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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

इस समय वह दर्पण के सामने खड़ी अपने बालों को संवार रही थी। एकाएक शिवानी ने पीछे से आकर कहा- 'बिजली कहां गिराएगी?'

'कैसी बिजली?'

'अपने सौंदर्य की।'

'मैं इतनी सुंदर तो नहीं।'

'यह तो किसी दिन भैया से पूछा होता।'

'क्यों?'

'हर समय तेरी ही प्रशंसा करते हैं।' कहते-कहते शिवानी ने डॉली के कंधे पर अपना सिर रख दिया और बोली- 'जानती है आज सुबह क्या कह रहे थे?

' 'क्या?'

'कहते थे डॉली जैसी कोई लड़की मेरे जीवन में आती तो यह घर स्वर्ग बन जाता।'

डॉली यह सुनकर चौंकी नहीं। राज की भावनाओं को वह समझती थी। राज की आंखों में जो मौन प्रस्ताव था-वह भी उससे छुपा न था। उसे यों विचारमग्न देखकर

शिवानी फिर बोली- 'क्या सोचने लगी?'

'सोचती हूं-उनकी पत्नी ज्योति तो मुझसे अधिक सुंदर थी।'

'हां।'

‘फिर यह घर स्वर्ग क्यों न बना?'

'भैया को इसी बात का तो दु:ख है। वो आज भी यह सोचकर पछताते हैं कि उन्होंने ज्योति को समझने में इतनी बड़ी भूल क्यों की।'

डॉली ने इस विषय को आगे न बढ़ाया। विषय को बदलकर वह बोली 'तू तो घर ही रहेगी न?'

'क्यों?'

'मैं कहीं जा रही हूं।'

'रामगढ़?'

'ऊंहु-रामगढ़ का नाम न ले।'

'फिर?'

'नौकरी की तलाश में।'

'किन्तु भैया ने तो...।'

'वो अपने ढंग से प्रयास करेंगे और मैं अपने ढंग से।'

'कब लौटेगी?'

'संध्या से पहले लौट आऊंगी।'

'मैं भी चलूं?'

'तू क्या करेगी?'

'अकेली जाएगी। कहीं किसी की नजर लग गई तो?'

'नजर तो तुझे भी लग सकती है।'

'मैं इतनी सुंदर कहां।'

'सुंदरता अपनी नहीं देखने वाले की आंखों में होती है।' डॉली ने कहा। उसने ब्रुश रख दिया और मुड़कर बोली- 'किसी दिन पूछना किसी से, लेकिन सुन! पूछते-पूछते दिल न दे बैठना।'

'क्या होगा?'

'रोग लगा लेगी जीवन भर का। दिन में चैन न मिलेगा और रातों में नींद न आएगी।'

'अच्छा!' शिवानी ने शरारत से मुस्कुराकर कहा

'तो इसीलिए तू रात-रातभर करवटें बदलती है। किसी को दिल दे बैठी है क्या?'

'ना बाबा! मैं दिल-विल के चक्कर में कभी नहीं पड़ती और यदि पड़ती भी तो इतना अवसर ही न मिला। पूरे दिन तो घर में कैद रहती थी।'

'किन्तु यहां तो पूरी आजादी है, बना ले किसी को अपना।'

'नहीं अभी नहीं।

'फिर कब?'

'वर्ष-दो वर्ष बाद।'

'बूढ़ी होने पर?' शिवानी ने पूछा और हंस पड़ी।

'पगली! बुढ़ापे का प्यार जवानी के प्यार से अधिक मधुर होता है। अच्छा-अब मैं चलूं?'

'देख जल्दी लौट आना।'

'प्रॉमिस।' डॉली ने कहा और उसी क्षण शिवानी ने उसका कपोल चूम लिया।

'शरारती कहीं की।' डॉली बोली।

शिवानी खिलखिलाकर हंस पड़ी।

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सैंट्रल जेल के मुलाकात वाले कक्ष में वह सिर झुकाए खड़ा था। समय ने कितनी जल्दी हुलिया बदल दिया था उसका। चेहरे पर मैल की परतें, बढ़ी हुई शेव और आंखों में निराशा के साये।

डॉली उसे देखकर स्वयं को न रोक सकी और सिसक पडी।

जय उसे रोते देखकर बोला 'रोना तो मुझे चाहिए डॉली! घर-परिवार और साथ ही उसे भी छोड़कर जिसे मैंने पागलपन की सीमा तक चाहा यहां चला आया, कैद हो गया इन ऊंची-ऊंची दीवारों में। समझौता कर लिया अपने मुकदर से किन्तु आंखों में आंसू न आए। जानती हो क्यों? क्योंकि मन में एक विश्वास था। विश्वास था कि कोई मेरा अपना है। यकीन था कि कोई मुझे भी चाहता है और डॉली! इंसान को किसी का प्यार मिले-किसी अपने की। सहानुभूति मिले-कोई उसके दुखों पर दो आंसू बहाए-उसके लिए खुशी की इससे बड़ी कोई और बात नहीं होती।'

'जय!' डॉली रोते-रोते सलाखों पर मस्तक रगड़ने लगी।

'डॉली!' जय फिर बोला- 'तुम्हें देखा तो मैंने संसार देख लिया। तुम यहां आईं तो संसार-भर की खुशियां मुझे मिल गईं। अब मुझे कोई परवाह नहीं। कोई गम नहीं कि मेरा क्या होगा। भले ही मुझे फांसी की सजा मिले, किन्तु मैं हमेशा यही चाहूंगा कि तुम्हें कुछ न हो। तुम्हारा जीवन खुशियों से महकता रहे। तुम्हारे पांव में कभी कांटा भी न चुभे।'

'जय! मेरे जीवन की खुशी तो तुम हो और यदि तुम ही इस चारदीवारी में कैद रहे तो मेरी खुशी का क्या महत्व? तुम सोचते हो जी पाऊंगी मैं तुम्हें खोकर-मुस्कुरा सकूँगी क्या?'

'डॉली-डॉली!'

'जय!' डॉली अपने आंसू पी गई और जय के हाथ पर अपना हाथ रखकर बोली- 'मैंने केवल प्यार की कहानियां पढ़ी थीं—प्यार को कभी देखा न था। उस दिन तुम मिले-तुमने अपने प्यार का इजहार किया तो एकाएक ही विश्वास ही न कर सकी किन्तु जब तुमसे दूर हुई तो तुम्हारे शब्द याद आए। तुम्हें जाना-तुम्हारे प्रेम को जाना और तभी मुझे अनुभव हुआ कि मैंने भी तुम्हें चाहा था। बहुत रोई मैं तुम्हारे आने के बाद। बहुत याद किया तुम्हें। जी में आया पंछी बनूं और उड़कर तुम्हारे पास चली आऊं। किन्तु यह कैसे संभव होता? इसलिए कल्पना के पंख लगाए और तुम्हारे आसपास ही उड़ती रही, सो नहीं पाई कभी। रात में तुम्हारी यादें बेचैन करतीं। सोचती, कितने महान निकले तुम। मेरे लिए पिता से विद्रोह किया विद्रोह न करते तो उनका खून क्यों होता? और दूसरी महानता यह कि मुझे परेशानी से बचाने के लिए उस अपराध को स्वीकार किया जो तुमने किया ही न था। खुशी-खुशी गिरफ्तार हुए और जेल चले आए। यह भी न सोचा कि आगे क्या होगा और मैं-मैं तुम्हारे लिए कुछ भी न कर सकी-कुछ भी तो नहीं कर सकी तुम्हारे लिए।' कहते-कहते डॉली फिर सिसक पड़ी।

जय बोला- 'पगली! इतना सब तो किया तुमने मेरे लिए। मुझ अजनबी को चाहा। मुझसे दर्द का रिश्ता जोड़ा। मेरे लिए रात-रातभर नींद न आई। मेरे लिए हजार-हजार आंसू बहाए। यूं ही कोई रोता है किसी के लिए? क्या यूं ही किसी का दर्द अपना बन जाता है? नहीं डॉली! इन सबके लिए तो बहुत त्याग करना पड़ता है। बहुत कुछ खोना पड़ता है रोने के लिए भी। कोई अंदर छुपे दर्द के समुद्र से कुछ बूंद आंसू निकालकर तो देखे-दिल में बहुत पीड़ा होता है और वो पीड़ा तुमने सही डॉली! तुमने सही मेरे लिए। मैं-मैं तो तुम्हारा वह उपकार मरकर भी न भूल पाऊंगा।'

'ऐसा न कहो जय! ऐसा न कहो। मैंने तो केवल आंसू ही बहाए हैं और तुमने-तुमने तो मेरे लिए अपने आपको भी मिटा दिया। लुटा दिया अपने आपको।' इतना कहकर डॉली ने अपने आंसू पोंछ लिए। एकाएक उसे कुछ याद आया और वह बोली- 'सुनो! यहां आते समय मैं । कचहरी गई थी। वहां एक कपूर साहब हैं। मैंने उनसे तुम्हारे विषय में सलाह ली थी। बोले-यदि किसी प्रकार यह पता चल जाए कि उस समय वहां हरिया एवं जमींदार साहब के अतिरिक्त भी कोई तीसरा व्यक्ति था और यह सिद्ध हो जाए कि गोली जय की रिवाल्वर से नहीं चली। थी-तो फिर तुम्हारा जय सजा से बच सकता है।'

'डॉली! यह तो मैं भी मानता हूं कि उस समय कोई तीसरा व्यक्ति वहां था। जिसने मेरे तथा पापा के झगड़े का लाभ उठाया और किसी शत्रुतावश पापा का खून कर दिया। जहां तक मैं समझता हूं केवल हरिया को उस व्यक्ति की जानकारी हो सकती है किन्तु हरिया कुछ बताएगा नहीं। इसलिए तुम्हारा किसी से । पूछताछ करना और वकीलों से मिलना व्यर्थ है। दूसरी बात यह है कि तुम अकेली हो और मेरा कोई संबंधी तुम्हारी मदद नहीं करेगा। कारण यह है कि वे लोग पापा की संपत्ति पर पहले ही गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि तुम्हारी कोशिशों से कोई लाभ न होगा। अच्छा होगा कि तुम इस विषय में सोचना छोड़ दो और मुझे अपने भाग्य के अनुसार जीने दो।'

'कैसे छोड़ दूं तुम्हें? वो हृदय कहां से लाऊं जो तुम्हारी ओर से मुख मोड़ ले। तुमने मेरे लिए बर्बादी को गले लगाया और मैं तुम्हें भूल जाऊं? नहीं जय! यह संभव नहीं और हां, एक बात और जान लो। मैं अपने आपको खाक में मिला दूंगी। मिटा दूंगी अपनी हस्ती को-किन्तु अपने जीते जी तुम्हें कुछ न होने दूंगी। कभी निराश मत होना जय! मत सोचना कि तुम यह मुकदमा हार जाओगे। मत सोचना कि तुम्हें फांसी हो जाएगी। मत सोचना कि इस संसार में तुम्हारा कोई अपना नहीं। सोचना तो सिर्फ यह सोचना कि डॉली मेरी अपनी है-सोचना तो सिर्फ यह सोचना कि डॉली का प्यार जेल की चारदीवारी में कैद है और उसे डॉली के लिए मुक्त होना ही होना है।'

'द-डॉली!'

'मैं फिर आऊंगी जय! आती रहूंगी। चिंता मत करना। तुम्हें मेरी सौगंध कभी आंसू मत बहाना। नहीं रोओगे न?' डॉली ने भावपूर्ण स्वर में कहा और अपना हाथ जय के हाथ में दे दिया।

जय ने उसका हाथ चूम लिया। किन्तु न जाने क्यों-ऐसा करते समय उसकी आंखों से दो बूंद आंसू निकले और डॉली की हथेली पर गिर पड़े।

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डॉली अभी न लौटी थी। राज एवं शिवानी कमरे में बैठे आज की डाक देख रहे थे। मेज पर बीसों लिफाफे फैले पड़े थे और ये सभी

अखबार के दफ्तर से आए थे।

शिवानी बड़े ध्यान से लिफाफों में रखी तस्वीरें देख रही थी जबकि राज की नजरें । वॉल-क्लॉक की सुइयों पर टिकी थीं। संध्या के छह बज चुके थे और डॉली अभी तक न आई थी।

एकाएक राज ने अपनी व्हील चेयर के पहिए घुमाए और खिड़की के समीप आ गया।

तभी एक तस्वीर को देखते-देखते शिवानी ने उसे संबोधित किया- 'भैया!' 'यह आगरे वाला लिफाफा देखा आपने?'

'नहीं-अभी नहीं।'

'लड़की का नाम लता है। आयु अट्ठारह वर्ष और नयन-नक्श भी अच्छे हैं। परित्यकता है।'

राज ने इस बार कुछ न कहा और मूर्तिमान-सा खिड़की से बाहर देखता रहा।

शिवानी फिर बोली- 'मुझे तो यही लड़की पसंद है।'

'शिवा!' राज बोला। 'यह डॉली तुझे कैसी लगती है?'

'क्यों?' शिवानी ने पूछा और चौंककर राज को देखने लगी।

'यूं ही पूछ बैठा।'

'यूं ही पूछ बैठे।' शिवानी उठकर राज के समीप आई और बोली- 'अथवा डॉली आपको पसंद आ गई?'

'नहीं-ऐसी तो कोई बात नहीं शिवा! दरअसल मैं सोच रहा था मैं सोच रहा था कि बेचारी अनाथ है। कहीं कोई अपना नहीं। यदि उसे सहारा मिल जाता तो।'

'तो-यूं कहिए न कि आप डॉली से विवाह करना चाहते हैं?'

'इसमें बुराई भी क्या है?'

'हां, बुराई तो कुछ नहीं भैया! किन्तु दिक्कत यह है कि डॉली हमारे विषय में कुछ और सोच सकती है। वह यह भी सोच सकती है कि हम उसकी बेबसी का लाभ उठा रहे हैं।'
 
'इसमें बेबसी कैसी? आखिरकार एक-न-एक दिन तो उसे किसी के साथ बंधना ही है और जब वह हमारे घर रहती है तो यह उत्तरदायित्व भी हमें ही निभाना है। हां यदि इस संबंध में तेरी अपनी मर्जी न हो तो।'

'नहीं भैया! डॉली तो मुझे भी पसंद है।'

'तो फिर किसी दिन टटोलकर देख न उसका हृदय।'

'देखूगी भैया!' शिवानी ने कहा और उसी समय अंदर आती डॉली को देखकर वह राज से बोली- 'लीजिए भैया! शैतान की नानी को याद करो और नानी हाजिर।' कहकर वह हंस पड़ी।

राज अपनी चेयर घुमाकर डॉली को देखने लगा।

गर्मी के कारण डॉली के मस्तक पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। उसने शिवानी की बात के उत्तर में भी कुछ न कहा और बैठकर अपना पसीना पोंछने लगी।

यह देखकर शिवानी उसके समीप आकर बैठ गई और बोली- 'लगता है बहुत थक गई है?'

'हां।'

'कहां-कहां गई थी?'

'तीन-चार जगह।'

'कहीं बात बनी?'

'नहीं।' डॉली ने धीरे से कहा।

उसी समय राज बोला- 'शिवा! यह बात शिष्टाचार के विरुद्ध है। कोई दिन भर का हारा-थका घर आए तो पहले उससे चाय-पानी के विषय में पूछा जाता है।'

'सॉरी! यह बात तो मैं भूल ही गई थी।' इतना कहकर शिवानी उठी और डॉली के लिए पानी ले आई।

डॉली पानी पी चुकी तो शिवानी ने उससे पूछा 'अब यह बता-ठंडा पिएगी अथवा गर्म?'

'नहीं-अभी मन नहीं। सर में दर्द है इसलिए थोड़ी देर आराम करूंगी।' डॉली ने एक ही सांस में कहा और उठकर दूसरे कमरे में चली गई।

राज एवं शिवानी उसे आश्चर्य से जाते देखते रहे। फिर शिवानी ने राज से कहा- 'भैया! यह लड़की तो मेरे लिए कभी-कभी बहुत बड़ी पहेली बन जाती है।'

'वह क्यों?'

'कभी तो इतनी खुश रहेगी-मानो संसार-भर की खुशी मिल गई हो और कभी इतनी उदास कि पूछिए मत।'

'शिवा! कुछ लोगों को समझना आसान नहीं होता। डॉली ने वैसे भी अपने जीवन में हजारों पीड़ाएं झेली हैं। हां, एक बात याद आई। डॉली जब बाहर जा रही थी तो क्या तूने उसे कुछ रुपए भी दिए थे?'

'क्यों?'

'बस का किराया और चाय वगैरहा का खर्च?'

'नहीं तो।'

'बस, इसीलिए उदास है तेरी सहेली। बेचारी पूरे दिन पैदल घूमती रही। क्या सोचा होगा उसने? यही न कि हमने उसे पराया समझा।'

'भैया! मैंने वास्तव में यह न सोचा था। मैं तो भूल ही गई थी कि जब वह यहां आई थी तो उसके पास एक भी पैसा न था। मैं उससे क्षमा मांगती हूं।' इतना कहकर शिवानी बाहर चली गई।

राज अपनी व्हील चेयर बरामदे में ले आया।

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वॉल क्लॉक ने रात्रि के एक बजने की सूचना दी तो डॉली ने करवट बदली और उठ गई।

आंखों में नींद का नाम न था। शाम राज एवं शिवानी का वार्तालाप उसने सुना था। राज उससे विवाह करना चाहता था। शिवानी भी यही चाहती थी। यूं राज के अंदर उसने कोई बुराई न देखी थी। वह पढ़ा-लिखा था, सुंदर था। दोष था तो केवल यह कि वह विकलांग था, किन्तु उसका विकलांग होना मात्र एक दुर्घटना थी। फिर भी राज का निर्णय उसे पसंद न आया था। इस संबंध में उसने कई बार अपने हृदय को टटोलकर देखा था और तब यह पाया था कि वह जय के अतिरिक्त अन्य किसी को कभी नहीं चाह सकेगी। न जाने प्रीत की ऐसी कौन-सी डोरी बंधी थी जय से। न जाने जय में ऐसा क्या था कि वह केवल एक ही मुलाकात में हमेशा के लिए उसकी हो गई थी।

डॉली के सामने अब ऐसी कोई विवशता भी न थी जिसके लिए वह राज से विवाह करती। अब तो अपनी राह उसने खोज ली थी। सोचा था-कहीं-न-कहीं कोई नौकरी उसे मिल ही जाएगी।'

तभी कोई पीछे से उसके कंधे पर झुका और उसने धीरे से कहा- 'क्यों लगा लिया न रोग?'

डॉली ने चौंककर देखा-यह शिवानी थी जो हमेशा उसी के साथ सोती थी। शिवानी ने उससे फिर कहा- 'क्यों नाम भी नहीं बताएगी उस जालिम का?'

'नींद नहीं आई?' डॉली ने पूछा।

'आई तो थी।'

'फिर?'

'तुझे बैठे देखा तो टूट गई।'

'मैं तो यूं ही।'

'सिर में दर्द होगा-है न?'

'हां।'

'और दिल में भी।' शिवानी हंस पड़ी।

'तंग न कर।'

'अभी तक नाराज है क्या? मैंने तो अपने अपराध की क्षमा भी मांग ली थी।'

'वह कोई अपराध न था।' डॉली ने कहा और लेट गई।

तभी शिवानी ने उसे अपनी ओर खींच लिया और बोली- 'एक बात पूछनी थी तुझसे।'

'वह क्या?'

'भैया तुझे कैसे लगते हैं?'

....

'क्यों?'

'यूं ही पूछ बैठी।'

'इसमें पूछने की क्या बात है? अच्छे हैं।'

'न जाने भैया को क्या हो गया है।'

'क्या हुआ?'

'उन्हें कोई लड़की पसंद ही नहीं आती।'

'यह तो उनके मन की बात है। इसमें मैं क्या कर सकती हूं।' डॉली ने शुष्क लहजे में कहा और करवट बदल ली।

शिवानी ने उस पर झुककर कहा- 'तू चाहे तो उन्हें समझा सकती है।'

'ना बाबा! मैं ऐसे किसी चपड़े में नहीं पड़ती। और वैसे भी यह तो उनका अपना निजी मामला है।'

शिवानी समझ न पाई कि अपने मन की बात किस प्रकार कहे। उसे यह भी भय था कि कहीं डॉली उसकी बात सुनकर नाराज न हो जाए। कुछ क्षणोपरांत वह बोली- 'एक बात पूछू?'

'वह क्या?'

'तूने अपने विषय में तो कुछ सोचा होगा?'

'अभी तो अपने पैरों पर खड़े होने की बात सोची है।'

'उसके पश्चात?'

'यह अभी नहीं सोचा।'

'विवाह तो करेगी?'

'नहीं, जीवन-भर नहीं।'

'ऐसा कैसे हो सकता है।' शिवानी ने कहा 'अब नहीं तो फिर शादी तो तुझे करनी ही पड़ेगी।'

'अभी ऐसी आवश्यकता नहीं। कभी होगी तो सोच लूंगी। अब तू मेरा पीछा छोड़ और सोने दे।'

'ऊंडं! अभी नहीं।'

'देख मुझे नींद आ रही है।'
 
'आने दे-मुझे तो तुझ पर प्यार आ रहा है।' शिवानी ने कहा और इसके साथ ही उसने डॉली पर झुककर उसके कपोल पर अपने होंठ रख दिए।

डॉली ने उसकी वेणी पकड़ ली और बोली- 'ठहर तो, आज मैं तेरी शैतानी निकालती हूं।'

'अच्छा बाबा! अब माफ कर।'

'डॉली ने उसकी वेणी छोड़ दी। शिवानी खिलखिलाकर हंस पड़ी।

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कपूर साहब ने फाइल बंद कर दी। आंखों पर चढ़ी ऐनक को दुरुस्त किया और डॉली से बोले 'देखिए, आप मेरी बात को समझने की कोशिश नहीं कर रही हैं। यह कोर्ट है और यहां कोई भी काम पैसे के बिना नहीं होता। आप पैसे का प्रबंध कर लीजिए-फिर मुझे आपका मुकदमा लड़ने में कोई दिक्कत नहीं।'

'लेकिन अंकल! मैंने आपसे कहा ना।'

'डॉली जी! हमारे पेशे में उधार नहीं चलता। अब आप जा सकती हैं।' इतना कहकर कपूर साहब फिर उसी फाइल के पन्ने उलटने लगे।

डॉली की विवशता आंसुओं में बदल गई किन्तु उसने अपने आंसू बहाए नहीं और कपूर साहब के ऑफिस से बाहर आ गई। इस समय उसके चेहरे पर विचारों का बवंडर था और उलझनों के कारण मस्तिष्क की रगें जैसे एक-दूसरे से टकरा-टकराकर टूट रही थीं। उसने तो सोचा था कि उसे नौकरी मिल जाएगी और इस प्रकार उसे मुकदमा लड़ने में कोई दिक्कत न होगी किन्तु शायद नौकरी मिलना इतना आसान न था।

डॉली समझ न पा रही थी कि ऐसी स्थिति में वह क्या करे? कहां से लाए पैसा? किस प्रकार मुकदमा लड़े जय का? किस प्रकार बचाए । अपने प्यार को? डॉली का दिल चाह रहा था कि वह अपनी बेबसी पर फूट-फूटकर रोए। इतना रोए कि उसके अंतर्मन में एक भी पीड़ा न रहे। कोर्ट से निकलकर भी वह यही सब सोचती रही और निरुद्देश्य-सी आगे बढ़ती रही।

सहसा पीछे से आता एक ऑटोरिक्शा उसके निकट आकर रुका। डॉली चौंककर एक ओर हट गई। तभी किसी ने उसे संबोधित किया- 'सुनिए!'

डॉली रुक गई। मुड़कर देखा-यह राज था जो ऑटोरिक्शा में बैठा उसे पुकार रहा था। डॉली ने पलभर के लिए कुछ सोचा और राज के निकट आकर बोली- 'ओह, आप!'

'कहां से आ रही हैं?'

डॉली को झूठ कहना पड़ा- 'यहीं कोर्ट रोड पर एक कंपनी है।'

'समझा-सान्याल प्राइवेट लिमिटेड होगी?'

'शायद।'

'बात बनी?'

'नहीं।'

'फिर आप एक काम कीजिए।'

'वह क्या?'

'मेरे ऑफिस चलिए।'

'वहां क्यों?' डॉली ने चौंककर पूछा।

'मैंने सोचा है-इधर-उधर भटकने से तो अच्छा है कि आप वहीं काम करें। इस प्रकार आपका मन भी लगा रहेगा और आपको नौकरी भी मिल जाएगी।' राज बोला।

'शिवानी क्या कहती है?'

'शिवा भी यही चाहती है।'

'थोड़ा प्रयास और कर लूं उसके पश्चात देख लूंगी। आप तो ऑफिस जा रहे होंगे?'

'हां, किन्तु आप कहें तो।'

'नहीं, अभी मैं घर न जाऊंगी।'

'शाम तो होने को है।'

'अभी कहां-चार ही तो बजे हैं।'

'फिर भी आपको जल्दी घर पहुंचना चाहिए। आकाश में घटाएं घिरी हैं, वर्षा की संभावना है।'

'जी!' डॉली ने केवल इतना ही कहा और आगे बढ़ गई। राज का ऑटोरिक्शा वहां कब तक रुका-यह उसने जानने की कोशिश न की।

चलते-चलते उसके सामने फिर वही उलझनें आ गईं। और जब उलझनें किसी प्रकार भी न सुलझीं तो उसने अपने आपसे प्रश्न किया- 'तो क्या उसे राज का प्रस्ताव मान लेना चाहिए? विवाह कर लेना चाहिए उससे?' 'किन्तु।' हृदय ने कहा- 'यह तो जय के साथ विश्वासघात होगा। क्या तुम्हारे अंदर इतना साहस है कि उसे धोखा दे सको।' 'जय को बचाने का अन्य कोई उपाय भी तो नहीं। कपूर साहब को मुकदमे से पहले ही दो हजार रुपए चाहिए। इतने रुपयों का प्रबंध मैं कहां से करूंगी। और यदि रुपयों का प्रबंध न हुआ तो।'

इस प्रकार डॉली का हृदय भी उलझकर रह गया। तभी एकाएक बादल गरजे-दूर कहीं बिजली गिरी और वर्षा आरंभ हो गई।

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सांझ अभी ढली न थी-किन्तु वर्षा के कारण अभी से अंधकार के साए फैलने लगे थे। राज ने लौटते ही शिवानी से डॉली के विषय में पूछा। शिवानी बोली- 'नानीजी बीमार हो गई हैं।'

'क्या मतलब?'

'भीग गई थीं। मैंने छूकर देखा तो जिस्म तवे की भांति तप रहा था। चाय भी नहीं पी।'

'क्यों?'

'कहती थी-मन ठीक नहीं।'

'किन्तु चाय से मन का क्या संबंध?'

'पूछकर देखिए।'

'हां, पूछना तो पड़ेगा ही।' इतना कहकर राज ने अपनी व्हील चेयर घुमाई और दूसरे कमरे में आ गया। डॉली बिस्तर पर लेटी थी। आंखें बंद थी-शायद सो रही थी। राज उसे ध्यान से देखने लगा। डॉली वास्तव में इतनी सुंदर थी कि उससे अधिक सुंदरता की कल्पना भी नहीं हो सकती थी। गुलाब की पंखुड़ियों की भांति एक-दूसरे से जुड़े उसके होंठ, लालिमा युक्त पारदर्शी कपोल और झील-सी आंखें। तकिए पर फैले उसके रेशमी केश तो इतने सुंदर थे कि देखते ही काली घटा का भ्रम होता। यह सब देखते-देखते राज के हृदय में आंदोलन-सा छिड़ गया। भावनाएं मचल-मचल उठी और रक्त में कोई तूफान-सा चीख उठा। दिल में आया-अभी नीचे झुके और डॉली के मधु भरे सुर्ख होंठों पर एक चुंबन अंकित कर

तभी शिवानी कमरे में आ गई। उसने एक नजर डॉली पर डाली और फिर राज से पूछा- 'क्या हुआ भैया?'

'क-कुछ नहीं शिवा!' राज ने चौंककर कहा। चेहरे पर ऐसे भाव थे मानो चोरी करते पकड़ा गया हो।

शिवानी फिर डॉली पर झुक गई और उसके मस्तक पर फैले बालों को पीछे हटाने लगी। एकाएक वह चौंक गई। बुखार के कारण डॉली का जिस्म तवे की भांति तप रहा था। पीछे हटकर उसने राज से कहा- 'भैया! डॉली को तो बहुत तेज बुखार है।'

'तू ऐसा कर-चौराहे से डॉक्टर खान को ले आ। वर्षा भी अब रुक गई है जल्दी कर।' राज ने कहा।

शिवानी तुरंत तैयार हो गई और चली गई। उसके चले जाने पर राज ने अपनी व्हील चेयर आगे बढ़ाई और डॉली के मस्तक को छूकर देखा। शिवानी ने झूठ न कहा था। डॉली को वास्तव में तेज बुखार था।

राज ने उसे पुकारा– 'डॉली!'

डॉली ने आंखें खोल दीं। पुतलियां घुमाकर राज को देखा- 'किन्तु कुछ कहा नहीं।

राज ने फिर कहा- 'मैंने कहा था न-जल्दी घर चली जाना। वर्षा की संभावना है।'

'शिवा कहां है?' डॉली के होंठ खुले। धीरे से पूछा।

'डॉक्टर को लेने गई है।'

'व्यर्थ ही कष्ट किया उसने।'

'कष्ट कैसा? यह तो फर्ज था और हां, आपने मेरे उस प्रस्ताव पर ध्यान दिया?'

'प्रस्ताव कौन-सा?'

'मैंने कहा था न कि आप मेरे ही ऑफिस में काम करेंगी।'

'नहीं, यह ठीक नहीं।'

'लेकिन क्यों?'

'मन की बात है।'

राज को आघात-सा लगा। बोला- 'अर्थात् नहीं चाहतीं कि...।'

'विवशता भी है।'

'वह क्या?"

'यह न बता सकूँगी।' डॉली ने कहा और बिस्तर से उतर गई।

राज ने कहा- 'लेटी रहिए न, आपकी तबीयत...।'

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'अब ठीक हूं।' डॉली ने धीरे से कहा और बाहर चली गई। राज को फिर आघात-सा लगा। मन में कई प्रश्न चीख उठे- 'क्या डॉली को उसके साथ अकेले में बैठना पसंद नहीं? क्या डॉली के हृदय में उसके लिए कोई स्थान नहीं? क्या-क्या डॉली उसे बिलकुल भी पसंद नहीं करती।' हां, शायद ऐसा ही था। और इन सब बातों के पीछे मुख्य कारण यह था कि वह विकलांग था-विकलांग। सोचते ही राज के अस्तित्व में पीडा की लहर-सी उठी। इसके पश्चात वह कमरे में न रुका और व्हील चेयर के पहिए घुमाता हुआ बाहर चला गया।

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फिर वही विवशता, फिर वही उलझनें और फिर दुर्भाग्य की वही परछाइयां। कई दिन बीत गए। डॉली ने अनेक दफ्तरों के चक्कर लगाए-किन्तु नौकरी उसे न मिली। इन उलझनों के कारण उसके व्यवहार में भी काफी परिवर्तन आ गया था। अब वह बाहर से लौटकर रसोई का कुछ काम न देखती और अपने कमरे में चली जाती।

राज तो उससे कुछ कहने का साहस ही न जुटा पाता। शिवानी कुछ कहती तो वह तबीयत खराब होने का बहाना बना देती।

अंततः एक शाम जब डॉली बाहर से लौटी तो शिवानी स्वयं को रोक न सकी और उससे बोली- 'डॉली! पिछले कई दिनों से देख रही हूं। न तो तू ठीक से खाना खाती है और न ही सो पाती है। यहां तक कि तू मुझसे और भैया से भी बोलना पसंद नहीं करती। क्या मैं जान सकती हूं कि ऐसा क्यों है?' 'अतीत की पीड़ाएं हैं-जो बेचैन कर डालती हैं?'

'अतीत तो बीत चुका है।'

'किन्तु उसकी स्मृतियां तो अब भी दु:ख देती है।'

'दु:ख तो बांटे भी जाते हैं।'

'सभी दु:ख एक जैसे नहीं होते।'

'किन्तु तेरे इन दुखों ने मुझे और भैया को कितना दुखी कर रखा है-यह तू नहीं जानती। एक बात मानेगी?'

'वह क्या?' डॉली ने पूछा। खिड़की के सामने खड़ी वह आकाश पर फैली लालिमा को देख रही थी।

'अपना यह हाथ किसी के हाथ में दे दे।' शिवानी ने कहा।

'इससे क्या होगा?'

'तेरी पीड़ाएं मिट जाएंगी। वर्तमान की खुशियों को गले लगाएगी तो अतीत भी याद न रहेगा।'

'कौन थामेगा मेरा हाथ?'

शिवानी को उसके इस वाक्य से प्रसन्नता हुई। वह बोली- 'पगली! तू इतनी सुंदर है कि तुझे तो कोई भी अपना सकता है। तू एक बार मुंह से हां तो कर। फिर देख तुझे किस प्रकार सजा-संवारकर दुल्हन बनाती हूं।'

डॉली ने दीर्घ निःश्वास ली और बोली- 'हां, अब तो यह सब करना ही पड़ेगा शिवा! बनना ही पड़ेगा दुल्हन। इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग भी तो नहीं।। जिंदगी ने नाटक ही इतना भयानक खेला है कि सब कुछ सहना ही पड़ेगा।' डॉली के इन शब्दों में अथाह पीड़ा थी।

शिवानी उसके मन की पीड़ा न जान सकी और उसे अपनी ओर खींचकर बोली- 'तो फिर एक बात मान।'

'वह क्या?'

'इस घर से सदा के लिए अपनेपन का नाता ले।' 'क्या मतलब?'

'लक्ष्मी बन जा इस घर की।'

'तेरा मतलब है।'

'हां, मेरा संकेत भैया की ओर है। बहुत चाहते हैं तुझे। कई बार कह चुके हैं मुझसे।'

'तू क्या चाहती है?'

'मैं भी यही चाहती हूं। सच कहती हूं तेरे रहने से यह घर स्वर्ग बन जाएगा। हमेशा खुशियों के फूल खिलेंगे इस आंगन में।'

'क्या-क्या वास्तव में ऐसा हो जाएगा शिवा?'

'पगली! कैसी बातें करती है।' इतना कहकर शिवानी ने डॉली के गाल पर स्नेह से हल्की-सी चपत लगाई और इसके उपरांत वह खुशी-खुशी कमरे से बाहर चली गई।

किन्तु डॉली के चेहरे पर कोई खुशी न थी। शिवानी के जाते ही उसकी आंखों में आंसुओं की बूंदें चमकी और फिर यह आंसू उसके कपोलों पर उतर आए। काश! शिवानी ने उसके यह आंसू देखे होते। काश! किसी ने उसकी पीड़ा और विवशता को समझा होता।

दूसरी ओर शिवानी तुरंत राज के कमरे में पहुंची और उसकी व्हील चेयर थामकर बोली 'भैया! आज बुधवार ही है न?'

'हूं क्यों?' राज ने अनमने ढंग से पूछा। व्हील चेयर पर बैठा वह किसी पुस्तक के पृष्ठ उलट रहा था।

'और।' शिवानी फिर बोली- 'सुना है बुधवार का दिन आपके लिए बहुत शुभ होता है।'

'नहीं शिवा! अब ऐसा नहीं। अब तो मुझे अपना हर दिन अशुभ नजर आता है।'

'भैया! आप तो बहुत जल्दी निराश हो जाते हैं। आप यह क्यों नहीं सोचते कि प्रत्येक रात के पश्चात सुबह का उजाला अवश्य आता है और मैं यह कहने आई हूं कि आपके जीवन में उजाला आ चुका है।'

'अच्छा! वह क्यों कर?' राज ने पुस्तक बंद कर दी और पूछा।

'ऊंडं यों न बताऊंगी।'

'और?'

'पहले मेरा इनाम।'

'वाह! यह खूब रही। बात से पहले इनाम।'

'मर्जी आपकी। नहीं देना! तो मत दीजिए। लेकिन मैंने फैसला किया है कि मैं इनाम से पहले कोई बात न बताऊंगी।'

'चलो उधार मान लो।'

'प्रॉमिस?'

'एकदम पक्का ।'

'तो सुनिए!' शिवानी ने राज के कान में कहा- 'डॉली को मैंने भाभी बना लिया है। भाभी-अर्थात् अपने आंगन की गृहलक्ष्मी।'

'क्या!' राज चौक पड़ा। होंठों पर खुशियों की मुस्कुराहट फैल गई।
 
'हां भैया! डॉली ने मेरी बात मान ली है। बस अब तो आप जल्दी से विवाह की तैयारी कीजिए।'

राज कुछ न कह सका और शिवानी हंसते हुए बाहर चली गई।

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फिर वही मंजर, फिर वही तड़प और फिर वही पीड़ाएं। डॉली मूर्तिमान-सी सलाखों के पीछे खड़े जय को देख रही थी। कुछ ही समय में वह वर्षों का बीमार नजर आता था। आंखें अंदर को धंस गई थीं और उसके कामदेव जैसे चेहरे पर मैल की इतनी परतें जम चुकी थीं कि पहचाना न जाता था। जय को देखते-देखते डॉली का हृदय भर आया। मन के किसी कोने में धुंधली-सी खुशी भी थी और दर्द का सागर भी। अपनी बेबसी से लड़ते-लड़ते वह इतनी थक चुकी थी कि उसने राज से विवाह करने का निश्चय कर लिया था। उसे खुशी थी कि वह राज की पत्नी बनकर बड़ी सरलता से जय का मुकदमा लड़ सकेगी, किन्तु दु:ख यह था कि उसने जय के संबंध में जो सपने संजोये थे वे सब टूटकर बिखर गए थे। उसके अंदर तो इतना भी साहस न था कि वह अपना यह निर्णय जय को बता पाती। जानती थी-सहन न कर पाएगा वह। शायद उसके हृदय में जीने की एक भी लालसा शेष न रहेगी। लेकिन जय को बचाने के लिए अपनी भावनाओं का परित्याग तो उसे करना ही था।

जय के सामने खड़ी डॉली अब भी यही सब सोच रही थी। वह समझ न पा रही थी कि जो कुछ होने वाला है-उस पर ठहाका लगाए अथवा आंसू बहाए।

तभी जय ने अपनी आवाज में उसे झिंझोड़ दिया। वह कह रहा था- 'डॉली! तुम्हारी यह खामोशी और उदासी बता रही है कि मेरी तरह तुमने भी परिस्थितियों से हार मान ली है। तुमने भी समझौता कर लिया है अपने दुर्भाग्य से।'

'न–नहीं जय!' डॉली बोली- 'मैंने हार नहीं मानी और हारने का तो प्रश्न ही नहीं है। मुझे आज भी यह आशा है कि तुम बरी हो जाओगे। मैंने इस संबंध में कई वकीलों से बात की है। उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है कि तुम्हें कुछ न होगा।'

'मुझे अपनी नहीं तुम्हारी चिंता है। मैं तो खैर जेल में हूं-इसलिए स्वास्थ्य गिर गया है किन्तु तुम तो खुली हवा में हो–फिर तुम्हारा स्वास्थ्य क्यों गिर गया? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि परिस्थितियों ने तुम्हें थका दिया है?'

'नहीं जय!'

'खैर!' जय ने सलाखें थाम लीं-डॉली की आंखों में देखते हुए बोला- 'अब मेरी एक बात मान लो।'

'वह क्या?'

‘अपने लिए किसी साथी का चुनाव कर लो।'

'व-जय!' डॉली की आवाज कांप गई। आवाज के साथ-साथ उसका हृदय भी कांपकर रह गया। सोचा, कहीं ऐसा तो नहीं कि जय को उसके निर्णय का पता चल गया हो।

जय फिर बोला- 'डॉली! यह सब मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जीवन के रास्ते बहुत लंबे होते हैं। अकेले चलोगी तो थककर गिर जाओगी और फिर यह संसार भी तो ऐसा है कि किसी को अकेले नहीं जीने देता। पग-पग पर गिद्ध बैठे हैं यहां।'

'जय प्लीज!' डॉली तड़पकर बोली- 'भगवान के लिए मुझसे यह सब न कहो-न कहा जय! तुम नहीं जानते कि यह सुनकर मुझ पर क्या बीतती है। कितनी तड़प उठती है हृदय में।'

'तुम-तुम समझती नहीं हो डॉली!'

'मैं समझना भी नहीं चाहती जय! कुछ और कहो।'

'हां, एक बात कहनी है।'

'वह क्या?'

'उस दिन तुम कह रही थीं जब पापा का खून हुआ तो वहां कोई तीसरा और था।'

डॉली ने चौंककर पूछा- 'तुम जानते हो उसे?'

'जानता तो नहीं केवल संदेह है। रामगढ़ के चौधरी को तो तुम जानती होगी। दरअसल पापा और चौधरी के बीच पिछले कई वर्षों से मुकदमेबाजी चल रही थी। झगड़ा किसी जमीन पर था और आज से एक वर्ष पहले हरिया भी चौधरी के पास ही काम करता था।'

डॉली यह सुनकर चौंक गई। उसे याद आया, उस दिन हरिया ही चौधरी को लेकर आया था।

जय कहता रहा- 'मुझे संदेह है कि कहीं। हरिया चौधरी से न मिल गया हो और पापा का खून चौधरी ने ही न किया हो, लेकिन मैं जानता हूं कि इस संबंध में तुमसे कुछ न हो सकेगा। चौधरी वैसे भी ठीक आदमी नहीं।' डॉली ने कुछ न कहा।

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जय फिर बोला- 'तुम तो उसके पश्चात रामगढ़ गई न होगी?'

'अब मेरा उस नरक से संबंध नहीं।'

'दीना के परिवार में और भी कोई था?'

'नहीं।'

'उसके पास संपत्ति तो होगी?'

'यह मैं नहीं जानती।'

तभी मुलाकात का समय समाप्त हो गया। यह जानकर डॉली के हृदय को आघात-सा लगा और वह जय का हाथ अपने हाथों में लेकर । बोली- 'जय! क्या मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकती?'

'मेरे साथ?'

'हां, जेल में।'

'पगली!' दर्द भरी मुस्कुराहट के साथ जय ने कहा- 'भला ऐसा भी कभी हुआ है? और वैसे भी जेल तो अपराधियों के लिए होती है और जिसने अपने जीवन में कोई अपराध ही न किया हो...?'

'अपराध तो मैंने भी किया है जय!'

'वह क्या?'

'चाहा है तुम्हें तुमसे प्यार किया है।'

जय छटपटाकर रह गया और तभी संतरी ने उसे पीछे हटा दिया। डॉली की आंखें सावन-भादो बन गईं।

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न कोई बारात सजी, न कहीं शहनाई बजी और दो दिन पश्चात ही डॉली दुल्हन बन गई। केवल फेरों की रस्म अदा हुई थी और राज के दोस्तों ने वर-वधु को मुबारकबाद दी थी। इस अवसर पर राज के मित्रों ने कहकहे भी लगाए थे और तरह-तरह के तोहफे भी दिए थे किन्तु इनमें से शायद ही किसी ने डॉली की विवशता और पीड़ा को समझा हो।

संध्या होते-होते राज के मित्र एवं शिवानी की सहेलियां विदा हो गईं। तभी शिवानी ने कमरे में आकर एक डिब्बा डॉली के हाथों में थमा दिया और कहा- 'भाभी! यह तोहफा मम्मी की ओर से।'

डॉली ने कुछ न पूछा। केवल प्रश्नवाचक नजरों से डिब्बे को देखती रही। शिवानी फिर बोली 'अपने अंतिम क्षणों में मम्मी ने यह डिब्बा मुझे दिया था। कहा था-राज दूसरा विवाह करे तो यह जेवर बहू को दे देना। वैसे तो इन जेवरों पर ज्योति भाभी का ही अधिकार था, किन्तु क्योंकि भैया ने प्रेम विवाह किया था और ज्योति का घर की बहू बनना उन्हें बिलकुल पसंद न था अतः यह जेवर ज्योति को न मिल पाए थे किन्तु आज इन पर ज्योति का नहीं तुम्हारा अधिकार है। संभालकर रखना।' डॉली ने फिर भी कुछ न कहा किन्तु जेवरों का डिब्बा देखकर एकाएक एक विचार उसके मस्तिष्क में कौंध गया। उसने सोचा, यदि उसे राज से कुछ न मिला तो वह इन जेवरों को बेचकर जय का मुकदमा लड़ लेगी। तभी शिवानी ने उसके हाथों से डिब्बा लेकर मेज पर रखा और खोल दिया।

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डॉली की आंखें चुंधिया गईं। डिब्बे के अंदर पुराने ढंग के कई जेवर जगमगा रहे थे।

'अच्छे हैं न भाभी?' शिवानी ने पूछा।

'शिवा!' डॉली बोली।

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'तू मेरा नाम नहीं ले सकती क्या?'

'ऊंहु! अब यह सब ठीक नहीं। अब तुम लक्ष्मी हो इस घर की।'

'लेकिन तेरे लिए तो...।'

'समय के साथ रिश्तों का बदलना जरूरी होता है।' इतना कहकर शिवानी ने डिब्बा बंद कर दिया और बोली- 'अब चलूं। तुम्हारा कमरा भी ठीक करना है। नहीं तो कहेगी कि शिवा ने मेरे लिए कुछ न किया और हां एक बात और सुन लो। अभी कुछ समय तक तुम घर के किसी भी काम को हाथ न लगाओगी।'

'क्यों?'

'यह हमारे वंश की परंपरा है। ठीक! अब मैं चलती हूं।' कहते हुए शिवानी ने डॉली के कपोल का एक चुंबन लिया और हंसते हुए कमरे से बाहर चली गई।

डॉली कुछ क्षणों तक तो बाहर की दिशा में देखती रही और फिर उसकी नजरें सामने रखे डिब्बे पर जम गईं। डॉली के विचार में जेवरों की कीमत पचास हजार रुपए से कम न होगी। सोचते हुए उसने डिब्बे की ओर हाथ बढ़ाया किन्तु तभी शिवानी ने अंदर प्रवेश किया और उसे आते देखकर डॉली ने शीघ्रता से हाथ पीछे खींच लिया।

शिवानी के हाथ में एक लिफाफा था। समीप आकर उसने लिफाफा डॉली को थमाया और बोली- 'तुम्हारा यह तोहफा तो रह ही गया भाभी!

' 'क्या है इसमें?'

'वे रुपए जो भैया के मित्रों ने दिए हैं। ढाई हजार होंगे।' डॉली को लिफाफा पाकर खुशी हुई। उसे याद आया, कपूर साहब ने उस फीस के रूप में दो हजार रुपए मांगे थे। डॉली ने सोचा 'इसमें से दो हजार वह कपूर साहब को दे देगी और शेष अन्य किसी काम आ जाएंगे।'

'कमाल है भाभी! तुम तो न जाने किन सोचों में गुम हो गईं।' एकाएक शिवानी ने कहा और डॉली पत्ते की भांति कांप गई। चेहरे पर ऐसे भाव फैल गए जैसे उसे चोरी करते पकड़ लिया गया हो।

'भाभी!' शिवानी फिर बोली।

'खाना तो अभी खाएंगी न?'

'नहीं शिवा! मन नहीं है।'

'मन को क्या हुआ?'

'यह तो वही जाने।'

तभी राज ने शिवानी को पुकारा और उसे बाहर जाना पड़ा। डॉली हाथ में थमे लिफाफे को देखती रही।

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