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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

शिवानी ने डॉली के कमरे को अपने हाथों से सजाया था। कमरे में कई स्थानों पर ताजा फूलों के गुलदस्ते रखे थे और बिस्तर पर धनिया तथा चमेली की कलियां मुस्कुरा रही थीं।

किन्तु डॉली का ध्यान इस सबकी ओर न था। सुर्ख जोड़े में लिपटी वह अपनी ही किन्हीं सोचों में गुम खिड़की से बाहर देख रही थी। आकाश में चांद न था। स्याह अंधेरी रात थी और डॉली इस अंधकार से अपने जीवन की तुलना कर रही थी। आज तक अंधेरों में ही तो जीयी थी वह। कभी कोई खुशी न देखी-कभी कोई उजाला न देखा। उन अंधेरों से घबराकर वह रामगढ़ से निकली तो अंधकार के सायों ने फिर भी साथ न छोड़ा। जय के मिल जाने से एक खुशी मिली थी-उसके मन में आशाओं की किरण चमकी थी। सोचा था जय उसके जीवन को उजालों से भर देगा किन्तु फिर वही हुआ।

आशाओं ने सिसक-सिसककर दम तोड़ दिया और उजाले की किरणें फिर उसी अंधकार में हो गईं। जिंदगी ने फिर करवट बदली।

दुर्भाग्य ने उसे एक बार फिर छला और उसे अपनी तमाम आशाओं को कुचलकर राज से विवाह करना पड़ा। सच तो यह था कि वह विवशताओं एवं परिस्थितियों के ऐसे चक्रव्यूह में फंस गई थी जिससे निकलने का अन्य कोई मार्ग न था।

जय को बचाना आवश्यक था उसके लिए। इसलिए नहीं कि वह उसे मन-ही-मन चाहने लगी थी। इसलिए नहीं कि वह उसके जीवन का सबसे पहला प्यार था, बल्कि इसलिए क्योंकि जय ने उसकी आबरू बचाई थी। इसलिए क्योंकि जय ने सिर्फ और सिर्फ उसे बचाने के लिए अपने पिता से झगड़ा किया था और जेल चला गया था।

डॉली यह भी सोच रही थी कि भले ही उसने केवल जय को बचाने के लिए ही राज से विवाह किया था किन्तु ऐसा करके उसने जय के साथ विश्वासघात भी किया था।

तभी उसकी विचारधारा भंग हुई। उसने देखा-व्हील चेयर के पहिए घुमाते हुए राज ने अंदर प्रवेश किया। राज को सहारा देने के लिए डॉली को बिस्तर से उतरना पड़ा। उसने आगे बढ़कर द्वार बंद किया और राज को सहारा देकर बिस्तर पर बैठा दिया। राज ने बैठते ही डॉली का हाथ अपने हाथ में ले लिया और बोला- 'एक बात पूछू?'

'पूछिए।'

'कैसा लगा यह सब?'

'क्या?'

'यह विवाह। तुम्हारा संयोगवश यहां आना और विवाह बंधन में बंध जाना।'

'यह संयोग न था।'

'और?'

'कुछ परिस्थितियां और कुछ मेरी विवशताएं।'

'विवशताएं क्यों?'

'जीवन का सफर अकेले न कटता।'

...

'ओह!' राज को डॉली के इस उत्तर से आघात-सा लगा। उसने डॉली का हाथ छोड़ दिया और बोला- 'किन्तु मेरी चाहत-मेरा प्रेम?'

'यह आपकी भावनाएं थीं-मेरी नहीं।'

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'तो क्या मैं यह समझू कि तुम्हारी कोई इच्छा न थी?'

'जो बीत चुका है-आप उसे क्यों दोहरा रहे हैं।' डॉली ने कहा। फिर एक पल रुककर वह बोली- 'और वैसे भी संसार में प्रत्येक दिन इतनी शादियां होती हैं-क्या सभी शादियां लड़के-लड़की की इच्छा से होती हैं? क्या यह आवश्यक होता है कि विवाह से पूर्व एक-दूसरे को पसंद करते हों अथवा चाहते हों?'

'यह तो है।' राज बोला- 'फिर भी जिससे विवाह का बंधन बांधा जाए, उसके हृदय में अपने साथी के लिए प्रेम की भावना न हो, यह भी तो ठीक नहीं। खैर छोड़ो! फिलहाल तो सोचने वाली बात यह है कि हमने अग्नि को साक्षी मानकर एक-दूसरे को जीवनसाथी के रूप में स्वीकार किया है, आज हमारे मिलन की पहली रात है।'

डॉली मौन चेहरा झुकाए रही।

'और।' राज फिर बोला- 'आज की इस रात हमें यह वायदा करना चाहिए कि हम एक-दूसरे के प्रति ईमानदार बने रहेंगे।'

डॉली ने पूछा- 'इस संबंध में बेईमानी क्या हो सकती है?'

राज को इस प्रश्न का उत्तर न सूझ सका। साथ ही उसे यह भी अनुभव हुआ कि उसे डॉली से ऐसी बात न कहनी चाहिए थी। अतः बात बदलकर वह बोला- 'नहीं, मेरा मतलब था कि हम-दूसरे को जीवन भर यूं ही चाहते रहेंगे। वैसे मुझे तुम पर पूरा भरोसा है।' इतना कहकर उसने डॉली को अपनी ओर खींच लिया और बोला- 'क्या सोच रही हो?'

'कुछ भी तो नहीं।'

'वैसे एक बात कहूं?'

'वह क्या?'

'तुम्हारे आने से मेरा यह घर उजालों से भर गया है। यों लगता है मानो आकाश का चांद हमारे आंगन में उतर आया हो।'

'पहले क्या था?'

'घोर अंधकार, निराशा की बदलियां और पीड़ाएं।' राज ने कहा। इसके पश्चात डॉली के कपोलों को अपनी हथेलियों में लेकर वह बोला- 'सच कहता हूं-जीना कठिन हो गया था मेरे लिए। इतनी पीड़ाएं थीं कि हर पल बेचैनी बनी रहती और ऊपर से वह अतीत जब भी अवसर मिलता वार कर बैठता।'

'ज्योति की वजह से?' डॉली बोली।

'हां, उसी की वजह से। बहुत चाहता था मैं उसे। उसकी स्मृतियां मेरे हृदय में इतने गहरे तक समा गई थीं कि लाख प्रयास करने पर भी उन्हें निकाल न सका।'
 
'फिर चली क्यों गई वह?'

'विचारों में असमानता आ गई थी। मुझे सादगी पसंद थी और वह किसी पंछी की भांति आकाश में उड़ना चाहती थी। प्रतिदिन शॉपिंग, सिनेमा और क्लब इन सब बातों के कारण दूरी बढ़ती गई और फिर एक दिन वह आया जब वह मुझसे हमेशा के लिए अलग हो गई।'

'विवाह कर लिया होगा?'

'शायद।'

'और आपका बेटा?'

'उसे भी ले गई। खैर! यह तो बीती हुई कहानी है। दोहराने से कोई लाभ नहीं। बीती हुई राहों को भूल जाना ही ठीक रहता है।' इतना कहकर राज लेट गया और डॉली को बाहों में भरकर बोला- 'आओ देखें कि यह रात हमारे लिए क्या लेकर आई है।' कहते हुए राज ने अपने होंठ डॉली के होंठों से सटा दिए। डॉली ने घबराकर आंखें मूंद लीं। यों लगा मानो वह विवशताओं के कुहरे में फंस गई हो।

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फिर कई दिन बीत गए। राज तो सुबह ही अपने ऑफिस चला जाता था किन्तु क्योंकि शिवानी घर ही रहती थी-अंतत: डॉली को घर से बाहर जाने का अवसर न मिला।

किन्तु एक सप्ताह बाद वह अवसर उसे मिल गया। शिवानी को अपनी सहेली की बर्थडे पार्टी में जाना था। पार्टी दिन में थी। अत: वह सुबह ही तैयार हुई और चली गई। डॉली को उसके जाने से प्रसन्नता हुई। अब उसके पास कई घंटों का समय था। इतने समय में वह कपूर साहब एवं जय दोनों से मिल सकती थी। राज को भी पांच बजे के बाद ही लौटना था। अतः वह शीघ्रता से तैयार हुई और एक ऑटोरिक्शा में बैठकर कोर्ट आ गई। कोर्ट आकर वह कपूर साहब से मिली और उसने पर्स से निकालकर दो हजार के नोट उनके सामने रख दिए।

'यह?' कपूर साहब ने उससे पूछा।

'आपकी फीस।'

'अच्छा-अच्छा।'

'अंकल!'

'अब आप बिलकुल चिंता न करें। मैं कल ही जय से मिलूंगा और पूरी फाइल देख लूंगा।'

'अंकल! मेरा मतलब था कि वह बरी तो हो जाएंगे?'

'बिलकुल हो जाएंगे डॉली जी! आप चिंता न करें।'

'थॅंक अंकल!' डॉली ने कहा और इसके उपरांत वह जब कपूर साहब के ऑफिस से बाहर निकली तो उसे यों अनुभव हुआ मानो उसके हृदय से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो।'

अब उसे जय से मिलना था। लगभग एक घंटे पश्चात वह जेल पहुंची।

मुलाकात वाले कक्ष में खड़े जय की आंखों में आज भी निराशा के भाव थे। डॉली ने उससे पूछा- 'कैसे हो जय?'

'अभी तो जिंदा हूं डॉली!' जय ने निराशा से कहा किन्तु एकाएक उसकी नजर डॉली की मांग में भरे सिंदूर और ललाट पर चमकती बिंदी पर पड़ी और वह चौंककर बोला- 'लेकिन-लेकिन यह सब...।'

'यह सब क्या?'

'मेरा मतलब है तुम्हारी मांग में सिंदूर। माथे पर बिंदिया और हाथों में कंगन?'

'ओह!' डॉली कांप-सी गई। इस ओर तो उसका ध्यान ही न गया था। उसने तो सोचा भी न था कि उसकी मांग के सूिंदर को देखकर जय के मन में शंकाओं का तूफान चीख सकता है किन्तु अगले ही क्षण उसे एक बात सूझ गई और वह बोली- 'यह सब तुम्हारा ही है जय! तुम्हारे ही है।'

'मेरे लिए?'

'हां, तुम्हारे लिए ही। यह बिंदिया, यह सिंदूर और कंगन।'

'लेकिन तुमने तो मुझसे...?'

'विवाह कर लिया है जय!' डॉली ने फिर झूठ का सहारा लिया और कहा- 'तुम्हें मन-ही-मन अपना देवता माना और विवाह कर लिया। सिंदूर भर लिया तुम्हारे नाम का। माथे पर बिंदिया सजाई और तुम्हारी प्रीत के कंगन भी पहन लिए।
 
'द-डॉली!' जय की आवाज कांप गई।

डॉली कहती रही- 'कुंआरी रहकर जीना कठिन हो गया था मेरे लिए। जहां काम करती हूं-वहां के लोग भी विचित्र-सी नजरों से देखते और जब संसार की कामुक नजरें मुझसे सहन न हुईं तो मैंने अपनी मांग में सिंदूर भरा-मस्तक पर बिंदी लगाई और स्वयं को शादीशुदा घोषित कर दिया।'

यह सुनकर जय पीड़ा से चीख उठा 'यह-यह तुमने क्या किया डॉली! तुम जानती हो मेरे जीवन का कोई भरोसा नहीं। मैं इस चारदीवारी से बाहर भी आ सकूँगा–यह भी कोई निश्चित नहीं। फिर तुमने मेरे नाम का सिंदूर क्यों सजा लिया डॉली? मेरे नाम के कंगन क्यों पहन लिए?'

'य-ये कंगन तो नकली हैं जय!'

'सिंदूर तो असली है। यह बिंदिया तो असली है डॉली!'

'जय!' डॉली इससे अधिक न कह सकी और सिसक उठी। जय ने मजबूरी से सलाखें थाम लीं। तड़पकर बोला- 'डॉली! तुम्हारे मन की दुर्बलता मैं समझता हूं लेकिन फिर भी जो कुछ तुमने किया है यह मेरे हृदय के लिए बहुत बड़ा बोझ है। बहुत बड़ा उपकार है तुम्हारा मुझ पर और यह एक ऐसा कर्ज है जिसे मैं इस जन्म में कदापि न उतार पाऊंगा। शायद जीना कठिन हो जाएगा मेरे लिए। मरना भी चाहा तो मर भी न पाऊंगा। जीवन एवं मृत्यु के बीच पिसकर रह जाएंगी मेरी समस्त भावनाएं।'

'जय!' डॉली ने आंसू पोंछ लिए और बातों का विषय बदलकर बोली- 'मैंने तुम्हारा मुकदमा कपूर साहब को सौंप दिया है। फीस के कुछ रुपए भी उन्हें दे दिए हैं। उनका कहना है कि तुम साफ छूट जाओगे-तुम्हें कुछ न होगा।'

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'डॉली-डॉली! तुम वास्तव में पागल हो। यों लगता है, मानो तुम्हें मेरे अतिरिक्त अन्य किसी भी बात का ध्यान नहीं। न जाने फीस के रुपए किस प्रकार जुटाए होंगे।'

'अगले सप्ताह मुकदमे की तारीख है।' डॉली ने जय की बात पर ध्यान न देकर अपनी बात कही- 'और मैं सिर्फ यह कहना चाहती हूं कि निराश मत होना। हार मत मानना जिंदगी से।'

'अब तो जीतना ही पड़ेगा डॉली! अपने लिए न सही किन्तु तुम्हारे लिए तो ईश्वर से कहना ही पड़ेगा कि वह मुझे जिंदा रखे। क्या करूं-तुमने रिश्ता ही ऐसा जोड़ा है जो मरने के पश्चात ही टूट सकता है।'

डॉली ने कुछ न कहा।

उसी समय मुलाकात का समय समाप्त हो गया और जय पीछे हट गया। डॉली ने देखा-उसकी आंखों में आंसुओं की मोटी-मोटी बूंदें झिलमिला रही थीं।

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डॉली अपनी सोचों की धुंध में कुछ इस प्रकार फंसी कि उसे घर पहुंचने का पता ही न चला।

उसकी विचारधारा तो तब भंग हुई जब ऑटोरिक्शा चालक ने उससे कहा- 'मेमसाहब! डी-एक सौ बारह आ चुका है।' और इसके पश्चात ऑटोरिक्शा रुक गया।

रिक्शा रुकते ही डॉली ने नजरें उठाकर दाईं ओर देखा। घर आ चुका था किन्तु अगले ही क्षण वह सिर से पांव तक कांप गई और उसके चेहरे पर ऐसे भाव फैल गए जैसे किसी ने उसे रंगे हाथों पकड़ा हो। एक ऑटोरिक्शा पहले से गेट के । सामने खड़ा था और यह वही ऑटोरिक्शा था जो राज को ऑफिस से घर लाता था। ऑटोरिक्शा बाहर इसलिए था क्योंकि वह गेट का ताला लगाकर गई थी। डॉली समझ न पा रही थी कि राज आज तीन बजे ही क्यों लौट आया था जबकि वह पांच के पश्चात ही घर लौटता था।

तभी चालक ने उसे फिर संबोधित किया 'मेम साहब!'

'आं हां।'

'बीस रुपए।'

चालक ने कहा तो डॉली ने शीघ्रता से बीस रुपए का एक नोट उसकी हथेली पर रखा और बाहर आ गई। आगे बढ़कर उसने देखा-राज । ऑटोरिक्शा में बैठा था और उसका चालक बाहर खड़ा हुआ सिगरेट फूंक रहा था किन्तु डॉली ने ऐसा जाहिर नहीं किया कि उसने राज को देखा हो। उसने तुरंत गेट खोला और चलकर कमरे में आ गई। घबराहट एवं बेचैनी के भाव उसकी आंखों से अभी भी झांक रहे थे।

कुछ देर पश्चात राज भी व्हील चेयर के पहिए घुमाते हुए कमरे में आ गया और डॉली के समीप पहुंचकर बोला- 'हैलो डॉली!'

'ओह आप!' डॉली ने चौंकने का अभिनय किया-उठकर बोली- 'आप कब आए?'

'ठीक दो बजकर तीस मिनट पर अर्थात् ढाई बजे।'

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'ऑफिस में काम न होगा?'

'काम तो था किन्तु...।'

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'किन्तु?'

'काम में मन न लगा।'

'क्यों?' डॉली ने पूछा और दर्पण के सामने आकर अपने बाल संवारने लगी।

राज बोला- 'अपनी प्यारी-प्यारी दुल्हन की वजह से किन्तु दुर्भाग्य हमारा, घर आए तो...।'

'मैं बाजार चली गई थी।'

'शॉपिंग?'

'नहीं बस यूं ही। अकेली थी-घर में मन न लगा।'

'हमसे कह दिया होता।'

'क्या?'

'हम आज ऑफिस ही न जाते और दिन-भर तुम्हारा मन बहलाते।'

'ऊंडं! यह ठीक न था।' डॉली ने कहा। इसके पश्चात उसने ब्रुश रख दिया और मुड़कर राज से बोली- 'चाय तो लेंगे।'

'चाय नहीं।'

'और?'

'पहले करीब आओ।'

डॉली समीप आ गई। राज ने उसके गले में बांहें डाल दी और उसे अपने ऊपर झुकाते हुए वह शरारत से बोला- 'हमें चाहिए आपके इन होंठों से भरा यह सुर्ख अमृत।'

'शिवा आती होगी।'

'शिवा जिस पार्टी में गई है-वह संध्या से पहले समाप्त न होगी।'

'तो फिर दो मिनट ठहरिए।'

'क्यों?'

'चूल्हे पर चाय का पानी रख दूं।'

'यूं कहिए न कि आप बचना चाहती हैं?'

'बचने का प्रयास भी किया तो जाऊंगी कहां? जल की मीन को तो जल में ही रहना पड़ता है।'
 
'जल में रहने में तो कोई बुराई नहीं-किन्तु ज्योति की भांति आकाश में न उड़ना।'

'आप ऐसा क्यों सोचते हैं?'

'जिसने अपने जीवन में पीड़ाओं के अतिरिक्त और कुछ न देखा हो-उसे पीड़ा की कल्पना से ही भय लगता है।'

'विश्वास कीजिए-आपको मेरी ओर से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं। वैसे भी मैं ज्योति नहीं बल्कि डॉली हूं।' इतना कहकर डॉली ने स्वयं को छुड़ाया और चलकर किचन में आ गई। और लगभग पंद्रह मिनट पश्चात जब वह चाय की ट्रे लेकर कमरे में पहुंची तो उसे यह देखकर प्रसन्नता हुई कि शिवानी आ चुकी थी। डॉली ने ट्रे मेज पर रख दी तो शिवानी उससे बोली 'आज तो पार्टी में बहुत मजा आया भाभी! जानती हो क्या हुआ?'

'क्या हुआ?'

'खाने-पीने के पश्चात जब मनोरंजन की बातें चली तो तय हुआ कि वंदना को एक भजन । सुनाना पड़ेगा। मगर भजन सुनाया वंदना के भाई दीपक ने और वह भी यों नहीं वंदना की साड़ी पहनकर, किन्तु तभी अंकल आ गए।'

'रंग में भंग हो गया होगा?'

"अरे नहीं। वह न जाने कहां से एक ढोलक उठा लाए और फिर जो गाना-बजाना हुआ तो दो घंटों तक चला।' कहते हुए शिवानी हंस पड़ी।

'ठीक ही तो हुआ।' डॉली बोली- 'बच्चों की खुशी में बड़ों को भी शामिल होना चाहिए। चाय तो लेगी?'

'ना बाबा! मैं तो इतना खा-पी चुकी हूं कि अब तो दो दिन तक भी कुछ न खाऊंगी।' शिवानी ने कुर्सी की पुश्त से सटकर कहा और फिर मौन बैठे राज से बोली- 'भैया!' 'आपको क्या हुआ?'

'कुछ भी तो नहीं।'

'फिर यह मौन?'

'अपने ही काम के विषय में सोच रहा था।'

'अधिक सोचना सेहत के लिए हानिकारक होता है। आपको एक चुटकुला सुनाऊं?'

'नहीं इस समय नहीं।' राज ने कहा और निकट खडी डॉली को कनखियों से देखते हुए प्याला उठा लिया।

डॉली ने उसे अपनी ओर देखते पाया तो वह शिवानी के निकट बैठ गई और प्याला उठाकर चाय की चुस्कियां लेने लगी। उसे यह समझते देर न लगी कि राज केवल उसी के विषय में सोच रहा था।

उन दोनों को मौन देखकर शिवानी वहां से चली गई।

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रात के समय एक ही बिस्तर पर रहते हुए भी राज एवं डॉली के बीच एक दूरी-सी बनी रहती। न डॉली ने कोई विशेष बात की और न ही राज ने। लगभग बारह बजे तक दोनों ही बेचैनी से करवट बदलते रहते और फिर सो जाते। यह सिलसिला पिछले कई दिनों से चल रहा था।

आज भी सुबह उठकर राज जल्दी तैयार हो गया। यूं तैयार तो डॉली को भी होना था जय के मुकदमे की तारीख थी, किन्तु वह समझ न पा रही थी कि शिवानी के रहते घर से किस प्रकार निकले। जय के संबंध में वह किसी से कुछ बताना न चाहती थी।

किचन में नाश्ता तैयार करते समय वह इसी समस्या पर विचार करती रही। अंत में उसने कुछ सोचा और फिर जब वह राज के पास नाश्ते की ट्रे लेकर पहुंची तो वह राज से बोली- 'एक बात कहनी थी आपसे।'

'वह क्या ?"

'क्या आपको यह दूरी अच्छी लगती है?'

'कौन-सी?'

'जो आपके और मेरे बीच बन रही है।'

'इस दूरी का कारण तुम जानती हो।'

'ठीक से तो नहीं जानती। मेरी समझ में सिर्फ दो बातें आई हैं। पहली तो यह कि उस दिन मैं आपसे पूछे बगैर घूमने चली गई थी और दूसरी यह कि आप मुझसे जो कुछ चाहते हैं-मेरी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं।'

'तुम जानती हो-किसी भी पत्नी का अपने पति के प्रति क्या कर्तव्य होता है?' राज ने पूछा।

डॉली बोली- 'मैं अपने कर्तव्य को भूली नहीं हूं, किन्तु पति का भी तो अपनी पत्नी के प्रति कोई कर्तव्य होता है।'

'क्या कर्तव्य होता है?'

'उसकी विवशताओं एवं भावनाओं को समझना। जबकि इन दोनों बातों से यों लगता है कि आपको मेरी भावनाओं की कोई चिंता नहीं। मैं थोड़ी देर के लिए बाहर चली गई तो आप रूठकर बैठ गए। मैंने सेक्स के प्रति अनिच्छा प्रकट की-तब आपको बुरा लगा। मैं आपसे पूछती हूं-क्या सेक्स ही जीवन है? क्या पति-पत्नी का संबंध केवल सेक्स पर ही आधारित होता है? क्या दोनों के बीच इसके अतिरिक्त अन्य कोई रिश्ता नहीं होता?'

'अच्छे दाम्पत्य जीवन के लिए एक-दूसरे की इच्छाओं को समझना और उनसे समझौता करना आवश्यक होता है।'

'क्षमा करें-मेरी सेक्स में कोई रुचि नहीं।'

राज को इससे आघात-सा लगा। उसने प्लेट सरकाई और खामोशी से नाश्ता करने लगा। डॉली खड़ी रही। कुछ क्षणोंपरांत बोली 'मुझे कुछ समय के लिए बाहर जाना है।'

'संध्या तक तो लौट आओगी?'

'उससे पहले ही।'

'ठीक है।'

'आप यह न पूछेगे कि मुझे कहां जाना है?'

'यह पूछना आवश्यक नहीं।' राज ने शुष्क स्वर में कहा। डॉली फिर भी खड़ी रही।

राज फिर बोला- 'और कुछ कहना है?'

'नहीं।'

'बाहर जाने के लिए कुछ पैसों की जरूरत होगी?'

'नहीं।'

'आवश्यकता हो तो संकोच मत करना। तुम इस घर की बहू हो और इस घर में तुम्हारा उतना ही अधिकार है-जितना मेरा है। वैसे भी सेफ की चाबी तो मेज की दराज में ही रहती है।'

डॉली ने कुछ न कहा।

'और हां।' राज फिर बोला- 'शिवानी से पूछ लेना कि वह तो कहीं न जाएगी।'

'जी।' डॉली ने कहा और दर्पण के सामने आ गई। जानती थी-राज ने यह सब बेमन से कहा था। उसके शब्दों में नाराजगी की झलक थी। डॉली के मन में आया कि रुक जाए, न जाए कहीं किन्तु विवशता यह थी कि आज जय के मुकदमे का पहला दिन था और वहां उसकी मौजूदगी जरूरी थी।

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जय के मुकदमे का दिन।

अदालत-कक्ष दर्शकों से खचाखच भरा था। इन दर्शकों में डॉली भी थी और रामगढ़ का चौधरी भी। डॉली अगली पंक्ति में बैठी जय को एकटक दृष्टि से देख रही थी और जय विटनेस बॉक्स में चेहरा झुकाए खड़ा था। उसके चेहरे पर आज पहले से भी अधिक मैल की परतें थीं। शेव बढ़ी हुई थी और सिर के बाल झाड़-झंकाड़ की भांति नजर आते थे।

उचित समय पर अदालत की कार्यवाही शुरू हुई।

सरकारी वकील मिस्टर हेगड़े ने उठकर एक नजर विटनेस बॉक्स में खड़े जय पर डाली, दर्शकों को देखा और इसके पश्चात जज महोदय को संबोधित करते हुए वह बोला- 'मीलॉर्ड! हमारे धर्मग्रंथों में माता-पिता का स्थान देवताओं से भी ऊपर माना गया है और यही हमारे देश की संस्कृति भी है। इतिहास गवाह है कि इस देश में ऐसे अनेक पितृभक्त हुए हैं जिन्होंने पितृभक्ति के लिए न केवल अपने सुखों को तिलांजलि दे डाली-बल्कि अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। और होना भी ऐसा ही चाहिए मीलॉर्ड! माता-पिता क्या कुछ नहीं करते अपने बच्चों के लिए? इसीलिए तो कहा जाता है कि माता-पिता बच्चों को अपना खून पिला-पिलाकर बड़ा करते हैं।

'किन्तु मीलॉर्ड! वही औलाद, वही बेटा जब स्वार्थ में अंधा होकर अपने पिता का खून कर डालता है तो क्या बीतती है उस पिता के हृदय पर, कितनी पीड़ा होती है हमारी संस्कृति को और वो समाज कितने आंसू बहाता है जिसके बीच में यह सब होता है। सच पूछिए तो यह बात समस्त मानव जाति के लिए लज्जा की बात होती है।

'मीलॉर्ड! विटनेस बॉक्स में खड़े मुलजिम जय ने यही किया है। यों कानून की दृष्टि में तो खून सिर्फ खून ही होता है और कानून मुजरिम को मौत की सजा भी देता है किन्तु मीलॉर्ड! मुलजिम जय ने सिर्फ खून ही नहीं किया-उसने खून के साथ-साथ हमारी प्राचीन संस्कृति एवं सभ्यता का भी अपमान किया है। उसने खून के साथ-साथ हमारी नई पीढ़ी को भी गुमराह करने की कोशिश की है और हमारी पुरानी मान्यताओं को भी बदला है। यह-यह वो शख्स है मीलॉर्ड! जिसने अपने ही पिता को गोलियों से छलनी करके उनके महानतम त्याग को ठोकर मारी है।

'मीलॉर्ड! ठाकुर कृपाल सिंह रामगढ़ के जमींदार थे और उनकी एक ही औलाद थी। उन्होंने एक अच्छे पिता की भांति अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया और उसे कारोबार के लिए भी लाखों रुपए दिए किन्तु मुलजिम जय उस रुपए को बिजनेस में न लगाकर बुरी आदतों पर खर्च करता रहा। वह जब भी रामगढ़ आता अपने पिता से हर बार रुपयों की मांग करता और इस बात को लेकर कभी-कभी पिता-पुत्र के बीच विवाद भी हो जाता।

'मीलॉर्ड! सोलह अगस्त की सुबह मुलजिम जय जब रुद्रपुर से लौटा तो उस समय जमींदार साहब भी यहीं थे। मुलजिम जय ने उनसे पचार हजार रुपए मांगे और जमींदार कृपाल सिंह ने यह कहकर अपनी असमर्थता व्यक्त की कि वे फसल पकने से पूर्व इतनी रकम का प्रबंध न कर पाएंगे। मुलजिम जय इस जिद्द पर अड़ा रहा कि रुपयों का प्रबंध उन्हें इसी समय करना पड़ेगा। इस बात को लेकर विवाद बढ़ गया और मुलजिम जय ने अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर से अपने पिता ठाकुर कृपाल सिंह का खून कर दिया।

'अतः मीलॉर्ड! मैं अदालत से प्रार्थना करूंगा कि वह मुलजिम जय को खून का अपराधी बल्कि अपने ही पिता के खून का अपराधी मानते हुए उसे मौत की सजा सुनाए। थॅंक मीलॉर्ड!' इतना कहकर सरकारी वकील बैठ गया।' अदालत में कुछ क्षणों तक सन्नाटा रहा।

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फिर इस सन्नाटे को जज महोदय की आवाज ने भंग किया। उन्होंने जय से पूछा- 'मुलजिम जय! तुम्हें अपनी सफाई में कुछ कहना है?'

'हुजूर!' जय ने चेहरा उठाकर एक बार डॉली को देखा और इसके उपरांत जज साहब को देखते हुए वह बोला- 'सबसे पहले तो मुझे यह कहना है कि इस अदालत को अदालत न होकर एक थियेटर होना चाहिए था। थियेटर जिसकी स्टेज पर लोगों के मनोरंजन के लिए तरह-तरह की कहानियां सुनाई जाती हैं और तरह-तरह के नाटक दिखाए जाते हैं।'

'तुम कहना क्या चाहते हो?'

'हुजूर! मैं यह कहना चाहता हूं कि वकील साहब ने मेरे संबंध में जो कुछ भी कहा है वह महज एक कहानी है। ऐसी कहानी जिसका सच्चाई से कोई रिश्ता नहीं है। कारण यह है कि हुजूर! न तो मैंने आज तक कोई बुरा शौक पाला है और न कभी मेरा बिजनेस घाटे में रहा है। पापा ने मुझे बिजनेस के लिए एक लाख रुपए दिए थे और ईश्वर गवाह है कि उसके पश्चात मैंने उनसे कभी एक पैसे की भी मांग नहीं की। मांग इसलिए नहीं कि क्यों कि मेरा बिजनेस हमेशा चला है। कहने का अभिप्राय यह है कि मेरे एवं पापा के बीच कभी कोई विवाद नहीं हुआ। मैं उनकी संपत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी था-अतः पापा के जीते जी और उनके मरणोपरांत भी उनका सब कुछ मेरा ही था। अतः यह आरोप गलत है कि मेरा उनसे कभी विवाद हुआ था।'

'मुलजिम जय! क्या तुम अपने जुर्म का इकबाल करते हो?' 'नहीं हुजूर!' जय ने दृढ़ता से कहा- 'यूं मैं मानता हूं कि दुनिया की कोई भी अदालत सौगंधों पर विश्वास नहीं करती-किन्तु मैं ईश्वर को साक्षी मानकर अदालत को यह विश्वास दिलाना चाहता हूं कि पापा का खून मैंने नहीं किया है। मैं यह भी स्वीकार करता हूं कि मैंने पुलिस को जो बयान दिया था-वह झूठा था। यदि मैं ऐसा न करता तो मुझे पुलिस द्वारा टॉर्चर होना पड़ता किन्तु हां, यह बिलकुल सच है कि पापा का खून मेरी आंखों के सामने हुआ है। परंतु यह मेरा दुर्भाग्य रहा कि मैं कातिल को न देख सका। मैं अदालत से प्रार्थना करता हूं कि वह पूरी उदारता से मेरे शब्दों पर ध्यान दे। थॅंक-थॅंक हुजूर!' कहकर जय ने अपनी बात समाप्त की।

उसी समय अदालत की आज की कार्यवाही समाप्त होने की घोषणा कर दी गई।

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कांस्टेबल जय को लिए हुए जेल की गाड़ी की ओर बढ़े। डॉली ने जय से मिलना चाहा, किन्तु इससे पूर्व कि वह जय से मिल पाती, न जाने किस ओर से आकर चौधरी ने उसका मार्ग रोक लिया।

डॉली को रुकना पड़ा। चौधरी बोला- 'पहचाना डॉली रानी?'

'नहीं।' डॉली ने घृणा से कहा और चेहरा घुमा लिया।

'क्या बात करती है? गांव छोड़कर शहर में आ गई तो क्या इतनी बदल गई कि तू हमें भी नहीं पहचानती?'

'देखिए! मैंने कहा न कि मैं आपको नहीं जानती। रास्ता छोड़िए।'

'वाह री बिल्ली! हमने दूध पिलाया और हमें ही आंखें दिखाने लगी। चल कोई बात नहीं। तू भले ही न पहचानती हो मगर हम तुझे भली प्रकार पहचानते हैं। रही रास्ते की बात-तो तू अच्छी तरह जानती है कि हम रामगढ़ के चौधरी हैं और एक बार जिसका रास्ता रोक लेते हैं उसे हमेशा तक रोके रखते हैं। वह तो अच्छा हुआ कि उस दिन तू हमारे आने से पहले ही उस मकान से चली आई और हमारे हाथों से बच गई। नहीं तो हम...।'

डॉली ने यह सुनकर गुस्से से दांत पीस लिए और बोली- 'चौधरी साहब! न तो मैं इस समय । आपके गांव में हूं और न ही आपसे मेरा कोई रिश्ता है। अतः अच्छा होगा कि आप मुझसे सभ्यता से बात करें।

'करेंगे-वह भी करेंगे।' चौधरी ने अपनी मूंछों पर हाथ फिराया और गर्व से बोला- 'फिलहाल तो हम तुमसे एक बात पूछना चाहते हैं।

'वह क्या?'

'हम जानना चाहते हैं कि तेरा इस संपोलिए से क्या रिश्ता है?'

'कौन संपोलिया?'

'अरे! जमींदार का बेटा जय और कौन? सुना है तू इसके मुकदमे की पैरवी भी कर रही है।'

'यह मेरा व्यक्तिगत मामला है।'

'डॉली की बच्ची! यह मामला तेरा नहीं बल्कि हमारा है। जानती है क्यों? क्योंकि जय हमारे दुश्मन का बेटा है। हालांकि दुश्मन तो अब नहीं रहा–किन्तु हम चाहते हैं कि यह हरामजादा भी इस दुनिया में न रहने पाए।'

'फिर तो जय ने मुझसे ठीक ही कहा था।'

'क्या कहा था?'

'कहा था कि पापा का खून चौधरी ने किया है।'

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चौधरी ने इस पर ठहाका लगाया और कहा 'साली तू क्या सोचती है? तू क्या सोचती है कि जय के ऐसा कहने से हमें फांसी हो जाएगी? ले कह दिया हमने कि जमींदार का खून हमने किया है। हम उस वक्त उसी मकान में मौजूद थे और खिड़की के निकट खड़े पिता-पुत्र के विवाद को सुन रहे थे। हमने अवसर का लाभ उठाया और जमींदार को गोली मार दी।'

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'आप-आप कमीने हैं चौधरी साहब!'

'हरामजादी! हमारा कमीनापन तो तू आगे चलकर देखेगी। फिलहाल तो एक सलाह मान और वो यह कि मुकदमे की पैरवी मत कर। सिर्फ तमाशा देख। यह देख कि कृपाल सिंह का वंश किस ढंग से मिटता है।'

'नहीं।'

'यह तो होकर रहेगा लड़की! दुनिया की कोई भी ताकत जय को मौत के मुंह से नहीं बचा सकेगी। पुलिस के पास ऐसे कई सबूत मौजूद हैं कि जय को फांसी के फंदे में झूलना ही पड़ेगा। इसलिए हमारी सलाह मान और छोड़ दे उस हरामजादे का साथ। नहीं तो उसके साथ-साथ तू भी किसी मुसीबत में फंस जाएगी। तू दीना की भतीजी है-इसलिए हम तुझे अपनी मानकर समझा रहे हैं। वैसे रहती कहां है तू आजकल?'

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'मैंने शादी कर ली है।'

'किससे?'

'यह जानना आपका काम नहीं।'

'खैर! किसी दिन आना रामगढ़।'

'किसलिए?'

'अरे! तुमसे हमारा पुराना रिश्ता है।'

'मैं ऐसे रिश्ते को ठोकर मारती हूं चौधरी दिलावर सिंह!' डॉली ने घृणा से कहा- 'अच्छा होगा कि आप मुझसे भविष्य में मिलने की कोशिश न करें।' इतना कहकर डॉली मुड़ी और चलकर कपूर साहब के ऑफिस में आ गई। कपूर साहब उसे देखते ही बोले- 'जय का बयान बहुत ही अच्छा रहा।

हेगड़े तो उसका बयान सुनकर बगलें झांकने लगा था।'

'अंकल! मैं यह कहने आई हूं कि असली खूनी चौधरी दिलावर सिंह है।'

'क्या मतलब?'

'अभी कुछ क्षणों पूर्व उसने मुझे चेतावनी दी कि मैं जय के मुकदमे की पैरवी न करूं। साथ ही यह भी स्वीकार किया कि जमींदार का खून उसने किया है।'

'अच्छा!'

'चौधरी ने बताया कि जिस समय जय एवं जमींदार साहब के बीच किसी बात पर विवाद चल रहा था उस वक्त वह खिड़की के पीछे खड़ा था। उसने इस अवसर का लाभ उठाया और जमींदार साहब को गोली मार दी।'

'हूं।' कपूर कुछ सोचकर बोले- 'चौधरी की जमींदार साहब से क्या दुश्मनी हो सकती है? आई मीन इस हत्याकांड के पीछे कोई-न-कोई कारण तो अवश्य ही रहा होगा।'

'कारण है अंकल!' डॉली बोली- 'अरे वो यह कि चौधरी एवं जमींदार साहब के बीच पिछले कई वर्षों से मुकदमेबाजी चल रही थी।'

'गुड! अब एक बात बताइए। क्या आप चौधरी के विरुद्ध ऐसा कोई प्रमाण जुटा सकती हैं जिससे सिद्ध हो कि कृपाल सिंह का खून चौधरी ने ही किया है।'

'नहीं अंकल!'

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'देखिए! यदि हमें चौधरी के विरुद्ध एक भी ऐसा सबूत मिल जाता है तो फिर जय के छूटने में कोई संदेह नहीं। मेरी सलाह है कि आपको इस संबंध में किसी प्राइवेट डिटेक्टिव की मदद लेनी चाहिए, किन्तु इसमें खर्च कुछ अधिक हो सकता है।'

'कितना?'

'लगभग बीस हजार।'

'लेकिन इतनी रकम?'

'डॉलीजी! यह खून का मुकदमा है और ऐसे केसों में तो पैसा खर्च होता ही है।'

जी! मैं कोशिश करूंगी।'

'रकम का प्रबंध हो जाए तो बता देना। मैं आपकी बात करा दूंगा।'

'ठीक है अंकल!' डॉली ने कहा और उठकर बाहर आ गई किन्तु उसका मन-मस्तिष्क अब एक अन्य उलझन में फंस चुका था।'

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