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स्वाहा..
लेखक:- राज भारती
हवाएं चींख रही थीं। मूसलाधार बारिश जारी थी। आकाश से धरती तक मानो पानी की चादर-सी तन गई थी। रात के दो बजे थे। भयानक अन्धेरी रात.... गरजते बादल....कड़कती बिजली.... बारिश के शोर और दरवाजे-खिड़कियां बजाती हवा ने वातावरण को जैसे प्रेत ग्रस्त बना रखा था।
ऐसे में उसने वह खताब फिर देख लिया था।
बड़ा ही अजीव ख्वाब था । भयावह, खौफजदा और सहमा को वाला और इस खाव को वह अब निरन्तर देखने लगी थी। हर दूसरी-तीसरी रात वही ख्वाब देखती थी वह आज भी जव उसकी आंख खुली तो उसके शरीर में कम्पन था । वह हौले-हौले कांप रही थी।
दिल बैठा जा रहा था। कंठ में कांटे से पड़ रहे थे। दिमाग जैसे शल होकर रह गया था।
पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि उसकी आंख खुल गई हैं या यह अभी तक ख्वाब देख रही हैं।
वह अभी एक घण्टा पहले ही तो सोई थी। आज शाम से उसकी तवियत ठीक न थी। दिल पर कुछ वोझ सा था। आज उससे ठीक तरह से खाना भी नहीं खाया गया था। खाना खाने के बाद वह चहलकदमी के लिए जरूर निकलती थी। आज वह टहलने भी नहीं निकली थी। बस आधा-अधूरा खाना खाकर ही अपने कमरे में आ गई थी।
फिर कुछ देर वह टी० वी के विभिन्न चैनल घुमाती रही। एक चैनल पर इंगलिश फिल्म आ रही था। वह देखने बैठ गई। फिल्म लगभग बारह बजे खत्म हुई। उसने टी० वी० ऑफ कर दिया। फिल्म सस्पेन्स वाली थी उसने कई सीन बार-बार उसकी निगाहों में घूम रहे थे। वह यूं ही कमरे से निकलकर गैलरी में आ गई और बाहर का नजारा करने लगी।
तभी निकट के एक पेड़ से एक परिन्दा उड़ा व तेजी से उसके सिर के पास से गुजर गया।
वह एकदम सहम गई।
वह काफी बड़ा पक्षी था चील जितना बड़ा होगा।
उसकी समझ में न आया कि रात के बारह बजे आखिर परिन्दे को उड़ने की जरूरत क्यों पेश आई। यही लगा था उसे जैसे वह परिन्दा उसे ही गैलरी में देखकर उसकी तरफ लपका था।
इस ख्याल ने उसे सहमा दिया।
वह फौरन कमरे में आ गई। दरवाजा अच्छी तरह बन्द किया और बिस्तर पर लेट गई।
नींद आंखों से कोसों दूर थी।
एक तो रहस्यपूर्ण, सस्पेस, फिल्म का असर, फिर उस पक्षी का बहुत ही पास से... उसके चेहरे को हवा देते हुए गुजर जाना। उसने सोचा कि वह नीचे जाकर सो जाए या फिर नीचे से किसी को अपने पास बुला ले। लेकिन ये दोनों ही ख्याल खुद उसे उचित न लगे।
लेखक:- राज भारती
हवाएं चींख रही थीं। मूसलाधार बारिश जारी थी। आकाश से धरती तक मानो पानी की चादर-सी तन गई थी। रात के दो बजे थे। भयानक अन्धेरी रात.... गरजते बादल....कड़कती बिजली.... बारिश के शोर और दरवाजे-खिड़कियां बजाती हवा ने वातावरण को जैसे प्रेत ग्रस्त बना रखा था।
ऐसे में उसने वह खताब फिर देख लिया था।
बड़ा ही अजीव ख्वाब था । भयावह, खौफजदा और सहमा को वाला और इस खाव को वह अब निरन्तर देखने लगी थी। हर दूसरी-तीसरी रात वही ख्वाब देखती थी वह आज भी जव उसकी आंख खुली तो उसके शरीर में कम्पन था । वह हौले-हौले कांप रही थी।
दिल बैठा जा रहा था। कंठ में कांटे से पड़ रहे थे। दिमाग जैसे शल होकर रह गया था।
पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि उसकी आंख खुल गई हैं या यह अभी तक ख्वाब देख रही हैं।
वह अभी एक घण्टा पहले ही तो सोई थी। आज शाम से उसकी तवियत ठीक न थी। दिल पर कुछ वोझ सा था। आज उससे ठीक तरह से खाना भी नहीं खाया गया था। खाना खाने के बाद वह चहलकदमी के लिए जरूर निकलती थी। आज वह टहलने भी नहीं निकली थी। बस आधा-अधूरा खाना खाकर ही अपने कमरे में आ गई थी।
फिर कुछ देर वह टी० वी के विभिन्न चैनल घुमाती रही। एक चैनल पर इंगलिश फिल्म आ रही था। वह देखने बैठ गई। फिल्म लगभग बारह बजे खत्म हुई। उसने टी० वी० ऑफ कर दिया। फिल्म सस्पेन्स वाली थी उसने कई सीन बार-बार उसकी निगाहों में घूम रहे थे। वह यूं ही कमरे से निकलकर गैलरी में आ गई और बाहर का नजारा करने लगी।
तभी निकट के एक पेड़ से एक परिन्दा उड़ा व तेजी से उसके सिर के पास से गुजर गया।
वह एकदम सहम गई।
वह काफी बड़ा पक्षी था चील जितना बड़ा होगा।
उसकी समझ में न आया कि रात के बारह बजे आखिर परिन्दे को उड़ने की जरूरत क्यों पेश आई। यही लगा था उसे जैसे वह परिन्दा उसे ही गैलरी में देखकर उसकी तरफ लपका था।
इस ख्याल ने उसे सहमा दिया।
वह फौरन कमरे में आ गई। दरवाजा अच्छी तरह बन्द किया और बिस्तर पर लेट गई।
नींद आंखों से कोसों दूर थी।
एक तो रहस्यपूर्ण, सस्पेस, फिल्म का असर, फिर उस पक्षी का बहुत ही पास से... उसके चेहरे को हवा देते हुए गुजर जाना। उसने सोचा कि वह नीचे जाकर सो जाए या फिर नीचे से किसी को अपने पास बुला ले। लेकिन ये दोनों ही ख्याल खुद उसे उचित न लगे।