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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

शिवानी ने इस बार डॉली के कंधे पर हाथ रखा और अत्यंत विनम्रता से बोली- ‘मान जाओ न डॉली! भैया को इतना बड़ा दु:ख न दो कि वे उसे सहन ही न करें और घबराकर आत्महत्या कर बैठे। तुम नहीं जानतीं कि वे कितने भावुक हैं और उन्होंने अपने जीवन में कितनी पीड़ाएं सही हैं।'

'पीड़ाएं सहने के लिए ही होती हैं।'

'किन्तु सहन शक्ति की भी एक सीमा होती है। उस सीमा के पश्चात तो पीड़ाएं मौत का कारण बन जाती हैं। देखो, यदि मैंने जाने-अनजाने में तुम्हें कुछ बुरा कह दिया है तो मैं उसके लिए क्षमा याचना करती हूं। मैं यह भी वचन देती हूं कि भविष्य में तुम्हें कुछ नहीं कहूंगी और तुम्हारे कहीं भी जाने पर प्रतिबंध न लगाऊंगी, किन्तु । बस-बस ईश्वर के लिए मेरी इतनी विनती मान लो कि इस घर से नाता न तोड़ो?'

डॉली को कहना पड़ा- 'ठीक है शिवा!'

'अर्थात् तुम...।'

'मैं प्रयास करूंगी कि मेरा इस घर से हमेशा यही रिश्ता बना रहे।'

'थॅंक भाभी-थै क्यू भाभी!' शिवानी ने उल्लासपूर्ण लहजे में कहा और इसके पश्चात वह उठकर तेजी से बाहर चली गई।

डॉली के होंठों पर अब ऐसी मुस्कुराहट थिरक रही थी मानो उसे शिवानी एवं राज पर दया आ रही हो।

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ऑटोरिक्शा से उतरकर राज जब व्हील चेयर पर बैठा तो न जाने क्यों आज उससे व्हील चेयर के पहिए न घूमे। वह तीन-चार कदम चलकर ही यों हांफने लगा-मानो मीलों से चलकर आया हो। तभी न जाने किस ओर से डॉली आई और उसने पीछे से व्हील चेयर को थाम लिया।

राज ने गर्दन न घुमाई। सोचा-शिवानी होगी। वह बड़बड़ाया- 'शिवा! मेरी समझ में नहीं आता कि जब संसार के सभी रिश्ते अंततः टूट ही जाते हैं तो फिर बनते क्यों हैं? किन्तु इसमें रिश्तों का भी क्या दोष? दोष तो हमारा होता है। हम ही कभी-कभी अनजाने बंधनों में बंध जाते हैं। हम ही कभी-कभी बिन समझे किसी को अपना दिल हार बैठते हैं, किन्तु अंत में मिलता क्या है? आंसुओं का सागर-पीड़ाओं का तूफान और पश्चात्ताप की आग; जलते हैं। हमारा हृदय यह सोच-सोचकर फटता है कि हमने किसी को अपना क्यों समझा। हमने किसी से प्रेम का बंधन क्यों बांधा? किन्तु यह भी सच है कि यह सब अपने वश में नहीं होता। जीवन पथ पर कोई मिलता है और एकाएक हम उसके हो जाते हैं। हमें तो पता ही नहीं चल पाता कि कब हम उसके हुए-कब वह हमारा हुआ। वह कम्बख्त तो नैनों के रास्ते हृदय में यूं समाता है कि हम उसे चाहकर भी स्वयं से अलग नहीं कर पाते।'

डॉली सुनती रही। उसके चेहरे पर भावों का तूफान चीखता रहा और वह राज की व्हील चेयर को हौले-हौले आगे बढ़ाती रही।

कुछ क्षणों के मौन के पश्चात राज फिर बोला- 'न जाने कैसे होते हैं वे लोग जो किसी का हृदय तोड़ देते हैं। मैं तो समझता हूं-उनके सीने में हृदय ही नहीं होता। शायद पत्थर होता है। शायद उनका भावनाओं से भी कोई रिश्ता नहीं होता। तुम क्या सोच रही हो?'

'यही।' डॉली को अपने होंठ खोलने पड़े-बोली 'कि मनुष्य को इतना भावुक न होना चाहिए।'

आवाज सुनते ही राज चौंका। उसने शीघ्रता से चेहरा घुमाकर डॉली को देखा और फिर अचरज से बोला- 'तुम!'

'भावुकता ठीक नहीं-हमेशा दु:ख देती है।'

'पर-पर तुम यह कुर्सी-?'

'शिवा कह रही थी-यदि सहारा न मिला तो आप गिर जाएंगे।'

'सहारा किन्तु वह तो टूट चुका है।'

'ऊं अभी नहीं।'

'तो उस दिन?'

'वह एक बात थी जो अनजाने में ही होंठों पर आ गई थी।'

'तो क्या तुमने वो सब हृदय से न कहा था?'

'नहीं।' डॉली बोली- 'परीक्षा हो रही थी आपकी। सोच रही थी सुनकर आप क्या कहते हैं।'

'ओह!' राज के होंठों पर खुशियों भरी मुस्कुराहट फैल गई। उसने डॉली के हाथ पर अपना हाथ रख दिया और बोला- 'क्या-क्या तुम बिलकुल सच कह रही हो डॉली? क्या यह सच है कि तुम ज्योति की भांति कभी इस घर को छोड़कर न जाओगी?'

'हा।' डॉली ने कहा और राज को लेकर कमरे में आ गई। इसके उपरांत जब वह बाहर जाने लगी तो राज ने उसकी कलाई थामकर कहा 'बैठो न।'

'आपके लिए चाय ले आऊं।'

'ऊंडे-आज चाय नहीं।'

'और?'

'तुम्हारे इन होंठों का शर्बत।'

'इंकार कर दूं तो?'

'मैं यह समझूगा कि अभी तुम्हारा मन साफ नहीं।'

'मन को कौन जान सका है?'

'मनुष्य के हाव-भाव-उसकी बातें। यह सब बता देते हैं कि किसी के मन में क्या है। आओ न।'

'बहुत जिद्दी हैं आप!' डॉली ने कहा और उसने स्वयं ही राज के होंठों को चूम लिया। इसके उपरांत वह अपना हाथ छुड़ाकर बोली- 'क्यों, अब तो विश्वास हो गया आपको?'

'किस बात का?

'यह कि मेरा मन साफ है।'

'हां।'

'अब एक बात पूछू?'

'पूछो।'

'सुना है-आपकी पहली पत्नी ज्योति अब यहीं आ गई है? मेरा मतलब है इसी शहर में।'

'हां।'

'मैंने यह भी सुना है कि वह आपसे कई बार मिल चुकी है।'

'तीन बार।' राज ने उत्तर दिया और मूर्तिमान-सा खिड़की की ओर देखने लगा। उसकी आंखों में अतीत की छाया डोल रही थी।

डॉली ने पूछा- 'किसलिए?' 'उसे सहारा चाहिए।'

'सहारा तो मिला था उसे।'

'हां, किन्तु वह सहारा उससे विधाता ने छीन लिया। ज्योति विधवा हो गई।'

'क्या करती है आजकल?'

'नौकरी।'

'आपका बेटा तो काफी बड़ा हो गया होगा?'

'हां, एक दिन देखा था उसे भी।'
 
'पहचान लिया होगा आपको?'

'कैसे पहचानता-उस समय तो बहुत छोटा था।'

'ज्योति की न सही-किन्तु अपने बच्चे की याद तो आपको आती होगी?'

'अपना खून है इसलिए।'

'आप एक काम क्यों नहीं करते?'

'वह क्या?' राज ने पूछा और पूर्ववत् खिड़की से बाहर देखता रहा। उसकी आंखों में अभी भी विचारों की परछाइयां थिरक रही थीं।

डॉली ने कहा- 'ज्योति से अपना बेटा क्यों नहीं ले लेते?' '

मैंने ऐसा चाहा था।'

‘फिर?'

'ज्योति अपने बेटे से दूर रहने को तैयार नहीं। वह चाहती है कि मैं उसे भी घर ले आऊं। वह मेरे मन की दुर्बलता जानती है और इसी का लाभ उठाना चाहती है।'

'और आप क्या चाहते हैं?'

'भूलना-सब कुछ भूल जाना। उसे भी और अपने बेटे को भी। ज्योति मेरे लिए वर्षों पहले मर चुकी है। वह मुर्दा बन चुकी है मेरे लिए। मुर्दो के लिए आंसू बहाना मैं बुद्धिमानी नहीं मानता। और वैसे भी डॉली! तुम तो जानती ही हो कि अब मैंने दूसरी दुनिया बसा ली है। मेरा पुरानी दुनिया से कोई संबंध नहीं।'

'और यदि।' डॉली उसके अंतर्मन को टटोल रही थी। रहस्यपूर्ण मुस्कुराहट के साथ वह बोली- 'किसी दिन मैं न रही तो?'

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'तुम!' राज ने चौंककर कहा और डॉली को ध्यान से देखने लगा।

डॉली बोली- 'आप तो जानते ही हैं कि मृत्यु एक सत्य है और यह सत्य प्रत्येक के जीवन में घटित होता है। मृत्यु की देवी कब किसको अपने आलिंगन में बांध ले-इसे कौन जान सकता है। बता सकते हैं उसके पश्चात आप क्या करेंगे? किसका सहारा लेंगे और किसको अपना कहेंगे?'

राज ने यह सुनकर बेचैनी से होंठ काट लिए। वह बोला- 'यह सब पागलों जैसी बातें हैं। डॉली।'

डॉली खिलखिलाकर हंस पड़ी।

उसी समय शिवानी ने चाय की ट्रे लेकर कमरे में प्रवेश किया और डॉली ने अपनी हंसी रोक ली।

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जय के मुकदमे का दिन।

अदालत की कार्यवाही शुरू होते ही मिस्टर हेगड़े ने अपने स्थान से उठकर जज महोदय को संबोधित किया- 'मीलॉर्ड! आई विटनेस के रूप में गवाह नंबर एक का बयान और सबूत के तौर पर अदालत में पेश की गई मुलजिम की रिवाल्वर और उसी रिवाल्वर की मृतक के जिस्म में से निकाली गई दो गोलियां। यह सब बातें इस ओर संकेत करती हैं कि मुलजिम जय ने ही अपने पिता ठाकुर कृपाल सिंह का खून किया है। अतः मैं अदालत से एक बार फिर दरख्वास्त करता हूं कि वह मुलजिम जय को इस खून का अपराधी मानते हुए उसे कड़ी-से-कड़ी सजा सुनाए। थॅंक मीलॉर्ड!'

'नो युअर ऑनर!' हेगड़े की बात समाप्त होते ही कपूर साहब ने अपना चोगा संभाला और उठकर चिल्लाए– 'सबूत पक्ष की ओर से पेश की गई रिवाल्वर एवं आई विटनेस से किसी प्रकार भी यह सिद्ध नहीं होता कि कृपाल सिंह का खून मेरे क्लाइंट ने किया है। सच तो यह है युअर ऑनर कि यह खून चौधरी दिलावर सिंह ने किया हैं

जज महोदय ने पूछा- 'क्या सफाई पक्ष के वकील इस संबंध में कोई गवाह अथवा सबूत पेश कर सकते हैं?'

'यस युअर ऑनर!' कपूर साहब ने इस बार अगली पंक्ति में बैठी डॉली को देखा और इसके पश्चात कहा- 'और इस संबंध में मेरी ओर से पहली गवाह हैं डॉली।'

डॉली उठकर विटनेस बॉक्स में आ गई।

अर्दली ने उसके समक्ष गीता रखकर कहा 'गीता की सौगंध लेकर कहिए कि आप जो कुछ कहेंगी सच कहेंगी और सच के अलावा और कुछ न कहेंगी।' डॉली ने गीता पर हाथ रखकर सौंगंध ली। इसके पश्चात उसने एक नजर विटनेस बॉक्स में खड़े जय पर डाली और फिर जज महोदय की ओर देखकर बोली 'हुजूर! मेरा नाम डॉली है और मैं इसी शहर की रहने वाली हूं। लगभग ढाई वर्ष पूर्व मेरे माता-पिता का देहांत हो गया तो मुझे रामगढ़ जाना पड़ा। वहां जाना मेरी विवशता ही थी-क्योंकि अपनों के नाम पर कोई दूसरा न था किन्तु हुजूर! रामगढ़ पहुंचकर मुझे जो मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ी-उन्हें केवल मैं ही जानती हूं। खैर, जैसे-तैसे दिन बीतते रहे और मैं अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाती रही।

'किन्तु एक दिन मेरे सिर पर मानो दुखों की चट्टान टूट पड़ी। चाचा ने जमींदार कृपाल सिंह के हाथों मेरा सौदा कर दिया था। जमींदार साहब मुझसे विवाह करना चाहते थे और इसके बदले में चाचा ने उनसे दस हजार रुपए लिए थे। यह सुनकर मैं चाचा के सामने रोई-गिड़गिड़ाई-मैंने उनसे विनती की कि वे मेरा विवाह सत्तर वर्ष । के बूढ़े से न करें-किन्तु उन पर मेरी विनती का कोई प्रभाव न पड़ा। अंत में हुजूर! ठीक उस रात जब मेरे हाथों पर मेहंदी रचाई गई और जिसकी सुबह मुझे जमींदार साहब की दुल्हन बनना था-मुझे अवसर मिला और मैं घर से निकल भागी। सोचा था-या तो आत्महत्या कर लूंगी या फिर इस नरक से कहीं दूर चली जाऊंगी।

'किन्तु ज्यों ही मैं पर्वतपुर वाली सड़क पर आई-पीछे से आता एक ट्रक मेरे समीप आकर रुका और उसमें से उतरकर चार व्यक्तियों ने मेरा मार्ग रोक लिया। मैं लुट जाती हुजूर! किन्तु तभी शहर की दिशा से एक गाड़ी आई और उसमें से एक नवयुवक उतरा। युवक के पास रिवाल्वर थी। गुंडों को डराने के लिए उसने अपनी रिवाल्वर से दो हवाई फायर किए और मुझे लुटने से बचा लिया। वह युवक यूं तो रामगढ़ जा रहा था किन्तु यह सोचकर कि कहीं वे गुंडे मुझ पर फिर आक्रमण न कर बैठे, वह मुझे शहर में स्थित अपने मकान पर ले आया। उस समय तक दिन का उजाला फैल चुका था। और हुजूर! मुझे बचाने वाला वह युवक और कोई नहीं बल्कि यही जय था।'

जज महोदय ने पूछा- 'आप ठाकुर कृपाल सिंह के खून के विषय में क्या जानती हैं?'

'हुजूर!' डॉली बोली- 'अब मैं इसी विषय पर आ रही हूं। दरअसल जय साहब को कुछ देर के लिए कहीं जाना था। अत: उन्होंने मेरे स्नान एवं जलपान की जिम्मेदारी नौकर हरिया को सौंपी और बाहर चले गए, किन्तु उनके जाने के थोड़ी देर पश्चात ही जमींदार साहब आ गए। मैं उन्हें देखकर घबरा गई। वह मुझे बलपूर्वक रामगढ़ ले जाना चाहते थे और मैं उनका विरोध कर रही थी। तभी जय आ गए। जय ने भी उन्हें समझाना चाहा। ठीक तभी खिड़की के पीछे से लगातार दो गोलियां चलीं और जमींदार साहब लहूलुहान होकर गिर पड़े। यह देखकर जय ने अपनी रिवाल्वर निकाली और हमलावर को पकड़ने के लिए तेजी से बाहर चले गए, किन्तु खूनी न मिला और कुछ समय पश्चात ही पुलिस आ गई।

'जय को गिरफ्तार कर लिया गया।

'पुलिस ने मुझसे कहा था कि मैं शाम तक उसी मकान में रहूं। संध्या के समय पुलिस इंस्पेक्टर आए और मेरा बयान लेकर चले गए। हरिया दोपहर से ही गायब था। मैं समझ न पा रही थी कि मुझे क्या करना चाहिए। तभी हरिया के साथ चौधरी दिलावर सिंह ने मकान में प्रवेश किया और मैं अंधेरे का लाभ उठाकर फूलों के पौधों के पीछे छुप गई। दोनों अंदर चले गए। मैंने । उनकी बातों से जाना कि चौधरी का इरादा ठीक न था। अतः मैं मकान से निकली और मीलों पैदल चलकर अपनी सहेली शिवानी के घर पहुंच गई। बस हुजूर! इसके अतिरिक्त मैं और कुछ नहीं जानती।' इतना कहकर डॉली ने अपनी बात समाप्त की। अदालत में कुछ पलों तक सन्नाटा रहा।

फिर इस सन्नाटे को तोड़ते हुए जज महोदय ने हेगड़े से कहा- 'क्या सबूत पक्ष के वकील गवाह से जिरह करना चाहेंगे?'

'यस मीलॉर्ड!' हेगड़े ने कहा और इसके पश्चात वह डॉली के सामने आकर बोले- 'आपका नाम?'

'डॉली।'

'मिस अथवा मिसेज? मेरा मतलब है-आप कुंवारी हैं अथवा शादीशुदा हैं?'

'मैं शादीशुदा हूं।'

'आपके पति का नाम?'

डॉली इस प्रश्न पर उलझकर रह गई, किन्तु उसने तुरंत ही अपने आपको संभाल लिया और बोली 'इस मुकदमे का मेरे पति से कोई संबंध नहीं है। अतः मैं उनका नाम बताना आवश्यक नहीं समझती।'

'आवश्यक है डॉली जी!' हेगड़े बोला- 'इसलिए आवश्यक है क्योंकि नाम न बताने पर यह अदालत आपके चरित्र पर संदेह कर सकती है। अदालत यह मान सकती है कि आपके जमींदार कृपाल सिंह से संबंध थे।'

'ऑब्जेक्शन यूअर ऑनर!' हेगड़े की बात समाप्त होते ही कपूर साहब चिल्लाए– 'मेरे विद्वान मित्र गवाह से ऐसे प्रश्न पूछ रहे हैं जिनका इस मुकदमे से कोई संबंध नहीं। साथ ही मेरे विद्वान मित्र को मेरे गवाह के चरित्र पर संदेह करने का भी कोई अधिकार नहीं है।'

जज साहब ने इस विरोध को स्वीकार किया और बोले- 'सबूत पक्ष को ताकीद की जाती है कि वह गवाह से केवल मुकदमे से संबंधित प्रश्न करें।'

'खैर!' हेगड़े पलभर के लिए मौन रहा और फिर डॉली से बोला- 'तो अब आप यह बताइए कि आपने अपनी आंखों से क्या देखा? मेरा मतलब है-ठाकुर कृपाल सिंह का खून किस प्रकार हुआ?'

'मैं इस संबंध में केवल इतना ही जानती हूं कि गोलियां खिड़की के पीछे से चलाई गई थीं।'

'आपने गोली चलाने वाले को देखा?'

'नहीं।'

'फिर आप किस आधार पर कह रही हैं कि गोलियां खिड़की की दिशा से चलाई गई थीं?'

'उस समय जय मेरे साथ खड़े थे और ठाकुर साहब हमारे सामने थे। पहली गोली चलने के पश्चात मैंने और जय ने चौंककर खिड़की की

ओर देखा था किन्तु इससे पूर्व कि हम दोनों कुछ कर पाते-खिड़की की दिशा से दूसरी गोली चली और ठाकुर साहब फर्श पर गिर पड़े।'

'अच्छा! एक बात बताइए।' हेगड़े बोला- 'जय ने अपनी रिवाल्वर दाएं हाथ में ले रखी थी अथवा बाएं हाथ में?'

'किसी भी हाथ में नहीं।'

'क्या मतलब?'

'मतलब यह कि उस उक्त उनके पास रिवाल्वर न थी।'

'किन्तु पुलिस ने तो उन्हें रंगे हाथों पकड़ा था।'

'यह सरासर झूठ है।' डॉली बोली- 'पुलिस ने उन्हें तब गिरफ्तार किया था जब वे हत्यारे को खोज रहे थे। उस समय उनकी रिवाल्वर भी दूसरे कमरे में थी।'

'थॅंक डॉली जी! मुझे इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं पूछना है।' हेगड़े ने कहा।

उसी समय अदालत की आज की कार्यवाही समाप्त होने की घोषणा कर दी गई।

अदालत कक्ष से निकलकर वह जेल की गाड़ी की ओर बढ़ा-तो एकाएक डॉली को देखकर उसके कदम रुक गए। साथ चलते कांस्टेबलों को रुकना पड़ा। डॉली उसे एकटक दृष्टि से देख रही थी। आज उसकी आंखों में आंसू न थे-बल्कि होंठों पर मिलन की मुस्कुराहट थी।

जय ने उससे पूछा- 'कैसी हो?'

'ठीक हूं।'

'और तुम?'

'अच्छा हूं। साथ ही एक विशेष बात और भी है।'

'वह क्या?'

'मुझे सपने बहुत आते हैं।'

'अच्छा! क्या देखते हो उन सपनों में?'

'तुम्हें और स्वयं को। जानती हो रात क्या देखा?'

'क्या देखा?'

'हम दोनों एक स्वर्ण महल में घूम रहे हैं। वह स्वर्ण महल भी बहुत सुंदर था। दीवारें, छतें, खिड़कियां, चारों ओर सोना-ही-सोना। उस स्वर्ण महल में तुम्हारा मुख यों दमक रहा है-मानो धूप खिली हो।'

'और?'

'आकाश में चांद खिला है। फिर न जाने क्या हुआ कि वह चांद परियों जैसे पंख लगाकर धरती पर उतर आया।'

'धरती पर अथवा महल में?'
 
'महल में।'

'फिर?'

'उसने तुमसे कहा-धरती की रानी, लाओ अपना यह रूप मुझे दे दो और मेरा रूप ले लो।'

'झूठे।' डॉली बोली।

'क्यों?' जय ने पूछा।

'चांद कभी ऐसा कहेगा?'

'पगली! वह तो एक सपना था।'

'और सपने कभी सच नहीं होते।'

'न-नहीं।' एकाएक जय का चेहरा उतर गया और वह घबराकर बोला- 'ऐसा न कहो डॉली! यह न कहो कि मेरा यह सपना कभी सच न होगा। क्या तुम्हें विश्वास नहीं कि मैं मुकदमा जीत जाऊंगा? क्या तुम्हें नहीं लगता कि मैं छूट जाऊंगा?'

'लगता है जय।

'तो फिर यह निराशा क्यों? किसलिए?'

'मैंने केवल सपने के विषय में कहा है।'

'किन्तु डॉली! यह सपने ही होते हैं जो मनुष्य के मन में प्रतिदिन कई नई आशाएं जगाते हैं। इन्हीं सपनों के आधार पर तो जिंदा रहते हैं लोग। जानती हो-मैं भी क्यों जिंदा हूं?'

'क्यों?'

'इन्हीं सपनों की वजह से। मैं सोचता हूं-मेरे यह सपने एक-न-एक दिन जरूर सच होंगे। अवश्य ही एक दिन मेरी एक छोटी-सी दुनिया होगी। उस दुनिया में मैं रहूंगा, तुम रहोगी और हमारे नन्हे-मुन्ने रहेंगे। खुशियों का कितना बड़ा खजाना होगा हमारे पास। क्यों, ऐसा ही होगा न?'

प्रत्युत्तर में डॉली केवल अपने होंठों को काटकर रह गई। समझ न पाई कि क्या उत्तर दे। भविष्य का पता क्या था। स्वयं उसका जीवन भी तो दो भागों में बंटा था। एक ओर राज की पीड़ाएं थीं, समाज का बंधन था और दूसरी ओर उसका प्यार। जय से जुड़ा दर्द का रिश्ता। किसको ठोकर मार दे-किसे गले लगाए?

'डॉली!' जय ने उसे फिर संबोधित किया।

डॉली ने तुरंत विषय बदल दिया। बोली- 'कपूर अंकल कह रहे थे-अगली पेशी पर चौधरी को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।'

'डॉली! मैं कुछ और कह रहा था।'

'फिर सुनूंगी।'

तभी कांस्टेबल ने जय को आगे बढ़ने का संकेत किया और डॉली उसके सामने से हट गई।

जय ने जाते-जाते उसे दुखी नजरों से देखा और कहा- 'डॉली! देखना-मेरा यह सपना टूट न जाए।'

स्पर्श डॉली ने चेहरा झुका लिया।

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राज के मित्र विनोद सक्सेना ने उसे पूरी बात बताई और इसके उपरांत प्याला उठाकर हल्की-सी चुस्की लेते हुए वह बोला- 'और राज! डॉलीजी को इतने समय तक वॉच करने के पश्चात मैं एक ही नतीजे पर पहुंचा हूं और वह यह कि डॉली और जय एक-दूसरे को । बचपन से चाहते हैं। यदि ऐसा न होता तो डॉली उसके लिए इतना बड़ा त्याग न करती।'

'तुम इसे त्याग कह रहे हो?'

'त्याग ही तो है। जय के मुकदमे की पैरवी करना-उसके लिए पानी की तरह पैसा बहाना और समाज की भी परवाह न करना। क्या कोई किसी के लिए इतना कर सकता है।'

"विनोद! मुझे तो यों लगता है कि यह सब सुनकर मैं पागल हो जाऊंगा।'

'मैं जानता था कि तुम यह सब सहन न कर पाओगे। यही कारण था कि मैं तुमसे सब कुछ छुपाता रहा।'

'फिर अब क्यों कह दिया?'

'इसलिए क्योंकि अब जय के मुकदमे का फैसला होने वाला है। यह भी तय है कि निर्णय जय के ही पक्ष में होगा और वह साफ छूट जाएगा और ज्यों ही जय जेल से बाहर आएगा-डॉली इस घर को हमेशा के लिए छोड़ देगी और जय के पास चली जाएगी।'

'विनोद! यह तो बताओ कि मैं क्या करूं?'

'डॉली को भूल जाओ।'

'उफ!' राज ने बेचैनी से कहा- 'किन्तु तुम यह क्यों नहीं समझते कि मैंने उसे वास्तव में चाह है। विनोद! मैंने उससे प्यार किया है और मेरे प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मैंने उसे अपना बनाने के लिए किसी भी लड़की को पसंद नहीं किया। तुम जानते हो, उस विज्ञापन को पढ़कर पचास से भी अधिक पत्र मेरे पास आए थे किन्तु मैंने किसी का भी उत्तर न दिया।'

'यह भूल थी तुम्हारी।'

'वह क्यों?'

'इसलिए।' विनोद ने फिर चाय की चुस्की ली और बोला- 'क्योंकि तुमने एकतरफा प्यार पर यकीन किया। तुमने अपनी भावनाएं तो देखीं। मगर डॉली की भावनाओं को न देखा। तुमने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह तुम्हें चाहती है और सिद्धांत की बात यह है राज कि ऐसा प्रेम हमेशा पश्चात्ताप का कारण बनता है।'
 
'क्या तुम्हारे पास इस समस्या का कोई समाधान है।'

नहीं?'

'समाधान है।'

'वह क्या?'

'डॉली से खुलकर बात करो। उसके अंतर्मन को टटोलकर यह जानने की कोशिश करो कि वह क्या चाहती है।'

'फिर?'

'हो सकता है उसके संबंध में मेरा अनुमान गलत हो। हो सकता है-उसके हृदय में जय के लिए केवल श्रद्धा हो और प्रेम न हो।'

'उसके पश्चात?'

'उसकी भावनाओं को समझो और वही करो जो वह चाहती है।'

'और।' राज की चाय बर्फ हो रही थी। उसने एक ही घूट में अपना प्याला खाली किया और बोला- 'यदि उसने वास्तव में जय के पास जाना चाहा तो?'

'उसे खुशी-खुशी जय के हवाले कर दो।'

'विनोद! आखिर तुम यह क्यों चाहते हो कि मैं आत्महत्या कर लूं?'

'क्यों?'

'डॉली को जय के हवाले करने के पश्चात क्या मैं जिंदा रह पाऊंगा?'

'मरना आसान नहीं होता राज!'

'मरने में देर कितनी लगती है?'

'देर नहीं लगती।' विनोद मुस्कुराया और व्यंग्य से बोला- 'देर नहीं लगती तो फिर यह बताओ कि तुम आज तक जिंदा क्यों हो? ज्योति ने तुम्हें इतने गहरे जख्म दिए, जीवन-भर का दर्द दिया और तुमने एक बार भी आत्महत्या का प्रयास न किया। एक बार भी मौत को गले न लगाया तुमने। आखिर क्यों?'

'वह-वह...।' राज हकलाकर रह गया।

विनोद ने अपना प्याला समाप्त किया और बोला- 'देखो राज! दर्द को पीने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आदमी उसे घूँट-घूट करके पीए। फिर वह दर्द उतना बेचैन नहीं करता, किन्तु इसके लिए थोड़ी सहन शक्ति जरूरी होती है।'

राज परेशानी की दशा में अपना मस्तक रगड़ने लगा। तभी विनोद ने अपनी रिस्टवॉच पर नजर डाली और एकाएक उठकर बोला- 'अच्छा राज! मैं तो चलता हूं। परसों बच्चों को लेकर आ जाऊंगा। सामान तो सब आ ही चुका है। अब तो केवल बारात के खाने-पीने का प्रबंध देखना है। वह सब मैं परसों देख लूंगा और हां, एक बात का ध्यान रखना।'

'वह क्या?'

'डॉली से अभी कुछ मत कहना। बात बिगडते देर नहीं लगती। ऐसे में यदि कोई नई बात हो गई तो अपनी ही बदनामी होगी।'

'मैं समझता हूं।'

'गुड! तो मैं चलू।' विनोद ने कहा और इसके पश्चात वह चला गया। गहरी बेचैनी एवं परेशानी की दशा में राज अपना मस्तक रगड़ता रहा।

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सूर्यास्त हो चुका था-किन्तु आकाश में उसकी किरणों की लालिमा अभी शेष थी। डॉली ने नपे-तुले कदमों से घर में प्रवेश किया और चलकर कमरे में आ गई। राज बिस्तर पर लेटा था। मुंह तक चादर खिंची थी। डॉली ने यह देखकर उसकी चादर खींच दी।

राज ने आंखें खोलकर उसे देखा और धीरे से बोला- 'तुम!'

'शैतान कहीं के।'

'शैतान।'

'और नहीं तो क्या?' चादर तो यों ढांप रखी थी-मानो घोड़े बेचकर सोए हो। सोचा होगा डॉली ये देखकर मूर्ख बन जाएगी। चलो उठो।'

'किसलिए?'

'मैं तुम्हें पार्क में घुमाकर लाऊंगी।'

'नहीं डॉली!'

'अब उठो न बाबा! बच्चों की भांति हठ न करो। देखो तो मौसम भी कितना प्यारा है, उठो।' कहते हुए डॉली ने राज का हाथ पकड़ा, किन्तु दूसरे ही क्षण उसके होंठों से चीख निकल गई।

राज ने पूछा- 'क्या हुआ?'

'बु-बुखार।' डॉली कंपकंपाती आवाज में बोली 'राज! तुम्हारा जिस्म तो तवे की भांति तप रहा है।'

'यह बुखार नहीं है।' 'हृदय की जलन-मन की तड़प।' राज ने कहा, किन्तु दूसरे ही क्षण उसे अपनी भूल का अनुभव हुआ। विनोद ने कहा था कि अभी डॉली से कुछ न कहना और अब डॉली उससे जलन का कारण पूछ सकती थी। हुआ भी ऐसा ही।

डॉली ने पूछा- 'एकाएक यह जलन और तड़प क्यों?'

राज ने तुरंत बात को संभाल लिया। डॉली का हाथ अपने हाथ में लेकर उससे बोला- 'नहीं समझी तुम?'

'ऊहुँ।'

'तो करीब आओ।'

'करीब ही तो हूं।'

'और भी करीब।'

डॉली उस पर झुक गई और राज ने उसी क्षण उसे अपने ऊपर खींच लिया किन्तु, इससे पूर्व कि वह उसके अधरों को चूम पाता-डॉली ने अपने-आपको छुड़ा लिया और फिर स्नेह से राज की नाक को मरोड़ते हुए बोली- 'ठग कहीं के। तबीयत ठीक नहीं और शरारत सूझ रही है।'

'यह शरारत न थी।'

'और?'

'प्रेम था हमारा।'

'चलिए प्रेम ही सही। अब यह बताइए कि दवाई ली?'

'लेना तो चाहता था।'

'फिर क्या हुआ?'

'हमारा डॉक्टर बड़ा निर्दयी निकला।'

'आप हमेशा उल्टी बातें करते हैं। अच्छा छोड़िए-मैं चौराहे वाले डॉक्टर खान को लेकर आ रही हूं। तीन दिन पश्चात घर में शादी है। यूं ही लेटे रहे तो काम कैसे होगा।' इतना कहकर डॉली ने उसके सीने तक चादर खींच दी। किन्तु इसके उपरांत वह ज्यों ही पीछे हटी-राज ने फिर उसका हाथ थाम लिया।

डॉली बोली 'छोड़िए न।'

'बैठ जाओ।'

'बाबा! मुझे डॉक्टर को लेकर आना है।'

'अब कोई आवश्यकता नहीं।'

'आवश्यकता क्यों नहीं?'

'मैं ठीक हूं। तुमसे एक बात कहनी थी।'

'वह क्या?' डॉली ने पूछा और हाथ छुड़ाकर बैठ गई।

राज उठकर बैठ गया और बोला- 'डॉली! तुम जानती हो तीन दिन बाद शिवा का विवाह है।'

'हां।'

'अर्थात् तीन दिन पश्चात वह यहां से चली जाएगी।'

'यह तो संसार का नियम है और समाज की परंपरा है। लड़कियां तो होती ही पराया धन हैं। माता-पिता उन्हें तिल-तिल करके बड़ा करते हैं और फिर एक दिन दूसरे के हाथों में सौंप देते हैं। आप यह सब सोचकर दुखी क्यों हो रहे हैं?'

'मेरे दु:ख का कारण कुछ और है।'

'वह क्या?'

'सोचता हूं-शिवा के जाते ही अकेला रह जाऊंगा। कोई ऐसा भी न होगा जो मुझे ऑटोरिक्शा से उतारकर व्हील चेयर पर बैठा सके।'

'क्यों?' डॉली चौंककर बोली- 'मैं नहीं हूं क्या?'

'तुम तो हो किन्तु...।'

'किन्तु क्या?'

'तुम्हारे पास इतना समय ही कहां? सुबह निकलती हो और संध्या को लौटती हो।'

डॉली ने कुछ न कहा। स्पष्ट था कि राज के यह शब्द उसे अच्छे न लगे थे और वैसे भी यह तो विवशता थी उसकी। जब तक जय का मुकदमा समाप्त न होगा-उसे तो घर से बाहर रहना ही था।

उसे यों मौन देखकर राज फिर बोला- 'देखो डॉली! मैंने तुम पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं लगाया। कभी यह नहीं पूछा कि तुम सुबह से शाम तक कहां रहती हो और क्या करती हो। मैं सोचता था हर किसी को अपने ढंग से जीने का अधिकार है किन्तु अब...।'

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'कहते रहिए।'

'मैं यह सोच-सोचकर कांप उठता हूं कि यदि तुमने अपनी दिनचर्या न बदली तो मेरा क्या होगा? मेरे तो ऐसे अनेक कार्य हैं जिनके लिए मुझे दूसरों पर ही आश्रित रहना पड़ता है।'

'मैं प्रयास करूंगी कि भविष्य में आपको कोई कठिनाई न हो।' डॉली ने कहा और इसके पश्चात वह उठकर बाहर चली गई।
 
राज का मकान दुल्हन की तरह सजा था। मकान पर फैली रंगीन बल्बों की झालरों एवं झाड़-फानूसों के कारण इतना प्रकाश था कि दिन का उजाला भी शरमा जाए। मकान के सामने वाले पार्क में बड़े-बड़े शामियाने लगे थे। शामियाने में सफेद चादरों से ढकी मेजें पड़ी थीं जिन पर खाने-पीने का सामान सजा था।

पंक्तिबद्ध रखी कुर्सियों पर मेहमान बैठे थे। निकट ही कहीं बारात का बैंड गूंज रहा था। ऐसे में राज की खुशी की कोई सीमा न थी।

अपनी व्हील चेयर के पहिए घुमाते हुए वह कभी मकान के अंदर आता और कभी पार्क में आकर मेहमानों की कुशलता पूछता। अधिकांश कार्य विनोद सक्सेना ने संभाल रखे थे। राज को यों भागदौड़ करते देखकर वह उसके समीप आया और बोला- 'राज! मेरी मानो तो थोड़ी देर आराम कर लो।'

'आराम ऐसे में?'

'जरूरी है भाई! ऐसे में जरूरी है। पिछली दो रातों से तुम बिलकुल नहीं सोए।'

'तुम्हीं कहां सोए हो?'

'मेरी बात दूसरी है तुमसे अधिक ताकतवर हूं।'

'तो फिर हो जाए।'

'क्या हो जाए?'

'हम दोनों के बीच एक कुश्ती।' राज ने कहा और ठहाका मारकर हंस पड़ा।

विनोद दूसरी ओर चला गया।

उसी समय एक व्यक्ति ने राज के समीप आकर उससे कहा- 'राज जी! एक महिला आपसे मिलना चाहती है।'

'कौन है?'

'यह तो मैं नहीं जानता। पश्चिम वाले गेट के पास खड़ी है।' कहकर वह व्यक्ति चला गया।

उसके जाने के पश्चात राज ने रिस्टवॉच में समय देखा। रात्रि के साढ़े ग्यारह बजे थे। बारात आने में अभी आधा घंटा शेष था। यह सोचकर उसने कुर्सी घुमाई और उसके पहिए घुमाते हुए वह पश्चिम वाले गेट की ओर बढ़ने लगा। पार्क के बाहर भी अच्छी रोशनी थी। और वहां पहुंचकर राज ने जो कुछ देखा उसे देखकर उसके सामने धमाका-सा गूंज गया। गेट के पास ज्योति अपने बेटे की उंगली पकड़े खड़ी थी। उसके दूसरे हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था।

ज्योति एवं राजू को देखकर राज के चेहरे पर भूचाल जैसे भाव फैल गए। कभी उसका अतीत उसके सामने होता और कभी उसकी आंखें वर्तमान को देखने लगतीं। वर्तमान एवं अतीत का यह द्वंद्व उसकी आंखों के सामने न जाने कब । तक चलता। तभी राजू ने उसे देखकर अपने हाथ जोड़ लिए और अपनी तोतली जुबान में कहा

'नमस्ते पापा!'

यह सुनकर राज के हृदय में कई नश्तर उतर गए और ममता छटपटाकर रह गई। स्पष्ट था कि राजू को यह सब ज्योति ने ही सिखाया था। राज के मन में आया-अभी राजू को उठाकर अपने हृदय से लगा ले और उसका मुख चूमकर कहे- 'नमस्ते बेटे!' किन्तु वह चाहकर भी ऐसा न कर सका और ज्योति से बोला- 'तुम यहां।'

'किसी से पता चला था कि आज शिवा का विवाह है। तुम तो बुला न सकते थे इसलिए स्वयं चली आई।'

'किसलिए?' राज ने शुष्क लहजे में पूछा।

'एक छोटा-सा उपहार देना था उसे।'

'नहीं-नहीं ज्योति!' राज घृणा से बोला- 'अब तुम्हारे इस उपकार का कोई मोल नहीं। न मेरे लिए और न ही शिवा के लिए। वह भूल चुकी है तुम्हें। शिवा से अब तुम्हारा कोई रिश्ता भी नहीं।'

ज्योति बोली- 'रिश्ते जुबान से नहीं टूटते राज! केवल कहने मात्र से संबंध नहीं टूट जाते। रिश्ते तो हृदय से बनते हैं और यदि उन्हें तोड़ा जाता है तो पहले हृदय का खून करना पड़ता है।'

'वह-वह सब मैं पहले ही कर चुका हूं। मैंने न केवल अपने हृदय का खून किया है-बल्कि उसमें छुपी एक-एक भावना को भी जलाकर राख कर दिया है।'

"किसी का प्यार इतनी आसानी से तो नहीं भुलाया जाता राज!'

'प्यार!' राज ने मानो अंगारे चबाए हों घृणा से। बोला- 'तुम-तुम घृणा को प्यार कह रही हो ज्योति! तुम इतने भयानक विश्वासघात को प्यार का नाम दे रही हो? सच तो यह है कि तुमने प्यार की परिभाषा कभी जानी ही नहीं। तुमने सीखा था केवल धोखा देना। प्यार के नाम पर किसी की भावनाओं से खेलना-बेवफाई करना और दूसरों के हृदय में विश्वासघात की कीलें ठोंकना। उफ! कितनी बुरी तरह से छला था तुमने मुझे। कितने गहरे जख्म दिए। पहले प्रेम की ऊंचाइयों पर बैठाया और फिर ठोकर मारकर नीचे गिरा दिया। मन में तो आया था कि तुम्हारा खून कर दूं। मिटा दूं तुम्हें इस दुनिया से, किन्तु मैंने ऐसा न किया। इसलिए नहीं किया क्योंकि मैंने तुम्हें वास्तव में चाहा था। प्रेम की देवी माना था तुम्हें और तुम्हारी पूजा की थी।'

'क-राज!'

‘मर चुका है राज।' राज इस बार क्रोध से चिल्लाया- 'तुमने अपने हाथों से खून किया उसका। तुमने अपने हाथों से उसकी चिता जलाई और फिर उस राख को भी हवा में उड़ा दिया। मत नाम लो उसका। मत सोचो कि राज जिंदा होगा।' इतना कहकर राज एक पल के लिए रुका और फिर बोला- 'मैं पूछता हूं तुमसे–मैं तुमसे पूछता हूं कि क्या यही औरत का धर्म होता है-समाज और संसार के लिए यही कर्तव्य होता है उसका? पहले तो खुशी-खुशी किसी का घर बसाना और फिर उसे जलाकर राख कर देना। तुमने सोचा-सोचा कभी कि तुम्हारे जाने के पश्चात मैं किस प्रकार जिंदा रहा? कितनी पीड़ाएं सहीं मैंने कितने दर्द पिए? अपंग हो गया मैं। हां, मैं जान-बूझकर अपंग हुआ। मरना चाहा था मैंने किन्तु मर न सका और दोनों टांगें गंवा बैठा। और यह सब तुम्हारी वजह से हुआ ज्योति! सिर्फ तुम्हारी वजह से। तुम्हारी बेवफाई ने जीते जी मुर्दा बना दिया मुझे।' कहते-कहते राज यों हांफने लगा-मानो मीलों से भागकर आया हो।

ज्योति चेहरा झुकाए खड़ी थी। राज की बात समाप्त होते ही वह धीरे से बोली- 'क्षमा न करोगे?'
 
'क्षमा-इस अपराध की।' राज के स्वर में फिर वैसी ही घृणा थी। वह बोला- 'नहीं-वो अपराध ऐसा न था और वैसे भी अब तो पूरा एक युग बीत चुका है। मेरी दुनिया अलग है और तुम्हारी अलग। तुमने अपनी खुशियों से समझौता कर लिया और मैंने अपनी पीड़ाओं से। नाटक खत्म हुआ पर्दा गिर चुका। अच्छा होगा कि भविष्य में मुझसे मिलने का भी प्रयास न करो। मैं तुम्हारे और अपने अतीत की ओर देखना भी नहीं चाहता।'

'तुम मेरे विषय में गलत सोच रहे हो। ऐसा नहीं कि मैं तुमसे कोई अधिकार मांगने आई हूं। यह भी नहीं कि मैं इस घर में फिर से आना चाहती हूं। आने का प्रश्न ही नहीं है क्योंकि तुम विवाह कर चुके हो। विश्वास करो तुम्हारी इस नई दुनिया को जलाने का मेरा कोई इरादा नहीं।'

'तो फिर क्यों आई हो?'

'यह बताने के लिए कि अब मैं कुछ ही दिनों की मेहमान रह गई हूं।'

राज ने उसे चौंककर देखा।

ज्योति ने एक नजर अपने बेटे पर डाली। उंगली छोड़कर उसके सिर पर हाथ फिराया और दुखी स्वर में बोली- 'डॉक्टरों ने मुझे ब्लड कैंसर की पेशेंट बताया है। यकीन करो, मेरे हृदय में मौत का कोई भय नहीं। मुझे कोई अफसोस नहीं कि मैं शीघ्र ही इस संसार से चली जाऊंगी। दु:ख तो केवल यह है कि राजू बेसहारा हो जाएगा। यदि तुम राजू का हाथ थाम लो तो फिर मैं चैन से मर पाऊंगी।'

राज के चेहरे पर विचारों का तूफान फैल गया।

ज्योति फिर बोली- 'वैसे भी राजू है तो तुम्हारा ही। इसकी रगों में दौड़ने वाला खून तो तुम्हारा ही है और फिर राज! जो भी अपराध हुए वे तो मुझसे ही हुए। मैंने तुम्हारे प्रेम को ठुकराया-तुमसे रिश्ता तोड़ा। तुम्हें धोखा दिया-तुम्हारे साथ बेवफाई की-सब कुछ किया। इसमें इस बेचारे का तो कोई दोष नहीं। यह तो अबोध था। मैं जहां ले गई वहीं चला गया।'

राज फिर भी मौन रहा। उसकी नजरें अब राजू पर टिकी थीं और वह यह भी देख रहा था कि राजू बड़े ध्यान से दोनों की बातें सुन रहा था। तभी ज्योति फिर बोली- 'तुमने कोई उत्तर नहीं दिया राज!'

राज के होंठ खुले। कुछ कहना चाहा, किन्तु इससे पूर्व कि वह ज्योति की बात का कोई उत्तर दे पाता-बारात उसके मकान के समीप पहुंच गई और राज ने शीघ्रता से अपनी व्हील चेयर को घुमा दिया।

ज्योति ने उसे यों जाते देखा तो पुकारा– 'राज! तुम मेरे प्रश्न का उत्तर न दो किन्तु यह उपहार तो ले जाओ। देखो, मैंने बड़ी मुश्किलों से खरीदा है।' किन्तु राज की व्हील चेयर आगे बढ़ती रही और यह देखकर ज्योति के होंठों से सिसकियां फूट पड़ीं। उसी क्षण उसका हाथ कंपकंपाया और पैकेट नीचे गिर पड़ा।

एकाएक कोई झाड़ियों के पीछे से निकला और उसने ज्योति का पैकेट उठा लिया। यह डॉली थी-जो पैकेट उठाकर ज्योति से कह रही थी 'निराश न होओ ज्योति! तुम्हारी यह भेंट शिवानी तक मैं पहुंचा दूंगी।'

'आप-आप कौन हैं?'

'डॉली-राज की दूसरी पत्नी।'

'क्या!' ज्योति चौंक गई और आंसू पोंछकर उसे अचरज से देखने लगी।

डॉली ने राजू के सिर पर हाथ रखा और बोली- 'हां, मैं डॉली ही हूं।

राज को मेहमानों के बीच न पाकर यहां चली आई थी। आओ-मेरे साथ आओ।'

'कहां?'

'शादी में अन्य मेहमानों के पास।'

'न-नहीं। मैं इस योग्य नहीं।'

'इसमें योग्यता एवं अयोग्यता कैसी। यह तो विवाह का जश्न है और इसमें कोई भी शामिल हो सकता है और फिर तुम तो वैसे भी पराई नहीं हो।'

'मैं कितनी पराई हूं-यह शायद आप नहीं जानतीं, किन्तु इसमें किसी का कोई दोष नहीं। दोष तो मेरा है। मैंने न तो प्रेम का महत्व समझा-न ही रिश्तों का और भावनाओं के पीछे दौड़ पड़ी। मेरे और राज के बीच कोई विशेष झगड़ा भी न था-साधारण-सी बात थी। समझौता हो सकता था-किन्तु मेरे अहं ने ऐसा न करने दिया और मैं उनसे अलग हो गई। अलग होकर पश्चात्ताप भी हुआ–किन्तु समझौता न किया और रिश्ते टूट गए। उस समय तो मैंने कुछ भी न । सोचा था, जाना ही न था कि रिश्तों का दर्द क्या होता है किन्तु जब जाना-जब हृदय में पीड़ा उठी तो बहुत रोई किन्तु फिर क्या होता–पुरानी राहों पर कैसे लौटती? अपने लिए एक और राह जो चुन ली थी।'

'फिर?'

'दुर्भाग्य मेरा। उस राह ने भी मेरा साथ न दिया और मैं अकेली रह गई।'

'तो क्या।' डॉली ने पूछा- 'तुम राज से आज फिर वही रिश्ता जोड़ना चाहती हो?'

'न-नहीं डॉली जी!' उंगलियों से आंखों की नमी पोंछकर ज्योति बोली- 'ऐसा तो मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा और जब सोचा तब तक बहुत देर हो चुकी थी।'

"तो फिर तुम चाहती क्या हो? किन्तु इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले एक बात और सुन लो। यदि राज तुमसे फिर वही रिश्ता जोड़ना चाहेंगे तो मैं तुम दोनों के बीच में कदापि न आऊंगी, बल्कि यदि संभव होगा तो मैं स्वयं राज का हाथ तुम्हारे हाथ में दे दूंगी।'

'न-नहीं डॉलीजी! मैं इतनी खुदगर्ज नहीं, बल्कि मैं तो यही दुआ दूंगी कि आपकी यह दुनिया युगों-युगों तक बसी रहे। आपको आपका सुहाग मुबारक हो।'

'तो फिर और क्या चाहिए आपको?'

'अपने बच्चे के लिए थोड़ी-सी जगह-थोड़ी-सी ममता-थोड़ा-सा प्यार।'

'लेकिन।'

'मैं ब्लड कैंसर की मरीज हूं। जीवन की लौ कब टिमटिमाकर बुझ जाए-कुछ पता नहीं। आप जानती हैं ऐसा होते ही मेरा राजू अनाथ हो । जाएगा। अतः मैं चाहती हूं कि वे इसका हाथ थाम लें।'

'राजू तो उन्हीं का बेटा है न?'

'हां, उन्हीं का खून है इसकी रगों में।'

'ठीक है। तुम चिंता न करो-मैं इस संबंध में राज से बात करूंगी। मुझे अपना पता बता दो।'

'मैं दीनदयाल हॉस्पिटल में काम करती हूं। मेरा क्वार्टर भी वहीं है।' ज्योति बोली।

'मैं आऊंगी किसी दिन।' इतना कहकर डॉली ने राजू की पेशानी को चूम लिया और फिर ज्योति से बोली- 'वैसे अच्छा तो यही रहता कि इस जश्न में तुम भी शामिल होतीं।'

'क्षमा चाहती हूं! आओ बेटे!' उषा ने कहा और फिर वह राजू की उंगली पकड़कर मुख्य सड़क की ओर बढ़ गई।

डॉली उसे देखती रही।

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सूरज की किरणें अभी-अभी धरती पर उतरी थीं। द्वार के सामने सजी हुई गाड़ी खड़ी थी और सुर्ख जोड़े में लिपटी शिवानी अपनी सखियों के साथ धीरे-धीरे गाड़ी की ओर बढ़ रही थी। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे–मानो आंसुओं का बांध टूट गया हो। राज से लिपटकर वह खूब रोई थी। एकाएक उसके कदम रुक गए। बरामदे में डॉली खड़ी थी। सखियों का साथ । छोड़कर वह डॉली के समीप पहुंची और उससे लिपटकर बच्चों की भांति रोने लगी।

उसे यों रोते देखकर डॉली भी रो पड़ी। आज किसी को किसी से शिकायत न थी। कुछ देर पश्चात शिवानी ने हिचकियां रोक लीं

और डॉली से बोली- 'जा रही हूं भाभी!'

'जाओ शिवा!' डॉली ने आंचल से उसके आंसू पोंछ दिए और भरे स्वर में बोली- 'अपना ध्यान रखना।'

'भाभी! जाने से पहले कुछ मांगना चाहती हूं। वचन दो कि इंकार न करोगी?'

'मांग न पगली! इंकार क्यों करूंगी?'

'तो वचन दो भाभी! वचन दो कि तुम इस घर से कभी नाता न तोड़ोगी। वचन दो कि तुम हमेशा इस घर की बहू बनकर रहोगी।'

डॉली उलझकर रह गई। वह तो अभी तय ही न कर पाई थी कि जीवन के दोनों किनारों में से किसको अपनाएगी और किसे छोड़ देगी। उसे यों

मौन देखकर शिवानी फिर बोली- 'भाभी! क्या मैं समझू कि तुम इंकार कर रही हो?'

डॉली को कहना पड़ा- 'नहीं-ऐसी कोई बात नहीं शिवा! तुम चिंता न करो। यह घर मेरा है और हमेशा मेरा ही रहेगा।'

'थै क्यू भाभी-थैक्यू!- शिवानी ने कहा।

इसके पश्चात वह आगे बढ़ गई।

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फिर सब कुछ बीत गया।

शिवानी अपनी ससुराल चली गई। नौ बजते-बजते कुछ मेहमान भी विदा हो गए और कुछ जाने की तैयारी करने लगे। राज अपने दोस्तों के साथ आगे वाले बरामदे में था।

डॉली ने उसे कमरे में बुलाकर कहा- 'कुछ मेहमान तो अभी रहेंगे?'

'संभव है-आगरे वाली मौसीजी और जबलपुर वाले चाचाजी अभी रुकें।

क्यों?'

'मेरी एक प्रार्थना है।'

'वह क्या?'

'मुझे तीन-चार घंटों के लिए बाहर जाना है।'

राज ने चौंककर पूछा- 'कहां?'

'अपनी किसी सहेली के पास।'

राज ने घृणा से दांत पीस लिए। डॉली फिर बोली- 'संध्या से पहले ही लौट आऊंगी।'

'किन्तु मेहमानों का क्या होगा?'

'अभी तो आपके मित्रों की पत्नियां भी यहीं हैं। वे संभाल लेंगी।'

'बात संभालने की नहीं डॉली! मुख्य बात यह है कि वे लोग तुम्हारे विषय में क्या सोचेंगे।'

'दूसरों को छोडिए।' डॉली बोली- 'यह बताइए कि आप क्या सोचेंगे?'

'मैं-मैंने तो कभी सोचा ही नहीं डॉली! इसलिए आज भी नहीं सोचूंगा। वैसे भी जाने वाले को कौन रोक सका है।'

'राज! मेरा जाना जरूरी है।'

'ठीक है-जाओ।'

'नाराज तो नहीं हुए?'

'जाना आवश्यक है तो फिर नाराजगी कैसी?' राज ने शुष्क लहजे में कहा और फिर से अपने दोस्तों के पास चला गया।

डॉली दर्पण के सामने आ गई।

आज जय के मुकदमे का दिन था और उसे ठीक दस बजे कोर्ट पहुंचना था।

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,,,,,,,जय के मुकदमे का दिन।

मुकदमे की कार्यवाही शुरू होते ही मिस्टर हेगड़े ने अपने स्थान से उठकर जज महोदय को संबोधित किया- 'मीलॉर्ड! गवाहों के बयान और पेश किए गए सबूतों से यह सिद्ध हो चुका है कि ठाकुर कृपाल सिंह का खून मुलजिम जय ने किया है। अतः मैं अदालत से प्रार्थना करता हूं कि वह इस मुकदमे में और अधिक वक्त जाया न करके मुलजिम जय को मौत की सजा सुनाएं। थॅंक मीलॉर्ड!'

'ऑब्जेक्शन युअर ऑनर!' कपूर साहब तुरंत उठकर चिल्लाए– 'गवाहों के बयान एवं पेश किए गए सबूतों से अभी किसी प्रकार भी यह सिद्ध नहीं हो पाया है कि ठाकुर कृपाल सिंह का खून मेरे क्लाइंट ने किया। युअर ऑनर! मैं पहले ही दरख्वास्त कर चुका हूं कि खूनी कोई और है और वह अदालत में ही मौजूद है। मेरे पास इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि ठाकुर कृपाल सिंह का खून उसी ने किया है, किन्तु इससे पूर्व कि मैं अदालत में उसके विरुद्ध सबूत पेश करूं-मेरी अदालत से प्रार्थना है कि उस व्यक्ति को पुलिस की हिरासत में ले लिया जाए।' इतना कहकर कपूर साहब अगली पंक्ति में बैठे चौधरी दिलावर सिंह की ओर देखने लगे।

चौधरी यह सुनते ही उठ गया और चिल्लाया 'यह झूठ है जज साहब! वकील साहब मुझ पर झूठा आरोप लगा रहे हैं।'

'युअर ऑनर!' कपूर साहब बोले- 'यही वो शख्स है-जिसने ठाकुर कृपाल सिंह का खून किया है।'

जज साहब ने आदेश दिया- 'चौधरी दिलावर सिंह को हिरासत में ले लिया जाए।'

आदेश का पालन हुआ।

इसके पश्चात कपूर साहब ने अपने हाथ में थमे दोनों पैकेट जज साहब की मेज तक पहुंचाए और फिर कहा- 'युअर ऑनर! इन पैकेटों में से एक पैकेट में वह रिवाल्वर है-जिससे ठाकुर कृपाल सिंह का खून हुआ है और यह रिवाल्वर जो कि अवैध है-चौधरी दिलावर सिंह की हवेली में पाई गई है।

रिवाल्वर के दस्ते पर दिलावर सिंह की उंगलियों के निशान मौजूद हैं और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की रिपोर्ट भी साथ में है।'

पुलिस हिरासत में खड़े चौधरी की टांगें कांपने लगीं।

कपूर साहब ने फिर कहा- 'और दूसरे पैकेट में वह कैसेट है जिसमें दिलावर सिंह की आवाज भरी है। इस कैसेट में दिलावर सिंह ने स्वयं स्वीकार किया है कि कृपाल सिंह का खून उन्होंने किया है। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया है जिस रिवाल्वर से उन्होंने गोलियां चलाई थीं-वह अवैध है और उनके कमरे की अलमारी में रखी है।'

दिलावर सिंह का सिर घूमने लगा।

विटनेस बॉक्स में खड़े जय के चेहरे पर खुशियों भरी चमक फैल गई। कपूर साहब ने एक पल रुककर फिर कहा- 'किन्तु युअर ऑनर! मेरी अदालत से प्रार्थना है कि इस कैसेट को सुनने से पूर्व मुझे दिलावर सिंह से चंद सवाल पूछने की इजाजत दी जाए।'

'इजाजत है।'

चौधरी को विटनेस बॉक्स में लाया गया। कपूर साहब ने अपनी ऐनक दुरुस्त की और चौधरी के सामने आकर उससे बोले- 'आपका नाम?'

'च-चौधरी दिलावर सिंह।'

'क्या आप यह स्वीकार करते हैं कि आपके एवं मृतक कृपाल सिंह के बीच पिछले दो वर्षों से एक जमीन के कारण मुकदमा चल रहा था और आप दोनों के बीच बोलचाल भी न थी।'

'यह सच है।'

'क्या यह भी सच है कि जिस सुबह कृपाल सिंह का खून हुआ-उस रात हरिया आपकी हवेली पर गया था?'

'नहीं।'

'तो क्या यह भी झूठ है कि आप कृपाल सिंह के अपने मकान में पहुंचने से पहले ही वहां आकर हरिया के कमरे में छुप गए थे?'

'मैं उस समय सोनुपर में था।'

'अर्थात् आप यह कहना चाहते हैं कि आपने कृपाल सिंह का खून नहीं किया।'

'मेरा इस खून से कोई संबंध नहीं।'

'खैर छोड़िए। अब एक बात सोचकर बताइए। आप पंद्रह जून की शाम लगभग चार बजे शहर आए थे?'

'मुझे याद नहीं।'

'आपको अर्चना लॉज के सामने विली नाम की युवती मिली थी और आप एकाएक ही उसकी ओर आकर्षित हो गए थे।'

'यह झूठ है।'

'छोड़िए किन्तु यह तो सच है कि आप विली के साथ राजा होटल में गए थे और रूम नंबर आठ में ठहरे थे? वहां आपने विली के हाथों शराब । पी थी और शराब के नशे में विली के प्रश्नों के उत्तर दिए थे।'

'यह-यह भी गलत है।'

'थॅंक दिलावर सिंह!' कपूर साहब ने कहा और इसके पश्चात अपनी जेब से एक बिल निकालकर वह जज महोदय से बोले- 'युअर ऑनर! यह राजा होटल का बिल है जो चौधरी दिलावर सिंह के नाम है।' इतना कहकर उन्होंने बिल जज साहब की मेज तक पहुंचा दिया और फिर कहा- 'युअर ऑनर! चौधरी दिलावर सिंह के विरुद्ध एक सबूत जो कि छुरे के रूप में था-मैं पहले ही अदालत में पेश कर चुका हूं और अब अदालत से प्रार्थना करता हूं कि वह इस कैसेट को सुनने का कष्ट करे। थॅंक युअर ऑनर!' कहकर कपूर साहब पीछे हट गए।
 
कैसेट को रिकॉर्डर पर लगाया गया।

'विली।' रिकॉर्डर से दिलावर सिंह की आवाज आई– 'तुमने दरवाजा तो ठीक से बंद कर दिया न?'

'चौधरी साहब!' यह किसी स्त्री की आवाज थी- 'आप तो बहुत डरपोक हैं।'

'नहीं-हम डरपोक नहीं हैं लड़की! राजपूत डरपोक नहीं होते। हमारे पुरखों ने अनेक लड़ाइयां लड़ी हैं।'

'अच्छा! फिर तो आपने भी कोई लड़ाई अवश्य लड़ी होगी।'

'हमने लड़ाई तो नहीं लड़ी-किन्तु अपने दुश्मनों को जिंदा भी नहीं छोड़ा।'

'आपका दुश्मन?'

'था एक-जमींदार कृपाल सिंह। अपने आपको पूरे गांव का बादशाह मानता था। एक हम ही थे जो उससे शुरू से ही टक्कर ले रहे थे। यूं समझो कि जमींदार यदि किसी से भय मानता था-तो वह सिर्फ हम थे।'

'मैं समझ गई। आपने उसका खून करा दिया होगा।'

'कराया नहीं था बल्कि स्वयं किया था।'

'अपने हाथों से?'

'हां।'

'ओह, माई गॉड!'

'और-जानती हो हमने क्या किया?'

'क्या किया?'

'एक तीर से दो शिकार किए।'

'वह कैसे?'

'हमने कृपाल सिंह का खून किया और उसके इकलौते बेटे को जेल भिजवा दिया।'

'यह कैसे हो सकता है?'

'ऐसा ही हुआ था विली रानी! खून हमने किया और इल्जाम उसके बेटे जय पर लगा दिया लेकिन-तुमने हमारा गिलास कहां छुपा दिया?'

'चौधरी साहब! गिलास आपके हाथ में है और मैं आपकी गोद में लेटी हूं। क्या आप मेरे जिस्म की गरमाहट महसूस नहीं कर रहे हैं?'

'क-क्यों नहीं विली! हम तो तुम्हारे इस नर्म गुदाज जिस्म की गरमाहट बहुत अच्छी तरह महसूस कर रहे हैं। सच तो यह है कि नशा इस शराब में नहीं तुम्हारे जिस्म से निकलती खुशबू में है। तुम हमसे मिलती रहना विली! यूं ही महकाती रहना हमारी रातों को। फिर देखना-हम अपना सब कुछ तुम्हारे नाम लिख देंगे।'

'कहीं आप बहक तो नहीं रहे?'

'अरे नहीं रानी! हम कभी नहीं बहकते।'

'तो बताइए न-फिर क्या हुआ?'

'क्या हुआ?'

'मेरा मतलब है-आपने जमींदार कृपाल सिंह का खून कैसे किया?'

'बड़ी आसानी से। हुआ यह कि हरिया ने रामगढ़ आकर हमसे जमींदार के बेटे के विषय में बताया। साथ ही यह भी बताया कि जय अपने पिता से नाराज है। इसलिए नाराज है क्योंकि उसका बाप सत्तर साल की आयु में एक लड़की से शादी कर रहा है और इस बात को लेकर बाप-बेटे के बीच झगड़ा अवश्य होगा। हमने जय की प्रतीक्षा की मगर वह साला रामगढ़ न आया। आता तो यह खेल वहीं खत्म हो जाता। मगर फिर भी किस्मत ने हमारा साथ दिया और शादी न होने पर जमींदार शहर में चला आया। हमें पता चल गया था कि जमींदार शहर जाएगा। अतः हम उससे पहले ही उसके मकान में पहुंच गए और हरिया के कमरे में छुप गए।'

अदालत सुनती रही और टेप रिकॉर्डर से आवाज आती रही। ‘फिर क्या हुआ?'

'साली डॉली भी वहीं पहुंच गई।'

'डॉली कौन?'

'दीना की भतीजी। जमींदार उसी से शादी कर रहा था। हरिया ने बताया था कि वह जय के साथ आई है।'

'अच्छा फिर?'

'जमींदार ने डॉली को अपनी दुल्हन बनाना चाहा। जय ने मना किया और बात बढ़ गई। उस वक्त हम खिड़की के पीछे खड़े सब कुछ सुन रहे थे। बस हमने रिवाल्वर निकाली और जमींदार का खेल खत्म कर दिया।'

'फिर आप कहां गए?'

'छुपे रहे हरिया के कमरे में। फिर जब पुलिस जय को गिरफ्तार करके ले गई तो चले गए।'
 
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