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सुलग उठा सिन्दूर complete

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सुलग उठा सिन्दूर by Ved Prakash Sharma

"लो दीपा, कल शहर में एक और बडी डकैती पड़ गई ।। "

किंचन में चाय बनाती दीपा ने पूछा " कहां ? "

"कचहरी में ।" सोफे पर अधलेटी अवस्था में पडे़ देव ने नजरें अखवार पर जमाए बताया----'"तीन लुटेरे एक मैंटाडोर में आए, रिवॉल्वरों की नोक पर ट्रेजरी लूट ली---गार्ड और अन्य… ....कर्मचारी हक्के-बक्के से मूर्ति वने सबकुछ देखते रहे औंर लुटेरों ने दस लाख के नोटों से भरा एक सन्दूक मैटाडोर में रख लिया ।"

"ऐसे मौकों पर कोई कर भी क्या सकता है ?" किचन और ड्राइंगरूम के बीच वने मोखले से दीपा की आवाज निक्ली----"सबको अपनी जान प्यारी होती है, गुण्डे--मवालियों के लिए किसी को मार डालना क्या मुश्किल काम ?"

"ऐसी वात नहीं है, आखिरी समय में ही सही, मगर ट्रेजरी के एक गार्ड ने बहादुरी दिखाई!"

"क्या-किया उसने?"

"सन्दूक को मैंटाडोर में रखने के बाद लुटेरे फरार होने वाले थे कि गीर्ड ने अपनी गन से गोली चला दी---एक लुटेरा वहीं ढेर हो गया, दूसरी गोली चलाई तो दूसरे की जांघ में लगी, परन्तु फिर भी वह सन्दूक सहित मैटाडोर लेकर फरार हो गया----लोग मैटाडोर के पीछे भागे, वह तो खैर उनके हाथ क्या आनी थी-----इस अफरा-तफरी में तीसरा लुटेरा भी जाने -कहां गुम हो गया?"

"पिछले दिनो से शहर में कोई गिरोह आया लगता है ।" हाथ में कप लिए, नाइट गाउन पहने दीपा ड्राइंगरूम में प्रविष्ट होती हुई बोली-----" आऐ दिन लूट-पाट, चोरी और हत्याएं हो रही है"

"पुलिस ने मैटाडोर या दोनों में से किसी भी लुटेरे का पता बताने वाले को दस हजार रूपये देने की घोषना की है ।"

"तुम्हारे मुंह में पानी क्यो आ रहा है, तुम्हारे हाथ तो ये दस हजार लगने से रहे---लो , चाय पियो!"

"ठीक कहती हो तुम, हमारी ऐसी किस्मत कहां?" देव ने अखबार सेंटर टेबल पर डाला और सीधा बैठकर कप-प्लेट लेता हुआ बोला…"'सिर्फ एक चाय बनाई हे?"

"जी हा!" दीपा उसके सामने वाले सोफे पर बैठ गई!

"क्यों?"

"आज मैं मंदिर जाकर भगवान के दर्शन करने से पहले कूछ नहीं लूँगी ।"
 


दीपा के सुन्दर चेहरे पर नजरे टिकाए देव की आखो में एकाएक शरारत नाच उठी, बोला------"तुम तो कहती थीं कि तुम्हारे भगवान हम ?"

"बेशक पत्नी के लिए उसका पति भगवान ही होता है!"

चाय की चुस्की लेते हुए देव ने कहा----"फिर यह मंदिर में रहने वाला भगवान कहाँ से टपक पडा़ ?"

"वह भगवान नम्बर एक है, क्योकि सबका है----तुम भगवान नम्बर दो हो, क्योकि सिर्फ मेरे हो…मैं आज-उस भगवान के दर्शन करने से पहले पानी भी नहीं पियूंगी, जिसने ठीक आज के दिन तुम्हें मेरा भगवान बनाया ।। "

"भगवान नम्बर एक तो पैसा है दीपा, दौलत------मंदिर में रहने वाले तुम्हारे भगबान का नम्बर दूसरा है और इस हिसाब से मेरा नम्बर ।"

"द--देव ।" दीपा चीख-सू पड़ी ।

"ओह, सॉरी --बुरा मान गई !" सकपकाकर कहने के वाद उसने ज़ल्दी-जल्दी चाय पीनी शुरू कर दी, जबकि दीपा के दूध से गोरे, गोल मुखड़े पर नागबारी के चिन्ह थे मगर बोली कुछ नही…चाय पीता-हुआ देव बीच-बीच में उसे कनखियों से देखता रहा ।

दीपा अखबार उठाकर ट्रेजरी में डाके ही न्युज पढने लगी ।।

चाय खत्म करके देव ने कप-प्लेट टेबल पर रखे ही थे कि दीपा ने उखड़े हुए स्वर ने हुक्म जारी कर दिया-"'जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो जाओ ।"

"ओह तो तुम अव तक नाराज हो दीपा डार्लिग ?" कहता हुआ देव उठा उसके नजदीक पहुंचकर बोला-"कम-से-कम आज तो नाराज मत हो, आज हमारी पहली मैरिज एनीवरसरी है ।"

"तो तुम ऐसी वात ही क्यों करते हो देव?" उसने पलकें उठाकर शि्कायत की-----"तुम अपने दिमाग से दौलत का भूत उतारकर फेक क्यो नहीं देते ?"

"छोडो दीपा, आज हमे किसी बहस में नहीं पड़ना चाहिए !" कहते हुए देव ने उसके समीप बैठकर, कमल-सा मुखड़ा हथेलियों के बीच लिया और उसकी बड्री-बड्री आंखों में झांकता हुआ बोला…"यह बताओं कि आज मंदिर जाकर, तुम अपने भगवान नम्बर एक से क्या मांगने वाली हो?"

दीपा के मन में न जाने क्या विचार उठा कि पलकें लाज के बोझ से स्वयं झुकती चली गई चौर चेहरा शर्म से सुर्ख हो गया…दीपा की इस अदा पर देव को इतना प्यार आया कि उसने होंठ आगे बढाकर गुलाब की पंखुरियों को चूम लिया ।

सुर्खी कनपटियों तक फैल गई, नेत्र बन्द हो गए ।

प्रेम-सागर में डूबी दीपा के मुंह से निक्ला…"हुं!"

"जवाब नहीं दिया तुमने, क्या मांगने जा रही हो भगवान से?"

पलके उठी, चमचमा रही आंखों में चंचलता उभर आई बोली-----" मन चाहे देवता से शादी के एक साल याद कोई स्त्री भगवान से क्या मांग सकती है?"

"जानना चाहता हूं ।"

"कृष्ण-कन्हेया जैसे शैतान, एक नन्हा-सा देव ।"

"न-नहीं ।" देव अचानक चीखकर एक झटके से खड़ा हो गया ।

दीपा चौंक पडी, असमंजस में फंसी वह देव को अभी देख ही रही थी कि चेहरे पर पूरी सख्ती और दृढ़ता लिए देव ने कहा…"अभी हमे कोई बच्चा नहीं चाहिए।"

"क्यों?"

"क्योकि हम ठीक से उसकी परवरिश नहीं कर सकते ।"

"कैसी बात कर रहे हो देव ।"

"मैं ठीक कह रहा हूं दीपा । " वह पलटकर उसकी आंखों में झांकता हुआ बोला-----"जब तक ठीक से मैं कुछ कमाने नहीं लगता, तब तक किसी नए मेहमान को इस दुनिया में लाकर हमे उसकी जिन्दगी बरबाद करने का कोई हक नहीं है ।"

 
"फिर वही बात देव, कितनी वार कहूं कि जो तुम कमाते हो वह हमारे लिये काफी नहीं बल्कि बहुत है-बैक में क्लर्क हो तुम, बारह सौ रुपये महीना क्या कम हैं?”

_ "हु!" देव ने नफरत से मुंह सिक्रोड़ा-"बारह सौ रुपये-बारह सौ रुपये महीना कम होते हैं क्या दीपा, एक आदमी उनसे क्या कर सकता है?"

"हजार वार कह चुकी हूं , इस तनख्वाह में कोई भी व्यक्ति अपने परिवार को इज्जत की रोटी खिला सकता हे-सम्मानपूर्वक हंसते-खेलते जिन्दगी गुजार सकता है!"

"बस ?"

"और आदमी को चाहिये भी क्या ?"

"तुम्हें नहीं मालुम दीपा, मैं जानता हूं कि मुझे क्या चाहिये?” अजीब उत्तेजना में फंसा देव कहता चला गया ---"जरा सोचो, आज मेरी उम्र पच्चीस साल हा…साठ साल की आजु में रिटायर कर दिया जाऊंगा यानी जिन्दगी के सिर्फ पैंतीस साल बाकी बचे हैं और इन पैतीस सालों में कुल मिलाकर वे मुझे पांच लाख चार हजार रुपये देगा-सिर्फ पांच लाख रुपये----कछुवे की चाल से बढ़ने वाला 'इंक्रीमेण्ट' भी इसमें जोड़ दिया जाये तो ज्यादा-से-ज्यादा छ: लाख कमा लूगा-यानी मेरी सारी जिन्दगी की कमाई कुल मिलाकर सिर्फ छ: लाख होगी, जबकि शादी के वाद मैंने तुम्हें जिस कोठी की मालकिन बनाने की कल्पना की थी उसकी कीमत आज आठ लाख है!"

"द-देव!" दीपा का स्वर कांप गया ।

"तुम्हारे गले में हीरों का हार, कलाइयों में कंगन तो क्या नाक से नथ और कानों में सोने के बुन्दे तक नहीं हैं!" भावावेश के भंवर में फंसा देव कहता चला गया-'"नहीँ दीपा, मेरी कल्पनाओं में तुम्हें चार-पांच सौ रुपल्ली की साड़ी नहीं पहननी थी?"

एकटक उसे देख रही दीपा ने कहा…"ज़ब से शादी हुई है, तब से तुम अपनी इन्हीं कल्पनाओं को पूरा करने के लिए दीवाने हुए जा रहे हो, जबकि मैं लगातार कहती आ रही हूं कि तुम्हारी इस गुड़िया को कुछ नहीं चाहिए…मुझें तुम मिल गये सबकुछ मिल गया है देव ---सबसे बडी दोलत मिल गयी है मुझें…मेरे लिए तो तुम्हीं सबकुछ हो…कंगन, नथ, बुन्दे और गले का हार भी…देखो, मेरे मस्तक पर जगमगाते इस सिंदूरी सूरज को देखो---- मेरी मांग में चमचमा रही सिंदूर की सुर्खी देखो देव…इस सबकी मौजूदगी में मैं सड़क पर इतराती चला करती हूं---तुमने इतना दिया है कि मैं निहाल हो गई हुं---इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं चाहिए! "

"मुझे चाहिए!" देव दांत भींचकर कह उठा----"तुम्हारे लिये समुद्र के किनारे पर वना एक बंगला चाहिए, चमचमाती विदेशी कार-नैकर-चाकर-हीरों से जड़ी तुम और तुम्हारे साथ आकाश में परवाज़ करता मैं…तब हमारे पास एक नन्हा-सा राजकुमार होना चाहिए, ऐसा-जिसकी परवरिश हम जैसे चाहे कर सकें ।"

"प-प्लीज देव ।" दीपा कराह-सी उठी…"ऐसे सपने मत देखो ।"

"ये मेरे सपने ही नहीं मनसूबे भी हैं, -ऐसे मनसूबे जिन्हें किसी भी हालत में एक दिन मैं पूरे करके रहूंगा ।"

दीपा ने ह्रदय में उठी दर्द की तीक्ष्ण लहर को दबाते हुए कही-"निगेटिव ढंग से सोचने के अपने इस अंदाज में सुधार करो देव---जरा यह भी तो सोचो कि इस दुनिया में तुमसे ज्यादा कमाने वाले कम हैं और कम कमाने वाले ज्यादा-वे भी हंसी-खुशी रहते हैं, जिसे जितना मिलता है वह उसी को खुशी के साथ भोगकर जी रहा है"

" हुं जी रहा है----तुम उसे-जीना कहती हो दीपा, वे जी नहीं रहे, बल्कि रेग रहे हे-हमारी तरह गन्दी नाली में रेंगते कीडे हैं वे…जरा सोचो, जिस मकान में हम रह रहे हैं वह एक दोस्त का है-अपने परिवार सहित कनाडा चला गया है वह, हमें इसका कोई किराया नहीं देना पड़ता, कल अगर वह लोट आया तो हमें मकान खाली करना पडेगा----ऐसा मकान पांच सौ रुपये से कम में नहीं मिलेगा--क्या बाकी सात सौ रुपये महीना में हम 'जी' सकेंगे?"

अवाक रह गयी दीपा!

अपने पति के चेहरे पर उसकी नजरे इस तरह गडी थी, जैसे किसी अजनबी को देख रही हो, बोली----"जब तुम ऐसी बाते करते हो देव तब लगता है कि दो साल से तुम्हें जानने के बावजूद मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानती?"

"क्या मतलब?"

 
"एक तरफ़ आज से ठीक एक साल पहले तुमने मेरे लिए अपने दोलतमन्द पिता से विद्रोह कर दिया इच्छा के विरुद्ध मुझसे शादी की, उनकी दौलत को ठुकराकर मेरे साथ अलग रहने लगे और दूसरी तरफ दौलत के प्रति ऐसी दीवानगी-भरी बाते करते हो, क्या यह विरोधाभास नहीं ?"

"हो सकता है, मगर मैं सिर्फ तुम्हारा दीवाना हुं दीपा--- तुम्हारे लिए, तुम्हारी खुशी के लिये मैं कुछ भी कर सकता हूं --- मेरा बाप फौज में कर्नल क्या है कि वह घर में भी फौज जैसा शासन चाहता था…चाहता था कि घर में भी उसके मुह से निकलने वाला हर लफ्ज 'हुक्म' वन जाए---मैंने सबकुछ सहन किया, किन्तु तुमसे जुदाई नहीं-तुम्हारे लिए मैंने उसके 'हुक्म' और दोलत को ठोकर मार दी…मैंने कोर्ट में तुमसे शादी की, उसने मेरे लिये अपने सरकारी बंगले के दरवाजे बन्द कर दिये और आज भी, मेरा हर मनसूबा, हर ख्वाब सिर्फ तुम्हारे लिये है दीपा, सिर्फ तुम्हारे लिये!"

"और तुम्हारे इन्हीं मनसूबों से मुझे डर लगता है"

"डर केसा?"

"जब अकेली होती हूं तो अजीब-अजीब शंकायें धेर लेती है मुझे-----. सोचकर कांप उठती हूं कि मेरे प्रति तुम्हारे प्यार की यह दीवानगी, मुझे हीरों से जड़ देने की यह ललक कहीं तुम्हें किसी गलत रास्ते पर न ले जाये---कहीं तुम कोई ऐसा काम न कर बैठे---जिससे हमारी _ जिन्दगी तबाह हो जाये!"

"ऐसे ख्याल अपने दिमाग में न लाया करो, मैं ऐसा कुछ नहीं करूंगा ट्रेजरी के इन लुटेरों ने किया है----भले ही आज मैं अपने बाप से अलग रहता हूं-----मगर मुझे उसकी इज्जत और

तुम्हारा ख्याल है, मैं कोई गुण्डा-मवाली नहीं कर्नल का बेटा हूं ।"

शहर से करीब सात किलोमीटर दूर स्थित भगवान औघड़नाथ के मन्विर में सोमवार को इस कदर भीड़ रहती थी कि मेला-सा लग जाता था, परन्तु सप्ताह के वाकी छ: _दिन मन्दिर उतना ही उजाड़ और वीरान पड़ा रहता ।

उस और जाने वाली सडक पर ट्रेफिक सोमवार की अपेक्षा वहुत कम रहता ।

और आज शनिवार था ।

" दीपा और देव मन्दिर सिर्फ इसलिए गए थे, कि उनका "मैरिज डे' आज़ ही था-उस वक्त करीब बारह बजे जव वे मन्दिरं से लोट रहे थे…दूध-सी बेदाग सफेद शर्ट और पतलून पहने देव छ: महीने पहले खरीदे गये अपने 'लम्ब्रेटा स्कूटर' की अगली गद्दी पर सवार था ।

बनारसी साडी में आकाश से उत्तरी अप्सरा-सी लग रही दीपा उसके कन्धें पर हाथ रखे पिछली सीट पर बैठी थी-सुहागिनों के मेकअप में उसका गोल एवं गोरा मुखड़ा ऐसा लग रहा था चन्द्रमा ने मेकअप कर लिया हो!

तेज हवा के कारण उनके कपड़े और बाल फड़फ़ड़ा रहे थे । हालांकि इस स्कूटर से निकलने वाली "फ़ट-फट' की आवाज देव को कतई न सुहाती थी, किन्तु उसी पर सवारी करना उसकी मजबूरी थी ।

जव कोई भारी वाहन 'सांय' से आगे निकल जाता तो उसकी धूल में फंसा देव देर तक कड़वे-कड़वे मुंह बनाता रहता --- सामने से आने वाला वाहन जव वगल से गुजारता-तो हवा के तेज कटाव के कारण स्कूटर झनझना उठता।

ऐसे समय में उसे अपने 'लम्ब्रेटा' पर सवार होने पर खीज होती ।

फिर भी--- कम-से-कम इस वक्त सड़क पर ट्रेफिक कम होने के कारण वह थोडी राहत महसूस कर रहा था-------अभी मन्दिर से चले सुनिल से दो सा तीन मिनट ही गुजर थे कि एक युवक को उसने सामने से आ रहे ट्रक को हाथ देकर रोकने की कोशिश करते देखा!

किन्तु!

ट्रक न रुका!

युवक हताश नजर आया!

एकाएक उसकी दृष्टि देव के लम्बेटा पर पड़ी देव ने दोड़कर उसे सड़क पार करके अपने स्कूटर के सामने पहुंचते देखा-जव वह दौड़ रहा था तब देव ने उसे लंगड़ाते महसूस किया…बड़े ही दयनीय अंदाज में दोनों हाथ उठाकर वह देव को रुकने का इशारा कर रहा था!

जाने क्यों देव को उस पर तरस-सा आया-नजदीक पहुंचकर उसने स्कूटर रोक दिया और स्कूटर के रुकते ही वह बोला-------" भ भाई साहव-म-मेरी मदद कीजिये, प्लीज ।।"

"बात क्या है?" देव ने पूछा!

शक्ल से ही दीनहीन नजर आ रहे युवक ने कहा-----" म - मेरी वाईफ बेहोश हो गयी हे----बड़ी सीरियस हालत है उसकी-प्लीज…मेरी मदद कीजिये वर्ना वह मर जाएगी ।।"

देव और दीपा ने प्रश्नवाचक नजरो से एक-दूसरे की तरफ़ देखा----दीपा के चेहरे पर युवक के लिए सहानुभूति के भाव थे ----भावना को समझकर देव ले पूछरु-"कहाँ है तुम्हारी वाईफ ।"

"व-वहां ! " उसने दायी तरफ़ फैले जंगल की तरफ़ इशारा किया…"जहां बहुत से पेड़ों का झुरमुट नजर आ रहा है-----वह उन्हीं के बीच पडी है---सबकुछ लुट गया भाई साहब…बहुत देर से सड़क पर खड़ा किसी से सहायता मांगने की कोशिश कर रहा हूं मगर कोई रुकता ही नहीं ।"

. "हुआ क्या था?"

"म-मैं इधर से वाईफ़ के साथ साइकिल पर जा रहा था कि चार बदमाशों ने हमें रोक लिया…चाकुओ की नोक पर वे हमें जंगल मे ले गए…वहां उन्होंने मेरी वाईफ के साथ जबरदस्ती की-मैँने विरोध किया तो मारपीट की----मैं बेहोश हो गया-उसके बाद उन्होंने वाईफ के साथ...!"

 


इतना कहकर वह फफक-फपककर रो पड़ा । वहुत कम शब्दों में जो कुछ उसने बताया, उसकी विस्तृत कल्पना करके देव और दीपा कांप उठे-------एक वार पुन: उन्होंने एक-दूसरे की तरफ देखा, जबकि रोता हुआ युवक बता रहा था…"होश में आने पर देखा कि वाइंफ का संधर्ष बेकार गया था-वह बेहोश है…गुण्डे भाग गए हैं--- मैं अपनी वाईफ से वहुत प्यार करता हूं भाई साहब----' अगर उसे कुछ हो गया तो!"

वाक्य अधूरा छोड़कर वह पुनः सिसकने लगा।

"हमसे क्या चाहते हो?"

"आपके पास स्कूटर है---किसी तरह आप उसे शहर के किसी हाँस्पिटल तक पहुंचा दे तो मुझ पर वहुत बड़ा एहसान होगा ।"

"मगर स्कूटर पर चार ।"

"पिछ्ली सीट पर भाभी जी उसे पकडकर बैठ जाएंगी----मैं साइकिल से पीछे-पीछे हॉस्पिटल पहुंच जाऊंगा----अगर आपने मेरी मदद न की तो वह मर जाएगी भाई साहिब---प्लीज !"

देव ने सवालिया नजरों से दीपा की तरफ़ देखा…उलझन के हल्के से भावो के साथ-साथ दीपा के चेहरे पर उसके लिए सहानुभूति थी-उसकी मंशा समझकर देव ने युवक से कहा…"स्टप्नी पर बैठ जाओ?"

शुक्रगुजार होने के सैकड़ों शब्द बोलता हुआ युवक स्कूटर के पीछे लगी स्टप्नी पर बैठ गया और देव ने स्कूटर सडक से कटकर जंगल की तरफ जा रहीं पगडण्डी पर उतार दिया ।

मोटी जड़ वाले ग्यारह विशाल---घने एवं बूढे वृक्ष एक दायरे की शक्ल में खडे थे-----हबा में इन वृक्षो की शाखें आपस में इस कदर उलझी हुई थी कि पत्तों की छत-सी वन गयी थी-इत्तनी धनी कि धूप भी मुश्किल से छनकर दायरे में पड़ रही थी!

स्कूटर झुरमुट के बाहर खड़ा करके युवक के साथ उन्होंने वृक्षो के बीच दायरे में पहला कदम ही रखा था कि वहाँ खड़ी मैटाडोर पर नजर पड़ते ही देव का माथा ठनक गया-दीपा शायद अभी कुछ समझ भी न पाई थी कि देव ने तेजी से पलटकर युवक से कहा---"ये सब क्या हैं?"

"सुबह का अखवार पढ़ना शायद तुम्हारा नियम है?" युवक ने कहा ।

देव उछल पड़ा-"क्या मतलब?"

"वही-जो तुम समझ रहे हो!" युवक' ने कहा--मेरा नाम सुक्खू है और ट्रेजरी लूटने वाले तीन _लुटेरों में से एक हूं । "

देव के रोंगटे खड़े हो गये…अभी वह कुछ बोल भी न पाया था कि सुक्खू ने जेब से रिवाल्वर निकालकर-उस पर तान दिया और रिवॉल्वर को देखते ही जहाँ देव के तिरपन कांप बनाए, वहीं दीपा के हलक से चीख निकल गई---देव से लता के समान चिपट गई वह ।

युवक के बदले हुए रूप को देखकर दोनों एकदम बुरी तरह नजर आने लगे-अव दीपा के स्मरण पटल पर भी ट्रेजरी में पड्री डकैती से सम्बन्धित समाचार का एक-एक शब्द उभर आया ।

" ह हमसे तुम क्या चाहते हो?" देव बड्री मुश्किल से पूछ सका ।

"इस रिवॉल्वर को देखकर डरो नहीं-मैं तुम्हें यहाँ किसी तरह का नुकसान पहुचाने नहीं लाया बल्कि-मुझें मदद की जरूरत है और यदि तुमने मदद की तो मुझसे, फायदा होगा"

."म-मैं समझा नहीं!"

"' मुझे गोली लगी है ।" कहने के साथ ही सुक्खू ने बाई जांघ से कमीज का निचला, सिरा थोड़ा ऊपर सरकाकर अपना जख्म दिखाते हुए कहा-"इसका जहर हर पल मेरे जिस्म में फैलता जा रहा है, अगर शीघ्र ही इसे न निकाला गया तो मैं ।"

सुक्खू ने वाक्य अधूरा छोड़ दिया!

 
दीपा बुरी तरह से डरी हुई थी जबकि अचानक ही इन हालातों में फंस गया देव हक्का-बक्का था---उसने ध्यान से चारों तरफ का निरीक्षण किया-उसके चेहरे पर पीड़ा के चिन्ह थे साफ लग रहा था वह जख्म में उठ रही दर्द की तरंगों को पीने की कोशिश कर रहा है!

आंखों को ज़बरदस्ती खोले हुए है ।

सुखे पत्ते की तरह कांप रहीं दीपा को अपने अंक में समेटे देव ने पूछा-------" हम तुम्हारी क्या मदद कर सकते हैं ?"

'" तुम्हें मेरे जिस्म से गोली निकालनी होगी!"

" म म मैं गोली नहीं निकाल सकता!"

"गोली तुम्हें निकालनी होगी!" सुक्खू ने सख्त स्वर में कहा, किंन्तु देव महसूस कर रहा था कि उसके स्वर की सख्ती बनावटी है--वास्तव में अन्दर से वह बेहद टूटा हुआ है, बोला----"' तुमने मेरा कहना नहीं माना तो मैं तुम दोनों को शूट कर दूंगा ।"

देब और दीपा के देव कूच कर गए ।

"आगे बढ़ो !'_'उसने दांत भीचकर हुक्म दिया…"मैटाडोर की तरफ!"

देव को लगा कि सुक्खू इस वक्त इतना टूट हुआ है कि यदि उन्होंने उसका कहना नहीं माना तो वह सचमुच मार देगा, अत: दीपा को सम्भाले वह मैटाडोर की तरफ बढा।

जमीन पर पड़े सूखे पत्ते चरमराने लगे!

आगे बढते हुए देव की सिर्फ टांगे कांप रही थी, किन्तु दीपा का तो सम्पूर्ण जिस्म ही…देव का दिमाग तेजी से उस मुसीबत से निकलने की कोई तरकीब सोच रहा था, जिसमे वे अचानक ही फंस गए थे…रिवॉल्बर से कवर किए सुक्खू उन्हें मेटाडोर के पिछले दरवाजे के नजदीक ले गया-बोला--" मैटाडोर का दरवाजा खोलो ।"

हालांकि देव समझ नहीं पा रहा था कि सुक्खू क्या चाहता है, किन्तु उसके आदेश का पालन करने के लिए विवश था-मैटाडोर का दरवाजा खोलते ही उनकी नजर सन्दूक पर पडी ।

देव समझ गया कि वह ट्रेजरी से लूटा गया सन्दूक है ।

अभी देव और दीपा के मुंह से एक लफ्ज भी न निकल था कि

"धांय ।"

एक फायर की आवाज से सारा जंगल गूंज उठा ।

देव और दीपा की आत्मा तक दहल उठी ।

चारों तरफ पक्षियों के कलरव का शोर गूंज गया और सुक्खू के रिवॉल्वर से निकली गोली ने सन्दूक पर लटका ताला तोड़ दिया ।

पति-पत्नी पहले से कहीं ज्यादा आतंकित हो उठे ।

"सन्दूक खोलो ।" सुवखू ने संक्षिप्त आदेश जारी किया ।

मजबूर देव के पास उसका' पालन करने के अलावा कोई चारा न था । आगे बढकर उसने मैंटाडोर के फर्श पर रखे सन्दूक के कुन्दे से दूटा हुआ ताला अलग किया और ढक्कन उलटते ही देव का दिल धक्क से रह गया-करेंसी नोटों से लबालब भरे सन्दूक पर उसकी नजरें लपककर रह गयी-दीपा के जिस्म के सभी मसामों ने ढेर सारा पसीना उगल दिया था, जबकि उनके पीछे रिवॉल्वर लिए खड़े सुक्खू ने कहा-तुमने अखवार में पढ़ लिया होगा कि यह पूरा दस लाख रुपया है…इसमे से दो लाख तुम्हारा हो सकता है"

देव का दिल बल्लियों उछलने लगा…वह सुक्खू की तरफ पलटकर बोला…"क्या मतलब?"

 


"मेरे साथ यहां आकर जो गलती तुम कर चुके हो उससे मुक्त होने के अब तुम्हारे पास केवल दो ही रास्ते है…पहला ये कि मदद करने से इंकार कर दो--इस अवस्था में तुम दोनो को यहीं खत्म कर देने के अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं रहेगा-दूसरा ये कि मेरे हुक्म का पालन करो--उस अवस्था में मैं तुम्हें दो लाख रुपये दूगां और किसी को कानोकान खबर न लगेगी कि तुम दो लाख मालिक वन चुके हो!"

देव की आंखे लालच के कारण चमकने लगी थी…उसने अभी तक बूरी तरह भयभीत नजर आ रही दीपा की तरफ़ देखा-बोला------"मुझे गोली निकालनी नहीं आती-ये काम मैंने मैंनें कभी नहीं किया!

" जैसे भी हो-गोली तुम्हें निकालनी होगी!"

देव तुरन्त कोई जवाब न दे सका । गहरी खामोशी छा गई वहां । स्वयं को खड़ा रखने के लिए भी सुक्खू को शायद काफी परिश्रम करना पड़ रहा था…काफी देर की चुपी के वाद उसने कहा'-'"जल्दी फैसला करो-कौंन-सा रास्ता पसन्द है तुम्हें?"

"म-मैं गोली निकालने की कोशिश कर सकता हूं ।"

" गुड ।" कहते हुए सुक्खू ने दुसरा हाथ जेब में डाला-अपने पति की तरफ देख रही दीपा यह समझने का प्रयत्न कर रही थी कि यह वाक्य उसने परिस्थितियों वश बोला है या दो लाख के लालच में…अभी वह कोई फैसला न कर पाई थी कि सु्क्खू ने जेब से चाकू निकालकर खोला-उसे देव की तरफ़ उछालता हुआ बोला----" ये लो गोली निकालने का औजार ।"

देव ने चाकू लपक लिया ।

सुक्खू जहाँ खड़ा था रिवॉल्वर सम्भाले वहीं बैठ गया और उन्हें कवर किए बोला--"हालांकि गोली निकलने के लिए चाकू की नोक गर्म होनी चाहिए, परन्तु यहां वैसा कोई साधन नहीं है, अत: तुम्हें इस ठंडे चाकू से ही गोली निकालनी होगी ।"

"" काफी दर्द होगा…क्या तुम सह सकोगे?"

"मजबूरी है ।" सुक्खू ने कहा----" अपनी वाइंफ को इधर भेजो--हर क्षण यह मेरे निशाने पर होगी जब तुम गोली निकाल रहे होगें…याद रहे----अगर तुमने कोई गडबड की या मुझे नुकसान पहुंचाने की कोई भी कोशिश की तो बदले में तुम्हें अपनी पत्नी की लाश देखनी पडेगी ।"

दीपा के होश फाख्ता ।

देव खामोश रहा ।

उसके आदेशो का पालन करने के अलावा फिलहाल उसके पास कोई चारा न था-देव ने दीपा को उसके नजदीक जाने के लिए कहा-उसकी तरफ़ बढती हुई दीपा की हालत बेरंग थी-जीभ तालू से जा चिपकी,मुंह से एक भी लफ्ज न निक्ला।

कुछ देर बाद ।

" एक हाथ से दीपा के बाल पकडे… दूसर से उसके सिर पर रिवॉ्ल्वर की नोक सटाये सुक्खू सूखे पत्तों भरी जमीन पर लेटा था…बोला-"अपना काम शुरू करों ।"

चाकू सम्भाले देव आगे बढा!

सुक्खू की जांघ के पास घुटनों के बल वेठा-सबसे पहले उसने जख्म के पास से सुक्खू की पैंट फाड़ ली-जख्स के इर्द-गिर्द जमे खून का रंग काला पड़ा था-देव ने जैसे ही चाकू की नोक जख्स पर रखी सुक्खू दर्द की ज्यादती के कारण बिलबिला उठा ।

देव ने दांत भीचकर चाकू गोश्त में पेवस्त किया ।

सुक्खू के मुह से मर्यान्तक चीखें उबल पड़ी-----बूरी तरह तड़पने लगा था वह -अपनी ही पीड़ा से लड़ रहा होने के कारण वह दीपा को कवर किये ना रख सका और उस पल देव के दिमाग मे जाने कैसे बड़ा ही भयंकर विचार उभरा ।

यह कि इस वक्त 'मैं' इस चाकू से सुक्खू की ईहलीला समाप्त कर सकता हुं------" बदले में वह कुछ न कर सकेगा। "

मगर ।

 


इस विचार को कार्यान्वित करने के लिए वह हौंसला न जुटा पाया-एक नजर उसने सुक्खू की पकड़ से पूरी तरह मुक्त दीपा पर डाली… सुक्खू को तड़पता देखकर दीपा मुखड़े पर वेदना के असंख्य चिन्ह थे…बोला---"दीपा इसकी टांग कसकर पकड़ लो ।"

हड़बड़ाई हुई दीपा ने आदेश का पालन किया ।

सब कुछ भुलाकर देव अब सचमुच उसके जख्म से गोली निकालने का प्रयास कर रहा था और उसके इसी प्रयास के परिणाम स्वरूप सुक्खू बुरी तरह मचल रहा था ।

सारा इलाका उसकी चीखों से गूंजने लगा ।

दो मिनट तक यही हालत रही-गर्म रेत पर पड़ी मछली के समान सुक्खू तड़पता, चीखता रहा-दीपा पूरी ताकत से उसकी टांग कब्जाये हुए थी -- दातों पर दांत गडाए देव चाकू से उसका कुरेद रहा था और अभी भी उसे गोली नजर न आई थी सुक्खू के जिस्म ने एक तेज झटका खाया ।

चीखें शांत ।

हर हरकत एकदम रुक गई ।

देव ने एक झटके से चाकू बाहर खींच लिया-पति-पत्नी ने चीखकर एक-दूसरे की तरफ़ देखा…दोनों का रंग उडा हुआ था…सुक्खू की आंखें बन्द हो चुकी धी…चेहरा निस्तेज

देव ने चाकू एक तरफ़ फेंक दिया । .

"स-सुक्खू-सुक्खू!" बौखलाकंर उसने सुक्खू को झंझोड़ा ।

कहीं कोई प्रतिक्रिया नहीं । "

पति-पत्नी के छक्के छूट गए, रोंगटे खडे थे-चेहरे पीले ।

हथेलिया और तलवे तक पसीने से भीग गए, देव ने हड़वड़ाकर नब्ज टटोली ।

गायब ।

हलक से चीख निकल गई…"य -ये तो मर गया है दीपा?"

दीपा के दिलो-दिमाग पर गड़गड़ाकर बिजली गिरी, वह जिस पोज में थी उसी में स्टेचू बनी रह गई ।

अचानक उसे सुक्खू का चेहरा उसे पहले से कई गुना ज्यादा डरावना नजर आने लगा ।।।

हर तरफ़ मोत की खामोशी छा गई । देव और दीपा इस तरह खड़े रहे जैसे लकवा मार गया हो---चेहरे पर खौफ-ही-खौफ -- आंखों में दहशत और दिल है हजार शंकाएं लिए वे सुक्खू की लाश को देखते रहे ।

अचानक ही उसे अपने चारों तरफ खड़े ऊचे-ऊंचे वृक्ष देत्य से महसूस होने लगे-किसी पेड़ की शाख पर बैठे कबूतर के जोडे़ की गुटरगू की आवाज उसे बेहद डरावनी लगी ।

एकाएक हिम्मत करके दीपा ने कहा----देव!"

"द---दीपा" देव के हलक से आवाज निकली तो दीपा उससे लिपट गई, भय की ज्यादती के कारण देव ने उसे कसकर अपनी बांहों में भीच लिया-मारे डर के दीपा तो रोने लगी, कुछ देर तक तो देव ने उसका रोना सहन किया जब सहन न हुआ तो बोला--" चुप करो दीपा---" प्लीज रोना बन्द करो ।"

"य-ये क्या हो गया देव-अव क्या होगा?"

"हम वहुत ज्यादा डर गए हैं, लेकिन अगर ध्यान से सोचा जाए तो इतना डरने की कोई बात नहीं है, किसी को पता नहीं चलेगा कि हम यहाँ आए थे ।"

"क्या मतलब?"

"मैं ताले, सन्दूक फिर खून से रंगे चाकू आदि सब चीजों से अपने निशान मिटा दूगा-उसफे बाद कोई कल्पना भी नहीं कर सकेगा कि ये सब कुछ हमारे सामने हुआ है ।"

"यहां से चलो देव, मुझे बहुत डर लग रहा है ।"

"चलेगे, मगर ।"

"मग'र?”

नोटों… से लबालब भरे सन्दूक पर नज़रे टिकाये देव ने कहा---" यह क्षण हमारे जीवन का सबसे अहम् , नाजुक और हसीन क्षण है-यदि जरा-सी हिम्मत करें, साहस-दूर दुष्टि और सूझबूझ से काम ले तो हम लखपति वन सकते हैं, इस क्षण हमें इतनी जल्दी फैसला नहीं लेना चाहिए?"

"द-देव अपने पति की लालची प्रवृति से पूरी तरह वाकिफ थी…चीख पड़ी ।

देव ने उस चीख को मानो सुना ही नहीं, अपने विचारों मैं गुम वह कहता चला गया-""जो हुआ उससे जाहिर है कि सुक्खू ट्रैजरी के तीन लुटेरों में वह है, दौलत से भरी मैटाडोर साथ कचहरी से भाग निकला था…पुलिस की आंखों में धूल झोकंकर वह किसी तरह यहां पहुच गया, बहुत नहीं निकल सका!"

"म-मगर इन सव बातों को सोचने क्या फायदा ।" दीपा कह उठी…"चलो देव, अगर कोई आ गया तो हम मुसीबत में फंस जाएगे"

"मैटाडोर, सुवखू की लाश और सन्दूक के यहां होने की जानकारी हमारे अलावा किसी को नहीं है--जिस तरह आए हैं उसी तरह अगर दौलत के साथ निकल जाएं तो किसी को क्या पता लगेगा कि यहाँ कौन आया, दौलत कौन ले गया?"

"यह जुर्म होगा देव, गैर-कानूनी हरकत ।।"

 


"नहीं-यह जुर्म नहीं है, कहीं डाका नहीं डाला-किसी की हत्या नहीं की…यह दोलत हमने पाई है, बल्कि अगर यह कहा जाए तो ज्यादा मुनासिब होगा कि भगवान ने ही इस रूप में हमें लखपति बनने का मौका दिया है, ये दस लाख रूपये हमारे हैं-----!"

"न-नहीं!" दीपा हलक फाड़कर चिल्ला उठी-"मैं तुम्हें ऐसा हरगिज नहीं करने दूंगी, यह पागलपन है देव---लालच ने तुम्हें अंधा कर दिया है, मैं कहती हूं चलो यहाँ से !"

"बेवकूफी-भरी बातें तो तुम कर रही हो !" लालच के कारण देव का बुरा हाल था-'"डरो नहीं दीपा, ठण्डे दिमाग से सोचो…ऐसा कहीं कोई सूत्र नहीं है, जिसके जरिए पुलिस हमारे यहाँ होने के बारे में जान सके या हमारे घर तक पहुच सके----फिर क्यों न हम हिम्मत करें, रिस्क ले-बड्री आसानी से हम दस लाख के मालिक वन सकते है!"

"देर-सवेर पुलिस को क्रोइं-न-क्रोई सूराग मिल जाता है देव, कानून के हाथ वहुत लम्बे होते हैं, छोड़ो ये पागलपन, अपनी और मेरी जिन्दगी तबाह मत करो!"

" कुछ तबाह नहीं होगा दीपा --- तुम बेकार डर रही हो--उलटे हमारी जिन्दगी के गुलशन खिलने वाले हैं, बस जरा-सी हिम्मत और जिन्दगी भर ऐश!"

"शायद यही सुक्खू और उसके साथियों ने सोचा था?"

"हम लुटेरे नहीं हैं, रही खून की बात-हमारे यहां आने से अगर कोई निशान वना भी होगा तो 'उसे मैं खत्म कर दूगा ।"

अगर यहाँ से दौलत ले जाते चेक पोस्ट पर पकड़े गये ? "

"इतनी आसानी तो नहीं पकडे जा सकेगे, क्योंकि मैं बेवकूफ नहीं हूं जो विना सोचे-समझे यहां से दौलत लेकर चल दूं…पूऱी योजना के साथ मैं-उसे घर पहुचाऊ'गा ।"

"यह जुर्म नहीं तो क्या होगा?"

"अगर जुर्म है तो जुर्म ही सही!" देव झलाकर चीख पड़ा---मगर कान खोलकर सुन लो दीपा,मैं गोल्डन चांस गंवाने वाला नहीं हू!"

दीपा को यकीन हो गया कि अव प्रार्थना था तर्कों के जरिये देव को उसके निश्चय से डिगाना नामुमकिन है, अत: दुढ़तापूर्वक बोली-"कुछ भी कहो देव, मगर मैं तुम्हे जुर्म की दलदल में नहीं फंसने दूंगी ।"

"क्या करोगी तुम ।"' उसे घूरता हुआ देव गुर्राया ।

"यहां जो कुछ है, तुम्हारे साथ-साथ मैंने भी देखा है, तुम न सही, मगर मैं पुलिस को सारी बाते साफ-साफ बता दूंगी !"

"त---तुम?" देव दातं भीचकर गर्जा----"ऐसी करने वाली तुम कौन होती हो?"

उसकी आंखों में-आंखें डालकर दीपा बोली-"'तुम्हारी पत्नी!"

"हुंह , जो मेरा कहना नहीं मानती-जिसे धेले की अक्ल नहीं, -मेरी पत्नी नहीं होसकती ।"

"द-देव!" कांपते लहजे में चीखने वाली दीपा की आंखे डबडबा गई ।

वह उसी भंवर में फंसा गुर्रा रहा था…"मै तुम्हें किसी को भी हकीकत नहीं बताने दूंगा ।"

"क्या करोगे मेरा?"

"म-मैं तुम्हें जान से मार डालूँगा ।" गुर्राते हुए देव ने झपटकर नजदीक पड़ा रिवॉल्वर उठा लिया और पलटकर खूंखार स्वर में बोला-""गोली मार दूगा तुम्हें ।"

दीपा अवाक् रह गई ।

जहाँ अपने पति के चेहरे को भभकता देखकर उसके रोंगटे खडे़ हो गए, बहीं चेहरे पर वेदना के असीम भाव उभर आए, दिल का दर्द आँसू वनकर आंखों में छलछला उठा और मुह से निकला कांपता स्वर…"म-मुझे-तुम मुझे गोली मार दोगे देव, अपनी पत्नी को?"

तुम जैसी बेवकूफ औरत मेरी पत्नी नहीं तो सकती!"

"अपने-अपको सम्भालो देव, क्या हो गया है तुम्हें-ज़रा सोचो, आज से एक साल पहले मेरे लिए तुमने अपने पिता की सारी दौलत ठुकरा दी थी और आज, ठीक एक साल वाद आज ही के दिन ये तुम क्या कह रहे हो-------ठंडे दिमाग से सोचोगे तो तुम्हें जुरूर इल्म होगा कि दौलत ने तुम्हें किस हद तक ,पागल कर दिया हैं ?"

"मुझे कुछ सोचने की जरूरत नहीं है?"

"क्या करोगे इस दौलत का-जब मैं ही न रहूंगी तो यह किस काम आएगी तुम्हारे?"

"हुंह, उससे बड़ा इस दुनिया में कौन हो सकता है जिसे यही पता न हो-कि किस काम आती है…अरे दौलत आज की दुनिया का भगवान 'नम्बर' एक हे…-ऐसी कोई चीज नहीं जो इसके जरिये हासिल न के जा सके!"

"तो फिर चलाओ गोली ।" दीपा चीख पड़ी-----"खत्म कर दो मुझे, दौलत हासिल करने की हवस तुम्हें यहीं से शुरू करनी होगी----मेरी लाश पर से गुजरे विना तुम इस दौलत को हाथ भी नहीं लगा सकते, देखूं तो सही कि मुझे किस तरह मारते हो तुम--चलाओ गोली ।"

देव गुर्राया ---- " इस भुलावे में न रहना दीपा, अगर तुम अपनी बेवकूफियों से बाज नहीं आई तो मैं सचमुच गोली मार दूंगा"

"जब मेरी लाश यहाँ मिलेगी तब पुलिस को खुद-ब-खुद पता लग जाएगा कि यहां कौन आया था, दौलत कौन ले गया है?" दीपा के इन शब्दों ने देव को बौखला दिया और इस बौखलाहट में वह झपटा, हाथ में दवे रिवॉल्वर की मूठ उसने पूरी ताकत से दीपा ,की कनपटी पर मारी-पूरे जंगल में एक मर्मान्तक चीख _गूज उठी ,दीपा की आंखों के सामने रंग-विरंगे तारे नाच उठे ।

दीपा जमीन पर पड़े घास और पत्तों पर, उसके कदमों में पड़ी थी-देव का दिल 'धाड़-धाड़' करके बज रहा था-रिबॉंल्वर हाथ में लिए कुछ देर तक बेहोश पड़ी दीपा को देखता रहा, वह इस कदर हांफ रहा था जैसे मीलों दौड़ने के वाद अभी-अभी यहाँ पहुचा हो-बाएं हाथ से चेहरे पर उभर आए देर सारे पसीने को पोंछा!

दाएं हाथ में दवे रिवॉल्वर को जेब में ठूंसकर उसने अपने चारों तरफ देखा ।।

कहीं कोई न था ।

 


हवा के कारण फड़फड़ा रहे पत्तों से निकलने वाली रहस्यमय आवाज के अलावा हर तरफ़ दूर-दूर तक खामोशी, सन्नाटा-तेज गति से दोड़ते अपने दिमाग को उसने नियन्त्रित किया------

अब उसे अपनी आगे की कार्यप्रणाली के बारे से ठंडे दिमाग से सोचना था, टांगे जमीन पर लटकाए वह मैटाडोर के फर्श पर बैठ गया । कुछ देर तक सोचता रहा ।

फिर उठा, सबसे पहले सन्दूक बन्द किया…सांकल लगाई और टूटा हुआ ताला उठ़ाकर लटका दिया'-हेडिल पकड़कर उसने सन्दूक अपनी तरफ खींचा और इतनी देर में ही उसे इल्म हो गया कि सन्दूक काफी वजनी है ।

फिर भी सन्दूक को उतारकर उसने जमीन पर रख लिया ।।

खडा किया, दायाँ हाथ हैंडिल में फंसाया और उसका बोझ सम्भाले लड़खड़ात्ता-सा एक तरफ को बढ़ गया ।

सूखे पत्ते कुछ ज्यादा ही जोर-जोर से चीखने-चलाने लगे ।

वृक्षों के दायरे से बाहर निकलने तक देव को रास्ते में तीन जगह सन्दूक को जमीन पर रखकर सुस्ताना पड़ा-जैसे ही सासें थोडा नियंत्रित होती, सन्दूक को उठा वह पुन: आगे बढ़ जाता -और इस तरह, घने जंगल में प्रविष्ट होता हुआ वह मैटाडोर से दो फर्लाग दुर निकल आया…यहां पहुंचकर उसने किसी ऐसे स्थान की तलाश चारों तरफ नजर दोड़ाई, जहाँ सन्दूक को छुपाया जा सके ।

इस प्रयास में उसकी नजर एक लंगूर पर पड्री ।

एक वृक्ष की डाल पर खड़ा लंगूर नजर मिलते ही अपनी लम्बी पूंछ को लहराता हुआ धुड़कने लगा-देव के दिल में अजीब घबराहट पैदा हुइ, मगर शीघ्र ही खुद को नियंत्रित करके उसने अपनी कारगुजारी के इस एकमात्र गवाह पर से नजरें हटा ली ।

उसी पेड़ की जड़ के चारों तरफ जो लम्बी झाडियों की तरफ देखा, सन्दूक छुपाने के लिए उसे यह स्थान उपयुक्त लगा--- सन्दूक को उठाकर झाडियों के नजदीक ले गया, बीच-बीच में से लंगूर को वह बराबर देख रहा था ।

एकाएक उसके दिमाग में विचार उठा कि उसके जाने के बाद कहीं ये लंगूर सन्दूक को खोल न ले और इस विचार ने उसके छक्के छुडा दिये -लंगूर की शेतानियां उसके दिमाग में कौंध गई, लगा कि वह को करेंसी नोटों को फाड़- फूड़कर चारो तरफ बिखेर देगा ।

अब उसने एक खतरनाक दुश्मन की तरह लंगूर की तरफ देखा । नज़रें मिलते ही लंगूर पुन: घुड़कने लगा ।

देव ने जेल से रिवॉल्वर निकलकर-उस पर तान दिया । रिवॉल्वर देखते ही लंगूर पीछे हटा, एक ही जम्प में पीछे वाली डाल पर पहुचा और पहले से ज्यादा उग्र होकर घुड़क्ने लगा-देव ने ऐसा एक्शन किया गोली चलाने वाला हो । बचाव के लिए लंगूर उछलकर तीसरी डाल पर पहुंच गया और अव बाकायदा अपने मुंह से डरावनी आवाजे निकालने लगा ।

यह सोचकर देव कांप उठा कि उसकी आवाजे सुनकर कहीं अन्य लंगूर यहां इकट्ठे न हो जाएं । इस नई मुसीबत ने उसे बौखलाकर रख दिया और परिणाम ये कि घबराकर उसने ट्रैगर दबा दिया । जंगल एक जोरदार धमाके की आवाज से गूंज उठा ।

पशु पक्षियों की चीख…चिल्ताहट से हर तरफ छाई खामोशी भंग होगई ।

एक चीख के साथ लंगूर जमीन पर आ गिरा, थोडी देर तड़पने के बाद वह शान्त पड़ गया-गोली उसके चेहरे पर लगी थी-हाथ में रिवॉल्वर लिए देव, अपने स्थान पर दम साधे खड़ा फायर के परिणामस्वरूप जंगल में छाई चीख-चिल्लाहट के शान्त पड़ने का इन्तजार करता रहा।

इस आशंका से धिरा उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि कहीं कोई अन्य लंगूर यहाँ पहुंचकर इस लंगूर की लाश न देख ले या कहीं कोई ऐसा जंगली जानवर न आ धमके जिसे कावू करना मुश्किल हो जाए ।

मगर उसकी ये सभी शंकाएं निर्मूल साबित हुईं । कुछ ही देर में कलरव वन्द हो गया, हर तरफ फायर से पूर्व की खामोशी छा गई और इसके साथ ही देव ने काफी देर से रूकी हुइ सांस छोड़ी---रिबॉंल्बर वापस जेब में ठूंसा-सन्दूक के साथ लंगूर की लाश भी उसने झाड्रियों में छूपा दी ।

झाडियों के चारों तरफ घूम-घूमकर उसने अच्छी तरह निरीक्षण किया, जब पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि किसी भी तरफ से सन्दूक या लंगूर की लाश नजर नहीं आ रही है तो लम्बे-लम्बे कदमों के साथ तेजी से सूखे पत्तों को रौंदता हुआ वापस दोड़ा ।

मैटाडोर के निकट पहुचा ।

स्थिति पूर्ववत थी ।

 
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