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मेरा नाम राहुल श्रीवास्तव है. मैं लखनऊ से हूँ और मुंबई में रहता हूँ. देखने में स्वस्थ मर्द हूँ और लड़कियों के मामले में बहुत खुशकिस्मत हूँ.
कुछ दिन पहले मैं दिल्ली में था. मुझे निकलना था मगर रिजर्वेशन था नहीं. इसलिए मैं नई दिल्ली के टी.टी. ऑफिस में चल गया. मैं स्वतंत्रता सेनानी ट्रेन के टी.टी का इंतज़ार कर रहा था कि तभी एक 20 से 22 साल की काली लड़की भी आई, उसने पूछा कि भुवनेश्वर की ट्रेन का टी.टी आ गया क्या? फिर बातों ही बातों में पता चला कि उसको भी भुवनेश्वर जाना है कोई एग्जाम देने, दोस्तो बहुत काली थी वो, पर उसमें एक नशा था.
छोटी सी चूचियां 32 के साइज़ की होंगी शायद, कद 5’5″ का था. दुबली पतली सी थी. पता नही क्यों मुझे उसकी आँखों में उदासी और चहेरे पर परेशानी दिखी. शायद अकेली होने का भय, रिजर्वेशन न होना आदि के कारण परेशान लग रही थी. न जाने क्यों मुझे उसमें इंटरेस्ट आ गया.
खैर टी.टी ने बता दिया कि दोनों ही ट्रेन में सीट नहीं हैं, वो परेशान हो गई. अब मैं ठहरा चोदू इंसान. मौका ऐसे कैसे छोड़ देता. तभी ऐ.सी. का टी.टी बोला कि फर्स्ट ऐ.सी. में भुवनेश्वर तक 2 पैसेंजर वाला कूपा खाली है, आप बोलो तो आप दोनों को देता हूँ? वो हम दोनों को एक समझ रहा था.
मैंने झट से हाँ कह दी.
तब काली लड़की बोली- मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं.
मैंने बिना सोचे-समझे उसका हाथ पकड़ा और चल पड़ा ट्रेन की ओर, और वो बेचारी डरी-सहमी खिंचती चली आई. कूपे में समान एडजेस्ट किया. उसके बाद हम दोनों भी अपनी जगह पर बैठ गए.
दिल्ली से भुवनेश्वर करीब 30 घंटे की यात्रा थी और ट्रेन भी करीब 10 घंटे लेट थी. 12 बजे ट्रेन चल दी, अब वो भी संभल गई थी.
हमने बातें शुरू कीं तो वो बोली- सच में मेरे पास पैसे इतने नहीं हैं.
मैंने कहा- कोई बात नहीं, मैं तुमसे पैसे नहीं मांग रहा हूं, जब आपके पास होंगे तब दे देना या मत देना, हम दोनों को भुवनेश्वर पहुँचना है, इस समय इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है.
फिर उसने अपना नाम स्मिता बताया. वो छत्तीसगढ़ की थी पर मैं उसको सलोनी नाम से ही बुलाऊंगा. (सलोनी का मतलब सांवली होता है) मैंने खुद को राहुल बताकर मोबाइल में अपने आप को व्यस्त कर लिया.
सलोनी नॉर्मल सी लड़की थी. रंग काला पर आँखें भूरी, लंबी सी नाक, सुराही सी गर्दन, पतली कमर मगर कूल्हे थोड़े ज्यादा थे. चूची ज्यादा बड़ी नहीं थी पर उभार कुर्ते के ऊपर से साफ दिख रहे थे. एक से एक खूबसूरत गोरी गुलाबी लड़कियां मेरे जीवन में आईं और उनका भोग भी लगाया लेकिन काली सलोनी लड़की पहली बार मेरे से टकराई थी. उसकी पर्सनेलिटी में ना जाने क्या था जो मुझे उसकी ओर आकर्षित कर रहा था.
खैर दिखावे के लिए मैं मोबाइल में लगा हुआ था लेकिन दिमाग सोच रहा था कि शुरुआत कैसे करूँ?
तभी सलोनी बोली- आपका शुक्रिया, आप की वजह से मैं एग्जाम दे पाऊंगी.
मेरे को तो जैसे जीवन मिल गया क्योंकि बातचीत से सलोनी को मैं इम्प्रेस करके उसका भोग लगा सकता हूँ। मैं बोला- अरे ऐसी कोई बात नहीं, दोनों को जाना था मुझे लगा कि एक से भले दो, तो सफर अच्छा कट जाएगा.
यह सुनकर सलोनी पहली बार मुस्कराई.
कसम से क्या नशीली मुस्कान थी, गालों में डिम्पल उफ्फ्फ … सलोनी थोड़ा सहज महसूस करने लगी थी. लंबा सफर था.
तभी टी.टी आया, मैंने टिकट बनवाया और फिर दरवाज़ा लॉक कर लिया, बातों-बातों में पता चला कि वो छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की रहने वाली है. स्नातक डिग्री किए हुए थी. दिल्ली में रह कर कम्पटीशन की कोचिंग ले रही थी. अकेले पेइंग गेस्ट में रहती थी. आगे बढ़ने की बहुत चाह थी उसके अंदर. सुन कर सच में अच्छा लगा कि देश की लड़कियां भी कुछ करने की इच्छा रखती हैं और वो माँ-बाप धन्य हैं जो अपनी लड़की को पढ़ा रहे हैं.
उसके 3 छोटे भाई-बहन और थे दिल्ली में. वो कुछ कोचिंग सेंटर में पार्ट टाइम पढ़ाया भी करती है जिससे अपना खर्चा खुद निकाल सके. उसको देख कर कहीं नहीं लगा कि सलोनी इतनी स्वाबलंबी और आत्मनिर्भर लड़की होगी.
खैर, ट्रेन धीमी रफ़्तार से बढ़ रही थी और सफर आराम से कट रहा था. मगर मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उसके साथ कुछ गलत करुँ … पर दिल नहीं मान रहा था. फिर मैंने सोचा वक्त पर ही सब छोड़ देता हूं, अभी बहुत लंबा सफर है।
इस बीच कानपुर फ़ोन करके अपने एक जूनियर साथी से खाना लाने के लिए बोल दिया था.
मैंने कोशिश की कि बात का सिलसिला प्रेम संबंधों की तरफ मोडूं, मुझे थोड़ी सफलता भी मिली. कॉलेज में कोई बॉयफ्रेंड नहीं था, क्योंकि उसका रंग देख कर कोई पास नहीं आता था.
वो बोली- पता नहीं, कोई लड़का मेरे पास आया ही नहीं.
रंग को लेकर काफी दुखी सी महसूस हुई।
कुछ दिन पहले मैं दिल्ली में था. मुझे निकलना था मगर रिजर्वेशन था नहीं. इसलिए मैं नई दिल्ली के टी.टी. ऑफिस में चल गया. मैं स्वतंत्रता सेनानी ट्रेन के टी.टी का इंतज़ार कर रहा था कि तभी एक 20 से 22 साल की काली लड़की भी आई, उसने पूछा कि भुवनेश्वर की ट्रेन का टी.टी आ गया क्या? फिर बातों ही बातों में पता चला कि उसको भी भुवनेश्वर जाना है कोई एग्जाम देने, दोस्तो बहुत काली थी वो, पर उसमें एक नशा था.
छोटी सी चूचियां 32 के साइज़ की होंगी शायद, कद 5’5″ का था. दुबली पतली सी थी. पता नही क्यों मुझे उसकी आँखों में उदासी और चहेरे पर परेशानी दिखी. शायद अकेली होने का भय, रिजर्वेशन न होना आदि के कारण परेशान लग रही थी. न जाने क्यों मुझे उसमें इंटरेस्ट आ गया.
खैर टी.टी ने बता दिया कि दोनों ही ट्रेन में सीट नहीं हैं, वो परेशान हो गई. अब मैं ठहरा चोदू इंसान. मौका ऐसे कैसे छोड़ देता. तभी ऐ.सी. का टी.टी बोला कि फर्स्ट ऐ.सी. में भुवनेश्वर तक 2 पैसेंजर वाला कूपा खाली है, आप बोलो तो आप दोनों को देता हूँ? वो हम दोनों को एक समझ रहा था.
मैंने झट से हाँ कह दी.
तब काली लड़की बोली- मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं.
मैंने बिना सोचे-समझे उसका हाथ पकड़ा और चल पड़ा ट्रेन की ओर, और वो बेचारी डरी-सहमी खिंचती चली आई. कूपे में समान एडजेस्ट किया. उसके बाद हम दोनों भी अपनी जगह पर बैठ गए.
दिल्ली से भुवनेश्वर करीब 30 घंटे की यात्रा थी और ट्रेन भी करीब 10 घंटे लेट थी. 12 बजे ट्रेन चल दी, अब वो भी संभल गई थी.
हमने बातें शुरू कीं तो वो बोली- सच में मेरे पास पैसे इतने नहीं हैं.
मैंने कहा- कोई बात नहीं, मैं तुमसे पैसे नहीं मांग रहा हूं, जब आपके पास होंगे तब दे देना या मत देना, हम दोनों को भुवनेश्वर पहुँचना है, इस समय इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है.
फिर उसने अपना नाम स्मिता बताया. वो छत्तीसगढ़ की थी पर मैं उसको सलोनी नाम से ही बुलाऊंगा. (सलोनी का मतलब सांवली होता है) मैंने खुद को राहुल बताकर मोबाइल में अपने आप को व्यस्त कर लिया.
सलोनी नॉर्मल सी लड़की थी. रंग काला पर आँखें भूरी, लंबी सी नाक, सुराही सी गर्दन, पतली कमर मगर कूल्हे थोड़े ज्यादा थे. चूची ज्यादा बड़ी नहीं थी पर उभार कुर्ते के ऊपर से साफ दिख रहे थे. एक से एक खूबसूरत गोरी गुलाबी लड़कियां मेरे जीवन में आईं और उनका भोग भी लगाया लेकिन काली सलोनी लड़की पहली बार मेरे से टकराई थी. उसकी पर्सनेलिटी में ना जाने क्या था जो मुझे उसकी ओर आकर्षित कर रहा था.
खैर दिखावे के लिए मैं मोबाइल में लगा हुआ था लेकिन दिमाग सोच रहा था कि शुरुआत कैसे करूँ?
तभी सलोनी बोली- आपका शुक्रिया, आप की वजह से मैं एग्जाम दे पाऊंगी.
मेरे को तो जैसे जीवन मिल गया क्योंकि बातचीत से सलोनी को मैं इम्प्रेस करके उसका भोग लगा सकता हूँ। मैं बोला- अरे ऐसी कोई बात नहीं, दोनों को जाना था मुझे लगा कि एक से भले दो, तो सफर अच्छा कट जाएगा.
यह सुनकर सलोनी पहली बार मुस्कराई.
कसम से क्या नशीली मुस्कान थी, गालों में डिम्पल उफ्फ्फ … सलोनी थोड़ा सहज महसूस करने लगी थी. लंबा सफर था.
तभी टी.टी आया, मैंने टिकट बनवाया और फिर दरवाज़ा लॉक कर लिया, बातों-बातों में पता चला कि वो छत्तीसगढ़ के जगदलपुर की रहने वाली है. स्नातक डिग्री किए हुए थी. दिल्ली में रह कर कम्पटीशन की कोचिंग ले रही थी. अकेले पेइंग गेस्ट में रहती थी. आगे बढ़ने की बहुत चाह थी उसके अंदर. सुन कर सच में अच्छा लगा कि देश की लड़कियां भी कुछ करने की इच्छा रखती हैं और वो माँ-बाप धन्य हैं जो अपनी लड़की को पढ़ा रहे हैं.
उसके 3 छोटे भाई-बहन और थे दिल्ली में. वो कुछ कोचिंग सेंटर में पार्ट टाइम पढ़ाया भी करती है जिससे अपना खर्चा खुद निकाल सके. उसको देख कर कहीं नहीं लगा कि सलोनी इतनी स्वाबलंबी और आत्मनिर्भर लड़की होगी.
खैर, ट्रेन धीमी रफ़्तार से बढ़ रही थी और सफर आराम से कट रहा था. मगर मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उसके साथ कुछ गलत करुँ … पर दिल नहीं मान रहा था. फिर मैंने सोचा वक्त पर ही सब छोड़ देता हूं, अभी बहुत लंबा सफर है।
इस बीच कानपुर फ़ोन करके अपने एक जूनियर साथी से खाना लाने के लिए बोल दिया था.
मैंने कोशिश की कि बात का सिलसिला प्रेम संबंधों की तरफ मोडूं, मुझे थोड़ी सफलता भी मिली. कॉलेज में कोई बॉयफ्रेंड नहीं था, क्योंकि उसका रंग देख कर कोई पास नहीं आता था.
वो बोली- पता नहीं, कोई लड़का मेरे पास आया ही नहीं.
रंग को लेकर काफी दुखी सी महसूस हुई।