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सूनी आंखो में उदासी complete

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खैर, गुस्से में कह दिया मैंने की राकेश को मार दुंगा..लेकिन ऐसा कर नहीं सका..जानती हो क्यूं??..सिर्फ ये सोचकर की अगर कविता उसे सच में ही पसंद करती है तो चला जाउंगा मैं उन दोनों के बीच से..कविता से राकेश को क्यूं अलग करुं..?? लेकिन उसके बाद पुलिस ने मुझे पकड़ लिया और कविता ने कहा की मैंने राकेश का खून किया ! उस पल मुझे जो तकलीफ हुई वो आजतक दिल में टीस बनकर उठती है ! कविता को तो मैंने जान से ज्यादा चाहा था...मैं तो सोचता था की अगर मैं सच में भी कभी खून कर देता या कुछ गलत कर देता तो कम से कम दुनिया में एक इंसान तो होता मेरे साथ ..मेरी कविता !! ..यही तो मुहब्बत थी मेरे लिये..कि

‘तुम गलत भी हुये तो भी मै तुम्हारा साथ नहीं छोड़ुगी’..मैं तो यही सोचता था..लेकिन मैं गलत था..”

जो गलत है वो गलत ही होता है फिर चाहे वो किसी ने भी किया हो..कविता ने भी सच का साथ दिया..हालात हि कुछ ऐसे थे की मैं ही मुजरिम बन गया ! जो उसकी नज़र में सच था उसका साथ दिया उसने ! मैंने अपना जुर्म कबूल लिया क्युंकी कविता ने कहा था की खून मैंने किया..उसके बाद मुझे किसी की चाहत नही थी और उसकी नफरत के साथ तो मैं जी भी नहीं पाता ! मैं जेल चला गया मुझे 7 साल की सजा हो गयी ! एक दिन जेल में मुझे एक कैदी मिला..वो कोई प्रोफेसनल किलर था..एक दिन उसने बात बात में ही बता दिया की उसने राकेश नाम के एक बंदे का खून किया था और वो खून राकेश के ही भाई ने करवाया था... “ भाई भाई का खून करवा देता है साहब”..वो शराब के नशे में सबकुछ बकता चला गया और मुझे पता चल गया की ये राकेश वही था जिसके खून के इल्जाम में मैं सजा भुगत रहा था....दुसरे दिन मेरी सजा खत्म होने वाली थी..लेकिन इतनो बरसों के अकेलेपन और खालीपन ने मुझमें अजीब सा गुस्सा भर दिया था !

उस की बात सुनकर मेरा दर्द जैसे ताज़ा हो गया..मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी इस सजा का जिम्मेदार यही है...पता नही कहां से मेरे अंदर इतनी हिम्मत आ गयी..पास रखे बड़े से पत्थर को उसके सर पर पटक दिया..मेरा हाथों इस बार सच में खून हो गया था..और मुझे एक बार फिर से 7 साल की सजा मिली...ज़िंदगी के और सात साल उसी काल कोठरी में बिताये मैंने..14 साल बाद जब बाहर निकला तो राकेश के उस भाई को तलाश करने की को कोसिश की..उसको भी जान से मार देना चाहता था मैं..पता नहीं क्यूं ऐसा लगता था मुझे की किसी साजिश में मुझे फंसाया गया है..लेकिन वो मुझे मिला नहीं..फिर अपने घर गया..वहां तुम्हारी मां को ढू*ढ़ने की कोशिस की लेकिन वो भी नहिं मिली..और सच कहूं तो मैं कविता से मिलना नहीं चाहता था,उसे देखना चाहता था बस..!! ..फिर एक दिन एक पुराना दोस्त मिल गया..उसके साथ यहां आ गया..तबसे यहीं हूं..”

गरिमा विरेंदर की सुनायी कहानी सुनाकर चुप हो गयी थी,कविता भी एक दम चुप थी !गरिमा इंत्ज़ार कर रही थी की वो कुछ बोले.लेकिन कविता खामोश रही..

“मॉम??”

“ह्म्म..”

“कुछ बोलिये...आप चाहती थी इस्लिये पापा ने मान लिया की उन्होनें खून किया??”

“विरेंदर ने नहीं माना था की उन्होंने खून किया..मैंने मज्बूर किया था उन्हें ये मानने के लिये..” कविता के आन्खों मे दर्द था और गरिमा की आंखों में अविश्वास..

“क्या कह रही हैं आप ?? पापा ने तो बस ये कहा की......”

“तुम्हारे पापा ने तुम्हें नहीं बताया वो सच..शायद इस डर से की तुम अपनी मां से नफरत ना करने लगो..”उदास कविता बोलती गयी..

“मैंने कहा था विरेंदर अगर तुमने खुद कबूल नहीं किया की तुमने राकेश का खून किया है तो मैं खुद को खत्म कर दुंगी और मेरे पेट में पल रहे तुम्हारे बच्चे को भी..तुम मेरे पेट में थी तब...और अगर वो यहां आये भी थे तो तुम्हारे लिये आये होंगे..अपनी औलाद से मिलने..” कविता कहकर चुप हो गयी !गरिमा जैसे पागल हो गयी..उसकी आंखों में वही पागलपन जो विरेंदर मिलनेकी आंखों में था 21 साल पहले....

“मुझे पहले आपने कभी ये नहीं बताया???क्यूं..??.....आपने बहुत गलत किया..बहुत गलत..आपकी वजह से मेरे पापा 21 साल मुझसे दूर रहे..सिर्फ आपकी वजह से वो 14 साल जेल में रहे..ये कैसी मुहब्बत थी आपकी...” गरिमा गुस्से और बेबसी से रोने लगी !

कविता चुपचाप उसे देखती रही...

“जब मैं पापा की सिस्टर से मिली तब उन्होंने बताया था की पापा ने जेल में भी किसी का खून कर दिया था .लेकिन आपके बारे में कुछ नहीं कहा..क्यूंकी शायद पापा ने उनसे भी आपके बारे में कुछ नहीं बताया था, और मुझे भी नहीं बताया उन्होंने !..वो आपको हर इल्जाम से बचाते रहे...और आपने ?? मम्मी, कमी तो हर इंसान में होती है..पापा ने गल्ती की थी गुनाह नहीं..लेकिन उनके हिस्से में जो सजा आयी वो आपकी दी हुयी है..उनको आपसे मुहब्बत करने की सजा मिली..” गरिमा बोलती जा रही थी ,कविता चुप्चाप सुन रही थी...

और अंत में गरिमा ने कहा..”मॉम..जो हो गया वो वापस सही नही किया जा सकता..मैं आपसे पुछने आई थी की आप पापा से मिलेंगी क्या? लेकिन अब मैं पापा के पास जा रही हूं..अब उनकी सजा खत्म हो जानी चाहिये..अगर पापा और आप दोनो लोग चाहो तो एकदुसरे से मिल लेना..लेकिन कुछ दिन मैं पापा के पास ही रहुंगी...” गरिमा ने कहा !

गरिमा उठकर अंदर चली गई और एक बैग में अपने कपड़े रखने लगी...कविता उठकर पिछे पिछे आ गयी..वो गरिमा को देखती रही..

“मेरे प्यार में कमी नहीं थी,हो सकता है आज मैं तुझे समझा ना सकूं और हो सकता है मैं उस दिन गलत रही हूं लेकिन चाहा मैंने भी सिर्फ उन्हें ही था..हां उनकी मुजरिम हूँ मैं..” कविता उदास थी,हद से ज्यादा उदास !

गरिमा थोड़ी देर बाद बैग़ उठाकर बाहर निकलने लगी.. कविता की ओर देखा और बोली-

“पापा का अधुरा काम पूरा करुंगी मैं...” उसकी आखों में पागलपन और चेहरे पर गुस्सा था !

“ग़रिमा !” कविता ने पुकारा तो गरिमा मुड़्कर उसे देखने लगी,

“उन्हें घर ले आना बेटा ! उनसे कहना -ऑई एम सॉरी !” कविता के उदास होठों से बस यही चंद शब्द निकले थे !उन सूनी आंखो में उदासी थी, दर्द था और इंत्ज़ार था !

The End

 
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