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शैतान से समझौता
लेखिका वर्षा
"आआआहहह ह ह ह ...."
रोकते रोकते भी उसके मुंह से एक दर्द भरी चीख निकल ही गई। वो एक गंदा सा कम रौशनी वाला कमरा था। जून का उमस भरा दिन था पर खिड़की और दरवाज़े बंद थे यहां तक की पर्दे भी लगे हुए थे। छत से एक मरघिल्ला सा बल्ब लटक रहा था जिसकी रौशनी उस कमरे के लिये पर्याप्त नहीं थी।
बल्ब के नीचे एकचरमराता सा बिस्तर था जिस पर मटमैली सी चादर बिछी थी जहां वो निढाल पड़ी थी।
उसके मुंह से फिर एक घुटी हुई चीख निकली।
नहीं! उसे खुद पर काबू रखना होगा वरना कोई उसकी आवाज़ सुन लेगा। आखिर इतना तंग मोहल्ला है ये!
पर और कितनी देर?? दो दिन तो हो गए थे उसे यहां आए हुए।
दर्द की एक और लहर उठी। उसने जल्दी से एक तकिये का कोना मुंह में भर लिया। वो हिम्मत करके जरा सा उठी और बगल की दराज़ से एक चौड़े फल वाला चाकू निकाल लिया।
अब किसी भी पल!! उसे तैयार रहना होगा!!
अब तक का सबसे भयंकर दर्द का ज्वार आया और...
ये हो गया!
वो पसीने पसीना हो चुकी थी और बुरी तरह हांफ रही थी।
वो कितनी देर तो निढाल पड़ी रही। फिर उसे थोड़ा अजीब लगा.…कोई आवाज़ क्यों नहीं आ रही???
वो हिम्मत करके उठ के बैठ गई और चाकू को मज़बूती से पकड़ लिया। पर जब उसकी नजर सामने बिस्तर पर पड़ी तो उसका चाकू वाला हाथ हवा में ही रुक गया और उसकी सांसे भी!!
....ये तो लड़की है..कितनी सुंदर..बिलकुल..
"नहीं...ये मैं क्या कर रही हूं..मुझे मजबूत होना होगा...
उसने चाकू वाला हाथ उपर उठाया..जबड़े भींचे हुए थे..आंखें बंद की और एक झटके से....
चाकू कमरे के पार फेंक दिया और फूट फूट कर रोने लगी।
"नहीं..ये मुझसे नहीं हो पाएगा" वो बहुत देर तक सुबकती रही।
सुबह हो चुकी थी। उसने रात भर सोचने के बाद फैसला कर लिया था। वो यहां से चली जाएगी और खुद के होने के सारे निशान मिटा देगी। अब तक जो भी हुआ..उसने जो कुछ भी किया...पर अब वो सिर्फ एक मां है और कुछ नहीं।
उसने पास रखी दराज से एक घिसापिटा सा कागज निकाला और उस पर एक चिट्ठी लिखने लगी....
"जानती हूं तुम मुझे ढूंढते हुए यहां जरूर आओगे...
उसने लिखना शुरू किया।
,
"......और यही सबके हक़ में सही होगा, अलविदा।
उसने चिट्ठी लिखनी खत्म की। उसे एक बार पूरा पढ़ा और वहीं मेज पर एक पुराने घुन लगे लकड़ी के फूलदान के नीचे दबा दिया। अब जल्द ही इस जगह को छोड़ना होगा।
उसने अपनी एक दिन की बच्ची को गोद में उठाया और बाहर का दरवाज़ा खोला। हल्की बारीश होने लगी थी। उसने एक लंबी सांस ली और चल पड़ी...न जाने कहां!
लेखिका वर्षा
"आआआहहह ह ह ह ...."
रोकते रोकते भी उसके मुंह से एक दर्द भरी चीख निकल ही गई। वो एक गंदा सा कम रौशनी वाला कमरा था। जून का उमस भरा दिन था पर खिड़की और दरवाज़े बंद थे यहां तक की पर्दे भी लगे हुए थे। छत से एक मरघिल्ला सा बल्ब लटक रहा था जिसकी रौशनी उस कमरे के लिये पर्याप्त नहीं थी।
बल्ब के नीचे एकचरमराता सा बिस्तर था जिस पर मटमैली सी चादर बिछी थी जहां वो निढाल पड़ी थी।
उसके मुंह से फिर एक घुटी हुई चीख निकली।
नहीं! उसे खुद पर काबू रखना होगा वरना कोई उसकी आवाज़ सुन लेगा। आखिर इतना तंग मोहल्ला है ये!
पर और कितनी देर?? दो दिन तो हो गए थे उसे यहां आए हुए।
दर्द की एक और लहर उठी। उसने जल्दी से एक तकिये का कोना मुंह में भर लिया। वो हिम्मत करके जरा सा उठी और बगल की दराज़ से एक चौड़े फल वाला चाकू निकाल लिया।
अब किसी भी पल!! उसे तैयार रहना होगा!!
अब तक का सबसे भयंकर दर्द का ज्वार आया और...
ये हो गया!
वो पसीने पसीना हो चुकी थी और बुरी तरह हांफ रही थी।
वो कितनी देर तो निढाल पड़ी रही। फिर उसे थोड़ा अजीब लगा.…कोई आवाज़ क्यों नहीं आ रही???
वो हिम्मत करके उठ के बैठ गई और चाकू को मज़बूती से पकड़ लिया। पर जब उसकी नजर सामने बिस्तर पर पड़ी तो उसका चाकू वाला हाथ हवा में ही रुक गया और उसकी सांसे भी!!
....ये तो लड़की है..कितनी सुंदर..बिलकुल..
"नहीं...ये मैं क्या कर रही हूं..मुझे मजबूत होना होगा...
उसने चाकू वाला हाथ उपर उठाया..जबड़े भींचे हुए थे..आंखें बंद की और एक झटके से....
चाकू कमरे के पार फेंक दिया और फूट फूट कर रोने लगी।
"नहीं..ये मुझसे नहीं हो पाएगा" वो बहुत देर तक सुबकती रही।
सुबह हो चुकी थी। उसने रात भर सोचने के बाद फैसला कर लिया था। वो यहां से चली जाएगी और खुद के होने के सारे निशान मिटा देगी। अब तक जो भी हुआ..उसने जो कुछ भी किया...पर अब वो सिर्फ एक मां है और कुछ नहीं।
उसने पास रखी दराज से एक घिसापिटा सा कागज निकाला और उस पर एक चिट्ठी लिखने लगी....
"जानती हूं तुम मुझे ढूंढते हुए यहां जरूर आओगे...
उसने लिखना शुरू किया।
,
"......और यही सबके हक़ में सही होगा, अलविदा।
उसने चिट्ठी लिखनी खत्म की। उसे एक बार पूरा पढ़ा और वहीं मेज पर एक पुराने घुन लगे लकड़ी के फूलदान के नीचे दबा दिया। अब जल्द ही इस जगह को छोड़ना होगा।
उसने अपनी एक दिन की बच्ची को गोद में उठाया और बाहर का दरवाज़ा खोला। हल्की बारीश होने लगी थी। उसने एक लंबी सांस ली और चल पड़ी...न जाने कहां!