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शादी की रात
शाम पाँच बजे, नोयडा सिटी सेन्टर माॅल
‘बोल वन्दना क्या आफत आ गई? बार बार क्यों फोन कर रही है?’, पूर्वा ने झल्लाये स्वर में फोन पर कहा।
‘तू बार-बार फोन क्यों काट रही थी? कहीं स्पेषल तैयार हो रही है क्या?’
‘मैं मूवी देख रही हूं। तेरा बार-बार फोन आ रहा था इसलिए बाहर आई हूं और ये स्पेषल तैयार क्या है? तेरी बारात आ रही है क्या?’
‘मेरी क्यों आयेगी? और……’
‘तो?’, पूर्वा ने बात काटी।
‘…..और तू मूवी देख रही है! आज बेला की षादी है और तू मूवी देख रही है?’, वन्दना का आष्चर्यमिश्रित स्वर उसके कानों में पड़ा।
‘दोबारा बोल, किसकी षादी हो रही है?, पूर्वा ने उलझनपूर्ण स्वर में पूछा।
‘बेला की। बेला की षादी हो रही है। तेरी बड़ी बहन की। तुझे नहीं पता क्या?’
‘दिमाग खराब हो गया क्या तेरा। दोपहर में वोदका मत पिया कर, दिमाग खराब हो जाता है।’
‘वोदका, रम, बीयर सारी चीजें तू पी के बैठी है, जो तुझे नहीं पता कि आज बेला की षादी है।’, वन्दना की तीव्र आवाज उसके कानों में पड़ रही थी।
‘तू सच कह रही है क्या?’, पूर्वा धीमे और अनिष्चय स्वर में बोली।
‘मैं तुझसे क्यों झूठ बोलूंगी। मैं बेला के साथ आई हूं ब्यूटी पार्लर में। वो अन्दर तैयार हो रही है।’, वन्दना अभी भी हैरानी से बोल रही थी, ‘तुझे सचमुच नहीं पता कि आज उसकी षादी है?’
पूर्वा से कुछ कहा नहीं गया लेकिन उसने इन्कार में गर्दन हिलायी। उसे ये भी ध्यान नहीं था कि उसकी हिलती गर्दन वन्दना को नहीं दिखाई देगी।
‘पूर्वा?……पूर्वा? सुन रही है?’, वन्दना का व्याकुल स्वर उसे सुनाई दिया।
‘मैं तेरे से बाद में बात करती हूं……….’, उसका स्वर रुआंसा सा हो गया और उसने फोन काट दिया।
उसे एकाएक समझ नहीं आया कि वह क्या करे? सिनेमा हाॅल के बन्द दरवाजे के पास वह खड़ी थी। वह गौतम के साथ ‘बदलापुर’ मूवी देखने आई थी। उसने एक बार बन्द दरवाजे को देखा और फिर बाहर की ओर चल दी। सिनेमा हाॅल के बाहर माॅल के काॅरिडोर की रेलिंग के पास जाकर वह रुक गई। उसे गहरा आघात लगा था। उसे सूझ नहीं रहा था कि वह सबसे पहले किसे फोन करे? बेला को? अपनी मां को या पिता को? वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं कि आज उसकी बहन की षादी हो रही है और उसे बताया तक नहीं। वन्दना, जो उसकी कजन है, तक को पता है यानि सबको पता है सिर्फ उसे छोड़कर। माॅल की तीसरी मंजिल से वह नीचे की चहल-पहल को देखते हुए भी नहीं देख रही थी। आखिरकार, उसने बेला को फोन लगाया। घण्टी जाती रही, जाती रही लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। गुस्से और निराषा ने उसके चेहरे पर अपना अधिकार जमा लिया। फिर उसने अपनी मां को फोन लगाया। मां ने भी फोन नहीं उठाया।
‘अब पापा को करूं?’, वह खुद से बोली।
उसने फोन की स्क्रीन अपनी आँखों के आगे की ही थी कि गौतम का फोन आ गया। वह अभी उससे बात करने की स्थिति में नहीं थी, उसने फोन काट दिया।
उसने वापस वन्दना को फोन लगाया।
‘हां बोल?’, उसे वन्दना की आवाज सुनाई दी।
‘अभी दीदी कहां है?’
‘उसका मेकअप चल रहा है।’
‘षायद तभी मेरा फोन नहीं उठा रही है। तूने उसे बता दिया कि तेरी मेरी बात हुई है?’
‘नहीं। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि नहीं बताना चाहिए।’
‘तू मेरी उससे बात करा सकती है?’, पूर्वा ने संयत स्वर में कहा।
दूसरी ओर खामोषी रही।
‘क्या हुआ?’
‘यार, मैं सोच रही हूं कि बात कराना ठीक रहेगा क्या? ऐसे तो उसे पता चल जायेगा कि मैंने तुझे षादी के बारे में बताया है तो…..तो मेरा क्या होगा? पता नहीं उन लोगों ने क्या सोचा हुआ है?’, वन्दना का चिन्तित स्वर उसे सुनाई दिया।
‘तू सही कह रही है। रहने दे।’, उसने कहा।
‘वैसे, ये तो गलत बात है कि सगी बहन की षादी है और तुझे न बताया गया और न बुलाया गया। एंगेजमेन्ट वाली कहानी रिपीट न हो षायद इसलिए तो नहीं……..। तू कहां है अभी, नोयडा में?’
‘हां, और कहां होऊंगी?’, उसका स्वर हल्का सा रुआंसा हो गया।
‘अब तू आ रही है क्या?’, वन्दना ने षायद उसके रुआंसेपन को महसूस किया क्योंकि उसकी आवाज भी भीगने लगी थी।
‘पता नहीं। वैसे षादी हो कहां रही है? घर पर या कहीं और?
‘कापसहेड़ा के एक फार्म हाउस में। नाम मुझे ध्यान नहीं है। मैं बाद में तुझे वेन्यु मैसेज कर दूंगी।’
‘ओके पर ये सीक्रेट रहेगा कि तेरी मेरी बात हुई है।’
‘बिल्कुल। और मैं क्यों कहूंगी?’, वन्दना ने आष्वासनपूर्ण स्वर में कहा। उसकी चैन भरी सांस भी पूर्वा को सुनाई दी।
जब पूर्वा ने फोन काटा तो गौतम उसके सामने खड़ा था। उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर वह धीरे से बोला, ‘क्या हुआ? एनीथिंग सीरियस?’
पूर्वा ने सहमति में गर्दन हिलाई।
‘क्या?’, कहते हुए उसने ढेर सारी बातें सोच ली।
आज बहुत दिनों की कोषिष के बाद गौतम पूर्वा को राजी कर पाया था। पहले मूवी का प्रोग्राम था फिर उसके बाद वह उसे अपने फ्लैट में ले जाने वाला था जहां उसने सिर्फ दोनों के लिए पार्टी का इन्तजाम किया हुआ था और आखिर में उसे रात को रुकने के लिए भी राजी कर लिया था। उसे सिर्फ रात का इन्तजार था मगर अब ‘क्या’ कहते हुए उसे लग रहा था कि प्रोग्राम खटाई में पड़ चुका है।
‘मुझे अभी घर जाना पड़ेगा?’, पूर्वा ने अपराधी भाव से कहा।
‘और पार्टी का क्या होगा?’ और इस फिल्म का?’, गौतम झल्लाते हुए बोला।
‘मैं रुक नहीं सकती, बहुत अरजेन्ट है यार।’, उसका स्वर रुआंसा हो उठा।
‘कुछ बतायेगी?’, गुस्से को मुष्किल से काबू करते हुए उसने पूछा।
‘लम्बी कहानी है, मैं तुझे आकर बताउंगी। मुझे जल्दी से हाॅस्टल छोड़ दे।’
‘यार, मूवी तो देख ले। बहुत इन्ट्रस्टिंग मूवी है।’
‘अरे नहीं रुक सकती। अगली बार मैं तुझे दिखा दूंगी। अब चल जल्दी।’, पूर्वा एस्केलेटर की ओर बढ़ी।
गौतम ने कुछ नहीं कहा और मरी हुई चाल से उसके पीछे चलने लगा। साला, लक ही खराब है। यहां टिकट के पैसे और वहां दारू के पैसे सब बरबाद गये।
‘क्विक यार।’, पूर्वा उसकी ओर मुड़कर चिल्लाई।
षाम सवा पाँच बजे, राजौरी गार्डन, दिल्ली
रीता अपना फोन चैक कर रही थी। तीन मिस काॅल थी जिनमें एक पूर्वा की थी। तो क्या उसे पता चल गया? उसका दिल जोर से धड़का। वह फौरन बाहर की ओर भागी। बाहर बरामदे में आकाष फेरों पर दिया जाने वाला सामान पैक करा रहा था।
‘सुनो।’, रीता विचलित स्वर में आकाष से बोली।
‘बोलो।’, बिना रीता की ओर देखे आकाष ने कहा।
‘पूर्वा की मिस काॅल है मेरे फोन पर।’, रीता आगे को झुकी और इतने धीमे स्वर में कहा कि वहां मौजूद अन्य लोग न सुन सकें।
पूर्वा का नाम सुनते ही आकाष रुक गया। ‘तुम अन्दर चलो मैं आता हूं।’, आकाष ने भी धीमे स्वर में कहा।
कुछ क्षण बाद।
‘हमें उसे बता देना चाहिए था। मुझे लगता है उसे मालूम हो गया है।’, रीता व्याकुल स्वर में बोली।
‘कैसे मालूम हो गया? सिर्फ काॅल आने से?’, आकाष ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता।’
‘मैं बुला लूं अब उसे? तुम्हें कुछ कहे न कहे मुझे सारी जिन्दगी कहेगी वो। मां जो हूं।’
‘देखो, इस बारे में हम पहले ही फैसला कर चुके हैं। दूध का जला हूं मैं, पता है न पिछली दो बार क्या हुआ था। पूर्वा को देखते ही दो रिष्ते टूट गये थे और एक तो ऐन सगाई के समय। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। और तो और अब तो खुद बेला भी नहीं चाहती कि पूर्वा आये।’, आकाष दृढ़ता से बोला।
रीता असहाय थी। पूर्वा के कारण बेला के दो रिष्ते टूट गये थे। लड़के वाले पूर्वा को देखते ही पूर्वा की बात करने लग जाते थे। बेला को कोई पसन्द ही नहीं करता था। इसलिए कुछ मौकों पर पूर्वा को बिना बताये बेला की दिखाई की जाती थी। पूर्वा को नोयडा पढ़ने भेजना भी रणनीति का हिस्सा था। दूर रहेगी तो कोई अड़चन नहीं आयेगी।
पिछली बार जिस दिन बेला की सगाई थी, पूर्वा को उसी दिन बुलाया गया था। मगर पूर्वा का परिचय मिलते ही बेला के होने वाले पति ने उसी दिन रिष्ता तोड़ दिया क्योंकि उसका कहना था कि उसके साथ धोखा हुआ है, पूर्वा को पहले क्यांे नहीं दिखाया गया। पूर्वा भी हैरान थी लेकिन क्या करे? अगर चारों भाई बहनों को एक साथ खड़ा कर दिया जाये तो वह अलग ही एलियन की तरह लगेगी या टाट में मखमल की तरह। उसकी खूबसूरती ही सबकी दुष्मन बन गयी थी।
‘अब…………..?’, रीता के मुँह से धीरे से निकला।
‘दिल पे पत्थर रखो। उसे कल बता देंगे।’, आकाष ने समझाने वाले भाव से कहा।
‘और अगर वह आ गई तो?’
रीता के इस कठोर प्रष्न का उत्तर उसके पति के पास नहीं था। वह बिना कुछ कहे बाहर चला गया।
षाम साढ़े पाँच बजे, एमिटी विष्वद्यिालय, नोयडा
पूर्वा चाहती थी कि गौतम उसके साथ दिल्ली उसके घर चले लेकिन पूर्वा ने उसे साथ चलने के लिए कहा नहीं। उसे तब और दुख हुआ जब गौतम ने भी कुछ नहीं कहा। क्या भाग्य है, आज तो कोई भी उसके साथ नहीं है। उसे मालूम है, गौतम काफी हद तक सैलफिष लड़का है। अभी वह उसके साथ मौज मस्ती करने के लिए राजी हो जाये तो चाँद तक भी जाने के लिए तैयार हो जायेगा। अपने मतलब बिना षायद वह कहीं नहीं जायेगा। फिर भी वह उसे पसन्द करती है, फिर भी वह उससे जुड़ी हुई है।
यहां उसके पास दो ही अच्छे फाॅरमल सूट थे। उसने एक पहन लिया। वह दुखी भी थी और उत्साहित भी। हालांकि पहले वह जीन्स पहनकर जाना चाह रही थी मगर षादी के माहौल के हिसाब से उसे ठीक नहीं लगा।
वार्डन को सूचित करने के बाद वह हाॅस्टल से बाहर निकली। वह एमिटी विष्वविद्यालय, नोयडा से फैषन डिजाइन का कोर्स कर रही है और अभी दूसरे वड्र्ढ मेें है। वह यहीं के हाॅस्टल में रहती है और हफ्ते दो हफ्ते में अपने घर राजौरी गार्डन दिल्ली में एक दो रातों के लिए रहने चली जाती है।
अभी वह कुछ दूर ही चली थी कि उसे विषेड्ढ दिखाई दिया। विषेड्ढ उसका सहपाठी है। विषेड्ढ ने भी उसे देख लिया और वह तेजी से चलता हुआ उसके पास आया।
‘क्या बात है आज तो बड़ा षानदार सूट पहना है। कहीं पार्टी है क्या?’, विषेड्ढ ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘तुझे चलना है पार्टी में?’, पूर्वा हल्का सा मुस्कुराई।
‘तू ले चलेगी?’
उसने सहमति में सिर हिलाया और कहा, ‘पार्टी नहीं है षादी है।’
‘क्या फर्क पड़ता है। तू रुक, मैं अभी दो मिनट में तैयार होकर आता हूं।’, वह उत्साहित स्वर में बोला। आज तो उसकी मन की मुराद पूरी हुई है। पूर्वा के साथ तो वह कहीं भी, कभी भी जाने के लिए तैयार है।
‘सुन, तू बाइक या कार का इन्तजाम कर सकता है क्या?’
‘हो जायेगा। तू बस पन्द्रह-बीस मिनट रुक। मैं तुझे तेरे हाॅस्टल के गेट पर मिलता हूं। ओके?’, विषेड्ढ ने जल्दी से कहा। उसे डर था कि कहीं पूर्वा अपना इरादा ना बदल दे।
‘हमें दिल्ली जाना पड़ेगा।’, पूर्वा ने हिचकते हुए कहा।
‘मुम्बई भी होता तो भी कोई प्राब्लम नहीं। बस, आइम कमिंग।’, उसने अंगूठा ऊपर उठाते हुए कहा और अपने हाॅस्टल की ओर चल पड़ा।
पूर्वा कुछ देर अनिष्चित सी खड़ी रही और वह भी वापस चलने लगी। विषेड्ढ से सिर्फ वह सहपाठी होने के नाते ही बात करती है लेकिन वह जानती है वह कहीं न कहीं एडवान्टेज लेने की कोषिष करता रहता है। यहां सब उसे मैंढक जैसी आँखों वाला लड़का कहते हैं क्योंकि उसकी आँखे बड़ी-बड़ी और बाहर को निकली हुई हैं जैसी मैंढक की निकली होती हैं। पूर्वा को न जाने क्यों हमेषा भय लगा रहता है कि अगर कभी विषेड्ढ अधिक उत्तेजित या क्रोधित हुआ तो उसकी आँखें बाहर टपक पड़ेगीं।
षाम सवा छह बजे
कार दिल्ली की तरफ दौड़ रही थी। पहले वह बाइक ला रहा था पर सर्दी में बाइक पर बुरा हाल हो जाता है। वैसे बाइक पर उसे पूर्वा का लगातार स्पर्ष मिलता रहता मगर दोनों के कपड़ों और चेहरों का सत्यानाष हो जाता। इसके विपरीत कार में हुलिया और कपड़े सही सलामत रहते है और सर्दी से भी बचाव हो जाता है, साथ ही बातचीत भी बेरोकटोक चलती रहती है जो बाइक पर सम्भव नहीं हो पाती।
‘एक बात पूछूं?’
‘क्या?’ पूर्वा ने सामने सड़क पर देखते हुए कहा।
‘तू उदास क्यों हैं आज?’
‘हां उदास तो हूं। अगर वजह बताउंगी तो तू हिल जायेगा।’, पूर्वा ने खाली आँखों से उसे देखा।
विषेड्ढ ने उसकी खाली आँखें देखी। देखने के साथ ही हल्का सा उसका हाथ चक्के पर काँपा। कितना कुछ था इन खाली आँखों में। वह तो पहले ही हिल गया।
‘मैंने ये बात किसी से षेयर नहीं की। हमेषा खुद ही भीतर घुटती रही। पर आज हालात ऐसे बन गये हैं कि आज षेयर करना चाहती हूं। तुझसे।’
‘और अगर गौतम होता तो?’, उसे पूर्वा और गौतम की नजदीकियां मालूम हैं। काॅलेज में ये सब चलता है। एक दूसरे की गर्लफ्रैन्ड काटने का मजा ही कुछ और है। वैसे उसे मालूम है कि पूर्वा उससे सिर्फ सहपाठी होने के नाते ही बातचीत करती है। पर आज………….
‘षायद…………षायद उसे नहीं बताती।’, पूर्वा ने कुछ क्षण रुककर कहा।
विषेड्ढ ने कुछ कहा नहीं पर उसके चेहरे पर एक सूक्ष्म मुस्कान छप गई।
‘कुछ किस्से ऐसे होते हैं जिनकी षुरूआत नहीं होती। घटनाएं घटती रहती हैं और किस्से बनते रहते हैं और हम कब उन किस्सों के हिस्से बन जाते हैं, एक मजबूत हिस्से, हमें मालूम ही नहीं होता।’, पूर्वा को समझ नहीं आ रहा था कि वह कहां से बताना षुरू करे लेकिन भूमिका उसने अच्छी बना दी। और विषेड्ढ को कुछ पल्ले नहीं पड़ा। वह भावहीन चेहरा बनाये कार चलाता रहा।
‘अच्छा विषेड्ढ, एक बात बता? क्या मैं बहुत सुन्दर हूं? ब्यूटीफुल?’, उसने ब्यूटीफुल पर बहुत जोर देते हुए पूछा।
‘रियली यू आर मोस्ट ब्यूटीफुल।’, विषेड्ढ ने बेहिचक कहा।
‘यही मेरा दुर्भाग्य है। खूबसूरत होना ही मेरी सजा है…………।’
‘क्या बकवास कर रही है तू?’ विषेड्ढ उलझनपूर्ण स्वर में बोला।
‘सच, सच कह रही हूं मैं। हम दो भाई और दो बहनें है। मैं सबसे छोटी हूं और सबसे गोरी, सबसे सुन्दर। मेरे बाकी भाई बहन साँवले या काले है और सुन्दर भी नहीं हैं। पैदा होने के कुछ समय बाद से ही मेरा दुर्भाग्य षुरू हो गया था। मेरे पूज्य पिताजी मुझसे नफरत करते थे। वे समझते थे कि मैं उनकी औलाद ही नहीं हूं क्योंकि मैं तीनों से अलग थी बल्कि मेरे मां बाप को मिलाकर पाँचों से अलग थी। उनके षक का कीड़ा इतना भयंकर था कि उन्होंने डीएनए टैस्ट भी करवाया। विज्ञान ने घोड्ढित कर दिया था कि मैं उनकी ही सन्तान थी लेकिन फिर भी सभी के मन में कोई काँटा चुभा रह गया…………।’
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेगी?’
पूर्वा ने इन्कार में गर्दन हिलाई।
‘एक जोक था जो मुझे याद आ गया। बिल्कुल………..’
‘यहां मैं इतनी सीरियस बात कर रही हूं और तुझे जोक याद आ रहा है।’, उसने असहाय भाव से उसकी बात काटते हुए कहा।
‘यार, जोक नहीं सुना रहा। मैं सिर्फ ये कहना चाह रहा था कि क्या तेरे पापा ने बाकी भाई बहनों का भी डीएनए टैस्ट कराया था?’
‘षायद……….कराया हो, मुझे पक्का नहीं पता।’, पूर्वा अनिष्चय स्वर में बोली, ‘लेकिन मेरा तो कन्फर्म है। मेरे भाई बहन मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं करते। अगर सीधे और साफ षब्दों में कहा जाये तो मुझसे नफरत करते हैं क्योंकि मैं उनसे अलग हूं, सुन्दर हूं। दूसरे लोग उनकी अपेक्षा मुझे अधिक पसन्द करते हैं और षायद यही वजह है जो मैं यहां नोयडा में हूं। उनसे दूर।’
विषेड्ढ ने पूर्वा को देखा। वह कहीं खो गई थी। इस समय वह बिल्कुल अजनबी लग रही थी। कार चलाते-चलाते वह कभी सामने देखता तो कभी पूर्वा को।
‘पता है, आज किसकी षादी है?’
विषेड्ढ ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला पर तुरन्त ही बन्द कर लिया और इन्कार में सिर हिलाया।
‘मेरी बहन की।’ पूर्वा ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
वह कुछ समझ तो गया था लेकिन फिर भी आष्चर्य प्रकट करता हुआ बोला, ‘अच्छा! कमाल है, घर में मैरिज है और तुझे षामिल भी नहीं किया। यार, इतनी नफरत तो नहीं होनी चाहिए।’
पूर्वा खामोष सामने देखती रही।
‘अब किसने बताया तुझे?’
‘मेरी कजन ने।’
‘घरवालों को पता है तू आ रही है?’
‘नहीं।’, पूर्वा की आँखों में आंसू आ गये।
‘कूल यार। सब ठीक हो जायेगा।’, वह आष्वासनपूर्ण स्वर में बोला, ‘वैसे क्यों नहीं बताया तुझे?’
‘बताया तो, मैं बहुत खूबसूरत जो हूं। बड़ी अजीब बात है कि दीदी को जो भी देखने आता था वह मुझे देखते ही मेरे पीछे पड़ जाता था। एक बार तो मैं लड़ भी पड़ी थी। इस वजह से दीदी में काॅम्पलैक्स आ गया था और वह मुझसे हमेषा चिड़ी रहती थी। मेरे दोनों भाई भी ऐसे ही हो गये। पर मेरे साथ तो और भी महाभारत है न कि मेरे मां बाप भी मेरे नहीं है……………।’
शाम पाँच बजे, नोयडा सिटी सेन्टर माॅल
‘बोल वन्दना क्या आफत आ गई? बार बार क्यों फोन कर रही है?’, पूर्वा ने झल्लाये स्वर में फोन पर कहा।
‘तू बार-बार फोन क्यों काट रही थी? कहीं स्पेषल तैयार हो रही है क्या?’
‘मैं मूवी देख रही हूं। तेरा बार-बार फोन आ रहा था इसलिए बाहर आई हूं और ये स्पेषल तैयार क्या है? तेरी बारात आ रही है क्या?’
‘मेरी क्यों आयेगी? और……’
‘तो?’, पूर्वा ने बात काटी।
‘…..और तू मूवी देख रही है! आज बेला की षादी है और तू मूवी देख रही है?’, वन्दना का आष्चर्यमिश्रित स्वर उसके कानों में पड़ा।
‘दोबारा बोल, किसकी षादी हो रही है?, पूर्वा ने उलझनपूर्ण स्वर में पूछा।
‘बेला की। बेला की षादी हो रही है। तेरी बड़ी बहन की। तुझे नहीं पता क्या?’
‘दिमाग खराब हो गया क्या तेरा। दोपहर में वोदका मत पिया कर, दिमाग खराब हो जाता है।’
‘वोदका, रम, बीयर सारी चीजें तू पी के बैठी है, जो तुझे नहीं पता कि आज बेला की षादी है।’, वन्दना की तीव्र आवाज उसके कानों में पड़ रही थी।
‘तू सच कह रही है क्या?’, पूर्वा धीमे और अनिष्चय स्वर में बोली।
‘मैं तुझसे क्यों झूठ बोलूंगी। मैं बेला के साथ आई हूं ब्यूटी पार्लर में। वो अन्दर तैयार हो रही है।’, वन्दना अभी भी हैरानी से बोल रही थी, ‘तुझे सचमुच नहीं पता कि आज उसकी षादी है?’
पूर्वा से कुछ कहा नहीं गया लेकिन उसने इन्कार में गर्दन हिलायी। उसे ये भी ध्यान नहीं था कि उसकी हिलती गर्दन वन्दना को नहीं दिखाई देगी।
‘पूर्वा?……पूर्वा? सुन रही है?’, वन्दना का व्याकुल स्वर उसे सुनाई दिया।
‘मैं तेरे से बाद में बात करती हूं……….’, उसका स्वर रुआंसा सा हो गया और उसने फोन काट दिया।
उसे एकाएक समझ नहीं आया कि वह क्या करे? सिनेमा हाॅल के बन्द दरवाजे के पास वह खड़ी थी। वह गौतम के साथ ‘बदलापुर’ मूवी देखने आई थी। उसने एक बार बन्द दरवाजे को देखा और फिर बाहर की ओर चल दी। सिनेमा हाॅल के बाहर माॅल के काॅरिडोर की रेलिंग के पास जाकर वह रुक गई। उसे गहरा आघात लगा था। उसे सूझ नहीं रहा था कि वह सबसे पहले किसे फोन करे? बेला को? अपनी मां को या पिता को? वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं कि आज उसकी बहन की षादी हो रही है और उसे बताया तक नहीं। वन्दना, जो उसकी कजन है, तक को पता है यानि सबको पता है सिर्फ उसे छोड़कर। माॅल की तीसरी मंजिल से वह नीचे की चहल-पहल को देखते हुए भी नहीं देख रही थी। आखिरकार, उसने बेला को फोन लगाया। घण्टी जाती रही, जाती रही लेकिन उसने फोन नहीं उठाया। गुस्से और निराषा ने उसके चेहरे पर अपना अधिकार जमा लिया। फिर उसने अपनी मां को फोन लगाया। मां ने भी फोन नहीं उठाया।
‘अब पापा को करूं?’, वह खुद से बोली।
उसने फोन की स्क्रीन अपनी आँखों के आगे की ही थी कि गौतम का फोन आ गया। वह अभी उससे बात करने की स्थिति में नहीं थी, उसने फोन काट दिया।
उसने वापस वन्दना को फोन लगाया।
‘हां बोल?’, उसे वन्दना की आवाज सुनाई दी।
‘अभी दीदी कहां है?’
‘उसका मेकअप चल रहा है।’
‘षायद तभी मेरा फोन नहीं उठा रही है। तूने उसे बता दिया कि तेरी मेरी बात हुई है?’
‘नहीं। पता नहीं क्यों मुझे लगा कि नहीं बताना चाहिए।’
‘तू मेरी उससे बात करा सकती है?’, पूर्वा ने संयत स्वर में कहा।
दूसरी ओर खामोषी रही।
‘क्या हुआ?’
‘यार, मैं सोच रही हूं कि बात कराना ठीक रहेगा क्या? ऐसे तो उसे पता चल जायेगा कि मैंने तुझे षादी के बारे में बताया है तो…..तो मेरा क्या होगा? पता नहीं उन लोगों ने क्या सोचा हुआ है?’, वन्दना का चिन्तित स्वर उसे सुनाई दिया।
‘तू सही कह रही है। रहने दे।’, उसने कहा।
‘वैसे, ये तो गलत बात है कि सगी बहन की षादी है और तुझे न बताया गया और न बुलाया गया। एंगेजमेन्ट वाली कहानी रिपीट न हो षायद इसलिए तो नहीं……..। तू कहां है अभी, नोयडा में?’
‘हां, और कहां होऊंगी?’, उसका स्वर हल्का सा रुआंसा हो गया।
‘अब तू आ रही है क्या?’, वन्दना ने षायद उसके रुआंसेपन को महसूस किया क्योंकि उसकी आवाज भी भीगने लगी थी।
‘पता नहीं। वैसे षादी हो कहां रही है? घर पर या कहीं और?
‘कापसहेड़ा के एक फार्म हाउस में। नाम मुझे ध्यान नहीं है। मैं बाद में तुझे वेन्यु मैसेज कर दूंगी।’
‘ओके पर ये सीक्रेट रहेगा कि तेरी मेरी बात हुई है।’
‘बिल्कुल। और मैं क्यों कहूंगी?’, वन्दना ने आष्वासनपूर्ण स्वर में कहा। उसकी चैन भरी सांस भी पूर्वा को सुनाई दी।
जब पूर्वा ने फोन काटा तो गौतम उसके सामने खड़ा था। उसका उतरा हुआ चेहरा देखकर वह धीरे से बोला, ‘क्या हुआ? एनीथिंग सीरियस?’
पूर्वा ने सहमति में गर्दन हिलाई।
‘क्या?’, कहते हुए उसने ढेर सारी बातें सोच ली।
आज बहुत दिनों की कोषिष के बाद गौतम पूर्वा को राजी कर पाया था। पहले मूवी का प्रोग्राम था फिर उसके बाद वह उसे अपने फ्लैट में ले जाने वाला था जहां उसने सिर्फ दोनों के लिए पार्टी का इन्तजाम किया हुआ था और आखिर में उसे रात को रुकने के लिए भी राजी कर लिया था। उसे सिर्फ रात का इन्तजार था मगर अब ‘क्या’ कहते हुए उसे लग रहा था कि प्रोग्राम खटाई में पड़ चुका है।
‘मुझे अभी घर जाना पड़ेगा?’, पूर्वा ने अपराधी भाव से कहा।
‘और पार्टी का क्या होगा?’ और इस फिल्म का?’, गौतम झल्लाते हुए बोला।
‘मैं रुक नहीं सकती, बहुत अरजेन्ट है यार।’, उसका स्वर रुआंसा हो उठा।
‘कुछ बतायेगी?’, गुस्से को मुष्किल से काबू करते हुए उसने पूछा।
‘लम्बी कहानी है, मैं तुझे आकर बताउंगी। मुझे जल्दी से हाॅस्टल छोड़ दे।’
‘यार, मूवी तो देख ले। बहुत इन्ट्रस्टिंग मूवी है।’
‘अरे नहीं रुक सकती। अगली बार मैं तुझे दिखा दूंगी। अब चल जल्दी।’, पूर्वा एस्केलेटर की ओर बढ़ी।
गौतम ने कुछ नहीं कहा और मरी हुई चाल से उसके पीछे चलने लगा। साला, लक ही खराब है। यहां टिकट के पैसे और वहां दारू के पैसे सब बरबाद गये।
‘क्विक यार।’, पूर्वा उसकी ओर मुड़कर चिल्लाई।
षाम सवा पाँच बजे, राजौरी गार्डन, दिल्ली
रीता अपना फोन चैक कर रही थी। तीन मिस काॅल थी जिनमें एक पूर्वा की थी। तो क्या उसे पता चल गया? उसका दिल जोर से धड़का। वह फौरन बाहर की ओर भागी। बाहर बरामदे में आकाष फेरों पर दिया जाने वाला सामान पैक करा रहा था।
‘सुनो।’, रीता विचलित स्वर में आकाष से बोली।
‘बोलो।’, बिना रीता की ओर देखे आकाष ने कहा।
‘पूर्वा की मिस काॅल है मेरे फोन पर।’, रीता आगे को झुकी और इतने धीमे स्वर में कहा कि वहां मौजूद अन्य लोग न सुन सकें।
पूर्वा का नाम सुनते ही आकाष रुक गया। ‘तुम अन्दर चलो मैं आता हूं।’, आकाष ने भी धीमे स्वर में कहा।
कुछ क्षण बाद।
‘हमें उसे बता देना चाहिए था। मुझे लगता है उसे मालूम हो गया है।’, रीता व्याकुल स्वर में बोली।
‘कैसे मालूम हो गया? सिर्फ काॅल आने से?’, आकाष ने कहा, ‘मुझे नहीं लगता।’
‘मैं बुला लूं अब उसे? तुम्हें कुछ कहे न कहे मुझे सारी जिन्दगी कहेगी वो। मां जो हूं।’
‘देखो, इस बारे में हम पहले ही फैसला कर चुके हैं। दूध का जला हूं मैं, पता है न पिछली दो बार क्या हुआ था। पूर्वा को देखते ही दो रिष्ते टूट गये थे और एक तो ऐन सगाई के समय। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता। और तो और अब तो खुद बेला भी नहीं चाहती कि पूर्वा आये।’, आकाष दृढ़ता से बोला।
रीता असहाय थी। पूर्वा के कारण बेला के दो रिष्ते टूट गये थे। लड़के वाले पूर्वा को देखते ही पूर्वा की बात करने लग जाते थे। बेला को कोई पसन्द ही नहीं करता था। इसलिए कुछ मौकों पर पूर्वा को बिना बताये बेला की दिखाई की जाती थी। पूर्वा को नोयडा पढ़ने भेजना भी रणनीति का हिस्सा था। दूर रहेगी तो कोई अड़चन नहीं आयेगी।
पिछली बार जिस दिन बेला की सगाई थी, पूर्वा को उसी दिन बुलाया गया था। मगर पूर्वा का परिचय मिलते ही बेला के होने वाले पति ने उसी दिन रिष्ता तोड़ दिया क्योंकि उसका कहना था कि उसके साथ धोखा हुआ है, पूर्वा को पहले क्यांे नहीं दिखाया गया। पूर्वा भी हैरान थी लेकिन क्या करे? अगर चारों भाई बहनों को एक साथ खड़ा कर दिया जाये तो वह अलग ही एलियन की तरह लगेगी या टाट में मखमल की तरह। उसकी खूबसूरती ही सबकी दुष्मन बन गयी थी।
‘अब…………..?’, रीता के मुँह से धीरे से निकला।
‘दिल पे पत्थर रखो। उसे कल बता देंगे।’, आकाष ने समझाने वाले भाव से कहा।
‘और अगर वह आ गई तो?’
रीता के इस कठोर प्रष्न का उत्तर उसके पति के पास नहीं था। वह बिना कुछ कहे बाहर चला गया।
षाम साढ़े पाँच बजे, एमिटी विष्वद्यिालय, नोयडा
पूर्वा चाहती थी कि गौतम उसके साथ दिल्ली उसके घर चले लेकिन पूर्वा ने उसे साथ चलने के लिए कहा नहीं। उसे तब और दुख हुआ जब गौतम ने भी कुछ नहीं कहा। क्या भाग्य है, आज तो कोई भी उसके साथ नहीं है। उसे मालूम है, गौतम काफी हद तक सैलफिष लड़का है। अभी वह उसके साथ मौज मस्ती करने के लिए राजी हो जाये तो चाँद तक भी जाने के लिए तैयार हो जायेगा। अपने मतलब बिना षायद वह कहीं नहीं जायेगा। फिर भी वह उसे पसन्द करती है, फिर भी वह उससे जुड़ी हुई है।
यहां उसके पास दो ही अच्छे फाॅरमल सूट थे। उसने एक पहन लिया। वह दुखी भी थी और उत्साहित भी। हालांकि पहले वह जीन्स पहनकर जाना चाह रही थी मगर षादी के माहौल के हिसाब से उसे ठीक नहीं लगा।
वार्डन को सूचित करने के बाद वह हाॅस्टल से बाहर निकली। वह एमिटी विष्वविद्यालय, नोयडा से फैषन डिजाइन का कोर्स कर रही है और अभी दूसरे वड्र्ढ मेें है। वह यहीं के हाॅस्टल में रहती है और हफ्ते दो हफ्ते में अपने घर राजौरी गार्डन दिल्ली में एक दो रातों के लिए रहने चली जाती है।
अभी वह कुछ दूर ही चली थी कि उसे विषेड्ढ दिखाई दिया। विषेड्ढ उसका सहपाठी है। विषेड्ढ ने भी उसे देख लिया और वह तेजी से चलता हुआ उसके पास आया।
‘क्या बात है आज तो बड़ा षानदार सूट पहना है। कहीं पार्टी है क्या?’, विषेड्ढ ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘तुझे चलना है पार्टी में?’, पूर्वा हल्का सा मुस्कुराई।
‘तू ले चलेगी?’
उसने सहमति में सिर हिलाया और कहा, ‘पार्टी नहीं है षादी है।’
‘क्या फर्क पड़ता है। तू रुक, मैं अभी दो मिनट में तैयार होकर आता हूं।’, वह उत्साहित स्वर में बोला। आज तो उसकी मन की मुराद पूरी हुई है। पूर्वा के साथ तो वह कहीं भी, कभी भी जाने के लिए तैयार है।
‘सुन, तू बाइक या कार का इन्तजाम कर सकता है क्या?’
‘हो जायेगा। तू बस पन्द्रह-बीस मिनट रुक। मैं तुझे तेरे हाॅस्टल के गेट पर मिलता हूं। ओके?’, विषेड्ढ ने जल्दी से कहा। उसे डर था कि कहीं पूर्वा अपना इरादा ना बदल दे।
‘हमें दिल्ली जाना पड़ेगा।’, पूर्वा ने हिचकते हुए कहा।
‘मुम्बई भी होता तो भी कोई प्राब्लम नहीं। बस, आइम कमिंग।’, उसने अंगूठा ऊपर उठाते हुए कहा और अपने हाॅस्टल की ओर चल पड़ा।
पूर्वा कुछ देर अनिष्चित सी खड़ी रही और वह भी वापस चलने लगी। विषेड्ढ से सिर्फ वह सहपाठी होने के नाते ही बात करती है लेकिन वह जानती है वह कहीं न कहीं एडवान्टेज लेने की कोषिष करता रहता है। यहां सब उसे मैंढक जैसी आँखों वाला लड़का कहते हैं क्योंकि उसकी आँखे बड़ी-बड़ी और बाहर को निकली हुई हैं जैसी मैंढक की निकली होती हैं। पूर्वा को न जाने क्यों हमेषा भय लगा रहता है कि अगर कभी विषेड्ढ अधिक उत्तेजित या क्रोधित हुआ तो उसकी आँखें बाहर टपक पड़ेगीं।
षाम सवा छह बजे
कार दिल्ली की तरफ दौड़ रही थी। पहले वह बाइक ला रहा था पर सर्दी में बाइक पर बुरा हाल हो जाता है। वैसे बाइक पर उसे पूर्वा का लगातार स्पर्ष मिलता रहता मगर दोनों के कपड़ों और चेहरों का सत्यानाष हो जाता। इसके विपरीत कार में हुलिया और कपड़े सही सलामत रहते है और सर्दी से भी बचाव हो जाता है, साथ ही बातचीत भी बेरोकटोक चलती रहती है जो बाइक पर सम्भव नहीं हो पाती।
‘एक बात पूछूं?’
‘क्या?’ पूर्वा ने सामने सड़क पर देखते हुए कहा।
‘तू उदास क्यों हैं आज?’
‘हां उदास तो हूं। अगर वजह बताउंगी तो तू हिल जायेगा।’, पूर्वा ने खाली आँखों से उसे देखा।
विषेड्ढ ने उसकी खाली आँखें देखी। देखने के साथ ही हल्का सा उसका हाथ चक्के पर काँपा। कितना कुछ था इन खाली आँखों में। वह तो पहले ही हिल गया।
‘मैंने ये बात किसी से षेयर नहीं की। हमेषा खुद ही भीतर घुटती रही। पर आज हालात ऐसे बन गये हैं कि आज षेयर करना चाहती हूं। तुझसे।’
‘और अगर गौतम होता तो?’, उसे पूर्वा और गौतम की नजदीकियां मालूम हैं। काॅलेज में ये सब चलता है। एक दूसरे की गर्लफ्रैन्ड काटने का मजा ही कुछ और है। वैसे उसे मालूम है कि पूर्वा उससे सिर्फ सहपाठी होने के नाते ही बातचीत करती है। पर आज………….
‘षायद…………षायद उसे नहीं बताती।’, पूर्वा ने कुछ क्षण रुककर कहा।
विषेड्ढ ने कुछ कहा नहीं पर उसके चेहरे पर एक सूक्ष्म मुस्कान छप गई।
‘कुछ किस्से ऐसे होते हैं जिनकी षुरूआत नहीं होती। घटनाएं घटती रहती हैं और किस्से बनते रहते हैं और हम कब उन किस्सों के हिस्से बन जाते हैं, एक मजबूत हिस्से, हमें मालूम ही नहीं होता।’, पूर्वा को समझ नहीं आ रहा था कि वह कहां से बताना षुरू करे लेकिन भूमिका उसने अच्छी बना दी। और विषेड्ढ को कुछ पल्ले नहीं पड़ा। वह भावहीन चेहरा बनाये कार चलाता रहा।
‘अच्छा विषेड्ढ, एक बात बता? क्या मैं बहुत सुन्दर हूं? ब्यूटीफुल?’, उसने ब्यूटीफुल पर बहुत जोर देते हुए पूछा।
‘रियली यू आर मोस्ट ब्यूटीफुल।’, विषेड्ढ ने बेहिचक कहा।
‘यही मेरा दुर्भाग्य है। खूबसूरत होना ही मेरी सजा है…………।’
‘क्या बकवास कर रही है तू?’ विषेड्ढ उलझनपूर्ण स्वर में बोला।
‘सच, सच कह रही हूं मैं। हम दो भाई और दो बहनें है। मैं सबसे छोटी हूं और सबसे गोरी, सबसे सुन्दर। मेरे बाकी भाई बहन साँवले या काले है और सुन्दर भी नहीं हैं। पैदा होने के कुछ समय बाद से ही मेरा दुर्भाग्य षुरू हो गया था। मेरे पूज्य पिताजी मुझसे नफरत करते थे। वे समझते थे कि मैं उनकी औलाद ही नहीं हूं क्योंकि मैं तीनों से अलग थी बल्कि मेरे मां बाप को मिलाकर पाँचों से अलग थी। उनके षक का कीड़ा इतना भयंकर था कि उन्होंने डीएनए टैस्ट भी करवाया। विज्ञान ने घोड्ढित कर दिया था कि मैं उनकी ही सन्तान थी लेकिन फिर भी सभी के मन में कोई काँटा चुभा रह गया…………।’
‘एक बात कहूं, बुरा तो नहीं मानेगी?’
पूर्वा ने इन्कार में गर्दन हिलाई।
‘एक जोक था जो मुझे याद आ गया। बिल्कुल………..’
‘यहां मैं इतनी सीरियस बात कर रही हूं और तुझे जोक याद आ रहा है।’, उसने असहाय भाव से उसकी बात काटते हुए कहा।
‘यार, जोक नहीं सुना रहा। मैं सिर्फ ये कहना चाह रहा था कि क्या तेरे पापा ने बाकी भाई बहनों का भी डीएनए टैस्ट कराया था?’
‘षायद……….कराया हो, मुझे पक्का नहीं पता।’, पूर्वा अनिष्चय स्वर में बोली, ‘लेकिन मेरा तो कन्फर्म है। मेरे भाई बहन मुझे बिल्कुल पसन्द नहीं करते। अगर सीधे और साफ षब्दों में कहा जाये तो मुझसे नफरत करते हैं क्योंकि मैं उनसे अलग हूं, सुन्दर हूं। दूसरे लोग उनकी अपेक्षा मुझे अधिक पसन्द करते हैं और षायद यही वजह है जो मैं यहां नोयडा में हूं। उनसे दूर।’
विषेड्ढ ने पूर्वा को देखा। वह कहीं खो गई थी। इस समय वह बिल्कुल अजनबी लग रही थी। कार चलाते-चलाते वह कभी सामने देखता तो कभी पूर्वा को।
‘पता है, आज किसकी षादी है?’
विषेड्ढ ने कुछ कहने के लिए मुँह खोला पर तुरन्त ही बन्द कर लिया और इन्कार में सिर हिलाया।
‘मेरी बहन की।’ पूर्वा ने उसकी ओर देखते हुए कहा।
वह कुछ समझ तो गया था लेकिन फिर भी आष्चर्य प्रकट करता हुआ बोला, ‘अच्छा! कमाल है, घर में मैरिज है और तुझे षामिल भी नहीं किया। यार, इतनी नफरत तो नहीं होनी चाहिए।’
पूर्वा खामोष सामने देखती रही।
‘अब किसने बताया तुझे?’
‘मेरी कजन ने।’
‘घरवालों को पता है तू आ रही है?’
‘नहीं।’, पूर्वा की आँखों में आंसू आ गये।
‘कूल यार। सब ठीक हो जायेगा।’, वह आष्वासनपूर्ण स्वर में बोला, ‘वैसे क्यों नहीं बताया तुझे?’
‘बताया तो, मैं बहुत खूबसूरत जो हूं। बड़ी अजीब बात है कि दीदी को जो भी देखने आता था वह मुझे देखते ही मेरे पीछे पड़ जाता था। एक बार तो मैं लड़ भी पड़ी थी। इस वजह से दीदी में काॅम्पलैक्स आ गया था और वह मुझसे हमेषा चिड़ी रहती थी। मेरे दोनों भाई भी ऐसे ही हो गये। पर मेरे साथ तो और भी महाभारत है न कि मेरे मां बाप भी मेरे नहीं है……………।’