में उत्पन्न हुए होंगे।

पूनम का हवाई जहाज उड़ने के लिए तैयार हो रहा था। यात्री अपना-अपना सामान जमा करने के बाद श्रीनगर हवाई अड्डे के लॉज में बैठे उड़ान की घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे थे। पूनम भी अपनी आंटी के साथ वही एक सोफे पर बैठी थी। आंटी समय बिताने के लिए कोई पत्रिका पढ़ रही थी और पूनम आते-जाते यात्रियों को देखकर बोर हो रही थी।

इस उकताहट को कम करने के लिए वह उठकर सामने के बुक स्टॉल पर पहुँच गई और वहाँ रखी पत्रिकाओं और पुस्तकों को उलट-पलट कर देखने लगी। जैसे ही उसने रैक में रखी किसी रोचक पुस्तक को उठाना चाहा, पीछे से आई किसी आवाज में उसे चौंका दिया, “काफ़ी बोर है यह किताब।”

पूनम ने पलटकर देखा, तो उसके पीछे रशीद खड़ा मुस्कुरा रहा था। वह गुमसुम खड़ी रशीद को देखती रह गई। रशीद ने फिर अपना वाक्य दोहराया, “मैं पढ़ चुका हूँ। काफ़ी बोर है यह किताब।”

“हो सकता है जो चीज आपको बोर लगती हो, मुझे भली लगे।”

“ऐसा नहीं हो सकता!”

“क्यों नहीं हो सकता?”

“मैं तुम्हारी रुचि को भली-भांति जानता हूँ।”

“झूठ।”

“तो सच क्या है, तुम ही बता दो।”

“सच बहुत कड़वा है मिस्टर रणजीत।” पूनम ने रशीद की आँखों में ऑंखें डालते हुए त्योरी चढ़ाकर कहा।

“ओह! मैं तुम्हारा इशारा समझ गया। तुम्हें मेरी रात वाली बात बुरी लगी। वास्तव में मैं उसके लिए क्षमा मांगने आया था।”

“अरे! आप ही घायल कर दिया, तो अब मरहम लगाने से क्या लाभ?”

“भूल का प्रायश्चित तो करना ही पड़ता है। रात में कुछ अधिक ही भावुक हो गया था। लेकिन पूनम तुम इसका अनुमान नहीं लगा सकती। मेरे उस दोस्त ने पाकिस्तान में मेरी कितनी सहायता की थी। उसकी सौगंध का ध्यान आया, तो मैं अपने बस में ना रहा और तुम पर बरस पड़ा। लेकिन बाद में मुझे अपनी मूर्खता का एहसास हुआ कि दोस्ती को अपने प्यार से कम समझा। अब मैं तुम्हें वचन देता हूँ पूनम कि अपनी हर भावना को तुम्हारे प्यार की भेंट कर दूंगा। मेरा धर्म मेरा ईमान सब कुछ तुम्हारा प्यार होगा।” कहते-कहते रशीद का गला भर आया और उसने अपनी कांपती हुई उंगलियों से टटोलकर उसकी दी हुई निशानी ओम का लॉकेट उसे दिखाने का प्रयत्न किया।

पूनम रशीद की भीगी आँखें देखकर व्याकुल हो उठी। रशीद के दिल की आग ने उसके गुस्से को पल भर में पिघला दिया। वह सोच भी नहीं सकती थी कि रात के अंधेरे में क्रोधित और कठोर दिखाई देने वाला फौजी अफसर दिन के उजाले में एक मोम का पुतला कैसे बन गया।

तभी उनके बीच छाई निस्तब्धता को हवाई उड़ान की घोषणा ने तोड़ा। दिल्ली जाने वाली उड़ान तैयार थी। यात्री लॉज से उठ-उठ कर हवाई जहाज की ओर जाने लगे। समय कम था और दिलों में तूफान उमड़े हुए थे। पूनम ने भाव को नियंत्रित करते पूछा, “दूसरा लॉकेट कहाँ है?”

“मेरे पास है। कल उसे दोस्त को पार्सल करवा दूंगा।” रसीद ने ‘अल्लाह’ वाला लॉकेट जेब से निकाल कर उसे दिखाया।

पूनम ने झट हाथ बढ़ाकर रशीद से उसके दोस्त की निशानी झपट ली और बोली, “लाओ इसे मैं अपने गले का हार बना लूं।”

“तुम?”

“हाँ! आपके दोस्त की दी हुई सौगंध भी ना टूटेगी और मेरा प्यार भी आपके दिल के पास रहेगा।”

“लेकिन?”

“लेकिन वेकिन क्या! आपके लिए दो होंगे, मेरे लिए तो दोनों एक है। ईश्वर, अल्लाह तेरे नाम सबको सम्मति दे भगवान।” यह कहते हुए पूनम ने लॉज की ओर देखा, जहाँ से कमला आंटी बैग हाथ में उठाये उनकी ओर आ रही थी। रशीद ने आगे बढ़कर उनके पांव छुये और फिर उनके साथ-साथ कदम उठाता हवाई जहाज की ओर चल दिया। पूनम ने उसे जल्दी छुट्टी लेने का अनुरोध किया और रशीद ने वचन निभाने की प्रतिज्ञा की। फौजी अफसर होने के कारण किसी ने उसे दरवाजे पर नहीं रोका और वह उनके साथ-साथ हवाई जहाज की सीढ़ी तक आ गया।

जब पूनम आंटी के साथ सीढ़ियाँ चढ़कर हाथ हिलाती हवाई जहाज के अंदर चली गई, तो रशीद को पहली बार अनुभव हुआ कि पूनम से प्रेम का अभिनय करते-करते उसे सचमुच पूनम से गहरा लगाव हो गया है। वह एक अनोखा अपनापन अनुभव करने लगा। कहीं यह अपनापन उसकी निर्बलता ना बन जाये और उसके माथे पर पाप का कलंक न लगा दे, यह सोचकर वह खड़े-खड़े यों कांप गया, जैसे सचमुच उससे यह पाप हो गया हो।

सीढ़ी बंद हो गई। हवाई जहाज के पंखे तेजी से घूमने लगे और उनके शोर से वातावरण जैसे थर्रा गया। थोड़ी ही देर में हवाई जहाज रनवे से ऊँचा उठकर आसमान में उड़ता दिखाई दिया। रशीद मौन खड़ा बड़ी देर तक हवाई जहाज को देखता रहा, जो पूनम को लिए दिल्ली की ओर उड़ा जा रहा था।

हवाई जहाज जब दृष्टि से ओझल हो गया, तो वह वापस जाने को पलटा। लेकिन फिर अचानक उसे ठिठककर वहीं रुक जाना पड़ा। वह आश्चर्य से गुरनाम को देखने लगा, जो एक लंबा ओवर कोट पहने उसके पीछे खड़ा था।

“गुरनाम तुम यहाँ!” उसके मुँह से निकला।

“हाँ! अचानक हेड क्वार्टर से फोन मिला कि मेरे नाम एक पार्सल भेजा गया है।” कहते हुए गुरनाम ने एक छोटा सा पार्सल उसे दिखाया और फिर जेब में रखते हुए बोला, “इसे लेने एयरपोर्ट आया था।”

“क्या है इस पर पार्सल में?” रशीद से पूछे बिना ना रहा गया।

“होगी कोई रिपोर्ट, दुश्मन के जासूसों के बारे में कुछ ताजा क्लूज या कुछ तस्वीरें या फिर फिल्म इत्यादि।” गुरनाम लापरवाही से कह गया।

“लेकिन तुम अचानक ऐसे क्यों चले गये?”

“भई अचानक क्यों? स्नान किया, नाश्ता दिया और तुम्हारे अर्दली को समझा कर आया था कि तुम सुबह उठो, तो मेरे लिए परेशान ना हो जाओ।”

“यह तुमने अच्छा नहीं किया।”

“नहीं यार! अच्छा ही हुआ, जो मैं अपने होटल में चला गया, वरना अगर हेडक्वार्टर का यह संदेश मुझ तक ना पहुँचता, तो मेरे विरुद्ध जरूर कोई एक्शन ले लिया जाता।”

“कहाँ ठहरें रहे हो?”

“अभी तो ओबेरॉय पैलेस में!”

“अभी क्यों?”

“दुश्मन को झांसा देने के लिए अड्डा बदलते रहना पड़ेगा। कभी इस होटल में, कभी उस होटल में। कभी किसी सराय में, तो कभी हाउसबोट में। लेकिन घबराओ नहीं, हर शाम व्हिस्की तुम्हारे ही यहाँ पियूंगा।”

“जरूर तो फिर आज आ रहे हो ना?”

“आज नहीं कल से! आज मेरा अपॉइंटमेंट है एक लड़की से।” गुरनाम ने जबान होठों पर फेरते हुए कहा और फिर कुछ रुककर बोला, “अमां यार रात में हमसे कोई बदतमीजी तो नहीं हुई थी, व्हिस्की पीने के बाद?”

“नहीं तो!”

“न जाने क्यों रात भर सिर बोझिल रहा। कुछ ऐसा याद आता रहा, जैसे मैंने अकारण किसी को गालियाँ दी हो। मेरे साथ ये बड़ी कमजोरी है कि शराब पीने के बाद लड़कियों को छेड़ बैठता हूँ।”
 
रशीद ने गुरनाम की बातचीत को और ना बढ़ने दिया और उसे अपने साथ लेकर वहाँ से चल पड़ा। फिर उसने उसे चौक बाजार में छोड़ दिया, जहाँ से गुरनाम को कुछ चीजें खरीदनी थी। रशीद को स्वयं भी दफ्तर जाने की जल्दी थी।

लेकिन दफ्तर जाने से पहले रशीद जॉन के नये ठिकाने पर पहुँचा। इस ठिकाने का पता जॉन ने उसे पिछली रात बताया था। वहाँ उसने जॉन को गुरनाम के होटल के ठिकाने की सूचना दी और उस पार्सल के बारे में बताया, जो वह एयरपोर्ट से साथ ले गया था। उसने जॉन पर अपनी इस शंका को भी व्यक्त किया कि हो सकता है भारत सरकार को उसी पर शक हो और गुरनाम को रणजीत का घर घनिष्ठ मित्र होने के नाते उसके पीछे लगा दिया गया हो।

“नहीं! यह मुमकिन नहीं। आप पर शक करने की कोई वजह नहीं।” जॉन ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा।

“सोच रहा हूँ, जल्दी छुट्टी ले लूं और कुछ दिनों के लिए माँ के पास चला जाऊं।”

“इरादा बुरा नहीं, लेकिन वहाँ भी काफ़ी होशियारी बरतनी पड़ेगी।”

“उसका सब प्रबंध कर लिया है। लच्छू राम सिपाही, जो अपने रिंग के लिए काम करता है, उसी गाँव का रहने वाला है। वह जाकर मुझे सब खबर ला देगा। घर का पूरा पता और माँ की आदतों की पूरी जानकारी लेकर आयेगा।”

“अब बताओ उस पार्सल का क्या होगा? कैसे पता चले कि उसमें क्या है?”

“मैंने तो कोशिश की थी कि वह आज शाम मेरे यहाँ गुजारे। लेकिन वह कल पर टाल गया। मैंने जोर देना मुनासिब न समझा कि कहीं उसे शक ना हो जाये।”

“वैसे आपकी दोस्ती कमजोरी क्या है?” जॉन ने सिगरेट का एक लंबा कश लेकर धुआं छोड़ते हुए पूछा।

“व्हिस्की और औरत!”

“तब मुझ पर छोड़ दो!” जॉन ने मुस्कुराते हुए कहा और किसी सोच में पड़ गया।

रशीद उसको सोचो में डूबा देखकर उठ खड़ा हुआ। बाहर निकलकर वह अपनी जीप में आ बैठा और तेज गति से चलाता हुआ अपने ऑफिस की ओर रवाना हो गया।

उसी शाम ओबरॉय पैलेस के बार में गुरनाम बैठा व्हिस्की पी रहा था कि अचानक एक सुरीली आवाज ने उसे छेड़ दिया। यह रुखसाना थी। यौवन की बिजलियाँ गिराती उसके सामने वाली सीट पर बैठने की अनुमति मांग रही थी। गुरनाम ने नशीली आँखों से उस सुंदरी को देखा, जो हाथों में जाम लिए उसी से संबोधित थी। इस सर्द रात में भी रुखसाना का लगभग आधा शरीर खुला था, जिससे हुस्न की छलकती शराब किसी को भी बहकाने के लिए पर्याप्त थी। गुरनाम थोड़ा चौकन्ना हो गया, तो रुखसाना ने फिर प्रार्थना दोहराई, “मैंने कहा हुजूर, इज़याजत हो, तो आपके पास बैठ जाऊं?”

“ज़रूर ज़रूर आप…”

“शायद हम पहले मिल चुके हैं, यही कहना चाहते हैं ना आप!”

“हाँ तो….”

“कल रात ऑफिसर मैस में मुलाकात हुई थी।”

“ओह…हाँ याद आया। जॉन साहब कहाँ हैं?”

“आज नहीं आये….दो दिन के लिए बाहर गये हैं।”

“आप अकेली हैं?”

“जी नहीं! जब आप जैसे दोस्तों का साथ मिले, तो मैं अपने आप को अकेले कैसे समझ सकती हूँ?” रुखसाना ने आखरी घूंट पीते हुए अपना गिलास खाली करके कहा।

“इस अपनत्व के लिए शुक्रिया!” और फिर उसका गिलास अपने हाथ में लेकर लेते हुए बोला, “लार्ज या स्मॉल?”

“व्हिस्की नहीं, जिन विथ कोक।”

‘व्हिस्की के बाद!”

“मुझे ड्रिंक्स मिक्स करने का शौक है।”

गुरनाम ने उसकी बात सुनकर उसके जवान बदन को एक बार नीचे से ऊपर तक निहारा और उसका गिलास लिए बार तक चला आया। जब जिन और कोक लेकर लौटा, तो रुखसाना मुँह में सिगरेट दबाये उसे सुलगाने में लगी थी। गुरनाम को देखती हुए वह बोली, “आपको बुरा तो नहीं लगता?”

“क्या?”

“मेरा यू आपके सामने बेझिझक सिगरेट पीना!”

“बिल्कुल नहीं! आप शौक से कर सकती हैं।”

रुखसाना ने सिगरेट सुलगाकर एक लंबा कश लिया और नथुनों से धुआं निकालते हुए बोली, “कल रात आप ज्यादा ही मूड में आ गए थे।”

“मूड में नहीं, बदतमीजी पर उतर आया था।”

“बदतमीजी कैसी? गलती तो जॉन की ही थी, जो बेकार आप उलझ बैठा। दरअसल वह हर ऐसे आदमी से जलने लग जाता है, जो जरा भी मुझसे हँसकर बात करे।”

“मर्द होते ही शक्की है।” गुरनाम ने एक लंबा घूंट कंठ से नीचे उतारते हुए कहा।

“लेकिन मैं ऐसे मर्दों को पसंद नहीं करती।”

“तो जॉन के साथ ज़िन्दगी कैसे कटेगी?”

“उसे मेरे इशारों पर चलना होगा। मेरी आजादी में दखल नहीं देना होगा।”

“और अगर उसने ऐसा ना किया?”

“तो शादी के फ़ौरन बाद डाइवोर्स!”

“आपका काफ़ी ज़िन्दादिल औरत हैं।”

“औरत नहीं लड़की! शादी हो जाने के बाद मुझे यह दर्जा दीजियेगा।”

“ओह! आई एम सॉरी।”

धीरे-धीरे जाम पर जाम खाली होते रहे और फिर भरते रहे। ठंडे सीने में चिंगारियाँ भड़कने लगी थी। दोनों अपने-अपने गिलास थामें होटल के हरी लॉन में निकल आये। ठंडी हवा में दिल और गर्म होने लगे। कुछ देर बाद दोनों वहाँ से उठकर गुरनाम के कमरे में आ गये।

गुरनाम ने खाने के लिए पूछा, तो रुखसाना ने झट उसकी बात काट दी और बोली, “खाना तो हम हर रोज खाते हैं।”

“लेकिन पीना भी तो हर रोज हो जाता है।”

“हाँ लेकिन आपके साथ पहली बार हुआ है।” रुखसाना ने बड़े मन मोह लेने वाले भाव से कहा और फिर गुरनाम के गाल से गाल मिलाकर इठलाती हुई बोली, “आप कितने अच्छे हैं सरदार जी!”

“सच! तो फिर एक बात मानो हमारी।”

“क्या? हुक्म दीजिये।”

“अब पीना बंद कर दो।”

“क्यों?”

“हमें नशा हो गया है। अगर नशे में हम कोई गुस्ताखी कर बैठे तो!”

“क्या होगा?” रुखसाना ने अदा से झूमते हुए उसी का प्रश्न दोहराया।

“जॉन हमसे जल उठेगा।”

“जलने दो उसे। आज की रात तो हम चाहते हैं कि कोई हमसे गुस्ताखी करें।” रुखसाना ने मुस्कुराकर कहा और साथ ही पलट कर कमरे की लाइट ऑफ कर दी।

गुरनाम रुखसाना का यह बेबाक वाक्य सुनकर क्षण भर के लिए तो झेंप गया, लेकिन फिर अंधेरे में ही उसके अर्धनग्न शरीर को घूरने लगा, जो पहले से और अधिक आकर्षक हो गया था। शराब के उन्माद से रुखसाना की आँखों में लाली उतर आई थी। वह गुरनाम के पहल करने की प्रतीक्षा कर रही थी। किंतु जब वह उसी प्रकार अपने स्थान पर खड़ा उसे घूरता रहा, तो वह स्वयं ही उछलकर उसकी बाहों में आ गई।

गुरनाम तो मर्द था। औरत को भी वह शराब के समान एक नशा ही समझता था, जो बस उन्माद देकर झोंके के समान चली जाये और लौटकर ना आये। रुखसाना के कोमल शरीर की तपन ने उसकी धमनियों में दौड़ते हुए खून को खौला दिया। दिल की धड़कन तेज हो गई और उसने दीवानगी ने रुखसाना को अपनी बाहों में भींच लिया। वह एक नागिन के समान उसकी बाहों में मचली, सरसराई और धीरे-धीरे उसने गुरनाम के सारे शरीर को अपनी लपेट में ले लिया।

रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। गुरनाम नंग-धड़ंग बिस्तर पर औंधा लेटा हुआ था। उसके भारी खर्राटों की आवाज कमरे में गूंज रही थी। रुखसाना गुरनाम के साथ अर्धनग्न अवस्था में लेटी अभी तक जाग रही थी और आँखें खोले छत को घूर रही थी। गुरनाम का दांया हाथ अभी तक उसकी कमर में था, जैसे सोते में भी वह उसे अपने पास से अलग न करना चाहता हो।
 
रुखसाना ने एक दृष्टि उसके चेहरे पर डाली और उसकी गहरी नींद की ओर से संतुष्ट होकर धीरे से अपनी कमर पर से उसका हाथ हटाया और खिसककर बिस्तर से नीचे उतर गई। फर्श पर पड़ी अपनी मैक्सी उठाकर उसके गुरनाम को देखा, जिसके मुँह से निकलते खर्राटे उसकी गहरी नींद का प्रमाण दे रहे थे। रुखसाना ने जल्दी-जल्दी मैक्सी पहनी और दोनों हाथों से अपने बिखरे बाल संवारे। फिर सिरहाने रखे अपने हैंडबैग में से एक छोटी सी पेंसिल टॉर्च निकाली और उसकी रोशनी कमरे में इधर-उधर फेंकी। पतली सी रोशनी की रेखा एक बार गुरनाम के नंगे स्वस्थ शरीर पर पड़ी और वह मुस्कुरा दी। उसने आगे बढ़कर उसके नंगे शरीर को एक चादर से ढक दिया।

थोड़ी ही देर में उसने पेंसिल टॉर्च के सीमित प्रकाश में सारा कमरा छान मारा। जल्दी-जल्दी उसने गुरनाम के सूटकेस, अलमारी और मेज के सभी खाने देख डाले। किंतु उसे काम की कोई विशेष चीज उपलब्ध नहीं हुई। वह कुछ निराश सी हो गई। फिर एकाएक उसकी दृष्टि पलंग के पास रखी छोटी सी साइड टेबल पर पड़ी और वह उधर लपकी।

साइड टेबल का पहला खाना खोलते ही उसकी आँखें खुशी से चमकने लगी। वहाँ वह फिल्म पड़ी थी, जिसके बारे में गुरनाम ने रशीद से कहा था। फिल्म के साथ ही गुरनाम का आईडेंटिटी कार्ड भी रखा हुआ था, जिसे पढ़ते हुए रुखसाना को इस बात का प्रमाण मिल गया कि वास्तव में गुरनाम मिलिट्री इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट का आदमी है। उसके होठों पर मुस्कुराहट उभर आई और उसने वह कार्ड अपने बैग में रखना चाहा। किंतु फिर कुछ सोचकर उसने कार्ड वहीं छोड़ दिया और केवल फिल्म की रील सावधानी से बैग में रख ली। फिर उसने टॉर्च बुझा दी। अंधेरे में ही अपनी सैंडल टटोली और उन्हें हाथों में उठाये दबे पांव दरवाजे तक चली आई, जो बरामदे में खुलता था। उसने धीरे से चटकनी खोली, पलटकर एक नज़र नींद में डूबे हुए गुरनाम के बदन पर डाली और चुपके से कमरे से बाहर चली गई।

रुखसाना ने कमरे से बाहर कदम निकाला ही था कि गुरनाम के खर्राटों को जैसे ब्रेक लग गये। वह तड़प कर बिस्तर पर उठ बैठा और झट उछलकर उस दरवाजे तक जा पहुँचा, जिससे अभी-अभी रुखसाना बाहर निकली थी। उसने दरवाजे का पर्दा हटाकर बाहर झांका, तो रुखसाना तेजी से होटल का लॉन पार कर रही थी। गुरनाम ने फुर्ती से कपड़े पहने, ओवरकोट पहनकर जेब में पिस्तौल टटोला, अपना कार्ड लिया और लपककर बाहर निकल आया।

रुखसाना होटल से निकलकर बाहर सड़क पर आ रूकी। गुरनाम उसका पीछा करता हुआ पेड़ों के एक झुंड तले आ ठहरा और अंधेरे में घूरकर उसे देखने लगा, जो थोड़ी दूर खड़ी बेचैनी से इधर-उधर देख रही थी, जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रही हो। तभी गुरनाम ने देखा, उसने अचानक अपने मुँह में एक सिगरेट लगाया और लाइटर से उसे सुलगाने से पहले दो बार लाइटर जलाकर बुझाया। उसी समय एक पुराने मॉडल की काले रंग की गाड़ी आकर उसके पास खड़ी हो गई। रुखसाना झट गाड़ी में बैठ गई और गाड़ी चल पड़ी।

गुरनाम गाड़ी के आगे बढ़ते ही लपक कर होटल के बाहर वाले भाग में आया और एक टैक्सी में बैठकर ड्राइवर को काली कार का पीछा करने को कहा। टैक्सी वाले ने मामला समझना चाहा, तो गुरनाम ने झट उसकी हथेली सौ के नोट से गर्म कर दी। ड्राईवर ने सौ का नोट देख शांति से टैक्सी की गति बढ़ा दी। कुछ दूर जाने के बाद गुरनाम ने ड्राइवर को अपनी गाड़ी की बत्तियाँ बुझा देने को कहा और उसे निर्देश दिया कि वह उस गाड़ी की टेल-लाइट के सहारे उसका पीछा करें, ताकि उस गाड़ी वालों को पीछा किए जाने का अंदेशा न हो पाये।

काली गाड़ी शहर की सीमा पार करके पीर बाबा के डेरे वाले टीले के पास पहुँची। गुरनाम ने अपनी टैक्सी काफ़ी पीछे रुकवा ली। उसने देखा रुखसाना ने वहीं गाड़ी से उतरकर ड्राइवर को कुछ समझाया और वह गाड़ी आगे बढ़ाकर ले गया। रुखसाना टीले की ओर जाने वाली पगडंडी की ओर हो ली।

“खतरों से खेलने का शौक है तुम्हें?” गुरनाम ने अचानक टैक्सी ड्राइवर से पूछा।

“कैसा खतरा सरदार जी?” ड्राइवर ने घबराकर पूछा।

“मैं उस छाया का पीछा कर रहा हूँ। जब तक ना लौटूं, यही मेरी प्रतीक्षा करोगे क्या?”

“क्यों नहीं बाबूजी? लेकिन वह पीर बाबा के डेरे की ओर जा रही हैं।”

“हाँ, मैं जानता हूँ।” गुरनाम ने कहा और तेजी से नीचे उतर गया। फिर अंधेरे का सहारा ले रुखसाना के पीछे हो लिया। टैक्सी ड्राइवर अपने आप बड़बड़ाया, “यों पीछा करने से बीवी को थोड़ी काबू में रखा जाता है औरत बिगड़ जाये, तो उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं संभाल सकती।”

वातावरण में सर्वत्र धुंध छाई हुई थी, जिससे अंधेरा कुछ अधिक ही बढ़ गया था। लेकिन उस अंधेरे में रुखसाना बेधड़क अपनी जाने पहचाने रास्ते पर बढ़ती चली जा रही थी और यह घना अंधेरा उसका पीछा करने में गुरनाम की सहायता कर रहा था। गुरनाम अनुभव कर रहा था कि वह किसी बहुत बड़े खतरे के मुँह में फंसने जा रहा था, लेकिन अब यहाँ से लौट जाना भी बहुत बड़ी कायरता थी। उसे मालूम नहीं था कि उसे किस खतरे का सामना करना होगा, लेकिन उसका कर्तव्य उसे बड़े से बड़े खतरे में जाने के लिए पुकार रहा था।

रुखसाना पीर बाबा के डेरे के बाहर थोड़ी देर रुकी और इधर-उधर देखकर झट अंदर प्रविष्ट हो गईं। गुरनाम भी उस दरवाजे तक आ पहुँचा। दरवाजे पर बैठे एक आदमी ने उसे रोकना चाहा, तो गुरनाम ने झट आगे जाती रुखसाना की उंगली से संकेत कर दिया और लपककर इस प्रकार रुखसाना के पीछे हो लिया, जैसे वह उसी के साथ अड्डे में आया हो।

गुरनाम जिस कमरे में रुखसाना के पीछे आया, वहाँ तेल का एक चिराग जल रहा था। जिसके प्रकाश से कमरे की हर चीज देखी जा सकती थी। इस समय वहाँ कोई और व्यक्ति नहीं दिखाई दे रहा था। रुखसाना ज्यों ही कमरे की दाईं ओर गुफा में घुसी, गुरनाम भी दबे पांव उसके पीछे था। अपने पीछे कुछ आहट सुनकर पहली बार रुखसाना ने पलटकर देखा और रिवाल्वर की नाल अपनी ओर तनी पाई। रिवाल्वर के पीछे गुरनाम की मोटी लाल खूंखार आँखें देखकर वह डर से कांप गई और उसके मुँह से एक चीख निकलते-निकलते रह गई।

“अगर आवाज मुँह से निकाली, तो यही ढेर कर दूंगा।” गुरनाम ने दबी आवाज में धमकी दी, “इस रिवाल्वर में साइलेंसर लगा है।” इसके साथ ही रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी में आ लगी।

क्षणभर घूरकर रुखसाना को देखकर उसने गुर्राकर कहा, “और कौन-कौन है इस अड्डे में इस वक्त?”

“कोई भी नहीं!” रुखसाना के मुंहफट से भिंची-भिंची आवाज निकली।

“सच बता कौन है? नहीं तो देशद्रोही पर दया करना मैंने नहीं सीखा।” गुरनाम ने खूंखार स्वर में कहा और रुखसाना ने कनपटी पर रिवाल्वर की नाल का दबाव अनुभव किया। वह डर कर कह उठी, “जॉन है, जॉन है।”

“और कोई भी है?’

“नहीं, कसम से नहीं!”

“चलो तो जहाँ चलना है, तुम् चलती रहो।”

रुखसाना वहीँ जमी खड़ी रही। गुरनाम ने रिवाल्वर की नाल उसकी कनपटी से हटाकर उसके पेट से लगा दी और उसे आगे धकेलता हुआ बोला, “चलो आगे बढ़ो। जरा भी होशियारी दिखाने की कोशिश की, तो गोली अंदर और दम बाहर होगा।”

विवश होकर रुखसाना आगे बढ़ी और एक दीवार तक पहुँच कर उस पर लगा एक बटन दबाया। दीवार में लगा एक लाल बल्ब एकाएक जल उठा और साथ ही दीवार में एक दरार उत्पन्न हो गई। एक गुप्त जीना उस दरार के बीच दिखाई दिया और गुरनाम रुखसाना के पीछे वह जीना उतरने लगा।

नीचे तहखाने में जॉन एक कुर्सी पर बैठा ट्रांसमीटर ऑन किए कुछ सिग्नल दे रहा था। अपने पीछे आहट सुनते ही उसने पलटकर पूछा, “मिल गई वह फिल्म?”

यह वाक्य जॉन की जबान पर लड़खड़ा कर ही रह गया, जब उसने रुखसाना के पीछे गुरनाम को उसकी पीठ पर रिवाल्वर जमाये देखा। वह आश्चर्यचकित उसे देखता ही रह गया।

“ओह तो आप है, जिन्होंने यह फिल्म मेरे कमरे उड़वाई है। आपकी मंगेतर तो काफ़ी वफादार लगती है, आपकी मदद करते-करते अपना तन मन सब कुछ गंवा बैठती है।” गुरनाम ने व्यंग्य से कहा।

“कौन है तुम?” जॉन जानते हुए भी अनजान बनकर पूछ बैठा। उसने जेब में हाथ डालकर अपना रिवाल्वर निकालना चाहा। गुरनाम ने झट गोली चला दी, जो उसके बाजू की खाल को छूती हुई दीवार से जा टकराई। उसके मुँह से एक कराह निकली और झट उसने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा दिये। गुरनाम ने रुखसाना का बाजू बाएं हाथ से पकड़कर एक झटके के साथ उसे जॉन के साथ खड़ा किया और उनकी आँखों के सामने रिवॉल्वर हिलाता हुआ जॉन से बोला, “मैं कौन हूँ, यह तो तुम अच्छी तरह जानते हो, वरना अपनी इस फुलझड़ी को मेरे पीछे ना लगाते। इस वक्त मैं तुम्हारा असली रूप जाना चाहता हूँ। तुम्हारे और कितने साथी हैं इस फुलझड़ी के अलावा? 555 रिंग का चीफ कौन है? अब तक तुमने क्या-क्या जासूसी की है? साफ बता दोगे, तो जान से नहीं मारूंगा यह वादा रहा…नहीं तो मैं दस तक गिनती गिनूंगा। इस बीच में अगर तुम्हारी जुबान ना खुली, तो मेरे रिवाल्वर की दो गोलियाँ और खर्च होंगी। जब तक तुम्हारे गुरगों को पता चलेगा, तुम्हारी लाश बिना कफन यहीं सड़ती रहेगी। बोलो बताते हो नाम या शुरू करूं गिनती?”

वे दोनों उसकी धमकी सुनकर भी चुप रहे, तो गुरनाम में गिनती आरंभ कर दिया और उनके चेहरे की बदलती रंगत को देखने लगा। अभी वह पाँच तक ही गिन पाया था कि अचानक जॉन फुर्ती से उछला और अपने पीछे दीवार से जा टकराया। इसके साथ ही गुरनाम की उंगली ट्रिगर पर दब गई। कमरे में एक जोरदार धमाका हुआ, लेकिन बजाय इसके कि गोली किसी को निशाना बनाती गुरनाम स्वयं ही लड़खड़ा गया। उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई। फर्श में एक खाई उत्पन्न हुई और वह जमीन के नीचे उस खाई में समा गया।
 
जॉन रुखसाना ने उस अंधेरे कुएं में झांका, जिसकी गहराई में गुरनाम समा गया था और नीचे अंधकार में उसकी चीख की अंतिम गूंज सुनाई दे रही थी।

जॉन ने आगे बढ़कर दीवार पर लगे एक बटन को दबाया। खाई की जमीन फिर बराबर हो गई और वह माथे का पसीना पोंछता हुआ रुखसाना की ओर बढ़ा, जो अभी तक स्थिर खड़ी थी और उसके होंठ कंपकंपा रहे थे।

उसने जॉन से नजरें मिलाई। कुछ कहने को उसके होठ खुले, लेकिन फिर अचानक एक चीख उसके मुँह से निकली और वह जॉन के पास जाकर उसके सीने से लग गई। फिर उसके सीने में मुँह छुपाकर सिसक-सिसक कर रोने लगी।

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“मुझे विश्वास नहीं आ रहा जॉन।” रशीद ने आश्चर्य से दुख भरी आवाज ने कहा।

“लेकिन यह सच है मेजर! गुरनाम का खून कर दिया गया है।” जॉन ने व्हिस्की का एक घूंट गले में उतारते हुए कहा।

“यह अच्छा नहीं हुआ। उसका कोई हमारे रिंग को खतरे में डाल सकता है।”

“लेकिन और कुछ रास्ता भी नहीं था। उसे रास्ते से हटा दिया जाता, तो 555 का भेद खुल जाता है।”

“555 की सरगर्मियों की खबर तो वैसे भी हेड क्वार्टर तक पहुँच चुकी है। तभी तो वह फिल्म उस तक पहुँची थी।”

“लेकिन वह फिर तो ब्लैंक थी। गुरनाम ने हमें चकमा दिया था।” रुखसाना ने पहली बार उनकी बातों में बोलते हुए कहा।

“असली फिल्म होटल के कमरे से पुलिस को मिल चुकी है।” रशीद ने उन दोनों के चेहरे को तेज नज़रों से देखते हुए कहा।

यह सुनते ही जॉन के हाथ से व्हिस्की का गिलास फिसल कर फर्श पर गिर पड़ा और कांच के टुकड़े उसके निश्चय के समान बिखर गया। रशीद उन दोनों के चेहरों का उतार-चढ़ाव देखता हुआ बोला, “अब हमें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा।”

“उस फिल्म में क्या था?” जॉन ने सूखे होठों को तर करते हुए पूछा।

“शायद हमारे जासूसों की तस्वीरें। दो-एक दिन में पता चल जायेगा।”

“अब हमें क्या करना होगा?” जॉन ने घबड़ा कर पूछा।

“इसके पहले कि पुलिस कोई कदम उठाये, पीर बाबा के डेरे से सब कुछ हटा दिया जाए। कोई निशान वहाँ नहीं रहना चाहिए और तुम दोनों कुछ दिनों के लिए फौरन कश्मीर छोड़कर चले जाओ।”

“कहाँ?” जॉन ने जल्दी से पूछा।

“आजाद कश्मीर….बाकी इंस्ट्रक्शन तुम्हें उस्मान बेकरी वाले से मिल जायेंगे।”

“मुझे भी जॉन के साथ जाना होगा क्या?” रुखसाना नहीं पूछा।

“नहीं….बेहतर होगा तुम कहीं और चले जाओ। कुछ दिनों तक तुम्हें हम सब से अलग रहना होगा।” यह कहते हुए रशीद हाउस बोट के बाहरी दरवाजे तक चला आया और दरवाजा खोलकर बाहर झांकने लगा।

चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। हाउसबोट डल झील में चलते-चलते एक उजाड़, सूने किनारे पर आ लगी थी। दूर-दूर तक कोई आवाज सुनाई नहीं देती थी। रात के सन्नाटे में बस झींगुर की आवाज सुनाई दे रही थी।

तभी पेड़ों के झुंड में से एक शिकारा बाहर निकला और हाउसबोट के किनारे आ लगा। रशीद चुपके से हाउस बोट छोड़कर उस शिकारे में आ बैठा। जॉन और रुखसाना हाउस बोट के जीने तक चले आये। रशीद ने धीमी आवाज में गुड लक कहा और मांझी ने शिकारा आगे बढ़ा दिया।

जॉन रुखसाना के देखते-देखते शिकारा पेड़ों के उसे झुंड में गायब हो गया, जहाँ से वह निकल कर आया था। रुखसाना ने विहस्की का ताज़ा जाम बनाया और जॉन को देते हुए बोली, “आजाद कश्मीर कैसी जगह है?”

“नॉनसेंस! मेरा तो जी चाहता है कि इस जाल से बाहर निकल जाऊं।”

“अब यह मुमकिन नहीं डियर!”

“क्यों?”

“हिंदुस्तान में रहोगे, तो एक न एक दिन पकड़े जाओगे। पाकिस्तान से दगा करोगे, तो गोली का निशाना बना दिए जाओगे।

“ओह शट अप!” जॉन गुस्से में झुंझलाया और फिर व्हिस्की का एक बड़ा घूंट लेते हुए रुखसाना से पूछ बैठा, “लेकिन तुमने क्या सोचा है?”

“दिल्ली चले जाऊंगी। शायद पुराना काम मिल जाये।”

“और अगर पुलिस तुम तक भी पहुँच गई तो?”

“तो क्या? मैं मौत से नहीं डरती।” रुखसाना ने लापरवाही से कहा और फिर अपने लिए एक जाम बनाकर जॉन के जाम से टकराया।

जॉनी आगे बढ़ कर उसे आलिंगन में भर लिया और मुस्कुराती नज़रों से देखते हुए बोला, “फॉरगेट इट!”

“लोग भूल गई। चलो मोहब्बत की बातें करो। शायद हम यह दोनों के मिलन की आखिरी रात हो।”

“नहीं डार्लिंग, आखिरी मत कहो। इंशा अल्लाह हम फिर मिलेंगे।” जॉन ने कहा और रुखसाना को खींचकर अपनी गोद में बैठा लिया। खिड़की से आती चांद की रोशनी में दो जवानियाँ आपस में गले मिलने लगी।

हाउस बोट पल-पल से रखती रात के समान झील के तल पर डोलती आगे बढ़ती गई।

घटना के तीन दिन बाद गुरनाम सिंह की लाश मिली। लाश श्रीनगर से कोई पचास मील दूर कंगन वादी में बहती बर्फीली सिंधु नदी में पाई गई। इस भयानक घटना की चर्चा श्रीनगर के शहरी और फौजी इलाके में जंगल की आग के समान फैल गई।

रशीद को गुरनाम की मौत का दुख था। वह सब कुछ जानते हुए भी अनजान बना मिलिट्री वालों की छानबीन में सहायता कर रहा था। जब लाश को पहचानने के लिए उसे पुलिस चौकी में बुलवाया गया, तो गुरनाम की लाश देखते ही वह तड़प उठा। कुछ देर के लिए वह भूल गया कि गुरनाम उसका नहीं, बल्कि रणजीत का दोस्त था। उसे लगा जैसे उसका कोई अपना प्रिय मित्र कठोरता से मार डाला गया हो। उसने पूरे जोश के साथ इंस्पेक्टर इंचार्ज से कहा कि इस घटना की पूरी छानबीन की जाये। मिलिट्री स्कूल में पूरा सहयोग देगी।

रशीद की अपनी आत्मा उसे धिक्कारने लगी थी गुरनाम से वह फिल्म उड़ाने का उत्तरदायित्व उसी ने जॉन को सौंपा था। ऐसा करते समय उसने यह बिल्कुल नहीं सोचा था कि इसका परिणाम इतना भयानक होगा। पर लाभ क्या हुआ? वह फिल्म, जो गुरनाम की हत्या करके प्राप्त की गई थी, बिल्कुल ब्लैंक थी।
 
लाश का पोस्टमार्टम हुआ, तो गुरनाम की मौत का कारण सिर का फट जाना निश्चित हुआ। शायद वह कहीं ऊंचाई से फिर किसी चट्टान पर जा गिरा था, जिस कारण उसका सिर फट गया और वह मर गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट हो गया था कि जिस समय उसकी मृत्यु हुई, उसके मेदे में काफ़ी मात्रा में शराब मौजूद थी।

पुलिस चौकी में उसके अतिरिक्त उसके यूनिट का कमांडेंट कर्नल मजुमदार और कुछ दूसरे फौजी अफ़सर भी उपस्थित थे। कर्नल मजुमदार ने बताया कि हेड क्वार्टर से मिली सूचना के अनुसार कैप्टन गुरनाम सिंह को किसी विशेष कार्य से कश्मीर भेजा गया था।जब उन्होंने रशीद से उस विशेष कार्य के बारे में कोई जानकारी प्राप्त करें चाहे तो रशीद झट कह उठा, ” नो सर! मुझे तो उसने इतना ही बताया था कि वह छुट्टी काटने कश्मीर आया था।”

“लेकिन तुम्हारा मकान छोड़ कर अचानक ही वह होटल में क्यों शिफ्ट कर गया था?” कर्नल ने पूछा।

“मेरी ही भूल से। वास्तव में मुझे उसका शराब पीना पसंद नहीं था। पीने के बाद वह कुछ अधिक ही बहकने लगता था। एक रात मैंने उसे टोका, तो वह सवेरे ही बिना मुझसे कुछ कहे होटल चला गया।”

“ओह! होटल जाने के बाद तुम उससे मिले थे?”

“जी नहीं! दो एक बार प्रयत्न किया, लेकिन वह मिला नहीं।”

“शराब के अलावा उसकी और भी कोई कमज़ोरी थी?”

“औरत!” रशीद ने झिझकते हुए कहा।

“दैट्स राइट!” पुलिस अफसर ने बीच में कहा, “गुरनाम सिंह के होटल से गायब हो जाने से एक दिन पहले वह होटल में अकेला नहीं था, बल्कि रुखसाना नाम की एक लड़की देर तक उसके साथ शराब पीती रही थी।”

रुखसाना का नाम सुनते ही रशीद के बदन में एक झुरझुरी सी दौड़ गई और उसने झट पूछा, “वह लड़की मिली क्या?”

“नहीं वह अपने दोस्त जॉन के साथ कश्मीर छोड़ कर भाग गई है।”

“कहाँ?”

“पुलिस इसकी छानबीन कर रही है।”

“मुझे विश्वास है इंस्पेक्टर!” रशीद के कुछ ऊँचे स्वर में कहा, “मेरे दोस्त की मौत का कारण वे लोग ज़रूर जानते होंगे।”

“यह तुम कैसे कह सकते हो।” कर्नल मजुमदार ने प्रश्न किया।

“उस रात कर्नल चौधरी की विदाई की पार्टी में मेरे दोस्त और जॉन की झड़प हो गई थी। उस समय रुखसाना उसके साथ थी।”

“और दो दिन बाद उसकी मंगेतर गुरनाम के साथ शराब पी रही थी। अजीब बात है!” कर्नल मजुमदार ने आश्चर्य प्रकट किया।

“पीने वालों का क्या भरोसा सर! एक रात उलझते हैं, दूसरी रात दोस्त बन जाते हैं।” रशीद के स्थान पर इंस्पेक्टर ने उत्तर दिया और रशीद से संबोधित हो कर पूछ बैठा, “क्या आप रुखसाना और जॉन को जानते थे?”

“जी नहीं! बस उसी दिन ऑफिसर्स मैस में सरसरी सी मुलाकात हुई थी।”

“वे लोग किसके गेस्ट थे?” कर्नल ने पूछा।

“मुझे नहीं मालूम सर!” रशीद ने माथे से पसीना पोंछते हुए कहा।

कुछ और पूछताछ तथा पुलिस की कार्रवाई के बाद गुरनाम की लाश फौज के हवाले कर दी गई। रशीद भारी मन के साथ उसकी लाश अपनी यूनिट में ले आया। वैसे भी गैरिजन ड्यूटी पर होने के कारण उसके अंतिम संस्कार का उत्तरदायित्व उन्हीं पर था।

रशीद ने अपने हाथों से अपने दोस्त की अर्थी सजाई और पूरे फौजी सम्मान के साथ उसका दाह संस्कार हुआ। जब उसने दोस्त की लाश को आग के हवाले किया, तो हवा में फायर हुए और फौजी बिगुल की उदास धुन से सारा वातावरण शोक ग्रस्त हो गया, रशीद की आँखों में अनायास आँसू उमड़ आये। उसे इस बात का बड़ा दुख था कि ड्यूटी निभाते हुए उसने रणजीत के दोस्त की जान ले ली।

गुरनाम का चंद दोस्तों के अतिरिक्त इस दुनिया में कोई ना था। पत्नी शादी के थोड़े दिनों बाद ही मर गई थी। औलाद से वह वंचित रहा। ले-देकर रिश्ते के एक चाचा थे, जिन्होंने उसकी खेती बड़ी संभाली हुई थी। वे उसकी मौत की खबर सुनकर कश्मीर आये और रीति के अनुसार गुलाब के फूल लेकर चले गये। जाने से पहले जब उन्होंने गुरनाम का असबाब मांगा, तो पुलिस ने यह कहकर इंकार कर दिया कि जब तक पुलिस की कार्रवाई पूरी नहीं हो जाती, वह असबाब पुलिस के अधिकार में रहेगा।

पुलिस की छानबीन की रशीद पूरी जानकारी रखता था। जब टैक्सी ड्राइवर का बयान पुलिस में रिकॉर्ड हुआ, तो उन्हें गुरनाम की मृत्यु के कारण पर संदेह होने लगा। ड्राइवर ने बताया कि वह एक लड़की का पीछा करता हुआ पीर बाबा के डेरे तक गया था। जब उसकी वापसी की प्रतीक्षा कर रहा था, तो बहुत देर बाद एक आदमी उसके पास आया और उसका किराया चुकाकर बोला था कि सरदारजी को थोड़ा समय लगेगा, इसलिए वह चला जाये। फिर जैसे-जैसे छानबीन आगे बढ़ती रही, उसके संदेह दृढ़ होता गया कि गुरनाम की मौत नदी में गिरने से नहीं हुई, बल्कि पीर बाबा के डेरे पर हुई थी। उसके कमरे से मिली फिल्म की रील को जब प्रोजेक्टर पर चढ़ाया गया, तो उसमें जॉन और पीर बाबा के चेहरे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे।

यह रहस्य पाते ही पुलिस ने पीर बाबा के अड्डे पर छापा मारा। पीर बाबा और उसके चेलों को पकड़ लिया गया। लेकिन उन्हें वहाँ ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिल सका कि जिससे वे इस अड्डे को दुश्मनों का अड्डा सिद्ध कर सके या यह प्रमाणित कर सके कि गुरनाम की हत्या वहीं पर हुई है। फिर उन्होंने बयान और गवाहों के आधार पर जॉन और रुखसाना के वारंट जारी कर दिये।

रशीद को यह जान कर संतोष हुआ कि 555 के मामले में उसका कहीं वर्णन नहीं है। इसका अर्थ था कि उस पर किसी को संदेह नहीं था और वह संतोष से इस देश में रहकर अपना निश्चित कार्य कर सकता था। लेकिन इस घटना को दृष्टि में रखते हुए कुछ समय के लिए उसे अपना कार्य बंद कर देना चाहिए।

तभी उसे रणजीत की माँ की याद आ गई, जो अपने बेटे से मिलने के लिए तड़प रही होगी। हर चार दिन बाद उसका एक पत्र आता था। उन पत्रों से उसकी उनकी बेचैनी झलकती थी। पिछले पत्र में तो उसने यहाँ तक लिख दिया था कि अगर वह तुरंत छुट्टी लेकर आया, तो वह स्वयं ही श्रीनगर पहुँच जायेगी।

माँ कहीं अपने इकलौते बेटे से मिलने के लिए मूर्खता ना कर बैठे, यह सोचते ही वह घबरा गया। अब उसके पास टालमटोल का कोई बहाना नहीं था। उसने सोचा कि हो सकता है अधिक टालने पर किसी को उस पर संदेह ना हो जाये। यह बात पहले ही उसकी दृष्टि में थी और इससे निपटने के लिए उसने अपनी रिंग के एक आदमी को इस गाँव में भेज दिया था। अब उसे छुट्टी के लिए प्रार्थना पत्र देना ही पड़ा।

अगले दिन उसकी छुट्टी की प्रार्थना स्वीकार हो गई। उसने घर आकर अलमारी में से वह पत्र निकाला, जो आज उसे प्राप्त हुआ था और उसके जासूस साथी ने मनाली से भेजा था। इस पत्र में रणजीत की माँ की तस्वीर थी। उसकी आदतों, व्यवहार संबंधियों इत्यादि का पूरा ब्यौरा था।

आराम कुर्सी पर बैठे न जाने कितनी देर तक वह उस वृद्धा की तस्वीर देखता रहा। इस महिला के चेहरे से एक विशेष तेज झलकता था। रशीद की अपनी माँ बचपन ही में ख़ुदा को प्यारी हो चुकी थी। ममता की मिठास का उसे ज़रा भी अनुभव नहीं था। वह महिला उसकी माँ नहीं थी। रणजीत की माँ थी और न जाने क्यों उसे कुछ ऐसा अनुभव हो रहा था कि रणजीत की माँ की कोख उजाड़कर वह कोई बहुत बड़ा पाप कर रहा था। माँ तो फिर माँ ही है…चाहे किसी की भी हो। इस विचार के आते ही उसका सारा शरीर कांपकर रह गया। उसके दिल में एक अनोखी पीड़ा उठी और जैसे उसका सारा शरीर ही बोझल हो गया हो। वह सुस्ताने के लिए उसी कुर्सी पर टांगे पसारकर लेट गया। उसने आँखें बंद कर ली और थोड़ी देर के लिए अपने शरीर ढीला छोड़ दिया।

तभी एकाएक किसी आहट ने उसे चौंका दिया। उसे लगा कमरे में अकेला नहीं था। कोई छाया उसके पास से गुज़र कर चली गई थी। अपनी सांस रोक, टेबल लैंप के धुंधले प्रकाश में वह कमरे में इधर-उधर देखने लगा। उसे यों प्रतीत हुआ, जैसे कोई सामने लटके पर्दे के पीछे से छिपने का प्रयत्न कर रहा है। रशीद ने कुर्सी से उठने का प्रयास किया, लेकिन भय से उसका शरीर कुर्सी से चिपक कर रह गया।

“कौन हो तुम?” बड़ी मुश्किल से फटी आवाज में वह चिल्लाया।

कुछ क्षण तक कमरे में मौन रहा। फिर वह छाया पर्दे के पीछे से निकलकर मेज के पास रोशनी में आ गई। रशीद के मुँह से अनायास एक भयभीत चीख निकल गई। उसने कांपती दृष्टि से देखा, तो सामने रणजीत खड़ा मुस्कुरा रहा था। अपनी आँखों पर विश्वास न करते हुए वह फिर चिल्लाया, “कौन हो तुम?”

“ओ हो! अपने हमशक्ल को इतनी जल्दी भूल गए हो।” रणजीत एक विषैली हँसी हँसता हुआ बोला।

“लेकिन तुम तो कैंप में कैद थे।” रशीद घबराकर बोला।

“कैद था, लेकिन फ़रार होकर यहाँ वापस आ गया हूँ।”

रणजीत ने कहा और फिर उसके पास आकर उसकी आँखों में झांकता हुआ बोला, “और अब मैं तुम्हें कैदी बनाऊंगा….गिन गिन कर तुमसे बदले लूंगा।”

“मुझसे?”

“हाँ तुमसे! ठीक उसी तरह तड़पाऊंगा, जैसे तुमने मुझे तड़पाया है। तुम मेरी माँ की ममता को घायल करके उसकी आत्मा को दुख पहुँचाना चाहते थे ना! इतने दिनों तो तुम्हें मेरी मंगेतर की भावनाओं से खेलकर उसे अपने दिल बहलाने का खिलौना बना रखा था, अब मैं तुमसे सारा हिसाब चुकता करूंगा। तुम्हें अपनी कैद में रखकर प्रतिशोध की बरछी से तुम्हारा कलेजा छलनी कर दूंगा। जो काम तुमने अधूरा छोड़ा है, उसे मैं पूरा करूंगा। मैं तुम्हारे स्थान पर मेज़र रशीद बनकर पाकिस्तान जाऊंगा। वहाँ के सब सैनिक भेद चुराकर अपने देश भेजूंगा और तुम्हारी सुंदर पत्नी सलमा को आलिंगन में लेकर अपने दिल की प्यास बुझाऊंगा। कहो कैसा लगेगा यह सब तुम्हें?”

“ओ शट अप…यू रास्कल!” रशीद गुस्से से चीख पड़ा और एक झटके से कुर्सी छोड़कर रणजीत के सामने आ खड़ा हुआ। रणजीत उसकी कंपन और उसके चेहरे का उतार-चढ़ाव देखकर अनायास हँसने लगा और फिर ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगा। उसके ठहाके रशीद के कानों में जैसे-जैसे ज़हर टपका ने लगे। और फिर जब यह ठहाके उसकी सहनशक्ति की सीमा पार कर गये, तो उसने लपककर रणजीत के गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया।

रशीद के बदन को सहसा जैसे किसी भूकंप ने झिंझोड़ कर रख दिया। उसने संभलने का एक और असफ़ल प्रयत्न किया, तो अपने आपको उस टेबल लैंप से उलझा हुए पाया, जो मेज़ पर गिरकर औंधा हो गया था।

लैंप के गिरने से कमरे में अंधेरा हो गया। धुंधलके में उसने इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई, तो वहाँ कोई भी नहीं था। झट ही नींद की झोंक से उसका मस्तिष्क साफ हो गया और उसे पता चला कि यह केवल एक भयानक सपना था। उसका सारा शरीर पसीने से लथपथ था।

सपने का प्रभाव बहुत देर तक उसके मस्तिष्क पर बना रहा। अपने बिस्तर पर लेटा न जाने वह कब तक वह करवटें बदलता रहा और अपने अशांत दिल की धड़कनें सुनता रहा।

(14)

पूनम का अर्ध-पागल पिता मेज पर युद्ध क्षेत्र का नक्शा जमाये बैठा था। लकड़ियों और लोहे के कुछ टुकड़ों से बंदूकें और तोपें बनाई गई थी और टीन के डिब्बों से टैंको तथा आरमर्ड कारों का काम लिया गया था। अब उस भूमि पर जहाँ सामने से दुश्मन आक्रमण करने वाला था, बारूद बिखेरकर सुरंगे बिछाने में व्यस्त था। साथ-साथ वह बोलता जा रहा था।

“सौ फीसदी इसी तरह से हमला होगा। तो यह सुरंगें दुश्मन के परखच्चे उड़ा देंगी और अगर वह सुरंगों से बच भी गया, तो हमारे जवान उसे गोलियों से भून कर रख देंगे। लेकिन वेट…वेट…जवानों! एक भी फायर हो गया, तो दुश्मन होशियार हो जायेगा। पहले उसे चोट पर आने दो।”

तभी रशीद मकान में प्रविष्ट हुआ और पूनम का पिता चीख उठा।

“फायर…आ गया दुश्मन…फायर।”

रशीद जहाँ था, वहीं ठिठककर रह गया। उसके कदमों की आहट सुन कर पूनम का पिता पलटा और चिंगारियाँ बरसाती आँखों से रशीद को घूरता हुए बोला, “कौन हो तुम?”
 
“जी…आपने मुझे पहचाना नहीं। मैं रणजीत हूँ…कैप्टन रणजीत!”

“ओह कैप्टन रणजीत! तुम कहाँ चले गये थे? शायद तुम पाकिस्तान की कैद में थे।” उसने मस्तिष्क पर बल देते हुए कहा।

“जी हाँ! आज ही कैद से छूट कर आया हूँ।”

“मैंने तुमसे कहा था, मेरा एटम बम का फार्मूला ले जाओ। तुम्हें दुनिया की कोई ताकत नहीं हरा सकती। लेकिन तुम लोग मुझे पागल समझते हो। हालांकि पागल तुम ख़ुद हो। बोलो कौन पागल है? तुम या मैं?”

“जी…जो आपको पागल समझता है, वह पागल है।”

“गुड, अब तुम काफी समझदार हो गए हो। लेकिन पूनम बिल्कुल मूर्ख है। कैसे कैद हुए थे तुम?”

“जी…हमारी टुकड़ी जैसे ही हमले के बाद बिखरी, मैं दुश्मनों की पकड़ में आ गया।”

“मैं भी सेकंड वर्ल्ड वॉर में एक बार पकड़ा गया था। लेकिन उस वक़्त मेरे पास एटम बम का फार्मूला नहीं था। वरना जापानी मुझे बिल्कुल गिरफ्तार ना कर सकते थे। अब मैंने ब्रिटिश गवर्नमेंट को लिखा है कि वह मुझे फिर मैदान-ए-जंग में भेज दे, ताकि अबकी बार मैं जापानियों को छठी का दूध याद दिला दूंगा। मैंने जंग में ऐसे-ऐसे नक्शे तैयार किए हैं कि….देखना चाहते हो, तो देखो।” उसने मेज़ पर बनाए युद्ध क्षेत्र के नक्शे की ओर संकेत किया और फिर बोला, “यह लड़ाई का तरीका खास मेरी ईज़ाद है। बीस साल तक सिर खपाने के बाद मुझे यह नक्शा सूझा है। अब मेरा एक जवान, दुश्मन के हजारों जवानों का मुकाबला कर सकता है। देखो दुश्मन उस पहाड़ी की आड़ में छिपा हुआ है। उसने मेज़ के दूसरे किनारे पर रखे हुए एक पत्थर की ओर संकेत करते हुए कहा और फिर रशीद की ओर हाथ उठाकर बोला, “होशियार…खबरदार…दुश्मन हमला करने ही वाला है। अब मैं सुरंग में आग लगाता हूँ। माचिस है तुम्हारे पास?”

“जी नहीं लाइटर है।”

“लाओ वही चलेगा”

रशीद पहले तो लाइटर देने से झिझका। लेकिन जब पूनम के पिता ने आग्रह किया, तो इंकार न कर सका। लाइटर हाथ में आते ही उसने झट से जला दिया और मेज पर बिछी बारूद में आग लगा दी। लाइटर के शोले के छूते ही बारूद भक़ से जल उठा। उसकी लपटें रशीद के चेहरे तक पहुँची थी कि पूनम की आहट सुनाई दी। वह झपटकर मेज़ तक तक पहुँची और पांव से चप्पल उतारकर उसने वह आग बुझा दी। फिर पिता की ओर मुड़कर गुस्से से बोली, “यह क्या डैडी…अभी सारे घर को आग लग जाती है।” फिर उनके हाथ में रशीद का लाइटर देखकर रशीद की ओर देखती हुई बोली, “ओह! तो यह आपका लाइटर है। आपने क्यों दिया यह इन्हें?”

“मुझे क्या मालूम था कि यह सचमुच बारूद है।” रशीद ने झेंपते हुए कहा।

“बारूद यह स्वयं बना लेते हैं। इसलिए मैं इनसे माचिस छुपाती फिरती हूँ। लाइए, लाइटर मुझे दे दीजिये, वरना घर में आग लगा देंगे आप।” उसने पिता के हाथ लाइटर छीनते हुए कहा।

“मैं तंग आ गया हूँ इन यूएनओ से। जब भी दो मुल्कों में जंग छिड़ती है, यह सीज़ फायर करा देती है।” पूनम के पिता ने बड़बड़ा कर कहा।

“अच्छा चलिए अपने कमरे में। अब तो सीज-फायर हो गया।” पूनम ने कहा और उन्हें घसीटती हुई उनके कमरे में ले गई। फिर जब वह वापस आए, तो रशीद ने उसे करुण दृष्टि से देख कर कहा, “बड़ा कठिन जीवन है तुम्हारा। तुम इन्हें अकेले घर में छोड़कर बाहर कैसे जाती होगी?”

घंटे दो घंटे के लिए भी कहीं जाती हूँ, तो चिंता लगी रहती है। शाम को ड्यूटी पर जाती हूँ, तो इनकी देखभाल एक नौकर करता है। कुछ दिन के लिए घर बाहर जाना होता है, तो किसी ने किसी को इनके पास रखकर जाती हूँ। कश्मीर गई थी, तो कमला आंटी की लड़की रमा को बुला लिया था। लेकिन वह भी इतने दिन डरती ही रही। न जाने मेरे पीछे क्या कर बैठे। दिन-ब-दिन हालत बिगड़ती जा रही है इनकी।” पूनम ने दुख भरे स्वर में रुक-रुक कर कहा।

“अच्छा आप अपनी बात बताओ।”

“कैसी हो तुम?” रशीद उसका ध्यान हटाने के लिए विषय बदलना चाहा।

“अच्छी हूँ…लेकिन आप कब आये?”

“आज सुबह की फ्लाइट से। कल शाम को मनाली जा रहा हूँ। सोचा तुम्हें साथ ले चलूं।”

“जी तो मेरा भी चाह रहा था माँ से मिलने को, लेकिन डैडी की हालत तो देख रहे हैं आप।”

“तुमने तो वचन दिया था कि तुम मेरे साथ चलोगी माँ के पास।”

“ऐसा कीजिए आप मनाली चलिए। मैं डैडी की देखभाल के लिए कमला आंटी को यहाँ बुला लेती हूँ। उनके आते ही चंद दिनों के लिए आ जाऊंगी।”

पूनम के बात सुनकर रशीद का मन बुझ गया। वह चाहता था कि पूनम उसके साथ होगी, तो माँ का ध्यान कुछ उसकी ओर बंट जायेगा। वरना हो सकता है कि अनजाने में उसकी किसी हरकत से माँ के मन में कुछ संदेह उत्पन्न हो जाये। वह इस प्रकार का कोई अवसर नहीं आने देना चाहता था। इस विचार से वह पूनम को साथ चलने का आग्रह कर रहा था, किंतु उसकी विवशता को ध्यान करके चुप रह गया।

“आप ठहरे कहाँ हैं?” पूनम ने उसकी विचारधारा बंद करते हुए पूछा।

“होटल अकबर में।”

“होटल में क्यों? मेरे घर को पराया समझते हैं क्या? चलिए अभी सामान लेकर आइये।”

“अरे एक रात की तो बात है, कल तो चला ही जाऊंगा और फिर शादी से पहले या रुकना भी तो ठीक नहीं है।” रशीद ने कुछ मुस्कुराकर अंतिम वाक्य कहा, तो पूनम शर्मा गई।

तभी अचानक रशीद की दृष्टि सामने दीवार पर फ्रेम में चढ़ी हुई एक तस्वीर पर पड़ गई। वह वापस जाकर ध्यानपूर्व उस तस्वीर को देखने लगा। रणजीत और पूनम बाहों में बाहें डाले किसी होटल की पार्टी में नाच रहे थे।

“क्या देख रहे हैं?” पूनम ने पास आकर पूछा।

“अपनी जवानी की गुस्ताखियाँ।”

“अब क्या बूढ़े हो गए हैं?” पूनम ने शरारत से कहा।

“जबसे दुश्मन की कैद से मुक्त हुआ हूँ, दिल कुछ बुझ सा गया है। सब इच्छायें, कामनायें जैसे दम तोड़ चुकी हैं। न हँसने को मन करता है, न मज़ाक करने को।”

“शादी के बाद भी आपने मुझसे यही रुखा व्यवहार किया, तो मैं घुट-घुट कर मर जाऊंगी।”

“मरे तुम्हारे दुश्मन…जब तुम्हारा साथ मिलेगा, तो सोई हुई कामनायें अपने आप फिर जाग उठेंगी।“

“तो भूल जाइए उस कैद को…उस युद्ध के वातावरण को। अब आप केवल मेरे कैदी हैं, मेरे प्यार के कैदी।” पूनम ने भावुकता से विभोर होकर उसके हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा।

रशीद ने झुककर उसकी आँखों में झांका, तो उसे वहाँ प्यार के दिये जलते दिखाई दिये। पूनम ने उसके सीने पर सिर रखकर आँखें बंद कर ली।

“अच्छा…तो अब इस कैदी के लिए क्या हुक्म है?” रशीद ने उसके दोनों कंधे पकड़कर उसे अपने आप से अलग करते हुए पूछा।

“आज रात जा खाना हम इकट्ठे खायेंगे…होटल अकबर में।”

“It’ll be a pleasure for me! मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा।”

वचन के अनुसार ठीक दस बजे पूनम होटल अकबर में पहुँच गई। रशीद द्वार पर खड़ा उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसने बड़े उत्साह से आगे बढ़कर उसका स्वागत किया। हरी साड़ी में पूनम का सौंदर्य फूटा पड़ा था। उसके खिले हुए चेहरे पर रशीद की दृष्टि न ठहर रही थी। वह उसे साथ लिए डायनिंग हॉल तक चला आया।
 
हॉल में अधिकतर मेजें भरी हुई थीं। रशीद पूनम को लिए हुए उस मेज़ तक चला आया, जो उसने आज विशेष रूप से आरक्षित करा रखी थी। बैरा आया और उन दोनों कि इच्छानुसार खाने का ऑर्डर लेकर चला गया। खाने से पहले रशीद ने कोल्ड ड्रिंक्स लाने के लिए कहा। पूनम के ताज़ा निखरे हुए सौंदर्य को वह प्रशंसनीय दृष्टि से निहारे जा रहा था। पूनम ध्यानपूर्वक डायनिंग हॉल की छत पर की गई मीनाकारी को देख रही थी।

अकबर होटल का यह हॉल कुछ मुगल राजभवनों के ढंग पर सजाया गया था। कांच की हजारों रंग-बिरंगी चूड़ियाँ छत से लटक रही थीं। होटल वालों ने इस हॉल को शीश महल का नाम दे रखा था। रशीद ने पहले ही बैरे से हॉल की बनावट इत्यादि के बारे में विस्तार से पूछ रखा था और अब मुगल इतिहास के पन्नों से हवाला देते हुए पूनम को उसकी बारीकियाँ समझाई।

तभी लाउड स्पीकर पर एक डांसर लिली के डांस की घोषणा हुई। रोशनियाँ बुझ गई और अब वहाँ केवल टिमटिमाती मोमबत्तियाँ जलती रह गई। फर्श पर लगी स्पॉट लाइट का प्रकाश हुआ और छत पर लटकी चूड़ियाँ आकाश में तारों के समान चमक उठी।

हॉल की गहमा गहमी एकाएक निस्टबधता में बदल गई और हर कोई इस सुंदरी को देखने लगा, जो पश्चिमी संगीत की धुन के साथ हॉल में प्रविष्ट हुई थी। अपने अर्ध नग्न शरीर का प्रदर्शन करते हुए वह कैबरे डांस के साथ गाने लगी। उसके संक्षिप्त से काले रेशमी लिबास में जड़े हुए सितारों पर सपाट लाइट का प्रकाश पड़ रहा था और कई दर्शकों के मुँह से सिसकारियाँ सी निकल रही थी। वह नागिन के समान बलखाती हुई अपने गोरे गदराये शरीर को थिरकाती, तो लोग दिल थाम लेते।

पूनम और रशीद दोनों ध्यानपूर्वक उसे यों देख रहे थे, जैसे उसे पहले कहीं देखा जो और अब पहचानने का प्रयत्न कर रहे हों। फिर अचानक पूनम के मुँह से निकला, “अरे यह तो रुखसाना है…कश्मीर वाली!”

“हाँ हाँ, है तो वहीं। लेकिन यहाँ कैसे आ गई?” रशीद ने आश्चर्य से कहा।

उनके यों अचानक बोल पड़ने पर आस-पास बैठे लोगों ने घूरकर उन्हें देखा और वे दोनों झेंप कर चुप हो गये। लेकिन रुखसाना को वे निरंतर ध्यानपूर्वक देखते रहे।

रुखसाना को अचानक वहाँ देखकर रशीद का मूड खराब हो गया था और वह कुछ उकताया सा दिखाई दे रहा था। रुखसाना नाचती हुई अचानक रशीद की मेज़ के सामने से गुजरी और उसके साथ वाली मेज़ पर एक नौजवान का झुककर चुंबन लेती हुई आगे बढ़ गई। रशीद और पूनम ने उसकी इस असभ्य हरकत पर बुरा सा मुँह बनाया।

“रुखसाना…लिली…! यह क्या मज़रा है?” पूनम ने बहुत धीमे से रशीद के कान में कहा।

“यही तो मैं भी सोच रहा हूँ।” रशीद जानते हुए भी अनजान बनकर बोला और फिर क्षण भर रुककर कहने लगा, “ज़रूर इसमें कोई भेद है।”

“होगा…छोड़ो…अब लिली हो या रुखसाना…हमें क्या?” पूनम लापरवाही से बोली।

“हो सकता है एक शक्ल की दो लड़कियाँ हों।” रशीद थोड़ी देर चुप रहकर बोला।

“आप भी क्या बेतुकी सोचते हैं…यह भी कोई फिल्म है, जहाँ हीरो जुड़वा का और हीरोइन जुड़वा बहन का रोल करती है।”

पूनम की बात सुनकर रशीद अनायास मुस्कुरा पड़ा। नाच क्लाइमेक्स पर पहुँच गया। लिली एक बार बिजली की सी तेजी के साथ लहराई और फिर अचानक ही उसके कदम रुक गये। हॉल तालियों से गूंज उठा… हॉल फिर रोशनी से जगमगा उठा, लेकिन प्रकाश होने से पहले ही डांसर गायब हो चुकी थी।

उजाला होते ही बैरे अंदर आये और खाना सर्वे करने लगे। पूनम जो भूख से बेचैन हो उठी थी, झट खाने पर टूट पड़ी। रशीद मुस्कुरा उठा और वह भी उसका साथ देने लगा।

थोड़ी देर बाद रुखसाना नाच का लिबास बदलकर एक रेशमी मैक्सी पहने लहराती हुई आई और उनके पास बैठ गई। उसके हाथ में विहस्की के एक गिलास था। मुस्कुराते हुए उसने उन दोनों को बारी-बारी से देखा और बोली, “हेलो!”

“रुखसाना तुम!” उन दोनों कि ज़बान से एक साथ निकला।

“नहीं मिस लिली…रुखसाना कश्मीर में थी। यहाँ मिस लिली हूँ।” रुखसाना ने गिलास से एक सिप लिए हुए कहा।

“यह तुमने अपना नाम क्यों बदल लिया? पूनम ने आश्चर्य से पूछा।

“हर नई जगह मेरा नाम बदल जाता है। कश्मीर में रुखसाना, दिल्ली में लिली और मुंबई में अनारकली।” कहते हुए उसने गिलास से एक और सिप लिया।

“लेकिन वास्तव में तुम हो क्या?” पूनम ने कहा और अपनी बात स्पष्ट करने के लिए बोली, “मेरा मतलब है हिन्दू हो, मुसलमान हो या क्रिश्चियन हो?”

“मैं सिर्फ औरत हूँ…औरत और औरत का कोई धर्म नहीं होता…धर्म तो बस मर्दों का होता है। औरत जिस धर्म के मर्द से शादी करती है, वही उसका धर्म है।”

“जो शायद जॉन से शादी करने के बाद…”

“नाम मत लो उस फ्रॉड का मेरे सामने।” रुखसाना ने गुस्से से पूनम कि बात काटते हुए कहा।

“फ्रॉड!” रशीद के मुँह से अनायास निकला।

“हाँ फ्रॉड…पाकिस्तानी जासूस था वह।”

“क्या कह रही हो तुम?” पूनम का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसने प्रश्नसूचक दृष्टि से रशीद की ओर देखा, जो स्वयं घबरा रहा था कि नहीं नशे की तरंग में रुखसाना उसका भी भेद न खोल दे। लेकिन रुखसाना ने कनखियों से उसकी ओर देखते हुए आँखों ही आँखों में उसे संतुष्ट रहने का संकेत किया और सिगरेट सुलगा कर उसका धुआं उड़ाते हुए बोली, “मैं कैबरे से अच्छी खासी कमाई कर रही थी। उसने शादी का वादा करके मुझसे मेरा धंधा छुड़वा दिया और मुझे अपने काम के लिए इस्तेमाल करने लगा। मैं मोहब्बत की भूखी थी, उसके इशारों पर नाचती रही। लेकिन मतलब निकल जाने पर वह मुझे अकेला छोड़कर पाकिस्तान भाग गया।”

“भाग नहीं गया…बॉर्डर पकड़ा गया था…उसने आत्महत्या कर ली।” रशीद ने उसे बताया।

“आत्महत्या!” पूनम के मुँह से हल्की सी चीख निकल गई।

“बहुत अच्छा हुआ…उसका यही अंत होना चाहिए था।” रुखसाना ने घृणा से होंठ सिकोड़ते हुए कहा।

पूनम को उसका यह ढंग पसंद नहीं आया और उसे समझाते बोली, “कुछ भी हो, वह तुम्हारा प्रेमी था…तुम्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए…हिंदुस्तानी नारी तो एक बार जिसकी हो जाती है, उस पर प्राण तक न्यौछावर कर देती है।”

“मैं उन बेवकूफ औरतों में से नहीं हूँ। अब मैंने फैसला कर लिया है कि कभी मोहब्बत का रोग नहीं लगाऊंगी। ज़िन्दगी मर्दों की तरह ऐश से गुजारूंगी…आज उसकी बाहों में, तो कल उसके आगोश में।”

“छी छी छी…कैसी बहकी-बहकी बातें करती हो।” पूनम ने घृणा से माथे पर बल डालते हुए कहा।

“अभी कहाँ बहकी हूँ डियर। पहला गिलास भी तो खाली नहीं हुआ।” रुखसाना ने कहा और फिर एक ही सांस में गिलास खाली करके मेज पर रख दिया।

तभी रुखसाना को उस नौजवान ने पुकारा, जिसका नाचते हुए उसने चुंबन ले लिया था और रुखसाना “एक्सक्यूज मी” कहकर नौजवान की मेज पर चली गई। वह शायद रुखसाना का नया आशिक था।

रशीद और पूनम ने संतोष की सांस ली। रशीद ने धीरे से कहा, “पूअर फ्रस्ट्रेटेड सोल।” और फिर दोनों जल्दी-जल्दी खाना खाने लगे।
 
खाना समाप्त हुआ। रशीद ने जल्दी से बिल चुकाया और इस विचार से कि कहीं रुखसाना फिर आकर बोर न करे, वह उठकर बाहर जाने लगा। रुखसाना उस नौजवान के पास बैठी बातें कर रही थी। उसने कनखियों से उन्हें बाहर जाते देखा और उनकी शीघ्रता देख कर मुस्कुरा दी।

वहाँ से रशीद और पूनम होटल के बगीचे में चले आये। जहाँ घास में छिपे रंगीन बल्ब एक अनोखी मनोहर छटा प्रस्तुत कर रहे थे। आसपास खिले फूलों की फैली सुगंध ने उन्हें विभोर-सा कर दिया। हाल में उत्पन्न हुई घुटन कुछ ही क्षण में हवा के झोंकों ने समाप्त कर दी। पूनम ने रशीद का हाथ अपने हाथों में ले लिया और उसके साथ टहलने लगी… इस रोमांचमयी वातावरण से उसे उन्माद की सी अनुभूति होने लगी।

कुछ देर बाद रशीद ने अनुभव किया कि पूनम जो अपने आपको एक सीमित फासले पर रखती थी, उस समय बात-बात पर रशीद से चिपकी जा रही थी। कभी उसके गले में बाहें डाल देती, कभी सीने से लग जाती और रशीद उसके इस व्यवहार से बेचैन हुआ जा रहा था। आखिर जब पूनम अधिक ही खुल गई और जब उसकी सहनशक्ति से दूर हो गई, तो वह पूनम से कह उठा, “चलो, अब मैं तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ आऊं।”

“क्यों इतनी जल्दी उकता गए मुझसे।” उसने शिकायत भरे स्वर में कहा।

“यह बात नहीं…मैं सोच रहा था कि तुम्हारे डैडी घर पर अकेले होंगे।”

“जी नहीं! उनकी देखभाल के लिए इस समय घर पर नौकर है।”

“तो चलो, फिर कहीं चल कर एक-एक कप कॉफी पियें।” रशीद ने उसका हाथ पकड़कर कहा।

“ऊंह, इतना सुंदर समा छोड़कर फिर उसी घुटन में चलें।” पूनम ने ठुनक कर कहा और पास होकर रशीद को अपनी बाहों में जकड़ लिया। उसके गदराए हुए जवान बदन का स्पर्श और बालों से आती भीनी सुगंध ने कुछ देर के लिए रशीद पर एक जादू सा कर दिया। वह भूल गया कि वह परीक्षा के किस लक्ष्य पर है।

“यह तुम्हें क्या हो गया है?” उसने पूनम के कान के पास मुँह ले जाकर कहा।

“एक नशा। तुम्हारे सामीप्य का नशा…कितने लंबे वियोग के बाद मुझे मिले हो। यों लग रहा है, जैसे आज की रंगीन रात मेरी शादी की रात हो। जीवन की सारी खुशियाँ तुम्हारी बाहों में सिमट आई हो। हमेशा के लिए इन मजबूत बाहों जा सहारा मुझे कब दोगे रणजीत!” कहते-कहते उसकी आवाज भर्रा गई और भावुकता में उसने रशीद को ज़ोर से भींच लिया।

पूनम पर जैसे पागलपन सा सवार था…वह भावनाओं की सब सीमायें पार किए जा रही थी। उसके जवान बदन की आंच ने रशीद की धमनियों में भी ज्वाला सी भड़का दी थी। इस समय उसे यूं लगने लगा था, जैसे उसकी बाहों में पूनम नहीं सलमा थी। वह पूनम को बाहों में जकड़े हुए था और उसके होंठ पूनम के होठों से मिलने वाले थे कि सहसा वह चौंक पड़ा। उसे अनुभव हुआ जैसे पास ही पेड़ों के पीछे रणजीत छिपा खड़ा है…उसकी मोटी-मोटी आँखें पत्तों से झांक रही हैं और वह उससे कह रहा है, “जब मैं तुम्हारी हसीन जमाल बीवी सलमा को आगोश में ले कर अपनी प्यास बुझाऊंगा, तो तुम्हें कैसा लगेगा?”

रशीद ने झट अपने उमड़ते हुए भावों को नियंत्रण में किया और झटके से पूनम को अपने से अलग कर दिया। पूनम उसकी अचानक उत्साह हीनता का कारण न समझ सकी और उसके पसीने से भीगे चेहरे को देखकर आश्चर्य से पूछ बैठी, “क्या बात रणजीत?”

“कुछ नहीं…जाओ…अब तुम घर जाओ। देर हो गई है।” वह बेरुखी से बोला और जल्दी से पलटकर तेज-तेज कदमों से होटल में जाने लगा। पूनम अपनी जगह खड़ी विस्मय से उसे देखती रही। वह छोटी-छोटी क्यारियों को फलांगता हुआ तेजी से उससे दूर जा रहा था।

पूनम ने सोचा शायद वह उसकी सीमा से अधिक घनिष्ठता से नाराज हो गया है। सचमुच वह कुछ अधिक भावुक हो गई थी। यह सोचकर उसका गला भर आया। उसका जी चाहा कि वह पीछे भागकर क्षमा मांग ले, लेकिन फिर साहस ने उसका साथ न दिया। कुछ देर तक वह अकेली वहाँ स्थिर सी खड़ी रही और फिर कांपते कदमों से बगीचे से बाहर निकल गई।

उसी बगीचे के एक अंधेरे कुंज का सहारा लेकर रुखसाना उन दोनों का यह नाटक देख रही थी। शराब की गर्मी और उन दोनों के प्यार के रोमांचमयी दृश्य ने उसके बदन में आग सी लगा रखी थी। उसकी धमनियाँ जैसे तड़पने लगी थी। उसने हाथ में पकड़ा शराब का गिलास अंतिम घूंट लेकर खाली कर दिया और लापरवाही से उसे घास में एक ओर उछाल दिया…फिर अचानक रशीद की बेबसी का विचार आती ही एक खनकता हुआ ठहाका उसके कंठ से निकला।

रशीद उसी बौखलाहट में अपने कमरे तक चला आया। उसका शरीर ठंडे पसीने में नहाया हुआ था। उसने जल्दी से कोट उतार कर एक ओर फेंका और गले की नेक टाई ढीली करके बिस्तर पर लेट गया। अभी तक एक उन्माद सा उसके मस्तिष्क पर छाया हुआ था…एक ऐसा उन्माद, जिसमें अब आत्मग्लानि सम्मिलित होकर उसे तड़पा रही थी। पूनम की भावनाओं को प्रोत्साहित करके उसे एक पीड़ा सी अनुभव हो रही थी।

मानसिक उलझन को दूर करने के लिए उसने एक सिगरेट सुलगा ली। सिगरेट लाइटर में भरी पूनम की आवाज ने उसे और भी बेचैन कर दिया। उसने झट लाइटर बुझाकर रख दिया और सिगरेट के लंबे-लंबे कश लेने लगा।

तभी कमरे के दरवाजे पर दस्तक हुई। वह चौंक गया। उसने सोचा, शायद पूनम फिर आ गई हो…और झट सिगरेट को ऐश ट्रे में रखकर दरवाजे तक चला आया। कुछ अजीब भाव से उसके दरवाजा खोल दिया, किंतु उसके सामने पूनम नहीं, बल्कि नशे में चूर रुखसाना खड़ी थी।

“तुम?” रशीद के होठों थरथराये।

“हाँ, मैं…” कहते हुए वह अंदर भी आ गई और नशीली आँखों से देखती हुई बोली, “दरवाजा बंद कर दो।”

फिर रशीद के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही उसने पलट कर चटकनी चढ़ा दी और उसके निकट आती हुई बोली, “पूनम परेशान करके चली गई?”

रशीद जो अब तक उसके आने के बारे में सोच रहा था कि उसकी यह बात सुनकर सावधान हो गया और उसे अपने आप से अलग करता हुआ बोला, “उसे मैंने भिजवा दिया।”

“झूठ…वह तड़पकर चली गई…मैं सब समझती हूँ…मैंने सब देखा है।”

“देखा है तो क्या हुआ? तुम तो मेरी मजबूरी समझती है।”

“हाँ! लेकिन कहो तो तुम्हारी इस परेशानी को दूर कर दूं।” रुखसाना ने नशे से लड़खाड़ाती आवाज में कहा और ऐश ट्रे में रखा रशीद का सिगरेट उठाकर अपने होठों से लगा।

“रुखसाना…!” रशीद ने उसकी बात सुनकर डांटा।

“शरमाओ मत…मर्द आदमी हो…मैं तुम्हारे बदन में लगी आग की तपन को महसूस कर रही हूँ। चाहो तो वह आग बुझा लो।” कहते हुए उसने रशीद के गले में बाहें डाल दीं।

“तुम नशे में हो।“ रशीद ने उसकी बाहें झटकते हुए कहा।

“हाँ मैं नशे में हूँ…लेकिन शराब के नशे में नहीं…तुम्हारे जवान और खूबसूरत बदन को देख कर मुझे नशा हो रहा है। तुम्हारी इन मखमूर आँखों ने मुझे बेसुध बना दिया है। जो आग इस वक़्त मेरे अंदर भड़क रही है, तुम्हें न बुझाई, तो मैं रात भर सो सकूंगी।“

“शटअप…बंद करो यह बकवास और चली जाओ यहाँ से।” रशीद गुस्से से बोला।

“मेरे इश्क को बकवास कहते हो…ऐसा जुल्म मत करो। देखो मेजर मैं तुम्हारी मजबूरी को समझती हूँ। जो तुम्हारे इश्क में जलाकर अभी लौट गई, उसे तो तुम छू नहीं सकते और जो तुम्हारी है, वह यहाँ से सैकड़ों मील दूर है। लेकिन मैं हाजिर हूँ। इस हाथ लगी नेमत को न ठुकराओ, अपनी आग को बुझा लो, वरना दीवाने हो जाओगे।” रुखसाना ने झूमते हुए कहा और झटपट बटन खोलकर उसने मैक्सी उतार कर फर्श पर डाल दी और अपने नग्न शरीर का प्रदर्शन करती हुई रशीद के सामने खड़ी हो गई।

रुखसाना की यह हरकत देख कर रशीद गुस्से से पागल हो गया, लेकिन उसने धैर्य से काम लिया…फर्श से उसकी मैक्सी उठाई और उसके नग्न शरीर पर डालते हुए बोला, “कपड़े पहन हो और यहाँ से चली जाओ।”

“और अगर मैं ना जाऊं, तो?”

“मैं तुम्हें जबरदस्ती बाहर निकाल दूंगा।”

“यह एक औरत की तौहीन होगी।”

“तौहीन उसकी होती है, जिसकी कोई इज्जत आबरू होती है और तुम… तुम अपने आपको बेहतर समझ सकती हो।”

“मैं तुम्हारा इशारा समझ गई मेजर। तुम मुझे बेआबरू कहना चाहते हो न…लेकिन मुझे इस गड्ढे में किसने धकेला? तुम लोगों ने…तुमने और जॉन ने…तुमने अपने नये कारोबार के लिए मेरे जिस्म को नीलाम किया…मुझे किसी की महबूबा बनाया। अपनी गर्ज के लिए मुझे गुरनाम के साथ सोने के लिए मजबूर कर दिया और अब मैं रंडी हूँ…ठीक है, अगर मैं रंडी हूँ, तो तुम लोग भड़वे हो…दलाल हो।”

रशीद से और उद्दंडता सहन न हो पाई। उसने तड़ाक से रुखसाना के गाल पर एक चपत धरते हुए कहा, “गेट आउट यू ब्लडी बिच!”

रुखसाना ने अपना गाल सहलाते हुए घायल नागिन के समान रशीद को देखा और तेजी से मैक्सी पहनते हुए कमरे से बाहर चली गई। कमरे से निकलते हुए उसने पूरे बल से, झटके से दरवाजा बंद किया। एक धमाका हुआ और फिर एक सन्नाटा छा गया… एक न समाप्त होने वाला सन्नाटा।

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दूसरे दिन सुबह जब पूनम होटल अकबर पहुँची, तो रशीद होटल छोड़कर जा चुका था। यह सूचना मिलते ही पूनम के दिल को भारी ठेस पहुँची और वह रिसेप्शन काउंटर पर ही खड़ी रह गई। इससे पहले कि वह रिसेप्शनिस्ट लड़की से कुछ और पूछती, उस लड़की ने स्वयं ही कहा, “आप ही मिस पूनम हैं?”

“जी…!” अपना नाम सुनकर पूनम आश्चर्य से उसे देखने लगी।

“आपके नाम कैप्टन रणजीत एक संदेश छोड़कर गए हैं।” लड़की ने कहा और मुस्कुराकर काउंटर की दराज़ से एक लिफ़ाफ़ा निकालकर पूनम को थमा दिया।

पूनम ने बेचैनी से लिफ़ाफ़ा खोला और काउंटर से परे हटकर रशीद का पत्र पढ़ने लगी। लिखा था –

“डियर पूनम!

रात जाने अचानक मुझे क्या हो गया…वास्तव में मेरी मानसिक स्थिति इन दिनों कुछ असंतुलित सी हो गई है। इसका कारण मैं नहीं जान सका…आशा करता हूँ, तुम मेरे अनुचित व्यवहार क्षमा कर दोगी।

मैं मनाली जा रहा हूँ माँ के पास। वहाँ तुम्हारी प्रतीक्षा करूंगा। आने की सूचना देना।

तुम्हारा रणजीत!”

पूनम ने इस संक्षिप्त पत्र को कई बार पढ़ा और रणजीत की मानसिक स्थिति के बारे में सोचने लगी। रात ही वह घंटों इसी विषय पर विचार करती रही थी…कहीं ऐसा तो नहीं कि लंबी कोर्टशिप के बाद रणजीत का दिल उससे ऊब गया हो और वह उसे स्थगित करने के लिए कोई ड्रामा खेल रहा हो…आखिर कौन सी मानसिक उलझन है, जो रणजीत को उससे दूर किए जा रहे हैं। इन्हीं विचारों में रशीद का पत्र हाथ में लिए वह खड़ी थी कि सहसा “हेलो” की सुरीली आवाज ने उसे चौंका दिया। उसने पलटकर देखा, तो रुखसाना गुलाबी रंग के सलवार सूट पर लहराती हुई सामने जीने से उतर रही थी। पूनम में जल्दी से पत्र मोड़कर बैग में डाल दिया। रुखसाना ने दूर ही से उसकी हरकत को देख लिया था। मुस्कुराते हुए पास आकर उसने पूनम से पूछा, “रणजीत का खत है क्या?”

“हाँ…उन्हीं का है…आज सवेरे वे चले गये।”

“जानती हूँ मैं…माँ से मिलने के लिए बहुत बेचैन था वह।”

“क्या तुमसे मिल कर गए हैं वे?”

“नहीं…लेकिन उसके दिल की कैफ़ियत मुझसे छिपी नहीं रहती।”

रुखसाना का यह वाक्य पूनम को कुछ अप्रिय लगा। उसके होंठ गुस्से से फड़फड़ा उठे, लेकिन झट ही वह संभल गई और आँखें झुकाकर कुछ सोचने लगी। उसे चुप देखकर रुखसाना ने पूछा, “क्या सोच रही हो?”

“यही कि तुम रणजीत के निकट न होते हुए भी उन्हें जितना समझती हो, मैं उतना निकट होते हुए भी नहीं समझ पाई।” पूनम ने अंधेरे में तीर फेंककर उसके दिल को टटोलना चाहा।

रुखसाना उसकी बात सुनकर कुछ देर चुप रही और फिर एक गहरी सांस लेकर कह उठी –

“क्या करूं…धंधा जो ऐसा ठहरा। कैबरे करते-करते मर्दों की नब्ज पहचानने लगी हूँ। मेरे इसी कमाल की वजह से तो पाकिस्तानी एजेंटों ने मुझसे जासूसी का काम लिया।”

“क्या?” पूनम आश्चर्य से उछल पड़ी और फटी-फटी आँखों से उसे देखती हुई बोली, “जासूसी क्या तुम भी जॉन के साथ…”

“हाँ…मैं भी इस काम में जॉन का हाथ बंटा रही थी।” रुखसाना ने बड़े ही शांत भाव से स्वीकार किया।

“तुम्हें शर्म नहीं आई अपने देश से द्रोह करते हुए।” पूनम ने गुस्से से कहा।

“कैसे आती? पैसे जो करारे मिलते थे।” वह निर्लज्जता से मुस्कुराई।

“धिक्कार है ऐसे पैसे पर। ज़िन्दगी में क्या पैसा ही सब कुछ है तुम्हारे लिये?”

“और क्या? लोग पैसे के लिए अपना ईमान बेच देते हैं, बीवी और बहनें तक बेच देते हैं। मैंने तो सिर्फ अपने ज़िस्म का सौदा किया है।”

“और यह सब कुछ खुलेआम कहते हुए तुम्हें डर नहीं लगता?”

“डर किसका?”

“कानून का!”

“कानून! वह साला तो कब का मेरे पीछे लगा हुआ है। मेरे और जॉन के वारंट निकल चुके हैं। जॉन तो खुदकुशी करके वहाँ पहुँच गया, जहाँ से पुलिस के फ़रिश्ते भी उसे गिरफ्तार नहीं कर सकते हैं। लेकिन मैं! मुझसे नहीं हो सकती खुदकुशी। मैं तो गिरफ्तार हो जाऊंगी और फिर कितनी शोहरत होगी मेरी। अखबारों में मेरा नाम आयेगा, तस्वीरें छपेंगी। एक सनसनी पैदा हो जायेगी इस खबर से…ओह! ज़िन्दगी में सेंसेशन भी के दिलफरेब शै है डियर पूनम!”

पूनम ने अनुभव किया कि शायद रात के नशे का प्रभाव अब तक रुखसाना के दिमाग पर बाकी था। इस दशा में उसके पास रहकर मगज़ खपाना उसने उचित न समझा और उससे आज्ञा लेकर वहाँ से खिसकना चाहा, किंतु रुखसाना इतनी शीघ्र उसे छोड़ने वाली नहीं थी। इसलिए उसका हाथ पकड़ कर बोली, “दो घड़ी हमारे साथ न बैठोगी। दिल की बातें न सुनोगी?”

“ज़रा जल्दी में हूँ।”

“लेकिन रणजीत मिल जाता, तो तुम जल्दी में न होती।” उसने मुस्कुराकर कहा और पूनम को हाथ से पकड़कर खींच कर डायनिंग हॉल में ले गई। कोने की एक मेज़ पर बैठते हुए उसने पूनम से नाश्ते के लिए पूछा । पूनम के इंकार करने पर उसने अपने लिए लंबे-चौड़े नाश्ते का तथा पूनम के लिए एक कप कॉफ़ी का आर्डर दिया और फिर उससे संबोधित होकर बोली, “सच कितना कड़वा होता है पूनम डियर!”

“हाँ रुखसाना…ओह…सॉरी लिली!”

“नहीं नहीं…तुम मुझे रुखसाना ही कहो। लिली तो रात के अंधेरों के साथ ही मर जाती है।” रुखसाना ने कुछ दार्शनिक ढंग से कहा।

“तुम रणजीत को कब से जानती हो?” पूनम ने अचानक उससे पूछा।

“जबसे वह पाकिस्तान से लौटा है।”

“क्या वह भी जानते हैं कि तुम पाकिस्तान के लिए जासूसी करती थी।”

रुखसाना पूनम का प्रश्न सुनकर कुछ सोच में पड़ गई और थोड़ी देर मौन रहकर बोली, “सवाल बड़ा टेढ़ा है डियर!”

“लेकिन जवाब सीधा चाहिए मुझे।”

“क्यों?”

“शायद तुम्हारे इस उत्तर पर मेरे जीवन का बहुत कुछ निर्भर है।”

“मैंने कुछ देर पहले कहा था न कि सच बड़ा कड़वा होता है। सुनोगी तो बौखला जाओगी।”

पूनम कुछ कहना ही चाहती थी कि बैरा नाश्ते की ट्रे लिए आ गया। रुखसाना ने कॉफ़ी का कप पूनम की ओर सरका दिया और स्वयं चुपचाप नाश्ता करने लगी।
 
पूनम कुछ कहना ही चाहती थी कि बैरा नाश्ते की ट्रे लिए आ गया। रुखसाना ने कॉफ़ी का कप पूनम की ओर सरका दिया और स्वयं चुपचाप नाश्ता करने लगी।

“तुम कुछ कहने जा रही थी।” उसे खामोश ने पूनम ने कहा।

“हाँ…मैं यह कहने वाली थी कि…” वह कुछ कहते-कहते रुक गई और फिर आमलेट का टुकड़ा पराठे के साथ मुँह में रखकर चबाती हुई पूनम की आँखों में आँखें डालकर बोली, “अगर मैं कहूं कि तुम्हारा रणजीत भी हमारा साथी है तो…”

पूनम जो कॉफ़ी का प्याला हाथ उठाकर घूंट लेते-लेते रुक गई थी, उसकी बात सुनकर यूं उछल पड़ी, जैसे उसे किसी बिच्छू ने डंक मार दिया हो और कॉफ़ी का प्याला उसके हाथ से छूटकर मेज़ पर गिर पड़ा। कॉफ़ी के छींटे उसकी साड़ी पर बिखर गते। रुखसाना ने झट उठकर नैपकिन से उसकी साड़ी साफ की और फिर जब उसने पूनम से दृष्टि मिलाई, तो पूनम उसे अविश्वास की दृष्टि से घूर रही थी। कुछ देर तक इसी भाव से वह उसे घूरती रही। फिर थोड़ा चिल्लाकर बोली,” यह झूठ है। वह कभी देशद्रोही नहीं हो सकते।”

“देशद्रोही था नहीं, लेकिन उसे बना दिया गया है।”

“किसने बनाया है?”

“दुश्मनों ने!”

“मुझे तो विश्वास नहीं होता।”

“तो क्या कहता है तुम्हारे विश्वास?”

“देश विद्रोह करने से पहले ही वह अपनी जान दे देंगे।”

“तुम्हारा विश्वास गलत है डियर! तुम्हारे प्यार को धोखा दिया गया है।”

“कैसा धोखा?”

“जिसे तुम रणजीत समझ रही हो, वह रणजीत नहीं है।”

“क्या बक रही हो तुम?” पूनम ने लगभग चीखते हुए कहा और फिर तेज नज़रों से उसे घूरते हुए बोल, “क्या इस समय भी तुम नशे में हो?”

“नहीं पूनम! कसम ले लो सुबह से एक बूंद भी चखी हो। मैं वह हकीकत बता रही हूँ, जो तुम्हें मालूम नहीं। लेकिन मैं उसके बारे में सब कुछ जानती हूँ।”

“तो कौन है वह?” पूनम ने बिफ़री हुई आवाज में पूछा।

“तुम्हारे प्रेमी का हमशक्ल रशीद…मेजर रशीद, जो रणजीत के भेष में हिंदुस्तान में घुसकर पाकिस्तान के लिए जासूसी कर रहा है।”

“रणजीत कहाँ है?” पूनम ने घबराकर पूछा।

“या तो दुश्मनों की कैद में है या मारा जा चुका होगा।”

“नहीं!” पूनम के मुँह से अनायास एक चीख निकल गई और आसपास बैठे लोग चौंककर आश्चर्य से उसे देखने लगे।

रुखसाना की बात सुनकर पूनम के दिल में जैसे किसी ने चाकू घोंप दिया हो। कुछ क्षण के लिए उसके दिल की हरकत जैसे रुक गई हो और मस्तिष्क में आंधियाँ सी चलने लगी…फिर धीरे-धीरे उसके सामने कल्पना पट पर रशीद से उसकी मुलाकातों की तस्वीरें उभरने लगी। कितनी ही असाधारण बातें…उसकी रणजीत से थोड़ी भिन्न भराई हुई आवाज, पूनम से पहले भेंट में उसका उखड़ा-उखड़ापन, देवी के मंदिर में जाते हुए उसकी हिचकिचाहट, रुखसाना के साथ रहस्यमयी मित्रता, ‘अल्लाह’ लिखे लॉकेट और ‘ओम’ लिखे लॉकेट की अदला-बदली पर उसका बिगड़ना…यह सब याद आते ही पूनम को रुखसाना की बात में कुछ सच्चाई दिखाई देने लगी। उसके दिल में जैसे हलचल सी मच गई…मस्तिष्क की नसें जैसे फटने लगी। अब वहाँ बैठना उसके लिए मुश्किल हो गया। एक झटके के साथ कुर्सी छोड़कर वह उठ खड़ी हुई और रुखसाना से बिना कुछ कहे बाहर की ओर लपकी। रुखसाना ने उसे पुकार कर रोकना चाहा, किंतु पूनम ने एक नहीं सुनी और पलक झपकते होटल से बाहर निकल गई।

रुखसाना की होठों पर जीवन में शायद पहली बार एक पवित्र सी मुस्कुराहट उभरी। अपराध स्वीकार करने के बाद अपना अतीत उसे कुछ उजला-उजला सा अनुभव होने लगा। उसने रशीद से केवल अपने अपमान का बदला ही नहीं लिया था, बल्कि एक नारी होने के नाते उसे दूसरी नारी के आंचल को कलंकित होने से बचा लिया था। अपना मन हल्का करके वह शांति से नाश्ता करने लगी।

नाश्ता करते हुए रुखसाना की दृष्टि अचानक बाहर काउंटर की ओर चली गई। सीबीआई का एक अफ़सर मिलिट्री पुलिस के दो सिपाहियों के साथ काउंटर पर खड़ा कुछ पूछ रहा था। रुखसाना ने उसके मुँह से लिली का शब्द सुना और क्षण भर के लिए चौंक उठी, लेकिन दूसरे ही क्षण शांति से नाश्ते में व्यस्त हो गई।

दोनों सिपाहियों को बाहर ही छोड़कर अफ़सर डाइनिंग रूम में आया और चारों ओर देखकर रुखसाना की मेज के पास आकर बोला, “रुखसाना आप ही है ना?”

“जी..!” रुखसाना ने उससे आँखें मिलाते हुए बड़ी शांत मुद्रा में उत्तर दिया।

“मुझे आपसे कुछ ज़रूरी काम है।”

“जानती हूँ…मेरा वारंट है…लेकिन आप बैठिए न…कुछ चाय कॉफ़ी लीजिये।”

“नो थैंक यू!” अफ़सर ने खड़े-खड़े उत्तर दिया।

“तो मुझे नाश्ता खत्म करने की इज़ाजत दीजिये।”

“आफ़कोर्स…आफ़कोर्स!” अफ़सर ने कहा और कुर्सी खींचकर रुखसाना के सामने बैठ गया।

दिल्ली में जो कुछ हो रहा था, उन सब बातों से अनभिज्ञ रशीद मनाली जाने वाली सड़क पर प्राइवेट टैक्सी में बैठा भविष्य के प्लान बना रहा था। माँ से मिलने के बाद जल्दी से जल्दी वह सारे सैनिक भेद और महत्वपूर्ण नक्शे, जो उसने बड़े परिश्रम से प्राणों पर खेलकर प्राप्त किए थे, पाकिस्तान पहुँचा देगा। इस काम के संपूर्ण हो जाने के बाद अगर वह गिरफ्तार भी हो गया, तो कोई चिंता नहीं, क्योंकि उसे मालूम था कि पाकिस्तान में कई खतरनाक हिंदुस्तानी जासूस पकड़े हुए कैद हैं… उसकी सरकार उनके बदले में उसे छुड़ा लेगी।

उसकी टैक्सी लगभग शाम के चार बजे मनाली पहुँची। अचानक घाटी की बर्फीली हवा से उसने शीत अनुभव किया और अटैची से स्वेटर निकाल कर पहन लिया। सड़क के दोनों ओर ऊँचे बर्फ से ढके पहाड़ खड़े थे और डूबते हुए सूरज की सुनहरी किरणों ने उनकी चोटियों को सोने के ताज पहना दिए थे। घाटी के छोटे-छोटे मकानों से धुएं की रेखायें सी उठकर वातावरण में छाये कोहरे में मिल रही थी। जिधर भी दृष्टि जाती, सेवों और दूसरे फलों से झूमते वृक्ष दिखाई देते। रशीद ने पहली बार घाटी के स्वर्ग को देखा था और वह इस सुंदर छटा की मोहिनी में खोया जा रहा था कि अचानक ड्राइवर ने टैक्सी अड्डे पर रोक दी। इस स्थान से आगे गाड़ियों को जाने की मनाही थी।

“बाजार आ गया साहब!” ड्राइवर की आवाज ने रशीद को चौंका दिया। वह अपने अटैची लेकर गाड़ी से बाहर निकल आया और डिक्की में सामान रखवा कर उसने टैक्सी का किराया चुका दिया।

“राम-राम कप्तान साहब!” अचानक एक बूढ़ा आदमी उसके पास आकर हाथ जोड़ता हुआ बोला।

“राम-राम!” रशीद ने दबी आवाज में उत्तर दिया और सोचने लगा। लद्दूराम के बताये व्यक्तियों में यह कौन व्यक्ति विशेष था।

“अरे भैया…आपने पहचाना नहीं…मैं कालूराम हूँ।” बूढ़े ने रशीद को असमंजस में देखकर स्वयं उस की मुश्किल दूर कर दी।

“अरे हाँ कालूराम!” रशीद ने मुस्कुराते हुए कहा, “बहुत बदल गए हो इतने दिनों में। कहो अच्छे तो हो?”

“अच्छा हूँ कप्तान साहब! आप कहिये…आपका क्या हाल…मुझे तो आप बदले हुए दिखाई देते हैं।”

रशीद कालूराम के इस वाक्य पर कुछ चौंक पड़ा। कालूराम ने बात चालू रखते हुए कहा –

“पाकिस्तान से लौट इतने दिन हो गए और आप अब आ रहे हैं माँ से मिलने। आपकी बांट जोहते-जोहते आँखें पथरा गई हैं बेचारी की। कोई ऐसा दिन नहीं जाता, जब मैं दूध लेकर जाऊं और माँ जी आपकी बात न छेड़ दें।”

“हाँ कालूराम, फौज की नौकरी ही ऐसी है….छुट्टी ही नहीं मिल पाई। क्या अब भी तुम्हीं दूध देने जाते हो?” रशीद ने माँ और घर के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करने के लिए उसे बोलने पर उकसाते हुए पूछा।

“हाँ जाता हूँ…परंतु आपके जाने के बाद तो धंधा ही मारा गया। पहले मान जी दो लीटर दूध लेती थीं। अब एक पाव ही में गुजर कर लेती हैं।”

“अकेली है ना! इतना दूध लेकर क्या करेंगी।”
 
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