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शापित राजकुमारी
लेखक
विनोद महर्षि "अप्रिय"
प्राचीन चन्द्रपुरी राज्य में एक अनुशाषित एवं प्रजावत्सल राजा वैभवराज हुए। वैभवराज का राज्य हर तरह से खुशहाल राज्य था। वैभवराज के दरबारी विद्वानों में एक विद्वान विशम्भर थे। जो अत्यंत प्रचंड विद्वान थे। राज दरबार मे उनका कद राजा के बाद सबसे बड़ा होता था। राजा का सेनापती चक्रधर थे जो युद्धकला में प्रखर थे एवं कुशल रणनीतिज्ञ थे।
शाही परिवार में रानी तारामती थी। जो राजा की हर सम्भव राज काज में सहायता करती थी। प्रतिदिन राज दरबार मे राजा प्रजा की समस्याओं का निपटारा करते थे और तारामती हर सम्भव अपने विचारों से राजा की सहायता करती। हर प्रकार से वैभवराज का राज्य सम्पन्न था। इस कमी थी तो वैभवराज के कोई संतान नही थी। विवाह के कई वर्ष बीत जाने पर भी जब राजा के कोई संतान नही हुई तो राज परिवार के साथ साथ प्रजा को भी चिंता होने लगी।
राजगद्दी का अगला उत्तराधिकारी कौन होगा? यह प्रसन्न अक्सर राजा और रानी को चिंतित करता था। लेकिन रानी तारामती हमेशा राजा को यह कहकर ढांढस बंधाती की जब तक हम है प्रजा को कोई समस्या नही होने देंगे। और फिर भगवान हमारे साथ इतना गलत नही करेगा। आप बस सब्र रखिये सब्र का फल मीठा होता है।
रानी की बात वैभवराज मान लेता था मगर फिर भी प्रजा की चिंता में वो हमेशा उदास रहता कि मेरे बाद प्रजा को कौन संभालेगा। पड़ोसी राजा जो कि एक क्रूर शासक था वो हमेशा ही चन्द्रपुरी पर राज करने का सपना देखता रहता था। लेकिन चक्रधर की रणनीति और सेना के पराक्रम के सामने उसकी हिम्मत नही होती थी। चन्द्रपुरी की सेना के बहादुरी के किस्से कोने कोने में फैले थे।
एक तरफ़ चक्रधर और सेना का शौर्य था तो दूरी तरफ विशम्भर का ज्ञान जो राजा को हर समस्या से निपटने में बहुत सहायक थे। चक्रधर के एक पुत्र था जिसको वो हमेशा सेना के शिविर में ले जाते और बहादुर सैनिकों के किस्से सुनाते तथा शस्त्र विधा सिखाते। चक्रधर का पुत्र कार्तिक जल्द ही शस्त्र विधा में पारंगत होता जा रहा था। अपने पिता के गुण वो बखूबी अपना रहा था।
दरबारी विद्वान के भी एक पुत्र था, मार्तण्ड। मार्तण्ड भी अपने पिता की तरह बहुत बुद्धिमान था। विशम्भर ने अपने पुत्र को शास्त्र विद्या का अध्धयन करने काशी भेज हुआ था।
सन्तान ना होने के कारण राजा अकेले में अक्सर सोचता कि काश चक्रधर और विशम्भर की तरह मेरा भी एक पुत्र होता जिसको में हर तरह से हर विद्या में पारंगत करता और राज्य की कुशहाली के लिए उसे राजगद्दी पर बैठाता। राजा की यह उदासी सिर्फ तारामती ही दूर कर सकती थी जो हमेशा करती भी थी।
एक दिन विशम्भर ने राजा को बताया कि विराटनगर में एक देवी है जो सबकी मनोकामना पूरी करती है। आप वहां के राजा से अनुमति लेकर देवी के दर्शन कीजिये और प्रार्थना कीजिये।
विशम्भर की हर बात सच होती थी तो राजा को उन पर पूरा भरोसा था। विराटनगर के राजा से अनुमति लेकर वैभवराज देवी की पूजा अर्चना करता है और मन्नत मांगता है। एक वर्ष बाद राजा के जुड़वां सन्तान होती है। एक लड़का एयर एक लड़की।।।
शाही परिवार और समस्त राज्य उल्लास से नाचने गाने लगे। आखिर राजा को सन्तान सुख जो मिल गया। राज्य में उत्सव सा मनाने लगे। शाही परिवार ने प्रजा के लिए शाही भोज का आयोजन किया।
रानी तारामती और वैभवराज बहुत खुश थे। समय अब हंसी खुशी में व्यतीत होने लगा। राजकुमार विजयराज और राजकुमारी चन्द्रावती समय के साथ साथ बढ़ने लगे। और दोनो ही भाई बहन बहुत ही मेधावी निकले। बचपन मे ही राजकुमार का शास्त्र से प्रति लगाव था तो राजा ने विजयराज को आश्रम में अध्ययन के लिए भेजने का निर्णय किया। लेकिन रानी का मन बेटे से दूर होने की बात नही मान रहा था।
राजा ने समझाया और विजयराज को आश्रम में अध्ययन के लिए भेजा। जहां विशम्भर का पुत्र भी वहाँ पहले से ही शास्त्र अध्ययन कर रहा था। 7 वर्ष की उम्र में विजयराज काशी चला गया।
राजकुमारी बचपन से ही सस्तरों की शौकीन थी। जहां भी कटार तलवार या धनुष देखती उसे लेने के लिए रोने लगती, उनके साथ खेलती रहती। राजा ने सोचा कि राजकुमारी को यौद्धा बनाया जाये। विजयराज जब अध्ययन करके वापिस आएगा तो अपनी बहन से जरूरी शस्त्र विद्या भी सीख लेगा। जिस वय में बच्चे मिट्टी से खेलते है उस वय में राजकुमारी तलवार भाले, धनुष से खेलने लगी।
वक्त बीत रहा था, उधर आश्रम में बिना एक दूसरे की पहचान के विशम्भर का पुत्र और राजकुमार अच्छे दोस्त बन गए। आश्रम में सबकी पहचान गुप्त रखी जाती थी। ताकि किसी को एक दूसरे से कोई वैरभाव ना हो। इधर राजकुमारी धीरे धीरे अपने खेल को निपुणता में तब्दील करती गई।
समय की रफ्तार से शाही परिवार की खुशियां बढ़ने लगी। राजकुमारी अब तलवारबाजी और धनुर्विद्या का अध्ययन कर रही थी।भाई शास्त्र में तो बहन, शस्त्र में निपुण होते जा रहे थे। कुछ अलग था लेकिन वैभवराज खुश थे। वो चाहते थे कि राजकुमारी एक कुशल यौद्धा बने।
राज्य में हर वर्ष एक प्रतियोगिता होती थी। जिसमे निशानेबाजी और घुड़दौड़ होती थी। जो भी व्यक्ति 3 साल लगातार उसमें सफल होता था उसे सेनापति बना दिया जाता था। पहले वाले सेनापति को या तो कोई दूसरा पड़ मिलता या फिर उसको सेवानिवृत कर दिया जाता।
चक्रधर पिछले 10 वर्षों से सेनापति था। और वीरप्पा पिछले 2 सालों से उस प्रतियोगिता को जीत रहा था। वीरप्पा चक्रधर से ईर्ष्या रखता था। वीरप्पा सेनानायक था और एक कुशल यौद्धा भी था। वीरप्पा को सेनापति पड़ चाहिए था। उधर चक्रधर अपनी देखरेख में राजकुमारी को निशानेबाजी और घुड़सवारी के गुर सीखा रहा था। चक्रधर ने राजकुमारी में साहस को कूट कूट कर भर दिया था।
लेखक
विनोद महर्षि "अप्रिय"
प्राचीन चन्द्रपुरी राज्य में एक अनुशाषित एवं प्रजावत्सल राजा वैभवराज हुए। वैभवराज का राज्य हर तरह से खुशहाल राज्य था। वैभवराज के दरबारी विद्वानों में एक विद्वान विशम्भर थे। जो अत्यंत प्रचंड विद्वान थे। राज दरबार मे उनका कद राजा के बाद सबसे बड़ा होता था। राजा का सेनापती चक्रधर थे जो युद्धकला में प्रखर थे एवं कुशल रणनीतिज्ञ थे।
शाही परिवार में रानी तारामती थी। जो राजा की हर सम्भव राज काज में सहायता करती थी। प्रतिदिन राज दरबार मे राजा प्रजा की समस्याओं का निपटारा करते थे और तारामती हर सम्भव अपने विचारों से राजा की सहायता करती। हर प्रकार से वैभवराज का राज्य सम्पन्न था। इस कमी थी तो वैभवराज के कोई संतान नही थी। विवाह के कई वर्ष बीत जाने पर भी जब राजा के कोई संतान नही हुई तो राज परिवार के साथ साथ प्रजा को भी चिंता होने लगी।
राजगद्दी का अगला उत्तराधिकारी कौन होगा? यह प्रसन्न अक्सर राजा और रानी को चिंतित करता था। लेकिन रानी तारामती हमेशा राजा को यह कहकर ढांढस बंधाती की जब तक हम है प्रजा को कोई समस्या नही होने देंगे। और फिर भगवान हमारे साथ इतना गलत नही करेगा। आप बस सब्र रखिये सब्र का फल मीठा होता है।
रानी की बात वैभवराज मान लेता था मगर फिर भी प्रजा की चिंता में वो हमेशा उदास रहता कि मेरे बाद प्रजा को कौन संभालेगा। पड़ोसी राजा जो कि एक क्रूर शासक था वो हमेशा ही चन्द्रपुरी पर राज करने का सपना देखता रहता था। लेकिन चक्रधर की रणनीति और सेना के पराक्रम के सामने उसकी हिम्मत नही होती थी। चन्द्रपुरी की सेना के बहादुरी के किस्से कोने कोने में फैले थे।
एक तरफ़ चक्रधर और सेना का शौर्य था तो दूरी तरफ विशम्भर का ज्ञान जो राजा को हर समस्या से निपटने में बहुत सहायक थे। चक्रधर के एक पुत्र था जिसको वो हमेशा सेना के शिविर में ले जाते और बहादुर सैनिकों के किस्से सुनाते तथा शस्त्र विधा सिखाते। चक्रधर का पुत्र कार्तिक जल्द ही शस्त्र विधा में पारंगत होता जा रहा था। अपने पिता के गुण वो बखूबी अपना रहा था।
दरबारी विद्वान के भी एक पुत्र था, मार्तण्ड। मार्तण्ड भी अपने पिता की तरह बहुत बुद्धिमान था। विशम्भर ने अपने पुत्र को शास्त्र विद्या का अध्धयन करने काशी भेज हुआ था।
सन्तान ना होने के कारण राजा अकेले में अक्सर सोचता कि काश चक्रधर और विशम्भर की तरह मेरा भी एक पुत्र होता जिसको में हर तरह से हर विद्या में पारंगत करता और राज्य की कुशहाली के लिए उसे राजगद्दी पर बैठाता। राजा की यह उदासी सिर्फ तारामती ही दूर कर सकती थी जो हमेशा करती भी थी।
एक दिन विशम्भर ने राजा को बताया कि विराटनगर में एक देवी है जो सबकी मनोकामना पूरी करती है। आप वहां के राजा से अनुमति लेकर देवी के दर्शन कीजिये और प्रार्थना कीजिये।
विशम्भर की हर बात सच होती थी तो राजा को उन पर पूरा भरोसा था। विराटनगर के राजा से अनुमति लेकर वैभवराज देवी की पूजा अर्चना करता है और मन्नत मांगता है। एक वर्ष बाद राजा के जुड़वां सन्तान होती है। एक लड़का एयर एक लड़की।।।
शाही परिवार और समस्त राज्य उल्लास से नाचने गाने लगे। आखिर राजा को सन्तान सुख जो मिल गया। राज्य में उत्सव सा मनाने लगे। शाही परिवार ने प्रजा के लिए शाही भोज का आयोजन किया।
रानी तारामती और वैभवराज बहुत खुश थे। समय अब हंसी खुशी में व्यतीत होने लगा। राजकुमार विजयराज और राजकुमारी चन्द्रावती समय के साथ साथ बढ़ने लगे। और दोनो ही भाई बहन बहुत ही मेधावी निकले। बचपन मे ही राजकुमार का शास्त्र से प्रति लगाव था तो राजा ने विजयराज को आश्रम में अध्ययन के लिए भेजने का निर्णय किया। लेकिन रानी का मन बेटे से दूर होने की बात नही मान रहा था।
राजा ने समझाया और विजयराज को आश्रम में अध्ययन के लिए भेजा। जहां विशम्भर का पुत्र भी वहाँ पहले से ही शास्त्र अध्ययन कर रहा था। 7 वर्ष की उम्र में विजयराज काशी चला गया।
राजकुमारी बचपन से ही सस्तरों की शौकीन थी। जहां भी कटार तलवार या धनुष देखती उसे लेने के लिए रोने लगती, उनके साथ खेलती रहती। राजा ने सोचा कि राजकुमारी को यौद्धा बनाया जाये। विजयराज जब अध्ययन करके वापिस आएगा तो अपनी बहन से जरूरी शस्त्र विद्या भी सीख लेगा। जिस वय में बच्चे मिट्टी से खेलते है उस वय में राजकुमारी तलवार भाले, धनुष से खेलने लगी।
वक्त बीत रहा था, उधर आश्रम में बिना एक दूसरे की पहचान के विशम्भर का पुत्र और राजकुमार अच्छे दोस्त बन गए। आश्रम में सबकी पहचान गुप्त रखी जाती थी। ताकि किसी को एक दूसरे से कोई वैरभाव ना हो। इधर राजकुमारी धीरे धीरे अपने खेल को निपुणता में तब्दील करती गई।
समय की रफ्तार से शाही परिवार की खुशियां बढ़ने लगी। राजकुमारी अब तलवारबाजी और धनुर्विद्या का अध्ययन कर रही थी।भाई शास्त्र में तो बहन, शस्त्र में निपुण होते जा रहे थे। कुछ अलग था लेकिन वैभवराज खुश थे। वो चाहते थे कि राजकुमारी एक कुशल यौद्धा बने।
राज्य में हर वर्ष एक प्रतियोगिता होती थी। जिसमे निशानेबाजी और घुड़दौड़ होती थी। जो भी व्यक्ति 3 साल लगातार उसमें सफल होता था उसे सेनापति बना दिया जाता था। पहले वाले सेनापति को या तो कोई दूसरा पड़ मिलता या फिर उसको सेवानिवृत कर दिया जाता।
चक्रधर पिछले 10 वर्षों से सेनापति था। और वीरप्पा पिछले 2 सालों से उस प्रतियोगिता को जीत रहा था। वीरप्पा चक्रधर से ईर्ष्या रखता था। वीरप्पा सेनानायक था और एक कुशल यौद्धा भी था। वीरप्पा को सेनापति पड़ चाहिए था। उधर चक्रधर अपनी देखरेख में राजकुमारी को निशानेबाजी और घुड़सवारी के गुर सीखा रहा था। चक्रधर ने राजकुमारी में साहस को कूट कूट कर भर दिया था।