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Guest
आ गई कि वह फौरन झोंपड़ी में दाखिल हो गया। अगर उसने फुर्ती न दिखाई होती तो उसका धायल हो जाना यकीनी था।
अपने शिकार को झोंपड़ी में घुसते देखकर, उल्लू ऊपर की तरफ उठा और झोपड़ी के ऊपर से उड़ता हुआ दूर
निकल गया। फिर एक चक्कर लगाकर वापस उस झोंपड़ी की छत पर आ बैठा।
इन्द्रजीत को उल्लू के इस हमले से यह अंदाजा लगाने में देर न लगी कि इस झांपड़ी का दरवाजा बन्द न होने और
. किसी निगरान की अनुपस्थिति के वावजूद वह झोंपड़ी से बाहर नहीं निकल सकता। यहां कुछ अदृश्य-मायावी रक्षक
मौजूद हैं।
दो-तीन दिन बीत गए।
इन दिनों में झोंपड़ी में कोई नहीं आया था। लेकिन खाने-पीने की कोई परेशानी नहीं हुई थी। खाना खत्म होने पर कपड़े के नीचे ट्रे में दूसरा ताजा खाना आ जाता -पानी के कम होने पर खुद-ब-खुद ही पानी से भर जाती। ट्रे में खाना व सुराही में पानी डालकर जाने वाला, इन्द्रजीत को प्रयत्नोपरान्त भी नजर नहीं आया था। इन तीन दिनों में वह किसी से बात करने किसी की शक्ल देखने को तरस गया था।
विकाल- विस्तृत रेगिस्तान, इकलौती झोंपड़ी और इस झोंपड़ी में एक अकेला आदमी। शायद यही कैदे तन्हाई (एकान्त कैद ) थी।
फिर सात दिन बीत गए।
इन सात दिनों में पौष्टिक खुराक और आराम का ही जादू था कि इन्द्रजीत की कमजोरी जाती रही थी। वह भला चंगा है। गया था। शारीरिक शक्तियां लौट आई थीं। हाथ-पैरों की रंगत में सुखी आ गई थी।
तब 'वह' फिर आई।
वह सातवीं रात थी। चांदनी छिटकी हुई थी। ठण्डी हवा चल रही थी। झोपड़ी के भीतर मलगजा उजाला फैला हुआ था।
इन्द्रजीत दरवाजे की तरफ मुंह किये लेटा हुआ था, बाहर चांदनी बरस रही थी। चौदहवीं का चाद रेत के चमकते कणों को और भी चमका रहा था। बाहर हर तरफ उजाला फैला हुआ था। अत्यन्त ही मंत्र-मुग्ध कर देने वाला स्वप्निल सा वातावरण था।
ऐसे में ही इन्द्रजीत को, खुले दरवाजे से, वह मायावी स्वप्न सुन्दरी आती नजर आई थी, जिसने उक्की हंसती-मुस्कराती जिन्दगी उजाड़ दी थी। उससे उसकी प्रेयसी छीन ली थी। उसे इन वीरानों का कैदी बना दिया था । इस पर उसका वह अमल-जिसके पाश में वह अपनी सुध खो बैठता था और इस वेसुधी से वह जिस तरह इन्द्र का खून निचोड़ लेती थी उसमें सुख-आनन्द कम और शोषण अधिक था। 'वह' अपनी सन्तुष्टि कर लेती थी और इन्द्र का सारा खून जैसे अपने आप में जज्ब कर लेती थी।
और यूं इन्द्रजीत अधमरा केंचुआ-सा बनकर रह जाता था। रक्तविहीन, शक्तिहीन चुसा निचुड़ा सा केंचुआ ।
इन्द्रजीत उसे आते देखकर उठकर बैठ गया।
पूरे सात दिन बाद उसे किसी की दिखाई दी थी। चाहे वह उसकी खून की प्यासी बकाल कैंस? थी। बकाल श्वेत परिधान में थी और आते हुए वह किसी भटकती हुई आत्मा की तरह लग रही थी।
अपने शिकार को झोंपड़ी में घुसते देखकर, उल्लू ऊपर की तरफ उठा और झोपड़ी के ऊपर से उड़ता हुआ दूर
निकल गया। फिर एक चक्कर लगाकर वापस उस झोंपड़ी की छत पर आ बैठा।
इन्द्रजीत को उल्लू के इस हमले से यह अंदाजा लगाने में देर न लगी कि इस झांपड़ी का दरवाजा बन्द न होने और
. किसी निगरान की अनुपस्थिति के वावजूद वह झोंपड़ी से बाहर नहीं निकल सकता। यहां कुछ अदृश्य-मायावी रक्षक
मौजूद हैं।
दो-तीन दिन बीत गए।
इन दिनों में झोंपड़ी में कोई नहीं आया था। लेकिन खाने-पीने की कोई परेशानी नहीं हुई थी। खाना खत्म होने पर कपड़े के नीचे ट्रे में दूसरा ताजा खाना आ जाता -पानी के कम होने पर खुद-ब-खुद ही पानी से भर जाती। ट्रे में खाना व सुराही में पानी डालकर जाने वाला, इन्द्रजीत को प्रयत्नोपरान्त भी नजर नहीं आया था। इन तीन दिनों में वह किसी से बात करने किसी की शक्ल देखने को तरस गया था।
विकाल- विस्तृत रेगिस्तान, इकलौती झोंपड़ी और इस झोंपड़ी में एक अकेला आदमी। शायद यही कैदे तन्हाई (एकान्त कैद ) थी।
फिर सात दिन बीत गए।
इन सात दिनों में पौष्टिक खुराक और आराम का ही जादू था कि इन्द्रजीत की कमजोरी जाती रही थी। वह भला चंगा है। गया था। शारीरिक शक्तियां लौट आई थीं। हाथ-पैरों की रंगत में सुखी आ गई थी।
तब 'वह' फिर आई।
वह सातवीं रात थी। चांदनी छिटकी हुई थी। ठण्डी हवा चल रही थी। झोपड़ी के भीतर मलगजा उजाला फैला हुआ था।
इन्द्रजीत दरवाजे की तरफ मुंह किये लेटा हुआ था, बाहर चांदनी बरस रही थी। चौदहवीं का चाद रेत के चमकते कणों को और भी चमका रहा था। बाहर हर तरफ उजाला फैला हुआ था। अत्यन्त ही मंत्र-मुग्ध कर देने वाला स्वप्निल सा वातावरण था।
ऐसे में ही इन्द्रजीत को, खुले दरवाजे से, वह मायावी स्वप्न सुन्दरी आती नजर आई थी, जिसने उक्की हंसती-मुस्कराती जिन्दगी उजाड़ दी थी। उससे उसकी प्रेयसी छीन ली थी। उसे इन वीरानों का कैदी बना दिया था । इस पर उसका वह अमल-जिसके पाश में वह अपनी सुध खो बैठता था और इस वेसुधी से वह जिस तरह इन्द्र का खून निचोड़ लेती थी उसमें सुख-आनन्द कम और शोषण अधिक था। 'वह' अपनी सन्तुष्टि कर लेती थी और इन्द्र का सारा खून जैसे अपने आप में जज्ब कर लेती थी।
और यूं इन्द्रजीत अधमरा केंचुआ-सा बनकर रह जाता था। रक्तविहीन, शक्तिहीन चुसा निचुड़ा सा केंचुआ ।
इन्द्रजीत उसे आते देखकर उठकर बैठ गया।
पूरे सात दिन बाद उसे किसी की दिखाई दी थी। चाहे वह उसकी खून की प्यासी बकाल कैंस? थी। बकाल श्वेत परिधान में थी और आते हुए वह किसी भटकती हुई आत्मा की तरह लग रही थी।