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व्यभिचारी नारियाँ complete

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जो गाँठ कुछ देर पहले क्रिकेट की गेंद जैसी महसूस हो रही थी वो अब नजीबा को ऐसे महसूस हो रही थी जैसे उसकी गाँड में अंदर फुटबॉल ढूँसी हो। जब भी औरंगजेब अपना लंड पीछे खींचता, तो उसकी गाँठ नजीबा की गाँड जैसे चीर-सी देती थी और नजीबा को एक ही पल में एक साथ जीने-मरने का अनुभव हो जाता। उसके गालों पर आँसू बह । रहे थे। उसके मन का एक हिस्सा गाँड में से लंड को बाहर निकालना चाहता था। नजीबा ने एक बार कोशिश भी की पर वो एक नहीं दो-दो लौड़ों से बंधी हुई थी। पर फिर उसके मन का दूसरा मौलिक हिस्सा, चाह रहा था की वो लंड जितनी जोर से हो सके उसकी गाँड की धुनाई करे -- उसकी गाँड तब तक चीरते हुए मारता रहे जब तक वो आनंद से चींखने ना लगे।

तभी उसे एहसास हुआ कि वो असल में अपने चूतड़ पीछे ठेलती हुई अपनी गाँड मरवाने में कुत्ते का साथ दे रही थी। कुत्ते की मोटी गाँठ के आघात से पुनः बहाल हो कर नजीबा फिर मस्त होने लगी थी और उस समय उसकी जिंदगी की एक ही अभिलाषा थी कि वो कुत्ता उसे अपनी कुत्तिया बना कर उसकी गाँड मार कर उसका भुर्ता बना ले। नजीबा के आगे-पीछे हिलने से उसकी चूत और गाँड में भरे दोनों कुत्तों के लंड पतली सी झिल्ली से जुदा पटरियों पर धड़कते हुए इस तरह फिसलने लगे जैसे किसी अंधेरी गुफा में दो रेलगाड़ियाँ दौड़ रही हो। उसे निराशा सी हो रही थी कि गाँड में गाँठ फँसे होने की वजह से औरंगजेब का लंड गाँड में ज्यादा आगे पीछे नहीं हिल पा रहा था। औरंगजेब के लंड की गाँठ की मोटाई के कारण उसे अपनी टाँगें फैलनी पड़ी जिससे टीपू के लंड पर जकड़ी उसकी चूत पर ऐंठन कुछ कम हो।

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दोनों कुत्ते हाँफ रहे थे और दोनों की राल बह रही थी। औरंगजेब की राल नजीबा की कमर पर बह रही थी पर नजीबा को परवाह नहीं थी क्योंकि उसके खुद के मुँह से ढेर सारा थूक बह रहा था। उसकी गाँड की दीवारें अकड़ कर हिलोरें मार रही थीं और चूत बार-बार झड़ कर कलकल की आवाज़ के साथ अपनी मलाई छोड़ने लगी। नजीबा का सिर आ वासना से चूर हो कर चकरा रहा था और वो जोर-जोर से सिसक रही थी।

उसे लगा जैसे वो अपने अंदर कुत्तों के लौड़ों की ऊँफकारने की आवाज़ सुन सकती थी और अपनी चूत के रस के बहने की आवाज़ भी आ रही थी। टीपू के लंड ने उसकी चूत में अब वीर्य छोड़ना बंद कर दिया था और अचानक ही उसका लंड की गाँठ धीली हो कर बोतल में से डाट की तरह पॉप’ की आवाज़ के साथ बाहर निकल आयी और टीपू नजीबा से दूर हो कर हाँफता हुआ एक तरफ लेट गया। ।

 
औरंगजेब लगातार अपना लंड नजीबा की गाँड में चोद रहा था पर गाँठ के फैंसे होने के कारण उसके लंड की गति बहुत तेज़ नहीं थी पर नजीबा को काफी मज़ा आ रहा था। नजीबा ने जल्दी ही महसूस किया कि इस धीरे पर ठंसाठस चुदाइ का एक फायदा यह था कि इससे चुदाई इतने अधिक समय तक बरकरार थी जो कभी भी किसी आदमी के साथ चुदाई में संभव नहीं था।

पंद्रह मिनट बीत चुके थे जबसे औरंगजेब ने उसकी गाँड मे अपना लंड हँसा था और उतना ही वक्त टीपू के लंड की गाँठ को ढीली हो कर नजीबा की चूत में से निकलने में लगा था। औरंगजेब के लंड की ताकत कम होने का अभी भी कोई संकेत नज़र नहीं आ रहा था। नजीबा की चूत बार-बार झड़ रही थी। नजीबा पहले कभी एक साथ इतनी बार नहीं झड़ी थी... कई मर्दो से चुदाई के दौरान वो दो या कभी तीन बार झड़ी थी पर औरंगजेब अब तक पिछले पंद्रह मिनट में कम से कम सात बार नजीबा का पानी छुड़ा चुका था और उसके रुकने के आसार नज़र नहीं आ रहे थे। शाम से अब तक दोनों कुत्तों के साथ चुदाई में कम से कम बीस बार झड़ कर चरम कामोन्माद का अनुभव ले चुकी थी।

उसे अपनी क्षमता पर आश्चर्य हो रहा था। उसके अंदर जैसे निंफोमानियक औरत की तरह चुदाई की आग भड़क उठी थी जो बुझने का नाम ही नहीं ले रही थी। हालाँकि जैसा कुत्तों की चुदाई में होता है, औरंगजेब के लंड से लगातार पतला सा चिपचिपा द्रव्य नजीबा की गाँड में एनिमा की तरह छलक रहा था पर उस द्रव्य का छिड़काव उसकी आग ठंडी करने की बजाय घी बनकर उसकी वासना की आग और अधिक भड़का रहा था।

कराहते हुए नजीबा उस कुत्ते से विनती सी करने लगी, “प्लीज... ओह गॉड, हाँ.. ओह। गॉड... ओह गॉड... फक मी... ओह चोद मुझे... ओह मॉय गॉड... ओहहहहह गॉडडडड.. चोद मुझे... हाँ... चोद अपनी कुत्तिया को... मुझे अपनी कुत्तिया बना ले... फक मी हार्ड.. प्लीज... धज्जियाँ उड़ा दे मेरी गाँड की... प्लीज..." इसी तरह कराहती और रिरियाती हुई नजीबा अपनी गाँड गोल-गोल हिला रही थी। उसे और किसी बात का होश नहीं था।

इस समय वो विकृत चुदाई ही उसके अस्तित्व का एकमात्र आधार थी। वो कुत्ते के उस अद्भुत लंड को ज्यदा से ज्यादा अपनी गाँड में ले लेना चाहती थी। वो चाहती थी कि औरंगजेब । कयामत तक उसे चोदता रहे। उसे और किसी बात की परवाह नहीं थी। सृष्टि में जो कुछ भी होगा वो सिर्फ इसलिए कि वो कुत्ता सदा उसकी गाँड में लंड पेल कर उसे चोद सके।

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कुछ देर पश्चात जो कि अनंतकाल की तरह था, कुत्ते के लंड की गाँठ थोड़ी और फूल गयी और वो रिरियाने लगा। औरंगजेब ने पूरी ताकत से अपना लंड जितनी गहरायी तक संभव था उतना ठेल दिया और उसके गाढ़े वीर्य की धार नजीबा की गाँड में फूट पड़ी। नजीबा को ऐसा लगा जैसे इस बार तो उसकी गाँड फट कर जरूर पड़ेगी। कुत्ते का गरम वीर्य गाँड में छूटने से और उस पीड़ा से स्वतः ही एक और चरम कामोन्माद ट्रिगर हो गया और अपनी कमर ऐंठ कर वो बहुत जोर से चिल्ला पड़ी, ऊऊऊऊआआआआआआआआहहहह... मैं गयीईईईईईईईईई, और फिर उसने जोर से अपने दाँत भींच लिये और उसका जिस्म थरथर काँपने लगा। करीब दो-तीन मिनट तक कुत्ता उसकी गाँड में गाढ़ा वीर्य, गोला-बारी की तरह दागता रहा।

नजीबा को पूरा जिस्म झनझना उठा और उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। उसे इतने जबरदस्त कामानंद की अनुभूति हुई कि कुछ पलों के लिये वो अचेत सी हो गयी। जब उसे होश आया तो उसने पाया कि औरंगजेब ने चुदाई बंद कर दी थी पर अभी भी वो उसके ऊपर सवार था। नजीबा की चूत उसके लंड और गाँठ के इर्द-गिर्द जकड़ी हुई थी और नजीबा को अपनी गाँड आश्चर्यजनक रूप से भरी हुई महसूस हो रही थी। यह । सनसनाहट उसे बहुत अच्छी लग रही थी।

दूसरे कुत्ते से दो बार अपनी चूत चुदवाने के बाद वो समझ गयी थी कि उसे औरंगजेब के लंड की गाँठ के सिकुड़ने तक ऐसे ही कुत्तिया बने हुए इंतज़ार करना पड़ेगा। उसकी गाँड अभी भी हवा में थी क्योंकि उसमें कुत्ते का लंड और गाँठ फैंसी हुई थी। इसलिए नजीबा ने अपनी बांहें ज़मीन पर फैला दी और अपना सिर भी ज़मीन पर टिका दिया।

औरंगजेब में टीपू जैसा सब्र नहीं था और संतुष्ट होने के बाद वो अपनी गाँठ नजीबा की गाँड में से आज़ाद करने के लिये खींचने की कोशिश करने लगा। नजीबा फिर चिल्लायी। उसे अपनी गाँड फिर फटती हुई महसूस हुई। कुत्ते ने आज़ाद होने का कई बार प्रयत्न किया और फिर जैसा टीपू ने पहले किया था, औरंगजेब ने भी अपना जिस्म नजीबा से परे धकेला और अपनी पिछली टाँगें के बल कूद कर पीछे मुड़ गया। नजीबा को अपनी गाँड | और ऊपर उठानी पड़ी क्योंकि औरंगजेब की ऊँचाई ज्यादा थी और इसका नतीजा यह हुआकी नजीबा की गाँड कुत्ते के लंड से लटकी हुई प्रतीत होने लगी।

नजीबा को बहुत दर्द हो रहा था पर मजेदार बात यह थी की उसे यह अच्छा लग रहा था। हालाँकि वो पहले कभी भी ‘स्व-पीड़न या पर-पीड़न कामुक्ता' में आकृष्ट नहीं हुई थी, पर कुत्ते के लंड से लटके होने का आभास, गाँठ द्वारा अपनी गाँड में जोरदार खिंचाव की पीड़ा मिश्रित सनसनी, कुत्ते के पूरे लंड का अपनी गाँड में अहसास, और इन सबका संयोजन उसकी काम-विकृत वासना को भड़का कर उसे पागल कर रहा था।

 
उसे अपनी क्लिट में बिजली सी दौड़ती महसूस हुई और वो तुरंत ही एक हाथ अपनी टाँगों के बीच में पीछे ले जाकर अपनी क्लिट और चूत रगड़ने लगी। जब भी वो आनंद की लहर से झटकती तो उसे अपनी गाँड में कुत्ते के लंड की गाँठ खिंचती हुई महसूस होती। और शीघ्र ही वो फिर एक बार कामोन्माद के चरम पर पहुँच कर कराहते हुए झड़ गयी।

अपने कामानंद की प्रचंडता के कारण खुद को सहारा देने के लिये उसे अपना हाथ वापस नीचे | रखना पड़ा। जैसे ही वो नीचे झुकी, नजीबा को अपनी गाँड में कुत्ते के लंड की सकुशल फंसी गाँठ का जोरदार खिंचाव महसूस हुआ। कुत्ते के लंड की मोटी गाँठ नजीबा की गाँड को अभी भी हवा में लटकाये हुए थी और जब तक वो सिकुड़ ना जाये, न उससे छूटने की कोई आशा नहीं थी।

झड़ने के पश्चात नजीबा उसी स्थिति में कुत्ते के लंड से लटके हुए और उसकी गाँठ के सिकुड़ने का इंतज़ार करने के लिये बेबस थी। कुत्ते के लंड से चिपक कर उससे अपनी गाँड लटकाये हुए वो करीब बीस मिनट तक रही। जब भी उन दोनों में से कोई थोड़ा सा भी हिलता तो नजीबा को गाँठ के साथ-साथ कुत्ते के लंड के प्रत्येक अंश का मीठा सा एहसास होता। अपने जीवन में शायद ही कभी नजीबा ने इतने कामुक और प्रचंड एहसास का अनुभाव किया था। नजीबा कुत्ते का लंड अपनी गाँड में गहरायी तक धड़कते। हुए महसूस कर रही थी जिसमें से अभी भी वीर्य के कतरे फूटना जारी थे।

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आखिरकार नजीबा को कुत्ते के लंड की गाँठ ढीली होती महसूस जब तक कि वो सिकुड़ कर उसकी गाँड में से बाहर निकलने जितनी छोटी नहीं हो गयी। जब लंड की गाँठ नजीबा की गाँड के छेद में से कुचलती हुई निकली तो उसके खिंचाव से नजीबा की चींख निकल गयी। अगले ही पल उसे महसूस हुआ कि हवा के एक झोंके के साथ जैसे टन भर वीर्य उसकी गाँड में से फूट कर बाहर निकल आया हो। नजीबा वहीं ढह गयी।

और कुछ देर के लिये हिल भी नहीं पायी। उसे अपनी गाँड ऐसे महसूस हो रही थी जैसे । उसमें अभी भी कुत्ते का लंड चूँसा हो। उसकी गाँड धड़कती महसूस हो रही थी और नजीबा को अपना हाथ पीछे ले जाकर अपनी गाँड छूने में डर सा लग रहा था। आखिर में उसने अपनी अंगुलियों से गाँड को छुआ तो चिहुँक उठी। उसकी गाँड बहुत ही संवेदनशील हो गयी थी और छूने से गुदगुदी भरा दर्द हो रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी गाँड का छिद्र अभी भी काफी खुला हुआ था। आखिरकार वो छिद्र कुत्ते के लंड की क्रिकेट की गेंद के आकार की गाँठ द्वारा चौड़ा फैल कर खुला था और अब अपने मूल आकार में लौटने का प्रयत्न कर रहा था।

 
उसे अपनी क्लिट में बिजली सी दौड़ती महसूस हुई और वो तुरंत ही एक हाथ अपनी टाँगों के बीच में पीछे ले जाकर अपनी क्लिट और चूत रगड़ने लगी। जब भी वो आनंद की लहर से झटकती तो उसे अपनी गाँड में कुत्ते के लंड की गाँठ खिंचती हुई महसूस होती। और शीघ्र ही वो फिर एक बार कामोन्माद के चरम पर पहुँच कर कराहते हुए झड़ गयी।

अपने कामानंद की प्रचंडता के कारण खुद को सहारा देने के लिये उसे अपना हाथ वापस नीचे | रखना पड़ा। जैसे ही वो नीचे झुकी, नजीबा को अपनी गाँड में कुत्ते के लंड की सकुशल फंसी गाँठ का जोरदार खिंचाव महसूस हुआ। कुत्ते के लंड की मोटी गाँठ नजीबा की गाँड को अभी भी हवा में लटकाये हुए थी और जब तक वो सिकुड़ ना जाये, न उससे छूटने की कोई आशा नहीं थी।

झड़ने के पश्चात नजीबा उसी स्थिति में कुत्ते के लंड से लटके हुए और उसकी गाँठ के सिकुड़ने का इंतज़ार करने के लिये बेबस थी। कुत्ते के लंड से चिपक कर उससे अपनी गाँड लटकाये हुए वो करीब बीस मिनट तक रही। जब भी उन दोनों में से कोई थोड़ा सा भी हिलता तो नजीबा को गाँठ के साथ-साथ कुत्ते के लंड के प्रत्येक अंश का मीठा सा एहसास होता। अपने जीवन में शायद ही कभी नजीबा ने इतने कामुक और प्रचंड एहसास का अनुभाव किया था। नजीबा कुत्ते का लंड अपनी गाँड में गहरायी तक धड़कते। हुए महसूस कर रही थी जिसमें से अभी भी वीर्य के कतरे फूटना जारी थे।

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आखिरकार नजीबा को कुत्ते के लंड की गाँठ ढीली होती महसूस जब तक कि वो सिकुड़ कर उसकी गाँड में से बाहर निकलने जितनी छोटी नहीं हो गयी। जब लंड की गाँठ नजीबा की गाँड के छेद में से कुचलती हुई निकली तो उसके खिंचाव से नजीबा की चींख निकल गयी। अगले ही पल उसे महसूस हुआ कि हवा के एक झोंके के साथ जैसे टन भर वीर्य उसकी गाँड में से फूट कर बाहर निकल आया हो। नजीबा वहीं ढह गयी।

और कुछ देर के लिये हिल भी नहीं पायी। उसे अपनी गाँड ऐसे महसूस हो रही थी जैसे । उसमें अभी भी कुत्ते का लंड चूँसा हो। उसकी गाँड धड़कती महसूस हो रही थी और नजीबा को अपना हाथ पीछे ले जाकर अपनी गाँड छूने में डर सा लग रहा था। आखिर में उसने अपनी अंगुलियों से गाँड को छुआ तो चिहुँक उठी। उसकी गाँड बहुत ही संवेदनशील हो गयी थी और छूने से गुदगुदी भरा दर्द हो रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि उसकी गाँड का छिद्र अभी भी काफी खुला हुआ था। आखिरकार वो छिद्र कुत्ते के लंड की क्रिकेट की गेंद के आकार की गाँठ द्वारा चौड़ा फैल कर खुला था और अब अपने मूल आकार में लौटने का प्रयत्न कर रहा था।

 
उसने औरंगजेब की तरफ नज़र डाली तो देखा कि उसका लंड तुरंत अपने खोल में सिकुड़ कर लुप्त नहीं हुआ था। नजीबा को विश्वास नहीं हो रहा था कि वो लंड और गाँठ उसकी गाँड में कैसे समा पाये थे। कुत्ते लंड की जड़ में गेंद जैसी गाँठ अभी भी काफी मोटी फूली थी। वो बैंगनी से लाल रंग की गाँठ आलूबुखारे जितनी बड़ी लग रही थी और वैसे ही बैंगनी-लाल रंग का कुत्ते का लंड भी इस समय कम से कम आठ इंच का था। यह सोच कर कि उसकी गाँड में चोदते हुए वो लंड इससे भी बड़ा रहा होगा, नजीबा के बदन में एक लहर सी दौड़ गयी।

वीर्य में भीगा और चमचमाता हुआ लंड झुलाते हुए औरंगजेब चलता हुआ एक तरफ जा कर बैठ गया और अपना लंड चाट कर साफ करने लगा। टीपू भी पास ही बैठा अपने लंड पर जीभ फिरा रहा था।

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गधे का वीर्य पीने के बाद शाजिया की कामोत्तेजना इतनी बढ़ गयी थी कि उसकी चूत ऐसे महसूस दे रही थी कि कभी भी उसमें आग की लपतें धधक उठेगी। गधे ने अपनी जीभ और जबड़े से शाजिया को तृप्त किया था पर शाजिया की संतुष्टि ज्यादा देर कायम नहीं रही। और अब, उसके लंड को चूस कर उसका वीर्य-पान करने के पश्चात उस कामुक चुदक्कड़ औरत को ऐसा लग रहा था कि वो गधे के विराट लंड से चुदवाये बिना नहीं रह पायेगी।

उसने टकटकी लगा कर गधे के लंड को घूरा तो उसका बदन थरथरा गया। उसके लंड का आकार दिल दहला देने वाला था। फिर भी उस लंड का सुपाड़ा उसके मुँह मे समा सका था और वो अच्छी तरह जानती थी कि उसके होंठों से ज्यादा लचीली उसकी चूत थी - और ज्यादा भूखी भी। उसकी चूत बहुत खोखली और खाली महसूस दे रही थी।

और चुदने के लिये तरस रही थी। शाजिया उस कुंआरी लड़की की तरह काँप रही थी आ जिसका कौमार्य भंग होने वाला हो। एक तरह से ये सच भी था - शाजिया ने सोचा। क्योंकि गधे का वो विशाल लंड उसकी चूत में इतनी गहरायी तक घुसने वाला था जहाँ तक पहले कोई लंड नहीं गया था।

वो हाँफ रही थी। उसकी गर्म साँस गधे के लंड के सुपाड़े पर पड़ी तो वो धड़कने और कूदने लगा। उसका लंड तड़क कर ऊपर उठ गया। शाजिया के मुँह में झड़ने के बाद वो * थोड़ा ही ढीला पड़ा था और इस समय झटक कर वापस सख्त बन गया था।

| शाजिया की आँखें इस तरह गधे के लंड पर चिपकी हुई थीं जैसे कि वो सम्मोहन से अचेतन हो गयी हो। वो धीरे से अपने सैंडलों की ऐड़ियों के बल बैठते हुए पीछे की तरफ अपने चूतड़ों के बल गिर गयी और फिर वो गधे के नीचे खिसक गयी। उसका सिर और कंधे ज़मीन पर टिके थे, उसके सैंडल युक्त पैर दृढ़ता से ज़मीन पर जमे थे और उसकी गाँड हवा में ऊपर उठ कर झूल रही थी जिससे उसकी झाग उठती चूत गधे के लंड के सुपाड़े के स्तर तक पहुँच गयी थी।

 
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गधे ने अपना सिर झुकाया और उसकी जीभ शाजिया की सख्त चूचियों को चाटते हुए उनके बीच की दरार से ऊपर फिसली। गधे का लंड भी शाजिया के पेट पर उछला। गधे ने आगे झटक कर अपना लंड आगे भोंका पर वो अपने लक्ष्य से एक-दो इंच से चूक गया। उसके लंड का चिपचिपा सुपाड़ा शाजिया के चूत के ऊपर से झड़झड़ाता हुआ उसके पेट पर फिसल कर शाजिया की भारी चूचियों के निचले हिस्से से टकराया।

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शाजिया के पेट पर वीर्य की पगडंडी सी छोड़ते हुए गधे ने अपना लंड पीछे खींचा। शाजिया ने। अपने चूतड़ और ऊपर ठेले। जब उस उत्तेजित गधे ने फिर से धक्का लगाया तो उसक लंड जोर से शाजिया की चूत पर टकराया और शाजिया को पीछे ढकेल दिया। उसका बड़ा सुपाड़ा शाजिया की चूत में धधकने लगा और शाजिया जोश में अपने चूतड़ हिलाती हुई अपनी चूत उस लंड के चिपचिपे सुपाडे पर रगड़ने लगी।

गधे के मूत-छिद्र में से वीर्य छलक पड़ा और शाजिया की चूत में बह कर उसकी चूत के । रस की चिकनाहट बढ़ाने लगा। शाजिया की चूत के गुलाबी बाहरी होंठ धड़कते हुए फैल गये

और लंड के सुपाड़े पर बाहर घूम कर खुल गये। घरघराते हुए गधे ने आगे धक्का लगा कर अपना सुपाड़ा उन खुले होंठों में से शाजिया के मलाई से भरे कटोरे में ठाँसने लगा। लंड का बड़ा खुटा शाजिया की चूत को और चौड़ा फैलाते हुए धधकने लगा। जब गधा अपना लंड और आगे ठेलने लगा तो शाजिया ने भी अपने कुल्हे आगे ठेल दिये। गधे के लंड का रिसता हुआ सुपाड़ा शाजिया की चूत में फँस गया था।

चुदाई की चाहत में रिरियाती हुई शाजिया अपनी चूत चलाने लगी और गधे ने फिर आगे धक्का लगाया। गधा गर्जने लगा और शाजिया कराहने लगी - और उसके लंड का विशाल मोटा सुपाड़ा शाजिया की दहकती चूत में। कुचलता हुआ अंदर खिसक गया। लंड के सुपाड़े की पूरी गाँठ अब चूत के अंदर थी और चूत के होंठ उस सूजे हुए सुपाड़े के ठीक पीछे चिपक कर लिपटे हुए थे।

शाजिया उस गधे के सख्त लंड के एक छोर पर अटकी हुई झूल रही थी। गधा अपना लंड आगे ठाँस रहा था और शाजिया की गाँड उसके लंड के छोर पर ऊपर-नीचे हो रही थी।

एक क्षण के लिये शाजिया घबरा गयी कि उसकी चूत और लंड अंदर नहीं ले पायेगी और उसके मुँह की तरह उसकी चूत भी सिर्फ लंड का सुपाड़ा ही ले पायेगी। उसकी आंशिक खाली चूत चुदाई की तड़प में धड़क रही थी। अपनी चूत को गधे के लंड से पूरा भरने की तड़प में शाजिया वहशियाने ढंग से अपने कुल्हे उचकाती हुई अपनी चूत उसके लंड पर ऊपर चोदने लगी।

गधे का लंड थोड़ा अंदर खिसका। धीरे से और स्थिरता से गधे का लंबा और मोटा महालंड शाजिया की चूत में और अंदर फिसलने लगा। इतने बड़े लंड को समायोजित करने के लिये चूत की लचीली दीवारें फैल कर लंड के चारों और साँचे में ढल गयी। शाजिया की चूत पहले कभी इतनी चौड़ी नहीं फैली थी। गधे ने आगे धक्का लगाया और उसका लंड । चूत के और अंदर धंस गया। धधकता हुआ सुपाड़ा गड़ते हुए रस्ता बना रहा था और उसके पीछे-पीछे लंड की छड़ अंजान प्रदेश में बढ़ रही थी।

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गधे के लंड का सुपाड़ा शाजिया की चूत में इतनी गहरायी तक पहुँच चुका था जहाँ पहले कभी और कोई लंड नहीं गया था और अभी भी शाजिया की चूत और गधे के टट्टों के बीच लगभग एक फुट लंड निकला हुआ था। गधे ने हिल कर अपना लंड और आगे ठेला तो लंड का सुपड़ा चूत की गहरायी में कठोरता से टकराया और अब वो और आगे नहीं जा सकता था। शाजिया खुद को लंड से इतना भरा हुआ महसूस कर रही थी कि उसने सोचा कि जब गधे के लंड में से वीर्य छूटेगा तो उसके मुंह से बाहर निकल पड़ेगा। गधे का लंड झटकने लगा तो शाजिया उसपर ऊपर नीचे हिलने लगी। शाजिया की चूत पूरी क्षमता तक गधे के लंड से भरी हुई थी पर फिर भी लगभग एक फुट लंड बाहर रह गया था। शाजिया की चूत में और लंड के लिये कोई जगह नहीं बची थी। उसकी भूखी चूत चमत्कारपूर्ण रूप से उस गर्म महा-लंड से भर गयी थी।

 
गधे ने शाजिया की चूत के अंदर घुसे हुए अपने धड़कते लंड की पैंठ कुछ क्षणों के लिये। बनाये रखी। शाजिया को लगा जैसे उसका लंड पम्प की तरह उसके पेट में हवा भर रहा है। अपने चूतड़ घुमा कर वो अपनी चूत को गधे के लंड के इर्द-गिर्द रगड़ रही थी। शाजिया गधे द्वारा चुदाई शुरू होने के लिये बेकरार हो रही थी।

तभी गधा पीछे हिला। परंतु उसका लंड शाजिया की चूत में इतनी मजबूती से गढ़ा था कि लंड बाहर खींचने की बजाय शाजिया को ही अपने लंड के साथ पीछे घसीट लिया। गधे ने फिर एक बार आगे ठेल कर पीछे झटका लिया किंतु उसके लंड ने अंदर या बाहर फिसलने से इंकार कर दिया। वो लंड शाजिया की चूत में इतना कस कर फँसा था कि टस से मस नहीं हुआ।

शाजिया बेकरारी से कराहने लगी। उसके लंड से अपनी चूत इस कदर भरी होने से वो खुश थी पर वो अपनी चूत में चुदाई की ताल में उस भारी लंड के अंदर बाहर फिसलने के लिये तड़प रही थी। अपनी चूत को ठीक स्थिति में रखते हुए उसने अपने पैरों और कंधों को ज़मीन पर ठेला ताकि गधे का लंड बाहर निकल कर फिर अंदर जोर से घुस सके पर वो असफल रही। गधे ने झटका मारा तो शाजिया का पूरा शरीर उसके लंड के साथ घिसट गया।

शाजिया ने सोचा कि कम से कम वो चूत में लंड भरे होने से झड़ तो सकती ही थी। पर फिर उसे दूसरा ख्याल आया। ‘प्रथागत चुदाई के घर्षण के बगैर, क्या वो गधा झड़ पायेगा?

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और अगर वो झड़ कर संतुष्ट नहीं हो सका तो - शाजिया ने आकस्मिक भय से थूक निगला - वो दोनों अलग कैसे होंगें? शाजिया को बड़ा भयनक ख्याल आया कि हो सकता है वो कई घंटों तक गधे के लंड पर फैंसी रहे। और हो सकता है उसकी चूत सुबह तक लंड पर चिपकी हुई हँसी रहे और नजीबा उसे ढूँढती हुई वहाँ पहुँच जाय या फिर उसे किसी डॉक्टर की मदद लेनी पड़े।

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शाजिया इस संभावना से डर कर जोर-जोर से पागलों की तरह झटके मारने लगी। अपनी मुलायम जांचें उस विराट लंड पर कस कर और उसे मजबूती से पकड़ कर वो उस लंड पर अपनी चूत ऊपर नीचे कुचलने की कोशिश करने लगी। पर फिर भी वो टस से मस नहीं हुआ। उसका सुपाड़ा शाजिया की चूत की असीम गहराइयों में था और उसके लंड की अधिकतर डाली उसकी चूत की सुरंग में फंसी थी, पर शाजिया अपनी चूत ज़रा सी भी नहीं। हिला सकी।

नशे में चूर शाजिया को एहसास हो गया कि वो गंभीर समस्या में थी।

परंतु सहायता तो वहीं मौजूद थी.....

औरंगजेब के लंड से आज़ाद होने के बाद अर्ध-चेतन हालत में नजीबा कालीन पर पसरी हुई पड़ी थी। दोनों कुत्ते भी हाँफते हुए नजीबा के नज़दीक ही सिकुड़े हुए पड़े थे। दोनों कुत्तों के आँड रिक्त हो चुके थे और उनके लंड धीरे-धीरे अपने खोल में लुप्त हो रहे थे।



चार-पाँच मिनट पश्चात नजीबा कुछ संभली तो उसने कुत्तों पर एक नज़र डाली। उसे कुत्तों में नवीन जोश का कोई आसार नहीं दिखा। वो हिम्मत करके उठी। पहले तो वो अपने कपड़े ढूँढने लगी पर फिर उसने कपड़े पहनने का ख्याल छोड़ दिया क्योंकि उसका इरादा तो बाहर छप्पर में जाने का था। उसने सोचा कि जब वो गधे का मूसल लंड अपने हाथों में ले कर सहलायेगी तो गधे का वीर्य हर तरफ छलकेगा और कपड़ों को वीर्य से भिगोने का कोई तात्पर्य नहीं था। वो वैसे ही बिल्कुल नंगी अपने हाई-हील के सैंडल पहने कमरे के दरवाजे तक गयी। उसके कदम पहले की तरह ही लड़खड़ा रहे थे। उसने रुक कर बाहर झाँका तो उसे घर का मुख्य दरवाजा खुला दिखायी दिया। उसने सोचा कि हो सकता हई नशे के कारण शाजिया दरवाजा बंद करना भूल गयी होगी। फिर शाजिया के बेडरूम की तरफ से कोई आहट ना सुन कर वो आश्वस्त हो गयी कि शाजिया नशे में चूर । हो कर गहरी नींद सो रही होगी।

 
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