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शादी वाला घर और पूरे शबाब पर चुदाई
22 नवम्बर की रात को मैंने दिल्ली से जालंधर जाने के लिए बस पकड़ी। रात का सफर थोड़ा सुविधाजनक भी था क्यूंकि लम्बा सफर था। दिल्ली बस स्टैंड से निकलने के बाद करीब आधे घंटे में बस करनाल बाईपास पर पहुँची तो कुछ सवारियाँ बस में चढ़ी। मैंने देखा की उन सवारियों में दो महिलायें थी। मेरे बगल में एक सीट खाली थी तो मन में सोचा कि इन में से अगर एक मेरे पास बैठ जाए तो सफर का आनन्द आ जाए।
भगवान ने मेरी मुराद पूरी की और वो करीब पच्चीस छब्बीस साल की गदराए बदन की मालकिन मेरे पास आकर बैठ गई। मैं तो उसको देखता ही रह गया। क्या फुरसत से घड़ा था ऊपर वाले ने उसको। एक एक अंग जैसे सांचे में ढाल कर चिपकाया गया था। सबसे पहले नजर चेहरे पर गई। एकदम गोरा रंग, बड़ी बड़ी गोल गोल आँखें, सुतवाँ नाक और गुलाब की पंखुड़ियों जैसे गुलाबी गुलाबी होंठ जो उसकी खूबसूरती को चार चार चंद लगा रहे थे।
नजर जैसे ही थोड़ा और नीचे गई तो दिल धाड़-धाड़ बजने लगा। दिल की धड़कने तेज हो गई जब मेरी नजर उस हसीना की छाती की शोभा बढ़ाती उसकी चूचियों पर गई। आप तो जानते ही हैं कि मैंने पहले ही बहुत सी चू्तों और चूतवालियों को चखा हुआ है पर यकीनन यह उन सबसे ऊपर के दर्जे की खूबसूरत क़यामत थी।
अभी मैं उसकी खूबसूरती में ही खोया हुआ था कि टिकट कंडेक्टर टिकट काटने आ गया। मेरे अंदर यह लालसा जाग गई कि देखूँ यह क़यामत कब तक मेरे सानिध्य को सुशोभित करेगी। और जब उसने जालंधर के दो टिकेट माँगे तो मैं ऊपर वाले की मेहरबानी पर नतमस्तक हो गया।
सफर शुरू हुआ, बस अपनी गति से चल रही थी पर मेरे दिल की धड़कन उस से कहीं ज्यादा तेज चल रही थी। मैं तो उस हसीना की खूबसूरती में खोया हुआ था, तभी वो मुझ से मुखातिब होकर बोली– आप कहाँ तक जा रहे हैं?
"मैं जालंधर तक जा रहा हूँ !" मैंने जवाब दिया।
फिर तो जैसे बातचीत का सिलसिला चल निकला। बातों ही बातों में उसने बताया कि वो भी जालंधर एक शादी में शामिल होने जा रही है। बातों बातों में कब पानीपत आ गया पता ही नहीं चला। पानीपत से बस चली तो रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। तभी उसने मुझसे मेरा मोबाइल माँगा क्यूंकि उसके मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी। उसने एक नम्बर मिला कर बात की और बताया कि वो सुबह चार बजे तक पहुँच जाएगी।
उसने मुझे मेरा फोन वापिस किया और बोली– आपका नाम राज है?
"हाँ.. आपको कैसे पता?"
"क्या आप विक्रम की शादी में जा रहे हैं?"
"हाँ.. पर आपको यह सब कैसे पता?"
मैं हैरान था कि तभी मैंने फोन में डायल किया हुआ नम्बर देखा तो उस हसीना ने विक्रम का ही नम्बर डायल किया हुआ था। मुझे सारा माजरा समझ में आ गया था।
"आप विक्रम की क्या लगती हैं?"
"विक्रम मेरे मामा जी का बेटा है" उसने जवाब दिया।
"ओह... तो आप विक्रम के बुआ की बेटी महक हैं?"
"नहीं... महक मेरी छोटी बहन का नाम है.. मैं पायल हूँ... महक वो आगे बैठी है।" उसने अपना परिचय दिया।
फिर काफी देर तक हम बातें करते रहे और करीब साढ़े बारह बजे बस पिपली बस स्टैंड पर रुकी और ड्राईवर चाय पीने चला गया। पायल उठी और मुझे बोली- प्लीज, मेरे साथ चलो, मुझे टॉयलेट जाना है।
बाहर अँधेरा था तो मैं उसके साथ चल दिया। बाथरूम की तरफ गए तो देखा उस पर ताला लटका हुआ था। मैंने उसे कहा कि वो उधर अँधेरे में जाकर फ्रेश हो ले।
पहले तो वो डर के मारे मना करती रही पर फिर वो मुझ से थोड़ी दूरी पर ही अपनी सलवार और पेंटी नीचे करके पेशाब करने लगी। हल्की हल्की लाइट में उसके गोरे गोरे कूल्हे संगमरमर की तरह चमक उठे थे जिन्हें मैं देखता ही रह गया।
22 नवम्बर की रात को मैंने दिल्ली से जालंधर जाने के लिए बस पकड़ी। रात का सफर थोड़ा सुविधाजनक भी था क्यूंकि लम्बा सफर था। दिल्ली बस स्टैंड से निकलने के बाद करीब आधे घंटे में बस करनाल बाईपास पर पहुँची तो कुछ सवारियाँ बस में चढ़ी। मैंने देखा की उन सवारियों में दो महिलायें थी। मेरे बगल में एक सीट खाली थी तो मन में सोचा कि इन में से अगर एक मेरे पास बैठ जाए तो सफर का आनन्द आ जाए।
भगवान ने मेरी मुराद पूरी की और वो करीब पच्चीस छब्बीस साल की गदराए बदन की मालकिन मेरे पास आकर बैठ गई। मैं तो उसको देखता ही रह गया। क्या फुरसत से घड़ा था ऊपर वाले ने उसको। एक एक अंग जैसे सांचे में ढाल कर चिपकाया गया था। सबसे पहले नजर चेहरे पर गई। एकदम गोरा रंग, बड़ी बड़ी गोल गोल आँखें, सुतवाँ नाक और गुलाब की पंखुड़ियों जैसे गुलाबी गुलाबी होंठ जो उसकी खूबसूरती को चार चार चंद लगा रहे थे।
नजर जैसे ही थोड़ा और नीचे गई तो दिल धाड़-धाड़ बजने लगा। दिल की धड़कने तेज हो गई जब मेरी नजर उस हसीना की छाती की शोभा बढ़ाती उसकी चूचियों पर गई। आप तो जानते ही हैं कि मैंने पहले ही बहुत सी चू्तों और चूतवालियों को चखा हुआ है पर यकीनन यह उन सबसे ऊपर के दर्जे की खूबसूरत क़यामत थी।
अभी मैं उसकी खूबसूरती में ही खोया हुआ था कि टिकट कंडेक्टर टिकट काटने आ गया। मेरे अंदर यह लालसा जाग गई कि देखूँ यह क़यामत कब तक मेरे सानिध्य को सुशोभित करेगी। और जब उसने जालंधर के दो टिकेट माँगे तो मैं ऊपर वाले की मेहरबानी पर नतमस्तक हो गया।
सफर शुरू हुआ, बस अपनी गति से चल रही थी पर मेरे दिल की धड़कन उस से कहीं ज्यादा तेज चल रही थी। मैं तो उस हसीना की खूबसूरती में खोया हुआ था, तभी वो मुझ से मुखातिब होकर बोली– आप कहाँ तक जा रहे हैं?
"मैं जालंधर तक जा रहा हूँ !" मैंने जवाब दिया।
फिर तो जैसे बातचीत का सिलसिला चल निकला। बातों ही बातों में उसने बताया कि वो भी जालंधर एक शादी में शामिल होने जा रही है। बातों बातों में कब पानीपत आ गया पता ही नहीं चला। पानीपत से बस चली तो रात के करीब ग्यारह बज चुके थे। तभी उसने मुझसे मेरा मोबाइल माँगा क्यूंकि उसके मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी। उसने एक नम्बर मिला कर बात की और बताया कि वो सुबह चार बजे तक पहुँच जाएगी।
उसने मुझे मेरा फोन वापिस किया और बोली– आपका नाम राज है?
"हाँ.. आपको कैसे पता?"
"क्या आप विक्रम की शादी में जा रहे हैं?"
"हाँ.. पर आपको यह सब कैसे पता?"
मैं हैरान था कि तभी मैंने फोन में डायल किया हुआ नम्बर देखा तो उस हसीना ने विक्रम का ही नम्बर डायल किया हुआ था। मुझे सारा माजरा समझ में आ गया था।
"आप विक्रम की क्या लगती हैं?"
"विक्रम मेरे मामा जी का बेटा है" उसने जवाब दिया।
"ओह... तो आप विक्रम के बुआ की बेटी महक हैं?"
"नहीं... महक मेरी छोटी बहन का नाम है.. मैं पायल हूँ... महक वो आगे बैठी है।" उसने अपना परिचय दिया।
फिर काफी देर तक हम बातें करते रहे और करीब साढ़े बारह बजे बस पिपली बस स्टैंड पर रुकी और ड्राईवर चाय पीने चला गया। पायल उठी और मुझे बोली- प्लीज, मेरे साथ चलो, मुझे टॉयलेट जाना है।
बाहर अँधेरा था तो मैं उसके साथ चल दिया। बाथरूम की तरफ गए तो देखा उस पर ताला लटका हुआ था। मैंने उसे कहा कि वो उधर अँधेरे में जाकर फ्रेश हो ले।
पहले तो वो डर के मारे मना करती रही पर फिर वो मुझ से थोड़ी दूरी पर ही अपनी सलवार और पेंटी नीचे करके पेशाब करने लगी। हल्की हल्की लाइट में उसके गोरे गोरे कूल्हे संगमरमर की तरह चमक उठे थे जिन्हें मैं देखता ही रह गया।