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अध्याय आठ
कितने रहस्य कैद है इस लड़की के हृदय में कौन जाने। कभी देखो तो सिर्फ दर्द दिखता है। सिर्फ मासूमियत दिखती है। लेकिन इस बात को भी झुटलाया नहीं जा सकता कि इसके हाथ खून से रंगे हैं। आँखों में सिर्फ गुस्सा भरा है। स्त्री स्नेह को परिभाषित करती है लेकिन इस कुरूप लड़की की पहचान रक्तरंजित है। यह कातिल है।
अदालत में बिलकुल ही सन्नाटा था। लोग अपने स्थानों पर बैठे जज साहब के आदेश का इंतजार कर रहे थे। कुछ समय के लिए जैसे समय का रफ्तार मंद पड़ गया था। आज की कार्यवाही कहाँ से आरंभ किया जाय। परी कटघरे में पिछले दिन की तरह ही खड़ी थी। जज साहब उचित शब्द का चयन कर रहे थे ताकि उस अपराधी से प्रश्न कर सकें। उसकी आगे की कहानी सुन सकें।
"मैं मौत से लड़ती अपने पापा की गोद में अचेत लेटी थी। उस रोज़ अचानक से मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया था। माँ की लाश कीचड़ में तैर रही थी। दादा–दादी के शरीर को आग जला रही थी। मेरे पिता घायल अवस्था में ट्रक के पिछले हिस्से में चेतना से संघर्ष कर रहे थे। उन्हें बहुत चोट लगी थी। कांटों और नुकीले पत्थरों से उनका पैर छलनी हो चुका था। रक्त ज्यादा बह जाने से वे बेहोश हो गए। मेरी सांसे मंद थी। हमारी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हो गया था। ट्रक चलता रहा। कितनी देर... नहीं जानती। कहाँ उसकी मंजिल थी... नहीं जानती।" परी आगे की कहानी सुनाने लगी।
सूर्योदय के साथ ही ट्रक दिल्ली पहुँच गया। फैक्ट्री का मुख्य दरवाजा खोला गया। गाड़ी अंदर गई। गाड़ी रुकते ही कुछ मजदूर भागते हुए ट्रक के पास गए। गाड़ी पर से समान उतार कर फैक्ट्री में रखना था। लेकिन जब उन्होंने ट्रक का दरवाजा खोला तो राघव और उसकी बेटी को देखा। सुपरवाइजर ने तुरंत एंबुलेंस बुलाया। इस बात की जानकारी पुलिस को दी।
अस्पताल में दोनों का उपचार आरंभ किया गया। राघव तो कम घायल था, इसलिए उसे जल्दी ही होश आ गया लेकिन परी लगभग मौत के मुंह में ही थी। उसकी हालत बहुत खराब थी। दो हफ्ते बीत गए लेकिन परी को अभी तक होश नहीं आया था। डॉक्टर का कहना था कि दिमाग में बहुत ही गहरा चोट आया। इसलिए शायद वो कोमा में है। धड़कने मंद है। कहा नहीं जा सकता कि यह जीवित रहेगी भी या नहीं।
बहुत समय बीत गया। राघव स्वस्थ हो गया था। आजीविका के लिए उसे एक कंपनी में मजदूरी का काम मिल गया था। लेकिन इस काम में उसका तनिक भी दिल नहीं लगता। क्योंकि पिछले एक महीने से उसकी बेटी अस्पताल में बेहोश पड़ी थी। न जाने मौत के साथ उसका संघर्ष कब समाप्त होगा! वो कब जागेगी? और पापा कह कर राघव से लिपट जायेगी।
उस हादसे को भूल जाना भी बहुत मुश्किल था। अपनी प्राणों से प्रिय पत्नी को इस तरह खो देगा कौन जानता था। अंतिम बार वह उसे गले भी नहीं लगा पाया था। नीलिमा की शादी की खुशी थी, लेकिन जब कलेजे के टुकड़े को किसी और को दे दिया जाता है, तब सिर्फ बेबसी होती है। भाग कर सुलेखा के पास चला जाना चाहता था। कई घंटों से उसे न देखने से हृदय व्याकुलता के दलदल में धंसते ही जा रहा था। और वह बाजार चला गया। कौन जानता था कि उसकी अनुपस्थिति में वक्त का कहर बरसेगा।
आज राघव साइट पर काम कर रहा था। सीमेंट के भरी बोरियों को कार्य स्थल तक ढोना उसका काम था। फिर सीमेंट को मशीन में डाल कर मसाला तैयार किया जाता था। सिर पर बोरी लादे राघव जा ही रहा था कि उसकी पत्नी की कीचड़ में तैरती लाश का वो दृश्य सामने आ गया। अपने माता और पिता की चीखने की ध्वनि कानों में गूंजने लगी। कितने तड़पें होने न वे लोग! जब अग्नि के ताप से उनके शरीर की कोशिकाएं जल रही होगी, असीम जलन, असहनीय दर्द, कब भागकर बाहर जाएं। किसे बुलाएं जो तुरंत इस दर्द से राहत दिला दे। मदद के लिए पुकारते उनके स्वर घर की चार दीवारों के भीतर उनके शरीर की ही भांति जल कर राख हो गई।
राघव को जैसे वह दर्द महसूस होने लगा था। सीमेंट की बोरी लिए वह गिर पड़ा। यह देख उसके साथ काम करने वाले अन्य मजदूर उसकी ओर दौड़ें। उसकी स्थिति के बारे में सब जानते थे इसलिए सभी इसके साथ सहानुभूति का व्यवहार रखा करते।
काम से छुट्टी होते ही वह बिना वक्त गंवाए अस्पताल भागा। आज महीने हो गए थे, परी अभी तक नहीं जागी। आईसीयू के दरवाजे पर खड़े हो कर एक नजर परी को देखा। वह उसकी इस स्थिति को बिलकुल भी देखना नहीं चाहता था। अचानक से उसे सुलेखा का ख्याल आया। क्या हुआ होगा जब उसे यह समाचार मिला होगा? कैसी बीती होगी उस पर जब उसे पता चला होगा कि मात्र पल भर ही में उसका परिवार तबाह हो गया। अब वह अपने माँ से कभी नही मिल पाएगी। दादा दादी अब कभी नहीं डांटेंगे।
"जब आपकी धड़कने चलती रहती है और आप बहुत ही लंबी नींद में सोए होते हो। मैं एक महीने से कोमा में थी। वक्त अपने साथ परिवर्तन करता ही जा रहा था। लेकिन मेरी स्मृति उसी काली रात में कैद थी। वही सारे दृश्य। जिन्हे झुठलाया नहीं जा सकता था। न स्मृति से मिटाया ही जा सकता था।" जिस नम आँखों से पिछली रात बारिश हो रही थी, अब वह बिलकुल ही सुखी थी। यादों की यतानों की आगत से घायल लड़की जो पूरी रात रोती रही थी, अभी बिल्कुल ही पत्थर सी खड़ी अपनी जीवनी अदालत के दस्तावेजों में अंकित कर रही थी।
फिर मैने अपनी माँ का स्पर्श अपने सिर के ऊपर महसूस किया। पिता का हाथ कंधों पर रखा हुआ पाया। वो मुझे हौसला दे रहे थे। क्षण भर के लिए ही सही मैं अपने साथ हुए अपराध पर क्रोधित हुई, आक्रमक हुई, बदले की भावना हृदय में उत्पन्न हो शरीर में संचालित हुई। झूठे अभिमान की बलि चढ़ी मेरी सहेली कविता, बेकुसूर मेरी माँ और वो लड़का। मैं नहीं जानती थी कि दादा और दादी के खून के छीटें भी कविता के भाईयों और पिता के हाथ के ऊपर हैं।
माँ ने मेरा हाथ थामा। मौत और जीवन के मध्य जूझते मुझ लड़की को जीवन ज्योति की ओर ले जाने लगी। अचानक से जब वह अदृश्य हो गई मैं बेचैन हो गई। बेचैनी, कहाँ चली गई अचानक वो मुझे छोड़कर। और मैं जोर से चीख पड़ी।
"माँ...!" जब मेरी आँखे खुली तो सिर्फ आश्चर्य ही आश्चर्य था। मेरे शरीर की गतिविधियों की गणना करते ये यंत्र, अस्पताल की बेड पर महिनों ले अचेत पड़ी मैं अचानक से कहाँ आ गई। माँ कहाँ गई? पिता जी कहाँ है? मैं अस्पताल में क्यों भर्ती हूं। ये मशीनें... मुझे क्या हुआ है?
हालाँकि गहरे चोट के दर्द पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे और अभी भी मैं इसे महसूस कर सकती थी। लेकिन इस समय वास्तविकता को झेल पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था।
मेरे पिता जो आईसीयू के बाहर बैठे बस रोए ही जा रहे थे मेरे चीखने की आबाज सुनकर भागे अंदर चले आए। मुझे होश में आया देख बहुत खुश हो गए। आंसु अब भी आँखों से बह रहा था लेकिन यह शायद खुशी के थे। अब हमारे परिवार में हम दोनो के अलावा कोई नहीं था। हम दोनों ही एक दूसरे की दुनियां थे। कुछ देर तक टकटकी लगा वो मुझे देखते ही रहें। जैसे कि कई वर्षों के बाद मैं उनके सामने आज खड़ी हूं। लेकिन परिस्थिति को मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरा परिवार तबाह हो चुका है, मैं अपने गाँव और घर को छोड़ एक नई दुनियां में चली आई हूं, इसका मुझे तनिक भी आभास नहीं था।
फिर अचानक से ऐसा हुआ जो आज से पहले कभी नहीं हुआ था। मेरे पिता ने मुझे अपने सीने से लगा लिया। आज मेरे लिए उनका स्नेह उमड़ पड़ा था और इसे रोकने के लिए आज उनके पैरों में सामाजिक रीतियों में पिरोई जंजीरें भी नहीं थी। उनके आंसुओं से मेरा कंधा गीला होता जा रहा था। मेरे आँखों से भी नदी उमड़ती ही जा रही थी।
एक पिता का स्नेह, इसे कैसे परिभाषित करूं? यह दिखावटी नहीं होता। यह बनावटी नहीं होता। शायद उन्हें अपने प्यार का दिखावा करना नहीं आता l लेकिन आज उनकी सारी बंदिशे टूट गई थी। आज अपने बेटी से प्यार करने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था।
"परी..! परी..! मेरी प्यारी बेटी परी..!" सिसकियां लेते हुए वह इन्हीं शब्दों को दोहराते आ रहे थे।
कितने रहस्य कैद है इस लड़की के हृदय में कौन जाने। कभी देखो तो सिर्फ दर्द दिखता है। सिर्फ मासूमियत दिखती है। लेकिन इस बात को भी झुटलाया नहीं जा सकता कि इसके हाथ खून से रंगे हैं। आँखों में सिर्फ गुस्सा भरा है। स्त्री स्नेह को परिभाषित करती है लेकिन इस कुरूप लड़की की पहचान रक्तरंजित है। यह कातिल है।
अदालत में बिलकुल ही सन्नाटा था। लोग अपने स्थानों पर बैठे जज साहब के आदेश का इंतजार कर रहे थे। कुछ समय के लिए जैसे समय का रफ्तार मंद पड़ गया था। आज की कार्यवाही कहाँ से आरंभ किया जाय। परी कटघरे में पिछले दिन की तरह ही खड़ी थी। जज साहब उचित शब्द का चयन कर रहे थे ताकि उस अपराधी से प्रश्न कर सकें। उसकी आगे की कहानी सुन सकें।
"मैं मौत से लड़ती अपने पापा की गोद में अचेत लेटी थी। उस रोज़ अचानक से मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया था। माँ की लाश कीचड़ में तैर रही थी। दादा–दादी के शरीर को आग जला रही थी। मेरे पिता घायल अवस्था में ट्रक के पिछले हिस्से में चेतना से संघर्ष कर रहे थे। उन्हें बहुत चोट लगी थी। कांटों और नुकीले पत्थरों से उनका पैर छलनी हो चुका था। रक्त ज्यादा बह जाने से वे बेहोश हो गए। मेरी सांसे मंद थी। हमारी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हो गया था। ट्रक चलता रहा। कितनी देर... नहीं जानती। कहाँ उसकी मंजिल थी... नहीं जानती।" परी आगे की कहानी सुनाने लगी।
सूर्योदय के साथ ही ट्रक दिल्ली पहुँच गया। फैक्ट्री का मुख्य दरवाजा खोला गया। गाड़ी अंदर गई। गाड़ी रुकते ही कुछ मजदूर भागते हुए ट्रक के पास गए। गाड़ी पर से समान उतार कर फैक्ट्री में रखना था। लेकिन जब उन्होंने ट्रक का दरवाजा खोला तो राघव और उसकी बेटी को देखा। सुपरवाइजर ने तुरंत एंबुलेंस बुलाया। इस बात की जानकारी पुलिस को दी।
अस्पताल में दोनों का उपचार आरंभ किया गया। राघव तो कम घायल था, इसलिए उसे जल्दी ही होश आ गया लेकिन परी लगभग मौत के मुंह में ही थी। उसकी हालत बहुत खराब थी। दो हफ्ते बीत गए लेकिन परी को अभी तक होश नहीं आया था। डॉक्टर का कहना था कि दिमाग में बहुत ही गहरा चोट आया। इसलिए शायद वो कोमा में है। धड़कने मंद है। कहा नहीं जा सकता कि यह जीवित रहेगी भी या नहीं।
बहुत समय बीत गया। राघव स्वस्थ हो गया था। आजीविका के लिए उसे एक कंपनी में मजदूरी का काम मिल गया था। लेकिन इस काम में उसका तनिक भी दिल नहीं लगता। क्योंकि पिछले एक महीने से उसकी बेटी अस्पताल में बेहोश पड़ी थी। न जाने मौत के साथ उसका संघर्ष कब समाप्त होगा! वो कब जागेगी? और पापा कह कर राघव से लिपट जायेगी।
उस हादसे को भूल जाना भी बहुत मुश्किल था। अपनी प्राणों से प्रिय पत्नी को इस तरह खो देगा कौन जानता था। अंतिम बार वह उसे गले भी नहीं लगा पाया था। नीलिमा की शादी की खुशी थी, लेकिन जब कलेजे के टुकड़े को किसी और को दे दिया जाता है, तब सिर्फ बेबसी होती है। भाग कर सुलेखा के पास चला जाना चाहता था। कई घंटों से उसे न देखने से हृदय व्याकुलता के दलदल में धंसते ही जा रहा था। और वह बाजार चला गया। कौन जानता था कि उसकी अनुपस्थिति में वक्त का कहर बरसेगा।
आज राघव साइट पर काम कर रहा था। सीमेंट के भरी बोरियों को कार्य स्थल तक ढोना उसका काम था। फिर सीमेंट को मशीन में डाल कर मसाला तैयार किया जाता था। सिर पर बोरी लादे राघव जा ही रहा था कि उसकी पत्नी की कीचड़ में तैरती लाश का वो दृश्य सामने आ गया। अपने माता और पिता की चीखने की ध्वनि कानों में गूंजने लगी। कितने तड़पें होने न वे लोग! जब अग्नि के ताप से उनके शरीर की कोशिकाएं जल रही होगी, असीम जलन, असहनीय दर्द, कब भागकर बाहर जाएं। किसे बुलाएं जो तुरंत इस दर्द से राहत दिला दे। मदद के लिए पुकारते उनके स्वर घर की चार दीवारों के भीतर उनके शरीर की ही भांति जल कर राख हो गई।
राघव को जैसे वह दर्द महसूस होने लगा था। सीमेंट की बोरी लिए वह गिर पड़ा। यह देख उसके साथ काम करने वाले अन्य मजदूर उसकी ओर दौड़ें। उसकी स्थिति के बारे में सब जानते थे इसलिए सभी इसके साथ सहानुभूति का व्यवहार रखा करते।
काम से छुट्टी होते ही वह बिना वक्त गंवाए अस्पताल भागा। आज महीने हो गए थे, परी अभी तक नहीं जागी। आईसीयू के दरवाजे पर खड़े हो कर एक नजर परी को देखा। वह उसकी इस स्थिति को बिलकुल भी देखना नहीं चाहता था। अचानक से उसे सुलेखा का ख्याल आया। क्या हुआ होगा जब उसे यह समाचार मिला होगा? कैसी बीती होगी उस पर जब उसे पता चला होगा कि मात्र पल भर ही में उसका परिवार तबाह हो गया। अब वह अपने माँ से कभी नही मिल पाएगी। दादा दादी अब कभी नहीं डांटेंगे।
"जब आपकी धड़कने चलती रहती है और आप बहुत ही लंबी नींद में सोए होते हो। मैं एक महीने से कोमा में थी। वक्त अपने साथ परिवर्तन करता ही जा रहा था। लेकिन मेरी स्मृति उसी काली रात में कैद थी। वही सारे दृश्य। जिन्हे झुठलाया नहीं जा सकता था। न स्मृति से मिटाया ही जा सकता था।" जिस नम आँखों से पिछली रात बारिश हो रही थी, अब वह बिलकुल ही सुखी थी। यादों की यतानों की आगत से घायल लड़की जो पूरी रात रोती रही थी, अभी बिल्कुल ही पत्थर सी खड़ी अपनी जीवनी अदालत के दस्तावेजों में अंकित कर रही थी।
फिर मैने अपनी माँ का स्पर्श अपने सिर के ऊपर महसूस किया। पिता का हाथ कंधों पर रखा हुआ पाया। वो मुझे हौसला दे रहे थे। क्षण भर के लिए ही सही मैं अपने साथ हुए अपराध पर क्रोधित हुई, आक्रमक हुई, बदले की भावना हृदय में उत्पन्न हो शरीर में संचालित हुई। झूठे अभिमान की बलि चढ़ी मेरी सहेली कविता, बेकुसूर मेरी माँ और वो लड़का। मैं नहीं जानती थी कि दादा और दादी के खून के छीटें भी कविता के भाईयों और पिता के हाथ के ऊपर हैं।
माँ ने मेरा हाथ थामा। मौत और जीवन के मध्य जूझते मुझ लड़की को जीवन ज्योति की ओर ले जाने लगी। अचानक से जब वह अदृश्य हो गई मैं बेचैन हो गई। बेचैनी, कहाँ चली गई अचानक वो मुझे छोड़कर। और मैं जोर से चीख पड़ी।
"माँ...!" जब मेरी आँखे खुली तो सिर्फ आश्चर्य ही आश्चर्य था। मेरे शरीर की गतिविधियों की गणना करते ये यंत्र, अस्पताल की बेड पर महिनों ले अचेत पड़ी मैं अचानक से कहाँ आ गई। माँ कहाँ गई? पिता जी कहाँ है? मैं अस्पताल में क्यों भर्ती हूं। ये मशीनें... मुझे क्या हुआ है?
हालाँकि गहरे चोट के दर्द पूरी तरह से ठीक नहीं हुए थे और अभी भी मैं इसे महसूस कर सकती थी। लेकिन इस समय वास्तविकता को झेल पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा था।
मेरे पिता जो आईसीयू के बाहर बैठे बस रोए ही जा रहे थे मेरे चीखने की आबाज सुनकर भागे अंदर चले आए। मुझे होश में आया देख बहुत खुश हो गए। आंसु अब भी आँखों से बह रहा था लेकिन यह शायद खुशी के थे। अब हमारे परिवार में हम दोनो के अलावा कोई नहीं था। हम दोनों ही एक दूसरे की दुनियां थे। कुछ देर तक टकटकी लगा वो मुझे देखते ही रहें। जैसे कि कई वर्षों के बाद मैं उनके सामने आज खड़ी हूं। लेकिन परिस्थिति को मैं समझ नहीं पा रही थी। मेरा परिवार तबाह हो चुका है, मैं अपने गाँव और घर को छोड़ एक नई दुनियां में चली आई हूं, इसका मुझे तनिक भी आभास नहीं था।
फिर अचानक से ऐसा हुआ जो आज से पहले कभी नहीं हुआ था। मेरे पिता ने मुझे अपने सीने से लगा लिया। आज मेरे लिए उनका स्नेह उमड़ पड़ा था और इसे रोकने के लिए आज उनके पैरों में सामाजिक रीतियों में पिरोई जंजीरें भी नहीं थी। उनके आंसुओं से मेरा कंधा गीला होता जा रहा था। मेरे आँखों से भी नदी उमड़ती ही जा रही थी।
एक पिता का स्नेह, इसे कैसे परिभाषित करूं? यह दिखावटी नहीं होता। यह बनावटी नहीं होता। शायद उन्हें अपने प्यार का दिखावा करना नहीं आता l लेकिन आज उनकी सारी बंदिशे टूट गई थी। आज अपने बेटी से प्यार करने से उन्हें कोई रोक नहीं सकता था।
"परी..! परी..! मेरी प्यारी बेटी परी..!" सिसकियां लेते हुए वह इन्हीं शब्दों को दोहराते आ रहे थे।