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वापसी : गुलशन नंदा

“अकेली क्यों है जी? वह ब्राह्मणों की बेटी गौरी जो है उनके साथ।”

गौरी का नाम सुनकर वह चौंका। उसके जासूस साथी ने भी घर में एक और लड़की के बारे में उसे लिखा था।

“तो ठीक है भैया! कल से तुम दी लीटर दूध दे जाया करना।” रशीद पास से गुजरते हुए एक और अजनबी के ‘नमस्ते’ का उत्तर देते बोला, “अब यह सामान तो किसी तरह पहुँचा दो।”

“लाओ मेरे सिर पर लाद दो।”

कालूराम ने सामान सिर पर उठा लिया और रशीद उसके पीछे पीछे चल पड़ा। इस समय कालूराम का मिल जाना बड़ा शुभ था क्योंकि रशीद उसके साथ बिना किसी कठिनाई के घर पहुँच सकता था।

रास्ते में बहुत से आते-जाते व्यक्तियों ने उसे पहचान कर प्रसन्नता से उसका अभिवादन किया। रशीद सबके अभिवादन का मुस्कुराकर उत्तर देता हुआ जल्दी से आगे बढ़ता गया। एक अच्छे पक्के मकान के दरवाज़े पर पहुँच कर कालूराम रुक गया। ‘सो यह है रणजीत जा घर!’ उसने सोचा और धड़कते दिल से अंदर प्रवेश करने लगा। यह उसकी परीक्षा की सबसे कड़ी मंज़िल थी।

उसने दहलीज पर पैर रखा भी नहीं था कि बारह तेरह वर्ष की एक उठती हुई बालिका खुशी से रणजीत भैया कहकर चीख पड़ी और उसे वहीं रोकती हुई बोली, ” अरे अरे ठहरो…पहले तेल तो छुआ लेने दी…माँ जी की पता चल गया, तो मेरी चोटी और जान एक कर देंगी।” यह कहकर वह तेल लाने अंदर चली गई।

रशीद की समझ में कुछ न आया कि यह तेल छुआना क्या होता है। उसे चुप देखकर कालूराम बोल उठा, “इन्हीं बातों से तो इसने माँ का दिल जीत लिया है और फिर वह भी इस अनाथ लड़की को अपनी औलाद के समान ही चाहती हैं।”

तभी गौरी एक छोटी कटोरी में सरसो का तेल लेकर आ गई और कुछ बूंदे रशीद के पैरों के पास टपका कर बोली, “बस, अब आ जाओ भैया…अंदर।”

“अरी गौरी! तू तो एकदम इतनी लंबी-चौड़ी हो गई।” रशीद ने घर के अंदर आते हुए कहा और फिर इधर-उधर देखते हुए बोला, “माँ कहाँ है?”

“मंदिर गई हैं। दोनों समय, देवी माता से आपकी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने जाती हैं। बस आती ही होंगी।” गौरी ने कहा और जल्दी-जल्दी पलंग का बिस्तर ठीक करती हुई बोली, “बैठो न भैया!”

रशीद चारपाई पर बैठता हुआ कालूराम से बोला, “अच्छा भैया! सामान रख दो…और हाँ…सुबह दो लीटर दूध लेकर आना।” उसने कालूराम की मुठ्ठी में दो रुपए रख दिए, जिन्हें पहले तो कालूराम ने लेने से इंकार किया, लेकिन रशीद के आग्रह पर लेकर चला गया।

कालूराम के चले जाने के बाद रशीद ने पूरे घर का जायज़ा लिया और गौरी से बोला, “हर चीज वैसी ही है, जैसी मैं छोड़ कर गया था।”

“और क्या भैया! मैंने तुम्हारी एक-एक चीज़ संभाल कर रखी है।”

“देखूं तो कैसे रखा तुमने मेरी चीज़ों को?” घर का इतिहास और भूगोल जानने का इससे सुंदर और कौन सा अवसर हो सकता था। गौरी के साथ वह एक-एक कमरे में जाकर हर चीज़ को ध्यानपूर्वक देखने लगा। रणजीत की पुस्तकें, उसके कॉलेज स्कूल में जीते हुए कप और दूसरी सब चीज़ें बड़े सलीके से सजी रखी थीं। रशीद ने गौरी के सलीके की प्रशंसा करते हुए कहा, “गौरी! तुमने हर चीजों किस सुंदर ढंग से वैसी की वैसी रखी गई। तुम बहुत सयानी लड़की हो।”

“हाँ भैया! तुम्हारी सब चीज़ें तो वैसी ही हैं, लेकिन माँ जी के चेहरे कि खिलन को मैं वैसे ही बचा कर न रख सकी। लड़ाई का एक एक दिन उनके चेहरे की रंगत छीनता चला गया और फिर जब तुम कैद हो गये, तो उनका चेहरा जैसे बिल्कुल वीरान हो गया।”

“घबराओ नहीं…अब मैं आ गया हूँ…माँ के चेहरे की खिलनन फिर लौट आयेगी।”

“अब तो वह एक ही चीज़ से लौट सकती है।” गौरी ने शरारत से मुस्कुराकर कहा।

“बस अब पूनम भाभी को बहू बनाकर के आओ। माँ जी के चेहरे पर ही क्या, सारे घर में बाहर आ जायेगी।”

तभी गौरी की दृष्टि दरवाज़े से बाहर एक स्वस्थ, परिश्रमी वृद्धा पर पड़ी और उसने झट रशीद का हाथ थामकर उसे अलमारी की आड़ में करते हुए धीरे से कहा, “भैया! इधर छिप जाओ।”

“छिप जाओ न भैया…ज़रा मज़ा आयेगा।”

रशीद झट अलमारी की ओट में खड़ा हो गया। माँ ने घर में दाखिल होते हुए कहा, “आरी गौरी! तू यहाँ खड़ी-खड़ी क्या कर रही है? अभी तक चूल्हा नहीं जलाया।“

“अभी जलाती हूँ माँ जी!” गौरी ने कुछ थकान का अभिनय करते हुए कहा।

“तू दिन-ब-दिन आलसी होती जा रही है। अच्छा चल तू आटा गूंध दे…खाना मैं बना लूंगी।”

“खाना बन जायेगा माँ जी। पहले आप यह बताइए कि देवी माता ने आपकी प्रार्थना सुनी कि नहीं।” गौरी ने माँ का ध्यान रणजीत की ओर मोड़ते हुए कहा।

“अरे, जब अपना बेटा ही नहीं आना चाहता, तो देवी माँ क्या उसे धकेल कर भेजेंगी।” माँ ने कुछ निराश होकर कहा।

“निराश मत हो माँ जी…फ़ौज की नौकरी ठहरी…जब छुट्टी मिलेगी, तुरंत आ जायेंगे।” गौरी ने एक्टिंग करते हुए कहा।

“चल हट…तू हमेशा उसका पक्ष लेती है। यह फ़ौज की नौकरी मेरी बैरन बन गई है…आ जाने दे रणजीत को। मैं उससे यह नौकरी ही छुड़वा दूंगी। अब युद्ध समाप्त हो गई है, तो उसे फौजी में रहने की क्या ज़रूरत है…बस हो चुकी बहुत देश भक्ति।” कहते हुए अचानक उसने दृष्टि आंगन में रखे रशीद के सामान पर पड़ी और चिल्लाकर बोली, “अरे! यह सामान किसका है?”

गौरी ने लपककर सामान में रखी टोकरी में से मिठाई का डिब्बा निकाला और उसमें से मावे एक लड्डू लेकर माँ के मुँह में देती हुई बोली, “पहले मुँह मीठा कर लीजिये…फिर बताती हूँ, कौन मेहमान आया है।”

माँ यह सुनते ही खुशी से कांपने लगी और भराई हुई आवाज़ में बोली, “अरे जल्दी बता??? कहीं मेरा रणजीत तो नहीं आ गया।”

तभी रशीद ने पीछे से आकर माँ की दोनों आँखें अपने हाथों से बंद कर दी और शरारत से मुस्कुराने लगा। माँ ने अपने हाथों से उसके दोनों हाथ टटोले और असीम खुशी से बोल उठी, “अरे यह तो मेरे लाल के हाथ हैं। इनसे मेरे बेटे की खुशबू आ रही है।” कहते हुए माँ ने धीरे से रशीद के दोनों हाथ अपनी आँखों पर से हटा दिए और पलटकर बोली –

“रणजीत मेरे लाल…आखिर तुझे अपनी माँ की याद आ ही गई।” और फिर दोनों हाथ रशीद की ओर फैला दिये।

रशीद ‘माँ’ कहकर उनसे लिपट गया और माँ की आँखों से खुशी के आँसुओं की झड़ी लग गई। उनके होंठ थरथराने लगे। वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन रोते हुए गले से आवाज नहीं निकल रही थी। उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसे जीवन में पहली बार अपने बच्चे को सीने से लगा रही थीं। वह निरंतर रशीद को चूमे जा रही थी। उनके आँसुओं से रशीद का चेहरा भीग गया था। उसने माँ का असीम प्यार नहीं देखा था। उसे प्रथम बार वास्तविक ममता की अनुभूति हुई थी। थोड़ी देर के लिए वह भूल गया कि यह उसकी नहीं रणजीत की माँ है।

आखिर माँ ने उसे अलग किया और उसका भीगा चेहरा अपने आंचल से साफ करने लगी। लेकिन अभी तक उनके हृदय में ममता का तूफान शांत नहीं हुआ था। वह अंदर ही अंदर कांपे पर जा रही थी। फिर बड़ी मुश्किल से अपने उमड़ते हुए भावों को नियंत्रित किया और बोली, “यह कैसी पागल ममता है। मुझे ऐसा जान पड़ता है, जैसे मैं जीवन में पहली बार तुमसे मिली हूँ। इतने बरसों बाद लौटकर आया है। अब तो माँ को छोड़कर कभी नहीं जायेगा।”

“हाँ माँ…तू कहेगी, तो नहीं जाऊंगा।” रशीद ने मुश्किल से अपने भावों को दबाते हुए कहा।

माँ बेटे की भावुकतापूर्ण भेंट देखकर गौरी का जी भर आया था और वह सिसक सिसक कर रो रही थी। अम ने उसे सिसकते देखा, तो बोली, “अरी पगली! तू क्यों रो रही है? चल जल्दी से भैया के लिए खाना तैयार कर दे। अच्छा ठहर…आज मैं खुद अपने बेटे के लिए खाना बनाऊंगी।”

“नहीं माँ, तुम कष्ट मत करो।” रशीद ने उसे रोकते हुए कहा।

“कष्ट कैसा बेटा…माँ को तो बेटे को खिलाने में आनंद मिलता है…छोड़ दे मुझे। हाँ पहले उठ…चल मेरे साथ।”

माँ रशीद को साथ लेकर घर के छोटे से मंदिर में आई, भगवान की मूर्ति को प्रसाद चढ़ाकर उन्होंने रशीद को चरणामृत दिया और भगवान के चरणों से भभूत लेकर उसके माथे पर लगाई।

न जाने क्यों आज रशीद को इन बातों में ज़रा भी आपत्ति ना हुई। उसने बड़ी श्रद्धा से माँ के हाथों से चरणामृत लेकर पिया, माथे पर भभूत लगाई और भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। शायद माँ के अथाह स्नेह ने उसके मन में खड़ी घृणा की दीवार ढहा दी थी…अब उसे मंदिर, मस्जिद, ओम और अल्लाह में कोई अंतर नहीं दिखाई दे रहा था।

अम ने अपने हाथों बनाए पराठे और सरसों का साग जब उसके सामने लाकर रखा, तो उनके सुगंध से बेचैन होकर वह खाने पर ऐसा टूटा, जैसे बहुत दिनों का भूखा हो। उसने माँ को भी खींचकर अपने साथ ही खाने पर बैठा लिया। जितनी देर तक वह खाना खाते रहे, गौरी उनके पास खड़ी उनकी बातें सुनती रही। रशीद को आज खाने में जो आनंद आया था, इतना आनंद उसने ऑफिसर्स मेस, बड़े-बड़े होटलों के बढ़िया खानों में भी कभी अनुभव नहीं किया था। उसने इतना खा लिया कि उसे नींद आने लगी। माँ ने गौरी से कहा, “जा जल्दी से बिस्तर लगा दे। नींद आ रही है मेरे बेटे को।”
 
थोड़ी देर में रशीद बिस्तर पर खर्राटे लेने लगा।

सुबह जब रशीद की आँख खुली, तो सूरज की किरणें खिड़की से उसके कमरे में झांक रही थी। वह उठकर सीधा माँ के कमरे में पहुँचा। लेकिन वहाँ माँ को न पाकर बाहर निकल आया और गौरी से पूछ बैठा, “माँ कहाँ है?”

“मंदिर के पीछे पुराने वाले बाग में गई हैं।”

मंदिर की वजह से बाग ढूंढने में रशीद को कोई दिक्कत नहीं हुई।

बाग में पहुँचकर उसने देखा, माँ कारिंदे के साथ फावड़े से बालियाँ साफ करके पेड़ों की जड़ों तक पानी पहुँचा रही थी। माँ ने फावड़ा उठाया ही था कि पीछे से रशीद ने उसका फावड़ा थाम लिया। माँ ने पलट कर देखा और फावड़ा छोड़कर बोली, “अरे बेटा तुम…तुम यहाँ क्यों आये?”

“माँ बाग में काम करें और बेटा घर में आराम…यह नहीं हो सकता।” रशीद ने बच्चों की तरह मुँह फुलाकर कहा था। फिर बोला, “यह काम तो कोई बस दूर कर देगा।”

“मजदूरों के भरोसे पर कोई काम होता है बेटा…जब तक बाग का स्वामी अपने पसीने से वृक्षों को न सींचे, फलों में रस और मिठास नहीं आती।” माँ ने मुस्कुराकर कहा और लाल-लाल सेवों से लदे पेड़ों की ओर संकेत करके बोली, “इन सेवों को देख रहे हो…इनमें मेरे लहू की सुर्खी और मेरे पसीने का रस है…मेरे बागों के सेव सारे इलाके में सबसे प्रसिद्ध हैं। जब मैं फलों से लदे बाग को देखती हूँ, तो मेरा कलेजा गज भर का हो जाता है…मुझे ऐसा लगता है जैसे या बाग मेरा भरा पूरा परिवार है, जिसमें मेरे बच्चे, मेरे पोते पोते किलकारी मारते खेल कूद रहे हैं। बेटे…बस तू जल्दी से शादी कर ले, ताकि मेरा घर सचमुच इस बाग की तरह फूलों और फलों से भर जाये। उसमें सच में तेरे बच्चों की किलकारियाँ गूंजने लगे। बोल, अब मैं करूं शादी की तैयारी?”

“हो जायेगी शादी भी…इतनी जल्दी भी क्या है माँ?” रशीद ने माँ के हाथ से फावड़ा लेते हुए कहा और स्वयं पानी की नाली खोदने लगा।

(16)

दिन भर रशीद से बातें करने के बाद भी माँ का दिल नहीं भरा था। थकान के कारण रशीद को रात कुछ जल्दी नींद आने लगी थी, तो माँ ने कहा, “क्यों बेटा…इतनी जल्दी सो जाओगे?”

“हाँ माँ…आज तो तुमने मुझे दौड़ा-दौड़ा कर थका दिया। इस मौसी से मिलने जाओ. उस चाचा के यहाँ चाय पियो..? उस मामा के यहाँ खाओ…सारा बदन टूट रहा है।”

“समाज में रहकर तो यह सब कुछ करना ही पड़ता है बेटे…और फिर यही लोग तो तुम्हारे यहाँ न होने पर सहारा बनते हैं। कितना दु:ख बटाया है मेरा इन लोगों ने, तुम्हारे लड़ाई में चले जाने पर। अच्छा जाओ अपने कमरे में। मैं गौरी के हाथ दूध भिजवाती हूँ।”

रशीद अपने कमरे में आ गया और एक कुर्सी पर बैठकर गौरी के दूध लाने की प्रतीक्षा करने लगा। समय काटने के लिए वह मेज़ पर रखी रणजीत की पुस्तकें और दूसरी चीज़ें देखने लगा। ढेर से कप और शील्ड रखी थीं, जो रणजीत विभिन्न प्रतियोगिताओं में जीत कर लाया था। वह सोचने लगा कि रणजीत अवश्य स्कूल और कॉलेज में योग्य विद्यार्थी रहा होगा। मेज़ पर एक बड़े से फ्रेम में लगा रणजीत का वह फोटो भी था, जिसमें वह गाउन पहने बीए की डिग्री लेते समय ऐसी तस्वीर खिंचवाई थी।

रशीद फोटो देखता हुआ मेज़ पर रखी पुस्तकों को एक-एक कर देखने लगा। अचानक उसे पुस्तकों के बीच रखी रणजीत की डायरी मिल गई। उसने डायरी खोली और सरसरी तौर से दो चार पन्ने पढ़े। वहीं डायरी में रखे पूनम के दो पत्र भी थे। पत्र खोलकर पढ़ना ही चाहता था कि उसमें से पूनम की तस्वीर निकलकर जमीन पर गिर पड़ी। वह तस्वीर उठाने के लिए झुका ही था कि उससे पहले पीछे से एक और हाथ ने झुककर तस्वीर उठा ली। रशीद ने पलटकर देखा, उसके सामने हाथ में दूध का गिलास लिए माँ खड़ी मुस्कुरा रही थी। गौरी के स्थान पर वह स्वयं ही अपने बेटे को सोने से पहले एक बार और देखने चली आई थी। माँ ने दूध का गिलास मेज पर रख दिया और तस्वीर रशीद को थमा दी। रशीद झेंपकर रह गया और खिसियायी आवाज में बोला, “तुमने कष्ट क्यों किया माँ?”

“गौरी सो गई है। सोचा कच्ची नींद में अब उस बेचारी को क्यों जगाऊं।”

“पूनम कैसी है माँ?” पूनम की तस्वीर को डायरी में रखते हुए उसने पूछा।

“क्यों? क्या तुम्हें कश्मीर में नहीं मिली?” माँ ने मुस्कुराकर पूछा और रशीद की बौखलाहट पर हँसकर बोली, “भले ही बेटा मुझसे अपनी बातें छिपाये, लेकिन मेरी बहू कभी झूठ नहीं बोलती। वह सब बातें मुझे लिख देती है।”

“और क्या लिखा था उसने अपनी सास को? मेरी शिकायत तो ज़रूर की होगी।”

“उसने तो और कुछ नहीं लिखा था। हाँ उसकी आंटी ने लिखा था।”

“अच्छा क्या लिखा था?” रशीद ने उसकी बात काटते हुए कहा।

“वही शादी की मांग! पहले तो लड़ाई का बहाना था, इसके बाद तुम लापता हो गये, फिर कैद की खबर। लेकिन अब…अब तो अधिक नहीं टाला जा सकता।”

“ओह माँ…इतनी जल्दी क्या है?”

“तुम्हें जल्दी न होगी बेटे, लेकिन मुझे है। पूनम बिचारी का जीवन भी बड़ा कठिन गुज़रा है। पागल पिता की देखभाल में वह जीवन के हर सुख से वंचित होकर रह गई है। शादी हो जाये, तो जरा चैन की सांस लेगी।”

“लेकिन शादी के बाद पूनम मेरे साथ आ जायेगी…उसके डैडी को वहाँ कौन संभालेगा?”

“यह सोचना उनका काम है, हमारा नहीं बेटे। बस अब तू अधिक टालमटोल मत कर। अब मैं तेरा कोई बहाना नहीं सुनूंगी। मैंने पुरोहित से मुहूर्त भी निकलवा लिया है। अगले महीने की 18 तारीख का शुभ दिन निकला है। बस मैं अब और नहीं टालूंगी।”

“अरे नहीं माँ….इतनी जल्दी शादी का प्रबंध कैसे हो सकता है। क्या यह भी कोई गुड्डा गुड़िया का खेल है।” रशीद ने घबराकर बोला।

“यह मेरा काम है…तू चिंता न कर…सब प्रबंध हो जायेगा।”

रशीद ने बहस करना उचित न समझा। उसने सोचा, अगले महीने की 18 तारीख को तो अभी बहुत दिन हैं। इस बीच परिस्थितियाँ न जाने क्या करवट लेंगी। वह धीरे-धीरे दूध के घूंट पीने लगा। गिलास खाली करके जब उसने माँ को देखा, तो माँ आंचल से अपनी भीगी आँखें पोंछ रही थी।

“क्यों माँ तुम रो क्यों रही हो?” रशीद ने घबराकर पूछा।

“कुछ नहीं बेटा! ऐसे ही कुछ ध्यान आ गया था। तेरी शादी के अवसर पर मैंने क्या-क्या सोचा था। तू पाकिस्तान गया भी, तो मुझे खबर न हुई।” कहते हुए माँ ने ठंडी सांस ली।

“पाकिस्तान जाने की खबर न हुई। होती भी, तो तुम क्या करती?” रशीद ने उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछा।

“तेरे शादी पर तेरे भाई को निमंत्रण भिजवाती।”

“मेरे भाई को…” रशीद का आश्चर्य और भी बढ़ गया।

“हाँ तेरे भाई को….जो आजकल पाकिस्तानी फौज में मेजर है।”

“क्या कह रही हो माँ?” वह कुर्सी छोड़कर खड़ा हो गया और माँ के दोनों कंधे पकड़कर झिंझोड़ता हुआ बोला, “बोलो माँ, कौन सा भाई? कैसा भाई?”

“तेरा सगा भाई, जिसे ज़िंदा रहने के लिए मुसलमान बनना पड़ा।” माँ ने सिसकते हुए कहा, “और इसकी जिम्मेदार मैं हूँ। इसलिए मैंने अब तक यह भेद सबसे, यहाँ तक कि तुझसे भी छुपाये रखा।” कहते-कहते माँ की आवाज से भर्रा गई और वह कुछ क्षण के लिए मौन हो गई।

“कौन सी बात? तुम चुप क्यों हो गई? वो कहाँ है? बोलो बताओ…जल्दी!” रशीद चिल्ला उठा। उसके मन में कई भ्रम उत्पन्न होने लगे थे और वह जल्दी से जल्दी इस पहेली को सुलझा देना चाहता था।

माँ ने ठंडी सांस ली और अपनी कहानी आरंभ की :

1947 में देश स्वतंत्र हुआ। हिंदुस्तान दो टुकड़ों में बंट गया और फिर अचानक इंसान शैतान बन गया। दोनों ओर खून की भयंकर होली खेली गई। बरसों से एक साथ पले, खेले कूदे, एक-दूसरे के सुख दुख के साथी एकाएक भयानक दुश्मन बन गए। मुसलमान हिंदुओं के और हिंदू मुसलमानों के लहू के प्यासे हो गये।

हमारा घराना लाहौर के संपन्न घरानों में से एक था। बहुत सुखी थे हम। दुख या चिंता कभी हमारे पास न फटकी और फिर एक दिन अचानक जैसे प्रलय आ गई। कुछ गुंडे बंदूक और तलवारें लिए हमारे घर में घुस आये। तेरे पिता और चाचा ने उनका मुकाबला किया, लेकिन निहत्थे क्या करते? कुछ ही देर में खून से नहाई उनकी लाश आंगन में पड़ी थी। मैं अपने दो मासूम जुड़वा बेटों को लेकर गली में खुलने वाले पिछले दरवाजे से भाग खड़ी हुई। दूर तक मेरे कान में बंदूक के धमाके और घर के दूसरे लोगों की चीखें गूंजती रहीं। लेकिन मैं अपने बच्चों के लिए तेजी से भागने लगी। अभी थोड़ी ही दूर गई थी कि अचानक एक गली से कुछ गुंडे निकल कर मेरे पीछे लग गये। उनके हाथों में हथियार थे। वह मोहल्ला मुसलमानों का था। मैं कुछ दूर तक तो बच्चों को घसीटती भागती रही, लेकिन जब गुंडे मेरे सिर पर पहुँच गये, तो मैं पास ही एक मस्जिद में घुस गई और झट किवाड़ बंद करके अंदर से कुंडी लगा दी।
 
गुंडे बाहर से किवाड़ पीट रहे थे। उनके शोर से पता चलता था कि उनकी संख्या प्रति क्षण बढ़ती जा रही है। मैं बच्चों को टांगों से लगाए थरथर कांप रही थी और वह इस प्रकार धक्के दिए जा रहे थे कि लगता था कि किवाड़ भी टूट जायेगा और मैं बच्चों समेत उसके नीचे दब जाऊंगी।

सहसा शोरगुल सुनकर मस्जिद के हुजरे से एक मौलाना बाहर निकले। उन्होंने मुझे दो बच्चों के साथ दरवाजे से लगी कांपते देखा, तो सारी बात समझ गए और तेजी से मेरी ओर लपके। उनका तेजस्वी चेहरा देखकर न जाने क्यों मेरे मन को ढांढस सी बंध गई। वह मेरे पास आये, तो मैं उनकी टांगों से लिपट कर रो पड़ी।

“भगवान के लिए मेरे बच्चों को बचा लीजिये मौलवी साहब।”

उन्होंने स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरा और सांत्वना देते हुए बोले – “घबराओ मत बहन! तुमने खुदा के घर पनाह ली है। तुम्हारा कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।”

फिर वह मस्जिद का दरवाजा खोलकर गुंडों के सामने डट गए और उन्हें लताड़ा – “शर्म नहीं आती तुम्हें। एक बेसहाय औरत और उसके मासूम बच्चों को कत्ल करने चले हो। कैसे मुसलमान हो तुम? हुजूर का फरमान भी भूल गए…तुम्हारे पैगंबर ने बूढ़ों औरतों और बच्चों पर रहम करने की तालीम दी है।”

“हिंदुस्तान में हमारे बच्चों, औरतों और बड़ों पर रहम नहीं किया जा रहा है। हम भी नहीं छोड़ेंगे।” कोई गुंडा जोर से दहाड़ा और फिर सब चीख पड़े – “हाँ हाँ, हम भी वही करेंगे, जो हिंदुस्तान में हो रहा है।“

यह सुनकर मौलाना के चेहरे पर और भी तेज़ छा गया। उन्होंने भारी आवाज में कहना आरंभ किया – “हिंदुस्तान में अगर लोग गंदगी खाने लगेंगे, तो क्या तुम भी वही करोगे….बोलो….जवाब दो। अगर वहाँ बेगुनाहों पर जुल्म हो रहा है, तो उसका बदला खुदा लेगा। तुम अपने पाक जमीन पर बेगुनाहों का खून बहाकर जालिमों की सफ़ में क्यों खड़े होते हो? क्या तुम्हें अल्लाह और रसूल के फ़रमान का कोई पास नहीं रहा? क्या तुम सिर्फ नाम के मुसलमान रह गए हो? इस्लाम का नाम ऊँचा होता, जब हिंदुस्तान में मुसलमानों पर ढाये जाते जुल्मों के बावजूद पाकिस्तान में हिंदू अमन और चैन की ज़िन्दगी बसर करते।’

क्षण भर के लिए रुककर वह फिर बोले – “क्या तुम फतहे मक्का का वह वाक्या भूल गए, जब वहाँ के काफ़िरों की ज़िंदगियाँ रसूल अल्लाह की मुट्ठी में थी। ये वे लोग थे, जिन्होंने बेदर्दी से मुसलमानों को क़त्ल किया था और खुद रसूल पर जुल्म के पहाड़ तोड़े थे, उन्हें बार-बार खत्म करना चाहा था। हुजूर चाहते, तो एक इशारे में सब को मौत के घाट उतार देते। लेकिन जानते हो, हमारे पाक नबी ने क्या किया? उन्होंने ऐलान कर दिया कि इस्लाम के बड़े-बड़े दुश्मनों को माफ कर दिया जाता है और इसका नतीजा सब जानते हैं। मक्के की ज़मीन पर खून का एक कतरा भी नहीं टपका और बिना जबरदस्ती के इस्लाम के सब दुश्मन मुसलमान हो गए। यह थी इस्लाम की तालीम। इस तालीम ने दुनिया का दिल जीता था और आज इसी इस्लाम के नाम पर तुम जुल्म और बेरहमी से अपने अज़ीम मज़हब के नाम को बट्टा लगा रहे हो।“

फिर मौलाना मेरी ओर संकेत करते हुए बोले, “यह मजलूम औरत अपने दो मासूम बच्चों को लेकर खुदा की पनाह में आई है। इसकी हिफाजत की जिम्मेदारी मेरी है। कान खोल कर सुन लो, तुम मुझे मानकर इन्हें मारने के लिए मस्जिद में दाखिल हो सकते हो।“

उन्होंने उनकी बातें सुनकर गुंडे सन्नाटे में आ गये। कुछ देर तक उन्होंने आपस में खुसर फुसर की…फिर यह देखकर मैंने संतोष की सांस ली कि वे वहाँ से लौट गये।

मौलाना ने पलटकर दरवाजे की कुंडी लगा दी और हमें साथ लेकर अपने हुजरे में चले आए। शाम तक बच्चों समेत मैं हुजरे में बंद रही और रात के अंधेरे में वह मुझे मस्जिद के पिछवाड़े से अपने घर ले गए, जहाँ उनकी पत्नी ने मुझे सांत्वना दी…मेरे बच्चों को प्यार से खाना खिलाया। वह रात मैंने उन्हीं के घर में गुजारी। दूसरे दिन सुबह मौलाना ने मुझे अमृतसर भेजने का प्रबंध करा दिया। लेकिन मुझे अभी तक गुंडों का डर लगा हुआ था। कहीं वे रास्ते में मुझे और मेरे दोनों बच्चों को मार ना डाले। मैं तो खैर एक प्रकार से मर ही चुकी थी। इसलिए मुझे अपने मरने का डर नहीं था। लेकिन मैं कम से कम अपने पति की एक निशानी बाकी रखना चाहती थी। इसलिए मैंने अपना एक बच्चा मौलाना की पत्नी के हवाले कर दिया। उनकी कोई संतान न थी और उन्होंने बच्चे को स्वीकार कर लिया। मौलाना ने परिस्थितियाँ ठीक हो जाने पर मेरे बच्चे को लौटा देने का वचन दिया।”

मान क्षण भर के लिए सांस लेने के रुकी और फिर बोली, “मैं हिंदुस्तान चली आई और परिस्थितियों के ठीक होने की प्रतीक्षा करने लगी। लेकिन दोनों देशों की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ते ही चले गए। दंगे फसाद, आरोप और प्रत्यारोप से घृणा की दीवारें और ऊँची होती चली गई और मौलवी साहब अपना वचन न निभा सके। गुंडे मेरे बच्चे के कारण उनकी जान के दुश्मन हो गए थे और मेरे बच्चे के प्राण बचाने के लिए उन्होंने उसे मुस्लमान बनाकर उसका नाम रशीद रख दिया।”

“क्या?” रशीद एक झटके से यों पीछे हटा, जैसे किसी ने उसके सीने पर छुरा मार दिया हो। उसका सिर दीवार से टकरा गया और वह फटी-फटी आँखों से माँ को देखने लगा।

“हाँ बेटे!” माँ ने अपनी हिचकियों पर काबू पाने का प्रयत्न करते हुए कहा, “मौलाना उसका नाम रशीद रखकर उसे अपने बच्चे के समान पालने लगे। अब कोई उसे खून का प्यासा ना रहा…यद्यपि उसकी धमनियों में दौड़ने वाला लहू वही था।”

“बरसों ठोकरे खाने के बाद जब मेरे जीवन में थोड़ी स्थिरता आ गई और कड़ा परिश्रम करके मैंने अपने हालात सुधारे, तो इतनी देर हो चुकी थी कि मैं चाहती भी तो शायद मौलाना उसे मुझे लौटा न सकते। परमात्मा ने उन्हें संतान नहीं दी थी और उन्होंने उसे अपना सगा बेटा मान कर तन मन से प्यार किया था और वही उनका बेटा था। मैं इसे हरि इच्छा समझ कर चुप रह गई।“

माँ चुप हो गई। उसकी आँखों से टप-टप आँसू बहे जा रहे थे।

रशीद भावुकता में डूबा जैसे कोई फिल्म देख रहा था। उसके मस्तिष्क में आंधियाँ चल रही थीं…जैसे सृष्टि लड़खड़ा गई हो। माँ को चुप होते देखकर उसने कंपकपाती और कराहती हुई आवाज़ में पूछा, “लेकिन माँ…पाकिस्तान से आने के बाद तुम्हें अपने बच्चे के हालात कैसे मालूम होते रहे।”

“जानना चाहते हो!” माँ ने आंसू पोंछते हुए कहा, “मुझे एक साल पहले तक के अपने बच्चे के सारे हालत मालूम है।”

फिर माँ ने उठकर अलमारी में से एक एल्बम निकाला और उसे रशीद को दिखाती हुई बोली, “इसमें मेरे जीवन का वह भेद बंद है, जिसे मेरे जीते जी शायद कोई नहीं जान पाता, अगर आज मेरे मुसलमान बच्चे की याद ने मेरी ममता को पागल न कर दिया होता। बेटा रणजीत! मेरे दिल के दो टुकड़े हैं – एक से ‘अल्लाह अल्लाह’ की आवाज आती है, तो दूसरे से ‘राम-राम’ की। इन दोनों आवाज में मुझे कोई अंतर अनुभव नहीं होता, जैसे मेरे दोनों बच्चों की शक्ल सूरत में रत्ती भर भी अंतर नहीं है।”

और उसने एल्बम का पहला पन्ना खोलकर रशीद को दिखाते हुए कहा, “देख यह मेरे लाल का उस समय का फोटो है, जब उसका खतना करने के लिए से दूल्हा बनाया गया था।”

रशीद ने बेचैनी से झुक कर देखा – फोटो में नन्हा रशीद दूल्हा बना खड़ा था। माँ ने दूसरा पन्ना पलटते हुए कहा, “यह उस समय का फोटो है, जब उसने कुरान पढ़ना आरंभ किया था।”

रशीद ने ध्यान से देखा…फोटो में नन्हा रशीद मौलाना के सामने कुरान खोले बैठा था। माँ ने तीसरा पन्ना पलटा।

“यह तब का फोटो है, जब उसने बीए की डिग्री ली थी।”

रशीद ने बेचैन इस इस फोटो को भी देखा, जिसमें वह गाउन पर हाथ में डिग्री लिए खड़ा था।

“अब मेरे लाल का खास फोटो देखो।” माँ ने चौथा पन्ना पलटते हुए कहा, “यह उस समय का फोटो है, जब वह दूल्हा बना था।”

और रशीद अपनी शादी पर लिए गए फोटो को देखने लगा। माँ ने उसे धीरे से परे हटाते हुए कहा, “अरे…इसे क्या देखता है। अब जो तस्वीर मैं तुम्हे दिखाऊंगी, उसे देखकर तू खुशी से नाच उठेगा।” यह कहते हुए माँ ने पांचवां पन्ना पलट कर उसके सामने करते हुए बड़े स्नेह से कहा, “यह है मेरी बहू का फोटो।”

फोटो में सलमा जरी के काम वाले लाल जोड़े में दुल्हन बनी शर्माई बैठी थी। माँ ने उसे देखकर निहाल होते हुए कहा, “देख…देख कितनी सुंदर है तेरी भाभी! बिल्कुल चांद का टुकड़ा। इनका नाम है – सलमा!”
 
रशीद के मन मस्तिष्क को निरंतर इतनी तीव्र झटके लग रहे थे कि उसकी सुध बुध उड़ी जा रही थी। उसका सारा शरीर जैसे भूकंप की चपेट में आ गया हो। वह कांप रहा था…उसके सारे विचार, भावनाएं बिखर गई थी…मानो कोई ग्रह अपनी धुरी से अलग हो जाये…उसकी परिक्रमा की कोई दिशा न रहे। कुछ देर वह मूर्तिमान, स्थिर खड़ा रहा। फिर बड़ी मुश्किल से संभालते का प्रयत्न करते हुए उसने कहा, “ये तस्वीरें तुम्हारे पास कहाँ से आ गई…ये तो…!”

घबराहट में वह यह कहने जा रहा था कि यही तस्वीर उसके एल्बम में भी थी…लेकिन अचानक वह रुक गया। माँ अपनी बहू की तस्वीर देखने में मगन थी। उसे रशीद की इस घबराहट का ज़रा भी आभास ना हो पाया। माँ ने एल्बम से फोटो निकालकर रशीद को देते हुए कहा,

“ये हैं वह मौलाना जी, मेरी व्याकुल आत्मा की शांति के लिए ये तस्वीरें भेजते रहे हैं। ये मनुष्य नहीं देवता हैं। इन्हें नमस्कार करो बेटे। ऐसी महान आत्मा कभी-कभी जन्म लेती है।”

रशीद के हाथ में मौलाना नुरुद्दीन की तस्वीर थी, जिन्हें कुछ देर पहले तक वह अपने बाप समझता रहा था। अभी पिछले साल इनका देहांत हुआ था।

आज इस भेद से पर्दा उठ गया था कि वह उसके वास्तविक पिता नहीं थे। रशीद सोच रहा था क्या कोई दूसरे के बच्चे को इतना नि:स्वार्थ, ममतापूर्ण प्यार दे सकता है, जितना मौलाना ने उसे दिया था। उसे उनकी बेगम की शक्ल याद नहीं थी, क्योंकि वह उसके बचपन में ही स्वर्गवासी हो गई थी। मौलाना ने अपनी असीम स्नेह और प्यार से इस अभाव को रशीद को कभी अनुभव नहीं होने दिया। वह उसके लिए माँ-बाप दोनों बन गए थे। माँ ठीक ही कहती है…सचमुच वह इंसान नहीं देवता थे। इस देवता की महानता पर उनका सिर झुक गया और उसने दोनों हाथ जोड़कर नमस्कार किया। फिर भीगी आँखों से माँ की ओर देखता हुए सोचने लगा…माँ भी तो किसी देवी से कम नहीं है, जिनके दिल में दो टुकड़े हैं… एक टुकड़े से ‘अल्लाह अल्लाह’ की आवाज आती है और दूसरे से ‘राम-राम’ की। उसे इन दोनों आवाज में कोई अंतर नहीं अनुभव होता। फिर उसकी कल्पना धारा रणजीत की ओर मुड़ गई…उसका हमशक्ल सगा भाई उसी के कारण पाकिस्तान की किसी जेल की तंग और अंधेरी कोठारी में पड़ा सिसक रहा होगा…तड़प रहा होगा। इस विचार से वह कांप उठा। उसने घबराकर माँ की ओर देखा। वह अभी तक प्यार से सलमा की तस्वीरें देखें जा रही थी।

“क्या देख रही हो माँ?” रशीद ने जैसे डरते-डरते पूछा।

“अपनी बहू को देख रही हूँ। इसे देखा मेरा जी नहीं भरता। तू पूनम को दुल्हन बना कर लायेगा, तो मैं उसे भी ऐसे ही कपड़े पहनाऊंगी और मेरा प्यारा बेटा रशीद…काश वह जानता उसकी अभागन माँ उसके लिए कितने वर्षों से तड़प रही है। उसकी ज़िन्दगी के लिए भगवान से कैसी-कैसी प्रार्थना की है। मैं जब तेरी सुरक्षा के लिए प्रार्थना करने मंदिर में जाती हूँ, तो उसकी रक्षा के लिए भी प्रार्थना करना कभी नहीं भूलती। वह भी फौज में नौकर है ना।”

माँ की आवाज भर्रा गई और उनकी आँखों से ममता के आँसू टपक पड़े । क्षण भर रुककर उन्होंने अपने आँसू पोंछे और बोली, “मुझे पता होता, तो पहले ही तुझे अपने जीवन का यह भेद बता देती। तू पाकिस्तान में तो पहुँच गया था। वहाँ अपने भाभी और भाई से किसी प्रकार मिल आता। खैर अब तो लड़ाई बंद हो ही गई है…भगवान ने चाहा तो दोनों देशों में आना-जाना भी शुरू हो जायेगा। ईश्वर करे मेरा बेटा वहाँ सकुशल हो…तू अपनी शादी में अपने भाई को ज़रूर बुलाना।

माँ का एक-एक शब्द रशीद के दिल को चीरता जा रहा था। वह अब तक उसे रणजीत समझे हुए थी। उसका जी चाह रहा था कि बच्चों के समान उसकी गोद में सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगे और उसे बता दे कि वही उसका बिछड़ा हुआ लाल है, जिसके लिए वह तड़प रही है। वही रणजीत का भाई है, जिसे वह उसकी शादी में बुलाना चाहती है। लेकिन वह कुछ भी न कह सका, यह कैसे जाने मजबूरी और बेबसी थी। वह निराशा भरी दृष्टि से माँ के भोले-भाले चेहरे को देखता रहा।

(17)

रणजीत की माँ ने संदूक खोला और शादी ब्याह के कपड़े देखने लगी। इस समय उन्हें एक अनोखा आत्मिक सुख अनुभव हो रहा था। उन्होंने एक कीमती साड़ी खोली और मन ही मन कल्पना करने लगी कि पूनम इसे पहनकर कैसी लगेगी। उनकी आँखों के सामने दुल्हन बनी पूनम का मुखड़ा उभर आया और वह मुस्कुरा पड़ी। फिर उन्होंने फ्रॉक और दुपट्टे का जोड़ा उठाकर देखा और अनायास याद उन्हें तड़पा गई…उनकी दूसरी बहू जिसे उन्होंने साक्षात नहीं देखा था। माँ की आँखें भीग गई। अभी वह दुपट्टे से अपने आँसू पूछ ही रही थी कि बाहर गौरी की आवाज सुनकर चौंक पड़ी। गौरी भागते हुए अंदर आई और बोली, “पूनम भाभी आई है।”

यह सुनते ही माँ जैसे खुशी से पागल हो गई। वह तेजी से कमरे के बाहर में आई, जहाँ पूनम हाथ में अटैची लिए खड़ी थी। माँ को देखते ही पूनम ने आगे बढ़कर उनके चरण छू लिये। माँ ने उसे आशीर्वाद देते हुए उठाया और प्यार से गले लगाते हुए बोली, “अरे तुमने आने की खबर तक नहीं दी।”

“अचानक प्रोग्राम बन गया माँ जी।”

“तुम्हारे पिताजी अब कैसे हैं?”

“उसी तरह…पल में ठीक…पल में बीमार…अब आंटी को छोड़ कर आई हूँ उनके पास।” पूनम ने घर में इधर-उधर झांकते हुए कहा। गौरी उसकी व्याकुलता को भांप गई और झट उसके हाथ से अटैची लेती हुए बोली, “भैया तो बाग में गए हैं भाभी…मालूम होता तुम आ रही हो, तो कभी ना जाते।”

“हाँ पूनम! आज रणजीत ने मुझे काम पर नहीं जाने दिया। इस बार जो घर लौटा है, तो बिल्कुल ही बदला हुआ है। पहले मेरा इतना ध्यान नहीं रखता था, जितना अब रखने लगा है।” माँ ने स्नेह से कहा।

“हाँ भाभी!” गौरी माँ की बात का समर्थन करती हुई बोली, “रात को अपने हाथ से भैया ने माँ जी के सिर में तेल डाला और बहुत देर तक उनका सिर दबाते रहे।”

“और बहू…इस बार बिना शादी किए मैं उसे वापस न जाने दूंगी। पहले तो वह हमेशा की तरह अब भी टालमटोल कर रहा था, लेकिन रात मैंने उसे सहमत कर ही लिया है। अगले महीने की 12 तारीख पक्की की है पुरोहित जी ने। उस दिन तेरी मांग में सिंदूर भर दिया जायेगा और मेरी एक बहुत बड़ी मनोकामना पूरी हो जायेगी।”

यह कहकर माँ पूनम को खींचती हुई अंदर वाले कमरे में ले गई, जहाँ शादी के कपड़े और गहने खुले रखे थे। उन्होंने एक-एक गहना और एक-एक जोड़ा उठाकर पूनम को दिखाया। माँ पूनम रणजीत की शादी का वर्णन कुछ इस भावुकता भरे ढंग से कर रही थी कि कई बार अनायास पूनम की आँखें भी छलछला उठी। उसने सोचा अगर माँ को यह मालूम हो गया कि जिसकी शादी का प्रबंध वह इतने चाव से कर रही है, वह उनका बेटा रणजीत नहीं बल्कि पाकिस्तानी जासूस है, तो उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ेगा। उनके सारे सपने टूट कर बिखर जायेंगे और क्या जाने वह उस आघात को सहन भी ना कर सके। यह सोचकर पूनम ने फैसला कर लिया कि वह माँ की खुशियों पर अचानक बिजली नहीं गिरायेगी। माँ की प्रसन्नता के लिए वह उन कपड़ों और गहनों की प्रशंसा करती रही।

माँ रणजीत को बुलाने के लिए जब गौरी को बाग में भेजने लगी, तो पूनम ने उसे रोकते हुए माँ से कहा, “उन्हें बुलाने की क्या ज़रूरत है? काम समाप्त होने पर आप ही आ जायेंगे।”

“भैया को आते-आते तो शाम हो जायेगी…तुम स्वयं ही बाग क्यों नहीं चल जाती भाभी?” गौरी ने मुस्कुराते हुए पूनम से कहा।

“हाँ पूनम! गौरी ठीक कहती है।” माँ ने गौरी की बात का समर्थन किया, “तुम चली जाओगी, तो दोपहर के खाने के लिए वह समय पर घर आ जायेगा।”

बाद में एक शेक सरीखे गोदाम में रशीद सेवों की पेटियाँ पैक करवा रहा था। कई मजदूर काम में जुटे हुए थे और इस बात पर हैरान थे कि आज से पहले रणजीत ने बाग में इतनी लगन से कभी काम नहीं किया था।

मीठे, रसीले और लाल सेवों का ढेर देखकर अचानक रशीद का भी जी ललचाया। उसने एक सेव उठाकर खाना शुरु कर दिया। ऐसे मीठे और स्वादिष्ट सेव उसने कश्मीर में भी नहीं खाये थे। तभी उसे माँ के कहे गए शब्द याद आ गए, “इन सेवों में मिठास मेरे पसीने से और रंगत मेरे खून से आती है।”

बाहर अचानक कुछ आहट हुई और रशीद सेव खाते-खाते रुक गया। उसने पलट कर देखा, तो शेक के बाहर खड़ी पूनम गुस्से में उसे घूर रही थी। रशीद के हाथ से सेव छूट कर नीचे गिर गया। पूनम की आँखों में छुपे तूफान का उसे कुछ आभास हो गया था। वह झट उठकर बाहर आते हुए बोला, “पूनम…तुम…” पूनम को छूने के लिए उसका बढ़ा हुआ हाथ वहीं रुक गया।

“रुक क्यों गये?” वह गुस्से में दांत पीसते हुई बोली।

“यूं ही…तुम्हें अचानक देख कर सकता सा हो गया हूँ।” रशीद ने मुस्कुराने का प्रयत्न करते हुए कहा।

“अचानक देखकर या डर के मारे?”

“डर….किस बात का डर?” उसने झिझकते हुए पूछा।

“अपने पापों का डर…अपने अपराधों का डर।”

“यह तुम क्या कर रही हो? कैसा पाप? कैसा अपराध?”

“किसी की भावनाओं से खेलना, किसी से विश्वासघात करना, प्रेमी का रूप धारण करके दूसरे की मंगेतर को अपने अपवित्र गंदे हाथों से छूना, बेटा बनकर किसी माँ की ममता को ठगना…यह सब पाप नहीं तो क्या है? बोलो जवाब दो!” वह गुस्से में जमीन पर पैर पटकती हुए बोली।

रशीद पूनम के मुँह से ये बातें सुनकर सचमुच घबरा गया था। अंतर की ग्लानि से वह पूनम से आँखें नहीं मिला पा रहा था। समझने में उसे देर नहीं लगी कि उसका सारा भेद पूनम पर खुल चुका है और इसकी जिम्मेदार रुखसाना है, जो उस रात अपना अपमान सहन न कर सकी थी…उसे पहले ही आशंका थी कि ऐसी स्थिति में वह औरत कुछ भी कर गुजरेगी। रशीद को चुप देकर पूनम ने तिलमिलाते हुए पूछा, “चुप क्यों हो गये?”

“तुमने मेरा भेद खोल कर मुझे मौन कर दिया है।”

“लेकिन तुमने ऐसा क्यों किया? किसी की भावनाओं से खेल कर तुम्हें क्या मिला?”

“अपने देश और कर्तव्य के लिए कभी-कभी इंसान को बहुत परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। ऐसी ही एक परीक्षा मेरे लिए तुम भी बन गई थी।”

“लेकिन तुम इस परीक्षा में सफल नहीं हो सके मेजर रशीद! तुम अपने ही बुने जाल में स्वयं फंस गये। जानते हो, अब मैं तुम्हारी पोल सबके सामने खोल कर रख दूंगी।”

“तुम ऐसा नहीं कर सकती पूनम।” वह उसकी आँखों में देखता हुआ बोला।

“क्यों? मुझे कौन रोकेगा?”

“तुम्हारा रणजीत!” रशीद मुस्कुरा उठा।

“क्या?” वह कुछ न समझते हुए बोली।

“हाँ पूनम! तुमने अगर मेरा भेद खोल कर मुझे गिरफ्तार करा दिया, तो तुम्हारा रणजीत ज़िन्दा नहीं लौट सकेगा।”

“क्या वह ज़िन्दा है?” अविश्वास से उसे देखते हुए पूनम ने पूछा। उसका दिल अनायास धड़क उठा था।

रशीद ने जेब से सिगरेट निकाल कर सुलगाया। उसके मन की शांति लौट आई थी। कुछ दिन मौन रखकर सिगरेट का एक कश लेकर वह बोला, “हाँ पूनम! मुझ पर विश्वास करो और निश्चिंत रहो। तुम्हारा रणजीत ज़िन्दा है।”

“लेकिन पुलिस वालों ने यह भेद रुखसाना से उगलवा लिया तो?” पूनम ने डरते डरते पूछा।

“पुलिस अब उसे कुछ नहीं उगलवा सकती।” रशीद ने सिगरेट का एक और कश लेकर गंभीरता से कहा।

“क्यों?”

“उसके कुछ बोलने से पहले हमारे रिंग वालों ने पुलिस के लॉक अप में उसे गोली का निशाना बना दिया है।”

उसके रूखे कठोर स्वर पर पूनम कांप उठी। वास्तव में वह खतरनाक पाकिस्तानी जासूस है, तो फिर उसे रणजीत से क्यों सहानुभूति होने लगी है…वह रणजीत को कभी आजाद नहीं करायेगा, बल्कि उल्टा उसके विरूद्ध कोई और जाल बुन रहा होगा। इस धमकी की आड़ में वह अपना जासूसी का काम पूरा करना चाहता है। इसी असमंजस में वह काफी देर तक खड़ी इस रहस्यमयी पाकिस्तानी जासूस को देखते रही। फिर अचानक दोनों हाथ से अपना चेहरा छुपा कर रोने लगी। रशीद ने आगे बढ़कर उससे कुछ कहना चाहा, लेकिन वह एक झटके से पलट कर भाग खड़ी हुई और बाग के बाहर जाने लगी।

रशीद ने लपक कर उसे रोकना चाहा, किंतु फिर कुछ सोच कर रुक गया। कुछ देर सिगरेट के लंबे-लंबे कश लेता वह से भागते देखता रहा और फिर सिगरेट बुझाकर शैक में घुस गया। उसे विश्वास था कि पूनम अब उसका भेद किसी से भी ना कह सकेगी, माँ से भी नहीं।

रात माँ पूनम रशीद को सामने बिठा कर अपने हाथ का बना खाना खिला रही थी। पूनम खिंची सी चुपचाप बैठी थी। रशीद ने माँ को आज दिन भर के कार्यवाही का ब्यौरा दिया और विश्वास दिलाया कि कल दोपहर तक वह सारा माल पैक करवा कर ट्रक पर लदवा देगा। माँ ने उसके काम की सराहना करते हैं प्यार से कहा, “चलो, अच्छा हुआ शादी से पहले तुमने अपनी जिम्मेदारियों को तो संभाल लिया।”

‘शादी’ का शब्द सुनकर पूनम अचानक यूं चमक उठी, जैसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया हो। रशीद ने उसकी बेचैनी को झट भांप लिया और बाद बदलते माँ से बोला, “यह क्या माँ…तुम मुझे ही खिलाये जा रही हो, पूनम की थाली तो कब से खाली है।”

“अगला पराठा उसी का है।” माँ ने तवे पर पकते पराठे में घी छोड़ते हुए कहा और फिर पूनम से संबोधित होकर बोली, “क्या बात है पूनम यूं गुमसुम क्यों बैठी हो?”

“नहीं तो माँ जी!” पूनम जल्दी से बोली।

“शादी से पहले ही शरमाने लगी है माँ।” रशीद ने मुस्कुरा कर कहा।

“तुम चुप बैठो।” मैंने प्यार से डांटा और फिर पूछा, “और हाँ कितनी छुट्टी बाकी है तुम्हारी।”

“एक हफ्ता और..!’

“तो अगले महीने तो कैसे रहोगे?” माने गरमा गरम पराठा पूनम की प्लेट में डालते हुए पूछा।

“छुट्टी बढ़वानी होगी जाकर..!”

“तो एक काम करो…माल लद जाये, तो स्वयं उसे दिल्ली ले जाओ…छुट्टी बढ़वा लाओ और व्यापारी से माल के पैसे भी वसूल कर लाओ। अगर डाक चिट्ठी पर रहे, तो पैसे मिलते दो चार महीने यूं ही लग जायेंगे। मुझे शादी के लिए पैसे की अभी ज़रूरत है। भगवान ने चाहा तो बड़ी धूम से करूंगी मैं यह शादी।”

रशीद ने कनखियों से पूनम की ओर देखा। वह एक-एक और बड़ी मुश्किल से गले से उतार रही थी। वह भी उसके साथ इस नाटक-पात्री बनी हुई थी, जिसे सब कुछ जानते हुए भी गूंगी का अभिनय करना पड़ रहा था।
 
रात धीरे-धीरे रेंग रही थी।

रशीद बिस्तर पर लेटा अपने इस अनोखे जीवन के बारे में सोच रहा था। परिस्थितियाँ क्या खेल खेल रही थी। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। बिस्तर पर बेचैनी से करवटें बदलता हुआ वह सोच रहा था कि अब उसे नाटक शीघ्र समाप्त कर देना चाहिए।

उधर पूनम माँ के कमरे में पलंग पर लेटी विचारों के जाल में उलझी हुई थी। उसे बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी। कभी वह रणजीत के बारे में सोचने लगती, तो कभी रशीद के बारे में। रशीद के साथ कश्मीर में बिताए चंद दिनों को याद कर के वह कांप उठी। कितना धोखा हुआ था उससे…बेचैनी से करवट लेकर उसने माँ की ओर देखा, जो गहरी नींद में खर्राटे भर रही थी। अपने बेटे को सुरक्षित जानकर कितने सुख की नींद सो रही थी वह। पूनम के मस्तिष्क पर तो हथौड़े से चल रहे थे। ऐसा लग रहा था कि नींद सदा के लिए रूठ गई है, आखिर उसने बिस्तर छोड़ दिया और बाहर वाले बरामदे में चली आई।

बाहर आते ही उसे एक झटका सा लगा। उसने देखा अंधेरे में बरामदे के दूसरे सिरे पर रशीद खड़ा सिगरेट फूंक रहा था। पूनम को देखकर उसने सिगरेट फर्श पर फेंककर पैर से मसल दिया और उसकी ओर बढ़ते हुए बोला, “क्यों नींद नहीं आ रही क्या?”

“जो चिंगारियाँ तुमने मेरे मस्तिष्क में भर दी हैं, उनकी तपन से भला नींद कैसे आ सकती है मुझे? लेकिन तुम…”

“मुझे भी नींद नहीं आ रही, सोचता हूँ कल चला जाऊंगा, तो माँ क्या सोचेगी?”

“यही कि उनका बेटा व्यापारियों से पैसा वसूल करने और छुट्टी बढ़वाने गया है।”

“वह तो जाने का एक बहाना है। रणजीत के आने में दो-चार दिन अधिक भी लग सकते हैं।”

“तो क्या है? तब तक माँ की सेवा करूंगी।” पूनम ने कहा और फिर शंका भरी दृष्टि से देख ती हुई बोली, “तुम्हें विश्वास है रणजीत सकुशल लौट सकेंगे?”

“सेंट परसेंट विश्वास है, क्योंकि वह ना आया, तो माँ के सारे सपने टूट कर बिखर जायेंगे।”

“लेकिन तुम्हें यह अचानक उनसे हमदर्दी क्यों हो गई?”

“उनसे नहीं, अपने आपसे। चेहरे जो एक जैसे हैं हमारे।”

“चेहरे में तो नहीं, लेकिन आत्माओं में तो जमीन आसमान का अंतर है।”

“चेहरों को पढ़ना और आत्मा में झांककर देखना बहुत मुश्किल है पूनम…तुम्हें तो केवल उसी दिन विश्वास होगा, जब तुम्हारा रणजीत तुमसे आन मिलेगा।” रशीद ने गुस्से में कहा।

पूनम ने झट बात बदलकर पूछा, “लेकिन तुम पाकिस्तान कैसे लौटोगे? सीमा पर तो बड़ी कड़ी निगरानी होती है।”

“मेरे आदमी ने सब प्रबंध कर लिया है। परसों रात की गाड़ी से अमृतसर से सिखों का एक टोला पंजा साहब की यात्रा के लिए जा रहा है। उसी टोली में एक नकली दाढ़ी वाला सिख भी होगा।”

“ओह तो तुम तो सिख बनोगे!”

“तो क्या हुआ? इस काम में हमें कई भेष धारण करने पड़ते हैं।” रशीद ने मुस्कुराते हुए कहा।

पूनम ने एक गहरी दृष्टि उसके चेहरे पर डाली। अंधेरे में वह कुछ और भी रहस्य मयी लग रहा था। कुछ देर वह उसे यूं ही चुपचाप देखती रही और फिर एक जम्हाई लेकर अपने कमरे में लौट आई। रशीद ने एक सिगरेट और सुलगा लिया और खड़े-खड़े न जाने कितनी रात गए तक विचारों के ताने-बाने बुनता रहा।

दूसरे दिन दोपहर को ट्रक पर माल लदवा कर जब रशीद जाने लगा, तो माँ, पूनम और गौरी सड़क तक उसे छोड़ने आई। रशीद ने माँ के चरण छूकर असास ली, भगवान का प्रसाद चखा और पूनम को अपने लौटने तक वहीं रुकने का निर्देश देकर गौरी की ओर बढ़ा। उसने गौरी के सिर पर हाथ फेरा, तो वह कह उठी, “भैया! दिल्ली से मेरे लिए रंगीन चूड़ियाँ लेते आना।”

“आरी कांच के टुकड़े का क्या करेगी। अब तो सोने की चूड़ियाँ लेना इससे ब्याह पर।” माँ ने मुस्कुराते हुए कहा।

माल से लदा हुआ ट्रक पुलिया के पास खड़ा हुआ रशीद की प्रतीक्षा कर रहा था। माँ और गौरी पुलिया पर बैठ गई। लेकिन पूनम रशीद के साथ ट्रक तक चली आई। ट्रक में बैठने से पहले पूनम ने चुपके से अल्लाह खुदा हुआ उसका लॉकेट उसके हाथ में दे दिया।

“यह क्या?” रशीद ने आश्चर्य से पूछा।

“तुम्हारे दोस्त के निशानी।”

“लेकिन तुम्हारे ओम का क्या होगा? “

“वह मेरी ओर से रणजीत को दे देना। वापसी में उनकी रक्षा करेगा।” कहते-कहते पूनम की आवाज भर्रा गई और उसकी पलकों पर आँसू झिलमिलाने लगे।

रशीद उचक कर ड्राइवर के साथ वाली सीट पर बैठ गया और ट्रक मनाली गाँव से रवाना हो गया। माँ से विदा होते हुए रशीद का दिल बोझिल थाम वह सोच रहा था माँ का प्यार जो जीवन में पहली बार उसे मिला है इतना संक्षिप्त होने पर भी कितना भरपूर था…अब यह प्यार उसे कभी नहीं मिल सकेगा। भाग्य सचमुच बड़ा बलवान है। खिड़की से गर्दन निकाले हर मोड़ पर वह माँ को देखता रहा। उसका जी चाह रहा था कि यह क्षण स्थिर हो जाये, सर्वकालिक हो जाये और वह माँ को इसी प्रकार देखते रहे। लेकिन ऐसा ना हुआ। जैसे ही ट्रक ढलान में उतरा, माँ उसकी आँखों से ओझल हो गई। उसके मस्तिष्क में बस एक अमिट छाप रह गई… ममता भरे माँके चेहरे की एक छवि रह गई, उसके कल्पना पट पर…दिल बहुत पत्थर रखने पर भी उसकी आँखों में आँसूछलक आए और वह उन बर्फीली घाटियों को देखता हुआ ठंडी आहें भरने लगा।

सड़क के साथ साथ तेज़ पानी की नदी बह रही थी। रशीद सोचने लगा कि वह भी इस नदी के जल के समान् है, जो इन घाटियों से एक बार गुजर कर फिर वापस नहीं आता।

(18)

आधी रात का समय होगा, जब ब्रिगेडियर उस्मान की टेलीफोन की घंटी एकाएक बज उठी। दिन भर के काम से थककर वह गहरी नींद सो रहे थे। निरंतर टन टन की आवाज से झुंझलाकर उन्होंने रिसीवर उठाया और कुछ झल्लाकर बोले, “हेलो! कौन? ओह कर्नल…क्या बात है?”

“मुआफ कीजिए सर…इतनी रात गए आप को जगाना पड़ा।” कर्नल रजा अली ने उधर से क्षमा याचना करते हुए कहा।

“कोई खास बात?”

“जी हाँ! अभी-अभी इत्तला मिली है कि मेजर रशीद खुफिया कैद खाने से हिंदुस्तानी कैदी कैप्टन रणजीत को निकाल ले गया है।”

“क्या? मेजर रशीद? लेकिन वह हिंदुस्तान से कब लौटा।” उस्मान ने आश्चर्य से पूछा।

“यही जानने के लिए तो मैंने आपको फोन किया है कि वह कब आया और किसकी इज़ाजत से इस कैदी को बाहर ले गया है।”

“मुआमला तश्वीशनाक मालूम होता है कर्नल…शायद उसने मेरी रियायतों का ग़लत इस्तेमाल करने की कोशिश की है। कहीं वह दुश्मनों से मिलकर वतन के साथ कोई गद्दारी तो नहीं कर रहा?”

“अगर आपका हुक्म हो तो वायरलेस पर…!”

“अभी नहीं…पहले हमें उसका मकसद मालूम करना होगा और तब तक हर कदम निहायत होशियारी से उठाना होगा। अगर बात बाहर निकल गई, तो हो सकता है कि यूएनओ के सामने हमारी पोजीशन गिर जाये।”

“तो क्या किया जाये सर?”

“तुम फौरन यहाँ चले आओ।”

कर्नल रजा अली को अपने घर आने का आदेश देकर ब्रिगेडियर उस्मान ने रिसीवर नीचे रखा और फिर उठाकर रशीद के घर का नंबर मिलाना चाहा, लेकिन झट कुछ सोचकर विचार बदल दिया। रिसीवर को क्रैडल पर रखकर मानसिक उलझन दूर करने के लिए वह अपने हाथों की उंगलियाँ मरोड़ने लगे। उन्हें अभी तक इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था कि रशीद हिंदुस्तान से लौट आया है और ऐसा दायित्वहीन काम भी कर सकता है।
 
दूसरी ओर रशीद के दिल में जो तूफान मचा था, उसका अनुमान किसी को ना था। यहाँ तक कि स्वयं रणजीत, जिसे वह कैदखाने की कोठरी से निकाल लिए जा रहा था, उसके इरादों के बारे में कुछ नहीं जानता था। रणजीत को उसने जीप में लिटाकर अपने ओवर कोट से ढक रखा था और जीप बॉर्डर की ओर उड़ी जा रही थी। चेक पोस्ट पर थोड़ी देर के लिए उसकी गाड़ी रुकी, लेकिन फिर आगे बढ़ गई मेजर रशीद पर किसी को किसी प्रकार का संदेह नहीं हुआ।

थोड़ी देर बाद जीप गाड़ी सीमा के पास एक नहर के सुनसान किनारे पर पहुँचकर रुक गई। शायद यही रशीद की मंजिल थी। गाड़ी में बैठे बैठे रशीद ने इधर-उधर नज़र दौड़ाई…सर्वत्र सन्नाटा छाया हुआ था। हवा से पास के खेतों में अधपकी फसल जब लहराती, तो एक हल्की सी सनसनाहट उस सन्नाटे को तोड़ देती। वातावरण का भली-भांति निरीक्षण करके रशीद ने धीरे से कहा, “बाहर आ जाओ कैप्टन!”

रणजीत ने ओवर कोट हटाया और कूदकर जीप गाड़ी की फ्रंट सीट पर आ बैठा। रशीद ने झट अपने कोर्ट की जेब से कैप्टन रणजीत के कागजात और आईडेंटिटी कार्ड उसे देते हुए कहा,” अच्छा ख़ुदा हाफ़िज़!”

रणजीत ने आश्चर्य से अपने इस हमशक्ल को देखा, जिसकी आँखों में आज कुछ अनोखी चमक थी। वह टकटकी बांधे उसे देखे जा रहा था। कुछ देर बाद रशीद ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा, “जाओ दोस्त? यह नहर हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहद है। इसका एक ही किनारा हमारा है और दूसरा तुम्हारा। तुम एक अच्छे तैराक हो। एक छलांग लगाओ और तैरते हुए अपने किनारे तक पहुँच जाओ।”

“लेकिन क्या मैं पूछ सकता हूँ कि तुमने मेरे लिए इतना बड़ा खतरा क्यों मोल दिया?”

“हमारी सूरतें जो आपस में मिलती हैं।”

“मैं तो तब भी मिलती थी, जब तुम मुझे कैदखाने की कालकोठरी में डालकर मेरे देश में जासूसी करने चले गए थे।”

“वह मेरा फ़र्ज़ था और यह है उसकी तलाफी – मेरा प्रायश्चित।”

“प्रायश्चित?” रणजीत बड़बड़ाया।

“हाँ तुम अभी नहीं समझोगे। जाओ देर ना करो…किसी को खबर हो गई, तो मेरे साथ तुम भी कहीं के ना रहोगे। अब तक शायद अफ़सर हरकत में आ चुके होंगे।”

“फौजी कानून में अच्छी तरह समझता हूँ। मैं जानता हूँ मेरे यूं जाने के बाद तुम्हारा क्या होगा। लेकिन मैं यह जाने बिना नहीं जाऊंगा कि तुम मेरे लिए अपनी ज़िन्दगी को दांव पर क्यों लगा रहे हो?”

“देखो रणजीत! इस वक्त जिद करके मेरी तमाम कोशिशों पर पानी मत फेरो। ख़ुदा के लिए जाओ रणजीत…देर न करो। वहाँ पूनम तुम्हारा इंतज़ार कर रही है। माँ ने अगले महीने की 18 तारीख को तुम्हारी शादी तय कर रखी है।” रशीद ने जल्दी-जल्दी कुछ भावुक स्वर में कहा।

“लेकिन यह अचानक मेरी प्रेमिका से, मेरी माँ से और मुझसे तुम्हें इतनी दिलचस्पी क्यों पैदा हो गई? कल तक तो तुम मेरे देश के दुश्मन थे, आज दोस्त कैसे बन गये? अब तो यह जाने बिना मेरे लिए जाना नामुमकिन हो गया है।” रणजीत ने हठ करते हुए कहा।

“अच्छा…तुम जानना ही चाहते हो तो सुनो…हम दोनों का हमशक्ल होना इत्तिफ़ाकिया नहीं है रणजीत, हम दोनों जुड़वा भाई हैं।”

“क्या?” रणजीत को एक तीव्र झटका लगा।

“हाँ रणजीत…हम दोनों सगे भाई हैं।”

“नहीं, यह कैसे हो सकता है?” रणजीत चीख पड़ा और फटी-फटी आँखों से रशीद को घूरने लगा। यह रहस्य जानकर उसके पूरे शरीर में कंपकंपी सी दौड़ गई। एक भूचाल सा आ गया, जिसने उसे झकझोर कर रख दिया। अभी वह सकते में ही खड़ा था कि रशीद फिर बोला, “यह हकीकत है रणजीत! हम दोनों एक ही माँ के बेटे हैं, जो हिंदुस्तान के बंटवारे के वक्त एक दूसरे से बिछड़ गए थे। तुम माँ के साथ हिंदुस्तान चले गए और मुझे मुसलमान बनकर पाकिस्तान में रहना पड़ा। ज़िन्दगी का यह राज़ मैं तब ही जान सका, जब अपनी माँ से मिला।”

“तो क्या माँ तुम्हें पहचान गई?” रणजीत ने उसके चुप होते ही पूछा।

“नहीं बल्कि मुझे रणजीत ही समझ कर उसने यह राज उगल दिया। जानते हो माँ ने मेरे बचपन से लेकर शादी तक की तस्वीरों को सीने से लगा कर रखा हुआ है। माँ जो कि इन्हीं याद और मुस्तकबिल के सुनहरे सपनों के सहारे ही जी रही है…वह सपने जो शायद कभी पूरे न होंगे।”

“तो तुम मेरे भाई हो रशीद?”

“हाँ रणजीत…मेरे भाई…लेकिन अब तुम देर मत करो…जाओ…लेकिन जाने से पहले पहली और आखिरी बार मेरे सीने से लग जाओ, क्योंकि मैं जानता हूँ यह हमारी आखिरी मुलाकात है।” यह कहते हुए रशीद ने बड़ी भावुकता से रणजीत को गले से लगा लिया।

तभी दूर से कई जीप गाड़ियों की रोशनी चमकती दिखाई दीं। गाड़ियाँ अभी दूर थीं, किंतु वह नहर वाली सड़क पर ही बढ़ी जा रही थीं। रशीद कांप उठा और एक झटके से रणजीत को अपने आप से अलग करते हुए बोला, “जल्दी से कूद जाओ इस नहर में…जाओ जल्दी..!”

“लेकिन भैया तुम्हारा क्या होगा?” रणजीत उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोला।

“मेरा ख़ुदा हाफ़िज़ है, माँ और पूनम भाभी से कह देना मुझे माफ़ कर दें।”

यह कहते हुए रशीद की पलकें भीग गई, लेकिन उसे धैर्य से काम लिया और रणजीत को नहर की ओर ढकेलता हुआ बोला, “कूद जाओ।”

गाड़ियों की रोशनियाँ प्रतिक्षण निकट होते जा रही थीं और साथ ही रशीद के दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थीं। रणजीत ने एक बार फिर आगे आकर उससे गले मिलने का प्रयत्न किया, तो रशीद जल्दी से बोला, “तुम्हें माँ की कसम और आगे बढ़े तो? लौटो और कूद जाओ।”

नहर के पानी में छपाका हुआ। इस आवाज को सुनकर दूर से कहीं सिक्योरिटी फोर्स के सिपाहियों ने ललकारा। रशीद ने झट रिवाल्वर से हवा में एक फायर किया। फायर की आवाज सुनकर न जाने कहाँ से दो सिपाही दौड़ते हुए उसके पास आकर बोले, “क्या हुआ जनाब?”

“कुछ नहीं एक भेड़िया था…फायर होने से पहले ही पानी में कूद गया।”

रशीद ने यह कहकर नहर की ओर देखा, जिसके शीतल जल में गोता लगाकर तैरता हुआ रणजीत बहुत दूर निकल गया था। रशीद ने संतोष की सांस ली और एक सिगरेट सुलगाकर जीप गाड़ी में जा बैठा। फिर उसने गाड़ी स्टार्ट की और खेतों के बीच में कच्ची सड़क पर मोड़ दी। सिपाहियों ने उसे सेल्यूट किया और आश्चर्य से इस अफसर को देखने लगे, जो नहर की पक्की सड़क को छोड़कर गाड़ी को कच्चे रास्ते पर उतार ले गया था। उन्होंने क्षण भर के लिए एक-दूसरे को प्रश्न सूचक दृष्टि से देखा और फिर पलटकर रोशनी को चल पड़े, जो अब बहुत निकट आ गई थीं।

रशीद बिना रोशनी के ही कच्चे रास्ते पर गाड़ी बढ़ाता चला गया। लड़ाई में वह बॉर्डर के सब रास्तों की रैकी कर चुका था। इसलिए जीप चलाते हुए कोई उसे कोई कष्ट नहीं हुआ। थोड़ी ही देर में वह टेढ़े मेढे रास्ते को पार करता हुआ फुल स्पीड से बहुत दूर निकल गया। उसे पूरा भरोसा था कि बात के उच्च सैनिक अधिकारियों तक पहुँचने से पहले ही वह अपनी सलमा के पास पहुँचच चुका होगा।

रात आधी से अधिक बीत चुकी थी। सलमा अपने कमरे में बेखबर सो रही थी कि अचानक खट..खट…खट की आवाज ने उसे चौंका दिया। अभी नींद का प्रभाव पूर्ण रूप से उसके दिमाग से दूर नहीं हुआ था कि दस्तक की आवाज और तेज हो गई। वह चुपके से उठकर अंधेरे कमरे में टटोलती हुई बिजली के स्विच तक पहुँच गई। बाहर कोई ज़ोर-ज़ोर से किवाड़ खटखटा रहा था। इससे पहले कि सलमा स्विच ऑन कर के कमरे में प्रकाश करती, बाहर से किसी ने मुक्का मारकर दरवाजे का शीशा तोड़ दिया और हाथ अंदर डालकर चटकनी खोल दी। सलमा डर के मारे बत्ती जलाना भी भूल गई। फिर इससे पहले कि वह अपनी नौकरानी नूरी को जगाती, एक छाया बढ़कर उसके पास आई और उसके मुँह पर हाथ रखते हुए दबी आवाज में बोली, “मैं हूँ सलमा!”

सलमा ने रशीद की आवाज पहचान ली और दीवार की ओर हाथ बढ़ाकर उसने कमरे में प्रकाश करना चाहा, किंतु रशीद ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला, “नहीं अंधेरा ही रहने दो।”

“क्यों? क्या बात है? आप इस कदर घबराये हुए क्यों है? खैरियत तो है और आप आए कब?” सलमा ने घबराकर पूछा।

“आज ही आया हूँ।” यह कहकर रशीद ने एक सिगरेट सुलगा लिया।

“लेकिन इस तरह अंधेरे में…चोरों की तरह।” कहते हुए सलमा ने उसके पसीने से भरे चेहरे पर हाथ फेरा और कुछ रुक कर बोली, “कहाँ से भाग कर आ रहे हैं आप?”

“भागकर नहीं…भगा कर आ रहा हूँ।”

“भगा कर? किसको?”

“रणजीत को…जानती हो सलमा…वह मेरा भाई है…सगा भाई।”

“क्या बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं आप?” वह आश्चर्य से उसे देखती हुई बोली।

“यकीन करो मैं ठीक कह रहा हूँ। तुम हैरान थी ना कि दो अजनबी आदमियों की सूरत इतनी ज्यादा कैसे मिल सकती है। रणजीत अजनबी नहीं, मेरा जुड़वा भाई है। हिंदुस्तान के बंटवारे के वक्त हम दोनों भाई बिछड़ गए थे…ओह…आज मैं किस कदर खुश हूँ। अपने भाई को कैद से आजाद करके मेरे सीने से बहुत भारी बोझ हट गया है।”

“ओह…यह आपने क्या किया? कानून और वतन आप को कभी मुआफ़ नहीं करेंगे।”

“मैं जानता हूँ और यह भी कि इसकी सजा मुझे नहीं बल्कि तुम्हें मिलेगी…जिस औरत के हाथों की मेहंदी का रंग भी अभी फीका न पड़ा हो…जिसके कानों में अभी बाबुल के गीत गूंज रहे हो…जिसका अभी कोई ख्वाब पूरा न हुआ हो…मैं उसकी ज़िन्दगी को एक दर्द भरी चीख बनाकर छोड़े जा रहा हूँ…कितनी बड़ी नाइंसाफी होगी तुम्हारे साथ सलमा…कितनी बड़ी नाइंसाफी।”
 
“बस कीजिए…ख़ुदा के लिए बस कीजिये” वह एकाएक चिल्ला कर पलट पड़ी, तो रशीद ने आगे बढ़कर उसके दोनों हाथ थाम लिए और भराई हुई आवाज़ में बोला, “नहीं सलमा…मेरी ज़िन्दगी की मजबूरी को समझो और मुझसे वादा करो कि यह सबकुछ तुम एक फौजी अफ़सर की बहादुर बीवी की तरह बर्दाश्त कर लोगी।”

सलमा का मस्तिष्क इस अचानक के आघात ने जैसे निष्क्रिय कर दिया हो…इस समय वह सोचने की सब शक्ति खो चुकी थी।

तभी बाहर कुछ आवाज़ों ने उन्हें चौंका दिया। एक साथ कई जीप गाड़ियाँ उस मकान के सामने आकर रुकी और एक सैनिक दस्ते ने मकान को चारों ओर से घेर लिया।

“वह लोग आए गये।” रशीद ने बाहर जीप गाड़ियों के रुकने की आवाज सुनते ही कहा।

सलमा एकाएक रशीद से लिपट गई और रोआंसी आवाज में बोली, “नहीं नहीं…मैं उन्हें अंदर नहीं आने दूंगी…वह आपको गिरफ्तार नहीं कर सकते। देखिए आप खिड़की कूदकर पिछवाड़े से भाग जाइये।”

“पगली!” रशीद ने उसका सिर थपथपाकर कहा, “भागकर कहाँ जाऊंगा।” फिर वह उसे अपने से अलग करके कमरे की बत्ती जलाता हुआ बोला, “जाओ दरवाजा खोल दो…वरना लोग तोड़ डालेंगे।”

दरवाज़े पर निरंतर ज़ोर-ज़ोर से दस्तक हो रही थी। रशीद ने स्वयं जाकर किवाड़ खोल दिया। कर्नल रज़ा अली और कुछ दूसरे मिलिट्री अफसर बंदूक ताने सिपाहियों के साथ अंदर दाखिल हुए। सलमा भी पति के पीछे-पीछे बाहर आ गई थी। रशीद ने आँख के इशारे से उसे अंदर जाने को कहा, लेकिन सलमा को उस समय पर्दे का होश ही कहाँ था।

कर्नल रज़ा अली ने सिपाहियों को मकान की तलाशी का आदेश दिया, तो रशीद कह उठा, “जिसकी आपको तलाश है, वह यहाँ नहीं है।”

“तो कहाँ है वह कैदी?” रजा अली ने कड़ककर पूछा।

“अब तक वह बॉर्डर क्रॉस कर चुका होगा।”

“हूं…तो हमारा शक गलत नहीं था…तो तुमने दुश्मनों की साथ मिलकर अपने वतन से गद्दारी की है।”

“दुश्मनों से मिलकर नहीं कर्नल…अपने दिल से मजबूर होकर।”

“जानते हो तुमने कितना बड़ा गुनाह किया है…ख़ुदा और कानून तुम्हें कभी नहीं बख्शेंगे।”

“ख़ुदा के दरबार में जब हाज़िर हूंगा, तो इंसाफ़ हो ही जायेगा। लेकिन कानून के दरबार में जो भी सजा मिलेगी, उसे भुगतने को तैयार हूँ।”

“तुम जानते हो गद्दारी की सजा क्या होती है?”

“जानता हूँ”

“इसके बावजूद भी…”

“जी हाँ इसके बावजूद भी मैंने यह गद्दारी की है।”

कर्नल रज़ा अली रशीद के बेझिझक और चटक उत्तर को सुनकर गुस्से से आपे से बाहर हो गया और सिपाहियों की ओर मुड़कर बोला, “गिरफ्तार कर लो इसे…”

सलमा जो अब तक चुपचाप डर से सहमी हुई खड़ी थी, कर्नल रज़ा का हुक्म सुनकर दौड़कर उन सबके सामने ही पति से लिपट गई और चिल्लाई, “नहीं नहीं… इन्हें कोई गिरफ्तार नहीं कर सकता…इन्होंने मुल्क से कोई गद्दारी नहीं की…इन्होंने तो अपने खून की मदद की है। अपने भाई को बचाया है, अपनी माँ के सपनों को हकीक़त में बदलने की कोशिश की है।”

सलमा की बात किसी की समझ में नहीं आई। उसकी पीड़ा का किसी ने अनुमान नहीं लगाया और उसकी आँखों के सामने उसके पति को मिलिट्री पुलिस के सिपाहियों ने पकड़ लिया। सलमा रशीद के पांव में गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी और फिर वहीं बेहोश हो गई। फिर जब उसे होश आया, तो उसका सरताज, उसका प्रीतम उसके पास नहीं था, केवल उसके अंतिम शब्द सलमा के कानों में गूंज रहे थे – “मेरे पास वक्त कम है सलमा, वादा करो कि यह सबकुछ तुम एक फ़ौजी की बहादुर बीवी की तरह बर्दाश्त कर लोगी।”

मनाली की हरी-भरी सुंदरवादी को सूरज की सुनहरी किरणों ने नहलाना आरंभ किया ही था कि रणजीत थके कदमों से अपने घर के आंगन में दाखिल हुआ। वह डरते-डरते कदम बढ़ाता हुआ इधर-उधर झांक रहा था। इस समय घर में कोई नहीं था। केवल माँ अपने कमरे में बने छोटे से मंदिर में बाल गोपाल की पूजा में लीन थी

रणजीत के दिल में अचानक माँ का सामना करने का साहस न हो रहा था।

तभी पूनम गौरी के साथ बाहर से आई। आहट पाकर आंगन में खड़े रणजीत ने सहसा पलट कर देखा और पूनम के दिल को एक तीव्र झटका लगा। यह तो उसका रणजीत था…हां रणजीत ही था…लेकिन कितना बदला हुआ। मैले-कुचैले कपड़े, बढ़ी हुई दाढ़ी, कमजोर बदन, सुते हुए चेहरे पर अंदर धंसी हुई आँखें जैसे वह महीनों का बीमार रहा हो। पूनम के मुँह से अनायास एक दर्द भरी चीख निकल गई। रणजीत धीरे-धीरे पांव बढ़ाता उसकी ओर बढ़ा। दोनों थोड़े अंतर पर मूर्तिमान एक-दूसरे को एकटक देखते रहे और फिर अचानक पूनम झपटकर उसके सीने से जा लगी और फूट-फूट कर रोने लगी।

गौरी जो अभी तक खड़ी थी, संदेह से रणजीत को देखे जा रही थी ‘माँजी माँजी’ चिल्लाती अंदर की ओर भाग गई।

रणजीत के सीने से लगी पूनम की दृष्टि अचानक उसके गले में लटके ‘ओम’ के लॉकेट में पड़ी, तो आँसू पोंछते हुए वह कह उठी, “तो दुश्मन ने अपना वचन निभा ही दिया।”

“उसे दुश्मन न कहो पूनम…वह तुम्हारा देवर है…मेरा हमशक्ल जुड़वा भाई।” रणजीत ने उसके दोनों हाथ अपने हाथों में लेते हुए कहा।

“क्या?” असीम आश्चर्य से वह उछल पड़ी।

रणजीत उसे पूरी बात बताना ही चाहता था कि उसी समय गौरी के साथ माँ अंदर आई और बेटे की उजड़ी हुई थी दशा को देखती हुई पास आकर कांपती आवाज़ में बोली, “यह क्या हालत बना रखी है तूने…मेरे लाल…यह मैले कपड़े…बढ़ी हुई दाढ़ी… बीमार सूरत…तेरी तबीयत तो ठीक है ना!”

“हाँ माँ!”

“फिर यह हुलिया क्या बना रखा है तूने? चार छः दिन में इतना बदल गया है!”

“चार छः दिन में नहीं माँ…चार छह महीनों में कहो…मैं तो आज ही पाकिस्तान से लौटा हूँ।”

“क्या कह रहा है रे! इतने दिन मेरे पास रहकर तो तू गया था दिल्ली, व्यापारियों से रूपये वसूल करने और अपनी छुट्टी बढ़वाने।”

“नहीं वह मैं नहीं था माँ।”

“फिर कौन था वह? क्या पागल समझता है मुझे?”

“नहीं माँ…वह जो इतने दिन तुम्हारे साथ रहा तुम्हारा बेटा रशीद था।”

माँ ने अविश्वास की नज़रों उसे देखा, तो रणजीत ने भर्रायी आवाज में संक्षेप में उसे बता दिया कि किस प्रकार रणजीत बनकर रशीद हिंदुस्तान में आया और फिर अपने जीवन का भेद जानने के बाद किस तरह उसने पाकिस्तान पहुँचकर अपने प्राणों पर खेलकर भाई को कैसे रिहाई दिला कर भेजा है।

माँ आश्चर्य से मुँह खोले उसकी बातें सुन रही थी और फिर जैसे ही वह चुप हुआ, वह एकाएक किसी कटे हुए पेड़ के समान लहराई और गिरने ही वाली थी कि रणजीत ने बढ़कर उसे थाम लिया। बेटे की बाहों में पागलों के समान वह बड़बड़ाने लगी, “हे भगवान! यह कैसा न्याय है तेरा? मेरा बेटा बरसों बाद मुझे मिला भी, तो मैं उसे जी भर के सीने से लगा न सकी…उससे बातें ना कर सकी…भाग्य की एक यह कैसी दीवार है, जिसे मेरी ममता भी न ढा सकी। मुझे अपने बेटे के पास ले चलो… अभी ले चलो अपने रशीद के पास मुझे…नहीं तो मेरा दम घुट जायेगा।”

माँ रणजीत के हाथों से फिसल कर बाहर जाने के लिए मचलने लगी। रणजीत पूनम उसे संभालने का प्रयत्न करने लगे। इसी दीवानगी की हालत वह चकराकर बेटे की बाहों में बेहोश हो गई।

गौरी जल्दी से पानी लाने के लिए भागी। रणजीत ने झट माँ को गोद में उठाकर पलंग पर लिटा दिया और उसी के दुपट्टे से उसके चेहरे का पसीना पोंछने लगा।

पूनम पास ही खड़ी किसी गहरी सोच में डूबी थी। शायद वह ज़िन्दगी के इस विचित्र नाटक के बारे में सोच रही थी।

(19)

विधान अनुसार देश से द्रोह महाअपराध था, जिसकी सजा थी मौत। गिरफ्तार हो जाने के बाद रशीद ने बिना संकोच के अपना अपराध स्वीकार कर लिया। वह एक साहसी और कर्तव्यपरायण अफसर था, जिसे अपने सीनियर अफसरों का पूरा विश्वास प्राप्त था…फिर जिस दुखदाई घटना से वह दो चार हुआ था और विधि के गुप्त हाथों में जिस प्रकार भावुकता से उसे देशद्रोह पर विवश कर दिया था, इसके लिए कई अफसरों के दिल में उसके प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो गई थी। कौन बेटा अपनी माँ की कोख उजाड़ सकता है?…कौन भाई अपने सगे भाई का खून बहा सकता है? विधाता के रचाये हुए इस घटना पूर्ण खेल में वह एक पात्र बन गया था। लेकिन कुछ भी हो देश से द्रोह था और इसके लिए उसके दोस्त उसकी कोई सहायता न कर सके।

उसका समरी ऑफ एविडेंस हुआ। ब्रिगेडियर उस्मान, कर्नल रज़ा अली और कैंप के दूसरे अफसरों ने उसके विरुद्ध शहादतें दी। चंद ही दिनों में उसकी चार्जशीट तैयार करके उसे जनरल कोर्ट मार्शल का हुक्म सुना दिया गया। उसे लाहौर के किले में कड़ी फौजी हिरासत में रखा गया। कुछ शुभचिंतकों ने उसे किसी बड़े वकील की कानूनी सहायता लेने का परामर्श दिया। लेकिन रशीद ने अपने मुकदमे की स्वयं ही पैरवी करने का निश्चय कर लिया।

फौजी अदालत में उसे दिल हिला देने वाला भावुकता पूर्ण बयान दिया, लेकिन न्याय के सामने भावना की एक न चली। उसका सबसे बड़ा अपराध यह सिद्ध हुआ कि उसने भारत में रहकर जो सैनिक गुप्त सूचनायें रिकॉर्ड और नक्शे प्राप्त किए थे, उन सबको से नष्ट कर दिया था। यही नहीं बल्कि दुश्मन के एक कैदी को स्वयं जेल से निकालकर सीमा पार पहुँचा दिया था। वतन से गद्दारी के अपराध में फौजी अदालत ने उसे मौत की सजा का हुक्म दिया।

मेजर को यूनिफॉर्म में संगीनें ताने सिपाहियों के साथ मार्च कराकर उसे सबके सामने लाया गया। पहले उससे टोपी और बेल्ट ली गई। फिर यूनिट का नाम और फिर रैंक चिन्ह उसके कंधे से नोंच लिए गये। फिर उसके हाथों में हथकड़ी डाल कर उसे ग्राउंड से शैल की ओर ले जाया गया। इस गंभीर कार्यवाही में वहाँ उपस्थित अफसरों और जवानों की शायद धड़कनें तक बंद हो गई थी, क्योंकि वहाँ इतनी गहरी निस्तब्धता छाई थी कि सांस लेने की आवाज सुनाई दे रही थी…वातावरण उदास और बोझिल था।

जब रशीद को शैल की ओर ले जाया जा रहा था, तो सामने एक कोने में सलमा सफ़ेद वस्त्रों में एक संगमरमर की मूर्ति के समान मौन खड़ी हुई थी। उसकी पलकें भीगी हुई थी और वह पथराई हुई दृष्टि से अपने पति को देखे जा रही थी।
 
चलते-चलते रशीद पत्नी के पास रूका, लेकिन सलमा टस से मस न हुई, जैसे अदालत के फैसले ने उसके शरीर से आत्मा खींच ली हो और वह केवल एक निष्प्राण मिट्टी का पुतला मात्र रह गई हो या फिर वह पति के आदेश अनुसार एक फौजी अफसर की साहसी और आदर्श पत्नी बनने का प्रयत्न कर रही हो।

“सलमा!” रशीद ने बोझिल और धीमी आवाज में उसे पुकारा।

सलमा के स्थिर शरीर में एक कंपन सी उत्पन्न हुई, लेकिन होंठ फिर भी न खुले और वह उसी प्रकार पथराई हुई नज़रों से उसे देखती रही। रशीद भर्रा यी हुई आवाज़ में बोला –

“अपनी पलकों से आँसू पोंछ डालो सलमा और एक वादा करो मुझसे कि जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान के हालात अच्छे हो जायेंगे, इन दोनों मुल्कों के दरमियान उठी नफ़रत की दीवारें ढह जाएंगी, तो तुम वहाँ जाओगी मेरी माँ से मिलने। देखो कुल्लू की वादी में एक छोटा सा गाँव है मनाली। वहीं तुम्हारी सास, देवर और देवरानी रहते हैं। वह सब तुमसे बहुत प्यार करते हैं और मेरी माँ तो तुम्हें सीने से लगा ने के लिए तड़प रही है। वह अपनी नई बहू को उन्हीं कपड़ों और जेवरों से सजाना चाहती है, जो शादी के दिन तुमने पहने थे। जब उसे मालूम होगा कि तुम्हारा सुहाग उजड़ गया है। उसका बेटा इस दुनिया में नहीं रहा, तो उस पर गम का पहाड़ टूट पड़ेगा। शायद तुम्हें पाकर उसका गम कुछ हल्का हो जाए। इसलिए वादा करो कि उसके ज़ख्मों पर मरहम रखने के लिए तुम ज़रूर जाओगी।”

पलकों में छुपा आँसुओं का निर्झर गालों पर उतर आया और सलमा ने ‘हाँ’ में गर्दन हिला दी। लेकिन इसके साथ ही उसके पैर लड़खड़ा गये। रशीद ने हथकड़ी पड़े हाथों से ही झट बढ़कर उसे थाम लिया और फिर बड़ी निराशा से उसके चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए बोला, “आज भी मुझे अलविदा न कहोगी। आज मैं आखिरी सफ़र पर जा रहा हूँ।”

“अलविदा!” सलमा के थरथराते होंठों से बड़ी मुश्किल से निकला। और फिर अचानक वह उसके हाथों में पड़ी लोहे की हथकड़ियों से टकरा-टकरा पागलों की तरह अपना सिर फोड़ने लगी।

सलमा के कुछ रिश्तेदारों ने जो वहाँ उपस्थित थे, बढ़कर उसे थाम लिया और सिपाही उसके रशीद की हमेशा के लिए उससे अलग करके अपने साथ ले गये। जहाँ तक रशीद उसे नज़र आता रहा, वह निराश, दु:ख भरी नज़रों से उसे देखती रही और उसके दिल की गहराइयों से दर्द में डूबी हल्की हल्की आवाज़ उभरती रही – ” अलविदा अलविदा अलविदा!”

** समाप्त**
 
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