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सारिका कंवल की जवानी के किस्से

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मैं एक टांग पर खड़ी थी, दूसरे को सुधा ने उठा कर सहारा दिया था और विजय एक हाथ से मेरी एक चूची को दबा रहा था, दूसरे हाथ से मेरे एक चूतड़ को और हमारे मुँह आपस में चिपके हुए थे।

कभी हम होंठों को तो कभी जुबान को चूसते और विजय जोर-जोर के धक्के मार कर मुझे चोद रहा था।

उधर मेरी सहेली कभी विजय के अंडकोष को सहलाती तो कभी अपनी योनि को।

कुछ देर बाद विजय ने मुझे छोड़ दिया और नीचे लेट गया। अब मेरी सहेली की बारी थी, उसने अपनी दोनों टाँगें उसके दोनों तरफ फैला कर उसके ऊपर चढ़ गई और मुझसे कहा- थोड़ा थूक उसकी चूत पर मल दो !

मैंने उसकी योनि में थूक लगा दिया और विजय के लिंग को पकड़ कर उसकी योनि के छेद पर टिका दिया।

अब उसने अपनी कमर नीचे की तो लिंग ‘सट’ से अन्दर चला गया, सुधा ने धक्के लगाने शुरू कर दिए।

कुछ ही देर में वो पूरी ताकत से धक्के लगाने लगी। मैं बगल में लेट गई और देखने लगी कि कैसे उसकी योनि में लिंग अन्दर-बाहर हो रहा है।

वो कभी मेरे स्तनों को दबाता या चूसता तो कभी मेरी सहेली के.. कभी मुझे चूमता तो कभी उसको!

उसने 2 उंगलियाँ मेरी योनि में घुसा कर अन्दर-बाहर करने लगा। मुझे इससे भी मजा आ रहा था।

सुधा ने कहा- मैं अभी तक दो बार झड़ चुकी हूँ।

मैंने पूछा- इतनी जल्दी कैसे?

तो उसने कहा- मैं जल्दी झड़ जाती हूँ।

तभी विजय ने कहा- मैं भी झड़ने वाला हूँ !

तब मेरी सहेली जल्दी से नीचे उतर गई, अब वो मेरे ऊपर आ गया, मैंने अपनी टाँगें फैला दीं, उसने बिना देर किए लिंग को मेरी योनि में घुसाया और मुझे चोदने लगा।

कुछ ही देर में मैं भी अपनी कमर उचका-उचका कर चुदवाने लगी। इस बीच मैं झड़ गई और मेरे तुरंत बाद वो भी झड़ गया।

उसने अपना सफ़ेद चिपचिपा रस मेरे अन्दर छोड़ दिया।

हम तीनों अब सुस्ताने लगे।

कुछ देर बाद हम फिर से चुदाई का खेल खेलने के लिए तैयार हो गए।

विजय ने कहा- आज मैं हद से अधिक गन्दी हरकतें और गन्दी बातें करना चाहता हूँ।

इस पर मेरी सहेली ने कहा- जैसी तुम्हारी मर्ज़ी हम दो तुम्हारी रानी हैं आज रात की।

मैं थोड़ी असहज सी थी, क्योंकि यह सब मैं पहली बार कर रही थी और मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी जिंदगी में ऐसा कुछ होगा।

उसने कहा- तुम दोनों बारी-बारी से मेरे लंड के ऊपर पेशाब करो !

और वो नीचे लेट गया। मेरी सहेली ने अपने दोनों पैर फैलाए और ठीक उसके लिंग के ऊपर बैठ गई।

फिर उसने धीरे-धीरे पेशाब की धार छोड़ दी।

मुझे यह बहुत गन्दा लग रहा था, पर अब देर हो चुकी थी, मैंने हद पार कर दी थी, मुझे भी करना पड़ा।

उसने उसके पेशाब से अपने लिंग को पूरा भिगा लिया। फिर मेरी बारी आई मैंने भी उसके लिंग पर पेशाब कर दिया।

इसके बाद विजय ने कहा- अब मेरी बारी है।

तब मेरी सहेली लेट गई और मुझसे कहा- मेरी योनि को दोनों हाथों से फैला कर छेद को खोल !

तो मैंने वैसा ही क्या।

फिर विजय बैठ गया और अपने लिंग को उसकी योनि के पास ले गया और उसके छेद में पेशाब करने लगा।

मैं तो ये सब देख कर हैरान थी।

तभी उसने मुझसे कहा- चलो अब तुम लेट जाओ।

मैंने कहा- नहीं.. मुझे ये पसंद नहीं है !

पर मेरी सहेली ने मुझे जबरदस्ती लिटा दिया और कहा- जीवन में हर चीज़ का मजा लेना चाहिए!

उसने मेरी टाँगें फैला दीं और दो उंगलियों से मेरी योनि को खोल दिया।

फिर विजय ने पेशाब करना शुरू कर दिया, मेरी योनि पर गर्म सा लगा, बिल्कुल वैसे ही जैसे मर्दों का वीर्य लगता है।

फिर हम लेट गए और चूसने और चाटने का खेल शुरू कर दिया।

हमने 4 बजे तक चुदाई की, कभी वो मुझे चोदता तो कभी मेरी सहेली को।

पर हर बार उसने अपना रस मेरे अन्दर ही गिराया।

इस रात में भी बहुत मजा आया और अगले दिन दोपहर को हमने नदी तट पर जाने की योजना बनाई।

फिर अपने-अपने कमरे में जा कर सो गए।

मैं अगले दिन उठी और अपने भाई और भाभी से कहा- आज दोपहर में मैं सुधा और विजय के साथ उनको गाँव दिखाने और गाँव के बारे में बताने के लिए जा रही हूँ तो देर हो जाएगी।

मैंने तौलिया और बाकी का सामान साथ ले लिया।

मैं घर से निकल ही रही थी कि मेरे पति का फोन आया और उन्होंने मुझसे कहा- घर जल्दी आ जाओ.. कुछ काम है !

मैंने कहा- ठीक है मैं कल आ जाऊँगी।

यह सुन कर मेरा दिल टूट सा गया क्योंकि पिछले 3 रातों से जो हो रहा था, उसमें मुझे बहुत मजा आ रहा था और ये सब अब खत्म होने वाला था।

मेरे पास बस आज भर का समय था। मैंने बहुत सालों के बाद ऐसा सम्भोग किया था और मेरा रोम-रोम इसकी गवाही दे रहा था।

मैंने ऐसा अमर के साथ बहुत पहले महसूस किया था और अब लगभग 6 साल बाद ऐसा हुआ था।

मुझे याद आ जाता कि कैसे अमर और मैंने 16 दिन तक लगातार सम्भोग किया था और किसी-किसी रोज तो दिन और रात दोनों मिलकर 5 से 7 बार हो जाता था।

मैं कभी नहीं भूल सकती वो दिन, जिस दिन अमर और मैंने 24 घंटे में 11 बार सम्भोग किया था।

मेरे जिस्म में दर्द था। मेरी योनि में भी दर्द हो रहा था पर जब भी मैं रात के मजे को याद करती, ये दर्द मुझे प्यारा लगने लगता और मैं फिर से इस दर्द को अपने अन्दर महसूस करने को तड़प जाती। मैं जब सोचती इस बारे मेरे अन्दर वासना भड़क उठती। मेरी योनि में नमी आ जाती, चूचुक सख्त हो जाते.. रोयें खड़े हो जाते !

बस यही सोचते हुए मैं निकल पड़ी, रास्ते में वो दोनों तैयार खड़े थे।

हम नदी की ओर चल पड़े, रास्ते में हम बातें करते जा रहे थे।

तभी विजय ने सुधा से पूछा- बताओ.. तुम्हें ऐसा कौन सा दिन अच्छा लगता है जिसको तुम अपने जीवन की सबसे यादगार सेक्स समझती हो !

तब मेरी सहेली कुछ सोचने के बाद बोली- मुझे सबसे यादगार दिन वो लगता है जिस दिन मैंने तुम्हारे और तुम्हारे दोस्त के साथ रात भर सेक्स किया था।

तब विजय बोला- अच्छा वो दिन.. उसमें ऐसी क्या खास बात थी, इससे पहले भी तो तुम दो और दो से अधिक मर्दों के साथ सेक्स कर चुकी हो !

उसने कहा- वो दिन इसलिए यादगार लगता है क्योंकि उस दिन मैं पूरी तरह से संतुस्ट और थक गई थी। दूसरी बात यह कि तुम दो मर्द थे और मैं अकेली फिर भी तुम दोनों थक कर हार गए थे, पर मैंने तुम दोनों का साथ अंत तक दिया।

ऐसा कह कर वो हँसने लगी।

फिर उसने कहा- मुझे तो ऐसा सेक्स पसंद है जिसमें इंसान बुरी तरह से थक के चूर हो जाए !

तब विजय ने भी कहा- हाँ.. मुझे भी ऐसा ही पसंद है, पर मुझे सम्भोग से ज्यादा जिस्म के साथ खेलना पसंद है !

‘जिस्म के साथ तब तक खेलो जब तक की तुम्हारा जिस्म खुद सेक्स के लिए न तड़पने लगे, फिर सेक्स का मजा ही कुछ और होता है !’

बातों-बातों में हम नदी के किनारे पहुँच गए, पर हम ऐसी जगह की तलाश करने लगे, जहाँ कोई नहीं आता हो और हम नदी में नहा भी सकें।

कहानी जारी रहेगी।
 
चलते-चलते हम पहाड़ी के पास पहुँच गए, जहाँ से जंगल शुरू होता था। थोड़ा अन्दर जाने पर ये हमें सुरक्षित लगा क्योंकि ये न तो पूरी तरह जंगल था, न ही यहाँ

कोई आता था।

छोटी सी पहाड़ी सी थी, जहाँ से झरना जैसा बह रहा था और नीचे पानी रुका सा था, तालाब जैसा.. जिसमें कुछ बड़े-बड़े पत्थर थे।

मेरी सहेली ने तब अपने बैग में से एक कपड़ा निकाला और मुझसे कहा- पहन लो।

मैंने देखा तो वो एक छोटी सी पैन्टी और ब्रा थी।

मैंने पूछा- ये क्या है.. मैंने तो पहले से पहनी हुई है।

तब उसने कहा- यह मॉडर्न टाइप की है, इसे बिकिनी कहते हैं ! लड़कियाँ समुन्दर में नहाने के टाइम पहनती हैं !

मैंने पूछा- क्या ये मुझे फिट होंगे?

तो उसने कहा- हाँ.. मेरे साइज़ का है।

मैंने साड़ी उठा कर पहले अपनी पैन्टी निकाल दी, फिर दूसरी पहनी फिर ब्लाउज निकाल कर ब्रा हटा कर दूसरी पहनी जिसको पहनने में मेरी सहेली ने मेरी मदद की, फिर मैंने अपनी साड़ी और पेटीकोट निकाल दिया।

विजय ने मुझे इस लिबास में बहुत गौर से देखा और कहा- तुम इसमें बहुत सेक्सी लग रही हो !

मैंने सुधा से पूछा- तुमने ऐसे क्यों नहीं पहनी?

तो उसने अपनी सलवार कमीज उतार दी और मुझे दिखाया बिल्कुल मेरी तरह का उसने भी पहले से पहन रखा था।

यह लिबास इतना छोटा था कि मुझे अजीब लग रहा था, पर खैर.. वहाँ हम तीनों के अलावा कोई नहीं आने वाला था।

ब्रा इतनी छोटी थी कि मेरे आधे से ज्यादा स्तन दिखाई दे रहे थे और पैन्टी तो बस नाम की थी। एकदम पतला धागे जैसी जिससे मेरी योनि ही सिर्फ ढकी थी बाकी मेरे कूल्हे तो साफ़ खुले दिख रहे थे।

मेरी सहेली को शायद इन सबकी आदत थी, तो उसे कुछ खास फर्क नहीं पड़ रहा था। तभी विजय ने भी अपने कपड़े निकाल दिए और उसका पहनावा देख मुझे हँसी आने लगी, पर मैंने खुद को काबू में किया और हँसी रोक ली।

उसने जो अंडरवियर पहनी थी, वो बिल्कुल लड़कियों की पैन्टी की तरह थी और उसके चूतड़ साफ़ दिख रहे थे।

हम पानी में चले गए और नहाने लगे और एक-दूसरे के साथ छेड़खानी करने लगे। विजय कभी मेरे स्तनों को दबाता तो कभी मेरे चूतड़ों को या फिर मेरी सहेली के।

हम भी कभी उसके चूतड़ों पर चांटा मारते या उसे छेड़ते.. काफी मजा आ रहा था। तीनों पानी के अन्दर थे।

तभी विजय ने मुझसे पूछा- तुमने अब तक कितने लोगों के साथ सम्भोग किया है?

मैंने अनजान बनते हुए कहा- सिर्फ 3 लोगों से !

उसने मुझसे फिर पूछा- किसके-किसके साथ?

मैंने कहा- पति, अमर और तुम्हारे साथ !

हालांकि मैंने विजय से पहले और अमर के बाद एक और लड़के के साथ कुछ दिन सेक्स किया था, पर उस वक़्त बताना ठीक नहीं समझा।

फिर मेरी सहेली ने मुझसे पूछा- अमर कौन है?

मैंने उसको बताया- मैं उससे उड़ीसा में मिली थी और काफी दिन हमारे बीच सेक्स हुआ।

फिर मुझसे पूछा- मेरा यादगार दिन कौन सा है?

मैंने उस वक़्त कह दिया- सभी लोगों के साथ बिताए दिन यादगार हैं !

पर उन्होंने जोर दिया तो मैंने बता दिया- अमर के साथ।

तभी विजय ने मुझसे पूछा- ऐसा क्या था और कोई एक दिन ही यादगार होगा हर दिन नहीं।

तब मैंने उनको बताया- उसके साथ मैंने 16 दिन लगातार सम्भोग किया था, वो भी दिन में और रात में कई-कई बार और एक दिन 24 घंटे के अन्दर हमने 11 बार किया था।

वो लोग हैरान हो गए कि ऐसा कैसे किया !

तब मैंने बताया कि लगातार नहीं.. बल्कि बीच-बीच में रुक कर 24 घंटे में किया था।

फिर मैंने बताया कि अगले दिन मेरी हालत क्या थी, वो लोग उत्सुकता से मेरी बातें सुनने लगे।

मैंने उनको बताया- उस दिन पति एक दिन के लिए बाहर गए थे, अगले दिन आने वाले थे। तो करीब 11 बजे हमने एक बार किया फिर दोपहर को 3 बार, फिर शाम को 2 बार, फिर रात भर में 5 बार, सुबह 8 बजे आखिरी बार किया तो मेरी हालत ख़राब हो गई थी। न वो झड़ रहा था न मैं, मैं बार-बार उससे विनती कर रही थी कि मुझे छोड़ दे.. पर वो मानने को तैयार नहीं था। बस थोड़ी देर कह कह के मुझे बेरहमी से चोद रहा था। मेरी बुर में बहुत दर्द होने लगा था और खून निकल आया था। जब हम अलग हुए तो मैं ठीक से खड़ी भी नहीं हो पा रही थी।

उसके जाने के बाद मैं वैसे ही नंगी पड़ी रही और जब आँख खुली तो देखा के बिस्तर पर खून लगा है और मेरी जाँघों और बुर में भी। मैं उठ कर साफ़ करने के लिए खड़ी हुई तो जाँघों में इतना दर्द था कि मैं लड़खड़ाते हुए गिर गई। 12 बज रहे थे मैंने उसको फोन करके बुलाया तो वो दफ्तर से छुट्टी लेकर आया और मुझे उठाकर बाथरूम ले गया। वहाँ मैंने खुद को साफ़ किया, फिर दिन भर सोई रही।

शाम को अमर ने बताया कि उसको मालूम नहीं था कि खून निकल रहा है और उसके लंड में भी इतना दर्द हो रहा था कि उसने चड्डी तक नहीं पहनी उस दिन।

ये सब सुनकर उनके होश उड़ गए और मेरी तरफ देखते हुए कहा- कमाल है, तुम्हारी सेक्सी देह किसी को भो जोश से भर देगी इसमें उस बेचारे का दोष नहीं !

हम अब यूँ ही खेलते हुए पानी में थोड़ी और गहराई में चले गए। वहाँ पानी करीब मेरे गले तक था और ऊपर से झरने जैसा पानी गिर रहा था, जो अधिक नहीं था।

पास में कुछ पत्थर थे, विजय एक पत्थर पर पीठ के बल खड़ा हो गया, फिर मुझे अपनी और खींच लिया।

मुझे पीठ के बल अपने से चिपका लिया और मेरे स्तनों को पकड़ कर मुझे भींच लिया। तभी सुधा ने नीचे पानी के अन्दर जाकर मेरी पैन्टी निकाल कर पत्थर पर रख दी, फिर ऊपर आकर मुझे चिपक गई।

अब मेरा और सुधा का चेहरा आमने-सामने था तथा विजय मेरे पीछे। विजय ने अपनी टाँगों से सुधा को जकड़ लिया और मैं उन दोनों के बीच में थी।

सुधा ने मेरे सिर को किनारे किया और अपने होंठों से विजय के होंठों को चूमने लगी। तब मैंने भी सुधा की पैन्टी निकाल दी।

विजय ने मेरे स्तनों को मसलते हुए मेरी ब्रा को निकाल कर अलग कर दिया, फिर सुधा की ब्रा को निकाल दिया।

हम दोनों औरतें अब नंगी थीं।

विजय ने अब सुधा को छोड़ दिया और मुझे अपनी और घुमा कर मेरे होंठों को चूसने लगा।

तब सुधा ने विजय का अंडरवियर निकाल दिया।

अब हम तीनों ही नंगे हो चुके थे।

मुझे थोड़ा डर भी लग रहा था, क्योंकि दिन का समय था और हम खुले आसमान के नीचे थे।

विजय मुझे चूमते हुए कभी मेरे स्तनों को दबाता तो कभी चूतड़ों को। मैं भी उसके होंठों को चूसने और चूमने में मग्न हो गई।

मेरे हाथ भी हरकत करने लगे, मैंने उसके लिंग को पकड़ कर सहलाना शुरू कर दिया, कभी मैं उसके लिंग को सहलाती तो कभी उसके अन्डकोषों को।

तभी सुधा मेरे पीछे आ गई और मुझे पकड़ कर अपना हाथ मेरी योनि में लगा दिया।

मैंने कहा- क्या कर रही हो?

तो उसने जवाब दिया- तुझे तैयार कर रही हूँ, तुझे गर्म कर रही हूँ चुदवाने के लिए !

उसकी इस तरह की बातें मुझे अजीब तो लग रही थीं, पर एक तरफ से मुझे उत्तेजित भी कर रही थीं।

फिर सुधा ने मेरी योनि को सहलाते हुए 2 उंगलियाँ अन्दर डाल दीं और उसे अन्दर-बाहर करने लगी।

मैं गर्म होने लगी थी, उधर मेरे सहलाने की वजह से विजय का लिंग भी सख्त हो चुका था।

विजय ने तब मेरी टाँगों को फैला कर अपने कमर के दोनों तरफ कर मुझे गोद में उठा लिया। उसने मेरी दोनों जाँघों को पकड़ कर सहारा दिया और मैं उसके गले में दोनों हाथ डाल कर किसी बच्चे की तरह लटक गई।

फिर सुधा ने विजय का लिंग पकड़ कर मेरी योनि पर रगड़ना शुरू कर दिया, इससे मुझे बहुत मजा आ रहा था, मन कर रहा था कि जल्दी से उसे मेरी योनि में डाल दे।

मैं भी अपनी योनि को उसके ऊपर दबाते हुए विजय को चूमने लगी।

तब विजय ने मुझसे कहा- आज एक चीज़ तुम दोनों को करना होगा मेरी खातिर !

मैंने पूछा- क्या?

कहानी जारी रहेगी।
 
तब उसने कहा- तुम दोनों को आपस में चूमना होगा, साथ ही एक-दूसरे की बुर को चूसना होगा !

यह बात सुनते ही मैं चौंक गई, मुझे ऐसा लगा कि यह क्या पागलपन है।

तभी सुधा खुशी से बोली- हाँ.. क्यों नहीं.. बहुत मजा आएगा !

पर मैं इसके लिए तैयार नहीं थी, पर सुधा और विजय जिद पर अड़ गए और विजय ने मुझे कस कर पकड़ लिया। फिर सुधा ने मेरे सिर को थामा और मेरे होंठों से होंठ लगा कर मेरे होंठों चूमने लगी।

मैं बार-बार मना कर रही थी, पर उन पर कोई असर नहीं हुआ। तब मैं गुस्से में आ गई तो उन दोनों ने मुझे छोड़ दिया।

मैं गुस्से से जाने लगी तब उन दोनों ने मुझसे माफ़ी माँगी और फिर हम वैसे ही अपनी काम-क्रीड़ा में लग गए।

सुधा के लिए शायद ये सब नया नहीं था क्योंकि वो ऐसी पार्टियों में जाया करती थी।

पर मेरे लिए ये सब नया था तो मैं सहज नहीं थी।

तब सुधा ने मुझसे कहा- सारिका, तुम्हें मजे लेने चाहिए क्योंकि ऐसा मौका हमेशा नहीं मिलता !

मैंने कह दिया- मुझे इस तरह का मजा नहीं चाहिए… मैं बस अपनी यौन-तृप्ति चाहती थी इसलिए तुम लोगों की हर बात ना चाहते हुए भी माना, पर अब हद हो गई है !

तब विजय ने मुझसे कहा- ठीक है, जैसा तुम चाहो वैसा ही करेंगे।

तब उन्होंने कहा- दो औरतें अगर एक-दूसरे का अंग छुए और खेलें तो खेल और भी रोचक हो जाता है।

पर मैंने मना कर दिया, तब उसने कहा- ठीक है मत करो ! तुम पर सुधा को करने दो उसे कोई दिक्कत नहीं।

मैंने कुछ देर सोचा फिर आधे मन से ‘हाँ’ कर दी।

अब विजय ने सुधा को पकड़ा और उसे पागलों की तरह चूमने, चूसने लगा। सुधा भी उसका जवाब दे रही थे।

दोनों काफी गर्म हो गए थे, तब विजय ने मुझसे कहा- तुम दोनों मेरा लंड चूसो !

वो किनारे पर आ गया, जहाँ पानी घुटनों तक था। सुधा और विजय आपस में चूमने लगे और मैं झुक कर घुटनों के बल खड़ी होकर उसके लिंग को प्यार करने लगी।

मैंने उसके लिंग को पहले हाथ से सहलाया, जब मैं उसके लिंग को आगे की तरफ खींचती तो ऊपर का चमड़ा उसके सुपाड़े को ढक देता पर जब पीछे करती तो उसका सुपाड़ा खुल कर बाहर आ जाता।

मैं दिन के उजाले में उसका सुपाड़ा पहली बार इतने करीब से देख रही थी, एकदम गहरा लाल.. किसी बड़े से चैरी की तरह था।

मैंने उसके सुपाड़े के ऊपर जीभ फिराई और फिर उसको अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। कुछ देर में विजय भी अपनी कमर को हिलाने लगा और अपने लिंग को मेरे मुँह में अन्दर बाहर करने लगा।

थोड़ी देर में सुधा भी घुटनों के बल आ गई और फिर वो भी लिंग को चूसने लगी। दोनों के लार और थूक से उसका लिंग तर हो गया था।

विजय ने अब कहा- चलो चट्टान के ऊपर चलते हैं।

फिर उसने सुधा को कहा- क्या तुम मेरे लिए सारिका की बुर चाटोगी !

उसने मुस्कुराते हुए सर हिलाया फिर मुझे चट्टान के ऊपर लेट जाने को कहा। मुझे अजीब लग रहा था क्योंकि पहली बार कोई औरत मेरी योनि के साथ ऐसा करने वाली थी।

उसने मेरी टाँगें फैला दीं और झुक कर मेरे टाँगों के बीच अपना सर रख दिया।

फिर उसने मेरी तरफ देख मुस्कुराते हुए कहा- अब तुम्हें बहुत मजा आएगा !

फिर उसने मेरी दोनों जाँघों को चूमा, फिर योनि के किनारे फिर अपनी जुबान को मेरी योनि में लगा कर नीचे से ऊपर ले आई।

उसने मेरी योनि को चाटना शुरू कर दिया।

काफी देर के बाद विजय सुधा के पीछे चला गया और झुक कर उसकी योनि को चाटने लगा। इधर सुधा मेरी योनि से तरह-तरह से खिलवाड़ करने लगी, कभी जुबान को योनि के ऊपर फिराती, तो कभी योनि में घुसाने की कोशिश करती, कभी दोनों हाथों से मेरी योनि को फैला देती और उसके अन्दर थूक कर दुबारा चाटने लगती या उंगली डाल देती।

कभी मेरी योनि के दोनों तरफ की पंखुड़ियों को दांत से पकड़ कर खींचती। मुझे इससे काफी उत्तेजना हो रही थी। मैं अब काफी गर्म हो कर तैयार थी, पर उन दोनों को तो खेलने में ज्यादा रूचि थी।

तभी विजय मेरे पास आकर लेट गया। मैंने उसको पकड लिया और चूमने लगी, साथ ही उसके लिंग को सहलाने लगी।

सुधा ने फिर मुझे छोड़ दिया और विजय के लिंग को पकड़ कर चूसा, फिर अपनी दोनों टाँगें फैला कर उसके कमर के दोनों तरफ कर उसके लिंग के ऊपर आ गई। मैंने उसके लिंग को उसकी योनि में रगड़ा और उसकी छेद पर टिका दिया। इस पर सुधा ने दबाव दिया, लिंग अन्दर चला गया।

अब सुधा ने धक्के लगाने शुरू कर दिए और विजय मुझे चूमने, चूसने में मग्न हो गया। वो मेरे स्तनों को पूरी ताकत से दाबता और चूसता तो कभी सुधा के आमों को चूसता।

करीब 10 मिनट के बाद सुधा सिसकी लेते हुए हांफने लगी और विजय के ऊपर गिर गई। मेरे लिए यह खुशी का पल था क्योंकि मैं खुद विजय का लिंग अपने अन्दर लेने को तड़प रही थी।

सुधा विजय के ऊपर से अलग हुई तो उसकी योनि में गाढ़े चिपचिपे पानी की तरह लार की तरह वीर्य लगा हुआ था।

विजय मेरे ऊपर आ गया तो मैंने अपनी टाँगें फैला दीं और ऊपर उठा दीं। उसने झुक मेरे दोनों स्तनों को चूमा, चूसा फिर मेरे होंठों को चूसने लगा।

मैंने हाथ से उसका लिंग पकड़ लिया और अपनी योनि के छेद पर टिका कर उसका सुपाड़ा अन्दर कर लिया। फिर मैंने अपनी कमर उठा दी। यह देख उसने जोश में जोर का धक्का मारा तो उसका लिंग मेरी बच्चेदानी से टकरा गई।

मैं चिहुंक उठी, मेरे मुँह से अकस्मात निकल गया- उई माँ… धीरे.. चोदो !

तब उसने 3-4 और जोर के धक्के लगाते हुए कहा- आज कुछ धीरे नहीं होगा !

उसका इतना जोश में आना, मुझे पागल कर रहा था… उसने जोर-जोर से मुझे चोदना शुरू कर दिया था।

मैं इतनी गर्म हो चुकी थी कि कुछ ही देर में मैं झड़ गई।

मैंने पूरी ताकत से विजय को पकड़ लिया।

तब विजय ने मुझसे कहा- आज इतनी जल्दी झड़ गई तुम !

मैंने उसको कहा- तुम्हें इससे कोई परेशानी नहीं होगी.. तुम जितना चाहो चोद सकते हो, मैं साथ दूँगी तुम्हारा !

यह सुन उसने धक्कों का सिलसिला जारी रखा कुछ ही देर में मुझे लगा कि मैं दुबारा झड़ जाऊँगी, सो मैंने उसको कस के बांहों में भर लिया। अपनी टाँगें उसके कमर के ऊपर रख उसको जकड़ लिया।

विजय की गति अब दुगुनी हो गई थी, उसकी साँसें और तेज़ हो गईं, मैं समझ गई कि अब वो भी झड़ने को है।

हमारे होंठ आपस में चिपके हुए थे और हम दोनों ने एक-दूसरे को यूँ पकड़ रखा था जैसे एक-दूसरे में समा जायेंगे। सिर्फ विजय का पेट हिल रहा था। वो मेरी योनि में लिंग अन्दर-बाहर तेज़ी से करके चोद रहा था।

अचानक मेरे शरीर की नसें खिंचने लगी और मैं झड़ गई।

ठीक उसी वक़्त विजय ने भी पूरी ताकत से धक्के मारते हुए मेरे अन्दर अपना रस छोड़ दिया।

हम दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे से काफी देर लिपटे रहे। थोड़ा सुस्ताने के बाद हम वापस पानी में चले गए और फिर पानी में ही दो बार उसने मुझे और सुधा को चोदा।

हम तीनों काफी थक चुके थे, फिर हमने खुद को पानी से साफ़ करके कपड़े पहने और वापस घर को आ गए।

कहानी जारी रहेगी।
 
रास्ते में मैंने उनको बताया, “मेरे पति ने मुझे कल वापस बुलाया है।”

इस पर विजय को दु:ख हुआ क्योंकि वो मेरे साथ कुछ समय और बिताना चाहता था।

पर उसने कहा- मैं रात को मिलूँ, पर मेरी हालत इन 4 दिनों में ऐसी हो गई थी कि मेरा मन नहीं हो रहा था।

फिर भी मैंने कहा- मैं कोशिश करुँगी !

फिर हम अपने-अपने घर चले गए।

मैं घर जाकर थोड़ी देर सोई रही, फिर शाम को घरवालों को बताया- मुझे कल वापस जाना है।

इस पर मेरी भाभी मुझे शाम को बाज़ार ले गईं और एक नई साड़ी दिलवाई। फिर करीब 7 बजे हम घर लौटे।

रास्ते भर मुझे विजय फोन करता रहा पर मैंने भाभी की वजह से फोन नहीं उठाया।

रात को सबके सोने के बाद मैंने उसको फोन किया तो उसने जिद कर दी कि मैं उसको छत पर मिलूँ !

काफी कहने पर मैं चली गई पर मैंने कहा- मुझसे और नहीं हो पाएगा।

हम छत पर बातें करने लगे। काफी देर बातें करने के बाद मैंने कहा- मुझे जाना है.. सुबह बस पकड़नी है !

पर उसने शायद ठान ली थी और मुझे पकड़ कर अपनी बांहों में भर लिया। मैंने उससे विनती भी की कि मुझे छोड़ दे, मेरी हालत ठीक नहीं है.. मेरे पूरे बदन में दर्द हो रहा है पर उसका अभी भी मुझसे मन नहीं भरा था।

शायद इसलिए मुझसे मेरे कानों में मुझे चूमते हुए कहा- मैं तुम्हें कोई तकलीफ नहीं दूँगा, क्या तुम्हें अभी तक मुझसे कोई परेशानी हुई !

मैं उसकी बातों से पिघलने लगी और उसकी बांहों में समाती चली गई। उसने मुझे वहीं पड़ी खाट पर लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गया।

मैंने एक लम्बी सी मैक्सी पहनी थी। उसे उसने उतारना चाहा, पर मैंने ने मना कर दिया।

तब उसने मेरे मैक्सी के आगे के हुक को खोल कर मेरे स्तनों को बाहर कर दिया और उनको प्यार करने लगा। उसने इस बार बहुत प्यार से मेरे स्तनों को चूसा, फिर कभी मेरे होंठों को चूमता या चूसता और कभी स्तनों को सहलाता।

तभी उसने मेरी मैक्सी को ऊपर पेट तक उठा दिया और मेरी जाँघों को सहलाने लगा। इतनी हरकतों के बाद तो मेरे अन्दर भी चिंगारी भड़कने लगी। सो मैंने भी नीचे हाथ डाल कर उसके लिंग को सहलाना शुरू कर दिया।

उसका एक हाथ नीचे मेरी जाँघों के बीच मेरी योनि को सहलाने लगा।

मैं गीली होने लगी तभी विजय मुझे चूमते हुए मेरी जाँघों के बीच चला गया और मेरी एक टांग को खाट के नीचे लटका दिया। अब उसने मेरी योनि को चूसना शुरू कर दिया पर इस बार अंदाज अलग था। वो बड़े प्यार से अपनी जीभ को मेरी योनि के ऊपर और बीच में घुमाता, फिर दोनों पंखुड़ियों को बारी-बारी चूसता और जीभ को छेद में घुसाने की कोशिश करता।

मुझे इतना आनन्द आ रहा था कि मुझे लगा अब मैं झड़ जाऊँगी। पर तभी उसने मेरे पेट को चूमते हुए नाभि से होता हुआ मेरे पास आ गया। मेरे होंठों को चूमा और अपना पजामा नीचे सरका दिया।

मैंने उसके लिंग को हाथ से पकड़ कर सहलाया, थोड़ा आगे-पीछे किया, फिर झुक कर चूसने लगी। उसका लिंग इतना सख्त हो गया था जैसे कि लोहा और काफी गर्म भी था। वो मेरे बालों को सहला रहा था और मैं उसके लिंग को प्यार कर रही थी।

तभी उसने मेरे चेहरे को ऊपर किया और कहा- अब आ जाओ मुझे चोदने दो !

मैंने सोचा था कि जैसा अब व्यवहार कर रहा है, वो इस तरह के शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा, पर मैं भूल गई थी कि वासना के भूखे सब भूल जाते हैं।

मुझे अब यह बात ज्यादा पहले की तरह बैचैन नहीं कर रहे थे, क्योंकि इन 4 दिनों में मैं खुद बेशर्म हो चुकी थी।

उसने मुझे चित लिटा दिया। मेरी टाँगों को फैला कर अपनी जाँघों पर चढ़ा दिया। फिर झुक गया और मेरे ऊपर आ गया। उसका लिंग मेरी योनि से लग रहा था। सो मैंने हाथ से उसे पकड़ा और फिर अपनी योनि में उसका सुपाड़ा अन्दर कर दिया।

इसके बाद विजय मेरे ऊपर अपना पूरा वजन दे कर लेट गया फिर उसने मुझे चूमते हुए कहा- कुछ कहो !

मैं समझ गई कि वो क्या चाहता है, सो मैंने उसको कहा- अब देर मत करो.. चोदो मुझे !

उसने मुझे मुस्कुराते हुए देखा और मेरे होंठों को चूमते हुए धक्का दिया। उसका लिंग मेरी योनि में अंत तक चला गया। मेरी योनि में तो पहले से ही दर्द था, तो इस बार लिंग के अन्दर जाते ही मैं दर्द से कसमसा गई।

मेरी सिसकी सुनकर वो और जोश में आने लगा और बड़े प्यार से मुझे धीरे-धीरे धक्के लगाता, पर ऐसा लगता था जैसे वो पूरी गहराई में जाना चाहता हो। पता नहीं मैं दर्द को किनारे करती हुई उसका साथ देने लगी।

जब वो अपनी कमर को ऊपर उठाता, मैं अपनी कमर नीचे कर लेती और जब वो नीचे करता मैं ऊपर !

इसी तरह हौले-हौले हम लिंग और योनि को आपस में मिलाते और हर बार मुझे अपनी बच्चेदानी में उसका सुपाड़ा महसूस होता। वो धक्कों के साथ मेरे पूरे जिस्म से खेलता और मुझे बार-बार कहता- कुछ कहो!

काफी देर बाद उसने मुझे ऊपर उठाया और अपनी गोद में बिठा लिया और मुझसे कहा- सारिका, अब तुम चुदवाओ !

मैं समझ रही थी कि वो ऐसा इसलिए कह रहा था ताकि मैं भी उसी तरह के शब्द उसको बोलूँ।

मैंने भी उसकी खुशी के लिए उससे ऐसी बातें करनी शुरू कर दीं।

मैंने कहा- तुम भी चोदो मुझे.. नीचे से मैं भी धक्के लगाती हूँ !

यह सुन कर उसने अपनी कमर को उछालना शुरू कर दिया। मैंने भी धक्के तेज़ कर दिए। करीब 20 मिनट हो चुके थे, पर हम दोनों में से कोई अभी तक नहीं झड़ा था।

फिर उसने मुझे खाट के नीचे उतरने को कहा और मुझसे कहा कि मैं घुटनों के बल खड़ी होकर खाट पर पेट के सहारे लेट जाऊँ।

मैं नीचे गई और वैसे ही लेट गई।

विजय मेरे पीछे घुटनों के सहारे खड़ा हो गया फिर मेरी मैक्सी को मेरे चूतड़ के ऊपर उठा कर मेरे कूल्हों को प्यार किया, दबाया, चूमा फिर उन्हें फैला कर मेरी योनि को चूमते हुए कहा- तुम्हारी गांड और बुर कितनी प्यारी है !

फिर उसने अपना लिंग मेरी योनि से लगा कर धक्का दिया।

कुछ देर बाद शायद उसे मजा नहीं आ रहा था तो मुझसे कहा- तुम अपनी टाँगों को फैलाओ और चूतड़ ऊपर उठाओ !

मैंने वैसा ही किया इस तरह मेरी योनि थोड़ी ऊपर हो गई और अब उसका लिंग हर धक्के में पूरा अन्दर चला जाता, कभी-कभी तो मेरी नाभि में कुछ महसूस होता।

करीब दस मिनट और इसी तरह मुझे चोदने के बाद उसने मुझे फिर सीधा लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गया। उसने मेरी एक टांग को अपने कंधे पर चढ़ा दिया और मुझे चोदने लगा। करीब 5 मिनट में मेरी बर्दाश्त से बाहर होने लगा, सो मैंने अपनी टांग उसके कंधे से हटा कर उसको दोनों टाँगों से उसकी कमर जकड़ ली।

मेरी योनि अब रस से भर गई और इतनी चिपचिपी हो गई थी कि उसके धक्कों से ‘फच-फच’ की आवाज आने लगी थी। मैं अब चरमसुख की तरफ बढ़ने लगी। धीरे-धीरे मेरा शरीर सख्त होने लगा और मैंने नीचे से पूरी ताकत लगा दी।

उधर विजय की साँसें भी तेज़ होती जा रही थीं और धक्कों में भी तेज़ी आ गई थी। उसने अपनी पूरी ताकत मुझ पर लगा दी थी।

मैंने उसके चेहरे को देखा उसके माथे से पसीना टपक रहा था और चेहरा मानो ऐसा था जैसे काफी दर्द में हो। पर मैं जानती थी कि ये दर्द नहीं बल्कि एक असीम सुख की निशानी है।

उसने मुझे पूरी ताकत से पकड़ लिया और मैंने उसको। वो धक्कों की बरसात सा करने लगा और मैंने भी नीचे से उसका साथ दिया। इसी बीच मैं कराहते हुए झड़ गई। मेरे कुछ देर बाद वो भी झड़ गया। उसके स्खलन के समय के धक्के मुझे कराहने पर मजबूर कर रहे थे।

हम काफी देर तक यूँ ही लेटे रहे। करीब रात के 1 बज चुके थे। मैंने खुद के कपड़े ठीक किए फिर मैंने विजय को उठाया, पर वो सो चुका था।

मैंने चैन की सांस ली कि वो सो गया क्योंकि अगर जागता होता तो मुझे जाने नहीं देता सो मैंने दुबारा उठाने की कोशिश नहीं की।

मैंने उसका पजामा ऊपर चढ़ा दिया और दबे पाँव नीचे अपने कमरे में चली आई। दिन भर की थकान ने मेरा पूरा बदन चूर कर दिया था।

अगली सुबह मैं जल्दी से उठी। नहा-धो कर तैयार हुई और बस स्टैंड जाने लगी। रास्ते भर मेरी जाँघों में दर्द के वजह से चला नहीं जा रहा था।

उसी रात पति को भी सम्भोग की इच्छा हुई। पर राहत की बात मेरे लिए ये थी कि वो ज्यादा देर सम्भोग नहीं कर पाते थे, सो 10 मिनट के अन्दर सब कुछ करके सो गए।

अगले महीने मेरी माहवारी नहीं हुई, मैं समझ गई कि मेरे पेट में बच्चा है। पर अब ये मुश्किल था तय करना कि किसका बच्चा है।

फिर भी मुझे कोई परेशानी नहीं थी और तीसरा बच्चा भी लड़का ही हुआ।
 
कुछ लोगों ने मुझे मेल किया कि यह कथा काल्पनिक है, पर मैं सबको बता दूँ कि ये हकीकत की घटनाएँ हैं, जो मेरे साथ हुईं, बस मैंने थोड़ा रोमांचक बनाने के लिए इसे अपने तरह से लिखा।

हालांकि हर बात को शब्दों में लिख पाना मुश्किल होता है फिर भी मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है। कुछ लोग यह भी मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूँ तो मैं आप सबको बता दूँ कि मैं ज्यादातर अकेली रही हूँ और काम कुछ ख़ास नहीं होता, तो खाली समय में मैं नेट पर समय बिताती हूँ। इसी दौरान मैं राज शर्मा स्टोरीज डॉट कॉम पढ़ने लगी, फिर मेरे दिल में भी ख़याल आया कि शायद लोगों को मेरी कहानियाँ भी पसंद आ सकती हैं, सो मैंने भी अपनी कहानियाँ लिखनी शुरू कीं।

मेरी कहानियों का मुख उदद्येश मनोरंजन है।

इस कहानी में मैं पहले खुद के बारे में संक्षेप में बता देती हूँ। फिलहाल मेरी उम्र अब 45 होने को है, मेरी लम्बाई ज्यादा नहीं केवल 5’1″ है, उम्र के हिसाब से अब मैं काफी मोटी हो गई हूँ, और रंग गेहुँआ है। पिछले कुछ महीनों से रतिक्रिया नहीं कर रही हूँ, क्योंकि पति को इसमें अब बिलकुल भी रूचि नहीं रही।

आज मैं आपको एक घटना के बारे में बताने जा रही हूँ जो अमर के साथ हुई थी।

उन दिनों घर में बैठे रहने की वजह से मेरा वजन काफी बढ़ गया था और मैं मोटी हो गई थी। अमर के साथ पहली बार सम्भोग करके मुझे अगले दिन कुछ ठीक नहीं लग रहा था, तो मैंने अमर से कुछ दिनों के लिए बातें करना बंद कर दिया था।

वो हमेशा मुझसे बातें करने का बहाना ढूंढता था। करीब एक महीना इसी तरह बीत गया। इस दौरान मैंने एक बार भी सम्भोग नहीं किया था। शायद यही वजह थी कि मैं उसके बार-बार कहने पर फिर से उससे घुलने-मिलने लगी थी।

सम्भोग में काफी अंतराल हो जाने की वजह से मैं शायद उसकी तरफ झुकती गई क्योंकि पति मेरे जरा भी सहयोग नहीं करते थे। मेरे पति दिन भर बाहर रहते और शाम काफी देर से आते थे। वैसे तो मैंने आज तक अपने पति को अपनी मुँह से सम्भोग के लिए कभी नहीं कहा, हाँ बस जब इच्छा होती तो उनसे लिपट जाया करती थी और वे मेरा इशारा समझ जाते थे। पर इन दिनों वो मेरे इशारों को नकार देते और थका हूँ कह कर सो जाते थे।

कुछ दिन इसी तरह बीत गए, पति जब काम पर चले जाते, तो अक्सर मुझे अमर फोन करते और हम घन्टों बातें करते।

कुछ दिनों के बाद अमर फिर से मुझे अकेले मिलने के लिए उकसाने लगे।

इसी बीच एक दिन दोपहर को अमर मेरे घर आए। मेरा पहला बेटा स्कूल से शाम को 4 बजे आता था तो मैं और मेरा दूसरा बेटा ही घर पर थे।

अमर ने मुझसे मेरे पति के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें बताया- वो आजकल काम की वजह से दिन भर बाहर रहते हैं, शायद उनके माइन्स में कोई बड़ी दुर्घटना हुई है।

तब उन्होंने कहा- अच्छा..!

फिर हम थोड़ी देर बातें करते रहे, उसके बाद उन्होंने मुझसे पूछा- क्या तुम्हें अब सम्भोग की इच्छा नहीं होती?

मैंने कुछ नहीं कहा बस अपना सर झुका लिया। तब वो मेरे पास आए और मेरे बगल में बैठ गए, फिर उन्होंने मेरा हाथ थाम लिया और मुझसे बातें करने लगे।

उन्होंने मेरी बाँहों को सहलाते हुए मुझे मनाने की कोशिश करना शुरू कर दिया। मैंने तब कोई विरोध तो नहीं जताया, पर मैं खुल कर भी उनसे नहीं मिल पा रही थी।

मेरा विरोध न देख उन्होंने मुझे मेरे गले से लेकर मेरे चेहरे को चूमना शुरू कर दिया। मुझे भी उनकी इन हरकतों से कुछ होने लगा था सो मैं भी उनकी बाँहों में समाती चली गई।

हमारे घर पर प्लास्टिक की कुर्सियाँ थी और हम दोनों अलग-अलग कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने मुझे चूमते-चूमते मुझे अपनी गोद में बिठा लिया। मुझे उनका लिंग उनके पैंट के ऊपर से मेरे कूल्हों में महसूस हुआ, वो काफी उत्तेजित लग रहे थे और अपना लिंग मेरे कूल्हों की दरार में रगड़ने लगे।

फिर उन्होंने मेरे होंठों को अपने होंठों से चिपका लिया और मुझे चूमने लगे। थोड़ी देर में ही मैंने भी उनका साथ देना शुरू कर दिया।

तब उन्होंने मेरे स्तनों को मेरे कुर्ते के ऊपर से दबाना शुरू किया मैं हल्के दर्द से सिसकारियाँ भरने लगी।

अमर ने मेरी एक टांग को घुमा कर दूसरी तरफ कर दिया, इससे मेरी दोनों जाँघों के बीच अमर आ गया और मैं उसके गोद में थी।

हम दोनों एक-दूसरे को पागलों की तरह चूमने लगे, ऐसा लग रहा था कि जैसे बरसों के बाद दो प्रेमी मिले हों और एक-दूसरे में समा जाना चाहते हों।

मैंने अमर के चेहरे को पकड़ लिया और उसने मेरी कमर को कस लिया और फिर हम एक-दूसरे के जुबान और होंठों को चूसने लगे। अमर बार-बार अपनी कमर उचका कर अपने लिंग को मेरी योनि से स्पर्श कराने की कोशिश करता और मैं भी उसके लिंग पर दबाव बना देती। अब मेरी योनि में गीलापन आना शुरू हो गया था और मेरी पैंटी भी गीली होने लगी थी।

तभी अचानक मेरे बच्चे की रोने की आवाज आई तो मैं तुरंत अमर से अलग हो गई और अन्दर जाकर झूले से बच्चे को उठा गोद में चुप कराने लगी।

उसे भूख लग गई थी, सो मैंने अपनी कमीज ऊपर की और बिस्तर पर बैठ कर उसे दूध पिलाने लगी।

कुछ देर बाद अमर मेरे कमरे में आ गए और वासना से भरी निगाहों से मेरे स्तनों को देखने लगे।

फिर मेरे बगल में बैठ गए और मुझसे बोले- पहले से तुम्हारे स्तन काफी बड़े हो गए हैं!

मैंने कुछ जवाब नहीं दिया, फिर उन्होंने कहा- तुम्हारा वजन भी पहले से ज्यादा हो गया है।

तब मैंने भी कह दिया- हाँ.. घर में बैठे-बैठे मोटी हो गई हूँ।

तब उन्होंने कहा- मुझे तुम मोटी नहीं लग रही हो, बल्कि सेक्सी लग रही हो..!

मैं शर्मा गई और बच्चे को झूले में दुबारा सुला कर उनके पास चली आई। पता नहीं अब मैं थोड़ा सहज महसूस करने लगी थी और उस रात की तरह ही उनसे बात करने लगी।

उन्होंने मुझसे पूछा- तुम्हारे स्तनों और नितम्बों का साइज़ अब कितना हो गया है?

मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया- फिलहाल तो मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं अभी पुराने वाली ब्रा और पैंटी पहन रही हूँ और वो 34d हैं और xl की पैंटी है, पर अब वो मुझे थोड़े टाइट होते हैं..!

यह कहते ही उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा और बिस्तर पर लेट गए, मुझे अपने ऊपर लिटा लिया।

उन्होंने अपने होंठों को फिर से मेरे होंठों से लगा कर मुझे चूमना शुरू कर दिया। उन्होंने मेरे चूतड़ों को पकड़ कर अपनी ओर जोर से खींचते हुए अपना लिंग मेरी योनि में कपड़ों के ऊपर से ही चुभाना शुरू कर दिया। मैंने भी उनकी इस क्रिया की प्रतिक्रिया में मदद के इरादे से अपनी दोनों टाँगें फैला कर उनके दोनों तरफ कर दीं और अपनी योनि को उनके लिंग पर दबाती हुई कमर को नचाने लगी।

मैंने खुद को वासना की आग में जलते महसूस किया। मैंने धीरे-धीरे उनके कपड़े उतारने शुरू कर दिए। थोड़ी ही देर में वो मेरे सामने नंगे हो चुके थे।

उन्होंने भी मेरी कुर्ती निकाल दी थी और फिर ब्रा को किनारे कर उन्होंने मेरी दाईं तरफ के स्तन को निकाल दिया और सहलाने लगे।

फिर चेहरे को चूचुक के सामने रख उन्होंने मेरे चूचुक को मसला तो पतली धागे जैसे दूध का धार निकली, जो सीधे उनके चेहरे पे गिरी। फिर क्या था, वो जोश में आकर मेरे चूचुक को मुँह में लगा कर चूसने लगे, जैसे कोई बच्चा दूध पीता हो। मैंने अपनी ब्रा का हुक पीछे से खोल दिया और अपनी स्तनों को आज़ाद कर दिया। ये देख कर उन्होंने मेरी बाईं चूची को हाथ से पकड़ा और दबाने लगे और बारी-बारी से दोनों को चूसने लगे।

मुझे बड़ा मजा आने लगा था और मैं उनके सर को हाथ से सहलाने लगी और एक हाथ नीचे उनकी जाँघों के बीच ले जाकर उनके लिंग को सहलाने लगी।

मैं कभी उनके लिंग को सहलाती, कभी अन्डकोषों को दबाती, या कभी उनके सुपाड़े पर ऊँगलियां फिराती, जिससे उनके लिंग से रिसता हुआ चिपचिपा पानी मेरी ऊँगलियों पर लग जाता।

अब उन्होंने मेरी एक टांग को उठा कर घुटनों से मोड़ दिया जिससे मेरी जाँघों के बीच का हिस्सा खुल गया और उन्होंने मेरे पजामे के ऊपर से मेरी योनि को सहलाना शुरू कर दिया। कुछ देर यूँ ही सहलाने के बाद मेरे पजामे का नाड़ा खींच दिया, तो नाड़ा टूट गया। पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की और पजामे को ढीला करके मेरी पैंटी के अन्दर हाथ डाल कर मेरी योनि से खेलने लगे। फिर दो ऊँगलियाँ घुसा कर अन्दर-बाहर करने लगे। मुझे तो ऐसा लगने लगा जैसे मैं जन्नत में हूँ।

मैं बुरी तरह से गर्म हो चुकी थी तभी उन्होंने खुद को मुझे अलग कर दिया और अपना लिंग मेरे मुँह के पास कर दिया। मैं इशारा समझ गई, पर थोड़ा संकोच कर रही थी। तब अमर ने मेरा सर पकड़ कर अपने लिंग के तरफ खींचा और अपना लिंग मेरे होंठों से लगा दिया। मैंने उसके लिंग को पकड़ लिया और मुँह में जाने से रोका।
 
मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “फिलहाल तो मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं अभी पुराने वाली ब्रा और पैंटी पहन रही हूँ और वो 34d हैं और xl की पैंटी है, पर अब वो मुझे थोड़े टाइट होते हैं..!”

ये कहते ही उसने मेरा हाथ पकड़ कर अपनी और खींचा और बिस्तर पर लेट गए, मुझे अपने ऊपर लिटा लिया।

तब उसने कहा- प्लीज इसे प्यार करो, यह तुम्हारे प्यार का प्यासा है।

मैंने उसके लिंग को गौर से देखा, उसका लिंग सुर्ख लाल हो गया था और उसका सुपाड़ा खून से भर गया था। उसके बार-बार विनती करने पर मैंने उसके सुपाड़े को चूमा तो उसके लिंग से निकलता पानी मेरे होंठों पर लग गया। फिर अब और क्या था मैंने उसके लिंग और अन्डकोषों को कुछ देर चूमा, फिर सुपाड़े पर जीभ फिराई और उसे मुँह में भर कर चूसने लगी।

वो पूरी मस्ती में आकर अपनी कमर को हिलाने लगा। कभी मेरे बालों पर हाथ फिराता तो कभी मेरे पीठ पर तो कभी कूल्हों को प्यार करता। काफी देर चूसने के बाद मेरे जबड़ों में दर्द होने लगा सो मैंने छोड़ दिया। इसके बाद अमर ने मुझे सीधा लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गया और फिर मुझे सर से पाँव तक चूमने लगा।

मेरे स्तनों को दबाते, चूसते हुए मेरे पेट को चूमने लगा फिर मेरी नाभि में अपनी जुबान को फिराने लगा। उसके बाद चूमते हुए मेरी योनि तक पहुँच गया।

अब उसने मेरी दोनों टांगों को फैला दिया और अपना मुँह मेरी योनि से लगा कर चूसने लगा। उसने बड़े प्यार से मेरी योनि को चूसते और किनारों पर जी भर कर प्यार किया।

मुझे इस तरह उसने गर्म कर दिया था कि मैं खुद अपने अंगों से खेलने लगी। कभी खुद अपने स्तनों को सहलाती तो कभी अमर के साथ अपनी योनि को मसलने लगती।

अमर मेरी योनि के ऊपर मटर के दाने जैसी चीज़ को दांतों से दबा कर खींचता तो मुझे लगता कि अब मैं मर ही जाऊँगी। उसने मुझे पागल बना दिया था। काफी देर बर्दाश्त करने के बाद मैंने अमर को अपनी ओर खींच लिया और अपनी टांगों को फैला उनको बीच में ले लिया और अपनी टांगों से उनकी कमर को जकड़ लिया।

अमर ने एक हाथ मेरे सर के नीचे रखा और दूसरे हाथ से मेरी बाईं चूची को पकड़ कर दबाते हुए उन्हें फिर चूसा। साथ ही अपने लिंग को मेरी योनि के ऊपर कमर नचाते हुए रगड़ने लगा।

उनके लिंग के स्पर्श से मैं और उत्तेजित होकर अधीर हो गई। मैंने तुरन्त लिंग को हाथ से पकड़ा और योनि के ऊपर दरार में रगड़ा और उसे अपने छेद पर टिका कर टांगों से अमर को खींचा।

इस पर अमर ने भी प्रतिक्रिया दिखाई और अपनी कमर को मेरे ऊपर दबाया ही था कि लिंग सरकता हुआ मेरी चूत में घुस गया। मैंने महसूस किया कि मेरी योनि में खिंचाव सा हुआ और उसके सुपाड़े की चमड़ी को पीछे धकेलता हुआ मेरे अन्दर चला गया और मैं सिसकते हुए सिहर गई।

अब अमर ने अपनी कमर को ऊपर-नीचे करना शुरू कर दिया। साथ ही मेरे जिस्म से खेलने लगा। मैं भी उसका साथ देने लगी, कभी मैं उसके माथे को चूमती तो कभी उसकी पीठ को सहलाती, या उसके चूतड़ों को हाथों से जोर से दबाती और अपनी ओर खींचती। काफी मजा आ रहा था और अब तो मेरी कमर भी हरकत में आ गई थी। मैं भी नीचे से जोर लगाने लगी।

अमर के धक्के अब इतने जोरदार होने लगे कि मैं हर धक्के पर आगे को सरक जाती थी। तब उसने हाथ मेरी बाँहों के नीचे से ले जाकर मेरे कन्धों को पकड़ लिया। मैंने भी उनके गले में हाथ डाल अपनी पूरी ताकत से पकड़ लिया और धक्कों का सामना करने लगी। उनके धक्के समय के साथ इतने दमदार और मजेदार होने लगे कि मेरे मुँह से मादक सिसकारियाँ रुकने का नाम नहीं ले रही थीं।

वो बीच-बीच में रुक जाते और मेरे होंठों से होंठ लगा कर चूमने लगते। मेरी जुबान से खेलने और चूसने लगते और अपनी कमर को मेरे ऊपर दबाते हुए कमर को नचाने लगते। उस वक़्त मुझे ऐसा लगता कि मानो मेरी नाभि तक उनका लिंग चला गया, पूरा बदन सनसनाने लगता, मेरे पाँव काँपने लगते।

काफी देर इस तरह खेलने के बाद, उसने मुझे पेट के बल लिटा दिया, फिर मुझे मेरी पीठ से लेकर कमर और चूतड़ों तक चूमा। मेरे दोनों चूतड़ों को खूब प्यार किया। फिर एक तकिया मेरे योनि के नीचे रख दिया। इस तरह मेरे कूल्हे ऊपर की ओर हो गए।

तब अमर ने मेरी टांगों को फैला दिया और बीच में झुक कर लिंग मेरी योनि में घुसाया फिर मेरे ऊपर लेट गया। अब उसने हाथ आगे कर मेरी दोनों चूचियों को पकड़ा और कमर से जोर लगाया। लिंग के अन्दर जाते ही उसने फिर से धक्कों की बरसात सी करनी शुरू कर दी और साथ ही मेरे स्तनों को दबाते और मेरे गले और गालों को चूमते जा रहा था।

मैंने भी उनकी सहूलियत के लिए अपने कूल्हों को उठा देती तो वो मेरी योनि के गहराई में चला जाता। हम मस्ती के सागर में डूब गए।काफी देर के इस प्रेमालाप का अंत अब होने को था। मैंने उनसे सीधे हो जाने के लिए कहा। हमने फिर से एक-दूसरे के चेहरे के आमने-सामने हो कर सम्भोग करना शुरू कर दिया। हमने एक-दूसरे को कस कर पकड़ लिया और अमर धक्के लगाने लगा। मेरी योनि के किनारों तथा योनि चिपचिपा सा लग रहा था पर मैं मस्ती के सागर में गहरी उतरते जा रही थी। मैंने अपनी आँखें खोलीं और अमर के चेहरे की तरफ देखा। उसने भी मेरे चेहरे की तरफ देखा, हम दोनों ही हांफ रहे थे।

उसके चेहरे पर थकान थी, पर ऐसा लग रहा था जैसे उसमें किसी जीत की तड़प हो और वो अपनी पूरी ताकत से मेरी योनि में अपने लिंग को अन्दर-बाहर कर रहा था।

हम दोनों की साँसें थक चुकी थीं और हांफ भी रहे थे। तभी मेरे बदन में करंट सा दौड़ गया मेरे कमर से लेकर मेरी टांगों तक करीब एक मिनट तक झनझनाहट हुई। मैं स्खलित हो चुकी थी और अमर को पूरी ताकत से अभी भी पकड़े हुई थी, पर अमर अभी भी जोर लगा कर संघर्ष कर रहा था।

करीब 5-7 मिनट में उसने भी जोरदार झटकों के साथ मेरे अन्दर अपने गर्म वीर्य की धार छोड़ते हुए झड़ गया।

अमर मेरे गालों और होंठों को चूमते हुए मेरे ऊपर निढाल हो गए। करीब 10 मिनट तक हम ऐसे ही लिपटे रहे, फिर मैंने उन्हें उठने को कहा।

वो मेरे ऊपर से उठे तो मैंने देखा मेरे कूल्हों के नीचे बिस्तर भीग गया था और चिपचिपा सा हो गया था, साथ ही मेरी योनि और उसके अगल-बगल सफ़ेद झाग सा चिपचिप हो गया था।

मैंने तुरंत तौलिए से साफ़ किया फिर अमर ने भी साफ़ किया और मैं बाथरूम चली गई क्योंकि मेरे बदन से पसीने की बदबू आने लगी थी।

मैं नहा कर निकली तो देखा कि 4 बजने वाले हैं।

मैंने अमर से कहा- अब तुम तुरंत यहाँ से चले जाओ।

उसने अपने कपड़े पहने और चला गया। इसी तरह अगले दिन भी मेरे पति काम की वजह से दिन में नहीं आने वाले थे, सो अमर और मैंने फिर से सम्भोग किया ऐसा लगभग 16 दिन तक चला। इन 16 दिनों में हमने सिर्फ दिन में ही नहीं बल्कि रात में भी कुछ दिन सम्भोग किए क्योंकि हालत ऐसे हो गए थे कि पति को बेवक्त काम पर जाना पड़ जाता था।

कुछ दिन तो ऐसे भी थे कि दिन में 2 से 4 बार तक हम सम्भोग करते और कभी रात को तो कुल मिला कर कभी-कभी 7 बार तक भी हो जाता था।

इस दौरान न केवल हमने सम्भोग किया बल्कि और भी बहुत कुछ किया। फिर एक दिन ऐसा आया कि अमर पागलों की तरह हो गया।

शायद ऊपर वाले का ही सब रचा खेल था कि उस दिन मेरे पति को ट्रेनिंग के लिए बाहर जाना पड़ा और हमने 11 बार सम्भोग किया। इसके बारे में कभी विस्तार से बताऊँगी।

और फिर तो मेरी हिम्मत नहीं हुई के कुछ दिन सम्भोग के बारे में सोचूँ।

कहानी जारी रहेगी।
 
इसी तरह 4 दिन बीत गए थे हम दोपहर को रोज मिलते और रोज सम्भोग करते। शाम को 5 से 7 मेरा बेटा पढ़ाई के लिए जाता, तो उस वक़्त भी हमें समय मिल जाता और एक-दो बार कर लेते थे। दिन भर मैं बस उसके बारे में ही सोचती रहती थी। मुझे नशा सा हो गया था, उसका और जब वो कहता कि उसको करना है, मैं तुरंत ‘हाँ’ कर देती।

अगले हफ्ते पति की शिफ्ट बदल गई और वो दोपहर को जाने लगे, अमर का भी समय शाम को वापस आने का था। दोपहर तक मुझे सामान्य लग रहा था, पर शाम होने लगी तो लगा कि अब मैं नहीं मिल पाऊँगी। शाम को मेरा बेटा पढ़ कर आ चुका था इसलिए अब कोई गुंजाईश नहीं बची थी।

मैं रसोई में खाना बनाने लगी मेरा काम लगभग पूरा हो चुका था। करीब 8 बज रहे थे, तभी मेरे बेटे ने मुझसे खाना माँगा और मैंने उसे खाना खिला दिया।

मैं खाना ढक कर अपने छोटे बच्चे को दूध पिलाने लगी, तब मैंने ध्यान दिया कि मेरा बड़ा बेटा किताब खोल कर ही सो गया है। मैंने उसे उठाकर दूसरे बिस्तर पर सुला दिया।

इधर छोटा बेटा भी सो गया, तो मैंने उसे भी झूले में सुला दिया। फिर मेरे दिल में ख्याल आया कि अमर को फोन करूँ। मैंने फोन लगाया तो उसने बताया कि वो अपने कमरे में ही है।

उसने मुझे छत पर आने को कहा।

मैंने कहा- पति कभी भी आ सकते हैं सो नहीं आ सकती हूँ।

पर उसने कहा- थोड़ी देर के लिए आ जाओ..!

मैं छत पर जाने लगी तो मैंने सोचा कि पति से पूछ लूँ कि कब तक आयेंगे, तो उन्हें फोन करके पूछा।

उसने कहा- लगभग 9 बजे निकलेंगे तो 10.30 से 11 बजे के बीच आ जायेंगे।

अमर का कमरा सबसे ऊपर ठीक हमारे घर के ऊपर था। हम छत पर कुछ देर बातें करने लगे।

फिर अमर ने कहा- चलो कमरे में चाय पीते हैं..!

हम कमरे में गए, उसने दो कप चाय बनाई और हम पीते हुए बातें करने लगे।

उसने बातें करते हुए कहा- ऐसा लग रहा है कि आज कुछ बाकी रह गया हो।

मैंने मुस्कुराते हुए कहा- हाँ.. शायद मेरा प्यार नहीं मिला इसलिए…!

उसने तब कहा- तो अभी दे दो…!

मैंने कहा- आज नहीं, मेरे पति आते ही होंगे।

तब उसने घड़ी की तरफ देखा 9.30 बज रहे थे।

उसने कहा- अभी बहुत समय है, हम जल्दी कर लेंगे..!

मैंने मना किया। पर उसने दरवाजा बंद कर दिया और मुझे पकड़ कर चूमने लगा। मैं समझ गई कि वो नहीं मानने वाला। सो जल्दी से करने देने में ही भलाई समझी।

मैंने उससे कहा- आप इस तरह करोगे तो काफी देर हो जाएगी, जो भी करना है, जल्दी से करो… बाकी जब फुर्सत में होंगे तो कर लेना!

उसने दरवाजा बंद कर दिया और मुझे पकड़ कर चूमने लगा। मैं समझ गई कि वो नहीं मानने वाला। सो जल्दी से करने देने में ही भलाई समझी।

मैंने उससे कहा- आप इस तरह करोगे तो काफी देर हो जाएगी, जो भी करना है, जल्दी से करो… बाकी जब फुर्सत में होंगे तो कर लेना…!

मेरी बात सुन कर उन्होंने अपना पजामे का नाड़ा खोल कर पाजामा नीचे कर दिया। मैंने उनके लिंग को हाथ से सहला कर टाइट कर दिया।

फिर झुक कर कुछ देर चूसा और फिर अपनी साड़ी उठा कर पैंटी निकाल कर बिस्तर पर लेट गई।

अमर मेरे ऊपर आ गए। मैंने अपनी टाँगें फैला कर ऊपर उठा दीं। फिर अमर ने एक हाथ से लिंग को पकड़ा और मेरी योनि में घुसाने लगे। मेरी योनि गीली नहीं होने की वजह से मुझे थोड़ी परेशानी हो रही थी, पर मैं चाह रही थी कि वो जल्दी से सम्भोग कर के शांत हो जाए इसलिए चुप रही।

पर जब अमर ने 2-4 धक्के दिए तो मेरी परेशानी और बढ़ गई और शायद अमर को भी दिक्कत हो रही थी।

सो मैंने कहा- रुकिए बाहर निकालिए..!

उन्होंने लिंग को बाहर निकाल दिया, मैंने अपने हाथ में थूक लगा कर उनके लिंग तथा अपनी योनि के छेद पर मल दिया और लिंग को छेद पर टिका दिया।

फिर मैंने उनसे कहा- अब आराम से धीरे-धीरे करो।

उन्होंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू किए, कुछ देर में मेरी योनि गीली होने लगी तो काम आसान हो गया।

उन्होंने मुझे धक्के लगाते हुए पूछा- तुम ठीक हो न.. कोई परेशानी तो नहीं हो रही..!

मैंने कहा- नहीं.. कोई परेशानी नहीं हो रही और होगी भी तो आपके लिए सब सह लूँगी, पर फिलहाल जल्दी करो क्योंकि देर हो जाएगी तो मुसीबत होगी।

ये सुनते ही उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे चूमा और धक्के तेज़ी से लगाने लगे, मैंने भी अपनी योनि को सिकोड़ लिया कि दबाव से वो जल्दी झड़ जाए।

करीब 20 मिनट के सम्भोग के बाद वो झड़ गए। मैंने जल्दी से वीर्य को साफ़ किया और अपनी पैंटी पहन कर कपड़े ठीक किए और चली आई।

अगले दिन पति के जाने के बाद दोपहर में अमर ने मुझे फोन किया।

मुझसे उसने कहा- अब तुम्हारे साथ बिना सम्भोग किए एक भी दिन नहीं रहा जाता।

मैंने उनसे कहा- रोज-रोज करोगे तो कुछ दिन में ही मजा ख़त्म हो जाएगा, बीच में कभी कभी गैप भी होना चाहिए।

तब अमर ने कहा- ये भी सही है पर क्या करें दिल मानता नहीं है।

मैंने उसे कहा- दिल को मनाओ..!

फिर उसने मुझे शाम को मिलने को कहा, और हम फिर मिले और दो बार सम्भोग भी हुआ।

फिर इसी तरह 2-4 दिन गुजर गए। एक दिन मैंने अमर से कहा- मैं अकेली हूँ दोपहर में..!

तो उन्होंने कहा- उन्हें भी आज दफ्तर में काम नहीं है, सो बस आ ही रहा हूँ।

पर मुझे थोड़ा डर लग रहा था क्योंकि मैं मध्यकाल में थी सो गर्भ ठहरने के डर से उन्हें पहले ही कह दिया कि आज कॉन्डोम साथ ले लें।

करीब 2 बजे वो मेरे घर पहुँच गए आते ही मुझे बाँहों में भर कर चूमने लगे फिर एक थैली मेरे हाथों में दी और कहा- आज तुम्हारे लिए तोहफा लेकर आया हूँ।

मैंने उत्सुकता से थैली को लिया और देखा मैं देख कर हैरान थी। थैली में कपड़े थे जो थोड़े अलग थे।

मैं हँसते हुए बोली- यह क्या है?

उन्होंने मुझसे कहा- पहन कर तो देखो पहले..!

मैंने मना किया क्योंकि थैली में जो कपड़े थे वो किसी स्कूल के बच्चे के जैसे थे, पर मेरी साइज़ के थे।

उन्होंने मुझे पहनने को जिद्द की, पर मैं मना कर रही थी। फिर मैंने उनकी खुशी के लिए वो पहनने को तैयार हो गई।

मैंने अन्दर जाकर अपने कपड़े उतार दिए फिर थैली में से कपड़े निकाले उसमे एक पैंटी थी पतली सी, एक ब्रा, उसी के रंग की जालीदार और एक शर्ट और एक छोटी सी स्कर्ट।

पहले तो मैं मन ही मन हँसी फिर सोचने लगी कि लोग कितने अजीब होते है प्यार में हमेशा औरतों को अलग तरह से देखना चाहते हैं।

मैंने वो पहन ली और खुद को आईने में देखा मुझे खुद पर इतनी हँसी आ रही थी कि क्या कहूँ, पर मैं सच में सेक्सी दिख रही थी।

स्कर्ट इतनी छोटी थी के मेरे चूतड़ थोड़े दिख रहे थे, मैंने सोच लिया कि अगर वो मुझे सेक्सी रूप में देखना चाहता है तो मैं उसके सामने वैसे ही जाऊँगी।

तब मैंने शर्ट के सारे बटन खोल दिए और नीचे से उसे बाँध दिया ताकि मेरे पेट और कमर साफ़ दिखे। अब मेरे स्तनों से लेकर कमर तक का हिस्सा खुला था और सामने से स्तन आधे ढके थे जिसमे ब्रा भी दिखाई दे रही थी।

जब मैं बाहर आई तो अमर मुझे देखता ही रह गया। उसने मुझे घूरते हुए अपनी बाँहों में भर लिया और कहा- तुम आज क़यामत लग रही हो, बहुत सेक्सी लग रही हो। और फिर मुझे चूमने लगा।

फिर उसने कहा- आज तुम्हें मैं कुछ दिखाना चाहता हूँ..!

और फिर एक सीडी निकाल कर टीवी चला दिया, पहले थोड़ी देर जो देखा तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि क्या ये सच है।

मेरे सामने ब्लू-फिल्म लगी थी। मैंने तब उनसे पूछा- क्या ये सच में हो रहा है..?

उन्होंने कहा- हाँ.. ऐसी पिक्चर तुमने कभी नहीं देखी थी क्या?

मैंने कहा- नहीं!

मैं उसके सभी सीन देख कर काफी गर्म हो गई।

मैंने अमर से कहा- चलो मुझे प्यार करो।

उसने मेरा हाथ पकड़ा और फिर हम अन्दर चले गए, अन्दर जाते ही मैंने अपने कपड़े खुद ही उतार दिए और अमर ने भी खुद को नंगा कर दिया। एक-दूसरे को पागलों की तरह चूमना शुरू कर दिया, मैंने उसके लिंग को चूस कर काफी गर्म कर दिया और उसने मेरी योनि को।

फिर अमर ने मुझे लिटा कर सम्भोग के लिए तैयार हो गया तो मैंने कहा- आज कॉन्डोम लगा लो.. मुझे डर है कहीं बच्चा न ठहर जाए।

उसने मुझसे पूछा- आज क्यों इससे पहले तो बिना कॉन्डोम के ही किया और तुमने कभी नहीं कहा?

तब मैंने कहा- मैं मध्यकाल में हूँ, इसमें बच्चा ठहरने का डर होता है।

तब उन्होंने कहा- मुझे कॉन्डोम के साथ अच्छा नहीं लगता, क्योंकि इसमें पूरा मजा नहीं आता।

मैंने उनसे कहा- 2-4 रोज कॉन्डोम लगाने में क्या परेशानी है… बाकी समय तो मैं कोई विरोध नहीं करती।

तब मेरी बातों का ख्याल करते हुए उन्होंने अपनी पैंट के जेब से कॉन्डोम की डिब्बी निकाली और मुझे देते हुए कहा- खुद ही लगा दो।

मैंने कॉन्डोम निकाल कर उनके लिंग पर लगा दिया। फिर उन्हें अपने ऊपर ले कर लेट गई और लिंग को अपनी योनि मुँह पर टिका दिया और कहा- अब अन्दर घुसा लो।

मेर कहते ही उन्होंने लिंग को अन्दर धकेल दिया और धक्के लगाने लगे। कुछ देर यूँ ही सम्भोग करते रहे। फिर 4-5 मिनट के बाद मुझे बोले- कॉन्डोम से मजा नहीं आ रहा, ऐसा लग ही नहीं रहा कि मैंने तुम्हारी योनि में लिंग घुसाया है।

मैंने उनकी भावनाओं को समझा और मैंने अपनी योनि को सिकोड़ लिया ताकि उनको कुछ अच्छा लगे।

फिर मैंने पूछा- क्या अब भी ऐसा लग रहा है?

तब उन्होंने कहा- प्लीज यह कॉन्डोम निकाल देता हूँ बिल्कुल मजा नहीं आ रहा है।

मैंने मना किया, पर कुछ देर के सम्भोग में लगने लगा कि वो पूरे मन से नहीं कर रहे हैं।

कहानी जारी रहेगी।
 
फिर उन्होंने मुझसे कहा- कॉन्डोम निकाल देता हूँ जब स्खलन होने लगूंगा तो लिंग बाहर निकाल लूँगा।

मैंने उनसे पूछा- क्या खुद पर इतना नियंत्रण कर सकते हो?

तो उन्होंने मुझसे कहा- भरोसा करो.. मैं तुम्हें कभी कोई परेशानी में नहीं डालूँगा।

मैंने उन पर भरोसा किया और उन्होंने अपना लिंग बाहर निकाल कर कॉन्डोम हटा दिया फिर दुबारा अन्दर डाल कर सम्भोग करने लगे।

अब ऐसा लग रहा था जैसे वो खुश हैं और धक्के भी जोर-जोर से लगा रहे थे। मुझे भी बहुत मजा आ रहा था। हम करीब 2-3 बार आसन बदल कर सम्भोग करते रहे, इस बीच मैं झड़ गई।

फिर जब अमर झड़ने वाले थे, तो मुझसे कहा- मैं झड़ने को हूँ, तुम हाथ से हिला कर मेरी मदद करो।

फिर उन्होंने लिंग को बाहर खींच लिया, मैं हाथ से उनके लिंग को आगे-पीछे करने लगी और वो झड़ गए। उनके लिंग से वीर्य तेज़ी से निकला और मेरे पेट पर गिर गया कुछ बूँदें मेरे स्तनों और गले में लग गईं। वो मेरे बगल में लेट गए।

मैंने खुद को साफ़ किया। फिर बगल में उनकी तरफ चेहरे को कर लेट गई। उन्होंने मेरी एक टांग को अपने ऊपर रख कर, मेरे कूल्हों पर हाथ फेरते हुए कहा- तुम्हें मजा आया या नहीं?

मैंने जवाब दिया, “बहुत मजा आया, पर मुझे डर लगा रहा था कहीं आप मेरे अन्दर झड़ गए तो मुसीबत हो सकती थी।”

तब अमर ने कहा- मैं इतना नादान नहीं हूँ जो तुम्हें इस तरह की मुसीबत में डाल दूँ और मेरे माथे को चूम लिया। तब मुझे बड़ा सुकून सा महसूस हुआ और मैंने पूछा- आज ऐसे कपड़े मुझे पहनाने की क्या सूझी..?

तब उन्होंने मुझे बताया, “मैंने तुम्हें हमेशा साड़ी या फिर सलवार कमीज में देखा था, मेरे दिल में ख़याल आया कि तुम जब 20-21 की होगी और नए ज़माने के कपड़े पहनती होगी तो कैसी लगती होगी, जैसे कि जीन्स, शर्ट आदि। फिर मैंने सोचा कि तुम उस वक़्त कैसी दिखती होगी जब तुम 15-16 साल की होगी और स्कूल जाया करती होगी। स्कर्ट और शर्ट में, तो मैंने तुम्हें उस लिबास में देखने की सोची इसलिए ये कपड़े लाया।

फिर मैंने पूछा- तो पैन्टी और ब्रा क्यों लाए साथ में?

उन्होंने कहा- तुम अभी भी पुराने वाले पहन रही हो, तो सोचा नया खरीद दूँ, मुझे लगा कि तुम इस टाइप के ब्रा और पैंटी में और भी सुन्दर और सेक्सी लगोगी और सच बताऊँ तो तुम इतनी सुन्दर और सेक्सी लग रही थी कि अगर कोई तुम्हें देख लेता ऐसे तो, बलात्कार कर देता तुम्हारा…!

और हँसने लगा।

मैंने तब पूछा- तुम्हें भी मेरा बलात्कार करने की मन हो रहा था क्या…?

उसने हँसते हुए कहा- हाँ.. एक बार तो ख्याल आया, पर तुम तो वैसे ही मेरे लिए ही आई हो, मुझे बलात्कार करने जरुरत क्या है।

फिर मैंने ब्लू-फिल्म के बारे में पूछा।

उसने कहा- तुम ज्यादातर सामने शर्माती हो सोचा शायद फिल्म देख कर पूरी तरह खुल जाओ इसलिए दिखाया।

फिर उसने मुझसे पूछा- तुम्हें कौन सा दृश्य सबसे उत्तेजक लगा?

मैंने कहा- मेरे लिए तो सभी उत्तेजक ही थे मैंने पहली बार ऐसी फिल्म देखी है।

बातें करते-करते हमने एक-दूसरे को फिर से सहलाना और प्यार करना शुरू कर दिया, हमारे जिस्म फिर से गर्म होने लगे। उसने मुझसे कहा- फिल्म में जैसे दृश्य हैं वैसे कोशिश करते हैं..!

मैंने भी जोश में ‘हाँ’ कह दिया।

हालांकि कुछ पोजीशन तो ठीक थे, पर ज्यादातर मुमकिन नहीं था फिर भी अमर के कहने पर मैंने कोशिश की। हमने एक-दूसरे को अंगों को प्यार करना शुरू कर दिया, मैंने उसनके लिंग को प्यार किया और वो सख्त हो गया और मेरी योनि से मिलने को तड़पने लगा। मैं भी अपनी अधूरी प्यास लिए थी सो मैं अमर के ऊपर चढ़ गई। अमर ने लिंग को मेरी योनि के मुख पर लगा दिया और मैंने नीचे की और दबाव दिया लिंग मेरी योनि में ‘चप’ से घुस गया।

मेरी योनि में पहले से अमर की पूर्व की चुदाई का रस भरा था और मैं खुद भी गर्म हो गई थी सो योनि पूरी तरह गीली हो गई थी, सो मुझे धक्के लगाने में बहुत मजा आ रहा था।

अमर ने मेरी कमर पकड़े हुए था। मैंने झुक कर एक स्तन को उसके मुँह में लगा दिया और वो उसे चूसने लगा। मैं जोरों से धक्के लगाने लगी। अमर भी बीच-बीच में नीचे से झटके देता, और तब उनका लिंग मेरे बच्चेदानी तक चला जाता और मैं जोश में अपने कमर को नचाने लगती। हम काफी गर्म जोशी से सम्भोग करते रहे फिर उसने मुझे नीचे लिटा दिया और कमर के नीचे तकिया रखा और धक्के लगाने लगा। उनके धक्कों से मैं कुहक जाती हर बार मेरे मुँह से मादक सिसकियां निकलने लगीं और मैं झड़ गई। पर अमर अभी भी धक्के पे धक्के लगा रहा था।

मेर झड़ने के करीब 4-6 मिनट बाद वो भी झड़ गए और मेरे ऊपर निढाल हो गए। वो हाँफते हुए मेरे ऊपर लेटे रहे, मैंने उनके सर को सहलाना शुरू कर दिया वो चुपचाप थे। कुछ देर बाद मैंने उनको आवाज दी, पर उन्होंने नहीं सुना, मैंने देखा कि वो सो गए थे। मैंने थका हुआ सोच कर उनको अपने ऊपर ही सोने दिया। ये सोच कर खुद जब करवट लेंगे मुझसे अलग हो जायेंगे।

मैं उनके सर के बालों को सहलाती हुई सोचने लगी कि मैं इनके साथ क्या-क्या कर रही हूँ जो मैंने कभी सोचा नहीं था। सम्भोग अब खेल सा बन गया था, एक-दूसरे को तड़पाने और फिर मिलने का मजा। यही सोचते-सोचते पता नहीं मैं कब सो गई पता ही नहीं चला। जब मेरी आँख खुली तो देखा 2.30 बज रहे थे और अमर अभी भी मेरे ऊपर सोया हुआ है।

मैंने सोचा कि सुबह होने वाली है इसलिए इसे उठा कर जाने के लिए बोलूँ, सो मैंने उसे आवाज दी और वो उठ गया पर उसके उठने पर मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ, उसका लिंग अभी तक मेरी योनि के अन्दर ही था। मैं मन ही मन हँस दी और फिर बाथरूम चली गई। वापस आई तो हमने दुबारा सम्भोग किया फिर अमर को चले जाने को कहा।

इसी तरह 15 दिन बीत गए हमें, रोज सम्भोग करते हुए, इन 15 दिनों में हमने कोई कोई दिन 7 बार तक सम्भोग किया।

इन दिनों में मैंने पाया कि मर्द शुरू में जल्दी झड़ जाते हैं पर उसके बाद हर बार काफी समय लगता है फिर से झड़ने में और औरतों का ठीक उल्टा होता है उन्हें शुरू में थोड़ा समय लगता है गर्म होने और झड़ने में पर अगली बार जल्दी झड़ जाती हैं।

मुझे शुरू में लगा कि शायद ऐसा मेरे साथ ही होता है पर कई किताबों से और फिर मेरी सहेलियाँ सुधा और हेमलता से पता चला कि सभी औरतों के साथ ऐसा होता है।
 
अब तक मैंने अमर और विजय के बारे में बताया आज मैं मुर्तुजा के बारे में बताने जा रही हूँ।

उसका पूरा नाम मुर्तुजा अंसारी था और वो मुझे पुरी में मिला था। जब मैं अपने पति के साथ घूमने के लिए गई थी।

मैं उस वक़्त पति के तबादले की बात हो रही थी, तो मेरे पति ने मुझे और बच्चों को घुमाने के लिए पुरी ले गए। अमर से भी अब मैं दूर रहने लगी थी, क्योंकि वो पत्नी की बीमारी की वजह से ज्यादातर घर आने-जाने लगे थे।

अमर और मेरे बीच बातें तो रोज होती थीं, पर करीब एक महीने से शारीरिक मिलन नहीं हो रहा था। पति के तबादले के ठीक एक हफ्ते पहले हमने घूमने का विचार किया और मेरे पति मुझे और मेरे बच्चों को लेकर पुरी चले गए।

हम दो दिन घूमे, फिर जिस रात वापस आना था उसी शाम को हम खाना खाने एक रेस्टोरेन्ट में गए। तभी मैंने गौर किया एक 35-36 साल का आदमी जो ठीक हमारे सामने बैठा, अपनी बीवी और 3 बच्चों के साथ खाना खा रहा था, बार-बार मुझे घूर रहा है।

वो काफी लम्बा-चौड़ा, गोरा हल्की दाढ़ी, एकदम जवान, उसे देख कर लग रहा था जैसे कोई अँगरेज़ हो।

पहले तो मैंने नजरअन्दाज करने की कोशिश की, पर मुझे कुछ अजीब सा लगा। उसके देखने के तरीके से ऐसा लग रहा था, जैसे वो हमें जानता हो।

काफी देर देखने के बाद उसने मुझे मुस्कुरा कर देखा।

मैंने तब अपने पति से कहा- वो हमें बार-बार देख रहा है।

जब मेरे पति ने उसकी तरफ देखा तो वो उठ कर हमारे पास आया और कहा- आप लोग अंगुल से हो न..?

मेरे पति ने जवाब दिया- हाँ, पर आपको कैसे पता चला?

उसने तब कहा- मैं भी वहीं से हूँ और मेरी एक कपड़ों की दुकान है।

तब मेरे पति ने पूछा- हाँ.. पर मैं तो कभी आपसे नहीं मिला।

फिर मेरे पति ने मेरी तरफ देखा तो मैंने भी कह दिया- मैं भी नहीं जानती!

तब उसने बताया- नहीं.. हम पहले कभी नहीं मिले, दरअसल आपकी पत्नी को मैंने अंगुल में बहुत बार देखा है। बच्चे को स्कूल से लेने जाती हैं तब..

फिर उसने कहा- आप लोगों को देखा तो बस यूँ ही सोचा कि पूछ लूँ कि घूमने आए होंगे!

यह कह कर उसने हम लोगों को अपने परिवार से मिलाया। फिर कुछ देर जान-पहचान की बातें हुईं और हम लोगों ने वापस अपने घर आने के लिए ट्रेन पकड़ ली।

मुझे ऐसा लगा जैसे आम मुलाकात होती है लोगों की राह चलते वैसी ही होगी, पर कहते है कि अगर नदी में बाढ़ आई है तो कहीं न कहीं बारिश हुई होगी।

मतलब कि हर चीज़ के पीछे कोई न कोई कारण होता है, हमारी मुलाकात भी बेवजह नहीं थी, इसका भी कारण था जो मुझे बाद में पता चला।

अगले दिन हम घर पहुँच गए।

मेरे पति का तबादला तो हो चुका था, पर हम इतनी जल्दी नहीं जा सकते थे क्योंकि दिसम्बर का महीना था और मार्च के शुरू में मेरे बच्चे का इम्तिहान शुरू होने वाला था।

इसलिए पति ने फैसला लिया कि उसके इम्तिहान के बाद ही हम यहाँ से जायेंगे ताकि नई जगह में जाकर बच्चे की पढ़ाई के लिए फिर से उसी क्लास में दाखिला न लेना पड़े।

इसलिए पति ने मुझे और बच्चों को यहीं छोड़ दिया और खुद रांची चले गए और हर हफ्ते छुट्टी में आने का फैसला किया।

पुरी से वापस लौटने के दो दिन बाद पति जाने वाले थे सो मैंने उनका सारा सामान बाँध दिया और रात को वो चले गए।

उसी रात अमर ने मुझे फोन किया और मेरा हाल-चाल पूछा। उससे बातें किए एक हफ्ता हो चुका था तो काफी देर तक हम बातें करते रहे।

उसने बताया कि उसकी बीवी की तबियत बहुत ख़राब है, सो अभी उसे महीने में हर बार आना जाना पड़ेगा। मैंने भी सोचा कि हाँ.. अब यहीं तक का साथ लिखा था हमारे नसीब में, सो उसे अपने दिल से निकालने की सोचने लगी क्योंकि जितना याद करती उतना ही दुःख होता। एक लम्बे समय तक किसी के साथ समय गुजार लेना कुछ कम नहीं होता।

खैर… मैं अगले दिन अपने बच्चे को लाने स्कूल गई।

ये मेरा दूसरा वाला बच्चा था। बड़े बेटे को लाने और ले जाने की अब जरुरत नहीं होती थी।

मैं जब उसे लेकर आ रही थी, तभी किसी ने मुझे आवाज दी। मैंने पलट कर देखा तो ये वही आदमी था जो हमें पुरी में मिला था।

मैंने कभी सोचा नही था कि इस आदमी से दुबारा मुलाकात होगी। पर किस्मत का खेल ही ऐसा होता है कि कब किससे मिला दे और कब किससे जुदा कर दे।

उसने मेरे पास आकर ‘सलाम’ कहा, फिर बताया कि वो हमारे पास के मोहल्ले से कुछ दूर ही रहता है। हम साथ बात करते हुए चलने लगे। फिर वो एक गली की तरफ मुड़ गया और हमें अलविदा कह चला गया।

उसने बातचीत के दौरान बताया कि उसका नाम मुर्तुजा अंसारी है, उसकी बीवी का नाम फरजाना है और 3 बच्चे हैं। उसकी बीवी की उम्र कुछ ज्यादा नहीं थी। महज 25 साल थी और बच्चों में भी कोई खास फर्क नहीं बस एक साल का था।

अगले दिन हम फिर मिले और बातें करते हुए जाने लगे।

तभी मैंने पूछा- आप अपनी दुकान छोड़ अपने बच्चों को लेने आते हैं, अपनी बीवी को क्यों नहीं भेजते?

तब उसने कहा- मेरी बीवी पढ़ी-लिखी नहीं है और मुस्लिम संस्कार में पली-बढ़ी है सो ज्यादा घर से बाहर नहीं निकलना पसंद करती..

मैंने कहा- इस जमाने में भी ऐसी है वो!

तब उसने कहा- क्या करूँ बदलने की कोशिश करता हूँ पर बदलती नहीं और ज्यादा जोर देने पर माँ-बाप से कह देती है इसलिए खुद ही सब कुछ करता हूँ।

तब मैंने पूछा- आप कितने पढ़े-लिखे हैं?

उसने जवाब दिया- जी एम.ए. किया है इंग्लिश में!

मैंने कहा- फिर अनपढ़ लड़की से शादी क्यों की?

उसने जवाब दिया, जी शादी तो घरवालों ने करा दी और हमारे यहाँ तो शादियाँ नजदीक के रिश्तेदारों में ही हो जाती हैं।

मैंने कहा- फिर भी आपको तो सोचना चाहिए था कि अपने बच्चों का एक पढ़ी-लिखी औरत जैसा ख्याल रख सकती है वैसा एक अनपढ़ औरत नहीं रख सकती है!

तब उसने कहा- जी पढ़ी-लिखी तो है, पर सिर्फ उर्दू!

फिर मैंने कहा- आपने इतनी जल्दी-जल्दी बच्चे क्यों किए? क्या जल्दबाजी थी?

उसने हँसते हुए कहा- अब क्या कहूँ, रहने दीजिए!
 
मुझे पता नहीं क्या हुआ शायद अपने सामने एक अनपढ़ औरत की बातें सुन खुद पर नाज हुआ और कह बैठी- इस जमाने में भी आप ऐसे लोग है… इतने सारे तरीके हैं, कुछ भी कर सकते थे.. कुछ तो दिमाग लगाना चाहिए था!

अब उसे भी शायद अपनी बेइज्ज़ती सी लगी, सो उसने मुझे समझाते हुए कहा- देखिए हर इंसान का रहन-सहन अलग होता है और हर मजहब का भी… मेरी बीवी कट्टर मुस्लिम समाज में पली-बढ़ी है, इसलिए वो इससे दिल से जुड़ी है। मैं भी उसी मजहब का एक हिस्सा हूँ इसलिए उसकी इज्ज़त करता हूँ, पर मैं बस उसके लिए हूँ, मैं भी नए जमाने के बारे में जानता हूँ और घर के बाहर आम लोगों की तरह ही रहता हूँ।

तब मैंने जोर देकर कहा- अगर सोचते तो ऐसा नहीं करते.. औरत बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं होती!

उसे मेरी बात का शायद बुरा लगा और कहा- देखिए आप गलत समझ रही हैं.. कन्डोम और बाकी की चीजों का इस्तेमाल करना हमारे यहाँ सही नहीं माना जाता और न ही नसबंदी कराने को, सो जल्दी-जल्दी में हो गए क्योंकि मेरी बीवी इन सब बातों को सख्ती से मानती है।

तब मैंने कहा- मतलब आगे भी और बच्चे होंगे?

उसने कहा- इसी बात का तो डर है इसलिए बीवी से दूर ही रहता हूँ!

और फिर ऐसी बातें करते हुए हम अपने अपने घर को चले गए।

घर पहुँच कर ऐसा लग रहा था जैसे हमारी मुलाकात दो दिन पहले नहीं बल्कि हम काफी दिनों से एक-दूसरे को जानते थे।

हम दो दिन के मुलाकात में ही इतने खुल कर बातें करने लगे थे, यह सोचना जायज था।

उससे खुल कर बातें करने का भी शायद कारण था कि वो दिखने और बातें करने में बहुत आकर्षक था।

अगले दिन हम फिर मिले, पर इस बार मेरे पति और और घर परिवार की बातें हुई।

फिर मैंने उसे बताया के मार्च में हम यहाँ से चले जायेंगे तो उसने मुझसे मेरा फोन का नंबर माँगा।

मैंने मना किया तो उसने मुझे अपना नंबर दे दिया कि अगर कभी बात करने की इच्छा हो तो फोन कर लेना।

मैं वापस अपने घर चली आई। शाम को पता नहीं मैंने क्या सोचा और उसे फोन किया। मेरी आवाज सुनते ही वो ऐसा खुश हुआ जैसे कोई खजाना मिल गया हो।

थोड़ी बहुत बातें करने के बाद मैंने फोन रख दिया और अपने काम में व्यस्त हो गई।

रात को पता नहीं मुझे नींद नहीं आ रही थी, फिर अचानक मेरे फोन की घंटी बजी, देखा तो उसका मैसेज था।

मैं कुछ देर तो सोचती रही, फिर मैंने भी सोचा कि कोई मुझे अच्छे सपनों का मैसेज कर रहा है, तो मैं भी कर दूँ, सो मैंने भी रिप्लाई कर दिया।

कुछ देर बाद उसका फोन आया, मैंने नहीं उठाया और मैं सोने की कोशिश करने लगी, पर नींद पता नहीं क्यों, मुझे आ नहीं रही थी।

मैं पेशाब करने के लिए उठी और बाथरूम से आकर फिर सोने की कोशिश करने लगी पर फिर भी नींद नहीं आ रही थी।

मैंने मोबाइल में समय देखा तो 12 बजने को थे। मैंने सोचा कि देखूँ मुर्तुजा सोया या नहीं, सो मैंने फोन करके तुरंत काट दिया।

दस सेकंड के बाद तुरंत उसका फोन आ गया। मैं कुछ देर तो सोचती रही कि क्या करूँ, पर तब तक फोन कट गया। मैंने राहत की सांस ली पर तब तक दुबारा घण्टी बजी, मैं अब सोच में पड़ गई कि क्या करूँ?

तब तक फिर फोन कट गया और मैंने सोचा कि शायद अब वो फोन नहीं करेगा, पर फिर से फोन रिंग हुआ। इस बार मैंने फोन उठा लिया।

उसने कहा- हैलो.. सोई नहीं.. अभी तक आप?

मैंने कहा- सो गई थी, पर अभी पानी पीने को उठी तो आपका ‘मिस कॉल’ था पर समय नहीं देख पाई थी, इसलिए कॉल कर दिया, आप सोये नहीं अभी तक?

मैं बस अनजान बन रही थी।

उसने कहा- मुझे आज नींद नहीं आ रही है।

मैंने कहा- आप इतनी रात मुझसे बातें कर रहे हो, आपकी बीवी नहीं है क्या?

उसने कहा- हम साथ नहीं सोते क्योंकि अब तीन बच्चे हो गए हैं।

मैंने तब पूछ लिया- मतलब आप लोग सम्भोग नहीं करते?

तब उसने बताया- हम करते हैं, पर बहुत कम.. बीवी को जब लगता है कि सब कुछ सुरक्षित है… तब..!

मैंने पूछा- आप लोग इतने जवान हो, फिर कैसे इतना कण्ट्रोल करते हो?

उसने बताया- क्या करूँ… बीवी ऐसी मिल गई है, तो करना पड़ रहा है।

मैं धीरे-धीरे उससे खुल कर बातें करने लगी और वो भी खुल कर बातें करने लगा।

उसने बताया कि उसे अपनी बीवी से उस तरह का सुख नहीं मिलता, जैसा उसे चाहिए था और कोई चाहेगा क्यों नहीं जवानी इसीलिए तो होती है।

फिर उसने बताया- मेरी बीवी पास के रिश्तेदार की बेटी है, जो रिश्ते में उसकी चाची की छोटी बहन है, पर मुस्लिम समाज में रहन-सहन होने की वजह से बहुत धार्मिक है। इसलिए वो खुले तौर पर सेक्स की और चीजों को पसंद नहीं करती।

मैंने भी सोचा कि शायद ऐसा होता होगा, सो ज्यादा जोर नहीं दिया।

हम ऐसे ही बातें करते हुए सो गए और अगले दिन मैं फिर उससे मिली।

वो मुझसे ऐसा मिला जैसे हर रोज मिलता था, पर आज रात की बात को लेकर मुझे थोड़ी शर्म सा महसूस हो रही थी।

फिर भी मैं उसे जाहिर नहीं होने देना चाहती थी, सो उससे उसी की तरह बात करने लगी।

उस दिन बच्चों को कुछ प्रोजेक्ट सा मिला था, तो मैंने सोचा कि यहीं से बाज़ार चली जाऊँ, तब उसने भी कहा- मैं भी चलता हूँ..!

सो हम बाज़ार चले गए।

हम लोगों ने बच्चों के लिए सामान ख़रीदा, फिर एक रेस्टोरेन्ट में उसने मुझे कुछ खाने के लिए बोला।

मुझे देर हो रही थी और बारिश जैसा मौसम भी था सो मैंने उसे जल्दी चलने को कहा और हम निकल गए।

मौसम को देखते हुए मैंने छाता ले लिया था।

पर जिस बात का डर था वही हुआ, बीच रास्ते में बारिश शुरू हो गई।

मैंने छाता खोला और हम चारों उसके नीचे आ गए। बारिश ज्यादा तो नहीं थी, इसलिए हमचलते रहे, पर थोड़ी दूर जाते ही तेज़ हो गई।

मैंने हल्के गुलाबी रंग का सलवार-कमीज पहना था और बारिश की वजह से वो भीगने लगा था।

करीब सलवार मेरी जाँघों तक पूरी भीग चुकी थी।

बारिश इतनी तेज़ हो चुकी थी कि 4 लोगों का एक छाता के नीचे बच पाना मुश्किल था पर आस-पास कोई जगह नहीं थी कि हम छुप सकें इसलिए हम जल्दी-जल्दी चलने लगे।

हमने बच्चों को आगे कर दिया और हम पीछे हो गए जिसके कारण उसका जिस्म मेरे जिस्म से चलते हुए रगड़ खाने लगा।

मुझे बहुत अजीब सा लग रहा था। उसके जिस्म की खुशबू मुझे दीवाना सा करने लगी। मैं थोड़ी शरमाई सी थी, पर मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था।

मेरी अंतहीन प्यास की कहानी जारी रहेगी।
 
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