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स्वाहा

आ गई कि वह फौरन झोंपड़ी में दाखिल हो गया। अगर उसने फुर्ती न दिखाई होती तो उसका धायल हो जाना यकीनी था।

अपने शिकार को झोंपड़ी में घुसते देखकर, उल्लू ऊपर की तरफ उठा और झोपड़ी के ऊपर से उड़ता हुआ दूर

निकल गया। फिर एक चक्कर लगाकर वापस उस झोंपड़ी की छत पर आ बैठा।

इन्द्रजीत को उल्लू के इस हमले से यह अंदाजा लगाने में देर न लगी कि इस झांपड़ी का दरवाजा बन्द न होने और

. किसी निगरान की अनुपस्थिति के वावजूद वह झोंपड़ी से बाहर नहीं निकल सकता। यहां कुछ अदृश्य-मायावी रक्षक

मौजूद हैं।

दो-तीन दिन बीत गए।

इन दिनों में झोंपड़ी में कोई नहीं आया था। लेकिन खाने-पीने की कोई परेशानी नहीं हुई थी। खाना खत्म होने पर कपड़े के नीचे ट्रे में दूसरा ताजा खाना आ जाता -पानी के कम होने पर खुद-ब-खुद ही पानी से भर जाती। ट्रे में खाना व सुराही में पानी डालकर जाने वाला, इन्द्रजीत को प्रयत्नोपरान्त भी नजर नहीं आया था। इन तीन दिनों में वह किसी से बात करने किसी की शक्ल देखने को तरस गया था।

विकाल- विस्तृत रेगिस्तान, इकलौती झोंपड़ी और इस झोंपड़ी में एक अकेला आदमी। शायद यही कैदे तन्हाई (एकान्त कैद ) थी।

फिर सात दिन बीत गए।

इन सात दिनों में पौष्टिक खुराक और आराम का ही जादू था कि इन्द्रजीत की कमजोरी जाती रही थी। वह भला चंगा है। गया था। शारीरिक शक्तियां लौट आई थीं। हाथ-पैरों की रंगत में सुखी आ गई थी।

तब 'वह' फिर आई।

वह सातवीं रात थी। चांदनी छिटकी हुई थी। ठण्डी हवा चल रही थी। झोपड़ी के भीतर मलगजा उजाला फैला हुआ था।

इन्द्रजीत दरवाजे की तरफ मुंह किये लेटा हुआ था, बाहर चांदनी बरस रही थी। चौदहवीं का चाद रेत के चमकते कणों को और भी चमका रहा था। बाहर हर तरफ उजाला फैला हुआ था। अत्यन्त ही मंत्र-मुग्ध कर देने वाला स्वप्निल सा वातावरण था।

ऐसे में ही इन्द्रजीत को, खुले दरवाजे से, वह मायावी स्वप्न सुन्दरी आती नजर आई थी, जिसने उक्की हंसती-मुस्कराती जिन्दगी उजाड़ दी थी। उससे उसकी प्रेयसी छीन ली थी। उसे इन वीरानों का कैदी बना दिया था । इस पर उसका वह अमल-जिसके पाश में वह अपनी सुध खो बैठता था और इस वेसुधी से वह जिस तरह इन्द्र का खून निचोड़ लेती थी उसमें सुख-आनन्द कम और शोषण अधिक था। 'वह' अपनी सन्तुष्टि कर लेती थी और इन्द्र का सारा खून जैसे अपने आप में जज्ब कर लेती थी।

और यूं इन्द्रजीत अधमरा केंचुआ-सा बनकर रह जाता था। रक्तविहीन, शक्तिहीन चुसा निचुड़ा सा केंचुआ ।

इन्द्रजीत उसे आते देखकर उठकर बैठ गया।

पूरे सात दिन बाद उसे किसी की दिखाई दी थी। चाहे वह उसकी खून की प्यासी बकाल कैंस? थी। बकाल श्वेत परिधान में थी और आते हुए वह किसी भटकती हुई आत्मा की तरह लग रही थी।
 
बकाल शायद आत्मा तो न थी, लेकिन भटकती हुई जरूर गई।

इन्द्रजीत की मोहिनी सूरत और चढ़ती जवानी ने उसे भटका दिया था। वह किसी 'देवा काली' के आदेश पर इन्द्रजीत को सजा देने आई थी। उसने योगी तांत्रिक को सजा दे भी दी थी।

इन्द्रजीत को भी सजा देने की तैयारी वह पूरी कर चुकी थी लेकिन जब उसने इन्द्रजीत को देखा तो अपना दिल हार बैठी। यह भी भूल गई थी कि वह इन्द्रजीत के पीछे को आई थी।

इन्द्रजीत, साक्षात कामदेव ही तो था कटारी और राजकुमारी नयना उसके सजीलेपन और चुम्बकीय व्यक्तित्व का शिकार हुई थीं और अब बकाल भी उसे देखते ही अपना दिल हार बैठी थी।

मायावी बकाल उसे अपने साथ उठा लाई थी और उसे ऐसी जगह बन्दी बना दिया था जहां से किसी का गुजर नहीं था। राजू मदारी ने ऊपर जाते हुए इन्द्रजीत का हाथ बकाल के हाथ में पकड़ा दिया था...उसे अपन अपराधी की पहचान करवा दी थी। उसे यकीन था कि उसके सिद्ध आराध्य देव 'देवा काली' ने जिस किसी को भी भेजा है वह इन्द्रजीत से उसका प्रतिशोध अवश्य लेगा। अब वह क्या जानता था कि शिकारी ही शिकार हो जाएगा। राजू मदारी अगर यह जानता होता तो उसने इन्द्रजीत का हाथ बकाल के हाथ में कदापि नहीं थमाना था।

वैसे मायावी बकाल का प्यार भी किसी सजा और प्रतिशोध से कम न था। अपने आत्म के लिए वह इन्द्रजीत की जान ही तो निकाल लेती थी। इन्द्रजीत के लिए बड़ा कष्टदायक साबित होता था उसका प्यार उसे यही महसूस होता था जैसे बकाल उसके सारे बदन का खून अपने आप में जज्ब कर लेती हो। वैसे बाद में इन्द्रजीत को जो सहना पड़ता था, वह अपनी जगह पर बकाल का यह खेल उसे जिस नशे, आनन्द और तुप्तियों का अहसास कराता था उसका कोई जवाब न था ।

कमजोरी मिटते हीं इन्द्रजीत चाहे अनचाहे बकाल के सामीप्य के उन्हीं क्षणों की कामना करने लगता था।

शायद यही वजह थी कि अब जब बकाल, अपने उसी प्रलयंकारी यौवन के साथ नजर आई तो इन्द्रजीत उसे देखते ही दोहरी मानसिकता का शिकार हो गया। उसे बकाल को देखकर खुशी भी हुई और रंज भी हुआ।

और फिर अब जब बकाल बड़ी कामुक अदा के साथ चलती हुई झोपड़ी के दरवाजे पर रुकी और फिर झुककर झोपड़ी के दरवाजे, में दाखिल र्झ तो इन्द्रजीत की नजर के सामने बिजलियां सी कौंध गयीं।

बकाल मुस्कराकर सीधी खड़ी हुई।

उसने इन्द्रजीत को किसी ताजा फूल की मानिन्द खिले व पूर्णतः स्वस्थ और चाक-चौबन्द बैठे देखा तो उसकी आंखों की चमक बढ़ गई । और यह चमक अपनी कामनाएं खुद ही ब्यान कर रही थीं। यही लगता था कि वह इन्द्रजीत को स्वस्थ देखकर अन्दर ही अन्दर बहुत खुश हुई थी। और यह थी वैसी ही थी जैसी मलाई का भरा कटोरा देखकर किसी बिल्ली की होती है।

बकाल उसके सामने अपने घुटनों के बल बैठ गई-जैसे किसी देवता के चरणों में कोई दासी आ बैठे। इन्द्रजीत उसे खामोश बैठा निहारता रहा। क्या बोले ? यही नहीं सूझ रहा था । '

"कैसे हो मेरे जादूगर ?" बकाल ने मुस्कराते हुए पूछा। और बेहद मीठी थी उसकी आवाज ।

''मैं... मैं बहुत बुरा हूँ बकाल ।" इन्द्रजीत ने अजीब से लहजे में कहा- "दीन-हीन और असहाय...।" बकाल खिलखिलाकर हंस दी, बोली- "दिख तो नहीं रहे ऐसे और फिर जो बकाल की चाहत हो वो दीन-हीन या

असहाय कैसे हो सकता है।"

"तुम मुझे कहां ले आई हो, बकाल?" इन्द्रजीत ने खुद को सम्भालते पूछा था वह बकाल की बहका देने वाली बातों बचना चाहता था। लेकिन बकाल ने बदस्तूर जज्वाती स्वर में जवाब दिया, "अपनी दुनिया में, अपने करीब और तुम्हारे अपने लोगों से दूर। वहां, जहा तुम्हारी मदद को तुम्हारा अपना कोई नहीं आ सकता। कोई आना भी चाह तब भी नहीं आ सकता । तुम मेरे हो मेरे लिए हो। किसी की मदद की उम्मीद न रखना, मेरे प्रियतम । "
 
"यह जोर-जबरदस्ती अच्छी नहीं है, बकाल। अगर मैं खुद यहां से फरार हो जाऊं तो...?"

उसे कुरेदने को ही पूछ डाला था इन्द्रजीत ने । काल बदस्तूर मुस्कराते हुये और बेहद मीठे-मीठे बोली- "ऐसा सोचना भी मत। तुम किसी और के नहीं बकाल के

कैदी हो!"

"तो क्या...? क्या होगा... जब तक तुम मेरे पास लौटकर आओगी... मैं जाने कहां से कहां जा चुका होऊंगा...।"

"एक दिन तुमने निकलकर देखा तो था फिर दोबारा निकलकर देख लेना।" व्यंग्यपूर्ण मुस्कान तैर आई थी बकाल के रसीले अधरों पर, "तुम्हें सब मालूम हो जाएगा। जब इस झोपड़ी की छत पर बैठा मेरा निगरान अपने खुंखार पंजों से तुम पर हमला करेगा तो तुम्हें इस झोपड़ी के अन्दर आकर ही पनाह मिलेगी। वैसे आज जाते हुये मैं एक और निगरान को भी तैनात कर जाऊंगी।

"मैं... मैं यहां कब तक कैद रहूँगा?" इन्द्रजीत ने खुद को शांत रखने की कोशिश करते पूछा।

वह खनकती हंसी हंसी, फिर बोली- "कब तक का क्या मतलब? यह तुम्हारी उम्र कैद है। तुम्हें क्या यहां कोई परेशानी है, मेरे जादूगर... ?"

"नहीं, मझे क्या परेशानी ने सकती है यहां में यहां बड़े आराम से हूँ।" इन्द्रजीत ने व्यंग्यपूर्ण लहजे में कहा। "अच्छा, ऐसा करो मुझसे एक जादू सीख लो। इसके सदके तुम अपनी पसन्द और मर्जी से खाने-पीने की चीजें मंगवा सकोगे। छोटी-मोटी जरूरतें भी पूरी हो सकती हैं।"

इन्द्रजीत ने फौरन सहमति दर्शायी क्योंकि खाने-पीने को जो कुछ मिल रहा था, वह उसकी रूचि का नहीं था। फिर

एक निश्चित वक्त पर ही मिलता था। यह जादू साखने के बाद उसे दम मे कम से कम खाने-पीने की आजादी तो मिल

जानी थी।

बकाल ने उसे तीन शब्द बताए। इन शब्दों को कितनी बार और किस कम से दोहराना है और दोहराकर फिर क्या

करना है यह सब इन्द्रजीत ने बकाल से सीख लिया और उसके सामने आजमा भी लिया। वह अब इस जादू के जरिये अपनी पसन्द का खाना मंगवा सकता था। वह खुश था। इन्द्र अब बकाल के सामने खुद

को सन्तुष्ट और खुश जाहिर कर रहा था। वह बोला-

"बकाल, एक बात पूछूं बताओगी।"

"हां, बताऊंगी। पूछा।"

"कुछ नयना के बारे में बता सकती हो?"

"तुम्हारी नयना तुम्हारी कमीज आपने हाथों में लिये बैठी है। कभी उसे आंखों से लगाती हैं... कभी उसे घूमती है। वह कई बार जंगल के चक्कर भी लगा चुकी है कि शायद तुम कहीं मिल जाओ...।" काल ने बताया।

"और बकाल कटारी का क्या हुआ... ?"

"बेचारी हटारी उसका अब कोई सहारा नहीं रहा। उसका बाप चल बसा और जिसे उसने अपने मन-मन्दिर में बैठाया था, उसकी कोई खबर नहीं। उसके कबीले के कुछ लोग शहर जा रहे हैं। वह भा अपने रीछ और बन्दर के साथ शहर जाने की तैयारी कर रही है। दिन में कई बार वो नहर के पुल पर चक्कर मार जाती है और तुम्हारे न मिलने पर अपनी भीगी आंखों के साथ अपनी बस्ती में लौट जाती है।" बकाल ने बताया, फिर हंसकर बोली- "तुम कितने निर्दयी हो, मेरे जादूगर दो लड़कियों को अपनी चाहत मे फंसाकर यहां रेगिस्तान में आ बैठे हो। "

"हां तुम सही कहती हो...।" इन्द्रजीत संजीदगी ओढ़ते बोला- "अब एक तीसरी लड़की मेरे फरेब में आ फंसी है। में जल्दी ही उसे भी छोड़ जाऊंगा।"
 
"किसी भूल में न रहना मेरे जादूगर ! मैं कटारी या नयना नहीं हूँ... बकाल हू-बकाल । रेगिस्तान की शहजादी । इस रोयेस्तान का एक-एक कण मुझे सलाम करता है। यह तुम्हारी दुनिया नहीं है। यह मेरा जहान है। मुझे छोड़कर जाने से पहले तुम्हें अपनी जान छोड़नी होगी क्या समझे?" और इन्द्रजीत ने बड़े छुन और इत्मीनान से जवाब दिया- "कभी ऐसा वक्त आया यह भी कर गुजरुगा....। देख

लेना...।"

." बहुत जिद्दी हो...?" बकाल ने होंठ पिचकाते कहा और अपनी प्यासी चमकती आंखें इन्द्रजीत के चेहरे पर गाड़ दीं। वह अब सीधे इन्द्र की आंखों में झांक रही थी ।

इन्द्रजीत को ऐसा महसूस हुआ जैसे रेगिस्तान में अचानक तूफान आ गया हो। वह घबराकर बोला- "तुम...तुम क्या

करने जा रही हो?"

"कुछ भी तो नहीं...! बकाल ने सहज भाव से कहा, लेकिन अपनी चमकती आंखें बदस्तुर उसके चेहरे पर गाढ़े रही।

उसकी आंखों में जरूर कुछ था । इन्द्रजीत के दिमाग में आधी चलने लगी। हवा का शोर और उड़ते हुए रेत के बगोले । वह घबरा कर लेट गया।

और फिर वही हुआ जो होता था।

काल इसी क्षण की प्रतीक्षक थी। उसने इन्द्रजीत के पैरों के दोनों अंगूठे पकड़ लिये। बस फिर क्या था, इन्द्रजीत पर नींदगी और बेखुदी छाने लगी। बकाल किसी रंगिस्तानी बगीले की तरह उस पर छानी चली गई। उन महकते क्षणों में इन्द्र को अपना होश कहां था वह बेसुध होता गया।

आह! कैसी तृप्तता थी यह । इन्द्रजीत अपना आपा अपने होश खो बैठा। आनन्दात्तिरेक के इन क्षणों में वह हमेशा ही

अपने होश खो बैठता था। आज भी ऐसा ही हुआ।

और फिर जब उसे होश आया तो वह होशरुबा वह मायावी रूपसी जा चुकी था ।

लुटे-पिटे इन्द्रजीत की अब वही अवस्था थी जैसे बरसों का मरीज हाथों-पैरों में जान नहीं। दिमाग की सो खिंची हुई। सिर उठाओ तो चक्कर आ जाये.... अन्धेरा छा जाये। अभिसार के इस खेल की मदहोशियों, आनन्दप्रद क्षणों के बाद निर्बलता के ये जान लेवा क्षण असहनीय ही थे।

दिन चढ़ आया था। झोंपड़ी के दरवाजे से रोशनी अन्दर आ रही थी। लेकिन इन्द्रजीत की रगों में अन्धेरा फैला हुआ था। वह रेगिस्तानी जौंक उसके बदन का सारा खून पी गई थी।

देह-सुख, काम तृप्ति और फिर उसके बाद यह रक्त पिपासा... इन्द्रजीत को दीन-हीन और असहाय बना छोड़ जाती

थी मायावी बकाल ।

वही हुआ जो होता था। दो-चार दिन इन्द्रजीत अत्यधिक कमजोरी का रहा। फिर धीरे-धीरे उसकी शारीरिक शक्तियां लौटने लगी । इन्द्र ने अच्छा खा-पीकर खुद को तन्दरुस्त कर लिया। इस बीच बकाल की सूरत दिखाई नहीं दी वह शायद इन्द्रजीत के स्वस्थ हो जाने का इन्तजार कर रही थी।

बली के बकरे की तरह इन्द्रजीत इन दिनों में फिर पूर्णतः स्वस्थ और भला चंगा हो गया। ऐसा सेहतमंद कि अपने अवचेतन में वह बकाल के साथ इन्हीं क्षणों की ख्वाहिश करने लगा। पर फिर उस पर खौफ छा जाता था। बकाल का खौफ उसके साथ बीते क्षणों के बाद अपनी मरणासन्न अवस्था का खौफ।

और इसी खौफ के साये में उसके दिल में ख्याल आता कि वह यहां से फरार होने की कोशिश करे। पर वह इस ख्याल को अपने जहन से निकाल देता। शायद इसलिए कि एक तो उसे रास्ते का पता नहीं था कि किधर जाए। और अगर वह यूं ही किसी दिशा में निकल भी लेता तो बकाल के तैनात निगरानों का आतंक जहन में ऊपर आता था।

अपनी निगरानी पर तैनात उल्लू को वह देख ही चुका था। और बकाल ने जाते वक्त जिस दूसरे गार्ड को तैनाती कर. जाने का जिक्र किया था वह भी कम खतरनाक न था। बड़ा ही मायावी जाल था। बकाल जाने से पहले जिस दूसरे
 
निगरान को तैनात कर गई थी वह एक भयानक फनियर नाग था । इन्द्रजीत इस दूसरे निगरान के भी दर्शन कर चुका था।

उल्लू झोपड़ी की छत पर रहता था तो यूह नाग झोपड़ी के दरवाजे के निकट फन उठाये खड़ा रहता था कि इन्द्रजीत रेगिस्तान की तरफ कदम उठाये और वह लगे पीछे।

ऐसे हालात में एक बार इन्द्रजीत को यह ख्याल भी आया कि क्यों न दिन की रोशनी के बजाय रात के अन्धेरे में . झोपड़ी से निकलकर रेगिस्तान में गुम हो जाए। पर इस मन्सूबे पर अमल करना भी आसान न था क्योंकि उल्लू और नाग दोनों ही रात के अन्धेरे में दूर तक देख सकते थे।

जाहिर था मायावी बकाल बेवकूफ नहीं थी। उसने इन्द्रजीत को सलाखों के पीछे ताले में बंद नहीं किया था तो कुछ सोचकर ही किया होगा।

यही अन्देशे ही थे जो इन्द्रजीत को हतोत्साहित कर जाते थे और वह खुद को बेबस मान खामोश बैठ जाता था।

पर आखिर कम तक... ।

लगभग छः माह बाद तंग आकर इन्द्रजीत ने बकाल की इस कैद से निकलने और उसके यातनापूर्ण सामीप्य से मुक्ति पाने के लिए, फरार होने की कोशिश की। वह झोपड़ी से निकला था और निकलते ही तेजी से एक तरफ भागना शुरु कर दिया था।

लेकिन रेत पर भागना आसान काम तो न था। उमके पैर रेत में फंस रहे थे भागना दूभर हो रहा था।

और फिर जब उल्लू ने अपने शिकार को फरार होते देखा तो...एक चीख मारकर फड़फड़ाकर उड़ा और कुछेक क्षणों में ही उसे जा लिया। उसने इन्द्रजीत के चेहरे पर ऐसा पंजा मारा कि इन्द्र की आंखें जख्मी होते-होते बची। बहरहाल, इन्द्र के गाल को उसने जख्मी कर दिया था।
 
"इतना ही काफी था- इन्द्रजीत ने उस दिन के बाद से ही फरार होने की सोच ही अपने दिमाग से निकाल दी थी। दरअसल, वह अपनी सूरत बिगाड़ना नहीं चाहता था। यह और बात थी कि उसकी सूरत खुद-ब-खुद बिगड़नी शुरू हो गई थी। वह अपना चुम्बकीय ओज व आकर्षण खोता जा रहा था। उसके चेहरे पर अब स्थाई जर्दी और पीलाहट रहने लगी थी। बकाल उसको पूरी तरह सम्भलने भी न देती थी कि उससे खेलने और उसका खून पीने पहुंच जाती थी । "

"ऐसे में उसका स्वास्थ ठीक कैसे रह सकता था। शुरु-शुरु में वह हफ्ता दस दिन में खा-पीकर और आराम करके • अपनी जान बना लेता था। लेकिन फिर यह अंतराल बढ़ता गया और उसकी सेहत की बहाली में कई दिन लगने लगे।

लेकिन एक लम्बी अवधि बीत जाने के बाद भी बकाल ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। वह तो उस पर ऐसी आसक्त

हुई थी कि आज तक उसकी जान को आई हुई है। उसको छोड़ने का नाम ही नहीं लेती। "

काला चिराग-रेखा को उसके भाई इन्द्रजीत की कहानी सुना रहा था। इन्द्रजीत की यह अविश्वसनीय आपबीती

सुना, उसने रेखा की तरफ देखा । रेखा बुत बनी बैठी यह सब सुनती रही थी। उसकी आंखों से वहे आंसू उसके गालों

पर अपनी छाप छोड़ गये थे। अपने भाई की यह आप बीती सुनते हुए रेखा कितनी ही बार से दी थी पर वह बोली कुछ नहीं थी। काला चिराग, इस

कहानी के समापन पर अपनी टिप्पणी करते आगे बोला था-

"इन्द्रजीत की इस सोलह-सत्रह बरसों में जो हालत हो गई है अगर तुम उसे उस वक्त देख लेतीं तो शायद बेहोश हो जातीं तुम्हें तीव्र मानसिक आघात का सामना करना पड़ता। मैंने इसीलिए झोपड़ी में प्रवेश करने से रोक लिया था। मैं चाहता था कि तुम अपने भाई को देखने से पहले सारे हालात जान लो ताकि तुममें वास्तविकता का सामना करने की हिम्मत पैदा हो जाए और तुम उसकी दयनीय सूरत देख सको। मेरे ख्याल में मैंने इन्द्रजीत के बारे में हर वह बात सविस्तार बता दी है, जिसका जानना तुम्हारे लिए जरूरी था। फिर भी अगर कहीं कोई जिज्ञासा रह गई तो प्रश्न कर सकती हो।" यह कहकर काला चिराग खामोश हो गया।

कमरे में गहरी खामोशी छा गई।

रेखा की आंखें आंसुओं से भरी हुई थीं। ऐसी भयावह और हृदयविदारक कहानी सुनकर कौन बटन अपने आंसुओं को रोक सकती है।

यह एक लम्बी कहानी थी। अपने भाई की आप बीती सुनते वह सीत रोके बैठी रही थी और इस रहस्यमय काले तिराग ने बहुत अच्छे अंदाज में इन्द्रजीत की कहानी सुनाई थी। रेखा ने कई जगह अपने आंसू जब्द किये थे लेकिन कब तक जब्द से काम लेती, आंसू उबलकर बाहर आ ही जाते थे।

रेखा ने अपने दुपट्टे से अपने आंसू साफ किये।

कुछ देर बाद जब रेखा खुद पर नियन्त्रण पाने में सफल रही। उसके दिल को करार आया तो एक उदास-सी मुस्कान उसके चेहरे पर नजर आई और वह काले चिराग को सम्बोधित करते बोली-

"आह! मेरे भाई ने छोटी सी उम्र में कितने दुःख झेले है। पहला दुःख उन्हें मेरे चाचा रमाकांत ने दिया। अगर वह शैतान मेरे भाई की हत्या को साजिश न करता तो मेरा भाई इन यातनाओं का शिकार क्यों होता। यह सब उसे न सहना पड़ता। मेरे भाई की जिन्दगी एक स्थाई कैद बनकर रह गई है। उनकी यह कैद तो उम्र कैद से भी बड़ी हो गई। उम्र कैद का अपराधी चौदह साल बाद जेल से रिहा तो हो जाता है। मेरे भाई को तो यह भयावह सजा भुगतते बीस बरस हो गए हैं और उनका भविष्य अभी भी अनिश्चित है। वह भी यह कैसा भाग्य लिखाकर आए हैं। इतने बड़े बाप का बेटा, एक मामूली मदारी के घर पल कर जवान हुआ। राजू मदारी से जान छुटी तो वह चुड़ैल बकाल की कैद में चला गया और जो अब भी उसके लिए जौंक बनी हुई है। कहां है वह चुड़ैल, मेरे सामने आ जाए तो मैं उसका खून पी जाऊं।" अतिरिक व्यशा, एक रोष बनकर ही दमकी थी, रेखा के चेहरे पर।

काले चिराग ने जवाब मैं कुछ न कहा। वो खाली खाली नजरों से रेखा को देखता रहा। रेखा की यह प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी।
 
"एक बात मेरी समझ में नहीं आई।" अन्ततः रेखा ही बोली ।

"कौन-सी बात?" काले चिराग ने शांत भाव से ही पूछा ।

"रेगिस्तान की वह झोपड़ी, उसकी छत पर बैठा उल्लू ओर दरवाजे पर तैनात फनियर नाग को मैं सपनों में देखती रही हूँ झोपड़ी के भीतर से मदद की गुहार भी सुनती रही हूँ। अब हकीकत में में उसी झोपड़ी के सामने ही तब भी मैंने वही सब देखा उघैर सुना। हां, सपने में भी जब मे उस झोपड़ी के निकट पहुंचती थी तो अन्दर से यही आवाज . आती थी- डरो मत, आओ...अन्दर आ जाओ...।" अब हकीकत में भी मैंने वही आवाज-वही गुहार सुनी है। सवाल यह है कि क्या मेरे भाई को मेरे आने का इतजार था। उसे पहले से ही मालूम था कि मैं यहां जरूर आऊंगी?

"हां था, उसे पूर्ण विश्वास था और वह जानता था।" काले चिराग ने यकीनी लहरो में अनुमोदन किया। " पर कैसे? आखिर कैसे? भैया को कैसे मालूम हुआ कि दरवाजे पर आने वाली में हूँ।"

"यह मैंने उसे बताया...।"

"लेकिन आप तो उस वक्त मेरे पीछे थे।" रेखा बोली- “मै उस वक्त की बात कर रही हूँ जब आपने मुझे भीतर जाने से रोका था। "

"यह बात मैं तुम्हारे भाई को तुम्हारे यहां पहुंचने से पहले ही बता चुका हूँ कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब उसकी बहन शीना तुम्हारी मुक्तिदाता बनकर आएगी।" काले चिराग ने बताया। “मुक्तिदाता...?" रेखा कुछ समझ न पाई थी।

"हा तुम ही वह इकलौती हस्ती हों जो अपने भाई को इस प्रकोप और नर्क से बचा सकती हो वर्ना कुछ ही अवधि में उसकी मृत्यु निश्चित है।" काले चिराग ने रहस्योद्घाटन किया।

"नहीं, मैं अपने भाई को मरने नहीं दूंगी। अगर अपनी जिन्दगी देकर भी भैया की जान बचानी पड़ी तो बचा लूंगी।"

रेखा ने बड़े यकीन के साथ कहा।

"मैं जानता हूँ।" काले चिराग ने मुंडी हिलाते हुए कहा- "अगर मुझे इस बात का विश्वास न होता तो तुम्हें यहां तक लाता क्यों?"

" आप लाए हैं यहां ?" रेखा ने हैरान होकर पूछा।

"हां, यही...।" काले चिराग ने गोल-मोल जवाब दिया।

"यानि कि बरसों से बन्द उस काले कमरे में मेरी जिस राजा साहब से मुलाकात हुई थी, वह आप ही का एक रूप था...?"

"नहीं, वह में नहीं था वह राकल है...।"

"राकल...।" रेखा ने इस अनूठे नाम को दोहराया- "उन्होंने मुझे एक डायरी दी थी- मेरी जिन्दगी का हाल बताने वाली। वह अब भी मेरे पात मौजूद है। यह डायरी उन्होंने मुझे भेंट दी थी। उनका ख्याल था कि मैंने उन्हें आजाद करवाया है। लेकिन मैंने तो उनकी मुक्ति के लिए कुछ नहीं किया।"

यह सुनकर काले चिराग ने एक जोरदार कहकहा लगाया, फिर बोला- "वह बड़ा शैतान, शरारती, फितना शख्स है।"

''होगा।'' रेखा ने लापरवाही से कहा- "लेकिन मुझे तो उन्होंने कोई हानि नहीं पहुंचाई...।" और काला चिराग अजीब से लहजे में बोला "आने वाले कल के बारे में कोई क्या कह सकता है।"

" यह राकल है कौन?" रेखा ने पूछा।

"हमारी दुनिया का एक शक्तिशाली शख्स... जो बड़ा रंगीनबाज निकला है।"
 
"और यह रूपसी बकाल कौन है?"

"बकाल - राकल की बहन है। "

"ओह, अच्छा...!" रेखा तय नही कर पाई थी कि इस रहस्योद्घाटन पर खुश हो या आश्चर्च व्यक्त करे, उसने कुछ सोचते हुए कहा- "फिर तो इन्द्र भैया के सितसिले में राकल से मदद ली जा सकती है...।"

"वह अपनी बहन के खिलाफ तुम्हारी सहाश्ता क्यों करेगा....।"

"मैं समझती हूँ कि वह एक अच्छी, सहृदय हस्ती है।"

"तुम उससे सिर्फ एक बार मिली हो मैं उसे बरसों से जानता हूँ।"

"और आपने उसे कैसा पाया है?"

"मैंने बताया है कि एक शैतान फितरत हस्ती है। शैतान, शरारती और रंगबाज...।" काले चिराग के माथे पर बल पड़ गये।

"मैं उससे मिलना चाहती हूँ।"

"पहले अपने भाई से तो मिल लो...।"

रेखा उत्तेजित हो उठी, बोली- "हां, ठीक है। चलिये पहले मुझे मेरे भाई से मिला दीजिए।"

"तुम खाना खा लो, कुछ देर आराम कर लो। फिर मैं तुम्हें इन्द्रजीत पास ले चलूंगा।" खाने का वक्त हो ही रहा था। रेखा ने इत्मीनान से खाना खाया। उसे अपने भाई तक पहुंच जाने की बहुत खुशी थी। किस्मत ने उसे बहुत सही वक्त पर अपने भाई की मदद के लिए भेज दिया था।

लगभग चार बजे काला चिराग कमरे में आया। इस बीच रेखा थोड़ी देर आराम करके, मुंह-हाथ धोकर तैयार हो चुकी थी।

"चले...।" उसने काले चिराग से पूछा।

"हां, बिल्कुल!" काले चिराग ने फौरन जवाब दिया। और जब वह दरवाजे तरफ बढ़ने लगी तो काले चिराग ने देखा कि वह अपना सामान कमरे में ही छोड़े जा रही है। उसने पूछा-

"क्या आप अपना सामान साथ नहीं लेंगी?"

"क्या हमें यहां वापस लौटकर नहीं आना है?" रेखा ने पूछा।

"मेरा ख्याल है कि जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर जरूरी हुआ तो आ जाएंगे।" "ठीक है।" यह कहकर रेखा ने अपना सामान समेट लिया।

उसका सामान ही क्या था एक बैग ही तो था। रेखा ने उसी में अपनी तमाम चीजें भरकर बैग कन्धे पर डाल लिया।

"चलिये...।"

यूं जब रेखा उस महल नुमा भवन से बाहर निकली तो धूप ढ़ल रही थी। बाहर का वही माहौल था। उन दोनों के अतिरिक्त दूर-दूर तक कोई नहीं था। एक खूबसूरत हरा-भरा बाग था। बीच में खूबसूरत फौव्वारा और भवन में चारों तरफ दरवाजे ही दरवाजे थे।

फव्वारे के निकट से गुजरकर जब रेखा ने ऐसे ही पलटकर उस सुर्ख पत्थरों वाले भवन पर एक 'अलविदाई' नजर डालनी चाहते तो वहां कोई भवन नहीं था।
 
स्वाहा और फिर जब वह फौव्वारे से आगे महराबी दरवाजे में प्रविष्ट हुई तो पीले वह हरा-भरा बाग, फौव्वारा इत्यादि भी गायब हो गए। रेखा फिर महराली दरवाजे से निकलकर ऊपर जाती हुई बेढ़ियां चढ़ने लगी तो उसमें हिम्मत न हुई कि वह पीछे मुड़कर देखे।

लेकिन जब वह खण्डहर की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंची और उसकी जिज्ञासा ने उसे पीछे मुड़कर देखने पर मजबूर किया तो उसने देखा कि सीढ़ियां भी गायब हैं। अब उन सीढ़ियों की जगह एक ढ़लान-सी दिखाई दे रही थी और नीचे गड्ढ़े में पानी भरा हुआ था।

काला चिराग उसके आगे-आगे चल रहा था।

रेखा ने सोचा कि उसी से पूछे कि यह सब क्या है? वह बाग और महल सब कहां गए। अब चारों तरफ रेगिस्तान था, उड़ती हुई रेत थी और दूर कहीं चंद चीलें दिखाई दे रही थीं। रेखा, पूछते-पूछते रुक गई। उसे अंदाजा हो गया था कि वह एक गैर-इन्सानी प्राणी की गिरफ्त में है और ऐसे गैर इन्सानी, चमत्कारी प्राणियों से किसी भी अचरज की आशा की जा सकती है।

वह अपने कंधे पर बैग लटकाए, खामोशी से काले चिराग के पदचिन्हों पर चलती रही। वह काफी तेज चल रहा था । इतनी तेज रफ्तार से कि रेखा के लिये उसका साथ देना कठिन हो रहा था।

"जरा धीरे चलिये न?" अंततः उसने पुकारकर कहा ।

काले चिराग के कान पर जू तक न रेंगी। वह सुनी-अनसुनी कर गया। उसने पलटकर भी नहीं देखा। आगे एक रेत का ऊचा टीला था। वह घूमकर उस टीले के पीछे चला गया। रेखा ने फौरन दौड़ लगाई। उसे अंदेशा था कि वह रेत के इस समुद्र में अकेली न रह जाये और कुछ ऐसा ही हुआ भी था।

रेखा घूमकर टीले के पीछे पहुंची तो वहां कुछ नहीं था।

काला चिराग गायब हो चुका था। उसे गायब पाकर रेखा का दिल धक्क से रह गया।

हे प्रभु! अब वह क्या करे। किस तरह अपने भाई की झोपड़ी तक पहुंचेगी? जाने कहां, किधर वह कितनी दूर है वह झोपड़ी?

रेखा अभी सोच ही रही थी कि उसकी नजरें काले चिराग पर पड़ी। वह रेत के टीले के भीतर से इस तरह निकल रहा था जैसे पानी की सतह के भीतर से निकल रहा हो। वह रेत के अन्दर से, मक्खन में से बाल की तरह निकल आया। उसके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कराहट थी। जाने क्या था उसकी मुस्कराहट में कि उसका चेहरा भी बदल जाता था और वह यह क्षण होते थे जब उसके चेहरे में सम्मोहन पैदा हो जाता था।

"क्या हुआ मुझे गायब देखकर परेशान हो गई थी?" उसने पूछा।

" हा सच ही में...।" रेखा का जवाब था ।

"आओ, मेरे साथ ।" कहते हुए काले चिराग ने उसका कोमल हाथ पकड़ लिया और उसे रेत के टीले की तरफ ले चला ।

"कहां ले जा रहे हो मुझे ?" रेखा घबराकर बोली ।

सामने खासा ऊंचा रेत का टीला था और वह रेखा का हाथ थामे उस टीले के अन्दर प्रवेश करना चाहता था, वह लापरवाही से बोला-

"आओ अन्दर चलते हैं।"

"टीले के अन्दर...! रेत में! मेरा तो दम घुट जाएगा।" रेखा परेशान हो गई। उसका सांस अभी से रुकने लगा था।

काला चिराग एक कदम आगे था। वह रेत के टीले में दाखिल हो चुका था, और वह यू प्रविष्ट हो रहा था जैसे रुई के ' गालों में इस रहा हो। उसने रेखा का हाथ मजबूती से थाम रखा था। वह रत में गायब हो चुका था और रेखा को अपनी तरफ खींच रहा था। रेखा का हाथ रत में घुसता जा रहा था।

फिर रेखा की आंखों के सामने एकदम अन्धेरा छा गया। उसने अचानक ही रेत अपने मुंह पर महसूस की थी। लेकिन यह अहसास अधिक देर तक नहीं रहा। जब उसने खौफ से बंद हुई आंखें खोली तो रेत के टीले का कहीं नामो-निशान तक नहीं था । और... और सामने कुछ ही फासले पर उसे वह झोपड़ी नजर आ रही थी, जिसकी छत पर एक उल्लू बैठा था और एक नाग दरवाजे पर कुण्डली मारे पहरा दे रहा था।

. यह वही झोपड़ी थी वही दृश्य था जो वह अपने सपने में देखा करती थी। और अब वह जानती थी कि इस झोपड़ी में उसे सहायता के लिए पुकारने वाला और कोई नहीं उसका अपना भाई इन्द्रजीत था ।

किसी मायावी रूपसी बकाल का कैदी इन्द्रजीत ।
 
इस झोपड़ी को देखकर रेखा ने एक गहरी सांस ली थी।

"कहो, तुम्हारा दम तो नहीं घुटा?" काले चिराग ने मुस्कराते हुए पूछा।

"नहीं, बिल्कुल नहीं। बल्कि मुझे तो यह महसूस हो नहीं हुआ कि मैं रेत के टीले में से गुजर रही हूँ।" रेखा बोली।

"अब तुम अन्दर जाओ अपने भाई से मिल आओ।"

""आप अन्दर जाएँग?"

"नहीं, मैं बाहर ही बेढंगा।"

"कोई विशेष कारण?"

"हां, विशेष ही समझो। तुम्हारी सुरक्षा के लिए मुझे यहां रुकना पड़ेगा।"

रेखा की निगाहें झोपड़ी के दरवाजे की तरफ उठ गई, वह बोली- "लेकिन में अन्दर जाऊंगी कैसे? वह सांप दरवाजे पर कुण्डली मारे बैठा है। "

"उसकी चिन्ता मत करो। मैं जैसे ही झोपड़ी के पास पहुंचूंगा वह तत्काल गायब हो जाएगा। "

"ओह...!" रेखा के मुंह से लम्बी सांस निकली।

और फिर ऐसा ही हुआ। काला चिराग ज्यों ही झोपड़ी के पास पहुंचा। नाग फौरन घूमकर झोपड़ी के पीछे कहीं गायब हो गया। सांप के जाते ही उल्लू भी छत पर से तेज फड़फड़ाहट के साथ उड़ गया। काला चिराग दरवाजे के पास रुक गया और हाथ के इशारे से रेखा को अन्दर जाने को कहा।

रेखा धड़कते दिल के साथ अन्दर दाखिल हुई।

छोटे दरवाजे से गुजरकर जब वह झोपड़ी में खड़ी हुई तो उसने एक तरफ कालीन पर एक शख्स को लेटा हुआ देखा। उसने अपने ऊपर काली चादर ओढ़ रखी थीं। मुंह तक ढका हुआ था। वह दबे पांव इन्द्रजीत के पास पहुंच गई दिल चाह रहा था कि वह उसके चेहरे से चादर हटा दे। लेकिन उसने ऐसा करना उचित नहीं समझा। उसने थोड़ा झुकते हुए बड़े ही प्यार से पुकारा-

"इन्द्र भैया...!"

रेखा की आवाज सुनते ही चादर में हरकत हुई। इन्द्रजीत ने धीरे-धीरे अपने चेहरे से चादर हटाई। पर वह चादर हटाते हटाते रुक गया और चादर मुंह पर लिए लिए ही आहिस्ता से उठ गया। उसने चादर सिर से न उतारी बल्कि इस तरह ओढ़ ली थी कि उसका चेहरा दिखाई न दे सके।

उसे गर्दन उठाकर एक आंख से रेखा की तरफ देखा और खुशी भरे लहजे में बोला-

" शीना तुम आ गई...मेरी बहन तुम आ गई।"

"हां, भैया! मैं आ गई हूँ। मैं आपको लेने आई हूँ...?"

तब इन्द्रजीत ने चादर से एक हाथ निकाला। सूखा हुआ हाथ... जैसे हड्डियों का ढाचा । उसने हाथ के इशारे से रेखा को कालीन पर बैठने के लिए कहा।

रेखा उसके सामने कालीन पर बैठ गई और उसका सूखा हुआ हाथ अपने खूबसूरत कोमल हाथों के बीचकले लिया।

" आपकी... आपकी यह हालत कैसे हो गई, भैया!" वह होंठ चबाते हुए बोली।

"मेरी यह हालत बकाल ने की है, मेरी बहन उस वासना की मारी चुड़ैल ने मेरी जिन्दगी तबाह कर दी है।"
 
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