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स्वाभिमानी
बुढ़ापा आ गया है, बीमार भी हूं और अब मेरे विचार अक्सरर मृत्युं की ओर ही जाया करते हैं जो दिन-ब-दिन मेरे पास आ रही है। कदाचित् ही मैं भूतकाल के संबंध में सोचता हूं और शायद ही कभी मैंने अपनी आत्मा की आखों से अपने अतीत के जीवन की ओर मुड़कर देखा है। सिर्फ, समय-समय पर, जाड़े में जब मैं दहकती आग के सामने निश्चतल भाव से बैठता हूं, या गर्मी में जब छायादार वृक्षों की पंक्ति के नीचे धीर-गति से टहला करता हूं तब मुझे अतीतकाल के दिन, घटनाएं और परिचित चेहरे याद आ जाते हैं, किन्तुी ऐसे समय में भी मेरे विचार, मेरी जवानी या पकी उमर पर नहीं जाते, वे मुझे बचपन के प्रारम्भत की या छुटपन के शुरू के वर्षों की ही याद दिलाते हैं। मसलन मुझे उन दिनों की याद आ जाती है, जब मैं देहात में अपनी कठोर तथा गुस्सैल दादी के साथ रहा करता था, उस समय मेरी उम्र सिर्फ बारह साल की थी, और मेरी कल्पैना के आगे दो मूर्तियां आकर खड़ी हो जाती हैं। किन्तु अब मैं अपनी कहानी का सिलसिले के साथ, ठीक-ठीक, वर्णन करूंगा।
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1830
बूढ़ा नौकर फिलिप्पिच दबे पांव, जैसी कि उसकी आदत थी, गले में रूमाल बांधे वहां पहुंचा। उसके होंठ खूब कसकर दबे हुए थे, जिससे उसकी सांस की गंध महसूस न हो और पेशानी के ठीक बीच में सफेद रंग के बालों का गुच्छाि पड़ा हुआ था। उसने अन्द र दाखिल होकर सलाम किया और मेरी दादी के हाथ में एक लम्बील चिट्ठी रख दी, जिस पर मुहर लगी हुई थी। मेरी दादी ने चश्मा उठाया और उस पत्र को शुरू से आखिर तक पढ़ डाला।
''क्याब वह यहां मौजूद है? '' मेरी दादी ने पूछा।
''जी, क्याा फरमाया?'' फिलिप्पिच ने दबी जबान में डरते-डरते पूछा।
''बेहूदे कहीं के! मैं पूछती हूं, जिस आदमी ने यह खत दिया है, क्या वह यहां मौजूद है?''
''जी, वह यही है। दीवान खाने में बैठा हुआ है।''
मेरी दादी ने माला के दाने खड़खड़ाते हुए कहा, ''उसे मेरे पास आने को कहो।'' और फिर मेरी ओर मुखातिब होकर बोलीं, ''देखो, तुम यहीं चुपचाप बैठे रहना।''
मैं तो इस समय भी पहले की तरह ही एक कोने में तिपाई पर बिल्कु ल चुपचाप बैठा हुआ था। मेरी दादी ने मुझ पर पूरी तौर से रौब जमा रखा था।
पांच मिनट के बाद कमरे में पैंतीस वर्ष की उमर का एक सांवला आदमी दाखिल हुआ। उसके बाल काले थे, गाल की हड्डियां चौड़ी थीं, चेहरे पर चेचक के दाग थे, नाक कुछ तिरछी और भौंहें घनी थीं, जिनके अन्द र से उसकी भूरे रंग की छोटी-छोटी उदास आंखें दीख पड़ती थीं। उसकी आंखों का रंग और उनकी अभिव्यिक्ति उसके चेहरे की पूर्वी ढंग की बनावट से मेल नहीं खाती थी। वह एक भद्र व्यकक्ति की भांति लम्बाय कोट पहने हुए था। आते-आते वह दरवाजे पर ठिठक गया और सिर झुकाकर सलाम किया।
''तुम्हाारा ही नाम बैबूरिन है?'' मेरी दादी ने पूछा, और फिर मन-ही-मन कहने लगीं-देखने में तो आरमेनियन जैसा मालूम पड़ता है।
''जी हां", उस व्यनक्ति ने गम्भीिर और निश्चाल स्व र में उत्तंर दिया ।
मेरी दादी के कंठ-स्वैर की पहली कड़कती आवाज पर उसकी भौंहें कुछ सिकुड़ सी गईं। कहीं उसने यह आशा तो नहीं की थी कि मेरी दादी उसे अपनी बराबरी का समझकर सम्बोहधन करेंगीं ?
''क्या तुम रूस के रहने वाले हो और कट्टर धर्मावलम्बी् हो?''
''जी हां।''
मेरी दादी ने अपनी आंखों से चश्माे उतारकर बैबूरिन को सिर से पांव तक गौर से देखा। उस व्यीक्ति ने अपनी निगाह नीची नहीं की, सिर्फ अपने हाथ उसने अपनी पीठ की तरफ मोड़ लिए। मेरा ध्यातन खासकर उसकी दाढ़ी की ओर गया जो खूब घुटी-मुड़ी थी। लेकिन उसके जैसे नीले गाल और ठोड़ी मैंने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखे थे।
''जेकोव पेट्रोविच ने'', मेरी दादी बोलीं, ''अपनी चिट्ठी में तुम्हाअरी जोरदार सिफारिश की है। लिखा है कि तुम बड़े गंभीर और परिश्रमी आदमी हो लेकिन यह तो कहो कि तुमने उसकी नौकरी क्यों छोड़ी?''
''उनकी? उन्हेंआ अपनी जमीदारी के प्रबंध के लिए दूसरे ही ढंग के आदमी की जरूरत है।''
''दूसरे ढंग के आदमी की! मतलब?''
मेरी दादी फिर आनी माला फेरने लगीं, ''जेकोव पेट्रोविच लिखता है कि तुममें दो-दो विशेषताएं हैं। वे क्या हैं?''
बैबूरिन ने अपने कंधे को धीरे से हिलाते हुए कहा, ''मैं नहीं बता सकता कि मुझमें ऐसी कौन-सी बातें हैं, जिन्हें वह मेरी विशेषताएं कहना पसन्दम करते हैं। शायद इसलिए कि मुझे.... शारीरिक दण्डय असह्य है।''
मेरी दादी को यह सुनकर आश्यरर्च हुआ, ''क्यास तुम्हाेरे कहने का अभिप्राय यह है कि जेकोव पेट्रोविच तुम्हेंद कोड़े मारना चाहता था?''
बैबूरिन का काला चेहरा एकदम लाल हो आया, बोला, ''श्रीमती जी, आपने मेरे कहने का मतलब ठीक नहीं समझा। मैंने यह नियम बना लिया है कि मैं किसानों के साथ शारीरिक दण्ड का प्रयोग नहीं करूंगा।''
मेरी दादी ने पहले से भी अधिक आश्चिर्य में आकर अपने हाथों को ऊपर की ओर फैला दिया और फिर वह अपने सिर को एक तरफ कुछ झुकाकर और एक बार फिर गौर से बैबूरिन को देखती हुई बोलीं, ''अच्छाअ, तुम्हाेरा यह नियम है! खैर, इससे हमें कोई सरोकार नहीं! हमें किसी ओवरसियर की जरूरत नहीं है। हमें तो चाहिए हिसाब रखने के लिए एक क्लकर्क, सेक्रेटरी। तुम्हा री लिखावट कैसी है?''
''जी, मैं अच्छी तरह लिख लेता हॅू, हिज्जेर में कोई गलती नहीं होती।''
''इससे मुझे कोई मतलब नहीं। मेरे लिए सबसे जरूरी बात यह है कि लिखना साफ होना चाहिए और नए ढंग के पूछ लगे अक्षर नहीं होने चाहिए। मैं उन्हेंी पसन्द नहीं करती। तुम्हाएरी दूसरी विशेषता क्यान है?''
बैबूरिन कुछ अनमना-सा होकर खांसने लगा, फिर बोला, ''शायद... उन महाशय का आशय इस बात से है कि मैं अकेला नहीं हूं।''
''तुम विवाहित हो?''
''जी नहीं, यह बात नहीं है... लेकिन...''
मेरी दादी ने अपनी भौंहें कुछ टेढ़ी कर लीं।
''मेरे साथ एक व्यक्ति रहता है... वह पुरूष है...मेरा साथी, गरीब दोस्तब।
उससे मैं कभी अलग नहीं हुआ... वह दस बरस से साथ है।''
''वह तुम्हानरा कोई संबंधी है?''
''जी नहीं, संबंधी नहीं, दोस्तथ है। मेरे काम में उसकी वजह से किसी प्रकार की बाधा पड़ने की संभावना नहीं है।''
बैबूरिन ने यह बात इस ख्यााल से कही कि कहीं मेरी दादी इस विषय में आपत्ति न कर बैठें। फिर बोला, ''वह मेरे खर्चे पर और मेरे साथ एक कमरे में ही रहता है। उससे बहुत कुछ काम भी निकल सकता है, क्यों़कि वह खूब पढ़ा-लिखा है... और यह सब मैं उसके बारे में शान मारने के लिए नहीं कह रहा हूं, असल में बात ऐसी ही है, और उसका चरित्र तो एकदम आदर्श है।''
मेरी दादी अपनी होंठों को चबाती हुई अधमुंदी आंखों से बैबूरिन की बातें सुनती रहीं, फिर बोलीं, ''वह तुम्हांरे खर्चे पर रहता है?''
''जी हां।''
''तुम उसे अपनी दरियादिली के कारण रखते हो?''
''जी नहीं, न्याेय के कारण, क्योंबकि एक गरीब आदमी का यह कर्तव्य, है कि वह दूसरे गरीब की मदद करे।''
''सचमुच ! यह पहला मौका है, जब मैंने यह बात सुनी है। अब तक तो मेरा भी ख्यारल था कि यह काम अमीर आदमियों का है।''
''अगर धृष्टैता न समझी जाए तो मैं कहूंगा कि अमीर आदमियों के लिए यह एक मनोरंजन का साधन है, किंतु हमारे जैसे लोगों के लिए तो...''
''अच्छाै-अच्छा, बहुत हो चुका, अब ज्याादा कहने की जरूरत नहीं।''
मेरी दादी ने उसकी बात को बीच में काटकर कहा। फिर क्षण भर सोचने के बाद उन्हों ने नाक के स्वयर से, जो कुलक्षण समझा जाता था, पूछा, ''तुम्हाचरे उस आश्रित की उमर क्याक है?''
''मेरी जितनी ही होगी।''
''ओह, मैंने तो यह अंदाज किया था कि वह कोई बच्चाआ होगा और तुम उसका पालन-पोषण कर रहे हेागे।''
''जी नहीं, यह बात नहीं है! वह मेरा साथी है और इसके सिवा...''
''अच्छाी, इतना ही काफी है।'' एक बार फिर मेरी दादी ने उसकी बातों को बीच में ही काटकर कहा, ''तुम परोपकारी आदमी मालूम पड़ते हो। जेकोव पेट्रोविच का कहना दुरूस्ते है कि तुम्हा री जैसी स्थिति के आदमी के लिए यह एक अजीब बात है। अच्छाड, अब हम लोग काम की बातें करें। मैं तुम्हें समझाये देती हूं कि तुम्हें क्याी-क्याछ करना होगा। तुम्हामरी मजदूरी की निस्बत... (मेरी दादी ने अपने सूखे पीले चेहरे को एकाएक मेरी तरफ करके कहा ) तुम यहां क्याा कर रहे हो? जाओ, अपनी पौराणिक कथाओं का पाठ याद करो।''
मैं उछल पड़ा और अपनी दादी के पास पहुंचकर उसका हाथ चूम लिया। फिर बाहर चला आया, पौराणिक कथाओं का अध्यदयन करने के लिए नहीं, बल्कि बगीचे में सैर-सपाटे के लिए।
मेरी दादी की जमींदारी में एक बगीचा था, जो बहुत पुराना और बड़ा था। उसके एक तरफ पानी से लबालब तालाब था, जिसमें कई प्रकार की मछलियां बहुतायत से पाई जाती थीं। एक प्रकार की खास मछली भी उसमें थी, जो अब प्राय: लुप्ता सी हो गई है। इस तालाब के एक सिरे पर बेंत की एक घनी निकुंज थी। इससे कुछ दूर ऊंचे पर एक ढालू जमीन के दोनों तरफ नाना प्रकार के सघन वृक्ष थे, जिनके नीचे कई प्रकार के फूल फूले हुए थे। इधर-उधर झाड़ियों के बीच में छोटे-छोटे जमीन के टुकड़ों पर हरे रंग की मखमली घास जमी हुई थी और उसके बीच में तरह-तरह के कुकुरमुत्तेट उग आये थे। बसन्त ऋतु में यहां बुलबुलें गाती थीं, कोयल कुहू-कुहू करती थी और सारिकाओं का मोहक स्वकर सुनाई पड़ता था। ग्रीष्मब में यह स्था न हमेशा ठंडा रहा करता था और मैं जंगल और झाड़ियों के बीच अपने किसी प्याकरे गुप्त स्थाबन में, जिन्हेंश मेरा ख्याूल था कि मैं ही जानता था, जाकर बैठ जाया करता था।
अपनी दादी के कमरे से बाहर निकलकर मैं सीधा इसी तरह के एक गुप्तर स्था न की ओर, जिसका नाम मैंने 'स्विट्जरलैण्डल' रख छोड़ा था, गया । किन्तुक 'स्विट्जरलैण्डे' तक पहुंचने के पहले ही मुझे अधसूखी टहनियों और हरी शाखाओं की कोमल जाली के अंदर से यह देखकर बड़ा आश्च र्य हुआ कि मेरे सिवा और किसी ने भी इस स्थाीन का पता पा लिया है। जिस स्थाेन को मैं सबसे अधिक पसंद करता था, उसी स्थालन पर मैंने एक ऊॅचे कद के आदमी को एक लम्बाा ढीला कोट और उसके पास एक लम्बीअ टोपी पहने हुए खड़ा देखा। मैंने चुपके-से उसके पास जाकर उसके चेहरे पर निगाह डाली। उसका चेहरा जो मेरे लिए बिल्कुपल अजनबी था, बहुत लम्बाे और कोमल मालूम पड़ता था। उसकी आंखे छोटी-छोटी और सुर्ख थीं। भोंड़ी नाक, मटर की फली जैसी, उसके होंठों तक लटक रही थी, जिसे देखते ही हंसी आये बिना नहीं रह सकती थी। उसके कांपते हुए होंठ गोल से थे और उनसे तेज सीटी जैसी आवाज निकल रही थी। वह अपने मजबूत हाथों की बड़ी-बड़ी अंगुलियों को अपनी छाती के ऊपरी हिस्सेआ पर तेजी से फेर रहा था। रह-रह कि उसके हाथों की गति रूक जाती थी, होंठों की सीटी जैसी आवाज बन्दे हो जाती थी और सर आगे की ओर झुक जाता था, मानों वह कुछ ध्यालनपूर्वक सुन रहा हो। मैं उसके और भी पास गया और उसे पहले से भी अधिक ध्याीन के साथ देखा। उस आगन्तुयक के दोनों हाथों में एक-एक छोटा कटोरा था, जिसका उपयोग लोग कनेरी चिडि़यों को हैरान करने और उनसे गाना गवाने के लिए किया करते हैं। मेरे पांव के नीचे दबकर एक टहनी टूट गई, जिससे वह आगन्तुेक चौंक पड़ा। उसने अपनी धुंधली छोटी आंखों से झाड़ी की ओर फेरा और वह चल पड़ा। वह लड़खड़ाकर गिरना ही चाहता था कि एक वृक्ष से ठोकर खाकर रूक गया। उसके मुंह से चीख निकल पड़ी और वह चुपचाप खड़ा हो गया।
मैं झाड़ के अंदर से निकलकर खुली जगह में चला आया। मुझे देखकर वह मुस्कुंराने लगा।
मैंने उसका अभिवादन किया।
उत्तेर में उसने भी मुझे 'छोटे बाबू' कहकर मेरा अभिवादन किया।
'छोटे बाबू' कहकर इस प्रकार घनिष्ठबतापूर्वक उसका संबोधन करना मुझे अच्छाऔ नहीं लगा।
''तुम यहां क्यान कर रहो?'' मैंने कठोर स्वउर में उससे पूछा।
''मैं? इधर देखा'' उसने मुस्ककराते हुए जवाब दिया, ''मैं छोटी-छोटी चिडि़यों को गाने के लिए पुकार रहा हूं।'' उसने मुझे अपने हाथ के छोटे कटोरे दिखलाए। ''चैफिंची चिडियां मेरे बुलाने पर खूब बोलती है। तुम बच्चेू हो, इसलिए जरूर ही गाने वाली चिडि़यों का गाना सुनकर खुश होते होंगे। ध्यालन देकर सुनो, मैं चिडियों की तरह चहचहाना शुरू करता हूं और वे फौरन उसके जवाब में चहचहाने लगेंगी। इसमें मुझे बड़ा मजा आता है।''
उसने अपने छोटे कटोरों को बजाना शुरू किया। इसके जवाब में पास के एक वृक्ष से एक चिड़िया सचमुच चहचहाने लगी। इस पर उस आगंतुक ने मूक हंसी हंसते हुए मेरी ओर आंख का इशारा किया। उसकी हंसी, उसका वह इशारा उसकी भाव-भंगिमा, उसकी कमजोर और हकलाती आवाज, उसके झुके हुए घुटने और दुबले-पतले हाथ, उसकी टोपी और लम्बा कोट, उसकी हरेक चीज से उसके भले स्वसभाव का, उसकी निश्च्छलता तथा उसकी विनोदी वृत्ति का आभास मिलता था।
''क्याथ तुम यहां बहुत दिनों से हो?'' मैंने पूछा।
''नहीं, मैं आज ही आया हूं।''
''क्योंा, क्यां तुम वही आदमी तो नहीं हो, जिसके बारे में...''
''मि. बैबूरिन ने यहां उस महिला से जिक्र किया था। जी हां, वही, वही।''
''तुम्हा रे दोस्त का नाम बैबूरिन है। और तुम्हायरा?''
''मुझे पूनिन कहते हैं, पूनिन। वह बैबूरिन है और मैं पूनिन।''
फिर उसने अपने छोटे-छोटे कटोरों को बजाना शुरू किया, ''सुनो, ध्यावन देकर चैफिंची का गाना सुनो। देखो तो वह किस तरह आनंद का गीत गा रही है!''
उस अजीब आदमी ने मेरे हृदय को एकाएक अपनी ओर आकर्षित कर लिया। अन्य, लड़कों की भांति मैं भी अपरिचित व्येक्तियों को देखकर या तो सहम जाता था, या अपनी शान-शौकत दिखलाने लगता था, किन्तुि उस आदमी के साथ तो मुझे ऐसा मालूम पड़ने लगा, मानो मैं वर्षों से उसे जानता हूं।
मैंने उससे कहा, ''आओ, मेरे साथ चलो। मैं इससे भी अच्छी एक जगह जानता हूं। वहां हम लोगों के बैठने के लिए एक स्थान है। वहां बैठकर हम बांध भी देख सकते हैं।''
''अच्छीए बात है।'' मेरे उस नवपरिचित मित्र ने अपनी सुरीली आवाज में जवाब दिया। मैंने उसे आगे-आगे चलने दिया। वह झूमता हुआ और सिर पीछे झुकाये हुए चलता रहा। मैंने उसके कोट की पीठ पर कालर के नीचे लटकता हुए एक छोटा झब्बास देखा।
''यह क्याु लटक रहा है?'' मैंने पूछा।
''कहां?'' उसने प्रश्नप किया, और कालर पर अपना हाथ रखा। ''ओह, झब्बेब के बारे में तुम पूछते हो? मैं समझता हूं कि शोभा के लिए यह वहां लगा दिया गया होगा। पर शायद यह ठीक तरह से लगाया हुआ नहीं है।''
बैठने के स्था न पर पहुंच कर हम लोग बैठ गए। वह भी मेरी बगल में बैठा। ''यह स्था।न बड़ा मनोहर है।'' यह कहते हुए उसने एक गहरी सांस ली, ''वाह, कैसी सुन्दलर जगह है! तुम्हानरा यह बगीचा तो बहुत बढ़िया है। वाह-वाह !''
मैंने उसे एक तरफ से ध्या'नपूर्वक देखा। ''तुम्हामरी यह टोपी तो अजीब ढंग की है।'' इतना कहे बिना मैं नहीं रह सका। ''जरा दिखाओ तो।''
''जरूर मेरे छोटे बाबू, लो, खूब अच्छीी तरह देखो।'' उसने अपनी टोपी उतार ली। मैं अपना हाथ फैलाये हुए था। मैंने अपनी आंखें उठाईं और वह खिलखिलाकर हंस पड़ा। पूनिन का सिर बिल्कुदल गंजा था। उसकी ऊंची उठी खोपड़ी पर, जो चिकनी सफेद खाल से ढकी हुई थी, एक भी बाल नजर नहीं आता था।
उसने अपने हाथ को खोपड़ी पर फिराया और वह खुद भी हंसने लगा। हंसते समय ऐसा मालूम पड़ा, मानो वह किसी वस्तुो को लील जाना चाहता हो। उसका मुंह खुला हुआ था, आंखें बन्दन थीं और माथे पर तीन सलवटें पड़ी थीं, मानों तीन लहरें हों। आखिर वह बोला, ''क्यों , मेरी यह खोपड़ी अंडे की शक्ल की-सी नहीं है?''
''हां-हां, ठीक अंडे की शक्लर-जैसी!'' मैंने बड़े उत्सा ह के साथ उसके कथन का समर्थन किया, ''तुम्हा'रा ऐसा सिर बहुत दिनों से है?''
''हां, बहुत दिनों से। पर जब मेरे बाल थे, उन दिनों का क्याय कहना!
बिल्कुरल सुनहले ऊन जैसे। ठीक उसी तरह के, जिस तरह के बालों के लिए आरगोनेट्स को पाताल की यात्रा करनी पड़ती थी।''
यद्यपि मेरी अवस्थाथ सिर्फ बारह वर्ष की थी, तथापि पौराणिक कथाओं का मैंने अध्येयन किया था, इससे मैं आरगोनेट्स के नाम से परिचित था। फटी चिथड़ी पोशाक पहने हुए उस व्यकक्ति के मुंह से आरगोनेट्स का नाम सुनकर मुझे बड़ा आश्चथर्य हुआ।
''मालूम होता है कि तुमने पौराणिक कथाएं पढ़ी हैं?'' मैंने उससे प्रश्नक किया और उसकी टोपी को अपने हाथों में लेकर इधर-उधर मोड़कर देखने लगा।
''मैंने इस विषय का अध्येयन किया है, मेरे प्या रे छोटेबाबू! मुझे अपने जीवन में हरेक बात के लिए काफी समय मिला है। किन्तु अब मेरी टोपी मुझे दे दो। यह मेरे सिर की नग्नेता को बचाने के लिए है।''
उसने टोपी पहन ली और अपनी सफेद भौंहों को कुछ नीचे की ओर झुकाकर मुझसे मेरा और मेरे माता-पिता का परिचय पूछा।
''मैं उस महिला का नाती हॅू, जो यहां की मालकिन है।'' मैंने जवाब दिया, ''मैं उसके साथ अकेला रहता हूं। मेरे मां-बाप मर चुके हैं!''
पूनिन ने सहानुभूतिपूर्वक कहा, ''भगवान् उनकी आत्माल को शान्ति दे। अच्छाज, तो तुम बे मां-बाप के एक अनाथ बालक हो और साथ ही वारिस भी हो। भले घर के जान पड़ते हो। तुम्हा रे नेत्रों में भलेपन की ज्योनति जगमगा रही है और उसकी धारा भी बह रही है।'' उसने अपनी अंगुलियों से मेरी आंखों की ओर इशारा किया, '' अच्छा , यह तो बताओ कि तुम्हा री दादी से मेरे मित्र की बातें तय हो चुकी हैं? क्या उसे वह नौकरी मिल गयी है, जिसके लिए उसे वचन दिया गया था?''
''मैं नहीं जानता।''
पूनिन ने अपना गला साफ करते हुए कहा, ''अहा, यदि थोड़े समय के लिए भी कोई इस स्थान को अपना निवास-स्थरल बना सके! नहीं तो कहां-कहां भटकना पड़ेगा, और फिर भी शायद ही पैर रखने को कोई जगह मिले। जीवन में अशान्ति के भय निरंतर लगे ही रहते हैं, आत्मा विभ्रान्ता बनी रहती है...।''
''मुझे यह तो बताओ,'' मैं उसकी बात काटकर बीच में ही बोल उठा, ''क्याा तुम्हा रा पेशा पादरी का है?''
पूनिन ने मेरी तरफ मुखातिब होकर अपनी पलकों को आधा मूंद लिया, ''तुम्हा'रे इस सवाल पूछने का क्यान कारण है, भले आदमी?''
''क्योंा, तुम्हामरे बातें करने का ढंग ऐसा है, जैसे कि पादरी लोग गिरजाघरों में बोला करते हैं।''
''क्योंाकि मैं प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों के वाक्योंा और पदों का बातचीत में व्य वहार करता हूँ? किन्तुम इस पर तुम्हेंय चकित नहीं होना चाहिए। मैं यह मानता हूं कि साधारण बातचीत में इस प्रकार के वाक्योंग का सादा प्रयोग नहीं होता, किंतु जब कोई व्यक्ति बनावट से विहृल होकर बातें करने लगता है, उस समय उसकी भाषा भी अधिकाधिक प्रांजल हो उठती है। तुम्हायरे जो अध्याृपक तुम्हें रूसी भाषा पढ़ाते हैं, उन्होंरने तो तुम्हेा यह बात बतलाई होगी। क्या तुम्हेंर ऐसी बातें नहीं बतलाते?''
''नहीं वे मुझे ऐसी बातें नहीं बतलाते।'' मैंने उत्ततर दिया, ''जब देहात में रहता हूं, मेरे साथ कोई शिक्षक नहीं रहता। मास्को में मेरे बहुत से शिक्षक हैं।''
''क्यार तुम देहात में बहुत दिनों तक ठहरोगे?''
''दो मास, इससे अधिक नहीं। दादी कहती हैं कि मैं देहात में रहकर बिगड़ रहा हूं, यद्यपि यहां भी मेरे ऊपर शासन करने वाली एक अध्यादपिका है।''
''वह अध्यालपिका फ्रांसीसी जाति की है?''
''हां ?''
पूनिन ने अपने कान के पीछे खुजलाते हुए कहा, ''वह कोई मिस (कुमारी) है?''
''हां, उसका नाम मिस फ्रीकेट है।''
एकाएक मुझे यह जान पड़ा कि मेरे जैसे बारह वर्ष के एक लड़के के लिए किसी शिक्षक के बजाय शासन करने वाली अध्याापिका का होना, जैसी एक छोटी बालिका के लिए रहा करती है, कलंक की बात है !
''किंतु मैं उसकी परवा नहीं करता।'' मैंने घृणासूचक भाव में कहा, ''मैं क्योंक परवा करने लगा !''