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रॉबर्ट छिदाई का सेट लेकर आया और उसकी टांगों के बीच स्टूल खींचकर बैठ गया। उसने रुई को स्पिरिट से भिगोकर उसकी भगनासा को और चारों तरफ पोंछा। वहाँ पर वह अत्यंत संवेदनशील हो गई थी और हर छुअन पर फड़क जाती थी। यद्यपि स्पिरिट की ठंडक उसका दर्द कम करने के लिए थी। रॉबर्ट ने चिमटी से भगनासा के दाने को पकड़ा और सुई से उसमें दाएँ से बाएँ आर-पार छेद कर दिया। खून की एक छोटी-सी बूंद बनने लगी। रॉबर्ट ने सोने का रिंग निकाला और उसको उस छेद में इस पार से उस पार पहना दिया। शालू दाँत पर दाँत दबाए सी सी करती अपनी चीखें दबाने की कोशिश कर रही थी। रॉबर्ट ने रिंग के खुले छोरों को सँड़सी से दबाकर सटाया और मांस को बचाते हुए सोल्डिंग रॉड से रिंग के सिरों को वेल्ड कर दिया।
मैंने रॉबर्ट से पूछा- सोल्डरिंग से तो रिंग गर्म हो गई होगी और शालू को जल रहा होगा?
वह बोला- हल्का-सा, ज्यादा नहीं। This pain is not more than the piercing pain. Everything will be ok ! (यह दर्द छिदाई के दर्द से ज्यादा नहीं है, सब ठीक हो जाएगा।)
उसने रुई से पोंछकर मरहम लगा दिया, बोला- दो दिन में घाव ठीक हो जाएगा। बस पेशाब उसे बचाकर करना होगा नहीं तो क्षार से जलन होगी। बेहतर होगा ऊपर से पानी की धार डालती हुई पेशाब करे।
गुलाबी कली में छिदी सुनहली अंगूठी सुंदर लग रही थी। उसके ठीक ऊपर पंख फड़फड़ाता एक किंगफिशर पक्षी- नुकीली चोंच नीचे रिंग पर लक्ष्य किए, जैसे झपट्टा मारकर उसे ले उड़ेगा। सुनहला रिंग किसी कीड़े की तरह कली में घुसा हुआ था और किंगफिशर उसे चोंच मारकर पकड़ लेने को उद्यत। बहुत सु्ंदर उकेरा था उसने। पक्षी की झपटने की गति को जीवंत कर दिया था। चोंच के नीचे रिंग बड़ी चुलबुली लग रही थी। गुदाई और छिदाई की बेहतरीन जुगलबन्दी थी। रॉबर्ट कलाकार था।
हमने शालू के फीते खोल दिए, वह निस्पंद पड़ी रही। मैं उसे दम लेने के लिए छोड़कर रॉबर्ट के साथ बाहर चला आया।
हॉल में मैंने रॉबर्ट को पैसे दिए और उसके काम की तारीफ की। उसने बहुत सुंदर गुदाई और छिदाई की थी। मैंने उसे वीडियो की एक कॉपी देने का वादा किया।
घर लौटते समय वह कार में ही सो गई। इतनी थकी और परास्त थी कि मैं उसे उठाकर घर के अंदर ले गया और बिस्तर पर डाला। किसी तरह साड़ी मैंने उसके बदन में लपेट दी थी। साया खुला ही था। वह अगले दिन तक सोती ही रही। बच्चों को मैंने समझा दिया मम्मी की तबियत ठीक नहीं है।
सुबह उठा तो वह बाथरूम में थी। दरवाजे से देखा वह बाथटब के किनारे पर बैठी थी और एक छोटा आइना लेकर पैरों के बीच देख रही थी। मुझे देखकर लगा वह मुझे डाँटेगी पर वह मुस्कुराई और बोली- उस रॉबर्ट ने तो अच्छा काम किया है।
मैं चकित रह गया। मैंने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।
उपसंहार :
उस दिन के बाद से हमारे यौन जीवन में जैसे एकदम से परिवर्तन आ गया। मैं उसके गुदने और छल्ले को देखने छूने के लिए रोमांचित रहता।
शालू तो जैसे बदल गई। उसमें उत्साह का झरना खुल गया। भगनासा पर उसे हमेशा छल्ला महसूस होता और उसकी इच्छा होती रहती। अक्सर पैंटी से छल्ला रगड़ खाकर उसकी उत्तेजना बढ़ा देता, वह मुझे ऑफिस में फोन करती- मन हो रहा है, चले आओ ना !
वगैरह।
सेक्स करते समय भगनासा पर रिंग की वजह से जल्दी ही स्खलित हो जाती। मुझे मुँह से करने में ज्यादा आनन्द आने लगा। जल्दी ही उसके चरमसुख और योनि के रसों का प्रसाद मिल जाता। उसके रस में शराब का नशा बढ़ गया। वह सदा तैयार और गीली मिलती। मेरी सक्रियता बहुत बढ़ गई। एक बार मैंने सुबह उसके रिंग में एक मोती का झुमका पहना दिया। हिदायत दे दी कि दिन भर उसे हाथ से हरगिज नहीं छुए। मैंने उसे पैंटी पहनने से भी मना कर दिया। शाम को जब घर लौटा तो वो बेकरार थी। बड़ी मुश्किल से खुद को छूने से रोक पाई थी। उस रात हमने हमारे बीच क्या लहालोट मची कहने की बात नहीं।
पर अब उसे हर समय की उत्तेजना परेशान करने लगी है। कहती है ‘रिंग की वजह से हर समय मन होता रहता है। हाथ अपने-आप उधर चला जाता है। किसी और चीज में ध्यान नहीं जमता।’
मैं उसे धैर्य रखने की सलाह देता हूँ, कहता हूँ- कुछ दिन में उसकी अभ्यस्त हो जाओगी।
पर वह कहती है न होगा तो रिंग निकलवा देंगे।
मैं अपने अनुभवी पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वह रिंग निकलवा दूँ?
समाप्त
मैंने रॉबर्ट से पूछा- सोल्डरिंग से तो रिंग गर्म हो गई होगी और शालू को जल रहा होगा?
वह बोला- हल्का-सा, ज्यादा नहीं। This pain is not more than the piercing pain. Everything will be ok ! (यह दर्द छिदाई के दर्द से ज्यादा नहीं है, सब ठीक हो जाएगा।)
उसने रुई से पोंछकर मरहम लगा दिया, बोला- दो दिन में घाव ठीक हो जाएगा। बस पेशाब उसे बचाकर करना होगा नहीं तो क्षार से जलन होगी। बेहतर होगा ऊपर से पानी की धार डालती हुई पेशाब करे।
गुलाबी कली में छिदी सुनहली अंगूठी सुंदर लग रही थी। उसके ठीक ऊपर पंख फड़फड़ाता एक किंगफिशर पक्षी- नुकीली चोंच नीचे रिंग पर लक्ष्य किए, जैसे झपट्टा मारकर उसे ले उड़ेगा। सुनहला रिंग किसी कीड़े की तरह कली में घुसा हुआ था और किंगफिशर उसे चोंच मारकर पकड़ लेने को उद्यत। बहुत सु्ंदर उकेरा था उसने। पक्षी की झपटने की गति को जीवंत कर दिया था। चोंच के नीचे रिंग बड़ी चुलबुली लग रही थी। गुदाई और छिदाई की बेहतरीन जुगलबन्दी थी। रॉबर्ट कलाकार था।
हमने शालू के फीते खोल दिए, वह निस्पंद पड़ी रही। मैं उसे दम लेने के लिए छोड़कर रॉबर्ट के साथ बाहर चला आया।
हॉल में मैंने रॉबर्ट को पैसे दिए और उसके काम की तारीफ की। उसने बहुत सुंदर गुदाई और छिदाई की थी। मैंने उसे वीडियो की एक कॉपी देने का वादा किया।
घर लौटते समय वह कार में ही सो गई। इतनी थकी और परास्त थी कि मैं उसे उठाकर घर के अंदर ले गया और बिस्तर पर डाला। किसी तरह साड़ी मैंने उसके बदन में लपेट दी थी। साया खुला ही था। वह अगले दिन तक सोती ही रही। बच्चों को मैंने समझा दिया मम्मी की तबियत ठीक नहीं है।
सुबह उठा तो वह बाथरूम में थी। दरवाजे से देखा वह बाथटब के किनारे पर बैठी थी और एक छोटा आइना लेकर पैरों के बीच देख रही थी। मुझे देखकर लगा वह मुझे डाँटेगी पर वह मुस्कुराई और बोली- उस रॉबर्ट ने तो अच्छा काम किया है।
मैं चकित रह गया। मैंने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया।
उपसंहार :
उस दिन के बाद से हमारे यौन जीवन में जैसे एकदम से परिवर्तन आ गया। मैं उसके गुदने और छल्ले को देखने छूने के लिए रोमांचित रहता।
शालू तो जैसे बदल गई। उसमें उत्साह का झरना खुल गया। भगनासा पर उसे हमेशा छल्ला महसूस होता और उसकी इच्छा होती रहती। अक्सर पैंटी से छल्ला रगड़ खाकर उसकी उत्तेजना बढ़ा देता, वह मुझे ऑफिस में फोन करती- मन हो रहा है, चले आओ ना !
वगैरह।
सेक्स करते समय भगनासा पर रिंग की वजह से जल्दी ही स्खलित हो जाती। मुझे मुँह से करने में ज्यादा आनन्द आने लगा। जल्दी ही उसके चरमसुख और योनि के रसों का प्रसाद मिल जाता। उसके रस में शराब का नशा बढ़ गया। वह सदा तैयार और गीली मिलती। मेरी सक्रियता बहुत बढ़ गई। एक बार मैंने सुबह उसके रिंग में एक मोती का झुमका पहना दिया। हिदायत दे दी कि दिन भर उसे हाथ से हरगिज नहीं छुए। मैंने उसे पैंटी पहनने से भी मना कर दिया। शाम को जब घर लौटा तो वो बेकरार थी। बड़ी मुश्किल से खुद को छूने से रोक पाई थी। उस रात हमने हमारे बीच क्या लहालोट मची कहने की बात नहीं।
पर अब उसे हर समय की उत्तेजना परेशान करने लगी है। कहती है ‘रिंग की वजह से हर समय मन होता रहता है। हाथ अपने-आप उधर चला जाता है। किसी और चीज में ध्यान नहीं जमता।’
मैं उसे धैर्य रखने की सलाह देता हूँ, कहता हूँ- कुछ दिन में उसकी अभ्यस्त हो जाओगी।
पर वह कहती है न होगा तो रिंग निकलवा देंगे।
मैं अपने अनुभवी पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि क्या वह रिंग निकलवा दूँ?
समाप्त