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शिवानी ने इस बार डॉली के कंधे पर हाथ रखा और अत्यंत विनम्रता से बोली- ‘मान जाओ न डॉली! भैया को इतना बड़ा दु:ख न दो कि वे उसे सहन ही न करें और घबराकर आत्महत्या कर बैठे। तुम नहीं जानतीं कि वे कितने भावुक हैं और उन्होंने अपने जीवन में कितनी पीड़ाएं सही हैं।'
'पीड़ाएं सहने के लिए ही होती हैं।'
'किन्तु सहन शक्ति की भी एक सीमा होती है। उस सीमा के पश्चात तो पीड़ाएं मौत का कारण बन जाती हैं। देखो, यदि मैंने जाने-अनजाने में तुम्हें कुछ बुरा कह दिया है तो मैं उसके लिए क्षमा याचना करती हूं। मैं यह भी वचन देती हूं कि भविष्य में तुम्हें कुछ नहीं कहूंगी और तुम्हारे कहीं भी जाने पर प्रतिबंध न लगाऊंगी, किन्तु । बस-बस ईश्वर के लिए मेरी इतनी विनती मान लो कि इस घर से नाता न तोड़ो?'
डॉली को कहना पड़ा- 'ठीक है शिवा!'
'अर्थात् तुम...।'
'मैं प्रयास करूंगी कि मेरा इस घर से हमेशा यही रिश्ता बना रहे।'
'थॅंक भाभी-थै क्यू भाभी!' शिवानी ने उल्लासपूर्ण लहजे में कहा और इसके पश्चात वह उठकर तेजी से बाहर चली गई।
डॉली के होंठों पर अब ऐसी मुस्कुराहट थिरक रही थी मानो उसे शिवानी एवं राज पर दया आ रही हो।
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ऑटोरिक्शा से उतरकर राज जब व्हील चेयर पर बैठा तो न जाने क्यों आज उससे व्हील चेयर के पहिए न घूमे। वह तीन-चार कदम चलकर ही यों हांफने लगा-मानो मीलों से चलकर आया हो। तभी न जाने किस ओर से डॉली आई और उसने पीछे से व्हील चेयर को थाम लिया।
राज ने गर्दन न घुमाई। सोचा-शिवानी होगी। वह बड़बड़ाया- 'शिवा! मेरी समझ में नहीं आता कि जब संसार के सभी रिश्ते अंततः टूट ही जाते हैं तो फिर बनते क्यों हैं? किन्तु इसमें रिश्तों का भी क्या दोष? दोष तो हमारा होता है। हम ही कभी-कभी अनजाने बंधनों में बंध जाते हैं। हम ही कभी-कभी बिन समझे किसी को अपना दिल हार बैठते हैं, किन्तु अंत में मिलता क्या है? आंसुओं का सागर-पीड़ाओं का तूफान और पश्चात्ताप की आग; जलते हैं। हमारा हृदय यह सोच-सोचकर फटता है कि हमने किसी को अपना क्यों समझा। हमने किसी से प्रेम का बंधन क्यों बांधा? किन्तु यह भी सच है कि यह सब अपने वश में नहीं होता। जीवन पथ पर कोई मिलता है और एकाएक हम उसके हो जाते हैं। हमें तो पता ही नहीं चल पाता कि कब हम उसके हुए-कब वह हमारा हुआ। वह कम्बख्त तो नैनों के रास्ते हृदय में यूं समाता है कि हम उसे चाहकर भी स्वयं से अलग नहीं कर पाते।'
डॉली सुनती रही। उसके चेहरे पर भावों का तूफान चीखता रहा और वह राज की व्हील चेयर को हौले-हौले आगे बढ़ाती रही।
कुछ क्षणों के मौन के पश्चात राज फिर बोला- 'न जाने कैसे होते हैं वे लोग जो किसी का हृदय तोड़ देते हैं। मैं तो समझता हूं-उनके सीने में हृदय ही नहीं होता। शायद पत्थर होता है। शायद उनका भावनाओं से भी कोई रिश्ता नहीं होता। तुम क्या सोच रही हो?'
'यही।' डॉली को अपने होंठ खोलने पड़े-बोली 'कि मनुष्य को इतना भावुक न होना चाहिए।'
आवाज सुनते ही राज चौंका। उसने शीघ्रता से चेहरा घुमाकर डॉली को देखा और फिर अचरज से बोला- 'तुम!'
'भावुकता ठीक नहीं-हमेशा दु:ख देती है।'
'पर-पर तुम यह कुर्सी-?'
'शिवा कह रही थी-यदि सहारा न मिला तो आप गिर जाएंगे।'
'सहारा किन्तु वह तो टूट चुका है।'
'ऊं अभी नहीं।'
'तो उस दिन?'
'वह एक बात थी जो अनजाने में ही होंठों पर आ गई थी।'
'तो क्या तुमने वो सब हृदय से न कहा था?'
'नहीं।' डॉली बोली- 'परीक्षा हो रही थी आपकी। सोच रही थी सुनकर आप क्या कहते हैं।'
'ओह!' राज के होंठों पर खुशियों भरी मुस्कुराहट फैल गई। उसने डॉली के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और बोला- 'क्या-क्या तुम बिलकुल सच कह रही हो डॉली? क्या यह सच है कि तुम ज्योति की भांति कभी इस घर को छोड़कर न जाओगी?'
'हा।' डॉली ने कहा और राज को लेकर कमरे में आ गई। इसके उपरांत जब वह बाहर जाने लगी तो राज ने उसकी कलाई थामकर कहा 'बैठो न।'
'आपके लिए चाय ले आऊं।'
'ऊंडे-आज चाय नहीं।'
'और?'
'तुम्हारे इन होंठों का शर्बत।'
'इंकार कर दूं तो?'
'मैं यह समझूगा कि अभी तुम्हारा मन साफ नहीं।'
'मन को कौन जान सका है?'
'मनुष्य के हाव-भाव-उसकी बातें। यह सब बता देते हैं कि किसी के मन में क्या है। आओ न।'
'बहुत जिद्दी हैं आप!' डॉली ने कहा और उसने स्वयं ही राज के होंठों को चूम लिया। इसके उपरांत वह अपना हाथ छुड़ाकर बोली- 'क्यों, अब तो विश्वास हो गया आपको?'
'किस बात का?
'यह कि मेरा मन साफ है।'
'हां।'
'अब एक बात पूछू?'
'पूछो।'
'सुना है-आपकी पहली पत्नी ज्योति अब यहीं आ गई है? मेरा मतलब है इसी शहर में।'
'हां।'
'मैंने यह भी सुना है कि वह आपसे कई बार मिल चुकी है।'
'तीन बार।' राज ने उत्तर दिया और मूर्तिमान-सा खिड़की की ओर देखने लगा। उसकी आंखों में अतीत की छाया डोल रही थी।
डॉली ने पूछा- 'किसलिए?' 'उसे सहारा चाहिए।'
'सहारा तो मिला था उसे।'
'हां, किन्तु वह सहारा उससे विधाता ने छीन लिया। ज्योति विधवा हो गई।'
'क्या करती है आजकल?'
'नौकरी।'
'आपका बेटा तो काफी बड़ा हो गया होगा?'
'हां, एक दिन देखा था उसे भी।'
'पीड़ाएं सहने के लिए ही होती हैं।'
'किन्तु सहन शक्ति की भी एक सीमा होती है। उस सीमा के पश्चात तो पीड़ाएं मौत का कारण बन जाती हैं। देखो, यदि मैंने जाने-अनजाने में तुम्हें कुछ बुरा कह दिया है तो मैं उसके लिए क्षमा याचना करती हूं। मैं यह भी वचन देती हूं कि भविष्य में तुम्हें कुछ नहीं कहूंगी और तुम्हारे कहीं भी जाने पर प्रतिबंध न लगाऊंगी, किन्तु । बस-बस ईश्वर के लिए मेरी इतनी विनती मान लो कि इस घर से नाता न तोड़ो?'
डॉली को कहना पड़ा- 'ठीक है शिवा!'
'अर्थात् तुम...।'
'मैं प्रयास करूंगी कि मेरा इस घर से हमेशा यही रिश्ता बना रहे।'
'थॅंक भाभी-थै क्यू भाभी!' शिवानी ने उल्लासपूर्ण लहजे में कहा और इसके पश्चात वह उठकर तेजी से बाहर चली गई।
डॉली के होंठों पर अब ऐसी मुस्कुराहट थिरक रही थी मानो उसे शिवानी एवं राज पर दया आ रही हो।
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ऑटोरिक्शा से उतरकर राज जब व्हील चेयर पर बैठा तो न जाने क्यों आज उससे व्हील चेयर के पहिए न घूमे। वह तीन-चार कदम चलकर ही यों हांफने लगा-मानो मीलों से चलकर आया हो। तभी न जाने किस ओर से डॉली आई और उसने पीछे से व्हील चेयर को थाम लिया।
राज ने गर्दन न घुमाई। सोचा-शिवानी होगी। वह बड़बड़ाया- 'शिवा! मेरी समझ में नहीं आता कि जब संसार के सभी रिश्ते अंततः टूट ही जाते हैं तो फिर बनते क्यों हैं? किन्तु इसमें रिश्तों का भी क्या दोष? दोष तो हमारा होता है। हम ही कभी-कभी अनजाने बंधनों में बंध जाते हैं। हम ही कभी-कभी बिन समझे किसी को अपना दिल हार बैठते हैं, किन्तु अंत में मिलता क्या है? आंसुओं का सागर-पीड़ाओं का तूफान और पश्चात्ताप की आग; जलते हैं। हमारा हृदय यह सोच-सोचकर फटता है कि हमने किसी को अपना क्यों समझा। हमने किसी से प्रेम का बंधन क्यों बांधा? किन्तु यह भी सच है कि यह सब अपने वश में नहीं होता। जीवन पथ पर कोई मिलता है और एकाएक हम उसके हो जाते हैं। हमें तो पता ही नहीं चल पाता कि कब हम उसके हुए-कब वह हमारा हुआ। वह कम्बख्त तो नैनों के रास्ते हृदय में यूं समाता है कि हम उसे चाहकर भी स्वयं से अलग नहीं कर पाते।'
डॉली सुनती रही। उसके चेहरे पर भावों का तूफान चीखता रहा और वह राज की व्हील चेयर को हौले-हौले आगे बढ़ाती रही।
कुछ क्षणों के मौन के पश्चात राज फिर बोला- 'न जाने कैसे होते हैं वे लोग जो किसी का हृदय तोड़ देते हैं। मैं तो समझता हूं-उनके सीने में हृदय ही नहीं होता। शायद पत्थर होता है। शायद उनका भावनाओं से भी कोई रिश्ता नहीं होता। तुम क्या सोच रही हो?'
'यही।' डॉली को अपने होंठ खोलने पड़े-बोली 'कि मनुष्य को इतना भावुक न होना चाहिए।'
आवाज सुनते ही राज चौंका। उसने शीघ्रता से चेहरा घुमाकर डॉली को देखा और फिर अचरज से बोला- 'तुम!'
'भावुकता ठीक नहीं-हमेशा दु:ख देती है।'
'पर-पर तुम यह कुर्सी-?'
'शिवा कह रही थी-यदि सहारा न मिला तो आप गिर जाएंगे।'
'सहारा किन्तु वह तो टूट चुका है।'
'ऊं अभी नहीं।'
'तो उस दिन?'
'वह एक बात थी जो अनजाने में ही होंठों पर आ गई थी।'
'तो क्या तुमने वो सब हृदय से न कहा था?'
'नहीं।' डॉली बोली- 'परीक्षा हो रही थी आपकी। सोच रही थी सुनकर आप क्या कहते हैं।'
'ओह!' राज के होंठों पर खुशियों भरी मुस्कुराहट फैल गई। उसने डॉली के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और बोला- 'क्या-क्या तुम बिलकुल सच कह रही हो डॉली? क्या यह सच है कि तुम ज्योति की भांति कभी इस घर को छोड़कर न जाओगी?'
'हा।' डॉली ने कहा और राज को लेकर कमरे में आ गई। इसके उपरांत जब वह बाहर जाने लगी तो राज ने उसकी कलाई थामकर कहा 'बैठो न।'
'आपके लिए चाय ले आऊं।'
'ऊंडे-आज चाय नहीं।'
'और?'
'तुम्हारे इन होंठों का शर्बत।'
'इंकार कर दूं तो?'
'मैं यह समझूगा कि अभी तुम्हारा मन साफ नहीं।'
'मन को कौन जान सका है?'
'मनुष्य के हाव-भाव-उसकी बातें। यह सब बता देते हैं कि किसी के मन में क्या है। आओ न।'
'बहुत जिद्दी हैं आप!' डॉली ने कहा और उसने स्वयं ही राज के होंठों को चूम लिया। इसके उपरांत वह अपना हाथ छुड़ाकर बोली- 'क्यों, अब तो विश्वास हो गया आपको?'
'किस बात का?
'यह कि मेरा मन साफ है।'
'हां।'
'अब एक बात पूछू?'
'पूछो।'
'सुना है-आपकी पहली पत्नी ज्योति अब यहीं आ गई है? मेरा मतलब है इसी शहर में।'
'हां।'
'मैंने यह भी सुना है कि वह आपसे कई बार मिल चुकी है।'
'तीन बार।' राज ने उत्तर दिया और मूर्तिमान-सा खिड़की की ओर देखने लगा। उसकी आंखों में अतीत की छाया डोल रही थी।
डॉली ने पूछा- 'किसलिए?' 'उसे सहारा चाहिए।'
'सहारा तो मिला था उसे।'
'हां, किन्तु वह सहारा उससे विधाता ने छीन लिया। ज्योति विधवा हो गई।'
'क्या करती है आजकल?'
'नौकरी।'
'आपका बेटा तो काफी बड़ा हो गया होगा?'
'हां, एक दिन देखा था उसे भी।'