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'फिर तो आप सचमुच बहुत बहादुर हैं-चौधरी साहब! अच्छा एक बात तो बताइए।'
'पूछो रानी! पूछो।'
'आपने जिस रिवाल्वर से खून किया-वह तो लाइसेंसी होगी?'
'बिलकुल नहीं। वह रिवाल्वर तो हमने एक गुंडे से खरीदी थी।'
'फिर तो आप उसे छुपाकर रखते होंगे?'
'छुपाना किससे है? गांव में पूछता ही कौन है। वह तो हमेशा हमारे कमरे की अलमारी में पड़ी रहती है।'
'चलिए छोड़िए।'
'लेकिन-लेकिन तुम कहां जा रही हो?'
'बाथरूम तक-अभी आई।'
कैसेट समाप्त हो गई। और ज्यों ही कैसेट समाप्त हुई-विटनेस बॉक्स में खड़ा चौधरी बच्चों की भांति रो पड़ा।
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जय अभी जेल की गाड़ी तक न पहुंचा था। डॉली ने तेज-तेज कदमों से चलकर उसका मार्ग रोक लिया और बोली- 'तुम-तुम खुश तो हो न जय? बस-एक सप्ताह की बात और है। उसके पश्चात तुम बिलकुल आजाद हो जाओगे?'
'डॉली! समझ में नहीं आता कि तुम्हारा यह उपकार मैं किस प्रकार उतार पाऊंगा। कितनी तपस्या की है तुमने मेरे लिए कितना पैसा खर्च किया है। तुम न होतीं तो मुझे निश्चय ही फांसी हो जाती।'
'ऐसा नहीं होता जय! ऐसा कभी नहीं होता। यह तो अदालत की बात है, मैं तो तुम्हें सावित्री बनकर यमराज से भी छीन लेती।'
'सच्चा प्यार इसी को कहते हैं डॉली! कहते हैं-जिसे कोई पागलपन की सीमा तक चाहता हो-मौत भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।
डॉली! मैं-मैं तुम्हारे प्रेम को प्रणाम करता हूं। मैं तुम्हारी वंदना करता हूं डॉली!'
'पागलों जैसी बातें न करो।'
'डॉली!' 'मैंने रात फिर एक सपना देखा।'
'उसी स्वर्ण महल वाला?'
'नहीं-वो सपना तो उसी मकान का था। जानती हो-मैंने क्या देखा?'
'क्या देखा?'
'तुम सुर्ख जोड़े में लिपटी, सजी-संवरी उस मकान के दरवाजे पर खड़ी हो। मैं न जाने कहां से लौटता हूं। तुम्हारे हाथों में फूलों की माला है और तुम वह माला मेरे गले में डाल देती हो।'
डॉली यह सुनकर कांप-सी गई।
जय उसे ध्यान से देखते हुए फिर बोला 'क्यों मेरा यह सपना तुम्हें पसंद नहीं आया?'
'नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं जय! सपने सुनने में तो अच्छे लगते ही हैं किन्तु तुम जानते हो न-स्वप्न और सच्चाई में अंतर होता है।'
'पर यह सब तो तुम्हारे हाथ में है डॉली! तुम चाहोगी तो यह स्वप्न भी हकीकत में बदल जाएगा। है न डॉली?'
'हां।'
'अब चलूं?'
'रोकना भी चाहूं तो रोक कैसे सकती हूं?'
'बस एक सप्ताह की तो बात है। एक सप्ताह अर्थात् आज ही के दिन। हम यहां से सीधे उसी मकान में जाएंगे। हरिया को तो सजा हो जाएगी। चलो-कोई दूसरा नौकर रख लेंगे। वैसे–यदि तुम कहोगी तो मुझे रामगढ़ में रहने में भी कोई दिक्कत नहीं। वहां भी काफी बड़ी हवेली है-पर बिजली नहीं है। अच्छा छोड़ो, मैं जानता हूं कि अब तुम रामगढ़ में न रह पाओगी। लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे। गांव का वातावरण ऐसा ही होता है। गांव के अधिकांश लोग पुरातनवादी होते हैं। शहर ही ठीक है-मैं यहीं कोई बिजनेस शुरू कर दूंगा।
ठीक है न?' डॉली ने कुछ न कहा और चेहरा झुकाए पांव के अंगूठे से धरती कुरेदती रही।
जय उसे यों विचारमग्न देखकर बोला- 'क्या सोचने लगीं डॉली?'
'क-कुछ नहीं। तुम्हारे ही मुकदमे के विषय में सोच रही थी। अब जाओ। कांस्टेबल नाराज हो रहे हैं। अगले सप्ताह मिलूंगी।' डॉली ने यह सब एक ही सांस में कहा और लौट पड़ी।
जय आगे बढ़ गया।
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'आपने जिस रिवाल्वर से खून किया-वह तो लाइसेंसी होगी?'
'बिलकुल नहीं। वह रिवाल्वर तो हमने एक गुंडे से खरीदी थी।'
'फिर तो आप उसे छुपाकर रखते होंगे?'
'छुपाना किससे है? गांव में पूछता ही कौन है। वह तो हमेशा हमारे कमरे की अलमारी में पड़ी रहती है।'
'चलिए छोड़िए।'
'लेकिन-लेकिन तुम कहां जा रही हो?'
'बाथरूम तक-अभी आई।'
कैसेट समाप्त हो गई। और ज्यों ही कैसेट समाप्त हुई-विटनेस बॉक्स में खड़ा चौधरी बच्चों की भांति रो पड़ा।
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जय अभी जेल की गाड़ी तक न पहुंचा था। डॉली ने तेज-तेज कदमों से चलकर उसका मार्ग रोक लिया और बोली- 'तुम-तुम खुश तो हो न जय? बस-एक सप्ताह की बात और है। उसके पश्चात तुम बिलकुल आजाद हो जाओगे?'
'डॉली! समझ में नहीं आता कि तुम्हारा यह उपकार मैं किस प्रकार उतार पाऊंगा। कितनी तपस्या की है तुमने मेरे लिए कितना पैसा खर्च किया है। तुम न होतीं तो मुझे निश्चय ही फांसी हो जाती।'
'ऐसा नहीं होता जय! ऐसा कभी नहीं होता। यह तो अदालत की बात है, मैं तो तुम्हें सावित्री बनकर यमराज से भी छीन लेती।'
'सच्चा प्यार इसी को कहते हैं डॉली! कहते हैं-जिसे कोई पागलपन की सीमा तक चाहता हो-मौत भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।
डॉली! मैं-मैं तुम्हारे प्रेम को प्रणाम करता हूं। मैं तुम्हारी वंदना करता हूं डॉली!'
'पागलों जैसी बातें न करो।'
'डॉली!' 'मैंने रात फिर एक सपना देखा।'
'उसी स्वर्ण महल वाला?'
'नहीं-वो सपना तो उसी मकान का था। जानती हो-मैंने क्या देखा?'
'क्या देखा?'
'तुम सुर्ख जोड़े में लिपटी, सजी-संवरी उस मकान के दरवाजे पर खड़ी हो। मैं न जाने कहां से लौटता हूं। तुम्हारे हाथों में फूलों की माला है और तुम वह माला मेरे गले में डाल देती हो।'
डॉली यह सुनकर कांप-सी गई।
जय उसे ध्यान से देखते हुए फिर बोला 'क्यों मेरा यह सपना तुम्हें पसंद नहीं आया?'
'नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं जय! सपने सुनने में तो अच्छे लगते ही हैं किन्तु तुम जानते हो न-स्वप्न और सच्चाई में अंतर होता है।'
'पर यह सब तो तुम्हारे हाथ में है डॉली! तुम चाहोगी तो यह स्वप्न भी हकीकत में बदल जाएगा। है न डॉली?'
'हां।'
'अब चलूं?'
'रोकना भी चाहूं तो रोक कैसे सकती हूं?'
'बस एक सप्ताह की तो बात है। एक सप्ताह अर्थात् आज ही के दिन। हम यहां से सीधे उसी मकान में जाएंगे। हरिया को तो सजा हो जाएगी। चलो-कोई दूसरा नौकर रख लेंगे। वैसे–यदि तुम कहोगी तो मुझे रामगढ़ में रहने में भी कोई दिक्कत नहीं। वहां भी काफी बड़ी हवेली है-पर बिजली नहीं है। अच्छा छोड़ो, मैं जानता हूं कि अब तुम रामगढ़ में न रह पाओगी। लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे। गांव का वातावरण ऐसा ही होता है। गांव के अधिकांश लोग पुरातनवादी होते हैं। शहर ही ठीक है-मैं यहीं कोई बिजनेस शुरू कर दूंगा।
ठीक है न?' डॉली ने कुछ न कहा और चेहरा झुकाए पांव के अंगूठे से धरती कुरेदती रही।
जय उसे यों विचारमग्न देखकर बोला- 'क्या सोचने लगीं डॉली?'
'क-कुछ नहीं। तुम्हारे ही मुकदमे के विषय में सोच रही थी। अब जाओ। कांस्टेबल नाराज हो रहे हैं। अगले सप्ताह मिलूंगी।' डॉली ने यह सब एक ही सांस में कहा और लौट पड़ी।
जय आगे बढ़ गया।
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