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शापित राजकुमारी

दरबार मे स्थान पाकर अब वीरप्पा के मष्तिष्क में कुटिलता दिनों दिन बढ़ने लगी। धीरे धीरे वीरप्पा ने अपने पुराने साथी सैनिकों से वापिस जान पहचान की उनको अपनी ताकत से परिचित करवाया। कुछ सैनिक वफादारी से तो कुछ डर से वीरप्पा का साथ देने के लिए तैयार हो गए।

उधर राजकुमार विजयराज की शिक्षा अब पूरी हो चुकी थी। अपने दोस्त पंडित के साथ वो अपने राज्य के लिए निकल गया। रास्ते मे दोनो दोस्तो ने अपनी अपनी विद्या के बारे में एक दूसरे को परिचय करवाया। पंडित पुत्र तंत्र विद्या में पारंगत था। तो विजयराज ने अपनी शास्त्र विद्या का ज्ञान भी पंडित पुत्र को दिया। दोनो में परिचय, होने के पश्चात पता चला कि दोनों के राज्य एक ही रास्ते मे आते है। खुशी खुशी एक साथ चले अपनी राह पर।

उधर राज्य में वीरप्पा अपनी योजना ने अनुरूप सैनिकों को अपनी तरफ करने में कामयाब हो रहा था। राजकुमारी के रूप वो शाही परिवार के प्रत्येक सदस्य को छल रहा था।

एक रोज राजकुमारी के रूप में वीरप्पा चक्रधर के साथ धुनष विद्या का अभ्यास कर रहा था। अचानक राजकुमारी बने वीरप्पा ने चक्रधर से कहा कि महोदय आप मेरे साथ आज तलवारबाजी का अभ्यास करो। चक्रधर अपनी शिष्या को सिखाने के लिए हमेशा तैयार रहता था तो उस दिन भी सहर्ष राजी हो गया। विरप्पा ने तो कुछ और ही सोच रखा था। अभ्यास करते करते राजकुमारी के वेश में वीरप्पा ने चक्रधर की भुजा पर जोर से तलवार का वार कर दिया जिससे चक्रधर की भुजा कटकर गिर पड़ी। साथ मे खड़े सैनिकों और दासियों में अफरातफरी मच गई। जानबूझकर प्रहार करने के पश्चात वीरप्पा ने सहानुभूति के आँशु भी टपकाये और रोने लगा। चूंकि राजकुंमारी के वेश में था तो किसी ने शक नही किया कि यह जनबूझकर किया गया है।

आनन फानन में चक्रधर को राजमहल में पहुंचाया गया। वैधजी को बुलाया गया और उपचार किया गया लेकिन चक्रधर का एक हाथ काट गया। वीरप्पा अपनी योजना में कामयाब हो गया। लेकिन दरबार तो लगना था। जांच होनी थी कि यह सब कैसे हुआ? दरबार लगा, वैभवराज के साथ रानी तारामती और मंत्रिमंडल के सदस्य भी विराजमान हुए।

मंत्री- महाराज की जय हो। आज दराबर में एक अनोखा मामला है, आपकी आज्ञा हो तो सुनवाई आरम्भ की जाए।

वैभवराज- मन्त्रिवर सुनवाई आरम्भ हो।

मंत्री- महाराज कल तलवारबाजी के अभ्यास के दौरान सेनापति चक्रधर का हाथ कट गया जो कि हमारे राज्य की अपूरणीय क्षति है।

वैभवराज- यह बहुत दुखद क्षण है। चक्रधर के प्रति सम्पूर्ण राज्य की सहानुभूति है।

मंत्री- लेकिन महाराज एक समस्या है।

वैभवराज- क्या समस्या मन्त्रिवर?

मंत्री- महाराज यह हादसा राजकुंमारी के हाथों से हुआ है।

वैभवराज- तो इसमें समस्या क्या है मन्त्रिवर! अपराध यदि शाही परिवार का कोई सदस्य करे तो क्या वह अपराध नही होता है! अपराध तो अपराध है। और फिर इतना बड़ा अपराध है सजा तो हमारे दण्ड विधान में सबके लिए एक सम्मान है।

मंत्री- महाराज आपकी बात सही है लेकिन यह राजकुंमारी ने जानबूझकर नही किया । साथ गए सैनिकों और राजकुमारी की सहेलियों जो कि प्रत्यक्षदर्शी है, उनसे हमने पूछताछ की है। पता चला है कि अभ्यास के दौरान राजकुमारी के हाथ से तलवार फिसल गई और सेनापति महोदय की बाजू कट गई।

वैभवराज- प्रत्यक्षदर्शियों को दरबार मे पेश किया जाय।

मंत्री- जी महाराज।

फिर अभ्यास के दौरान वहां उपस्थित सभी सैनिकों और राजकुमारी को सहेलियों को दरबार मे पेश किया जाता है। राजा प्रत्येक से सवाल करता है और उनका जवाब सुनता है। सभी लोगो से सवाल हो जाने के बाद राजा चक्रधर को दरबार मे बुलाता है। दो सैनिको का सहारा लेकर दर्द के साथ सेनापति चक्रधर राजदरबार में हाजिर होता है।

वैभवराज- सेनापति महोदय, आपके साथ हुई इस दुखद घटना का पता चला, हृदय को गहरा आघात पहुंचा है। आप हमारे राज्य के एक अभिन्न अंग हो और हमारे सुभचिंतक भी। अपराध किसी के भी द्वारा किया जाए उसकी सजा इस दरबार द्वारा अवश्य तय की जाती है।

चक्रधर- महाराज, यह कोई अपराध नही है। मानता हूं कि मेरी वजह से आपकी सेना को तनिक नुकसान हुआ है लेकिन मैं यह नही मान सकता कि यह एक अपराध है।

वैभवराज- सेनापति महोदय इसमें आपकी तो कोई गलती ही नही है। आप व्यर्थ में स्वयं को मानसिक कष्ट ना दे। मेने सभी प्रत्येक्षदर्शी से बातचीत की है। पता चला है कि यह अपराध राजकुमारी के हाथों हुआ है।

चक्रधर- लेकिन महाराज राजकुमारी ने यह जानबूझकर नही किया है। यह एक हादसा है जो अभ्यास के दौरान हो गया। मैं इसे राजकुमारी का अपराध नही मानता हूं।

वैभवराज- सेनापति महोदय यह आपकी वफादारी है शाही परिवार के लिए, लेकिन इससे जनता में अनुचित संदेश जाएगा। राजकुमारी को सजा तो मिलनी ही चाहिए। बिना हाथ आप अपने परिवार का भी पालन पोषण नही कर सकते है। आपके जीवन की अपूरणीय क्षति है।

राजकुमारी को दरबार मे पेश किया जाए।

राजकुमारी के वेश में वीरप्पा दरबार मे पेश होता है। हृदय में असीम खुशी और चेहरे पर बनावटी दर्द लिए। गर्दन झुकाए हुए ही वीरप्पा कहता है,,,

राजकुमारी(वीरप्पा)- महाराज सबसे पहले तो में सेनापति महोदय से क्षमायाचना करती हूं, दरबार मे सभी को प्रणाम और मैं मेरे इस अपराध को बिना किसी सुनवाई के स्वीकार करती हूं।

वैभवराज- राजकुमारी आपके अपराध की सुनवाई हो चुकी है, सभी पहलुओं पर गौर किया जा चुका है। बस हम आपसे अंतिम सवाल करना चाहते है।

राजकुमारी- महाराज, मैं अपना अपराध स्वीकार करती हूं, फिर भी आपको कुछ पूछना है तो आप पूछ सकते है।

वैभवराज- क्या अपने किसी वैरभावना या प्रतिशोध के चलते सेनापति से तलवारबाजी की थी?

राजकुमारी- नही महाराज, ऐसा कदापि मेरे जेहन में नही है कि आदरणीय सेनापति महोदय, जो कि मेरे सस्त्र गुरु भी है उनसे कभी मेरा कोई वैर हो सकता है या फिर कभी मैं उनसे किसी तरह का प्रतिशोध लेना चाहती हूं। महाराज हम सिर्फ अभ्यास कर रहे थे और इसी दौरान यह हादसा हो गया। लेकिन मैं समझती हूं कि इसमें मेरी गलती है। अतः मेरा इस दरबार से निवेदन है कि मुझे शाही परिवार की सदस्य समझकर दण्ड विधान का अपमान ना करे। यह दरबार जो भी सजा का मेरे लिए निर्णय करेगा वो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी।

चक्रधर- महाराज मेरा इस दरबार से निवेदन है कि अभ्यास के दौरान हुए इस हादसे को अपराध ना माना जाए और निरपराध राजकुमारी को कोई सजा ना दी जाए।

मन्त्रिवर आपस मे सलाह मशविरा करके महाराज के सामने सुझाव रखते है। रानी तारामती भी इस सलाह में शामिल थी। अंत मे निर्णय हुआ कि सेनापति के पद पर राजकुमारी को रहना होगा और वेतन के रूप में स्वर्णमुद्रा चक्रधर के परिवार को दी जाए साथ हि राजकुमारी स्वयं चक्रधर के परिवार की देखभाल करेगी। इसके साथ कम से कम राजकुंमारी को 1 माह की कैद की सजा दी जाएगी। चक्रधर के मना करने के बाद भी दरबार ने राजकुमारी को कैदखाने भेज दिया।

कैद में पहुंचकर वीरप्पा बहुत प्रशन्न हुआ। वो जो चाहता था उसमें सफल हुआ और अब कैद में वीरप्पा की योजना की अगली सीढ़ी बननी थी। जो अब वीरप्पा के लिए आसान थी।
 
कैद में वीरप्पा न आपानी योजना को आगे बढ़ाना शुरू किया। रात को जब पहरेदार भी सो जाते तो वीरप्पा एक कोठरी के सभी कैदियों को इक्कठा कर उनको शैतानी शक्तियां सिखाता। सभी कैदी जो कि सजा काट रहे थे जाहिर सी बात है कि राजा और शाही परिवार से वैमनस्य रखते थे तो शिघ्र ही वीरप्पा की बाते स्वीकार कर ली और शैतानी शक्तियां सीखने लगे। लेकिन एक माह की कैद में वीरप्पा सिर्फ सभी को कैसे सिखाता और समस्या यह भी थी कि जिस कोठरी में वीरप्पा राजकुमारी के रूप में कैद था उसमें सभी औरते थी।

लेकिन वीरप्पा रूप बदलना भी जानता था। दिन में तो सम्भव नही था लेकिन यह काम उसको रात में ही करना था। रात में वीरप्पा ने चमगादड़ का रूप बनाया और दूसरी कैद कोठरी में गया। एकबारगी सभी डर गए लेकिन वीरप्पा ने सबको विस्वास दिलाया कि मैं आप सबको इस कैद से बाहर निकाल लूंगा बस आपको मेरा काम करना है। मैं आपको एक मंत्र सिखाता हूं जिसे आपको सीखना है। कैद से बाहर आने के लालच में सभी ने वीरप्पा की बात स्वीकार ली और लगे शैतानी शक्तियों को सीखने में।

धीरे धीरे इस तरह वीरप्पा सभी को शैतानी शक्तियों में पारंगत कर दिया और अपनी एक सेना तैयार कर ली। दिन में राजकुमारी के रूप में शांत और रात में अपना शैतानी रूप दिखाकर सबको वीरप्पा ने अपनी तरफ कर लिया। सभी कैदियों को पता चल गया कि यह राजकुमारी नही बल्कि वीरप्पा ही है। पर किसी ने बताया नही क्योंकि वो स्वयं आजाद होना चाहते थे और शक्तिशाली भी। जो वीरप्पा उनको बना रहा था।

उधर गुफा में कुलसी का अत्याचार अब राजकुमारी पर तीव्र होता जा रहा था। भले ही राजकुमारी चुड़ैल रूप में थी लेकिन साहस इतना था कि शैतानी शक्तियों को स्वीकार नही किया। लेकिन कुलसी भी कहाँ हार मानने वाली थी। एक रोज कुलसी राजकुमारी को मना रही थी लेकिन राजकुमारी नही मानी तो कुलसी को गुस्सा आया उसने राजकुंमारी को पीटना शुरू कर दिया।

कुलसी- जब तक तू नही मानेगी मैं तुम्हे छोडूंगी नही।

राजकुमारी- तुम लोग बस इंसानों पर जुल्म करना जानते हो , अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हो। लेकिन मैं कदापि तुम्हारी बात नही मानुगी।

कुलसी को अब और क्रोध आ गया। उंसने राजकुमारी को एक काल कोठरी में डाल दिया जहां कुलसी की प्रशिक्षित की हुई चुड़ैलें थी। उन सब के बीच राजकुमारी असहाय थी। चुड़ैलें कभी डराती तो कभी राजकुमारी को पिटती। राजकुमारी ने सामना किया लेकिन अकेली कब तक उनका सामना कर सकती थी। लहूलुहान राजकुमारी के घावों पर चुड़ैलें और अधिक अत्याचार करने लगी। राजकुमारी के पैर में एक बड़ा घाव हुआ जहां चुड़ैल ने अपने नाखून से कुरेदकर दर्द को और असहनीय बना दिया।

इन सबके बीच राजकुमारी रोटी रही। एक कोने में सिमट कर बैठ गई। कुछ देर में चुड़ैलें शांत हुई लेकिन राजकुमारी का दर्द अब और असहनीय हो गया। शरीर पर असंख्य घाव थे। थोड़े थोड़े समय मे कोई ना कोई चुड़ैल आती और घाव पर अपने लंबे नाखून चुभोती। रोटी हुई राजकुमारी को देख कर हंसती, अट्टहास करती फिर वापिस चली जाती।

उधर ऋषि द्रुम गुफा के द्वार पर तो पहुंच गए थे लेकिन शैतान के प्रहरी सिंह से लड़ना ऋषि के लिए कठिन था। सन्त बनी चुड़ैल ने उन सिंघों के बारे में सब बता दिया। ऋषि ने उनसे सीधे लड़ना अपनी मौत को बुलाने जैसा समझा। ऋषि ने सोचा कि यदि बाहर ऐसे शेर है तो गुफा के अंदर तो शैतान की कितनी भयंकर शक्तियां होगी। यदि यहीं मेरी सारी ताकत लगा दूँगा तो अंदर जाकर राजकुमारी की मदद कैसे करूँगा।

द्रुम ऋषि वहीं पास के एक पेड़ के नीचे आग जलाकर बैठ गए और मंत्रोच्चार करने लगे। उन्होंने शेर का सामना करने की नई तरकीब सोची। जिसके लिए ऋषि अग्नि के सामने मंत्रोच्चार करने लग गए।

राजकुमार विजयराज और पंडितपुत्र दोनो अपनी मस्ती में रास्ते मे चल रहे थे। रात का अंधेरा हो गया था। दोनो ने सोचा कि कहीं अच्छी जगह देख कर रात्रि बिताई जाए। तभी दूर एक मशाल जलती दिखाई दी। दोनों तेज गति चले और वहां पहुंचे , देखा कि वहां एक झोंपड़ी थी और एक बुढ़िया बाहर बैठी थी। पास ही चारपाई पर एक बुजुर्ग असहाय से लेते थे। झोंपड़ी से रोने की सी आवाज आ रही थी।

पण्डितपुत्र ने माताजी को नमस्कार किया और अपना परिचय दिया। राजकुमार के बारे में जानकर माताजी ने उनको वहाँ रुकने की सहमति दे दी। जलपान के पश्चात पण्डितपुत्र ने पूछा,,,,

पण्डितपुत्र- माताजी अंदर रोने की आवाज सी सुनाई दे रही है मुझे। बुरा ना मानना, लेकिन मैं जानना चाहता हूं।

बुजुर्ग महिला- बेटा क्या बताऊँ। मेरी बेटी है। पता नही इसको क्या बीमारी है। हेमशा अजीब सा व्यवहार करती है। इसके व्यवहार के चलते जमीदार ने हमे गांव से बाहर निकाल दिया।

पण्डितपुत्र- ओहो फिर आपने किसी वैद्य को दिखाया।

महिला- बहुत से वैद्य को दिखाया लेकिन कोई समाधान नही हुआ।

पण्डितपुत्र-क्या मैं मिल सकता हूं आपकी बेटी से।

महिला- जी ठीक है। लेकिन ध्यान रखना वो किसी इंसान को देख कर अजीब ही हरकत करती है और चिल्लाती भी है।

पण्डितपुत्र- ठीक है आप चिंता मत करो। मैं सम्भाल लूंगा।

पण्डितपुत्र राजकुमार के साथ झोंपड़ी में जाता है, अंदर का दृश्य देखकर चौंक जाता है। अंदर एक 15/16साल की लड़की जिसके हाथ पांव बंधे है और चेहरे पर बहुत से नाखून के निशान है। पण्डितपुत्र और राजकुमार को देखते ही वो छटपटाने लगी और चिल्लाने लगी। पण्डितपुत्र मन कुछ मंत्र बुदबुदाता है और लड़की शांत हो जाती है। फिर राजकुमार को पण्डितपुत्र कान में कुछ कहता है और राजकुमार बाहर चला जाता है। फिर पण्डितपुत्र लड़की के हाथ पांव खोल देता है। राजकुमार पण्डितपुत्र के कहे अनुसार बाहर से कुछ लाता है।

पण्डितपुत्र- राजकुमार तुम मंत्रोचारण के साथ अग्नि में घी की आहुति दो ताकि वातावरण सुध हो जाये। वैसे भी रात्रि का समय है सम्भलकर , मैं एक घण्टे तक कुछ नही बोलूंगा, यदी तुम्हे लगे कि लड़की में कुछ हलचल हो रही है तो जल के छींटे देते रहना।

राजकुमार- पंडित तुम मेरी चिंता मत करना, हालांकि मैं नही जानता कि तुम क्या करने वाले हो लेकिन मैं साहस से काम लूंगा। तुम तनिक भी चिंता ना करना।

इसके बाद पण्डितपुत्र अपनी तंत्रविद्या में लीन हो जाता है और राजकुमार वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए घी की आहुति से वातावरण सुध करता है। लड़की में चेतना का संचार होता है और अत्यधीक छटपटाहट के साथ चिल्लाने लगती है। सामने राजकुमार पर नजर पड़ते ही लड़की राजकुमार पर टूट पड़ती है एयर नाखून से राजकुमार के चेहरे पे घाव कर देती है लेकिन राजकुमार ने साहस का परिचय दिया और लड़की को क्षकर पकड़ लेता है।

कुछ समय के बाद लड़की शांत हो जाती है और निढाल होकर गिर जाती है। एक घण्टे के तंत्र साधना के पश्चात पण्डितपुत्र आंखे खोलता है तो लड़की तुरन्त होश में आ जाती है। पण्डितपुत्र कि तरफ झपटते ही राजकुमार लड़की पर जल की छींटे देना शुरू कर देता है।

बाहर बैठे लड़की के माता पिता बेहाल हो जाते है। राजकुमार बाहर जाना चाहता था लेकिन पण्डितपुत्र के इसारे से रुक जाता है। लड़की फिर निढाल हो जाती है। अब पण्डितपुत्र और राजकुमार दोनो ने लड़की के चारो तरफ जल की एक रेखा बनाई और बाहर आये।

लड़की के माता पिता को सम्भाला।

पण्डितपुत्र- माताजी अब आप चिंता मत कीजिये। सब कुछ ठीक हो गया है।

महिला- बेटा हुआ क्या था मेरी बेटी को।

पण्डितपुत्र- माताजी एक बात बताओ क्या आपके परिवार का कभी किसी साधु से मिलन हुआ था।

महिला- हा , पहले गांव में एक संत रहते थे जो हमेशा हमारे घर पर ही खाना खाता था और मेरी बेटी ही उसे खाना खिलाती थी। लेकिन हुआ क्या?

पण्डितपुत्र- माताजी हर संत रूप में दिखने वाला जरूरी नही की अच्छा इंसान ही होता है। कुछ ढोंगी भी होते है जो अपने स्वार्थ के कारण किसी नादान और भोले इंसानों को गलत राह पर ले जाते है। या उन्हें आपको पुत्री की तरह प्रताड़ित करते है।

महिला- मैं समझी नही,,

पण्डितपुत्र- आपकी पुत्री को किसी डोंगी साधु के द्वारा श्राप मिला हुआ था।

महिला- लेकिन मेरी बेटी की क्या गलती थी कि श्राप मिला उसको।

पण्डितपुत्र- माताजी गलती कुछ नही, लेकिन कुछ लोग अपने स्वार्थ के लिए किसी और को परेशान करते है। तंत्र विद्या का गलत उपयोग करके वो लोग शैतानी ताकत हाशिल करने की चाह में ऐसे नादानों बालको को या भोले भाले लोगों को अपना शिकार बनाते है।

महिला- अब क्या होगा बेटा।

पण्डितपुत्र- अब सब ठीक है। आप चिंता ना करे। हमने आपकी पुत्री को अब ठीक कर दिया है।

महिला- बेटा आपका यह ऋण मैं कैसे चुकाऊं।

पण्डितपुत्र- माताजी आप अपना आशीर्वाद दीजिये की हमे रास्ते मे किसी मुसीबत का सामना करने की हिम्मत मिले। और कुछ नही चाहिए।

महिला- बेटा भगवान आप दोनों को सदा खुश रखे। आप विश्राम करो मैं खाना बना देती हूं।

राजकुमार- जी माताजी बहुत भूख लगी हुई है। जरा जल्दी बना दो।

राजकुमार और पंडित पुत्र ने रात्रि में वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल नित्यक्रिया से निवृत होकर फिर अपने मार्ग पर चले। राज्य के अब निकट पहुंच गए थे।

उधर ऋषि द्रुम अब तपस्या में लीन थे और सिंह गुफा के द्वार पर कड़ा पहरा दे रहे थे। गुफा के अंदर एक काल कोठरी के कोने में डरी सहमी हुई राजकुमारी बैठी रो रही थी। कुलसी का अत्याचार अब दिन प्रतिदिन बढ़ रहा था। चुड़ैलें आती और राजकुमारी के घावों को नाखून से कुरेदती, तब राजकुमारी चिल्लाती और चुड़ैलें हंसती, अट्टहास करती।

पिछले 3 दिन से राजकुमारी ने कुछ भी नही खाया था। गुफा में उसे तामसी खाना मिला जो राजकुमारी को मंजूर नही था। खाना ना खाने पर कुसली और अधिक सताती लेकिन राजकुमारी ने कहा कि तुम मेरे शरीर को यातना दे सकती हो, वश में कर सकती हो लेकिन मेरी अंतरात्मा मेरे हृदय को तुम कभी इस बुरी प्रवृति के लिए तैयार नही कर सकती।

महल में वीरप्पा राजकुमारी के वेश में कैद खाने में था। अपनी कुटिल सोच को सार्थक करने का भरसक प्रयास कर रहा था। एक तरफ चक्रधर का हाथ काटकर मानो सेना को ही अपंग कर दिया और दूसरी तरफ कैद में सभी कैदियों को शैतानी शक्तियों से मंड दिया। रूप बदलना और अदृश्य होना जैसी विद्या उनको सीखा दी।

ऋषि द्रुम ने मंत्रोच्चार से मायावी हिरणों का झुंड जंगल मे प्रविष्ट कराया। एक एक करके हिरण गुफा के द्वार के सामने से गुजरने लगे। सिंह अब हिरण को देखकर मचल गए। बहुत समय के बाद अपना शिकार देखकर सिंह बेकाबू हो गए। एक सिंह ने हिरण के पीछे दौड़ लगाई तो हिरण कुलांचे भरता भाग गया। तभी दूसरा हिरण सिंह के सामने आकर खड़ा हो गया। सिंह ने जोर से दहाड़ मारी। गुफा के सभी सिंह उस दहाड़ को सुनकर द्वार पर आ गए। सामने हिरणों का झुंड देखकर सभी दहाड़ने लगे।

एक सिंह ने हिरण के पीछे दौड़ लगाई तो हिरण भागने लगे उसे देखकर सभी सिंह हिरणों के पीछे दौड़ने लगे। चूंकि हिरण तो मायावी थे जो सन्त द्रुम की चाल थी। सभी हिरण जंगल से बहुत दूर निकल गए और उनके पीछे सारे सिंह भी। द्रुम अपनी योजना में कामयाब हो गए।

जैसे ही गुफा में प्रवेश करने लगे चमगादड़ ( जो सन्त बना हुआ था)ने उसे रोका।

चमगादड़- महात्मा आपके साथ रहने के बाद मैं सत्य और असत्य , अच्छाई और बुराई को समझ गया हूं। अब इस गुफा के बारे में मैं आपको सब सच बताता हूं। आप इस तरह सीधा अंदर प्रवेश करने की कोशिश ना करे।

द्रुम- अच्छा हुआ तुमने अच्छाई को पहचान,,, लेकिन गुफा मैं अब क्या भय है। सिंह तो द्वार पर है नही और मेरे हिरण उनको इतनी जल्दी वापिस भी नही आने देंगे।

चमगादड़- महात्मा जी, अंदर मेरे जैसे बहुत से लोग है जिन्होंने

चमगादड़ और चुड़ैलों का रूप लेकर एक अलग प्रकार की दुनियां बना रखी है। राजकुमारी भी अंदर है। ऐसे में हमे सोच समझकर अंदर जाना है।

द्रुम - बताओ तो फिर अब हमें क्या करना चाहिए।

चमगादड़- महात्मा जी अंदर जाते ही एक चमगादड़ो का झुंड हम पर हमला बोलेगा,, मुझे तो वो लोग जानते है। उन्हें पता है कि मैंने नया रूप ले रखा है। लेकिन वो लोग आपको भी पहचान लेंगे की आप उनकी दुनियां से अलग है। आप पर हमला करेंगे।

द्रुम- तो हमे क्या करना चाहिए?

चमगादड़- महात्मा जी, शैतानी शक्ति से निपटने का तरीका तो मुझे नही आता। मैं बस आपको आगाह कर रहा हूं, आपको बता सकता हु की अंदर किस तरह की समस्या से आपको सामना करना पड़ेगा।

द्रुम- शैतानी शक्ति का तोड़ तो तंत्र विद्या के द्वारा होता है और मुझे तो मंत्र साधना आती है। इस तरह की गलत विद्या का अध्ययन मेने कभी किया नही है।

चमगादड़- फिर आप कैसे सामना करोगे?
 
द्रुम - महाशय अब तो मुझे बस किसी तरह राजकुमारी तक पहुंचना है, मुझे नही पता कि आगे क्या होगा लेकिन मुझे बस राजकुमारी की चिंता है।

चमगादड़- महात्मा जी मैं आपकी एक मदद कर सकता हूँ । यदि आप चाहो तो""

द्रुम - किस प्रकार की मदद! तुम जो भी कुछ जानते हो शीघ्र बताओ।

चमगादड़- मैं आपको अदृश्य होने का मंत्र सीखा सकता हूं।

द्रुम ऋषि ने कुछ सोचा, लेकिन सवाल यह था कि कैसे भी राजकुमारी तक पहुंचना है तो किसी भी प्रकार की सहायता मिले वो लेना ऋषि बुरा नही समझते थे। सोच कर ऋषि ने हाँ कर दी।

चमगादड़ ने ऋषि को बताया कि रात्रि के समय तंत्र विद्या की साधना करने से ज्यादा कारगर होती है। ऋषि के मन मे अब धैर्य रखना थोड़ा मुश्किल था लेकिन उनको यह भी पता था कि सब कुछ सोच समझकर करना सही होगा। जल्दबाजी में लिया गया निर्णय किस क़द्र मुसीबत में फंसा देता है वो ऋषि जानते थे।

चमगादड़ ने ऋषि को सामने बैठाया और अपनी तंत्र साधना आरम्भ की। उधर राजकुमार और पण्डितपुत्र अब जंगल मे पहुंच गए थे। एक हिरण अचानक तेज दौड़ते हुए उनके सामने से निकला , उसके पिछे पीछे सिंह भी था। पण्डितपुत्र ने अचानक कहा,,,

पण्डितपुत्र- रुको राजकुमार, जरा सम्भल कर!

राजकुमार- (आश्चर्य से) क्या हुआ दोस्त!

पण्डितपुत्र- दोस्त इस जंगल मे माया अपना काम कर रही है।

राजकुमार- मतलब!

पण्डितपुत्र- मतलब की इस जंगल में कुछ ना कुछ गलत हो रहा है। अभी अपने देखा कि एक हिरण दौड़ते हुए गया है।

राजकुमार- हा दोस्त, लेकिन उसके पीछे सिंह भी तो था। वो अपना शिकार कट रहा था, हिरण जान बचाने के लिए भाग रहा था।

पण्डितपुत्र- नही दोस्त,,,, वो हिरण मायावी था। और वो अकेला नही है , उनका पूरा झुंड है। यहां तक कि जो सिंह उसके पीछे था वो भी कोई सामान्य सिंह नही था।

राजकुमार- तुम कहना क्या चाहते हो, पण्डितपुत्र? अपनी सारी पंडिताई यहीं झाड़ोगे। मुझे डरा रहे हो क्या।

पण्डितपुत्र- नहीं दोस्त, यह मजाक का समय नही है। रात्रि होने वाली है और इस जंगल मे हमे भयानक चीजे देखने को मिलेगी। तुम सम्भल कर चलना।

दोनो मित्र हाथ पकड़ कर चलने लगते है। पण्डितपुत्र कि नजर प्रतिपल इधर उधर दौड़ रही थी। उसको आभास हो गया था।

अंधेरा होने लगा। दोनो मित्र गुफा के नजदीक पहुंच गए। बाहर दो ऋषि साधना में लीन थे। ,,,

राजकुमार- मित्र यह इस जंगल मे सन्त लोग कौन है? सुना है कि प्रखर साधु जंगल मे ही मिलते है। कहीं ऐसा ही तो हम नही देख रहे है।

पण्डितपुत्र- नही मित्र,,, मुझे माया की बू आ रही है। मैने पहले ही कहा था ।

राजकुमार- चलो पास चलकर देखते है।

पण्डितपुत्र- हाँ, लेकिन जरा सम्भलकर।

राजकुमार- निश्चिंत रहो, तुम्हारे साथ इतना तो सीख गया हूं।

दोनो मित्र सावधानी से ऋषि के समीप जाते है। ऋषि द्रुम साधना में लीन थे। उनको चमगादड़ ने अदृश्य होने का मंत्र सीखा रहा था। पास में गुफा को देखकर राजकुमार उत्सुक हो जाता है। अपने मित्र से पूछता है।

राजकुमार- मित्र यह गुफा कैसी है।

पण्डितपुत्र- मित्र यह गुफा मुझे साधारण गुफा नही लगती है। मेरी शंका सही है मित्र।

राजकुमार- क्या किया जाए। ऋषियों को साधना से जगाना भी पाप है।

पण्डितपुत्र- मित्र सही कहा। हम ऋषियों की साधना में व्यवधान नही डालेंगे। लेकिन गुफा के अंदर जरूर जाएंगे। मुझे लगता है कि इस गुफा में बहुत बड़ा राज है।

राजकुमार- क्या हम अंदर जाएं?

पण्डितपुत्र- हाँ, लेकिन जरा सम्भलकर, आप मेरे पीछे रहना राजकुमार।

राजकुमार- ठीक है।

दोनो मित्र गुफा में जाते है। अभी अंदर प्रवेश किया ही था कि एक चमगादड़ तह रफ्तार से आया और पण्डितपुत्र के पर नाखून चुभो गया। पण्डितपुत्र गिर गया। तभी राजकुमार चिल्लने लगा। एक चमगादड़ो के समूह ने राजकुमार को घेर लिया। पण्डितपुत्र ने एक मंत्र पढ़ा और चमगादड़ों की तरफ फूंक मारी। सभी चमगादड़ राख में बदल गए।

दोनो मित्र सम्भले, लेकिन अब उनको समझ मे आया कि अंदर बहुत खतरा है।

पण्डितपुत्र- राजकुमार यह गुफा शैतानी ताकत की एक बड़ी झील है। लेकिन यहां कोई इंसान कैद है।

राजकुमार- मित्र तुम यह पता लगा सकते हो। मुझे तो इस बारे में कोई ज्ञान नही है। लेकिन अब हमें क्या करना चाहिए।

पण्डितपुत्र- मित्र हम आगे जरूर जाएंगे, लेकिन हमें हर कदम पर खतरा मिलेगा। आप घबराना मत।

राजकुमार- हाँ मित्र, हो सकता है अंदर किसी को हमारी सहायता की आवश्यकता हो। लेकिन तुम चिंता मत करो, मैं बिल्कुल नही डरूंगा।

दोनो मित्र गुफा में आगे चलने लगे।

उधर वीरप्पा ने कैदखाने के सभी कैदियों को इतना शक्तिशाली बना दिया कि अब वो किसी भी सेना का सामना कर सकते थे। वीरप्पा ने कहा कि जो भी सैनिक आपको राजपरिवार का वफादार लगे उसको मार डालो। और जो अपनी तरफ आना चाहे उसे अपने साथ मिला लो। अब कैदखाने के प्रहरी कुछ ही दिनों में एल एक करके मरने लगे। ना राजा को समझ आ रहा था और ना ही चक्रधर को। चक्रधर ने कहा कि हो सकता है राजकुंमारी को हमने कैद कर रखा है तो मातारानी का प्रकोप राज्य पर हो रहा हो। क्योंकि आखिर मातारानी को कृपया से ही आपको सन्तान हुई थी।

वैभवराज भी सोच में पड़ गया। मंत्रिमंडल से विचारविमर्श के पश्चात राजकुमारी को आजाद कर दिया गया। वीरप्पा अब खुश हो गया। राजकुमारी के रूप में अब वो आगे की योजना में जुट गया।

महल में एक सेना ऐसी रहती थी जो विकट समय मे कुछ, भी हो लेकिन राजपरिवार के किसी भी सदस्य के लिए जान प्राण भी गवां सकती थी। उस सेना का प्रत्येक सिपाही कुशल प्रशिक्षित यौद्धा था। विरप्पा को पता था कि ना वो सेना कभी राजपरिवार से घात करेगी और ना ही उस सेना को आसानी से जीता जा सकता है।

कैदखाने में दी गई शैतानी ताकत का इस्तेमाल यहां करूँगा तो बाकी की योजना के लिए भी उसको सैनिक चाहिए। क्योंकि की राजा की सेना भी बहुत बड़ी थी।

उधर ऋषि द्रुम ने आंखे खोली और चमगादड़ को कहा कि गुफा में कोई मनुष्य गया है। उस पर खतरा आ सकता है। हमे शीघ्र गुफा में जाना चाहिए।

ऋषि द्रुम शीघ्रता से गुफा में जाना चाहते थे लेकिन चमगादड़ ने उन्हें रोक दिया।

चमगादड़- महात्मा जी आप जल्दबाजी ना करें। अंदर गया हुआ मनुष्य या तो चमत्कारी है या फिर बिल्कुल नादान है।

द्रुम- आपके कहने का अर्थ क्या है?

चमगादड़- महात्मा जी जो अंदर चला गया है उसके पीछे बिना सोचे समझे हमे नही जाना चाहिए। उसे अपनी ताकत का इस्तेमाल करने दीजिये। हम योजनाबद्ध रूप से अंदर जाएंगे। यदि वो इंसान खतरे में भी होगा तो हम उसकी सहायता कर सकते है। लेकिन हम बिना स्थिति को परखे यदि जाएंगे तो हम भी मुसीबत में आ सकते है।

द्रुम- आपकी बात सत्य है। किंतु मुझे चिंता हो रही है। कोई साधारण मनुष्य कैसे इस तरह की शैतानी शक्ति का सामना करेगा। हमें भी चलना चाहिए।

चमगादड़- जी जरूर, लेकिन जरा सम्भलकर। पहले हम दोनों को अदृश्य होना पड़ेगा।

द्रुम- ठीक है।

दोनो अदृश्य हो जाते है और गुफा में प्रवेश करते है। पण्डितपुत्र और राजकुमार दोनो उनसे आगे आगे गुफा में जा रहे थे। ऋषि ने देखा कि रास्ते मे राख का ढेर पड़ा है। ऋषि रुक गए।

द्रुम- यह क्या है? (आश्चर्य से)

चमगादड़- (राख को हाथ मे लेकर) महात्मा जी यह शैतानी चमगादड़ो को राख है। लगता है अंदर जा रहे मनुष्य साधारण नही है। चमगादड़ो ने उन पर हमला किया और उनका यह हाल हो गया।

द्रुम- लेकिन अपने बताया था कि अंदर का प्रत्येक जीव मूलतः मनुष्य ही है।

चमगादड़- हाँ, यह सत्य है। महात्मा जी।

द्रुम- फिर हमें इनको वापिस जिंदा करना चाहिए।

चमगादड़- कैसे! यह जिंदा होंगे तो हम पर ही मुसीबत बन जाएंगे।
 
राजा और विशम्भर के बीच मन्त्रणा के बाद मंत्रिमंडल में बात रखी गई कि अब सेनापति कौन होगा। कयोंकि चक्रधर हादसे का शिकार होकर अपंग हो गया। अब सेना को संभालने वाले कौन होगा। सबने राजकुमारी के नाम पर मुहर लगा दी। दरबार राजकुमारी के जयकारों से गूंज उठा। मन मे कुटिल हंसी लिए खुश होता हुआ वीरप्पा राजकुमारी के वेश में दरबार मे सेनापति के सिंहाशन पर विराजमान हो गया।

उधर राजकुमार और पण्डितपुत्र ने जोर लगाकर पत्थर को हटाने ल प्रयास किया लेकिन पत्थर जरा भी नही हिला। तभी पीछे से एक गंभीर आवाज ने उन्हें रोका। दोनों मित्रो ने मुड़कर देखा। तो एक सन्त के पीछे मनुष्य की सेना देखकर चौंक गए।

द्रुम;- वत्स,,, हम सब तुम्हारे शुभचिंतक है। हो सकता है कि जिस अभिप्राय के लिए आप यहां आये हो उसी के लिए हम यहां आए है। लेकिन इस तरह तुम अकेले यह काम नही कर सकते ।

पण्डितपुत्र- आप लोग हो? आपका यहां आने का क्या अभिप्राय हो सकता है।

द्रुम- मैं ऋषि द्रुम हूं। यह सब मेरे शिष्य है। हम यहां किसी नादान की जान बचाने आये हैं।

राजकुमार- (चौंककर) क्या!! यह बात तो मेरे मित्र ने इस जंगल मे प्रवेश करते ही बता दी थी।

पण्डितपुत्र- ऋषिराज, मुझे आशंका है कि इस जगंल में भयानक माया है। और कोई नादान इस माया जाल में फंसा हुआ है।

द्रुम- आप यह कैसे जानते हो ।

पण्डितपुत्र- ऋषिराज मैं तंत्रविद्या का जानकार हु। मैं हर प्रकार की शैतानी शक्ति का तोड़ जानता हूं। तभी इस गूफ़ा के सभी शैतानों को मार गिराया जिनको आपने अपना शिष्य बना लिया है।

ऋषि द्रुम सकते में आ गए। पण्डितपुत्र तो सच मे ज्ञाता था। तब ऋषि ने दोनों को हर बात बताई और जो चमगादड़ उनके साथ था उसके बारे में भी बताया। जब सभी की मंजिल एक हो गई तो अब राजकुमार के मन का भय दूर हो गया था।

पण्डितपुत्र- लेकिन ऋषिराज एक शंका है। निवारण करेंगे?

द्रुम- अवश्य, बोलो वत्स।

पण्डितपुत्र- आपने सबको शैतान से इंसान बना दिया,लेकिन अपने साथ इस एल चमगादड़ को अभी भी शैतानी रूप में क्यों रखा है?

द्रुम- यह इसलिए कि मुझे किसी भी शैतानी शक्ति के बारे में कुछ मालूम नही है। मैं किसी का भला कर सकता हूँ लेकिन इतनी शैतानी ताकतों का सामना अकेला नही कर सकता हूँ। इस चमगादड़ की सहायता से मैं एक एक समस्या का समाधान करना चाहता हु। अब तुम आ गए हो तो मैं इसको मनुष्य रूप दे सकता हूँ।

चमगादड़- शीघ्रता कीजिये ऋषिराज। मैं इस रूप से थक गया हूं।

पण्डितपुत्र- लेकिन इस गुफा के बारे में कुछ जानता हूं।

चमगादड़- चिंता मत कीजिये। मैं मनुष्य रूप में आने के बाद भी आपको गुफा के राज बता दूँगा। जिससे आप दोनों मिलकर इस शैतानी गुफा को नष्ट कर सकते हो।

पण्डितपुत्र के कहने पर ऋषि ने उस चमगादड़ को भी मानव रूप दे दिया। उसके बाद सबने मिलकर गुफा के उस अन्तःकक्ष के पत्थर को गिरा दिया। पत्थर के गिरते ही एके भयानक तूफान उठा। असंख्य चुड़ैलें और चमगादड़ो का रेला भयानक चीत्कार करता हुआ आया।

पण्डितपुत्र सम्भलता तब तक सबको घायल कर दिया। चुड़ैलों ने नाखून चुभो रखे थे। और ऊपर मौत की तरह चमगादड़ मंडरा रहे थे। किसी को कोई मौका नही मिला कि उनका जवाब दे सके। ऋषि द्रुम और पण्डितपुत्र दोनो अचंभित खड़े थे। जितना उन्होंने सोच था उससे सौ गुना ज्यादा भयानक शैतान उस अन्तःकक्ष से निकले और सबको घेर कर खड़े हो गए।

सामने से अट्टहास करता हुआ भयानक रूप में एक विशालके दैत्य के समान शैतानराज आया,,

वीरप्पा एक रोज शयन कक्ष में सो रहा था। रूप राजकुंमारी का था लेकिन मष्तिष्क वीरप्पा का चल रहा था। दो दासियाँ पास में बैठी थी। वीरप्पा सोच रहा था कि वैभवराज को किस तरह रास्ते से हटाया जाए। एक तरफ सेना दूसरी तरफ विशंभर का तेज दिमाग। छल के अलावा यह काम नामुमकिन था। छल कपट तो वीरप्पा की विरासत थी।

वीरप्पा ने राजा को बंदी बनाने की योजना बनाई। एक दासी को भेजकर राजा और रानी मां को बुलाया की राजकुमारी किसी जरूरी कार्य से मिलना चाहती है। दासी कर साथ वैभवराज और रानी तारामती राजकुमारी के कक्ष में आये।

वैभवराज- क्या बात है राजकुमारी इतनी देर रात अपने हमे यहां क्यों बुलाया है?

रानी- क्या हुआ मेरी रानी बिटिया को। कोई तकलीफ है क्या?

राजकुमारी- हाँ, मैं आपसे बात करना चाहती हूँ।

वैभवराज- बोलो क्या बात है? हमसे कोई शिकायत है या राज्य से सम्बंधित कोई समस्या है तो बोलो।

राजकुमारी- विजयराज कहाँ है?

वैभवराज- क्या! इतने वर्ष बाद आज आपको अपने भाई की याद कैसे आई?

राजकुमारी- मुझे तो रोज ही याद आता है। मेरे रास्ते का कांटा जो है।

वैभवराज और रानी दोनों राजकुमारी के इस उतर से अचंभित हो गए। एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

रानी- तेरा दिमाग तो खराब नही हो गया। तेरा भाई तेरे रास्ते का कांटा कैसे हो गया। हमने हमेशा आपको राज्य के हर कार्य मे आगे रखा है। कभी विजयराज का ख्याल ही नही किया। उसकी शिक्षा अभी पूरी हुई है। उसको तो राज्य के बारे में कुछ भी पता नही।

वैभवराज- राजकुमारी हमने आज तक आपमे और विजयराज में कोई फर्क नही किया है। फिर आप ऐसा क्यों कह रही हो?

राजकुमारी- आप अभी भी नही समझे राजन,,

वैभवराज- (आश्चर्य से) क्या मतलब!

तभी वीरप्पा ने दासी को इसारा किया और अगले पल दासी के रूप में खड़े दो वीरप्पा के सैनिक राजा और रानी को बंदी बना लेते है। अचानक एक स्त्री का पुरुष रूप में आना और बंदी बना लेने से राजा और रानी अचंभित रह गए। पाश में बंधे हुए राजा की आंखों में आँशु आ गए और रानी का चेहरा भी पिला पड़ गया। अचानक हुए इस हादसे को दोनो ही समझ नही पाए।

वैभवराज- राजकुमारी ऐसी क्या कमी रह गई थी हमारे लाड़ प्यार में जो तुम हमारे साथ ऐसा सलूक कर रही हो।

रानी- बेटी हो सकता है आपको कोई गलतफहमी हो गई हो। हमने तो आज तक आप और राजकुमार में कोई फर्क नही किया। अपने माता पिता के साथ इस तरह का व्यवहार ठीक नही है।

राजकुमारी-(हंसते हुए) आप अभी भी नही समझी मां,,, पिताजी आप भी बड़े भोले हो। रुको अभी आपको सब समझ मे आ जायेगा।

कहते हुए वीरप्पा अट्टहास करने लगा और अपने असली रूप में आ गया। वीरप्पा को इस तरह रूप बदलते देख कर राजा और रानी एकदम चौंक गए। वीरप्पा और सैनिक मदभरी हंसी हंसने लगे। इस तरह के घटनाक्रम से राजा और रानी आंखे फटी की फटी रह गई। कुछ समझ मे नही आया कि हो क्या रहा है। उधर वीरप्पा तो बस हंस रहा था। राजा और रानी को बंधी बनाकर वीरप्पा अब अपनी योजना में कामयाब जो गया था। बस सिहांशन पर बैठकर वो अपना शैतानराज चलाने के सपने देखने लगा।

रानी ने होश सम्भालते हुए राजा से कहा,,,

रानी- राजन यदि यह वीरप्पा है तो राजकुमारी कहाँ है?

वैभवराज- हाँ रानी साहिबा मैं तो भूल ही गया। यह तो वीरप्पा है, फिर राजकुमारी है कहाँ!! (राजा वीरप्पा से पूछता है) वीरप्पा राजकुमारी कहाँ है? सच सच बता,, तूने राजकुमारी के साथ क्या किया? कहाँ है हमारी फूल जैसी बेटी। बता नालायक,, नमकहराम। (कहते हुए राजा की आंखों से आँशु निकल गए)

वीरप्पा- क्या राजन रुक क्यों गए? और गाली दो। मेरी सबसे बड़ी शत्रु तो वो ही थी। उसके बाद तुम हो। लेकिन अब कोई नही है। अब इस राज्य का राज सिंहाशन मेरे पास है। तुम सबसे मैं अब मेरे अपमान का बदला लूंगा।

वैभवराज- कैसा बदला? हमने तुम्हारा क्या अनिष्ट किया है? मूर्ख,,, तुम खुद हार गए थे। इसमें किसी का क्या कसूर है?
 
वीरप्पा- चुप,,, अब ज्यादा मत बोल। यह मत भूल की तू अब मेरा बंधी है। मैं चाहूं तो अभी तुम दोनों का जीवन समाप्त कर सकता हूँ। लेकिन अभी राजकुमार को भी आना है।

वैभवराज- वीरप्पा तू चाहे तो इस राज्य का सारा राजपाट मैं तुमको दे सकता हूँ। बस तू बता दे कि राजकुमारी कहाँ है?

वीरप्पा-(हंसता हुआ) इतनी जल्दी राजन,, तुमने तो सेनापति का पद भी नही दिया था। और उस राजकुमारी की वजह से ही तो मैं अपमानित हुआ था। उसका अंत तो उसी दिन तय हो गया था।

वैभवराज- यह मत भूलो वीरप्पा की तुमने छल किया था और आज भी तुम छल से यहां हो। अभी तक तुम्हारा अज्ञातवास भी पूरा नही हुआ है। सुबह होते ही तुम्हारा असली रूप सबके सामने आ जायेगा। फिर मेरी सेना तुझे जिंदा नही छोड़ेगी।

वीरप्पा- अरे तुम अब राजा नही हो,, मेरे बंधी हो,, सेना और राज्य तुम्हारा नही मेरा है,,,.समझे। और मेरा एक काम करेगा तो, मैं राजकुमारी के बारे में तुम्हे सच बता दूँगा।

वैभवराज- वीरप्पा मैं तुम्हे पूरा राज्य दे सकता हूँ बस, तुम मुझे राजकुमारी से मिला दो।

इस पूरे वाकये में रानी बेतहाशा रो रही थी और राजा बार वीरप्पा को समझा रहा था। लेकिन वीरप्पा तो अब बस राज्य को हथियाना चाहता था और वो भी शाही परिवार को खत्म करके। अपने अपमान का इस तरह से बदला ले रहा था , ऐसा वैभवराज ने कभी नही सोचा था।

वीरप्पा- राजन अब किसी बात का कोई अर्थ, नही है। आज की रात तुम यहीं बिताओ। कल दरबार मे ही तुमसे बात होगी।

कहकर वीरप्पा राजकुमारी के वेश में आ जाता है और शयनकक्ष से बाहर निकल जाता है। राज चिंतित हो जाता है। रानी तो अभी भी रो रही थी। राजा सारी चिंताएं भूलकर रानी को सांत्वना दी रहा था।

वीरप्पा बाहर जाकर कैदखाने की अपनी सेना को समझता है कि आज रात्रि में तुम सबको बाहर निकलना है और जो भी प्रहरी या सैनिक विरोध करे उसको खतम कर दो। शाही परिवार का कोई भी सदस्य या शुभचिंतक सामने आए तो उसे बंदी बना लेना और इस कैद में डाल देना।

सभी कैदी रात्रि में चमगादड़ बनकर बाहर निकलते है और प्रहरियों का रूप धारण कर लेटव है। पहले से तैनात प्रहरियों को मार डालते है। महल के अंदर तैनात सैनिकों को भी ख़त्म कर देते है। इस तरह सुबह होने से पहले ही महल में शाही सेना के अलावा हर तरफ वीरप्पा के शैतानी सैनिक पूर्व के सैनिकों के रूप में तैनात हो गए, ताकि किसी को शक भी ना हो। मेरे हुए समस्त सैनिकों ली शवों को महल के पीछे फेंक दिया गया। अब महल में शाही सेना और शाही परिवार के कुछ सदस्य थे, जो वीरप्पा के नियंत्रण में नही थे।

राजा और रानी को बंधी बना लिया था और कुछ दासियाँ जिनको ना तो इस अनहोनी घटना का पता था और ना वो कुछ कर सकती थी।

शास्त्र में पारंगत पंडित विशम्भर को सपना आया , की राजा खतरे में है। भोर का समय था , विशम्भर बिना नित्यक्रिया से निवृत हुए ही महल की तरफ दौड़ा। लेकिन मुख्य दरवाजे पर पहुंचते ही बंधी बनाकर प्रहरियों से जेल में डाल दिया। अब राजा का कोई भी व्यक्ति नही था जो कि कुछ मदद कर सके। चक्रधर पहले ही अपंग हो चुका था।

राजा और रानी को पूरी रात नींद नही आई। वो सुबह होने का इंतजार कर रहे थे,,,

ऋषि की सेना,राजकुमार और पण्डितपुत्र सबने मिलकर दीवार तो हटा दी लेकिन सामने का दृश्य देख कर सबके होश उड़ गए। एक कोने में एक चुड़ैल सिसक रही थी एयर आस पास सैंकड़ो चुड़ैलें घेरा बनाकर उसको प्रताड़ित कर रही थी।सामने ऊंचे पत्थर पर एक लंबे बाल बाल भयानक चेहरा लिए हुए सफेद वस्त्रों में एक शैतान बैठा हुआ था।

दीवार के हटाते ही सैंकड़ो चमगादड़ो ने ऋषि और बाकी सब पर हमला कर दिया। हमला इतना अचानक और भयानक हुआ कि ना तो पण्डितपुत्र को समय मिल और ना ही ऋषि द्रुम को। चुड़ैलें अट्टहास करने लगी और चमगादड़ ने ऋषि की पूरी सेना को घायल कर दिया। तभी कुलसी आई और एक पास फेंका जिसमे ऋषि , राजकुमार और पण्डितपुत्र बंध गए।

कुलसी- हा हा हा हा हा!! आज तक मेरी इस कोठरी में कोई नही आ सका। तुम लोगों ने क्या समझा कि तुम अपनी मर्जी से आये हो? नही,,, मैं तुम सबको यहां लाई हूं।

ऋषि द्रुम- देखो तुम जो भी हो,, हमारी तुमसे कोई शत्रुता नही है। ह। सिर्फ अच्छे काम के लिए आये है। हमे यहां किसी मानव के कष्ट में होने का अंदेशा है।

कुलसी- हंसते हुए) ऋषि तुम सबसे बड़े मूर्ख हो। तुम्हे पता नही की जिसकी सहायता से तुम यहाँ आये हो वो मेरा ही एक रूप है। तुम मनुष्यों को यही तो कमजोरी होती है। तुम लोग किसी पर भी यकीन कर लेते हो। तुम जिस दिन इस जंगल मे आये थे उसी दिन मुझे पता चल गया था कि तुम मेरे राज्य को नुकसान पहुँचाओगे। तभी मेने मेरे इस रूप को तेरे साथ रखा जो तुम्हे हर बात बताई, ताकि तुम शक ना कर सको और मेरे जाल में फंस जाओ। लेकिन यह दो नवयुवक जानबूझकर मौत के मुहं में आये है।

ऋषि ने अपने साथ राह रहे चमगादड़ की तरफ देखा जो हंस रहा था। और हंसते हंसते चमगादड़ के रूप में आ गया। तभी चुड़ैल के रूप में राजकुमारी कई नजर राजकुमार विजयराज पर पड़ी। वो दौड़कर राजकुमार के पास आती है और राजकुमार के गले लग जाती है।राजकुमार सहित सभी आश्चर्यचकित हो जाते है।

राजकुमारी- (रोते हुए) भैया! आपने मुझे नही पहचान? मैं चन्द्रावती,, आपको बहन। देखो मेरी की हालत कर दी ही इस सबने और यह सब उस विरप्पा की वजह से हुआ।

राजकुमार-(आश्चर्य से) नही तुम मेरी बहन नही हो सकती हो। लगता है यह भी इस चुड़ैल की एक चाल है।

ऋषि द्रुम- हाँ राजकुमार,,, मुझे भी ऐसा ही लग रहा है।

पण्डितपुत्र- नही,,,, ऋषिराज, यह सच बोल रही है। मुझे पता चल गया कि यह राजकुमारी चन्द्रावती है।

तभी कुलसी ने जोर से एक चाबुक राजकुमारी की पीठ पर मारा। राजकुमारी चीख कर गिर पड़ी। यकीन ना होने पर भी राजकुमार को गुस्सा आया।

राजकुमार- तुम यह क्या कर रही हो, इसको क्यों मारा? यह मेरी बहन है या नही, यह तो मुझे नही पता लेकिन मैं जानना चाहता हूं कि इसको मार क्यों रही हो?

कुलसी- राजकुमार विजयराज,,, तुम जान भी सकते की यह कौन है! क्योंकी इसको यह रूप मिला हुआ है। और मैं इसलिए मार रही हूं को इस रूप में मेरे राज में रहकर भी यह चुड़ैल नही बनी। मेरी हर बात टाली है इसने। यदि यह मान लेती तो शायद मैं इसको मेरी सेना का सेनापति बना देती। क्योंको इसमें साहस बहुत है। बहुत बहादुर है यह।

ऋषि द्रुम- लेकिन किसी पर इस तरह जुल्म करना अन्याय है।

कुलसी- ऋषिराज'' मेरी दुनिया ही अन्याय के लिए है। मैं यहां यही सिखाती हूं। तुम लोग तो अन्याय करते नही। किसी को तो करना चाहिए ना।

ऋषि द्रुम- गलत कर रही हो तुम,, तुम्हे इसका परिणाम भुगतना होगा।

तभी एक जोरदार चाबुक ऋषि को मारा और इस प्रहार से ऋषि द्रुम बेहोश हो गए। कुलसी ने एक के बाद एक लगातार चाबुक राजकुमारी पर बरसाए। पण्डितपुत्र और राजकुमार अंदर ही तड़प कर राह गए। राजकुमार में धीरे से पंडितपुत्र को कहा कि तेरी शक्ति कहाँ गई। इस चुड़ैल पर कोई मंत्र तो बोल। लेकिन पण्डितपुत्र ऐसा नही कर सका। वजह यह थी कि चमगादड़ के हमले में पण्डितपुत्र का कमंडल कहीं गिर गया। और पास से बंधे होने के कारण पण्डितपुत्र किसी अन्य आसन का सहारा भी नही ले सकता। इधर ऋषि भी बेहोश हो गए थे।

राजकुमार को अब तक यकीन नही था कि उसकी बहन एओ चुड़ैल है। इस रूप में पहचानना भी सामान्य मनुष्य के लिए आसान नही था। फिर भी राजकुमार के मन मे आशंका थी कि हो सकता है कि राजकुमारी के साथ कुछ गलत हुआ हो। विजयराज राजकुमारी से कहता है,,,

राजकुमार- कन्या तुम खड़ी हो और मुझे अपना चेहरा दिखा फिर से शायद मैं पहचान सकू।

राजकुमारी हिम्मत जुटाकर खड़ी होती है और अपने चेहरे पर बिखरे हुए बाल हटाती है।

राजकुमार- यदि तुम राजकुमारी चन्द्रावती हो तो मेरे इस मित्र को पहचानती हो। बताओ यह कौन है?

राजकुमारी ध्यान से पण्डितपुत्र को देखती है लेकिन पहचान नही पाती है। राजकुमार तो बस परीक्षा ले रहा था। लेकिन राजकुमारी ने सच ही बोल।

राजकुमारी- नही भैया,,, मेने आपके मित्र को नही पहचानती हूं।

राजकुमार- इसके पास जाकर देखो शायद पहचान सको।

राजकुमारी पण्डितपुत्र के नजदीक जाती है लेकिन नही पहचानपाती है। तभी मौका पाकर पण्डितपुत्र धीरे से राजकुमारी को अपने कमंडल के बारे में कहता है। और राजकुमारी की नजर दूर पयदे कमंडल पर पड़ती है। राजकुमारी बिना समय व्यर्थ किए दौड़कर कमंडल को लाकर पण्डितपुत्र को दे देती है। तभी कुलसी का चाबुक राजकुमारी की पीठ पर पड़ता है। इतने में पण्डितपुत्र मंत्र फूंकता है और चाबुक राजकुमारी के हाथ मे आ जाता है।

उधर महल में प्रातःकाल राजकुमारी के रूप में वीरप्पा आकर के राजगद्दी पर बैठ जाता है और दरबार मे यह सूचना देता है कि विशम्भर के साथ महाराज और महारानी कुछ समय के लिए भ्रमण के लिए गए है और राज्य की जिमेदारी मेरे हाथ मे सौंपकर गए है।

वीरप्पा के कहने पर एक सैनिक शाही सेना के सेनापति के पास जाता है और दरबार मे हाजिर होने की बात कहता है।

सैनिक के साथ शाही सेनापति दरबार मे पहुंचता है।

राजकुमारी(वीरप्पा) - सेनापति महोदय,, महाराज कुछ समय के लिए बाहर गए हुए है। और मुझे एक जिमेदारी देकर गए है।

सेनापति- जी राजकुमारी जी,, हुकुम कीजिये। मेरे लिए क्या आज्ञा है।

राजकुमारी- दुर्भाग्य से चक्रधर जी के साथ दुर्घटना हो गई और अब हमें राज्य के लिए एक कुशल सेनापति की जरूरत है। मैं चाहती हूं कि राज्य के सैनिकों के बीच एक प्रतियोगिता रखी जाए और उसमें आपकी सेना के भी सभी यौद्धाओ को शामिल करना है। सभी सैनिकों में से एक यौद्धा जो सभी शस्त्र चलाना बखूबी जानता हो,, उसे सेनापति के पद पर बैठाया जाएगा।

सेनापति- जो आज्ञा राजकुमारी जी,,, मैं सभी को सूचित कर देता

वीरप्पा का राजकुमारी के रूप में आदेश सम्पूर्ण सेना को पहुंचा दिया गया। अगले दिन ही सेना ले अभ्यास मैदान पर शामियाना लगा दिया गया। इस प्रतियोगिता से वीरप्पा का मकसद बहुत कुटिल था। एक योजना के तहत वो ऐसा कर रहा था। बड़ी चालाकी से शाही सेना को को रास्ते से हटाने की योजना को आगे बढ़ाया जा रहा था। राजकुमारी के रूप में वीरप्पा की शाही सवारी मैदान पर पहुंची।
 
जनता ने जयघोष की, और वीरप्पा मदभरी चाल से मैदान में बने ऊंचे सिहांशन की तरफ चला।सामने का नजारा देख कर वीरप्पा अत्यधिक खुश हुआ।शाही सेना का प्रत्येक सैनिक मैदान में प्रतियोगिता के लिए तैयार खड़ा हुआ था। और दूसरी तरफ वीरप्पा के प्रशिक्षित शैतानी सैनिक प्रत्यंचा चढ़ाए हुए खड़े थे। अपनी योजना के अनुरूप हर कार्य को होता देख वीरप्पा प्रशन्न हो गया।

वीरप्पा- सभी सैनिकों को मेरी शुभकामनयें। लेकिन इस पद के लिए सिर्फ एक योग्य यौद्धा की आवश्यकता है। आप सब के इस हौसले को देखकर मैं बहुत खुश हूं कि राज्य में इतने यौद्धा है। मैं आपको इस प्रतियोगिता के कुछ नियम बता देती हूँ।

इस प्रतियोगिता में यदि किसी एक सैनिक का तीर दुर्भाग्यवश किसी दूसरे को लग गया या फिर कोई अन्य दुःखद घटना हो गई तो आप स्वयं ही जिम्मेदार होंगे। जो यौद्धा जितने ज्यादा तीर निशाने पर लगाएगा वही विजेता होगा। यदि आप मे से कोई अभी हटना चाहता है तो आप पीछे हट सकते है।

सभी सैनिक- (एक स्वर में) नही राजकुमारी जी,, हम अपने कदम पीछे नही हटाएंगे। हम इस राज्य के हर आदेश की पालना करते रहेंगे, चाहे इस प्रतियोगिता का विजेता कोई भी हो। और जो विजेता होगा वो हम बाकी सब के लिए सम्माननीय होगा।

वीरप्पा- अतिउत्तम,, बहादुर राज्य की बहादूर सेना।

प्रतियोगिता शुरू की जाय,,,

नगाड़े के तेज ध्वनि के साथ सभी सैनिकों ने प्रत्यंचा चढ़ा ली और निशाने पर तीर मारने शुरू कर दिए। एकाएक कुछ सैनिकों के तीर शाही सेना के सैनिकों को निशाना बनाने लगे। और पलभर में मैदान में लाशें बिछ गई। अचानक हुए इस हमले में शाही सेना सम्भल नही सकी। उनको इस बात का अंदेशा भी नही था कि ऐसा भी हो सकता है क्या। प्रतियोगिता के बहाने वीरप्पा की यह चाल थी कि शाही सेना को खतम किया जाय। अब अपनी छल की चाल को सफल होते देख वीरप्पा बहुत खुश हुआ। तभी इस तबाही को देखकर राज्य का एक बुजुर्ग वीरप्पा के पास आता है।

बुजुर्ग- राजकुमारी जी आपकी आंखों के सामने ऐसा मंजर ,,, आप फिर भी चुप है। मौत के इस तांडव को ध्यान से देखिये,, अपने प्राण हथेली पर रखकर शाही परिवार की रक्षा करने वाले वीर यौद्धा इस तरह मारे जा रहे है। क्या यह उचित है?

वीरप्पा- हम कुछ नही कर सकते है इसमें,,, प्रतिस्पर्धा की यह शर्त पहले बता चुकी हूं। अब जो सबसे बहादूर है वो ही बचेगा।

बुजुर्ग- लेकिन राजकुमारी जी शायद आपको अंदाज नही है कि इस स्पर्धा में हमारे सारे सैनिक मारे जा रहे है। इस तरह से यदि हम सेनापति मिल जाएगा तो हम कौनसी सेना का सेनापति बनायेगें उसे। आप जरा सोचिए।

वीरप्पा- मेने आपको कहा ना कि मैं कुछ नही कर सकती। मैंने सबको पहले ही कहा था कि जिसे भी पीछे हटना है वो हट सकता है।

बुजुर्ग- राजकुमारी जी अपनी आंखों की पट्टी को हटाइये। जरा ध्यान दीजिए कि इस तरह से मौत का तांडव करके कौनसी सेना आप तैयार कर रही हो। महाराज की अनुपस्थिति में अपने ऐसी स्पर्धा का आयोजन किया और वो बीबी इस तरह भयावह मौत का मंजर3 Exclamation mark

वीरप्पा- आप कौन हो इसमें दखल देने वाले। सैनिक इस बूढ़े को बंदी बना लो।

बुजुर्ग- क्या!! राजकुमारी जी मुझे तो शक है कि कहीं आप राज्य के किसी शत्रु से तो नही मिल गई है जो आप अपनी आंखों के सामने इस तरह मौत का खेल खेल रही हो।

तभी दो सैनिक आते है और इस बुजुर्ग को बंदी बना लेते है। उधर मैदान में लाशों के ढेर लग गए थे। वीरप्पा के सैनकों ने शाही सेना को पूरी तरह खतम कर दिया था। तय योजना के अनुरूप शाही सेना तो बस स्पर्धा में हिस्सा ले रही थी और वीरप्पा के सैनिक सिर्फ शाही सेना को खतम करने के इरादे से ही मैदान में उतरे थे।

शाही सेना की लाशों के ढेर देखकर मन ही मन वीरप्पा बहुत खुश हो रहा था, दूसरी तरफ मैदान के चारो तरफ स्पर्धा देखने आए लोगों को यकीन नही हो रहा था कि यह हो क्या रहा है? अपनी आंखों के सामने अपने ही सैनिकों की लाशों के ढेर देखकर कलेजा फट गया। किसी को कुछ समझ नही आया। ना कोई कुछ बोल पा रहा था।

सम्पूर्ण सेना को समाप्त करके वीरप्पा के सभी सैनिक वीरप्पा के पास आकर मुजरा करते है और जयघोष करते है। तभी एक रथ आकर के मैदान में रुकता है। दो सैनिक उतरते है और बंदी बने हुए राजा वैभवराज और रानी तारामती को उतरते है। इस दृश्य को देखते ही समस्त प्रजा को जैसे सांप सूंघ गया। तभी पीछे पीछे एक और, रथ आया जिसमे विशम्भर और चक्रधर थे।

अब प्रजा को समझ आया कि यह क्या हुआ। राजकुमारी का यह रूप तो उन्होंने कभी सपने में भी नही सोचा था। अब तक राजा और रानी के अलावा किसी को पता नही था कि राजकुमारी के रूप में वीरप्पा है। सिर्फ वीरप्पा के सैनिक जानते थे। लेकिन चक्रधर, विशम्भर और प्रजा तो अब तक राजकुमारी ही समझ रहे थे। राजा वैभवराज ने मैदान में लाशों के ढेर देखे तो आंखों से झरना बहने लग गया। उधर विशम्भर और चक्रधर को अब तक कुछ बीबी समझ मे नही आया।

चक्रधर- राजकुमारी, आपका यह रूप!! क्यों, आखिर महाराज से या राज्य के किसी भी नागरिक से ऐसी क्या भूल हो गई कि आप सबको ऐसा कष्ट दे रही हो। कहीं अपने किसी शत्रु से तो हाथ नही मिला लिया है।समझ मे आता है अब की मेरा हाथ कटना भी हादसा नही बल्कि चाल थी।

विशम्भर- आपने हम सबको बंदी बना लिया और शाही सेना का हाल हमारी आँखों के सामने है। लेकिन हमें हमारे कसुर भी बताओ। आखिर ऐसा क्या नही मिला आपको इस राज्य से की आपने ऐसा किया।

वैभवराज- आप लोग जो समझ रहे हो वो सच नही है।

चक्रधर- क्या मतलब राजन!!

वैभवराज- मतलब की यह राजकुमारी नही, राजकुमारी के वेश में वीरप्पा है।

राजा की यह बात सुनकर सभी अचंभित रह जाते है। अब वीरप्पा समस्त प्रजा के सामने ही अपने असली रूप में आ जाता है और जोर से अट्टहास करता है। उसके साथ उसकी सेना भी अट्टहास करती है। वहां मौजूद सभी की आंखे फ़टी की फटी रह जाती है। किसी को इस पर विस्वास नही हो रहा था।

वीरप्पा को इस तरह अट्टहास करते देख और उसके छल को जानने के बाद प्रजा क्रोधित हो जाती है। प्रजा के क्रोध को भांपकर वीरप्पा अपने सैनिकों को इशारा करता है और अगले ही पल वीरप्पा के सैनिक चमगादड़ और चुड़ैल का रूप धारण करके प्रजा पर टूट पड़ते है। कुछ को घायल करते है तो कुछ को मार डालते है। इस भयानक रूप को देखकर प्रजा में हाहाकार मच जाता है और प्रजाजन वहां से अपनी जान बचाकर भाग जाते है।

शाही परिवार के सदस्य और मंत्री ही राह जाते है। जिनको वीरप्पा ने बंदी बना रखा था। वीरप्पा ने फिर कहाँ की सबको लेकर महल में चलो।

सभी वीरप्पा के पीछे पीछे महल की तरफ चलते है। चलते समय राजा वैभवराज और अन्य बंदियों ने मैदान की तरफ कटर निगाह डाली। हर तरफ लाशों के ढेर थे और वो भी उन लोगों के जो कभी राजा के एक इशारे पर अपने प्राण न्योछावर करते थे। उस प्रजा की लाशें भी थी जो राजा वैभवराज की जान हुआ करती थी।

राजा के साथ साथ सभी की आंखों में आँशु और लाचारी थी। चाहकर भी वो लोग कुछ नही कर पा रहे थे। उधर वीरप्पा आगे आगे रथ पर हंसता हुआ जा रहा था और पीछे पीछे क्रूर सैनिक सभी बंदियों को घसीटते हुए ले जाने लगे। युद्ध के मैदान को श्मशान बना हुआ देखकर सभी का कलेजा फैट गया।

राजा के मन मे अब राजकुमारी चन्द्रावती का ध्यान आ रहा था । पत नही कहाँ है और किस हाल में है। रानी तो बेसुध ही थी। वो तो बस राजकुमारी के वियोग में खो चुकी थी बाकी कुछ उसको समझ ही नही आ रहा था।

उधर राजकुमारी की फुर्ती और सोच से कमंडल अब पण्डितपुत्र के हाथ मे था। बेंत राजकुमारी के हाथ मे आते ही कुलसी भी अचंभित रह गई। अब तक वो स्वयं को सबसे शक्तिशाली समझ रही थी लेकिन पण्डितपुत्र की शक्ति देखकर वो थोड़ी भयभीत हो गई थी। राजकुमारी ने अब पण्डितपुत्र को कहा,,,

राजकुमारी- भैया, अब क्या करना है? इन लोगों ने मुझे बहुत सताया है। और पता नही की वीरप्पा अपनी किस हद तक गया होगा। राज्य में क्या हो रहा है उसका तो मैं अंदाज भी नही लगा सकती। आप अनजान होते हुए भी मेरी सहायता ले लिए यहां पहुंच गए। मैं आपका धन्यवाद करती हूं।

पण्डितपुत्र- राजकुमारी जी मैं अनजान नहीं हूं। आपके ही राज्य ल एक नागरिक हूँ। या यूं कहूँ तो शाही परिवार का एल सदस्य।

राजकुमार- मित्र क्या कह रहे हो! इतने दिन साथ रहने पर भी तुमने मुझे कभी बताया नही की तुम हमारे परिवार ले सदस्य हो।

पण्डितपुत्र- हां राजकुमार, मैने बताया नही,लेकिन आपके राजदरबार के पंडित विशम्भर को जानते हो आप?

राजकुमारी-हां भैया मैं अच्छे से जानती हूँ। क्या उनके पुत्र है। जो पढ़ने के लिए आश्रम में गए हुए थे।

पण्डितपुत्र- हां राजकुमारी जी,,, राजकुमार , मेरा नाम कार्तिक है। और मैं आपके दरबार का ही सदस्य हु। आप दोनों निश्चिन्त रहे। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि आपको सही सलामत राज्य में ले जा सकू।

राजकुमार- मित्र कार्तिक,, बहुत खुशी हुई और अब तो मेरा भी जोश दुगुना हो गया है। तुम पहले मुझे खोलो हम दोनों भाई मिलकर इन शैतानों को खतम कर देंगे।

कार्तिक- हां राजकुमार,,, अवश्य।

कार्तिक ने अब राजकुमार और ऋषि दोनो को आजाद कर दिया। उधर कुलसी दांत पीस रही थी। सबसे पहले कार्तिक ने मंत्र बोलकर दो तलवार बनाई और राजकुमारी और राजकुमार को दी। उसके बाद ऋषि द्रुम को समझाया कि आप शैतान को नियंत्रण में करो।

ऋषि- कार्तिक मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ। मुझे तन्त्र विद्या का ज्ञान नही है।

कार्तिक- लेकिन ऋषिराज , हमारे पास इतना समय नही है। हमे राजकुमारी को इस रूप से मुक्त करना है इसके लिए आपको शैतान की पूजा करनी पड़ेगी। तब तक हम तीनों मिलकर इस सेना से मुकाबला करते है।

ऋषि- ठीक है। मैं कोशिश करता हूं।

ऋषि द्रुम शैतान की पूजा करने लग जाता है। इधर क्रोधित होकर कुलसी अपनी सम्पूर्ण सेना को आदेश दे देती है। राजकुमारी जो कि एक कुशल यौद्धा भी है, कुलसी के सैनिकों को मौत के घाट उतार रही थी। दुगुने जोश से राजकुमार भी अब तलवार चलाने लगा। जैसे ही एक चमगादड़ राजकुमार की तरफ आया तो अपना बचाव करते हुए राजकुमार ने चमगादड़ पर तलवार से वार किया और वार करते ही चमगादड़ का पंख कटकर दूर जा गिरा। पंख कटते ही चमगादड़ इंसान के रूप में आ गया और घायल होकर गिर पड़ा।

अब तो राजकुमार को और जोश आ गया। राजकुमार को पता चल गया कि तलवार की चोट लगते ही इनकी शैतानी शक्ति वाला रूप गायब हो जाता है। तो राजकुमार और राजकुमारी दोनो अब पूरे जोश से कुलसी की सेना से लड़ने लगे। दूरी तरफ कार्तिक कुलसी के घायल सैनिकों को तन्त्र विद्या से राख में बदल रहा था ताकि कुलसी अपनी शक्ति से उनको फिर जिंदा ना कर सके।

ऋषि द्रुम शैतान की पूजा में लगा हुआ था।तभी कुलसी ने सैनिक को इशारा किया और एक चमगादड़ ऋषि के सामने बने हवन कुंड में कूद गया। और ऋषि की पूजा भंग कर दी। उसी क्षण कार्तिक ने उस चमगादड़ को राख बना दिया और फिर से हवनकुंड में अग्नि प्रज्ज्वलित हो गई।

अपना हर वार खाली जाता देख कुलसी वहां से गायब हो गई। कुलसी की समस्त सेना को तो नष्ट कर दिया गया। लेकिन राजकुमारी अपने असली रूप में नहीं आ सकी।

कार्तिक- राजकुमारी , क्या आप बता सकती है कि आपका असली रूप वापिस कैसे आयेगा? क्योंकि आप इतने दिन से यहां रह रही हो।

राजकुमारी- भैया, मैं नही जानती की इन लोगों ने कैसे रूप बदला या फिर वापिस कैसे असली रूप आ सकता है।

लेकिन भैया आपने देखा कि इन शैतानों को तलवार लगते ही इनका असली रूप सामने आ जाता है।

कार्तिक- क्या मतलब! आप कहना क्या चाह रही हो?

राजकुमारी- मेरे कहने का मतलब है कि आप मेरे शरीर का कोई अंग काट दीजिये। जिससे मेरा असली रूप वापिस आ जायेगा।

राजकुमार- पागल हो गई हों आप? हम ऐसा कुछ नही करेंगे।

राजकुमारी- फिर आप ही बताओ भैया, की आप क्या करोगे? वो कुलसी गायब हो गई है और इस गुफा में उसको ढूंढना मुश्किल है। उसकी सेना भी नष्ट हो गई है।

कार्तिक- हमारे पास कोई और रास्ता तो नही है लेकिन हम ऐसा भी नही कर सकते है।

राजकुमारी- तो फिर हमें इसी हाल में महल ले चलिए। हम पिताजी और मां की बहुत याद आ रही है। कृपया कुछ कीजिये।

कार्तिक- अगर इस रूप में आप महल में गई तो आपके पिताश्री और रानी मां और ज्यादा दुःखी हो जाएंगे। नहीं,, हमे कुछ करना ही पड़ेगा।

राजकुमार- मित्र हम क्या कर सकते है।
 
कार्तिक- सोचने दो।

राजकुमारी- भैया ज्यादा मत सोचो। कहीं कुलसी और सेना लेकर वापिस आ गई तो,, हम कब तक इनका सामना कर सकेंगे। और इस शैतानी ताकत का कोई अंदाजा नही है हमे।

राजकुमार- तुम चिंता मत करो बहन, हम कुछ करेंगे। जरूर,

राजकुमारी- भैया, अब ज्यादा समय व्यर्थ करने से कोई लाभ नही। मेरा एक हाथ कट जाने से मैं मरुँगी तो नही ना। अपने असली रूप में खुस रहूंगी। लेकिन यह रूप मुझे काटने को दौड़ता है। आप काट दीजिये ना मेरा एक हाथ।

कार्तिक- बात तो आपकी सही है राजकुमारी जी,, और राजकुमार हमारे पास कोई और रास्ता भी तो नही है। क्या पता कुलसी कौनसी योजना बनाकर कब वापिस आ जाये, हमारे पास इतना समय भी नही है।

राजकुमार- मित्र, मन तो नही मान रहा है, लेकिन आप दोनों की बात भी बिल्कुल सही है।

कार्तिक कुछ सोचने लगा और तलवार हाथ मे ले ली,, राजकुमार जरा भयभीत हुआ और अपनी आंखें बंद कर ली। राजकुमारी ने खुशी खुशी अपना हाथ आगे कर दिया,,,,,

हाथ मे तलवार लेकर कार्तिक सोचता हुआ राजकुमारी की तरफ बढ़ रहा था, उत्सुकता से राजकुमार उसे देख रहा था और राजकुमारी ने आंखे बंद करके हाथ आगे कर दिया। राजकुमारी बस यह चाहती थी कि किसी भी तरह उसे राजमहल पहुंचना है उसके लिए वो अपना हाथ भी कटा सकती है।

उधर ऋषि द्रुम अब तक शैतान की पूजा में लगे हुए थे। अचानक एक तेज बिजली की चमक के साथ अंधड़ सा आया। बादलों की सी गड़गड़ाहट होने लगी और जोर जोर से किसी के हंसने की आवाजें आने लगी। कार्तिक और राजकुमार डर गए। इधर उधर देखने लगे। ऋषि अपनी पूजा में लीन थे।

अचानक एक चमगादड़ तेज रफ्तार से आकर कार्तिक के हाथ से टकराता है और कार्तिक के हाथ से तलवार छूट जाती है। राजकुमार भी सहम जाता है। फिर एक चमगादड़ों का समूह आता है और कार्तिक पर हमला कर, देता है। अचानक हुए इस हमले से कार्तिक सम्भल नही पाता है और गिर जाता है, राजकुमारी कार्तिक की तरफ दौड़ती है तो एक और चमगादड़ तेज रफ्तार से राजकुमारी पर हमला करता है और राजकुमारी गिर जाती है।

तब तक राजकुमार सचेत हो जाता है और तलवार लेकर इधर उधर पैनी नजर दौड़ाता है, एक चमगादड़ राजकुमार की तरफ आता है तो राजकुमार तलवार के वार से उसे ढेर कर देता है। तभी ऋषि के समक्ष एक भयानक और विशाल शैतान प्रकट होता है और कहता है,,,

शैतान- रुक जाओ सैनिको,,,

ऋषि द्रुम(आंखे खोलकर) - शैतानराज को मेरा सादर प्रणाम,,

शैतान- आज तक मेरी साधना सिर्फ छल कपट और गलत कार्य करने वालो ने की है,, आज पहली बार एक सन्त ने मेरी पूजा की है, क्या मैं इसका कारण जान सकता हूँ?

ऋषि द्रुम- शैतानराज, आपकी इस दुनिया मे अनायास ही एक अबोध और निरपराध बालिका फंस चुकी है। हम उसको उक्त कराने आये है और आपकी सेना से लड़ने में असमर्थ है, इस कारण आपका आह्वान किया है।

शैतान- मुझे सब कुछ पता है, आपकी सच्चाई के लिए मैं आपकी सहायता करूँगा। लेकिन राजकुमारी को यहां से ले जाना कठिन है।

ऋषि द्रुम- क्यों! इसका कोई कारण?

शैतान- ऋषिराज, राजकुमारी किसी शर्त के कारण यहां कैद है। आप उसे ले जा सकते हैं परंतु उसका असली रूप नही आ सकता है।

ऋषि द्रुम- लेकिन शैतानराज, यह कैसे हो सकता है, यदि आप रूप बदल सकते हो तो अब वापिस असली रूप भी तो दे सकते हों।

, In pager

शैतान- ऋषिराज आप एक साधक हो, आपको पता है कि शैतानी दुनिया के नियम कितने कठोर और पक्के होते है। राजकुमारी शापित है।

इतना सुनते ही ऋषि सही सभी अचंभित रह जाते है। राजकुमार तो अपने होश खो बैठता है और रोने लग जाता है। कार्तिक राजकुमार को सम्भालता है , राजकुमारी भी बेचेत हो जाती है। ऋषि द्रुम दौड़कर राजकुमारी को सम्भालता है। फिर शैतान से पूछता है,,

ऋषि द्रुम- तो शैतानराज इसका कोई निवारण तो होगा ही। माना कि आपकी दुनिया के नियम कठोर होते है लेकिन किस तरह की परीक्षा देनी होगी हम तैयार है। राजकुमारी को इस श्राप से मुक्त करने के लिए। बताइए कि हमे क्या करना होगा?

शैतान- जिस मनुष्य के कारण राजकुमारी शापित हुई उसे वापिस यहां लाना पड़ेगा। यदि वो वापिस आता है तो राजकुमारी अपने असली रूप में आ जायेगी।

ऋषि द्रुम- वो मनुष्य कौन है? क्या आप हमें बता सकते है?

शैतान- नहीं, उसका पता मेरी सेनापति कुलसी जानती है। वो ही आपको बता सकती है।

कुलसी का नाम सुनते ही सभी फिर से डर जाते है। अभी कुछ ही समय पहले सबने कुलसी का वो भयानक रूप देखा था। बड़ी मुश्किल से बचे थे अब दुबारा कुलसी का सामना नही करना चाहते थे। लेकिन करना भी होगा। वो ही बता सकती है कि राजकुमारी को श्राप दिया किसने।

ऋषि और कार्तिक आपस मे मन्त्रणा करते है, राजकुमार और राजकुंमारी दोनो भाई बहन एक दूसरे को देखते है और रोने लगते है।

ऋषि- शैतानराज, आप कुलसी को बुला सकते है?

शैतान- ठीक है, मैं हरसम्भव आपकी सहायता करूँगा।

इसके पश्चात शैतान मन मे कुछ बुदबुदाता है और कुछ ही पलों में एक भयानक शैतानी आवाज ले साथ और चुड़ैलों की अति भयानक सेना ले साथ कुलसी आती है। आते ही कुलसी के सभी सैनिक ऋषि , कार्तिक, राजकुमारी और राजकुमार को घेर लेते है। लेकिन शैतान के इसारे के बाद वो कुछ दूर हो जाते है।

कुलसी- गुरु देव, आप इन पर रहम मत कीजिये, इन्होंने हमारे कितने सैनिक मार दिए, मैं इनको छोडूंगी नही।

शैतान- शांत हो जा कुलसी,,, मैंने ऋषि से वादा किया है और यह लोग सच्चे है। एक निरपराध को हमने कैद किया है। तुम जानती हो कि मैं शैतान जरूर हुँ परन्तु मैं किसी निरपराध को सजा नही देता। अब तुम बताओ कि राजकुमारी शापित कैसे हुई।

शैतान की आज्ञा से कुलसी बोलना शुरू करती है और वीरप्पा के अज्ञातवास से राजकुमारी को छल से वीरप्पा द्वारा श्राप दिलाना सब कुछ बताती है। कार्तिक यह सुनकर बहुत क्रोधित होता है, साथ ही राजकुमार की आंखे भी लाल हो जाती है। एक मामूली से सैनिक की यह हिम्मत की राजकुमारी पर इतना जुर्म करे।

, In pagerऋषि- कुलसी महोदया,, उस श्राप से मुक्ति का कोई उपाय,,, कृपा करके बताओ।

कुलसी- हमारी दुनिया के नियम के अनुसार हमे वो इंसान वापिस चाहिए। आप राजकुमारी को ले जा सकते हो लेकिन बदले में यहां कोई भी इंसान होना जरूरी है। यदि आप मेसे कोई एक राजकुमारी के बदले यहां रहे तो राजकुमारी अपने असली रूप में बाहर जा सकती है। और वीरप्पा को मृत या जीवित यदि आप लेकर आते हो तो जो राजकुमारी के बदले यहां रुकेगा वो भी बाद में जा सकता है।

ऋषि द्रुम और कार्तिक दोनों एक दूसरे की तरफ देखते है। उधर राजकुमार भी अब जोश में आ जाता है। लेकिन यहां किसी को रहना भी है तो कौन रहेगा।

कार्तिक- ऋषिराज, मैं यहाँ राजकुमारी के बदले रहूंगा, आप और राजकुमार राज्य में जाइये और वीरप्पा को लेकर आइये।

ऋषि - कार्तिक यह इतना आसान नही है। और फिर तुम्हे क्या लगता है कि वीरप्पा बेखबर बैठा होगा जो हम जाकर उसे लेकर आ जाएंगे। वो कपटी है छली है,, जिसने राजकुमारी को इस कदर शैतानी दुनियां में फंसा दिया, क्या वो राज्य में आराम से रह रहा है। हो ना हो वहां भी वो किसी अन्य चाल चलने में लगा होगा। मुझे तो डर है, उसके मंसूबे बेहद खतरनाक है।

कार्तिक- सही है ऋषिराज, राज्य का सेनापति पद पाने के लिए यदि उसने ऐसी चाल चली है तो क्या पता राज्य में और क्या क्या छल किया होगा। फिर हम क्या करें।

ऋषि- आप और राजकुमार दोनों राजकुमारी को लेकर जाओ, मैं यहां रुकता हूं ।

राजकुमार- लेकिन ऋषिराज , हम आपको यहां खतरे मैं छोड़कर कैसे जा सकते है। आप निःस्वार्थ हमारी सहायता कर रहें है, वो भी आपका उपकार है।

ऋषि- राजकुमार अब किसी भी अन्य बहस का कोई लाभ नही है। आप समझ लो कि यह एक उपकार और कर रहा हूँ। जब राज्य में सब कुछ सही हो जाएगा तो आप मुझे इनाम दे देना। लेकिन अब आप लोग जाओ।

कार्तिक- लेकिन ऋषिराज इस भयानक शैतानी दुनियां में आपको अकेला कैसे छोड़े?

शैतान-आप चिंतित ना हो, एक ऋषि का सम्मान करना मुझे आता है, मैं बिना वजह किसी को भी परेशान नही करता हूं। ना ही मेरी सेना करती है। और फिर ऋषिराज की तपस्या से मैं खुश हूं। तो आप निश्चिंत होकर जाइये और अपना फर्ज अदा कीजिये।

शैतान की बातों से अब कार्तिक को कुछ यकीन हुआ लेकिन राजकुमार को अभी भी शंका थी। परंतु इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण यह बात थी कि राजकुमारी को श्राप मुक्त करके राज्य में जाकर पता लगाना की वीरप्पा क्या कर रहा है और फिर वीरप्पा को वापिस शैतान को भी शौंपना भी है। तो कार्तिक और ऋषि के कहने पर अब राजकुमार भी तैयार हो गया था।

कुलसी ने एक मंत्र फूंका और अगले ही पल राजकुमारी अपने वास्तविक रूप में आ गई। लेकिन ऋषि द्रुम अब चुड़ैल बन गए थे। हांलकि इस परिवर्तन को देख कर किसी का भी मन नही हुआ कि ऋषि को इस हालात में छोड़कर जाएं। परन्तु अब वीरप्पा के कुटिल इरादों से परिचित होने के बाद राज्य को चिंता भी होने लगी थी तो ऋषि से विदा लेकर तीनो अब गुफा से बाहर निकल जाते है।गुफा से बाहर आकर तीनो ने साधरण वेश में राज्य में जाकर वीरप्पा की गतिविधियों का पता लगाने की योजना बनाई। और चले राज्य की तरफ,,,,,,

जंगल मे आकर तीनो ने सोचा कि यदि वीरप्पा ने कोई चाल चलकर राज्य में किसी अनहोनी को अंजाम दे दिया तो क्या होगा। कार्तिक ने समझदारी दिखाकर दोनो भाई बहन को सचेत किया। राजकुमारी अतिशीघ्र राज्य में जाना चाहती थी। लेकिन कार्तिक के अनुसार पहले पता करना जरूरी है कि राज्य में सब ठीक ठाक है कि नही।

राजकुमारी- कार्तिक भैया,, आप क्यों इतना सोच रहे हो? अरे मुझे पहले पिताश्री और रानी मां से मिलना है। आप मत रोको, मुझे जाना है ।

कार्तिक- राजकुमारी, मैं समझ सकता हूँ कि आप इतना उतावलापन क्यों दिखा रहे हो। जाहिर सी बात है कि इतने दिन इस हालत में घर से दूर रहना बहुत मुश्किल होता है।

राजकुमारी-तो फिर आप क्यों रोक रहे हो भैया?

कार्तिक- अरे पागल, थोड़ा दिमाग लगा। जो वीरप्पा तुमको इस तरह श्राप देकर शैतानी गुफा में पहुंचा सकता है क्या वो राज्य में कोई चाल नही चल सकता। हां मैं भी चाहता हूं कि राज्य में सब कुशल हो, लेकिन यदि कुछ गलत हुआ और बिना सोचे समझे हम घुस गए तो,,,,,, सोचो,,,

राजकुमार- कार्तिक बिल्कुल सही कह रहा है राजकुमारी। हमे पहले ध्यान से छानबीन करनी चाहिए।

राजकुमारी- अच्छा बाबा,, अब तुम दो पंडितों के आगे मेरी कहाँ चलने वाली है। करो जो करना है वो।

कार्तिक- अरे ये क्या,, आप तो बस नाराज हो गई। हम सही कह रहे है।

राजकुमार- इसमें पंडित वाली कौनसी बात है! इतने दिन राज्य की गतिविधियां देख रही थी आप,, क्या आप इतना भी नहीं समझ सकती।

राजकुमारी- हाँ मुझे ही डाँटो अब,, मैंने क्या किया?(रोने लगती है)

कार्तिक- राजकुमार आप भी बिल्कुल पागल हो,, इस बेचारी पर क्यों गुस्सा कर रहे हो? गलती तो उस वीरप्पा की है। अपना गुस्सा उस पर निकालना।
 
राजकुमार- मैं कहाँ गुस्सा कर रहा हूँ। यह तो बात ही नही समझ रही है। और मिलने दो उस वीरप्पा को तो,,,,,,, उसकी तो मैं ऐसी हालत करूँगा ना कि वो अगले 10 जन्म तक इंसान बनने की ख्वाहिस ही नही रखेगा।

कार्तिक- ओए,, महाबली,, अब ज्यादा तेवर मत दिखा, और कुछ सोच की राज्य में कैसे प्रवेश करें।

राजकुमारी आप चिंतित मत हो,, यह तो नादान है, आपका यह भाई बहुत समझदार है। हम जल्दी ही राजमहल पहुंच जाएंगे।

राजकुमार- क्या,, क्या,,,क्या3 Exclamation mark तुमने किसको नादान बोला,,,

कार्तिक-अरे मैं वीरप्पा नही हु जो मुझ पर गुस्सा कर रहा है, मैं तो उस हिरन को नादान बोल रहा हूँ ,, वो देख कैसे दौड़ रहा है

राजकुमार का मुंह छोटा सा हो जाता है, वो समझ जाता है कि कार्तिक मजाक कर रहा है तभी राजकुमारी हंसने लगती है। कार्तिक भी यही चाहता था, राजकुमारी को हंसता हुआ देख कर दोनों मित्र हंसने लगते है। कुछ देर इधर उधर की बातों में लगाकर कार्तिक राजकुमारी से पूछता है,,,

कार्तिक- राजकुमारी आप हमसे ज्यादा राज्य में रही हो, हम दोनों तो जानते ही नही की हमारा राजमहल कैसा है। हम तो छोटे ही पढ़ने चले गए थे।आप बताओ कि राज्य में प्रवेश करने का सबसे सही रास्ता कौनसा है। राज्य में कौनसा घर ऐसा है कि जहाँ जाकर हम राजमहल की जानकारी सही से ले सकते है, जिस पर आपको यकीन हो कि वो हमें गलत नही बताएंगे।

राजकुमारी- रास्ते पर तो हमे सम्भल कर ही जाना होगा। यदि जैसा आप सोच रहे हो वैसा हुआ तो कोई भी रास्ता ऐसा नही है जहां से आप निसंकोच निकल सको। और हां आपका ही घर है ना भैया,, आपके ही घर मे सही सूचना मिलेगी और चक्रधर जी के घर से भी मुझे विस्वास है कि हमे सब सच ही बताया जाएगा।

राजकुमार- फिर हम जाएं किस रास्ते से, बहना? रास्ता तो सिर्फ तुम्ही जानती हो,, हम तो नही जानते।

राजकुमारी- चलिए,, मेरे पीछे पीछे चलो।

राजकुमारी की पीछे पीछे दोनो चलते है। जंगल खतम हुआ और राज्य की सीमा में प्रवेश करते ही देखते है कि मुख्य मार्ग पर सैनिक तैनात है,, जो कि राज्य के सैनिक नही लगते है। राजकुमारी को भी अब शक हुआ कि यह क्या है,,अक्सर इस रास्ते पर सामान्य सुरक्षा रहती है और जो सैनिक है वो भी हमारे सैनकों जैसे नही लगते है।

राजकुमारी- भैया,, यह सैनिक हमारी सेना के तो नही है। यह तो कुछ विचित्र लग रहे है।

कार्तिक- मुझे शंका थी पहले ही कि वीरप्पा ने जरूर कोई चाल चली होगी। अब क्या करें? कैसे राज्य में प्रवेश करें।

राजकुमारी-अब तो हमे रात्रि का इंतजार करना होगा।

राजकुमार-लेकिन कोई और तरीका भी तो हो सकता है।

तभी कार्तिक चौंक कर बोलता है कि,,,

कार्तिक- अरे ये तो बहुत बुरा हुआ,,,!!

राजकुमार- अब क्या हुआ,, क्या दिख गया तुम्हे!!

कार्तिक- सामने दिख रहे सैनिक कोई मानव नही बल्कि मायावी है।

राजकुमार- क्या मतलब!

कार्तिक- मतलब की,, वीरप्पा ने शैतानी शक्ति का उपयोग राज्य किया है। और यह सैनिक उसी शैतानी शक्ति वाले है, जिनका सामना हमसे गुफा में हुआ था।

कार्तिक के इतना कहने पर राजकुमारी और ज्यादा भयभीत हो जाती है,, कि पिताश्री और रानी माता का क्या हुआ,, वो कहाँ है, किस हाल में है,, इस तरह सवाल करने लगती है।

कार्तिक राजकुमारी को चुप करता है और कहता है कि,,

कार्तिक- इस तरह घबराने से कुछ नही होगा। क्या पता राज्य के अंदर का हाल क्या है? हमे सचेत होकर और सावधानी से सब पता लगाना है।

राजकुमारी- लेकिन भैया किसी सामान्य सेना का तो हम मुकाबला कर सकते है परंतु इस तरह की मायावी सेना का कैसे करेंगे?

कार्तिक- क्यों नहीं करेंगे! जैसे कुलसी का किया था ना सामना,, वैसे ही हम तीनों मिलकर इस सेना का भी मुकाबला करेंगे और जीतेंगे भी। क्या आप इतनी कमजोर हो?

राजकुमारी- नही भैया,, मैं कमजोर नही हूँ और वीरप्पा के छल का बदला लेने के लिए तो मैं कुछ भी कर सकती हूं। मैं अकेली ही इस सेना से भिड़ सकती हूं।

कार्तिक- वाह,,यह हूई ना बात। इसी बहादुरी से हमे वीरप्पा को हराना है।

राजकुमार- आप दोनों एक दूसरे की तारीफ ही करते रहोगे क्या फिर कोई योजना सोचोगे भी।

कार्तिक- हाँ, सोचते है।

कार्तिक कुछ देर सोचकर कहता है,,

कार्तिक- मेरे पास एक योजना है।

राजकुमारी- क्या! शीघ्र बताओ।

कार्तिक- मैं इन सैनिकों को अपने नियंत्रण में लड़ सकता हूँ। यदि एक एक सैनिक मेरे पास में बंध जाए तो मैं मंत्र से उसको अपना गुलाम बना सकता हूँ।

राजकुमार- वो कैसे! ऐसा कैसे करोगे। क्या यह सम्भव है?

कार्तिक- हाँ, यह मायावी सैनिक है , और यह सब स्वयं कुछ नही लर सकते है। इनको कोई ना कोई निर्देश देने वाला होना चाहिए। मायावी शक्ति हमेशा किसी के द्वारा नियंत्रित रहती है और मैं इस मायावी शक्ति को नियंत्रित कर सकता हूँ।

राजकुमार- वाह,, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन एक साथ इतने सैनिकों को कैसे तुम पास में बाँधोगे?

कार्तिक- हाँ, यही समस्या है। यदि एक सैनिक सामने हो तो मैं उसको कैद कर सकता हूँ।

राजकुमार- तो हमे इन सबको अलग अलग करना पड़ेगा।

राजकुमारी- वो कैसे करेंगे? लेकिन यदि ऐसा कर सके तो मैं तलवार से इनका सामना बहु कर सकती हूं।

कार्तिक- हाँ , यह भी ठीक है। अब सुनो , हम तीनों को भी अलग अलग रहना होगा। हम तीन तरफ से जाएंगे। दो तरफ से आप दोनों उनका जब तक हो सके मुकाबला करना और तब तक मैं किसी एक को पास में बांध लूंगा। लेकिन मेरा इसारा मिलते ही आपको तुरंत वहां से वापिस आना होगा वरना आप मुश्किल में पड़ सकते हो।

राजकुमारी- लेकिन भैया, आपके इसारे का कैसे पता चलेगा।

कार्तिक- (सोचकर) मैं जोर से वीरप्पा का नाम लूंगा और आप समझ जाना। नाम सुनते ही आप दोनों दौड़कर वापिस इसी जगह छुप जाना। लेकिम ध्यान रहे कि यदि कोई सैनिक आपका पीछा कर रहा हो तो उसको खतम भी करना।

राजकुमारी- ठीक है मैं इसका पूरा ध्यान रखूंगी।

कार्तिक- चलो , फिर।
 
कार्तिक छुपकर जाता है जबकि राजकुंमारी और राजकुमार तलवार लेकर सामने से जाते है। सैनिक जैसे ही देखते है उन पर टूट पड़ते है।लेकिन राजकुमारी ने एके कुशल यौद्धा की भांति लड़ते हुए सैनिकों को मार रही थी। अपने सैनिक मरते देख कर कुछ सैनिक चुड़ैल बन जाते है। तभी जोर से आवाज आती है,,, वीरप्पा,, ।

वीरप्पा का नाम सुनते ही सभी सैनिक दौड़ते है और मौका पाकर राजकुमार और राजकुमारी दौड़कर छुप जाते है। दूसरी तरफ से कार्तिक एक साथ दो सैनिकों को बंदी बनाकर ले आता है।

थोड़ी देर में राजकुमार और राजकुमारी भी आ जाते है। अपनी योजना में कामयाब होकर तीनो बहुत खुश होते है। उधर सैनिकों में अफ़रातफ़री मच जाती है कि अचानक यह क्या हुआ?.

राजकुमार- कार्तिक अब तुम अपना काम शीघ्रता से करो।

कार्तिक - चिंतित ना हो राजकुमार , अब हम जरूर कामयाब होंगे।

कार्तिक एक मंत्र फूंकता है और दोनो सैनिक बेहोश हो जाते है। कुछ क्षण बाद दोनों अलग ही अंदाज में आंखे खोलते है। कार्तिक के चेहरे पर मुस्कान देखकर राजकुमार समझ जाता है कि अब कार्तिक अपनी योजना में पूर्ण रूप से कामयाब हो गया है। फिर कार्तिक सैनिक से राज्य के बारे में पूछता है। सैनिक एक गुलाम की तरह वीरप्पा की प्रत्येक चाल और कार्य का वर्णन करता है। राजा और रानी के साथ अन्य बंदियों की भी सम्पूर्ण जानकारी देता है।

कार्तिक- राजकुमारी,, मेरा शक सही निकला ना,, लेकिन अब हम इन दो सैनिकों के सहारे एक सेना का निर्माण करेंगे जो वीरप्पा से लड़ने में हमारी मदद करेंगे।

राजकुमारी-- वो कैसे भईया,,, यह हमारी मदद कैसे कर सकते है?

वीरप्पा के सैनिक को पकड़ने के बाद कार्तिक उसको वश में कर लेता है। वीरप्पा के दोनो सैनिक वीरप्पा की सारी बातें बता दी। वीरप्पा की करतूत से राजकुमार बहुत क्रोधित हुआ। राज्य के छिनने से ज्यादा अपने माता पिता के साथ हुए दुर्व्यवहार से दुखी हुआ और क्रोध में गरजने लगा। लेकिन कार्तिक ने समझाया कि हमे हर कदम सोच समझकर उठाना होगा। क्रोध में कहीं गलती हो गई तो हमे बहुत परेशानी हो जाएगी।

राजकुमारी- भैया, अब हमें जल्द ही कुछ करना चाहिए। वीरप्पा का अत्यचार न केवल अपने परिवार पर बल्कि राज्य के सभी प्रजाजनों पर भी बढ़ रहा है। (जैसा सैनिक ने बताया)

कार्तिक- हा, राजकुमारी जी, लेकिन पहले योजना बनानी होगी। वीरप्पा के पास सेना है और हम यहां सिर्फ तीन लोग है। तो हमे हर कार्य योजना के अनुरूप करना होगा।

राजकुमार- कार्तिक तुम शीघ्र योजना बनाओ। अब हमारे पास ज्यादा वक्त नही है।

कार्तिक- हाँ राजकुमार, थोड़ा धीरज रखो। और हां कोई भी कदम हम तीनों आपस मे एक दूसरे से सलाह करके ही उठाएंगे। कहीं प्रतिशोध में तुम बिन सोचे मत बढ़ना।

राजकुमार- नही कार्तिक, तुम बताओ। हम उसी अनुसार आगे बढ़ेंगे।

राजकुमारी- कार्तिक भैया सही कह रहे है। लेकिन हमें कुछ लोग चाहिए जो हमारा सहयोग कर सके।

कार्तिक- उसके लिए मेरे पास एक योजना है।

राजकुमार- क्या है! जल्दी बताओ।

कार्तिक- ध्यान से सुनो,, इन सैनिकों को अब मैं जो आदेश दूँगा यह वैसा ही करेंगे। सबसे पहले तो इस रास्ते के सारे सैनिकों को हम इनके जरिये यहां बुलाएंगे और मैं उनको वश में कर लूंगा। उसके बाद हमारे वश में होकर यह सैनिक हमारा हर आदेश मानेंगे। फिर धीरे धीरे राज्य के लोगों को हम यहाँ जंगल मे बुलाएंगे। आप दोनों राजकुमार और राजकुमारी राज्य के असली उत्तराधिकारी हो तो लोगों को आप दोनों समझाओगे। वीरप्पा से त्रस्त राज्य के लोग हमारी बात मान लेंगे। हो सकता है कुछ लोग यकीन ना करें लेकिन उनको भी हमे यकीन दिलाना होगा।

राजकुमार- लेकिन राज्य के लोग हमारी मदद कैसे करेंगे?

कार्तिक- जितने भी लोग हमारे साथ होंगे उन सबको राजकुमारी तलवार चलाना सीखा देंगी। हमे थोड़ा वक्त भी लगेगा, लेकिन ऐसा ही करना पड़ेगा।

राजकुमारी- हां भैया , मैं सबको तलवारबाजी सीखा दूँगी। लेकिन हमारे पास हथियार कहाँ से आएंगे।

कार्तिक-वो भी हो जाएगा। हम इन्ही सैनिकों से और अन्य सैनिक जिनको वश में करेंगे उनके हथियार से काम चलाएंगे। फिर जब हमारे साथ ज्यादा सैनिक हो जाएंगे तो हमे हथियार के लिए एक और चाल चलनी पड़ेगी , जो मैं बाद में बता दूँगा। पहले हम इतना तो करें। फिर आगे सोचेंगे।

राजकुमार- ठीक है, तुम अपने काम मे लगो। मुझे क्या करना है वो बात देना।

कार्तिक- ठीक है।

फिर कार्तिक उन दोनों सैनिकों के जरिये उस रास्ते के बाकी सैनिकों को एक एक करके जंगल मे ले आते है ओर वहां आते ही कार्तिक उन सबको वश में कर लेता है। धीरे धीरे राज्य के अंदर जितने भी सैनिक तैनात थे उन सबको इसी तरह जंगल मे ले जाकर वश में कर लेता है। अब महल की सेना का पता भी उन सैनिकों के सहारे करता है।

अब वीरप्पा के सैनिक जो कि कार्तिक के वश में थे उन पर कोई शक भी नही करता और वो बस कार्तिक के आदेश की पालना कर रहे थे। राजकुमारी राज्य के कुशल और वफ़ादार लोगों को जानती भी थी तो राजकुमारी के बताने पर वशीभूत सैनिक उन लोगों को धीरे धीरे जंगल मे लाने लगे। बिना किसी को शक हुए कार्तिक की योजना आगे बढ़ रही थी।

राज्य के लोग कार्तिक और राजकुमार को तो नही जानते थे लेकिन सब राजकुमारी को जरूर जानते थे। तो सब लोग कार्तिक की योजना से सहमत हो गए। राजकुमारी को जानने का परिणाम यह हुआ कि अब राज्य के लोग भी धीरे धीरे एक एक करके अन्य लोगों को जंगल मे लाने लगे और वीरप्पा के खिलाफ सेना बनाने में मदद करने लगे।
 
उधर राजकुमारी सबको तलवार चलाना सीखा रही थी। चूंकि राजकुमारी भी एक कुशल यौद्धा थी। हथियार चलाने में माहिर थी तो प्रजाजनों को अच्छे से तैयार कर रही थी। 10 दिन के बाद राजकुमारी और कार्तिक ने मिलकर हजारों की तादाद में राज्य के साधारण लोगो को सैनिको का रूप दे दिया। अब इन 10 दिनों में राजकुमार भी हथियार चलाना सीख गया था।

लेकिन सेना तो अब वीरप्पा की सेना से बहुत कम थी। हथियार भी कम। महल में तो सैनिकों को भेज नही सकता था। क्योंकि वीरप्पा भी तो शैतानी शक्ति वाला था। वो पहचान जाता। राजकुमारी ने अब राज्य के और लोगों को शामिल करना चाह रही थी। कार्तिक के कहने पर जिन लोगों को हथियार चलाना सीखाया था उनको राज्य के अन्य लोगो को समझा कर लाने के लिए भेजा। प्रजा वीरप्पा से नाखुश थी तो सभी चाहते थे कि वीरप्पा राज्य से बाहर हो इसलिए सभी राजकुमार और राजकुमारी के साथ हो गए।

अब बस कमी थी तो हथियारों की। राज्य के एक लोहार को राजकुमारी जानती थी जो कि हथियार बनाता था। कार्तिक ने एक सैनिक को भेज कर उसको बुलाया। वो लोहार भी राजकुमारी को जानता था। लेकिन राजकुमार और कार्तिक को नही जानता था तो थोड़ा संकोच में था।

कार्तिक- महोदय मेरा नाम कार्तिक है और मैं पंडित विशम्भर जी का पुत्र हूं। यह आपकी राजकुमारी के जुड़वां भाई विजयराज है। हम दोनों शिक्षा ग्रहण करने हेतु राज्य से बाहर थे। अब राज्य पर इस तरह की विपदा आ गई है तो आपकी सहायता की जरूरत है।

लोहार- मैं राजकुमारी जी को अच्छी तरह जानता हूं। माफी चाहता हूं कि आप दोनों को पहचान नही सका। राज्य पर आई विपदा से सभी त्रस्त है। आप बताओ कि मैं कैसे आपकी सहायता कर सकता हूं।

कार्तिक- जी आपको हथियार बनाने आते है। हमारे पास ना तो संसाधन है और ना ही पर्याप्त हथियार। आप अतिशीघ्र हमे हथियार बनाकर दीजिये। यह राज्य सदैव आपका ऋणी रहेगा।

लोहार- जी महोदय, मुझे राज्य की भलाई के लिए काम करके गर्व होगा। मेरे पास जितना संसाधन है वो पर्याप्त है। मैं हथियार बना दूँगा। आप मेरे साथ 5/7 लोगों को भेज दीजिये जो मेरी मदद कर सके।

कार्तिक- जी जरूर, लेकिन आप जल्द कीजिये यह काम। हमारे पास समय कम है।

लोहार- आप निश्चिन्त रहें, कल तक पर्याप्त हथियार बना दूँगा।

लोहार कुछ लोगो को साथ लेकर जाता है और काम मे लग जाता है। पूरी रात्रि में काम करके राजकुमारी के सेना के लिए हथियार बना देता है। लेकिन इतनी मात्रा में हथियार राज्य से बाहर कैसे ले जाये। डर था कि यदि वीरप्पा के किसी खास की नजर पड़ गई तो सारी योजना चौपट हो जाएगी। लोहार वापिस जंगल मे कार्तिक के पास आता है।और बताता है।

कार्तिक अपने वशीभूत सैनिकों को एक एक करके भेजता है और प्रत्येक सैनिक अपने साथ 2-2तलवार लेकर जंगल मे वापिस आते है। शाम होते होते कार्तिक के पास सेना और हथियार दोनों इतने हो जाते है कि वीरप्पा की सेना से मुकाबला किया जा सके।

उधर राजकुमारी रात्रि में भी आराम नही करती बल्कि सभी को तलवार चलाना सीखा रही थी। अब बस सुबह का इंतजार था।

कार्तिक- हमारे पास अब इतनी सेना ही कि हम वीरप्पा का मुकाबला लर सकते है लेकिन फिर भी हमे सावधानी से अपनी योजना को आगे बढ़ना है। सेना को दो भागों में बांट लो। एक का सेनापति राजकुमार और दूसरी की राजकुमारी। मायावी सैनिकों को मैं लेकर जाऊंगा।

राजकुमारी- हमे किस तरह से आक्रमण करना होगा।

कार्तिक- आप अपनी सेना लेकर आगे जाओगे,क्योंकि आप महल के हर कोने को जानती हो। मेरा एक मायावी सैनिक आपके साथ रहेगा जो सिर्फ आपका संदेश राजकुमार और मुझे देगा। मैं और राजकुमार आपके पीछे पीछे रहेंगे।

राजकुमारी-जी कार्तिक भैया। मातारानी की कृपा से और हमारे सभी साथियों के सहयोग से कल वीरप्पा को उसकी असली जगह पहुँचा दिया जायेगा।

कार्तिक- अब सभी लोग आराम करो। सुबह होते ही हमे अपनी योजना को अंजाम देना है। अपने राज्य को बचाने के लिए और पाप से लड़ने के लिए कभी कदम पीछे मत हटाना। हमें संघर्ष करना है जीत अंततः हमारी ही होगी। बस अपने मन से भय निकाल दो और टूट पड़ना पापियों पर।

सभी एक स्वर में बोलते ही ,, हम पीछे नहीं हटेंगे, पापियों का सर काटकर ही दम लेंगे।

राजकुमार भी अब यह जोश देखकर निश्चिन्त हो जाता है।

रातभर राजकुमारी की आंखों में नींद नही थी। प्रातःकाल का इंतजार उसके लिए बहुत लम्बा हो रहा था। उधर राजकुमार और कार्तिक भी युद्ध की रणनीति बनाने में लगे हुए थे। राजकुमारी को पहले महल में हमला करने भेज तो रहे थे लेकिन उनको भय था कि कहीं वीरप्पा की शैतानी शक्तियों में राजकुमारी फंस ना जाए।

तब राजकुमार ने कहा कि मैं सेना लेकर बाहर से आक्रमण करूँगा और राजकुमारी के साथ कार्तिक महल के अंदर जाएगा। कार्तिक ने भी बात मान ली। अब तय हो गया कि राजकुमारी और कार्तिक आधी सेना लेकर महल में जाएंगे और हमला करेंगे। राजकुमार आधी सेना के साथ बाहर से उनका सहयोग करेगा।

भोर हुई तो राजकुमारी ने अपनी सेना तैयार की और उनको समझाने लगी। उधर राजकुमार भी अपनी सेना को तैयार कर रहा था। दोनों ने आपनी अपनी सेना को तैयार किया और रणनीति बताई। जो मायावी सैनिक थे उनको कार्तिक तंत्रविद्या के सहारे तैयार कर रहा था। सम्पूर्ण तैयारी हो जाने के बाद कार्तिक ने सबको सम्बोधित किया।
 
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