सुलभा (सास)
लड़की देखने का प्रोग्राम आख़िर पूरा हुआ. अब तैयारी करना है जल्द से जल्द. वैसे मुझे पूरा भरोसा था कि लीना हां कहा देगी. अनिल तो पहले से तैयार बैठा है, उसकी मज़ाल है कि मेरी बात ना माने! वैसे इतनी खूबसूरत लड़की को ना कहने का सवाल ही नही पैदा होता किसी के लिए. लीना को अब तक किसी बात की भनक नही है, अच्छा ही हुआ, घबरा कर ना कर देती तो खुद तो इस संसार के सबसे मीठे सुख से वंचित रह जाती, हमे भी तरसता छोड़ देती. मुझे और नीलिमा को तो चैन ही नही है जब से लीना को देखा है. वैसे मैं नीलिमा से बात करूँगी, लीना को एक दो हिंट धीरे धीरे दे देना चाहिए, नही तो बेचारी को हनीमून के दिन बड़ा शॉक लगेगा. लीना को पहली बार मैने देखा जब नीलिमा ने मुझे एक शादी मे दूर
से उसकी ओर इशारा करके दिखाया. नीलिमा बहुत उत्तेजित थी, मुझे कान मे बताया कि इस लड़की को हम बहू बनाएँगे. दूर से मुझे भी वह बहुत प्यारी लगी थी, इन मामलों मे नीलिमा का अंदाज़ा अचूक रहता है. आज लीना को इतनी पास से देखकर और उससे बातें करके ऐसा ही लगा जैसा सोलह साल पहले नीलिमा का वह कमसिन सौन्दर्य देख कर मुझे लगा था.
कितने दिनों से मैं बहू के लिए तड़प रही हूँ. अनिल की शादी करना है, और अब हम दोनों मा बेटी को भी लगता है कि घर मे और कोई आए हमारा दिल बहलाने को, अनिल तो बाहर ही रहता है. हमारा परिवार छोटा है पर एकदम क्लोज़ है, आपस मे इतना क्लोज़ शायद ही और कोई परिवार होगा. इस परिवार को अब बढाय जाए यह सब के हित और सुख की
बात है. हमारे मन मे .... ख़ास कर मेरे मन मे क्या क्या हसरतें हैं,
किसी खूबसूरत लड़की के साथ .... पर किया किसके साथ जाए, यह सोच सोच कर मैं तो पागल होने को आ गयी थी. नीलिमा बहुत सुख देती है मुझे पर अब वह मुझसे भी आगे निकल गयी है, वह बचपन का भोलापन, इनोसेन्स नही रहा उसमे. दिन कैसे जल्दी बीत जाते हैं समझ मे ही नही आता. नीलिमा और अनिल से मुझे जो सुख मिला उसकी मैने कभी कल्पना भी नही की थी. याने इस के लिए मुझे ही पहल करनी पड़ी यह बात अलग है. बचपन से मैं औरों से कितनी अलग हूँ इसका मुझे अहसास रहा है. मन काबू मे नही रहता. ख़ास कर जब ऐसे सुंदर लड़के लड़कियों को देखती हूँ. मुझे अभी भी याद है कि जब मैं कालेज मे वार्डन थी तब नीलिमा को किस हालत मे मैने दूसरी लड़कियों के साथ पकड़ा था. वैसे मेरी नज़र उसपर बहुत दिनों से थी, क्या खूबसूरत दिखती थी वह कमसिन उमर से ही. उसे मैने डीसिपलिन किया, कहा कि मेरा मानेगी तो किसी को बताऊन्गी नही. बेचारी पहले बहुत घबराती थी पर बाद मे मेरे चंगुल मे ऐसी फँसी की कभी ना छूट पाई. फिर मेरे बिना रहना ही उसे गवारा नही होता था. मुझसे चिपक कर रहती थी कॉलेज मे और कॉलेज छूटने
के बाद भी. उसके डैडी को पता चला तो उन्होने मना नही किया, बल्कि बोले कि अच्छा है, मेरे साथ रहेगी तो कम से कम बाहर और बुरी संगत मे तो नही पड़ेगी. बाद मे उन्होने मुझसे शादी कर ली, वे बाहर जाने वाले थे और बच्चे अकेले कैसे रहेंगे इसकी चिंता उन्हे थी. वैसे यह शादी नाम मात्र की था, वे अलग किस्म के आदमी थे. बोले कि घर मे ही आ जाओ तो बिन मा के बच्चों का अच्छा ख़याल रख सकोगी.
बेचारे जल्द ही हार्ट अटेक से चले गये. हम सब को बहुत दुख हुआ. मुझे इतना ही संतोष है कि जब तक वे बाहर रहे, अपनी जिंदगी अपनी तरह से जिए, अपने मन का सुख पाते हुए. तब तक मैं बच्चों से घुल मिल गयी थी, वे मुझे मा की जगह देखते थे और नीलिमा के लिए मैं मा से भी बढ़ कर थी. मैने ही उन्हे बड़ा किया. मेरे पति पैसा जायदाद काफ़ी
छोड़ गये थे. अब नीलिमा रात को मेरे ही बेडरूम मे सोने लगी, अनिल के सोने के बाद चुप चाप आ जाती थी. मुझसे अलग रहने का तो कोई सवाल ही नही था. अनिल पहले बहुत छोटा था पर जैसे जैसे बड़ा हुआ, इतना खूबसूरत लगने लगा, मुझे यहा गवारा नही हुआ कि वह ऐसा अकेला रहे. इस उमर मे बच्चे बिगड़ जाते हैं, उससे अच्छा यही था कि हम
उसे साथ ले लें. मेरे कहने पर कि नीलिमा तू ही उसे सिखा, वह हँसने लगी. फिर मुझे बताया कि यह तो बहुत पहले से ही चल रहा था, इसीलिए तो रात को अनिल को सुलाकर ही वह मेरे पास आती थी. अब तो आसान था, एक रात जब अनिल बाहर गया था तो मैं नीलिमा के बेडरूम मे सो गयी. जब वह वापस आया और मुझे नीलिमा के साथ देखा ... आज भी उसकी वह सूरत याद आती है तो रोमाच सा हो आता है. बेचारा शुरू मे घबरा गया था पर फिर नीलिमा प्यार से उसे ज़बरदस्ती खींच कर मेरे पास, अपनी मा के पास, भले ही सौतेली सही, लाई कि मा ठीक से अपने उस बेटे को प्यार कर सके. खैर, हम दोनों मा बेटी ने मिलकर फिर उस कमसिन बालक की ओर हमारा पूरा कर्तव्य निभाया.
मैं कहाँ की बातों मे खो गयी. अब वह हमसे ज़रा दूर चला गया है. नीलिमा पहले बहुत नाराज़ हुई थी पर मैने ही उसे समझाया. उसके बाद हमारी फिर से ठीक निभने लगी, वैसे अनिल साल मे बस दो तीन बार एक एक हफ्ते की छुट्टी लेकर आ पाता है, एक तो नौकरी और दूसरे वह जेसन उसे छोड़े तब ना.
इसीलिए मुझे और नीलिमा को एक और किसी ऐसे की ज़रूरत थी जो हमारे परिवार का सदस्य बन सके. बहू से अच्छी मेम्बर कौन हो सकती है! और फिर लोगों को भी कुछ ऐरा गैरा नही लगेगा अगर बहू घर मे आ जाए तो. हम एक फूल सी बहू ढूँढने लगे, जो अब हमे मिल गयी है. नीलिमा बता रही थी कि कल लड़की देखने का कार्यक्रम हो रहा था तब लीना का छोटा भाई कैसा उसे घूर रहा था. मुझे सुन कर मज़ा आया. वैसे है ही हमारी नीलिमा इतनी सेक्सी, कोई भी देखे तो
देखता रह जाए. वह छोकरा भी काफ़ी रसिक लगता है, मुझे भी एक दो बार देख रहा था पर मैने ध्यान नही दिया. बाद मे देख लूँगी उस बच्चे को. मेरे तो पाँव अब ज़मीन पर नही पड़ते इतनी मैं खुश हूँ. नीलिमा के बाद एक और सुंदर नाज़ुक कन्या मुझे मिलने वाली है, तन और मन आने वाले सुख की कल्पना से ही सिहर उठे हैं, मुझे तो ऐसा लगता है जैसे
मैं फिर जवान हो गयी हूँ. नीलिमा ही कल रात तक कर परेशान होकर भूनभुना रही थी कि ममी आज तुमने मेरी हालत खराब कर दी, कितना जोश चढ्ता है तुझे, अपना यह जोश अब बचा कर रख अपनी बहू के लिए. आज रात को भी मैं नीलिमा के साथ और हो सके तो अनिल के साथ रतजगा करूँगी, कुछ तो सेलेब्रेट करना ज़रूरी है इतनी अच्छी बहू मिलने के बाद.