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"मैं जानती हूँ। मुझे काला चिराग ने सबकुछ बता दिया है। पूरी आप बीती सुना दी है आपकी...।"
"काला चिराग बहुत ही नेकदिल आटमी है। वह मुझसे आकर मिला था और उसी ने मुझे बारे में बताया है... तुम्हारे आने की इत्तला दी थी और अब पहले जब तुम यहां आइ धी और अन्दर आने की बजाय वापस पलट गई थीं तो में तुम्हें अन्दर से देख रहा था। मैंने तुम्हें देखकर ही कहा था कि डरों मत, अन्दर आ जाओ। लेकिन अन्दर नहीं आई थी। शायद तुम्हें काले चिराग ने अन्दर आने रोक दिया था और तुम्हें अपने साथ ले गया था। मैं जानता हूँ कि उसने तुम्हें अन्दर आन से क्यों रोका था...।" इन्द्रजीत बहुत धीरे-धीरे बोल रहा था। जैसे बरसों का मरीज हो वह और .उससे बोला न जा रहा हो।
"सच कहूँ भैया! मुझे उसकी यह हरकत बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी लेकिन अब सोचती हूँ कि उसने मुझे अपने साथ ले जाकर अच्छा ही किया था। अगर में आपके बारे में सबकुछ जानने के बिना ही आपको देख लेती तो मुझे तीव्र दिमाग शॉक लगना था। खुश तो खैर में अब भी नहीं हूँ। आपका यह सूखा हाथ आपके स्वास्थ्य का पता दे रहा है। खैर, कोई बात नहीं। मैं अब आपको अपने साथ ले जाऊंगी।"
" शीना एक बात बताओ। तुम्हारा यह नाम किसने रखा... जरूर दादा जी की ख्याहिश पर ही रखा गया होगा। पापा- दादा जी की इस ख्वाहिश का जिक्र अक्सर किया करते थे कि वो अपनी पोती का नाम शीना रखना चाहते थे।"
"हां, भैया ! मेरा यह नाम उन्हीं की ख्याहिश पर रखा गया था।" रेखा ने बताया, लेकिन अब मेरा नाम शीना नहीं... रेखा है। मुझे शीना कोई नही कहता खुद मुझे भी मालूम नहीं था कि मेरा नाम शीना है।
'अच्छा! हैरत है।'
"मैं जब अपनी कहानी सुनाऊंगी तो आप और भी हैरान रह जाएंगे। आपके लापता हो जाने के बाद पापा एकदम सहम गये थे। उन्होंने चाचा के डर से मुझे कभी अपनी बेटी नहीं कहा। मैं गैरों में पली-बड़ी... इसलिए मेरा नाम भी बदल दिया गया। पापा ने मेरे लिए बड़ी कुर्बानी दी...।" रेखा का स्वर भर्रा गया था।
"कैसे हैं पापा और मम्मी का क्या हाल है। मम्मी तो मेरी गुमशदगी पर रो-रो कर पागल ही हो गई होंगी।"
रेखा के दिल में आया कि बता दे कि वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं पर फिर यह सोचकर रुक गई कि अभी यह खबर इन्द्र के लिए तीव्र सदमे का कारण बन जाएगी पहले ही सूखकर दृष्टियों का ढांचा बना हुआ है-मां-बाप की मौत की सूचना उसे मिट्टी का ढेर बना देगी।
"वे दोनों सकुशल हैं, भैया!" उसने सफेद झूठ बोला- "और आपको बहुत याद करते हैं।"
" और वो शैतान... कमीना शख्स?" इन्द्र के लहजे में नफरत भर आई।
"कौन? चाचा रमाकांत...?"
"हां, उसी की बात कर रहा हूँ।"
"वह हमारे प्रतिशोध का इंतजार कर रहा है।"
इन्द्रजीत भड़ककर बोला- "ठीक कहा तुमने रेखा । तुम देखोगी मैं उससे ऐसा इंतकाम लूंगा कि उसकी रूह तक काप जाएगी।"
रेखा सजल आंखों से उसे देखने लगी। इन्द्रजीत अभी तक पूरी तरह चादर ओढ़े बैठा था। बस, उसकी सिर्फ एक आंख जरूर दिखाई दे रही थी। रेखा समझ नहीं पा रही थी कि उसने अपना चेहरा चादर में क्यों छिपा रखा है।
"भाई, एक बात पूछूं?" रेखा बोली।
"हां, पूछो।"
"आप बुरा तो नहीं मानोगे?"
"काला चिराग बहुत ही नेकदिल आटमी है। वह मुझसे आकर मिला था और उसी ने मुझे बारे में बताया है... तुम्हारे आने की इत्तला दी थी और अब पहले जब तुम यहां आइ धी और अन्दर आने की बजाय वापस पलट गई थीं तो में तुम्हें अन्दर से देख रहा था। मैंने तुम्हें देखकर ही कहा था कि डरों मत, अन्दर आ जाओ। लेकिन अन्दर नहीं आई थी। शायद तुम्हें काले चिराग ने अन्दर आने रोक दिया था और तुम्हें अपने साथ ले गया था। मैं जानता हूँ कि उसने तुम्हें अन्दर आन से क्यों रोका था...।" इन्द्रजीत बहुत धीरे-धीरे बोल रहा था। जैसे बरसों का मरीज हो वह और .उससे बोला न जा रहा हो।
"सच कहूँ भैया! मुझे उसकी यह हरकत बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी लेकिन अब सोचती हूँ कि उसने मुझे अपने साथ ले जाकर अच्छा ही किया था। अगर में आपके बारे में सबकुछ जानने के बिना ही आपको देख लेती तो मुझे तीव्र दिमाग शॉक लगना था। खुश तो खैर में अब भी नहीं हूँ। आपका यह सूखा हाथ आपके स्वास्थ्य का पता दे रहा है। खैर, कोई बात नहीं। मैं अब आपको अपने साथ ले जाऊंगी।"
" शीना एक बात बताओ। तुम्हारा यह नाम किसने रखा... जरूर दादा जी की ख्याहिश पर ही रखा गया होगा। पापा- दादा जी की इस ख्वाहिश का जिक्र अक्सर किया करते थे कि वो अपनी पोती का नाम शीना रखना चाहते थे।"
"हां, भैया ! मेरा यह नाम उन्हीं की ख्याहिश पर रखा गया था।" रेखा ने बताया, लेकिन अब मेरा नाम शीना नहीं... रेखा है। मुझे शीना कोई नही कहता खुद मुझे भी मालूम नहीं था कि मेरा नाम शीना है।
'अच्छा! हैरत है।'
"मैं जब अपनी कहानी सुनाऊंगी तो आप और भी हैरान रह जाएंगे। आपके लापता हो जाने के बाद पापा एकदम सहम गये थे। उन्होंने चाचा के डर से मुझे कभी अपनी बेटी नहीं कहा। मैं गैरों में पली-बड़ी... इसलिए मेरा नाम भी बदल दिया गया। पापा ने मेरे लिए बड़ी कुर्बानी दी...।" रेखा का स्वर भर्रा गया था।
"कैसे हैं पापा और मम्मी का क्या हाल है। मम्मी तो मेरी गुमशदगी पर रो-रो कर पागल ही हो गई होंगी।"
रेखा के दिल में आया कि बता दे कि वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं पर फिर यह सोचकर रुक गई कि अभी यह खबर इन्द्र के लिए तीव्र सदमे का कारण बन जाएगी पहले ही सूखकर दृष्टियों का ढांचा बना हुआ है-मां-बाप की मौत की सूचना उसे मिट्टी का ढेर बना देगी।
"वे दोनों सकुशल हैं, भैया!" उसने सफेद झूठ बोला- "और आपको बहुत याद करते हैं।"
" और वो शैतान... कमीना शख्स?" इन्द्र के लहजे में नफरत भर आई।
"कौन? चाचा रमाकांत...?"
"हां, उसी की बात कर रहा हूँ।"
"वह हमारे प्रतिशोध का इंतजार कर रहा है।"
इन्द्रजीत भड़ककर बोला- "ठीक कहा तुमने रेखा । तुम देखोगी मैं उससे ऐसा इंतकाम लूंगा कि उसकी रूह तक काप जाएगी।"
रेखा सजल आंखों से उसे देखने लगी। इन्द्रजीत अभी तक पूरी तरह चादर ओढ़े बैठा था। बस, उसकी सिर्फ एक आंख जरूर दिखाई दे रही थी। रेखा समझ नहीं पा रही थी कि उसने अपना चेहरा चादर में क्यों छिपा रखा है।
"भाई, एक बात पूछूं?" रेखा बोली।
"हां, पूछो।"
"आप बुरा तो नहीं मानोगे?"