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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

ठीक ही तो कहा था उसकी अंतरात्मा ने। इतने बड़े संसार में वह बिलकुल अकेली थी। निराश्रित-कहीं कोई आश्रय नहीं। ऐसे में क्या कर सकेगी वह जय के लिए?

सोचते-सोचते एकाएक उसकी नजर अखबार पर पड़ी। एक पृष्ठ पर वैवाहिक विज्ञापन छपा था। लिखा था-चालीस वर्षीय विकलांग युवक, अपना मकान, अपना व्यवसाय को आवश्यकता है जीवन संगिनी की। परित्यकता एवं विधवा भी स्वीकार्य, पूर्ण विवरण के साथ लिखें। नीचे युवक का पता था। डॉली ने यह विज्ञापन पढ़ा और पढ़ते ही उसके मस्तिष्क में एक विचार कौंध गया- 'यदि वह उस युवक से विवाह कर ले तो? इस प्रकार स्वयं का-उसका जीवन भी संवर जाएगा और वह जय का मुकदमा भी लड़ सकेगी। युवक व्यवसायी है और अपना मकान भी है। कमी है तो केवल यह कि युवक विकलांग है, किन्तु इसमें उस बेचारे का क्या । दोष? घटी होगी जीवन में कोई घटना और ऐसी घटना तो किसी के साथ भी घट सकती है।' 'लेकिन।' हृदय ने कहा- 'जय को जब तेरे विवाह का पता चलेगा तो क्या वह इसे सहन कर पाएगा? तू जानती है-वह तुझे कितना चाहता है। कितना प्यार करता है वह तुझे।'

'हां-दु:ख तो होगा। पीड़ा तो होगी उसे, किन्तु । ऐसा करने से उसका जीवन तो बच जाएगा। वह सुंदर है-पढ़ा-लिखा है। अपने पिता की लाखों की संपत्ति का उत्तराधिकारी है-ऐसे में कोई भी लड़की उसे अपना जीवनसाथी बना सकती है।'

'तुझे भूल जाएगा वह?'

'भूलना कठिन तो होगा, किन्तु समय का मरहम बड़े-बड़े घावों को भर देता है। जीवन में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं कि इंसान को न चाहते हुए भी सब कुछ भूलना पड़ता है।'

तभी डॉली के विचारों का दर्पण गिरा और टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया। बाहर किसी गाड़ी का हॉर्न सुनाई दे रहा था। शायद पुलिस की गाड़ी होगी यह सोचकर डॉली उठी और उसने द्वार खोल दिया। वास्तव में पुलिस की गाड़ी थी।

द्वार खुलते ही जीप में बैठा पुलिस इंस्पेक्टर बाहर आया और डॉली के समीप आकर अत्यंत शिष्टता से बोला- 'क्षमा करें डॉली जी! आपसे दो-चार प्रश्न और पूछने थे इसलिए आना पड़ा।'

'आइए।' डॉली ने कहा और बरामदे में आ गई।

'पूछिए।'

'आप वास्तव में रामगढ़ की रहने वाली हैं?'

'नहीं इंस्पेक्टर साहब!' डॉली ने उत्तर दिया- 'मेरा जन्म तो इसी शहर में हुआ था। यहीं मैंने बचपन के दिन देखे और यहीं शिक्षा प्राप्त की किन्तु एकाएक माता-पिता का देहांत हो गया और मुझे अपना शहर छोड़कर रामगढ़ जाना पड़ा।'

'रामगढ़ में?'

'पापा के दूर के रिश्ते के भाई रहते थे-दीनानाथ। मैं बेसहारा हो गई तो वे मुझे अपने साथ रामगढ़ ले गए।'

'फिर आपने रामगढ़ क्यों छोड़ दिया?'

'चाचा मुझे बेचना चाहते थे। उन्होंने किसी के हाथों मेरा सौदा कर दिया था। मुझे यह पता चला तो मैंने उसी रात रामगढ़ छोड़ दिया। सोनपुर में एक रिश्तेदार रहते हैं। सोचा था-वहीं चली जाऊंगी किन्तु एकाएक जय साहब से मुलाकात हुई और वे मुझे यहां ले आए।'

'जय का आपको यहां लाने के पीछे क्या उद्देश्य था?'

'वो मेरे भविष्य की ओर से चिंतित थे। उन्हें यह भी भय था कि कहीं मैं इन दुखों से घबराकर आत्महत्या न कर बैठू। अत: वो । चाहते थे कि मैं अपने पैरों पर खड़ी होकर अपने ढंग से जीने की कोशिश करूं। इसके लिए वह मुझे हर प्रकार का सहयोग देने को तैयार थे।'
 
कुछ सोचकर इंस्पेक्टर बोला- 'आपने अपने बयान में बताया कि जिस समय जमींदार साहब का खून हुआ–आप बरामदे में थीं।'

'जी।'

'फिर आप विश्वासपूर्वक कैसे कह सकती हैं कि गोलियां खिड़की की ओर से चली थीं।'

'क्योंकि उस समय जय मेरे सामने थे और उनके हाथ में रिवाल्वर भी न थी।'

'क्या आपको पूरा विश्वास है कि गोलियां खिड़की की दिशा से ही चली थीं?'

'जी।'

'फिर तो आपने हत्यारे को अवश्य देखा होगा?'

'नहीं-मैं उसकी सूरत नहीं देख सकी।'

'खैर।' इंस्पेक्टर बोला- 'अब अंतिम प्रश्न। आप बता सकती हैं-जय एवं जमींदार के बीच झगड़ा किस बात पर हुआ था?'

'मेरा ख्याल है-संपत्ति से संबंधित कोई विवाद था।'

'किंतु हरिया ने तो...।'

डॉली ने साहस एवं दृढ़ता से उत्तर दिया 'इंस्पेक्टर साहब! हरिया ने आपसे क्या कहा है-यह मैं नहीं जानती। मैंने सिर्फ वह कहा जो मैं जानती हूं।'

'क्या आप सरकारी गवाह बनना पसंद करेंगी?'

'नहीं इंस्पेक्टर साहब! मैं किसी उलझन में फंसना नहीं चाहती। वैसे भी इस हत्याकांड से मेरा कोई संबंध नहीं है। न तो मैंने कुछ देखा है और न ही कुछ सुना है। मेरा अपराध केवल यह है कि मैं उस वक्त एक मेहमान के रूप में यहां उपस्थित थी।'

'खैर, अब आप यहीं रहेंगी अथवा अपने किसी रिश्तेदार के पास जाएंगी?'

'इंस्पेक्टर साहब! आपके इस प्रश्न का संबंध मेरे व्यक्तिगत जीवन से है। मैं इस शहर में भी रह सकती हूं और अपने किसी रिश्तेदार के पास भी जा सकती हूं किन्तु विश्वास कीजिए-मैं इस मकान में नहीं रहूंगी।'

'थॅंक डॉली जी!' इंस्पेक्टर उठ गया और बोला 'मुझे आपसे और कुछ नहीं पूछना है। वैसे मैं चाहूंगा कि आप यहीं रहें और इस मुकदमे में अपनी गवाही दें।'

डॉली ने कुछ न कहा।

इंस्पेक्टर ने उससे और कोई प्रश्न न किया और चला गया। डॉली उसके जाते ही फिर उसी विज्ञापन को पढ़ने लगी।

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रात्रि के आठ बजे थे। हरिया अभी न लौटा था। डॉली बिलकुल अकेली थी और इतने बड़े मकान में उसे यों लग रहा था मानो वह किसी भूत बंगले में आ फंसी हो। पिछले एक घंटे से आंगन में खड़ी वह यही सोच रही थी कि उसे कहां जाना चाहिए। सोचते-सोचते उसे अपनी दो-तीन सहेलियों का ध्यान आया जो किसी समय उसके साथ पढ़ती थीं। ऐसे समय में उनसे सहायता मांगने में कोई बुराई भी न थी। यह सोचकर डॉली ने स्टूल पर रखा अखबार उठाया और आगे बढ़कर द्वार का बोल्ट गिरा दिया।

तभी वह चौंकी। दरवाजे के सामने कई व्यक्तियों की मिली-जुली आवाजें सुनाई पड़ीं। उनमें एक आवाज हरिया की भी थी। वह किसी से कह रहा था- 'बहुत तेज लड़की है चौधरी साहब।'

'अरे तेज न होती तो क्या एक साथ दो-दो खून करा देती? रामगढ़ में दीना को मरवाया और यहां आकर जमींदार साहब को खत्म करा दिया।'

'न जाने अब किसका नंबर है।'

'किसी का भी नहीं।' किसी ने भारी आवाज में कहा- 'वह हरामजादी एक बार मेरे हाथों में आ जाए फिर देखना। ऐसी नकेल डालूंगा कि रामगढ़ से जिंदगी भर बाहर न जाएगी।'

'लेकिन मेरा इनाम?'

'मिलेगा हरिया! तू दरवाजा तो खोल।'

डॉली ने यह सब सुना तो पत्ते की भांति कांप गई। उसे समझते देर न लगी कि गांव के लोग उसे लेने आए थे। चौधरी को वह जानती थी, दीना के पड़ोस में ही रहता था। वह यह भी जान गई थी कि हरिया उन्हें इनाम के लालच में लेकर आया था।

तभी भड़ाक से द्वार खुला और डॉली फुर्ती से एक ओर हटकर पौधों के पीछे छुप गई। इस ओर अंधकार भी था। उसी समय हरिया के साथ तीन व्यक्तियों ने अंदर प्रवेश किया और वे सब बरामदे की ओर बढ़ गए। यह देखकर डॉली ने संतोष की सांस ली। फिर जब वे लोग सामने वाले कमरे में चले गए तो वह पौधों के पीछे से निकली और शीघ्रता से बाहर आ गई। उसे विश्वास था कि वे लोग जब तक उसे पूरे । मकान में न खोज लेंगे-बाहर न आएंगे। वह उससे पहले ही मुख्य सड़क तक पहुंच जाना चाहती थी। सड़क तक पहुंचने में अधिक समय न लगा। वह चलती रही और अंततः एक घंटे बाद अपनी एक अंतरंग सहेली शिवानी के मकान के सामने पहुंच गई। कोठीनुमा मकान था और संयोगवश मुख्य द्वार भी खुला था। डॉली ने अंदर पहुंचकर घंटी का बटन दबाया। कुछ क्षणोंपरांत द्वार खुला। छरहरे जिस्म की एक लड़की सामने आई। यह शिवानी थी।

शिवानी ने उसे देखते ही पहचान लिया और उल्लास से बोली- 'डॉली तू!'

'हा-मैं ही हूं शिवानी!'

'तो अंदर आ न-बाहर क्यों खड़ी है?' इतना कहकर शिवानी ने डॉली का हाथ पकड़ा और उसे कमरे में ले आई।

डॉली उदास थी-आंखों में आंसुओं की बूंदें झिलमिला रही थीं। शिवानी से उसके मन की पीड़ा छुपी न रही। वह बोली- 'डॉली, तेरी पीड़ा तो मैं समझती हूं। अंकल-आंटी चले गए-तू बेसहारा हो गई। शहर भी छूट गया और तू रामगढ़ चली गई, किन्तु यह तो बता कि इन दो वर्षों में तू एक बार भी आई क्यों नहीं? क्या तुझे कभी मेरी याद नहीं आई?'

'याद तो आती थी शिवानी! बहुत आती थी। कभी एकांत में क्षण मिलते तो घंटों रोती। बहुत याद आती थी तेरी, अपनी सभी सहेलियों की।'
 
'फिर आई क्यों नहीं?'

'आती कैसे?'

'क्यों?'

'पिंजरे में जो पड़ी थी। चाचा ने कभी एक दिन के लिए भी गांव से बाहर न जाने दिया। शायद उन्हें भय था कि कहीं मैं हमेशा के लिए रामगढ़ न छोड़ दूं।'

'चल खैर! देर से आई किन्तु आई तो सही!

लेकिन।' डॉली के मैले वस्त्रों एवं बिखरे बालों को देखकर शिवानी ने कहा- 'यह क्या हालत बना रखी है तूने? गांव की लडकियां क्या इसी ढंग से रहती हैं?'

'गांव और शहर के रहन-सहन में अंतर होता है।' डॉली ने कहा। ठीक उसी समय बाहर से किसी की आवाज सुनाई पड़ी– 'कौन है शिवा?'

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'भैया!' शिवानी ने उत्तर दिया- 'मेरी सहेली है डॉली। पहले यहीं रहती थी-आजकल रामगढ़ गांव में रहती है लेकिन आप बाहर क्यों आ गए? आपको तो ज्वर है।'

'थोड़ा घूमने को मन कर रहा था। कितना अच्छा मौसम है।' शिवानी ने फिर कुछ न कहा।

डॉली ने उससे पूछा- 'ये...?' 'बड़े भैया हैं-राज भाई साहब।'

"अच्छा! राज भाई साहब।'

'तूने तो देखे न होंगे। विवाह के पश्चात तुरंत चंडीगढ़ चले गए थे। न जाने किस बात पर पापा से विवाद हो गया था।'

'भाभी?'

'साथ ही ले गए थे लेकिन...।'

'लेकिन क्या?'

'एक दिन भाभी ने भी साथ छोड़ दिया। तलाक लेकर दूसरा विवाह कर लिया। राजू को भी साथ ले गईं।'

'राजू कौन?'

'भाई साहब का बेटा।'

'ओह!'

'भैया को इस घटना से ऐसा आघात लगा कि चंडीगढ़ छोड़कर यहां आ गए। तभी पापा का देहांत हो गया और फिर एक दिन भैया भी एक दुर्घटना के शिकार हो गए। उस दुर्घटना में भैया की दोनों टांगें चली गईं।'

'तो क्या?'

'अपंग हैं बेचारे।' शिवानी ने कहा। तभी एकाएक उसे कुछ ध्यान आया और वह उठकर बोली 'मैं भी कितनी अजीब हूं। न जाने कहां-कहां की बातें ले बैठी और तेरे लिए जलपान भी न लाई।' इतना कहकर शिवानी बाहर चली गई।

उसके जाते ही डॉली ने फिर मेज पर रखा वही अखबार उठाया और वही विज्ञापन पढ़ने लगी।

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एकाएक अपने कपोल पर किसी के गर्म होंठों का स्पर्श पाकर डॉली की नींद टूट गई। आंखें खोलकर देखा शिवानी बिस्तर पर झुकी उसके कपोल को चूम रही थी। डॉली ने उसे शरारत से अपने ऊपर खींच लिया और बोली- 'क्या कर रही थी?'

'प्यार कर रही थी तुझे।'

'प्यार करने के लिए कोई और नहीं मिला क्या?'

'मिले तो बहुत।'

'फिर?'

'किसी पर दिल न आया।'

'और मुझ पर आ गया?'

'सच कहूं?'

'तू बहुत सुंदर है।'

'अच्छा ।'

'सच कहती हूं। तू लड़का होती तो मैं तुझसे शादी कर लेती।' शिवानी ने कहा और दूसरे ही क्षण वह अपनी कही हुई बात पर स्वयं ही खिलखिलाकर हंस पड़ी। उसी समय बाहर से राज की आवाज सुनाई पड़ी- 'शिवा! भई हमारी चाय कहां है?'

"अभी लाती हूं भैया!' शिवानी ने कहा। फिर डॉली से अलग होकर वह उससे बोली- ‘भैया को चाय दे आऊं।' कहकर वह चली गई।

उसके जाने के पश्चात डॉली उठी और दर्पण के सामने आकर अपने बाल संवारने लगी। कल तो जय के चले जाने के पश्चात उसे अपना होश ही न रहा था। न कुछ खाया और न ही दर्पण में अपना मुख देखा। दो दिन पहले पहने हुए कपड़े भी कितने गंदे हो गए थे।

सहसा वह चौंक गई।

दर्पण में उसने देखा। कोई व्हील चेयर पर बैठा उसी की ओर देख रहा था। डॉली ने शीघ्रता से ब्रुश रख दिया और मुड़कर बोली- 'ओह, आप!'

'राज-राज वर्मा।'

डॉली ने हाथ जोड़ दिए।

राज उसके अभिवादन का उत्तर देकर बोला 'और आप-आप डॉली जी हैं।'

'जी।'

'खड़ी क्यों हैं-बैठिए।'

डॉली बैठ गई। राज अपनी चेयर को मेज के पास ले गया। उसी समय शिवानी चाय ले आई। चाय के प्याले मेज पर रखकर वह राज से बोली- 'भैया! यह ही है मेरी सहेली।'

'परिचय हो चुका।'

'फिर तो बहुत तेज निकले आप। मुझसे पूछे बगैर ही परिचय कर लिया। खैर चाय लीजिए।'

'सॉरी बाबा!' राज ने एक बार डॉली की ओर देखा फिर प्याला उठाकर वह शिवानी से बोला 'आगे से ऐसी भूल न होगी। वैसे-तुम्हारी यह सहेली करती क्या हैं?'

'शैतानी।' शिवानी को मजाक सूझ गई, बोली 'जानते हैं एक बार इसने क्या किया?'

'कहीं से एक बिल्ली पकड़ी और उसके गले में घंटी बांध दी। अब बेचारी बिल्ली परेशान। कहीं भी चूहों की तलाश में निकले तो घंटी पहले बजे। परिणाम यह हुआ कि बेचारी भूखों मर गई।'

'झूठी कहीं की।' डॉली बोली- 'मैंने ऐसा कब किया?'

'हम भी यही सोच रहे थे।' राज बोला- 'बात यह है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधना कोई आसान काम नहीं होता।'

डॉली ने इस पर कुछ न कहा।

फिर तीनों ही मौन चाय की चुस्कियां लेते रहे।

एकाएक शिवानी ने मौन को तोड़ा। राज से वह बोली- 'भैया! आज तो आप अखबार के दफ्तर भी जाएंगे न?'

'क्यों?'

'आपने विवाह का जो विज्ञापन दिया है-उसका परिणाम देखने के लिए।'

'उस विज्ञापन में तो सक्सेना का पता लिखा है। डाक उसी के पते पर आएगी।'

डॉली यह सुनकर चौंक गई। अखबार में जो विज्ञापन उसने पढ़ा था-उसमें 'संपर्क करें' के पश्चात विनोद सक्सेना का नाम लिखा था।
 
सोचते हुए डॉली ने अपने-आपसे प्रश्न किया 'तो क्या वह विज्ञापन राज ने ही छपवाया था? राज भी तो विकलांग है और आयु भी चालीस वर्ष से अधिक नहीं। वैसे शारीरिक गठन के । हिसाब से राज पैंतीस से अधिक न लगता था। तभी विचार श्रृंखला टूट गई। चाय की लंबी चुस्की लेकर राज ने शिवानी से कहा- 'वैसे तो शिवा! मेरे विचार से यह ठीक नहीं हुआ। इस आयु में विवाह। लोग क्या कहेंगे? और वैसे भी भाग्य में यदि पत्नी का सुख होता तो ज्योति का ही साथ क्यों छूटता?' राज के इन शब्दों में पीड़ा थी।

शिवानी बोली- 'भैया! आपने तो अपने जीवन में बहुत कुछ देखा है और बहुत कुछ पढ़ा भी है। इतना तो आप भी जानते होंगे कि जीवन का सफर अकेले कभी नहीं कटता। इस सफर के लिए किसी-न-किसी साथी की जरूरत हर किसी को महसूस होती है। इसके अतिरिक्त भैया! अतीत के दर्द को दबाने के लिए किसी-न-किसी खुशी का होना भी आवश्यक होता है। इंसान को एकाएक कोई खुशी मिले तो वह अतीत की पीड़ाओं को भूल जाता है।'

'पीड़ाओं को भूलना तो असंभव ही होता है शिवा! वैसे सच्चाई यह है कि यह विज्ञापन मैंने तेरी वजह से दिया है।'

'मेरी वजह से?'

'हां।' राज ने खाली प्याली रख दी और बोला- 'तेरी वजह से। बात यह है कि अब तू बड़ी हो गई है और तुझे अपनी ससुराल भी जाना है। तेरे जाते ही जो अकेलापन मुझे डसेगा-वह मुझसे सहन न हो पाएगा।' इतना कहकर राज ने अपनी व्हील चेयर घुराई और उसके पहिए घुमाते हुए वह बाहर चला गया।

शिवानी उसे जाता देखती रही। भाई की पीड़ा उससे छुपी न थी।

तभी डॉली उससे बोली- तुझे राज भैया से यह सब नहीं कहना चाहिए था।'

'मैंने क्या कहा?'

'कहा तो कुछ विशेष नहीं, किन्तु विवाह की बातों से उन्हें यों लगा-जैसे उनके घावों को कुरेदा गया हो।'

'भैया वास्तव में शादी के पक्ष में नहीं। यदि मैं जीवन-भर इसी घर में रहती तो वो निश्चय ही शेष जीवन यूं ही गुजार देते, लेकिन तू तो जानती है कि कोई भी लड़की अपने बाबुल के घर जीवन भर नहीं रह सकती। भैया केवल इसी बात से दुखी हैं और इस दु:ख को कम करने के लिए ही दूसरा विवाह कर रहे हैं।'

'कैसी लड़की चाहिए उन्हें?' डॉली ने पूछा।

शिवानी बोली- 'बस सुंदर, पढ़ी-लिखी और ऐसी जो उनका सहारा बन सके। खैर छोड़, अब तू स्नान कर ले। कपड़े मेरे पहन लेना और हां, आज तो रहेगी न?'

डॉली ने इस प्रश्न पर चेहरा झुका लिया। उसने तो अभी तक शिवानी से अपने दुखों की चर्चा भी न की थी। यह भी न बताया था कि वह यहां किस उद्देश्य से आई थी।

शिवानी ने उसे यों विचारमग्न देखा तो आत्मीयता से बोली- 'डॉली! तूने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। मेरा यह पूछना तुझे बुरा लगा?'

'नहीं, ऐसी बात नहीं शिवा!'

'फिर क्या बात है?'

"शिवा!' डॉली को कहना पड़ा- 'मैंने रामगढ़ छोड़ दिया है।'

'क्या मतलब?'

'चाचा मुझे बेचना चाहते थे। उन्होंने मेरा सौदा कर दिया था। गांव का सत्तर वर्षीय जमींदार मुझे खरीद रहा था और कल यह सब होना था, किन्तु एकाएक मुझे अवसर मिला और मैं रात के अंधेरे में रामगढ़ से चली आई। यहां आने पर पता चला कि चाचा भी न रहे।'

'ओह!'

'सोचा था-कहीं दूर चली जाऊंगी किन्तु फिर यह न समझ सकी कि इतनी बड़ी दुनिया में जाऊं तो कहां जाऊं। कोई अपना नहीं-कोई ऐसा नहीं जो मुझे आश्रय दे सके। आज कहीं बैठी यही सब सोच रही थी कि एकाएक तेरा ध्यान आया। सोचा-शिवा मेरे लिए कुछ और न भी करेगी तो सलाह तो अवश्य देगी।' यह सब कहते-कहते डॉली की आंखें भर आईं और आवाज रुंध गई।
 
शिवानी ने उसे अपनी ओर खींच लिया। स्नेह से बोली- 'पगली! तूने यह कैसे सोच लिया कि मैं तेरे लिए कुछ न करूंगी? और फिर अपना तो वही होता है न-जो विपत्ति में काम आता है।'

'शिवा!'

'चिंता मत कर। मत सोच कि संसार में तेरा कोई अपना नहीं-तेरा कोई घर नहीं। यह घर तेरा है-इसे अपना समझ और यहीं रह।'

'शिवा-मेरी सखी!'

'न-न-रोते नहीं। रोने से दु:ख अवश्य हल्का होता है किन्तु दुर्भाग्य को हंसने का अवसर मिलता है।' इतना कहकर शिवानी ने उसके आंसू पोंछ दिए और बोली- 'चल, अब स्नान कर ले। लेकिन देख तुझे मेरी सौगंध जो कुछ बीत चुका है उसे बिलकुल भूल जाना और इस घर को पराया मत समझना। तू यहीं रहेगी तो मुझे बहुत खुशी होगी।'

डॉली ने फिर कुछ न कहा और उठ गई।

पीड़ाएं सहने के लिए होती हैं-सही जाती हैं। डॉली ने भी अपनी पीड़ाओं को सहा और अपने अतीत को भी भुला दिया। दो दिन बीतते-बीतते वह शिवानी एवं राज से इस प्रकार घुल-मिल गई मानो वह बचपन से ही उन लोगों के साथ रह रही हो।

डॉली ने शिवानी से जय के विषय में कुछ न बताया था। यह भी न कहा था कि वह जय को बचाने के लिए एक विकलांग व्यक्ति से विवाह करना चाहती थी। सच तो यह था कि डॉली ने अब विवाह का विचार ही मस्तिष्क से निकाल दिया था। उसने सोचा था वह अपने लिए कोई छोटी-मोटी नौकरी खोज लेगी। इससे दो लाभ होंगे। एक तो यह कि वह शिवानी एवं राज पर बोझ न बनेगी और दूसरा यह कि वह जय के पक्ष में मुकदमा भी लड़ सकेगी।

संध्या के समय राज जब बाहर से लौटा तो डॉली ने उसके एवं शिवानी के सामने अपने मन की बात रख दी।

राज बोला- 'डॉलीजी! क्या इसका अर्थ यह नहीं कि आप अभी तक भी इस घर को अपना नहीं समझ सकी हैं।'

'यह किसने कहा आपसे?'

'आपकी इस बात ने कि आप नौकरी करना चाहती हैं। मेरा ख्याल है-आप नौकरी इसलिए करना चाहती हैं क्योंकि आप हम लोगों पर बोझ बनना नहीं चाहतीं।'

'नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है।'

'तो फिर क्या बात है?' शिवानी ने पूछा।

'बात केवल यह है कि मैं अपने अतीत से दूर जाना चाहती हूं। मैं चाहती हूं कि बीता हुआ कल मुझे एक पल के लिए भी झिंझोड़ने का प्रयास न करे और यह तभी होगा जब मैं कुछ समय के लिए घर से बाहर रहूंगी। प्रत्येक समय यहां रही तो अतीत रह-रहकर चोट करेगा। पुरानी यादें दु:ख देंगी ओर वो दु:ख ऐसा होगा जो मुझे चैन से न जीने देगा। बस इसलिए मैं नौकरी करना चाहती हूं।'

शिवानी बोली- 'फिर तो कोई बुराई भी नहीं। क्यों भैया?'

'हां।' राज को भी कहना पड़ा 'बुराई तो कुछ नहीं किन्तु एक शर्त है।'

'वह क्या?' डॉली ने पूछा।

'वो यह कि आप अपने वेतन का पैसा इस घर के लिए खर्च न करेंगी।'

'शर्त तो विचित्र-सी है आपकी किन्तु जब आप कह रहे हैं तो मान लेती हूं।'

'गुड! अब यह बताइए-नौकरी कहां करेंगी?'

'इसी शहर में।'

'अरे बाबा! मैं पूछ रहा था कि कौन-सी कंपनी में?'

'यह तो खोजने से ही पता चलेगा।'

'चलिए-यह जिम्मेदारी हम पर रही।'

'भैया!' शिवानी बोली- 'क्या आपके ऑफिस में कोई जगह नहीं?'

'अरे भई! अपना ऑफिस है ही क्या? दो मेजें और दो कुर्सियां। चार्टेड । एकाउंटेंट के पास और क्या होता है लेकिन मेरी इतनी जान-पहचान है कि काम हो जाएगा।'

डॉली ने फिर कुछ न कहा और उठ गई।

शिवानी ने पूछा- 'तू कहां चली?'

खाने की तैयारी करूंगी।'

'फिर तो मैं गई काम से।'

'क्यों?'

'क्योंकि बच्ची! जब दिन भर का खाना, नाश्ता तू बनाएगी तो मैं क्या करूंगी?'

'इसमें बुराई क्या है?' डॉली ने पूछा।

शिवानी ने राज से कहा- 'भैया! अब आप ही बताइए न कि इसमें क्या बुराई है?'

राज ने डॉली को कनखियों से देखा और बोला- 'देखो भई! बुराई तो मैं नहीं बता सकता। हां, फैसला जरूर कर सकता हूं।'

'ठीक है कीजिए फैसला।'

'तो हमारा फैसला यह है कि सुबह का खाना और नाश्ता तो डॉलीजी बनाएंगी।'

'और शाम का खाना?'

'यह तुम बनाओगी और हां, यह फैसला इसी समय से लागू होगा!'

'जज साहब का फैसला सर-आंखों पर। अब मैं चली खाना बनाने।' । शिवानी ने धीरे से हंसकर कहा और उठ गई।

एकाएक राज को कुछ याद आया और वह अपनी जेब से एक लिफाफा निकालकर शिवानी से बोला- 'एक मिनट शिवा! तेरे विज्ञापन का उत्तर आ गया है।'
 
एकाएक राज को कुछ याद आया और वह अपनी जेब से एक लिफाफा निकालकर शिवानी से बोला- 'एक मिनट शिवा! तेरे विज्ञापन का उत्तर आ गया है।'

'अच्छा !'

'इस लिफाफे में चार लड़कियों के बायोडाटा और फोटोग्राफ हैं। मुझे तो एक भी पसंद नहीं।'

शिवानी ने लिफाफा खोलकर बायोडाटा निकाले और तस्वीरें देखने लगी। डॉली निकट ही खड़ी थी। उसने न तो बायोडाटा देखा और न ही किसी फोटोग्राफ की ओर ध्यान दिया।

तभी शिवानी बोली- 'लड़कियां तो चारों सुंदर हैं भैया। आयु भी अधिक नहीं पच्चीस-तीस, अट्ठाइस और बत्तीस।'

'नहीं शिवा! मुझे तो एक भी पसंद नहीं।'

'कोई बात नहीं अभी तो कल भी डाक आएगी।' इतना कहकर शिवानी ने लिफाफा मेज पर रखा और बाहर चली गई।

डॉली अपनी ही किन्हीं सोचों में गुम चेहरा झुकाए खड़ी रही। एकाएक राज ने उससे पूछा- 'आप क्या सोचने लगीं?'

'क-कुछ भी तो नहीं।' डॉली चौंककर बोली।

'ये तस्वीर नहीं देखीं आपने?'

'अच्छी तो हैं।'

'सिर्फ अच्छी?'

'तस्वीरें अच्छी हैं तो लड़कियां भी सुंदर होंगी।'

'तस्वीरें तो झूठ भी बोलती हैं।'

'तो स्वयं मिल लीजिए।'

'मिलकर कोई लाभ न होगा।'

'क्यों?'

'मैंने इरादा बदल दिया है।'

'अर्थात् विवाह न करेंगे।'

'विवाह तो करूंगा।' डॉली को ध्यान से देखते हुए राज बोला- 'किन्तु विज्ञापन के माध्यम से नहीं।'

'और?' डॉली पूछ बैठी।

'अपनी आंखों के माध्यम से।'

'तो-यूं कहिए न कि आपने पहले ही कोई लड़की पसंद कर ली है।'

'हां, पसंद तो है।'

'फिर?'

'अभी उसका हृदय नहीं टटोला है।'

'इसमें मुश्किल क्या है? आप उससे अपने मन की बात कहिए। क्या पता वह आपका प्रस्ताव मान ही ले।'

'हां, सोचा तो यही है।' राज ने कहा।

तभी बाहर से शिवानी ने डॉली को पुकारा और वह बाहर चली गई। राज निःश्वास लेकर रह गया।

डॉली रात भर न सोई थी। पूरी रात उसने जय के विषय में सोचा था। सुबह होने पर उसने जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार किया और जब राज चला गया तो वह स्वयं भी तैयार होने लगी। उसे जय से मिलने के लिए सैंट्रल जेल जाना था।
 
एकाएक राज को कुछ याद आया और वह अपनी जेब से एक लिफाफा निकालकर शिवानी से बोला- 'एक मिनट शिवा! तेरे विज्ञापन का उत्तर आ गया है।'

'अच्छा !'

'इस लिफाफे में चार लड़कियों के बायोडाटा और फोटोग्राफ हैं। मुझे तो एक भी पसंद नहीं।'

शिवानी ने लिफाफा खोलकर बायोडाटा निकाले और तस्वीरें देखने लगी। डॉली निकट ही खड़ी थी। उसने न तो बायोडाटा देखा और न ही किसी फोटोग्राफ की ओर ध्यान दिया।

तभी शिवानी बोली- 'लड़कियां तो चारों सुंदर हैं भैया। आयु भी अधिक नहीं पच्चीस-तीस, अट्ठाइस और बत्तीस।'

'नहीं शिवा! मुझे तो एक भी पसंद नहीं।'

'कोई बात नहीं अभी तो कल भी डाक आएगी।' इतना कहकर शिवानी ने लिफाफा मेज पर रखा और बाहर चली गई।

डॉली अपनी ही किन्हीं सोचों में गुम चेहरा झुकाए खड़ी रही। एकाएक राज ने उससे पूछा- 'आप क्या सोचने लगीं?'

'क-कुछ भी तो नहीं।' डॉली चौंककर बोली।

'ये तस्वीर नहीं देखीं आपने?'

'अच्छी तो हैं।'

'सिर्फ अच्छी?'

'तस्वीरें अच्छी हैं तो लड़कियां भी सुंदर होंगी।'

'तस्वीरें तो झूठ भी बोलती हैं।'

'तो स्वयं मिल लीजिए।'

'मिलकर कोई लाभ न होगा।'

'क्यों?'

'मैंने इरादा बदल दिया है।'

'अर्थात् विवाह न करेंगे।'

'विवाह तो करूंगा।' डॉली को ध्यान से देखते हुए राज बोला- 'किन्तु विज्ञापन के माध्यम से नहीं।'

'और?' डॉली पूछ बैठी।

'अपनी आंखों के माध्यम से।'

'तो-यूं कहिए न कि आपने पहले ही कोई लड़की पसंद कर ली है।'

'हां, पसंद तो है।'

'फिर?'

'अभी उसका हृदय नहीं टटोला है।'

'इसमें मुश्किल क्या है? आप उससे अपने मन की बात कहिए। क्या पता वह आपका प्रस्ताव मान ही ले।'

'हां, सोचा तो यही है।' राज ने कहा।

तभी बाहर से शिवानी ने डॉली को पुकारा और वह बाहर चली गई। राज निःश्वास लेकर रह गया।

डॉली रात भर न सोई थी। पूरी रात उसने जय के विषय में सोचा था। सुबह होने पर उसने जल्दी-जल्दी नाश्ता तैयार किया और जब राज चला गया तो वह स्वयं भी तैयार होने लगी। उसे जय से मिलने के लिए सैंट्रल जेल जाना था।
 
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