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स्वाहा

रेखा पदचिन्हों को घूरने लगी थी, वह बोली- "आपने ठीक पहचाना भाई! यह निशान वाकई एक ही पैर के हैं।

लेकिन अब एक सवाल उठता है।"

"वह क्या...?"

"अगर यह शख्स एक टांग का है तो, फिर वह किसी बैसाखी या लाठी के सहमती चलता होगा...।"

"हां साफ जाहिर है ।" अमर की मुण्डी सहमति में हिली।"

"तो फिर पैर के साथ वैसा कोई निशान क्यों नहीं है?"

"हां, वाकई!" अमर की मुण्डी फिर हिली- "यह बात भी ध्यान देने लायक है।"

"भाई! ऐसा भी मुमकिन है कि उसकी लाठी या बैसाखी खून से न सनी हो?" रेखा ने अपने सवाल का खुद ही

जवाब दिया। "हां, यह भी हो सकता है।" अमर सोचपूर्ण लहजे में बोला ।

इस मकान की कहानी सुनाते हुए पिछले मकान मालिक वासुदेव ने एक मलंग किस्म के शख्स का जिक्र किया धा- जो चांदनी रातों में छ: फुट ऊंची चारदीवारी पर एक टांग से नाचा करता था। इस बंगले की यह अविश्वसनीय कहानी उसी रहस्यमय मलंग से शुरू हुई थी। इस वक्त वही एक टांग वाला मलंग अमर को याद आ गया था। उसने चाहा कि वो रेखा का ध्यान उस मलंग की तरफ दिलाए लेकिन वह कुछ सोचकर रह गया।

अब यह मामला ज्यादा संगीन हो गया लगने लगा था। लेकिन स्थिति की इस गम्भीरता को वह रेखा के सामने जाहिर

नहीं करना चाहता था।

अमर ने माया को हुक्म दिया- "माया! सारे काम छोड़कर यह खून साफ कर दो...!"

"साहब जी ! अगर आप पिंजरे से उल्लू को निकालकर बाहर फेंक दे तो मैं यह पिंजरा भी धो दूं।" माया बोली ।

"ठीक है...।" अमर समझ गया कि माया उस मरे हुए उल्लू से डर रही है।

वह फौरन आगे बढ़ा-पिंजरे को पैर से जरा आगे खिसकाया। फिर सूखे साफ फर्श पर बैठकर उसने पिंजरे का दरवाजा खोला और हाथ डालकर उल्लू का फैला हुआ पंख पकड़कर उसने उल्लू को बाहर खींच लिया। उसने सोचा था कि वो इस मरे हुए उल्लू को बराबर वाले खाली प्लाट की तरफ उछाल देगा...।

लेकिन... वह अभी उल्लू का पंख पकड़कर खड़ा ही हो रहा था कि एकाएक जबदस्त फड़फड़ाहट की आवाज आई। उल्लू का पंख अमर के हाथ से निकल गया।

यह देख सब सन्नाटे में आ गए।

वह उल्लू अमर के हाथ में बुरी तरह फड़फड़ाया था। और फिर जैसे ही अमर की गिरफ्त ढीली हुई, उल्लू उसके हाथ से निकलकर उड़ता हुआ छत की तरफ उड़ गया था।

रेखा चींख मारकर पीछे हटी। माया भी बुरी तरह चिल्लाई। अमर ने अपने हवास पर काबू रखा और एकदम कहकहा लगाकर हंसा।

"कमबख्त जिंदा था।"

"यह... यह क्या हुआ?" रेखा चकरा गई थी।

स्वाह "कुछ नहीं हुआ...।" अमर मुस्कराते हुए बोला- "हाथों के तोते उड़ने की बजाये आज हाथ के उल्लू उड़ गये।” " आपको मजाक सूझ रहा है-मेरी जान पर बनी हुयी है। "

माया खून पोंछने में लग गई थी। अमर ने रेखा की बात पर कोई तवज्जो न दी और कुछ कहे बिना अपने कमरे की तरफ चल दिया।
 
और यह भयावह स्वप्न-सा घटना क्रम यहीं खत्म न हुआ था।

यह दूसरे दिन शाम की बात है। रेखा सामने बंगले में अपनी सखी रजनी से मिलने गई हुई थी। अमर अपने ऑफिस

में था। घर पर गंगा मौसी और माया के अलावा कोई न था।

और यह वही वक्त था कि घर की कॉलबेल बजी ।

माया ने दरवाजा खोलकर बाहर झांका तो उसकी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गयी। सामने,

बरामदे में, वही रहस्यमय व्यक्ति खड़ा था और इस वक्त वो जैसे गुस्से में था। माया को देखत ही वह सर्द लहजे में बोला-

"हमारा परिन्दा वापस कर दो... 1"

परिन्दा... अच्छा वह उल्लू..। वह तो जी मर गया...।" माया ने जल्दी से बात पलटी, "नहीं जी... वो तो... वो तो ज उड़ गया...।"

" शीना को एक अमानत दी गई थीं-बड़े अफसोस की बात है कि वह उसकी हिफाजत न कर सकी।"

"हैं, जी...।" माया मुंह खोलकर रह गई।

".... वह आजाद हो गया है और यह कोई अच्छी बात नहीं....।" उस रहस्यमय व्यक्ति ने बदस्तूर तीखे लहजे में कहा- " अपनी शीना बीबी को बुलाओ।"

"हैं जी...! मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा हैं। आप क्या कह रहे है ?" माया बौखला गई थी।

"तुम्हारी रेखा बीबी कहां हैं?"

"दो तो जी घर में नहीं हैं।"

"जानता हूँ। उनसे कहना कि अब मेरी मुलाकात उनसे रेगिस्तान में होगी। लाओ, यह खाली पिन्जरा मेरे हवाले कर हो...।"

" अच्छा जी, आप ठहरें... मै लाती हूँ।"

माया बड़ी तेजी से पिंजरा उठा लाई। वह करीब ही दीवार के साथ रखा था "यह लो, जी...।"

उस रहस्यमय व्यक्ति ने पिंजरा अपने हाथ में ले लिया। फिर हाथ ऊंचा करके पिंजरे को बड़ी हसरत भरी नजरों से देखा और जाने के लिए पलटा ।

"वो जी... आपका नाम क्या है? बीबी से मैं क्या कहूँगी कि कौन आया था...।"

"काला चिराग ...।" उस रहस्यमय व्यक्ति ने जाते-जीते मुड़कर कहा- "मेरा संदेशा देना मत भूलना। "

"नहीं जी...।" माया ने यकीन दिलाया।

"हां, उनसे कहना कि कोई रेगिस्तान में उनका इन्तजार कर रहा हैं... यहां वक्त बर्बाद न करें...।"

" अच्छा जी, कह दूंगी।" माया धूक निगलते बोली।

वह रहस्यमय व्यक्ति, खाली पिंजरा घुमाता हुआ तेजी से आगे बढ़ गया। माया ने फौरन दरवाजा बन्द कर लिया। दरवाजा बन्द करके वह कुछ देर खामोशी से खड़ी रही। फिर उसने दरवाजा खोलकर बाहर झांका। वह जा चुका था।

माया तत्काल बाहर निकली और सड़क पार करके सामने वाले वंगले के दरवाजे पर पहुंची--कॉल बेल दवाई
 
दरवाजा रजनी के नौकर ने खोला ।

"हां... क्या है?"

"बीबी कहां है। रेखा बीवी...!"

" अन्दर हैं...।" नौकर ने कहा और एक तरफ हटते माया को अन्दर आने को रास्ता दे दिया।

रेखा ने माया को भीतर आते देखा तो उसका माथा ठनका। उसने तेजी से पूछा-

"क्या हुआ, माया ? खैर तो है?"

"हां जी, बिल्कुल खैर है, वो जी आपको बड़ी बीबी बुला रही है।” "रेखा उठ खड़ी हुई। मैं चलती हूँ, रजनी...तुम आना...।"

रजनी उसे गेट तक छोड़ने आई।

रेखा और माया सड़क पार कर अपने बंगले के गेट के करीब आ गई तो, माया ने उसके निकट होते बड़ी राजदारी से कहा-

"बीबी, वो आया था?"

"वो काले कपड़ों वाला?" रेखा ने ठिठकते हुए पूछा।

"हां जी, पर आपको कैसे पता चल गया...।"

"तुम्हारी शक्ल देखकर। हवाईयां जो उड़ रही हैं। "

"वो जी खाली पिंजरा ले गया है और आपके लिए एक सन्देशा दे गया है।" और माया ने उस रहस्यमय व्यक्ति के साथ हुई बातें सविस्तार कह सुनाई।

यह सब सुन रेखा का रंग उड़ गया। एक अज्ञात-सा भय उसके दिमाग पर छा गया था। वे बातें करते हुए ही अन्दर

आए थे। अपने कमरे में आकर रेखा एक कुर्सी पर बैठ गई तो माया बैड के कोने पर आ बैठी।

रेखा की समझ में नहीं आ रहा था यह रहस्यमय व्यक्ति है कौन, जो अचानक ही कहीं से प्रकट हो जाता था। नाम भी बड़ा अजीब था। काला चिराग भला यह भी कोई नाम हुआ। चिराग से तो रोशनी फूटती है और रोशनी काली कब होती है।

वह सन्देशा दे गया था कि अब रेगिस्तान में मुलाकात होगी। पर रेखा को किसी रेगिस्तान में जाने की क्या जरूरत थी। अगर कोई उसकी इन्तजार किसी रेगिस्तान में कर रहा है तो फिर जिन्दगी भर इन्तजार ही करता रहेगा। वह यहां आराम से रह रही थी उसे रेगिस्तान में भटकने की भला क्या जरूरत है।

वह यह सोच रही थी और नहीं जानती थी कि वो जो सोच रही है गलत सोच रही है। आने वाला वक्त उसके लिए जो. ॥ जाल बुन रहा था उस जाल में फंसकर उसे न जाने कहां-कहां भटकना था।

माया रेखा को खामोश बैठा देखकर खड़ी हो गई, बीबी, में नीचे जा रही हूँ-जरा किचन देखूं ।

माया के नीचे चले जाने के बाद रेखा कुर्सी से उठी और टेर्लोफान उठाकर बैड पर ले आई और आलती पालती मारकर बैठ गई। उसने अमर का नम्बर लगाया और रिसीवर कान से लगा लिया। दो घंटिया बजने के बाद किसी ने रिसीवर उठाया।

उधर से 'हैलो" कहने वाला व्यक्ति अमर नहीं था उसका असिस्टेन्ट आनन्द था।
 
"भाई कहां हैं?" रेखा ने उसकी आवाज पहचानकर पूछा था।

आनन्द भी रेखा की आवाज को पहचानता था, सो फौरन समझ गया कि किस भाई को पूछा जा रहा है। उसने जवाब दिया- "जी वह तो चले गए। "

"कहां...?"

" किसी साहब से मिलने गए हैं-वहां से घर चले जायेंगे।"

"अच्छा, ठीक है।" कहकर रेखा ने रिसीवर रख दिया। बाहर अब बारिश होने लगी थी।

रिसीवर रखने के बाद वह यूं ही दरवाजे को देखती रही। दरवाजे को देखते-देखते उसे यूं महसूस हुआ जैसे कोई अन्दर आया है। यह उसकी अजीब आदत थी। उसे बैठे- बैठाये ही अपने गिर्द किसी दूसरे की मौजूदगी का अहसास हो रहा था। किसी अमानवीय प्राणी की मौजूदगी का अहसास।

इस गैर इन्सानी प्राणी के बारे में सोचते-सोचते उसका ध्यान उस बन्द कमरे की तरफ चला गया। फिर वे अख्तयार ही ललक उठी कि वो उठे, उस कमरे का ताला खोले और उस कमरे के अन्दर चली जाए। अंदर जाकर देखे तो सही कि उसमें क्या है?

उल्लू का खून, कदमों के निशान, घायल उन्तु का फड़फड़ाकर उड़ जाना, बड़े दादा का लिफाफा, बंद कमरा, उसके

हैण्डल पर लटका हुआ ताबीज। इन सब बातों ने उसे सख्त उलझन में डाल दिया था। उसकी जिज्ञासु प्रवृत्ति उसे इस

के लिए उकसा रही थी कि वह किसी तरह उस काली दिवारों वाले कमरे में दाखिल हो जाए। उसे तो यह भी मालूम नहीं था कि उस कमरे के ताले की चाबी किसके पास है। उसने इस सिलसिले में गंगा मौसी से बात करने की सोची। वही चाबी के वारे में बता सकती थीं।

वह गंगा मौसी के कमरे में पहुंची।

उसने देखा कि अमर भी मौसी के साथ बैठा उनसे बात कर रहा है। उन दोनों ने ही मुस्कराकर जैसे रेखा का स्वागत किया था।

गंगा मौसी बोली " आओ, रेखा...!"

"बारिश का मजा ले रही हैं, आप...?" अमर बोला था।

"हां, भाई! आप जानते ही है मुझे बारिश कितनी अच्छी लगती है। जी चाहता है, ऐसी बारिश में नहाऊं.....!"

"तो नहाओ, किसने रोका है...।"

"अरे, अमर कैसी वात कर रहे हो।" मौसी ने विरोध किया- "हर्गिज नहीं, बेटी! बीमार हो जाओगी।"

"सुन लिया भाई।" रेखा ने हंसकर कहा।

मौसी विषय बदलते हुए बोली थी- मअच्छा हुआ, बेटी तुम आ गई। मैं तुम्हें बुलाने वाली थी।" मौसी एकाएक ही संजीदा नजर आने लगी थीं, में अभी अमर से तुम्हारी ही बात कर रही थी।

"क्या मौसी?"

"वह माया बता रही थी कि वो मरजाना काले कपड़ों वाला फिर आया था अपना उल्लू वापस लेने।"

अमर भी हालात से आगाह था, उसने हंसते हुए ही टिप्पर्णा की थी "उल्लू तो उसे मिला नहीं, खाली पिन्जरा ल गया और आईदा प्रकार का वक्त दे गया। "

''जी भाई! वो कह गया है कि रेगिस्तान में मिलेगा...।" रेखा ने सहज भाव में जवाब दिया- "जाने कौन शख्त है
 
मैने तो आज तक उसे देखा नहीं...।"

"अब तो उससे मिलने के लिए रेगिस्तान का ही रूख करना पड़ेगा।" अमर बदस्तूर शोखी से बोला था।

"भगवान न करे। अमर तुम बेकार की बेहूदा बातें बहुत करते हो...।" मौसी ने अमर को प्यार से डांटा।

“भाई, एक बात तो बताओ।" रेखा अमर को निहारते हुए बोली।

“जरूर... क्या बात है?"

"उस काली दीवारों वाले कमरे की चॉबी कहां है?" रेखा ने पूछा।

"क्यों खैरियत तो है?" मौसी एकदम सहम गई- "रेखा बेटी! यह अचानक तुम्हें चाबी का ख्याल कैसे आया?" "बस, वैसे ही पूछ रही हूँ?" रेखा सहज भाव में बोली - "कहा है चाबी भाई । "

“चाबी कहां है, मुझे खुद याद नहीं।" अमर बोला- वासूदेव साहब ने जाने चाबी मुझे दी भी थी या नहीं। सात-आठ साल हो गए है यह मकान खरीदे। अब कुछ याद नहीं है, वैसे भी जब वासूदेव साहब ने यह बात मुझे बता दी कि इस कमरे को किसी भी हालत में कभी नहीं खोलना है तो मैंने इस कमरे की चाबी का भी ज्यादा ख्याल नहीं किया होगा। मेरा ख्याल है वासूदेव साहब ने चाबी मुझे दी ही नहीं थी।"

"हां नहीं दी थी।” मौसी बोल उठी- "मुझे याद है हमने मांगी भी नहीं थी । "

चाबी के बारे में इस रहस्योद्घाटन ने कि वह घर में नहीं है रेखा को बड़ा निराश किया। वह कुछ देर मौसी और अमर से बातें करती रही तथा फिर अपने कमरे में आ गई।

अपने कमरे में आकर रेखा, उस काले कमरे का ख्याल अपने जहन से नहीं निकाल पाई थी और न ही उस कमरे में

जाकर अन्दर से देखने की अपनी ख्याहिश को ही दबा पाई थी। बल्कि जाने क्यों उसे यह महसूस हो रहा था, जैसे

कोई उसके कान में कह रहा हो "आओ रेखा, चला वह कमरा देख लो...।"

अपना ध्यान बांटने को ही रेखा ने कैसेट लगाई और सुनने लगी। ध्यान थोड़ा बंटा और फिर कैसेट सुनते सुनते ही जाने कब उसे नींद आ गई।

रात को दो बज रहे थे। बारिश बंद हो चुकी थी। रेखा की आंख अचानक ही खुल गई।

उसका गला खुशक हो रहा था।

उसने उठकर साईड टेबिल पर रखे जग से पानी निकालना चाहा मगर जग तो खाली था। माया, शायद आज पानी रखना भूल गई थी। उसने जग उठाया, दरवाजा खोलकर बाहर आई और सीढ़ियां उतरने लगी। इरादा नीचे रखे फ्रिज से पानी लेकर आने का ही था। लेकिन नीचे पहुंची तो उसकी सोच बदल गई।

उसने जग डायनिंग टेबल पर छोड़ा और जैसे मंत्र-मुग्ध-सी ही उस बंद कमरे की तरफ बढ़ गई।

हैरत की बात यह थी कि अभी कुछ दर पहले प्यास की वजह से उसके गले में कटि से चुभ रहे थे। लेकिन अब वह - अहसास जाता रहा था। प्यास बुझ गई थी जैसे वह बड़े इत्मीनान से उस रहस्यमय कमरे की तरफ बढ़ती चली गई। और फिर... 1

वह जब उस कमरे के निकट पहुंची तो यह देखकर हैरान रह गई कि गंगा मौसी पहले से ही वहां मौजूद है।

"आओ रेखा आओ। मुझे मालूम था कि तुम यहां जरूर आओगी...।"

और फिर इससे पहले कि रेखा कुछ कहती, गंगा मौसी बड़ी तेजी से उसकी तरफ लपकी।

जैसे उसे मारना चाहती हो।

"बेवकूफ लड़की, क्यों अपनी जिन्दगी के पीछे हाथ धोकर पड़ी है, ठहर तो... मैं बताती हूँ तुझे।"

गंगा मौसी को यूं अपनी तरफ लपकते देखकर रेखा, फिर वह किसी चीज से उलझकर लौटी तो उसकी चींख निकल गई।
 
रेखा की आंखें खुली। उसने खुद को अपने कमरे में अपने बैड पर पाया यानि कि वह ख्वाब देख रही थी। उसने साईड टेबिल पर रखे जग पर नजर डाली। जग पानी से भरा हुआ था। वह उठकर बाथरूम में गई। वहां से निकली तो वह ख्याल जो शाम से उसके दिल में बार-वार उठ रहा था उसी ख्याल ने अचानक फिर सिर उठाया।

कोई था जो उसे इस बात पर उकसा रहा था कि वह उठकर नीचे जाए।

बाहर अब भी हल्की-हल्की बारिश हो रही थी और उसके दिल में नीचे जाने की ख्वाहिश तीव्र होती जा रही थी। वह -जैसे वे अख्तयार ही बाहर निकली व किसी सम्मोहित मंत्र-मुग्ध प्राणी की तरह धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरने लगी। रात के सन्नाटे में झीगरों की आवाजें बहुत साफ सुनाई दे रही थीं।

रेखा का अहसास ही न हो सका कि वह कब उस बन्द दरवाजे के सामने पहुंच गई। जिसके हैण्डल पर काल धागे

और काले कपड़े में लिपटी ताबीज लटका हुआ था। तबीज को साथ लगाए बिना ही उसके हैण्डल पर हाथ रखा और तभी उसके मुंह से वे अख्तयार निकला. "अरे...!"

आश्चर्य की बात ही था। उसकी हैरत स्वाभाविक थी। इस कमरे को बरसों से बन्द व लॉण्ड बताया जा रहा था। लेकिन वह बन्द न था। रेखा ने ताबीज को हाथ लगाए बिना ही हैण्डल को घुमाया ती वह फौरन व सहज में ही घूम गया। दरवाजा थोड़ा-सा खुल गया। दरवाजा खुलते ही अन्दर से सर्दी की तेज लहर आई बेहद ठण्डी हवा थी। यही लगा था जैसे भीतर एक साथ कई एअर कन्डीशनर चल रहे हों।

सर्दी की लहर के साथ ही खौफ की लहर भी आई जो सीधी रेखा की रीढ़ की हहु में उतरती चली गई। उसका दिल कांप उठा, हाथ-पांव ठण्डे पड़ गए। रेखा की यह मनोवृत्ति इन भयावह क्षणों के सबब थी इससे पहले तो रेखा पर खौफ की बजाय एक जिज्ञासा की कैफियत हावी थी। शाम ही से उसे कोई इस दरवाजे की तरफ खींच रहा था। सोते स्वप्न में भी उसकी यह ख्याहिश जोर मारती रही थी। वह इसी ख्याहिश के अधीन ही तो मंत्र-मुग्ध व सम्मोहित-सी इस दरवाजे तक पहुंची थी और उसने बेधड़क हीण्डल पर हाथ रख दिया था।

हैण्डल घुमाया था तो सर्दी की तीव्र लहर थोड़े से खुले दरवाजे से निकल मानो चमगादड़ बनकर उसके बदन से

लिपट गई हो।

वह थर्रो उठी। उसने फौरन दरवाजे का हैण्डल अपनी तरफ खींच लिया।

दरवाजा हल्की-सी खट् के साथ बन्द हो गया ।

रेखा के मसामों से पसीना फूट निकला था। उसने अपने दांए-बांए देखा। राहदारी में कोई नहीं था। इस वक्त वहां कौन होता भला सब अपने कमरों में थे।

वह लड़खड़ाते कदमों से चलती जीने की तरफ आई और फिर जल्दी-जल्दी सीढ़ियां फलांगती ऊपर पहुंची। अपने

कमरे में पहुंचकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और दरवाजे से पीठ लगाकर हांफने लगी।

तभी बड़े जोर से बिजली चमकी, बादल गजें और एकदम ही मूललाधार बारिश होने लगी। वातावरण एकाएक ही बड़ा भयावह तथा हौलनाक हो गया। वह धीरे-धीरे चलती अपने बैड की तरफ आई और धम्म से कटे हुए शहतीर की तरह उस पर गिरी। कुछ देर तो यूं ही साकत निश्चल पड़ी रही फिर हाथ बढ़ाकर जग उठाया और उसी में मुंह लगाकर दो घूंट पानी पिया। फिर सीधी लेटकर छत को खाली-खाली नजरों से घूरने लगी।

अब उसका भय शनै-शनै कम होता जा रहा था।

रेखा के लिए यह बड़ा विचित्र अनूठा अनुभव था। सब कुछ ही तो आशा विपरीत हा रहा था। इसकी आशा तो उसे कदापि नहीं थी कि दरवाजा इस तरह खुला मिल जाएगा, रेखा उस कमरे में जाने की तीव्र इच्छा रखती थी क्योंकि बड़े दादा हरि आम ने उसके खाव का उसके ख्वाव को उस दरवाजे से जोड़ दिया था।

कैसा अनूठा अनुभव था यह कि रेखा अपने आपको किसी अज्ञात गैर इंसानी प्राणी कं प्रेरित किए... बरबस ही और सम्मोहित सी है उस दरवाजे तक जा पहुंची थी। उस अदृश्य अमानवीय प्राणी ने ही उसे बेबस कर अपना आदेश मानने को विवश कर दिया था। वह दरवाजे तक पहुंची और फिर उस पर रहस्योद्घाटन हुआ कि जिस दरवाजे की
 
बाली के लिए वह हलकान रही थी वह दरवाजा लॉकल था ही नहीं, पर विजाबना यह भी थी कि लाख चाहते हुए भी दरवाजा खुला मिलने पर भी रेखा आन्न्दर नहीं जा सकी थी। जरा-सा अन्दर जाना तो दूर की बात है वह दरवाजा खोलकर अन्दर देख ज्ञान भी न गती थी। दरवाजा खुलते ही ऐसी डण्डी हवा, कि खुदा की पनाहा उस कमरे में तो खिड़किया भी नहीं भी फिर भी ऐसी खून जमा देने वाली शीत लहरा

बहरहाल, इतना फायदा तो हुआ ही था कि अब रेखा जान गई थी कि यह दरवाजा लॉक नहीं है। यह हकीकत अगर वो मौसी और अगर भाई को मनति तो उन्होंने सिर्फ हैरान ही नहीं, खौफजदा हो जाना था।

रेखा सोचने लगी कि यह इस भेद को भेद ही रखे-किसी को न बताए कि दरवाजा खुला हुआ है और दिन के वक्त

मौका पाकर उस कमरे में घुस जाए। ऐसी ही बातें सोचते-सोचते लगभग तीन बजे रेखा एक बार फिर नींद को चाहों में भी और उसे पुरसुकून नींद आई थी।

रात को दर से सोई थी सो प्रातः जल्दी उठने का सवाल ही नहीं था। माया कई बार ऊपर चक्कर लगा गई थी उसे रेखा के कमरे का दरवाजा हर बार बंद ही मिला था। रेखा के बारे में गंगा मौसी भी कई बार पूछ चुकी थी और उसे हर बार यही जवाब मिला था-

"यह सो रही है, बड़ी बीबी। दरवाजा भीतर में बन्द है।"

गंगा मौसी ने नाश्ता अपने कमरे में मंगवा कर किया था और अखबार भी पढ़ लिया था। मगर रेखा के उठने की सूचना उन्हें अब तक नहीं मिली थी और फिर साढ़े नौ बजे, आफिस जाने से पहले अमर, गंगा मौसी से विदा लेने आया तो उन्हें वक्त का अहसास हुआ।

गंगा मौसी की बेचैनी बड़ी उसने माया को आवाज दी।

"आई बर्ड बीबी।"

माया कमरे में आई तो अमर भी मौसी के पास था।

"अच्छा मौसी ! मैं चलता हूँ।" अमर ने कहा और कमरे से निकल गया।

"बड़ी बीबी... वह जी दूध फट गया है।" माया ने मुंह खाला वो यही बताने को इधर आ रही थी कि गंगा मौसी ने उसका आवाज लगा दी थी।

"हाय...।" गंगा मौसी ने बड़ा-सा मुंह खोलकर इस तरह अपने दोनों हाथ सीने पर रखे जैसे टूध न फल हो बम फट गया हो। " अरी, निगोड़ी! यह तूने सुबह-सुबह कैसी अशुभ खबर सुनाई। यह तो बड़ा अपशगुन है। अमर, सुन तो । जरा एक मिनट ठहर ! यह कहकर गंगा मौसी मुंह ही मुंह में कुछ पढ़ने लगी।

"अरे, मौसी ! कुठ नहीं हुआ । दूध ही तो फटा है। मैं दूध वाले को कहता, जाऊंगा वह अभी और पै जाएगा। आप भी मौसी, दिन प्रतिदिन, वहमी होती जा रही हैं।" अमर ने मुस्कराते हुए कहा ।

"तुम्हें नहीं मालूम, अमर! दूध का फटना अच्छा नहीं होता।" मौसी ने कुछ पढ़न के बाद अमर के मुंह पर तीन फूंके, मारा।

"क्या हो जाता है?" अमर ने शोखी से पूछा ।

"भगवान करे आज का दिन खैरियत से गुजर जाए।" मौसी ने सवाल का सीधा स्पष्ट जवाब नहीं दिया था।

"अरे, छोड़ा भी कुछ नहीं होगा? खराब दूध था फट गया। अच्छा मैं चलता हूँ। कोई वहम न पालना मौसी।"

अमर चला गया।

गंगा मौसी माया से सम्बोधित हुई- “माया, ऐसा करो फटे हुए दूध में एक लाल मिर्च डालकर उसे एक उबाला दे दो।”
 
"इससे क्या होगा, बड़ी बीबी?" माया की जिज्ञासा जागी।

"जो कहती हूँ वो करो - ज्यादा बहस करने की जरूरत नहीं है।" गंगा मौसी ने गुस्से से कहा।

"जी, बीबी!" माया फौरन सम्भल गई।

"आपने मुझे आवाज लगाई थी?"

"हां, देखो! जाकर रेखा को उठाओ। साढ़े नौ बज रहे हैं।" "दरवाजा बन्द हो तो खटखटा दूं?" माया ने जैसे इजाजत चाही।

"हां कुछ कहे तो मेरा नाम 'ले देना।" गंगा मौसी ने शांत होते समझाया और सुन जानें से पहले किचन में जाना।

दूध में लाल मिर्च डालकर उसे उबाल देकर सिंक में बहा देना। समझ गई ना मेरी बात...।"

"जी अच्छी तरह।" माया ने कहा और कमरे से निकल गई।

माया भी गंगा मौसी की बदलती फितरत को लेकर हैरान थी। पता नहीं यह बड़ी बीबी को क्या होता जा रहा है। बात-बात पर बहम करने लगी है। कोई छींक दिया तो क्यों छींका। बालों में कंघी उलझ गई या वाल सुलझाते हुए कंघी हाथ से निकलकर फर्श पर जा पड़ी, दीवार पर से बिल्ली गुजर गई, रात को कहीं से किसी मुर्गे की बाध सुनाई दे गई या ऐसी की कोई अपशुगनी समझी जाने वाली बात हो गइ तो बड़ी बीबी लग गई उसक पीछे।

अब यह दूध फटने में कुछ भी असाधारण क्या था। पर उनके लिए तो यह बड़ा खतरनाक अपशुगन था इसके तोड़ के लिए उन्होंने लाल मिर्च डालकर उस दूध को एक उबाल देने को कहा था। यह सोचते हुए माया ने मुंह बिचकाया था। हां माया भी एक चीज थी। वह गंगा मौसी के सामने तो कुछ नहीं बोलती

थी लेकिन उनकी इन अंधविश्वासपूर्ण हिदायतों पर भी कभी नहीं चलती थीं।

गंगा मौसी की हिदायत पर कुढ़िया माया किचन में पहुंची और दूध भी सिंक में बहा दिया मगर उसम लालमिर्च न डाली थी। फिर पतीला धोकर वह जल्दी से ऊपर चली मई।

वह ऊपर पहुंची तो उसे रेखा का दरवाजा खटखटाने की जरूरत न पड़ी। दरवाजा खुला हुआ था और रेखा तोलिये

से मुंह पोंछते हुए बाथरूम से निकल रही थी। रेखा उसे देखकर मुस्कराइ और बोली-

"जी...।"

"राम-राम बीबी!" माया ने उसके हाथ से तोलिया लेकर गैलरी में फैला टिया और फिर वापस आकर बोली- "बीबी, आपको बड़ी बीबी ने बुलाया है।"

"मुझ आज उठने में देर टा गई। क्या मौसी ने नाश्ता कर लिया?".

"हां जी, नाश्ता कर लिया और अखबार भी पढ़ लिया। अब वह परेशान हैं कि आप अब तक क्यों नहीं उठीं।"

"मौसी भी बस....!" रेखा मुस्करा दी खामखाह ही परेशान हो जाती है, आजकल।"

'एक खबर है बीबी कि दूध फट गया है।" माया ने बड़ी संजीदगी से बताया।

"तो और आ जाएगा। इसमें परेशानी वाली क्या बात है?" रेखा हंस दी थी। "हाय, बीबी आप कितनी अच्छी-कितनी समझदार हैं।" माया चहकी।

"मैं तुम्हारी बात समझी नहीं माया ।" रेखा को उसकी यह चहकार अर्थपूर्ण लगी थी।

"बड़ी बीबी नीचे परेशान बैठी हैं। उनका ख्याल है कि आज के दिन जरूर कुछ होकर रहेगा!”
 
और माया के ये शब्द, रेखा के दिमाग पर हथौड़े की तरह लगे उसे फौरन ही रात की घटना याद आ गई। रहस्यमय कमरे का दरवाजा लॉक्ड न था यह हाथ लगाते ही खुल गया था और यह भेद अभी सिर्फ रेखा ही जानती थी। यानी कि रेखा अगर यह हकीकत जाकर मौसी को बता दे तो उनका अंधविश्वास यकीन में बदल जाएगा। इससे बड़ी बात आज के दिन और क्या हो सकती थी।

"आपको क्या हुआ, बीबी यह आप क्यों एकदम परेशान सी दिखने लगी हैं।" माया ने टीका।

"कुछ नहीं, माया। मैं तो बस, वह तुम्हारी बड़ी बीबी के बारे में सोच रही थी, वह अब जरूरत से ज्यादा अंधविश्वासी हो चली हैं।"

"हां बीबी, बहुत ज्यादा। उन्होंने कहा था कि फटे हुए दूध में लाल मिर्च उबालकर सिंक में बहा दूं। मैं ऐसे ही दुध का बहा आई हूँ। मैंने ठीक किया न?"

"हां, माया ! तुमने ठीक किया। ये सब बेकार की बातें है।" रेखा मुस्करा दी फिर आगे बोली "माया बात बताओ। तुम इस घर में कव से हो?"

"काई चार साल ता हो गार होंगे।" माया ने बताया वह रेखा की सात टेखने लगी थी।

"तुमने कभी उस दरवाजे का खुला देखा हैं जिस पर ताबीज बंधा है?"

"नही, बीबी क्यों...?"

"कभी तुम्हारे दिल में खुद-बुद नहीं हुई कि उस दरवाजे के खोलकर देखा जाए? " रखा ने सवाल किया।

" शुरू-शुरू मे तो ख्वाहिश थी, बीबी कि इस कमरे में क्या रखा है? लेकिन बड़ी बीबी ने उस कमरे के बारे बारे में कुछ ऐसा डरा दिया था कि मैं कभी उस दरवाजे के सामने खड़ी भी नहीं हुई। बड़ी बीबी ने तो उस ताबीज की वजह से दरवाजे की सफाई करने को भी सख्ती से मना कर दिया था। वह कभी-कभी खुद ही साफ कर दिया करती है, उस दरवाजे को । लेकिन आप यह क्यों पूछ रही है, बीबी ?"

"ऐसे ही पूछ रही हूँ।" रेखा सीढ़ियां उतरते हुए बोली।

"बीबी ! आपको इस घर में आए करीब एक साल तो हो ही गया है- अब से पहले तो आपने कभी पूछा नहीं।"

“मैंने एक बार मौसी से पूछा था तो उन्होंने बताया था कि उस कमरे में काठ कबाड़ है, कि वह तरह का स्टोर है। उस ताबीज के बारे में उन्होंने बताया था कि वह पिछले मकान मालिक का लटकाया हुआ हैं ताकि घर में बरकत रहे। अब मेरी तबियत में भी चूंकि खाज नहीं इसलिए कभी उस कमरे की तरफ पलटकर भी नहीं देखा।"

"तो अब क्या हुआ?" माया ने पूछा, वह कुछ शंकित और सतर्क-सी नजर आने लगी थी। रेखा न शायद माया को अपनी राजटार बनाना चाहा था। वह मंद-मंद मुसकराते हुए बोली "अब मेरा जी चाहता है कि उस कमर का राज मालूम करू। माया क्यों न हम दोनों मिलकर उस कमरे में चलें ?"

"मुझे तो बीबी आप माफ करें...। "माया ने हाथ जोड़ दिए - "मुझे अभी यहां नौकरी करनी है जी। ऐसा अच्छा घर और ऐसे अच्छे लाग मुझे कहां मिलेंगे। आप तो जा मुझे बस नौकरी करने दें...।"

''अच्छा जाओ, मेरा नाश्ता लाओ। और इस बात का जिक्र मौसी से न करना। मैं मौसी के कमरे में जा रही हूँ। नाश्ता वहीं ले आना।"
 
गगा मौसी के कमरे में जातं वक्त जब रेखा की नजर उस रहस्यमय दरवाजे पर पड़ी तो उसके दिल की धड़कनें बरबस ही तेज ही गई। दरवाजा ज्यों का त्यों बन्द था और वह काला ताबीज भी वैसे ही दरवाजे के हैण्डल पर झूल रहा था। गंगा मौसी के कमरे का दरवाजा खुला हुआ था और अन्दर से गंगा मौसी के बोलने की आबाजे आ रही थीं।

रेखा कमरे में दाखिल हुई तो उसने गंगा मौसी को फोन पर चीख-चीख कर बातें करते पाया, रेखा ने हाथ के इशारे से उनका अभिवादन किया और उनके कदमों में कालीन पर बैठ गई।

"लो वह आ गई।" गंगा मौसी ने फोन पर शायद उसी के बारे में बताया था।

" किसका फोन है, मौसी?" रेखा ने उत्सुकतावश पूछा।

"तुम्हारे बलदेव अंकल का ।" गंगा मौसी के चेहरे पर रंग आया हुआ था।

"हाय....।" रेखा खुशी से चिल्लाई "लारा फोन मुझे दें।"

लो भई, रेखा से बात करो।" गंगा मौसी ने रिसीवर रेखा के हाथ में दे दिया।

"नमस्कार अंकल । " रेखा बोली- "कैसे हैं आप..?"

"नमस्कार...। मैं बिल्कुल ठीक हूँ। पर तुम मुझे कुछ परेशान लग रही हो।"

" अरे नहीं अंकल, ऐसी कोई बात नहीं है...।"

"यह बताओ, तुम खुश तो हो वहां?" वलदेव अंकल ने पूछा।

"मैं यहां बहुत खुश हूँ। गंगा मौसी मेरा बहुत ख्याल रखती है। फिर भी मेरा दिल्ली जान का जी चाहता है।"

"कुछ और रुक जाओ मैं खुद तुम्हें लेने आऊंगा।" बलदेव अंकल के स्वर में चिन्ता का भाव था।

"ऐसा तो आप पिछले कई माह से कह रहे है, अंकल...!"

"तुम्हें कुछ और रुपये भेज दूंगा।" अंकल ने जैसे बहलाना चाहा था।

"रुपयों का मैं क्या करूंगी अंकल...?" रेखा रूठती-सी वाली "आपने जो रुपये पहले भेज रखें हैं वही खर्च नहीं हुए हैं। मनी मेरी प्रॉब्लम नहीं है अंकल । "

"मैं तुम्हारी प्रॉब्लम अच्छी तरह जानता हूँ। लेकिन तुम्हें कुछ सब्र करना होगा।"

"ठीक है, अंकल, जैसा आप कहें।" रेखा ने गहरी सांस लेकर विषय बदला--"वह वर्षा कैसी है?"

"बिल्कुल ठीक है। तुम्हें याद करती हैं।"

"मैं भी उसे याद करती हूँ।"

बलदेव अंकल ने दो-चार बातें और की और उन्होंने वही कहा जो वह प्राय: कहा करते थे। यानी कि रेखा खुद को खुश रखे और वह शीघ्र ही आकर रेखा को दिल्ली ले जाएंगे।

रेखा ने चाहा कि वह ख्वाब देखने से लेकर उस रहस्यमय कमरे तक की सारी आप धोती कह सुनाये। मगर वह कुछ सोचकर रुक गई। वह जानती थी कि यह सब सुनकर अंकल परेशान हो जाएंगे और वह यही नहीं चाहती थी कि बलदेव अंकल उसकी वजह से परेशान हां। वह तो उसकी वजह से पहले ही परेशान थे और ये अविश्वसनीय घटनाएं उपहे और भी बौखला देंगी।

बलदेव अंकल ने शादी नहीं की थी, हालांकि कमत्र पचास वर्ष के हो चुके थे। गंगा मौसी उनसे दो-चार बरस ही छोटी होगी। जवानी के दिनों में बलदेव अंकल और गंगा मौसी के वीच जलबरदस्त इश्क चला था। खानदानी मतभेदों तथा
 
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