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लेखक:-लिलाधर
जीजाजी ..ऽ..ऽ…
हल्की-सी देर तक खिंचती आवाज जो एक सुरीली-सी फुसफुसाहट में यकायक टूटती है। कुछ लोग बोलते हैं तो ऐसा लगता है उसमें संगीत बज रहा हो। बातों की धारा में हँसी की तरंगें। सदा प्रसन्न रहने की प्रकृति से उत्पन्न स्वाभाविक हँसी पर तैरती वह सांगीतिक आवाज! काश वह आवाज जिन्दगी भर के लिए मेरे साथ होती!
जीजाजी ..ऽ..ऽ…
आह! शादी के बीस साल गुजर जाने के बाद भी यह पुकार कलेजे में हूक पैदा करती है। फोन पर भी वह आवाज कानों में मिसरी घोलती है। मेरी शादी तय होने के अगले दिन ही मुझे देखने आई थी और उसके दमकते रूप के साथ उसकी हँसी मिश्रित मीठी आवाज कलेजे में नश्तर की तरह उतर गई। वह अपनी बहन से कितनी ज्यादा सुंदर थी! काश यही मेरी बीवी बनती! उस दिन मैंने कितना सिर धुना। काश इस लड़की को मैं पहले देख लेता। बरसों इंतजार क्यों न करना पड़े, कर लेता, पर शादी इसी लड़की से करता। लेकिन अब तो बात पक्की हो चुकी थी। और कल्पना में तमाम आकाश-पाताल के कुलाबे मिलाने (अपनी ‘लड़की’ को गोली तक मार देने की भी) के बावजूद पक्की हो चुकी बात से फिर सकना गवारा नहीं हुआ। यों मेरी वाली ‘लड़की’ भी कम सुंदर और ‘सुभाषी’ नहीं थी लेकिन साली तो उससे बढ़कर थी।
शादी के बाद मैं अपनी पत्नी के रूप-सौंदर्य और गुणों में खो गया। उसने अपने प्यार और सौंदर्य से मुझे मोह कर रखा। लेकिन शादी के बीस साल बाद आज भी रात के अंधेरे शयनकक्ष में कल्पना करता हूँ कि पिंकी की गर्म संघर्ष के क्षणों में उसकी कराहटों की – ”आ..ऽ..ऽ..ह… ऊ..ऽ..ऽ..ह… ऍं..ऽ..ऽ..ह!!”
”जीजाजी..ऽ..ऽ…”
मन के सन्नाटे में गूंजती रहनेवाली आवाज। हाय !!
वह मुझे अपना सबसे प्रिय व्यक्ति कहती है। ‘मेरे सबसे प्यारे जीजाजी’ आप बहो.ऽ.त बहो.ऽ.त अच्छे हैं, (‘हो’ को खींचकर बोलती है) ‘ये मेरा लक है कि आप जैसे जीजा मिले’। मैं पूछता हूँ आपका लक या दीदी का? ”दीदी का”… और मंद छलकती हँसी। मुझे उस समय और बहुत जोर से लगता है उसके मन में भी वही आग जल रही है जो मेरे मन में। लेकिन भले मानुस की झिझक छूट लेने नहीं देती।
लेकिन निरंतर जलने वाली दिल की आग का शायद कोई अलौकिक असर होता होगा! कहानियों से बाहर भी कभी ख्वाब अप्रत्याशित रूप से हकीकत बन जाते हैं। कभी सोचा न था कि सौंदर्य की वह उमड़ती नदी मेरे पहलू में बहेगी – इत्मीनान से, रात भर, और मैं उसकी धारा में डूब-डूबकर स्नान करूंगा। वह भी अकेले नहीं, अपनी पत्नी, उसकी बहन के साथ। उस रात एक नहीं, दो नदियाँ बहीं – रूप, रस, रंग की उमड़ती धाराएँ। अस्तित्व का रेशा-रेशा, पोर-पोर धन्य हो गया।
… … …
इस अद्भुत घटना का रंगमंच बना कलकत्ते से थोड़ी दूर स्थित दीघा का मनोरम समुद्र तट जहाँ नारियल पेड़ों से रेखित समतल किनारे और स्वच्छ रेती महानगर की भीड़ और शोर से अलग मन को शांति और स्फूर्ति प्रदान करते हैं। हम वहाँ अक्सर जाते हैं। हमने वहाँ एक रिसॉर्ट की सदस्यता ले रखी है। वहाँ हम जब भी जाते, समुद्रतट के शांत सौंदर्य के बीच पिंकी की जरूर याद आती – वह होती तो कितना अच्छा लगता, दिल्ली की भीड़भाड़ से अलग वह यहाँ कितना एंजाय करती। मैं अपनी लिबरल पत्नी से जीजोचित छेड़छाड़ के साथ उसके बारे में बात करता और मन-ही-मन उसके पानी में भीगे यौवन की कल्पना करता – चिपकी फ्राक में उठे हुए वक्ष, उनपर उभरती अंदर ब्रा के किनारे और उसके कपों की सिलाई की लाइन, पीठ में ब्रा के फीते की धंसी हुई लकीर! कमर, नितंबों, जांघों की गोलाइयों को जाहिर करती चिपकी फ्रॉक और शलवार! काश कभी वो और मैं अकेले हों इस एकांत में!
हमने कई बार पिंकी और उसके पति को दीघा चलने का आमंत्रण दिया लेकिन उन्हें समय नहीं मिल पाता। कुणाल गुड़गाँव दिल्ली में एक मल्टी नेशनल ड्रग फैक्ट्री के प्रोडक्शन इंचार्ज थे। सुबह जल्दी जाना और देर रात लौटना; घर में भी फोन पर व्यस्त रहना। फिर भी हमारी तारीफ सुन-सुनकर वे दीघा जाने को उत्सुक हो गए थे; काफी मुश्किल से उन्हें छुट्टी मिली, दशहरे के समय। बस दो दिन की। हमने ऑफर किया कि पिंकी चार-पाँच पूजा को ही कोलकाता आ जाए और यहाँ की दुर्गा पूजा देख ले। दशमी के दिन कुणाल फ्लाइट से कोलकाता आएंगे और एयरपोर्ट से सीधे स्टेशन आकर उसी रात हम लोगों के साथ दीघा की ट्रेन पकड़ लेंगे।
हमने दीघा की ट्रेन में चार सीटों का आरक्षण करवा लिया। दीघा यूँ तो शांत रहता है लेकिन त्योहारों के समय वहाँ बड़ी भीड़ होती है, होटलों में जगह नहीं मिलती। हमारे ठहरने की तो समस्या नहीं थी क्योंकि वहाँ हमने एक रिसॉर्ट की सदस्यता ले रखी है। उन दोनों के लिए होटल खोजने में बड़ी मुश्किल हुई। किस्मत ने साथ दिया – एक महंगे होटल में एक खासा महंगा कमरा बुकिंग कैन्सिलेशन से खाली हुआ था, उसमें जगह मिल गई। वह होटल हमारे रिसॉर्ट से ज्यादा दूर भी नहीं था।