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स्पर्श ( प्रीत की रीत )

'फिर तो आप सचमुच बहुत बहादुर हैं-चौधरी साहब! अच्छा एक बात तो बताइए।'

'पूछो रानी! पूछो।'

'आपने जिस रिवाल्वर से खून किया-वह तो लाइसेंसी होगी?'

'बिलकुल नहीं। वह रिवाल्वर तो हमने एक गुंडे से खरीदी थी।'

'फिर तो आप उसे छुपाकर रखते होंगे?'

'छुपाना किससे है? गांव में पूछता ही कौन है। वह तो हमेशा हमारे कमरे की अलमारी में पड़ी रहती है।'

'चलिए छोड़िए।'

'लेकिन-लेकिन तुम कहां जा रही हो?'

'बाथरूम तक-अभी आई।'

कैसेट समाप्त हो गई। और ज्यों ही कैसेट समाप्त हुई-विटनेस बॉक्स में खड़ा चौधरी बच्चों की भांति रो पड़ा।

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जय अभी जेल की गाड़ी तक न पहुंचा था। डॉली ने तेज-तेज कदमों से चलकर उसका मार्ग रोक लिया और बोली- 'तुम-तुम खुश तो हो न जय? बस-एक सप्ताह की बात और है। उसके पश्चात तुम बिलकुल आजाद हो जाओगे?'

'डॉली! समझ में नहीं आता कि तुम्हारा यह उपकार मैं किस प्रकार उतार पाऊंगा। कितनी तपस्या की है तुमने मेरे लिए कितना पैसा खर्च किया है। तुम न होतीं तो मुझे निश्चय ही फांसी हो जाती।'

'ऐसा नहीं होता जय! ऐसा कभी नहीं होता। यह तो अदालत की बात है, मैं तो तुम्हें सावित्री बनकर यमराज से भी छीन लेती।'

'सच्चा प्यार इसी को कहते हैं डॉली! कहते हैं-जिसे कोई पागलपन की सीमा तक चाहता हो-मौत भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।

डॉली! मैं-मैं तुम्हारे प्रेम को प्रणाम करता हूं। मैं तुम्हारी वंदना करता हूं डॉली!'

'पागलों जैसी बातें न करो।'

'डॉली!' 'मैंने रात फिर एक सपना देखा।'

'उसी स्वर्ण महल वाला?'

'नहीं-वो सपना तो उसी मकान का था। जानती हो-मैंने क्या देखा?'

'क्या देखा?'

'तुम सुर्ख जोड़े में लिपटी, सजी-संवरी उस मकान के दरवाजे पर खड़ी हो। मैं न जाने कहां से लौटता हूं। तुम्हारे हाथों में फूलों की माला है और तुम वह माला मेरे गले में डाल देती हो।'

डॉली यह सुनकर कांप-सी गई।

जय उसे ध्यान से देखते हुए फिर बोला 'क्यों मेरा यह सपना तुम्हें पसंद नहीं आया?'

'नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं जय! सपने सुनने में तो अच्छे लगते ही हैं किन्तु तुम जानते हो न-स्वप्न और सच्चाई में अंतर होता है।'

'पर यह सब तो तुम्हारे हाथ में है डॉली! तुम चाहोगी तो यह स्वप्न भी हकीकत में बदल जाएगा। है न डॉली?'

'हां।'

'अब चलूं?'

'रोकना भी चाहूं तो रोक कैसे सकती हूं?'

'बस एक सप्ताह की तो बात है। एक सप्ताह अर्थात् आज ही के दिन। हम यहां से सीधे उसी मकान में जाएंगे। हरिया को तो सजा हो जाएगी। चलो-कोई दूसरा नौकर रख लेंगे। वैसे–यदि तुम कहोगी तो मुझे रामगढ़ में रहने में भी कोई दिक्कत नहीं। वहां भी काफी बड़ी हवेली है-पर बिजली नहीं है। अच्छा छोड़ो, मैं जानता हूं कि अब तुम रामगढ़ में न रह पाओगी। लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे। गांव का वातावरण ऐसा ही होता है। गांव के अधिकांश लोग पुरातनवादी होते हैं। शहर ही ठीक है-मैं यहीं कोई बिजनेस शुरू कर दूंगा।

ठीक है न?' डॉली ने कुछ न कहा और चेहरा झुकाए पांव के अंगूठे से धरती कुरेदती रही।

जय उसे यों विचारमग्न देखकर बोला- 'क्या सोचने लगीं डॉली?'

'क-कुछ नहीं। तुम्हारे ही मुकदमे के विषय में सोच रही थी। अब जाओ। कांस्टेबल नाराज हो रहे हैं। अगले सप्ताह मिलूंगी।' डॉली ने यह सब एक ही सांस में कहा और लौट पड़ी।

जय आगे बढ़ गया।

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डॉली लगभग एक घंटे पश्चात घर पहुंची। राज उस समय लॉन में बैठा शरद की धूप का आनंद ले रहा था। डॉली उसके निकट पहुंचकर बोली 'सॉरी राज! आने में थोड़ी देर हो गई।'

'कोई बात नहीं। मेहमान भी चले गए हैं।'

'क्या मौसी और चाचीजी भी?'

'हां।'

'और आपके मित्र?'

'वे भी।' राज बोला- 'रुककर भी क्या करते? मेजबान ही न हो तो मेहमान किसलिए रुकेंगे'

'तुम तो थे?'

'हां, किन्तु घर की लक्ष्मी तो तुम ही हो न। मेहमानों का उत्तरदायित्व तो तुम्हीं पर था।'

'कुछ कह रहे होंगे?'

'नहीं, कुछ विशेष नहीं। पूछा था तुम्हें। कह दिया कि तबीयत ठीक न थी। डॉक्टर के पास गई हैं।'

'सॉरी!' डॉली ने कहा- 'मैं न जानती थी कि वे लोग मेरे पीछे चले जाएंगे। खैर छोड़ो, आओ अंदर चलते हैं।'

'यहीं अच्छा लगता है।'

'किन्तु धूप में अब उतनी गरमाहट कहां। संध्या होने को है। थोड़ी देर बाद सर्दी बढ़ जाएगी।' इतना कहकर डॉली ने पीछे से राज की कुर्सी थाम ली और उसे लेकर कमरे में आ गई।

कमरे में आकर उसने राज के कंधों पर शाल डाल दिया और बोली- 'मैं चाय लेकर आती हूं।'

राज ने कुछ न कहा।

डॉली किचन में गई और चाय ले आई। चाय के प्याले राज के सामने रखकर वह उससे बोली- 'राज! मुझे ज्योति मिली थी।' और इसके उपरांत अपने इस झूठ की प्रतिक्रिया जानने के लिए वह राज की ओर देखने लगी।

राज चौंककर बोला- 'पर तुम्हारा तो उससे कभी परिचय ही न हुआ। तुमने उसे कैसे पहचान लिया?'

'मैंने नहीं-ज्योति ने ही मुझे पहचाना था। शायद पहले कभी देखा हो।'

'कब मिली थी?'

'आज ही उसका बेटा भी साथ में था।'

'क्या कह रही थी?'

'पछता रही थी अपने किए पर। कहती थी-मैंने राज को धोखा देकर इस संसार का सबसे बड़ा अपराध किया है।'

राज ने घृणा से कहा- 'वह औरत नहीं बल्कि नागिन है। इतनी खूबसूरती से डसती है कि पता भी नहीं चलता। उसकी नस-नस में जहर भरा है।'

'दिल तो नागिन के सीने में भी होता होगा?'

'नहीं, नागिन के सीने में जहर के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। न उसके पास हृदय होता है और न ही भावनाएं। वह सिर्फ डसना जानती है।'

'गुस्सा थूक दो। भूलें भी इंसानों से ही होती हैं और वैसे भी सुबह का भूला यदि शाम को घर लौट आता है तो उसे भूला नहीं कहते। मनुष्य गलती करने के बाद पश्चात्ताप करे और उसे सुधार ले तो फिर इससे बड़ी बात कोई नहीं होती। लो-चाय लो।'

राज ने अपना प्याला उठा लिया-किन्तु चेहरे पर कड़वाहट बनी रही।

चाय की हल्की-सी चुस्की लेकर डॉली फिर बोली- 'मुझे तो बहुत दया आई उस पर।'

'क्यों?'

'बेचारी विधवा हो गई है।'

'मनुष्य को अपने दुष्कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है। जो दूसरों का घर जलाते हैं-कभी-न-कभी आग उनके घर में भी तो लगती है। मैं तो कहता हूं-उस कमीनी के साथ इससे भी बुरा होना चाहिए था। मेरी तरह वह भी अपंग हो जाती। सड़ जाती।'

'राज प्लीज! किसी भी दुखी व्यक्ति के प्रति इतनी घृणा ठीक नहीं और फिर घृणा भी क्यों? तुमने तो उसे पागलपन की सीमा तक चाहा है।'

'किन्तु उसने?'

'समझने की कोशिश करो राज! तुमने उसे चाहा-यह तुम्हारा अधिकार था। तुमने उसे हृदय की गहराइयों में उतारा-उससे आत्मा का रिश्ता जोड़ा-यह तुम्हारा अधिकार था। उसने तुम्हें न चाहा-यह उसका अधिकार था। उसने तुम्हें धोखा दिया यह भी उसका हक था। समझ में नहीं आता-तुम उसके अधिकारों की वजह से अपने अधिकारों का खून क्यों कर रहे हो। तुम्हें तो उसे पहले की भांति ही चाहना चाहिए।'

'समझ में नहीं आता-तुम उसका पक्ष क्यों ले रही हो?'

'इसलिए क्योंकि मेरी तरह वह भी एक नारी है। उसे भी प्यार चाहिए किसी का। उसे भी सहारा चाहिए।'

'और-तुम चाहती हो कि उसे वह सहारा मैं दूं? नहीं डॉली! मैं तो ऐसा सात जन्मों में भी न कर पाऊंगा।' इतना कहकर राज ने एक ही घूँट में अपना प्याला खाली किया और व्हील चेयर को घुमाकर खिड़की के सामने ले गया। लॉन में अब धूप न थी। धरती पर सांझ के साये बड़ी तेजी से उतर रहे थे।
 
डॉली उठी और उसने चलकर राज की कुर्सी थाम ली। इसके पश्चात वह राज पर झुककर बोली- 'और यदि मैं उसे सहारा देना चाहूं तो?'

'तुम! वह क्योंकर?'

'इतने बड़े घर में उसे भी थोड़ी जगह दे दूं।'

'ठीक है।' राज ने नाराजगी से कहा- 'मैं कोई दूसरा मकान ले लूंगा।'

'ज्योति की वजह से?'

'डॉली! वह मेरे लिए मर चुकी है। मैं उसके लिए मर चुका हूं। मैं तुमसे विनती करता हूं कि मेरे सामने उसका नाम न लो।'

'अच्छा छोड़ो-एक बात तो मानोगे?'

'वह क्या?'

'अपने बेटे को ले आओ।'

'राजू को?'

'ज्योति बता रही थी कि उसे ब्लड कैंसर हो गया है-वह अधिक समय तक न जी पाएगी। ऐसी स्थिति में उसका बेटा अनाथ हो जाएगा और यह तुम भी जानते हो कि ज्योति का बेटा तुम्हारा बेटा है।'

राज यह सुनकर किन्हीं सोचों में डूब गया।

डॉली उसे यों विचारमग्न देखकर बोली- 'क्या सोचने लगे?'

'सोच रहा हूं-तुम पराए बच्चे को क्योंकर सहन करोगी।'

'राजू पराया कहां है-तुम्हारा ही तो है।'

'फिर भी।'

'मैं वचन देती हूं कि राजू को हमेशा अपना समझूगी।'

'तो फिर एक वचन और दो।'

'वह क्या?'

'तुम यह घर छोड़कर न जाओगी।'

'तुम तो पिछली बातें ले बैठे।'

'तो फिर भविष्य के विषय में बता दो।' राज ने कहा।

डॉली एक बार फिर उसी भंवर में फंसकर रह गई। एकाएक उसकी कल्पना में जय का चेहरा घूम गया। आज ही तो कहा था जय ने- 'डॉली हम यहां से सीधे अपने मकान में जाएंगे। हरिया को तो शायद सजा हो जाएगी। चलो कोई दूसरा नौकर रख लेंगे।' कितना सुखद एवं रुपहला सपना तैर रहा था जय की आंखों में। इतने दुखों के पश्चात आने वाले सुखों की कल्पना उसे कितनी रोमांचित कर रही थी। क्या उसे उसकी इन कल्पनाओं के तार तोड़ देने चाहिए? क्या उसे उसके सपनों का महल गिरा देना चाहिए? क्या वह ऐसा कर पाएगी? है उसके अंदर इतना साहस? और दूसरी ओर ज्योति के बेटे का भविष्य-समाज का बंधन-राज की पीड़ाएं-क्या वह इन सबकी ओर से आंखें मूंद सकती है? है उसमें इतना साहस?

डॉली ने अपने आपसे प्रश्न किया और पत्ते की भांति कांप गई। उसे यों लगा कि वह लाख प्रयास करके भी समाज के इस बंधन को न तोड़ पाएगी। तभी राज ने अपनी आवाज से उसे झिंझोड़ दिया। वह कह रहा था- 'मैं जानता था डॉली कि तुम्हारा मन साफ नहीं और तुम यह वचन कभी न दे सकोगी।'

'न–नहीं राज!' डॉली घबराकर बोली- 'मेरा मन बिलकुल साफ है। मैं वचन देती हूं कि कभी इस घर से न जाऊंगी। मैं-मैं तुम्हारे साथ कभी विश्वासघात न करूंगी राज!'

'सच कहती हो न?' राज ने पूछा और डॉली का हाथ थाम लिया।

'हां-बिलकुल सच।' डॉली ने कहा किन्तु अगले ही क्षणों में उसकी आंखों में आंसुओं की बूंदें झिलमिला उठीं।

राज उसके आंसू न देख सका।

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जय के मुकदमे का अंतिम दिन।

आज इस मुकदमे का निर्णय सुनाया जाना था-अत: अदालत कक्ष में आज पहले से भी अधिक भीड़ थी। विटनेस बॉक्स में खड़ा जय आज इतना खुश था कि खुशी की वजह से उसकी आंखें भी चमक रही थीं किन्तु विचित्रता यह थी कि डॉली आज उदास थी। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे-मानो वह किसी धुंध में फंस गई हो और बाहर निकलने का मार्ग न मिल रहा हो। अदालत कक्ष में सन्नाटा था।

तभी जज महोदय की गंभीर आवाज ने इस सन्नाटे को भंग किया। मुकदमे का निर्णय सुनाते हुए वह बोले- 'गवाहों के बयानात, दोनों पक्षों के वकीलों के तर्क और अदालत में पेश किए गए सबूतों के आधार पर यह अदालत इस नतीजे पर पहुंची है कि मुलजिम जय का कृपाल सिंह के खून से कोई संबंध नहीं है। अतः यह अदालत मुलजिम जय को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए बाइज्जत बरी करती है। साथ ही चौधरी दिलावर सिंह एवं हरिया को मुलजिम मानते हुए उन पर मुकदमा चलाने का आदेश देती है।'

इस निर्णय के साथ ही जय की हथकड़ियां खोल दी गईं। हथकड़ियां खुलते ही जय तो खुशी के मारे जैसे पागल हो उठा और उसने डॉली के समीप पहुंचकर उसके हाथ थाम लिए। इसके उपरांत कंपकंपाती आवाज में वह बोला 'थॅंक–थॅंक डॉली!'

'चलो-बाहर चलो जय!'

'जय डॉली के साथ बाहर आ गया। कपूर साहब वहीं खड़े थे। डॉली के कहने पर जय ने कपूर साहब का शुक्रिया अदा किया और फिर डॉली से बोला- 'आओ डॉली! अब घर चलें।'

'घर।' डॉली बड़बड़ाई।

'हां, किन्तु सुनो-पहले किसी रेस्तरां में बैठते हैं। बहुत भूख लगी है। इसके अतिरिक्त बाहर का कुछ खाए भी तो जैसे सदियां बीत गई हैं।'

डॉली खामोशी से जय के साथ चल पड़ी। जय को उसकी यह खामोशी अच्छी न लगी। वह बोला- 'डॉली!' 'तुम्हें क्या हुआ?'

'क-कुछ भी तो नहीं।'

'फिर यह मौन-यह उदासी?'

'ओह यह!' डॉली को अपनी भूल का अनुभव हुआ। बात को संभालते हुए वह बोली 'दरअसल रात-भर सो न पाई थी।'

'क्यों?'

'तुम्हारी चिंता थी न। सोचती थी-न जाने क्या निर्णय होगा।'

'पगली हो तुम। इतनी कठिन तपस्या करके भी तुम्हारे मन में शंकाएं उठती रहीं।'

'ऐसा ही होता है।'

'चलो छोड़ो। अब तो शंकाएं भी मिट गईं और मैं भी बरी हो गयां कोई गीत सुनाओ।'

'गीत!' डॉली चौंक पड़ी।

'हां।' जय बोला- 'कोई प्यारा-सा गीत, जिसमें मिलन की मधुरता भी हो और वियोग का दर्द भी। आज मैं बहुत खुश हूं-बहुत ही खुश। दिल करता है-तुम्हें लेकर चांद पर पहुंच जाऊं और चांद से कहूं-चांद-बहुत नाज है न तुझे अपनी खूबसूरती पर। देख, मेरी इस दुल्हन को देख। इसकी आंखों में तुझसे अधिक शीतलता भी है और चेहरे में तुझसे अधिक सुंदरता भी।' किन्तु सोचता हूं कि कहीं चांद तुम्हें देखकर चमकना न छोड़ दे।'

'ऐसा क्यों होगा?'

'तुम्हारे कारण। चांद तुमसे ईर्ष्या करेगा न–इसलिए। अच्छा सुनो, हम थोड़ी देर के लिए किसी पार्क में बैठ जाते हैं। क्यों?'

'जैसा तुम चाहो।'

'तो आओ।' इतना कहकर जय ने डॉली का हाथ थाम लिया और उसे साथ लिए निकट के पार्क की ओर बढ़ने लगा। चलते-चलते वह कह रहा था- 'डॉली! यह मैंने आज ही जाना कि यह दुनिया वास्तव में कितनी सुंदर है। जेल में रहकर तो पता ही न चलता था कि मैं कहां हूं। बस-वही ऊंची-ऊंची दीवारें, नीला आकाश-वह भी बहुत छोटा। कैदियों की गाली-गलौज और रात के सन्नाटे को तोड़ती संतरी के भारी बूटों की आवाज। यही दुनिया थी मेरी। कभी-कभी तो इतनी घुटन होती कि दिल चाहता-दीवारों से सिर टकराकर जान दे दूं। खैर, इतनी लंबी और अंधेरी रात के पश्चात भोर तो हुई। हजारों पीड़ाएं तो सहन की-किन्तु तुम्हें पा तो लिया।'

'मुझे?'

'सॉरी!' तुम्हें नहीं-अपने प्यार को।' जय ने कहा और ठहाका मारकर हंस पड़ा।

डॉली मुस्कुरा भी न सकी।

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संध्या हो चुकी थी-किन्तु अभी अंधकार के साये न उतरे थे। जय कुछ देर तो पार्क में बैठा किन्तु फिर डॉली को लेकर अपने मकान में आ गया। हरिया एक दिन पहले तक वहीं था और उसने मकान की सफाई का पूरा-पूरा ध्यान रखा था।

डॉली पहले ही भंवर में फंसी हुई थी और उसके चेहरे पर इस समय भी उलझनों का जाल फैला था। जय के साथ वह आना न चाहती थी-किन्तु इंकार भी न कर सकी थी। फिर भी मन का निर्णय वही था-राज के साथ। विश्वासघात न करेगी। समस्या तो यह थी कि वह जय से यह सब कहने का साहस न जुटा पा रही थी।

तभी वह चौंकी।

जय ने कमरे में आते ही उसे गोद में उठाया और यों नाचने लगा मानो पागल हो गया हो।

डॉली यह देखकर चिल्लाई- 'जय-जय! पागल हो गए हो क्या? छोड़ो न।'

जय ने उसे बिस्तर पर लिटा दिया और स्वयं भी उसके निकट बैठकर बोला- 'डॉली रानी! यह पागलपन नहीं बल्कि खुशी है। जानती हो आज मैं कितना खुश हूं?'

"जानती हूं।' डॉली उठकर बोली।

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'तो आओ।' जय ने उसके कंधे थाम लिए और उसकी आंखों में देखते हुए वह बोला 'अपनी इन मधुर सांसों से मेरी इस खुशी को दोगुनी कर दो।'

'वि-जय!'

'यह-यह तुम्हारी मांग का सिंदूर मेरे ही नाम का है न डॉली? यह माथे की बिंदी-इन होंठों की यह लाली-सब कुछ मेरा ही तो है। तो फिर संकोच कैसा? भय किसका?'

'समाज और संसार का।'

'पगली! हमने एक-दूसरे को प्यार किया। हमने एक-दूसरे को पाने के लिए तपस्या की है। हम तड़पे हैं एक-दूसरे के लिए। हमें समाज और संसार से नहीं डरना चाहिए डॉली! हम कल ही कोर्ट में जाएंगे और एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेंगे।'

'न-नहीं जय!' डॉली ने कांपती आवाज में कहा और अपने कंधे छुड़ाकर बिस्तर से उतर गई।

जय चौंककर बोला- 'क्या मतलब?'

'यह संभव नहीं जय! मेरा मतलब है-हम दोनों कभी पति-पत्नी नहीं बन सकते।'

'किन्तु क्यों?'

'इसलिए कि मैं-मैं...।'

'कहो।' जय ने कहा और डॉली के सामने आ गया।

'इसलिए किं' डॉली बड़ी मुश्किल से कह पाई 'मैं-मैं विवाह कर चुकी हूं।'

मानो कोई चट्टान जय के ऊपर गिरी और उसका मस्तिष्क हजार टुकड़ों में बंटकर बिखर गया। वह कुछ क्षणों तक तो सन्नाटे जैसी स्थिति में खड़ा डॉली का चेहरा देखता रहा और फिर एकाएक चीख पड़ा- 'नहीं-नहीं हो सकता यह।'

'जय-जय! यह सच है।'

'नहीं-नहीं हो सकता यह सच। कभी नहीं हो सकता। कह दो-कह दो कि यह सब झूठ है। कह दो कि तुम मेरा इम्तिहान ले रही हो। कह दो कि तुम मजाक कर रही हो।'

यह सुनकर डॉली की आंखें भर आईं। आंसुओं को छुपाने के लिए उसने अपना चेहरा घुमा लिया और रो देने वाले स्वर में बोली- 'जय-जय! यह मजाक नहीं है। मैंने वास्तव में विवाह कर लिया है।'

'विवाह कर लिया है।' जय बड़बड़ाया और फिर गुस्से से चीख पड़ा- 'तो फिर वह क्या था? जब मांग में सिंदूर, माथे पर बिंदिया और हाथों में कंगन पहनकर तुम मुझसे जेल में मिलने आई थीं। तुमने कहा था-यह सिंदूर तुम्हारा है। यह बिंदिया मैंने तुम्हारे नाम की सजाई है और यह कंगन मैंने तुम्हारी प्रीत के पहने हैं। बोलो-क्यों कहा था तुमने ऐसा? क्यों धोखा दिया तुमने मुझे? क्यों विश्वासघात किया तुमने मेरे साथ-क्यों?'

'मैं-मैं विवश थी।'

'तुम झूठ बोलती हो।' जय पागलों की भांति चिल्लाया- 'झूठ बोलती हो तुम। तुम्हें कोई भी विवाह के लिए विवश न कर सकता था।'

'जय! मुझे तुमने विवश किया था।'

'मैंने।'

'तुमने और तुम्हारी पीड़ाओं ने।' भरे स्वर में डॉली बोली- 'तुम तो पीड़ाओं को पी गए। परिस्थितियों से समझौता कर लिया, किन्तु मैं क्या करती? किस प्रकार बदला चुकाती तुम्हारा? कैसे बचाती तुम्हें?' यह सब कहते-कहते डॉली सिसक उठी और सिसकते हुए बोली- 'वकीलों ने मुझसे कहा था-मुकदमे में तीस-पैंतीस हजार से कम खर्च न होगा। कहां से लाती मैं इतनी बड़ी रकम? किसके आगे हाथ फैलाती? सड़कों पर बैठकर भीख भी मांगती तो हजार का प्रबंध भी न हो पाता। किसी कोठे पर बैठ जाती तो तुम्हारी न रहती। फिर क्या करती मैं क्या करती?'

'मर जाने देतीं मुझे। सड़ जाने देती जेल में। झेलने देतीं मुझे फांसी पर। सच कहता हूं डॉली! मुझे अपनी मौत का कोई दु:ख न होता। कोई पीड़ा न होती मुझे। जानती हो क्यों? क्योंकि मरते वक्त भी मुझे यह संतोष रहता कि कोई मेरा है। कोई है-जो मेरी लाश पर दो आंसू बहाएगा। इंसान को किसी का सच्चा प्यार मिले और उसी क्षण मौत भी आ जाए तो कोई अफसोस नहीं होता, बल्कि खुशी होती है कि प्राण निकले तो किसी अपने की गोद में निकले। मगर आज!' जय ने पीड़ा से होंठ काट लिए और तड़पकर बोला- 'तुमने तो मुझे जीते जी मार दिया डॉली! कहीं का न छोड़ा मुझे। इससे तो बेहतर था कि तुम मेरा मुकदमा न लड़तीं। जेल में रहता तो मन में यह आशा तो रहती कि कभी-न-कभी तुमसे मिलन होगा हुं, कितने सपने सजाता था मैं हर रोज। कल्पनाओं के कितने महल खड़े करता था तुम्हारे लिए किन्तु-तुमने तो मेरा एक-एक सपना तोड़ दिया। जलाकर राख कर दिया एक-एक अरमान को।'

डॉली सिसकती रही।
 
जय ने पीछे हटकर दीवार का सहारा ले लिया और एक पल रुककर बोला- 'लेकिन मैं तुमसे पूछता हूं। मैं पूछता हूं-क्या यही प्रेम था तुम्हारा? यही तुम्हारी चाहत थी?'

'हा।' डॉली ने इस बार अपने आंसू पी लिए और जय को देखते हुए दृढ़ता से बोली- 'यही था मेरा प्रेम, मेरी चाहत। मगर तुम मेरे प्रेम को प्रेम न समझोगे। कारण यह है कि तुम्हें उस प्रेम में कुछ पाना था और मुझे पाना नहीं था जय! लुटाना था। वही किया मैंने। लुटी मैं। मैंने अपनी भावनाओं का खून किया-अपनी आशाओं का कत्ल किया और हृदय को पत्थर बनाकर राज से विवाह कर लिया और मैं-मैं यह पूरी ईमानदारी से कह सकती हूं जय! मैंने यह सब अपने प्यार के लिए किया। अपने प्यार को बचाने के लिए किया। मैंने लुटकर भी प्रीत की रीत निभाई। मैंने किसी दूसरे की पत्नी बनकर भी तुम्हारे नाम की माला जपी। तन्हाइयों में याद किया तुम्हें। क्या यह मेरा प्रेम न था? यदि नहीं तो चीख-चीखकर बेवफा कहो मुझे। कपटी और धोखेबाज कहकर मुझे गालियां दो। मगर एक बात याद रखना जय! वास्तविक प्रेम वही है-जिसमें त्याग एवं समर्पण की भावना हो। जो लुट नहीं सकता-वह प्यार भी नहीं कर सकता। फिर भी हो सके तो मुझे माफ कर देना।' इतना कहकर डॉली मुड़ी ओर तेजी से बाहर चली गई। पीड़ा की ज्यादती के कारण जय न जाने कब तक अपने होंठों को काटता रहा।

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रात कभी की धरती पर उतर आई थी। राज अपनी बहन शिवानी की तस्वीर के सामने उससे कह रहा था- 'देखा, तूने देखा शिवा! मैंने दूसरी दुनिया बसाई तो वह भी जलकर राख हो गई। मैंने दूसरा आशियाना बनाया तो वह भी तिनके-तिनके होकर बिखर गया। इसीलिए तो कहता था तुझसे-मत बाध्य कर मुझे विवाह के लिए। सब धोखेबाज हैं इस दुनिया में। लोग हैं कि एक-दूसरे को नाग बनकर डस रहे हैं। नाम अमृत का लेते हैं और प्याले विष के पिलाते हैं। अब तू ही बता-किस पर विश्वास करूं मैं। किसको अपना कहूं-न-नहीं शिवा! अब यह । पीड़ाएं मुझसे सहन न होंगी। मैं इस घर को जला दूंगा। मैं इस घर के साथ-साथ अपने आपको भी जलाकर राख कर दूंगा। नहीं रहना चाहता मैं धोखेबाजों की दुनिया में।' और इसके उपरांत वह कुर्सी पर बैठे-बैठे ही कमरे में रखा सामान उठा-उठाकर बाहर फेंकने लगा। उसकी इस हरकत से यों लगता था मानो वह पागल हो गया हो।

तभी कोई कमरे में आया और राज से बिना कुछ कहे फर्श पर फैले सामान को बटोरने लगा।

वह डॉली थी।

राज ने देखा तो उसकी आंखों में घृणा की चिंगारियां छूटने लगी और वह पागलों की भांति चिल्लाया- 'चली जाओ। मैं कहता हूं-चली जाओ यहां से। यदि तुम्हारा इस घर से कोई रिश्ता नहीं तो मत आओ यहां। छोड़ दो मुझे अकेला। मर जाने दो मुझे-राख हो जाने दो । जलकर। जाओ-जाओ डॉली!'

'जाना ही होता तो बहुत पहले चली जाती राज!' डॉली के स्वर में अथाह पीड़ा थी। राज के समीप आकर वह बोली 'कोई रिश्ता न होता इस घर से तो फिर लौटकर ही न आती।'

'झूठ बोलती हो। झूठ बोलती हो तुम। तुम्हारा इस घर से नहीं-जय के घर से रिश्ता है।'

'क-राज!'

'यदि यह झूठ है तो बताओ-क्या तुमने उसके मुकदमे की पैरवी न की? क्या तुमने उसे बचाने के लिए अपने दो आभूषण न बेचे? तुम उससे जेल में नहीं मिलीं? तुमने चाहा नहीं उसे?'

यह सुनकर डॉली की आंखें सावन-भादो बन गईं। उसने दोनों हाथों से राज की चेयर थाम ली और तड़पकर बोली- 'मैंने सब किया राज! मैंने सब कुछ किया उसके लिए। आभूषण बेचे-तुम्हें धोखा दिया-घर से बाहर रही-उसके लिए मुकदमा लड़ा किन्तु फिर भी मैंने उससे कभी कोई रिश्ता न जोड़ा। कोई बंधन न बांधा उससे, बल्कि उसे एक ऐसा दर्द दे आई-जो उसे जीने भी न देगा।'

राज उसे ध्यान से देखने लगा।

डॉली ने आंसू पोंछ लिए और एक पल रुककर फिर बोली- 'राज! तुमने कहा था न मुझसे। कहा था न कि भारतीय नारी कभी झूठे फेरे नहीं ले सकती। यह भी कहा था कि हिन्दुस्तान की संस्कृति में पली और जन्मी औरत अग्नि को साक्षी मानकर झूठे वचन नहीं दे सकती। यकीन करो राज! मैंने पूरी ईमानदारी से अपने वचन की लाज निभाई है। धोखा नहीं दिया तुम्हें। तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी को पति नहीं माना और किसी दूसरे घर से रिश्ता न जोड़ा।'

'फिर-फिर क्यों इतना बड़ा त्याग किया तुमने उसके लिए?'

'मुझे उसका बदला चुकाना था राज! उसका ऋण उतारना था मुझे। और वो ऋण ये था कि उसने मुझे रामगढ़ के पास गुंडों से बचाया था। स्वयं उसके पिता भी मुझे लूटना चाहते थे किन्तु उसने मेरे लिए अपने पिता से विद्रोह किया और इसका परिणाम यह हुआ कि उसके पिता का खून हो गया। खून किसी ने किया-सजा उसे मिली किन्तु यह सब हुआ तो मेरे कारण ही। फिर भी मैं किस प्रकार उसकी ओर से मुंह मोड़ती? कैसे न बचाती उसे? क्यों न त्याग करती मैं उसके लिए?'
 
'पर।' राज शांत स्वर में बोला- 'यह सब तुमने पहले क्यों नहीं बताया मुझे-क्यों इस रहस्य को छुपाकर रखा?'

'सिर्फ यह सोचकर कि कहीं तुम मेरे चरित्र पर संदेह न कर बैठो।'

'पगली कहीं की।' राज ने स्नेह से कहा और डॉली को अपनी ओर खींच लिया।

डॉली उसकी गोद में गिरी और सिसक पड़ी।

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'मे आई कम इन सर!'

'आइए।' जेलर साहब ने कहा और दूसरे ही क्षण जिस व्यक्ति ने उनके ऑफिस में प्रवेश किया-उसे देखकर वह चौंक गए और आश्चर्य से बोले- 'तुम!'

'सर! मेरा नाम जय है। दो दिन पहले का विचाराधीन कैदी-कैदी नंबर।'

'तुम तो बरी हो चुके हो।'

'यस सर!'

'फिर क्यों आए हो?'

'सर मुझे बाहर की दुनिया रास नहीं आई। मैं यहीं रहना चाहता हूं। सर! मैं अपनी सांसें इसी चारदीवारी में पूरी करना चाहता हूं।'

'विचित्र-सी बात है। लोग तो जेल के नाम से ही कांपते हैं और तुम बरी होने के पश्चात भी यहीं रहना चाहते हो।'

'यस सर!'

'किन्तु क्यों?'

'सर!' जय ने दुखी स्वर में कहा- 'यह दुनिया अच्छी नहीं। लोग हृदय से लगकर पीठ में छुरा उतारते हैं। पहले अपना बनाते हैं और फिर परायों की तरह ठोकर मारते हैं। यकीन कीजिए सर! मैं ऐसी दुनिया में जी न पाऊंगा।

' 'हूं।' जेलर ने उसे ध्यान से देखा और बोले- 'लगता है कोई गहरी चोट लगी है।'

'और चोट भी ऐसी सर! जो कभी भर ही नहीं सकती।'

'किसी से प्रेम किया होगा?'

'यस सर!' जय बोला- 'और जिससे मैंने प्रेम किया-उसने मेरा मुकदमा लड़ा। दिन-रात भागदौड़ की-पानी की तरह पैसा बहाया और जब मैं जेल से छूटा तो उसने मुझे ठोकर मार दी। सदियों के रिश्ते एक ही पल में तोड़ डाले। अब आप ही बताइए सर! ऐसी दुनिया में रहने से क्या लाभ?'

'देखो यंगमैन!'

'सर!' मैं आपसे विनती करता हूं। मैं प्रार्थना करता हूं कि मुझे जेल में ही रहने दिया जाए। मुझ पर दया कीजिए सर!' कहते-कहते जय की आंखों में आंसू झिलमिलाने लगे।

जेलर ने कहा- 'देखो यंगमैन! मुझे तुम्हारी मानसिक स्थिति ठीक नहीं लगती। प्रेम के इस रोग ने तुम्हें विक्षिप्त कर दिया है। अच्छा होगा कि तुम इस संबंध में किसी मनोचिकित्सक से मिलो।'

'लेकिन सर!'

'यंगमैन! ऐसा कोई नियम नहीं कि किसी निरपराध व्यक्ति को जेल में रखा जाए। तुम जा सकते हो।'

जय उठ गया किन्तु उसकी आंखों से आंसू बहते रहे।

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ज्योति जनरल वार्ड के एक बैड पर लेटी मूर्तिमान-सी कमरे की छत को देख रही थी। निकट ही फर्श पर उसका बच्चा खेल रहा था। तभी डॉली ने कमरे में प्रवेश किया और उसे देखकर ज्योति की निराश आंखों में धुंधली-सी चमक फैल गई।

ज्योति ने थकी-थकी-सी मुस्कुराहट के साथ उसका स्वागत किया और बोली- 'आप बिलकुल ठीक समय पर आई हैं डॉलीजी!'

'आप ठीक तो हैं न?'

'ठीक होती तो इस बिस्तर पर ही क्यों रहती? सच पूछिए तो अब तो चंद सांसें ही रह गई हैं और वे भी शायद इसलिए अटकी हैं क्योंकि मुझे राजू की चिंता से मुक्ति नहीं मिली है।'

'राजू की चिंताओं से तो आप मुक्त हो गईं। मैंने राज से बात कर ली है। वे नीचे ऑटोरिक्शा में बैठे अपने बच्चे की प्रतीक्षा कर रहे हैं।'

'यहां क्यों नहीं आए?'

'आप जानती हैं कि वे व्हील चेयर के बिना एक पग भी नहीं चल सकते।'

'ओह!' ज्योति ने कहा। फिर उसने राजू को अपने समीप बुलाया और उससे कहा- 'राजू! अपने पापा के पास जाओगे?'

'हां मम्मी-मगर आप...?'

'मैं भी आऊंगी। अभी बीमार हूं न-इसलिए नहीं आ सकती।'

'लेकिन ज्योति जी!' डॉली बोली 'मैं तो आप दोनों को लेने आई हूं। राज ने मुझे यही आदेश दिया है।'

'यह-यह आप क्या कह रही हैं डॉली जी!' ज्योति चौंककर बोली- 'वे तो घृणा करते हैं मुझसे उन्हें तो मेरी सूरत से भी नफरत है।'

'विश्वास कीजिए-अब ऐसा न होगा।'

यह सुनकर ज्योति के उदास चेहरे पर खुशियों भरी चमक फैल गई।

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ऑटोरिक्शा ने जेल रोड का चौराहा पार किया और फिर एकाएक रुक गया। राज ने चौंककर देखा-सड़क पर भीड़ लगी थी। दूर तक खून फैला पड़ा था। शायद कोई एक्सीडेंट हुआ था।

तभी राज की नजर एक कांस्टेबल पर पड़ी। कांस्टेबल उसे पहचानता था और इस समय भीड़ को घटनास्थल से दूर हटा रहा था। राज ने उसे निकट बुलाकर पूछा- 'क्या हुआ वर्मा जी?'

'होना क्या है जी! लोग आत्महत्या करते हैं और परेशानी हमें होती है। अब देखिए न-साहबजादे बड़े आराम से फुटपाथ पर चले रहे थे, किन्तु ज्यों ही सामने से बस आई-फौरन उसके आगे कूद पड़े।'

'कौन था?'

'जेब में पड़ी डायरी में तो मृतक का नाम जय ठाकुर लिखा है। आगे ईश्वर जाने।' कहकर कांस्टेबल चला गया।

राज ने निकट बैठी डॉली की ओर देखा। डॉली उसका संकेत समझकर घटनास्थल पर पहुंची और मृतक के निकट चीखकर गिर पड़ी। मृतक कोई और नहीं बल्कि उसका अपना जय ही था।

...............!! समाप्त !! ..................
 
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