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स्वाहा

"मैं जानती हूँ। मुझे काला चिराग ने सबकुछ बता दिया है। पूरी आप बीती सुना दी है आपकी...।"

"काला चिराग बहुत ही नेकदिल आटमी है। वह मुझसे आकर मिला था और उसी ने मुझे बारे में बताया है... तुम्हारे आने की इत्तला दी थी और अब पहले जब तुम यहां आइ धी और अन्दर आने की बजाय वापस पलट गई थीं तो में तुम्हें अन्दर से देख रहा था। मैंने तुम्हें देखकर ही कहा था कि डरों मत, अन्दर आ जाओ। लेकिन अन्दर नहीं आई थी। शायद तुम्हें काले चिराग ने अन्दर आने रोक दिया था और तुम्हें अपने साथ ले गया था। मैं जानता हूँ कि उसने तुम्हें अन्दर आन से क्यों रोका था...।" इन्द्रजीत बहुत धीरे-धीरे बोल रहा था। जैसे बरसों का मरीज हो वह और .उससे बोला न जा रहा हो।

"सच कहूँ भैया! मुझे उसकी यह हरकत बिल्कुल अच्छी नहीं लगी थी लेकिन अब सोचती हूँ कि उसने मुझे अपने साथ ले जाकर अच्छा ही किया था। अगर में आपके बारे में सबकुछ जानने के बिना ही आपको देख लेती तो मुझे तीव्र दिमाग शॉक लगना था। खुश तो खैर में अब भी नहीं हूँ। आपका यह सूखा हाथ आपके स्वास्थ्य का पता दे रहा है। खैर, कोई बात नहीं। मैं अब आपको अपने साथ ले जाऊंगी।"

" शीना एक बात बताओ। तुम्हारा यह नाम किसने रखा... जरूर दादा जी की ख्याहिश पर ही रखा गया होगा। पापा- दादा जी की इस ख्वाहिश का जिक्र अक्सर किया करते थे कि वो अपनी पोती का नाम शीना रखना चाहते थे।"

"हां, भैया ! मेरा यह नाम उन्हीं की ख्याहिश पर रखा गया था।" रेखा ने बताया, लेकिन अब मेरा नाम शीना नहीं... रेखा है। मुझे शीना कोई नही कहता खुद मुझे भी मालूम नहीं था कि मेरा नाम शीना है।

'अच्छा! हैरत है।'

"मैं जब अपनी कहानी सुनाऊंगी तो आप और भी हैरान रह जाएंगे। आपके लापता हो जाने के बाद पापा एकदम सहम गये थे। उन्होंने चाचा के डर से मुझे कभी अपनी बेटी नहीं कहा। मैं गैरों में पली-बड़ी... इसलिए मेरा नाम भी बदल दिया गया। पापा ने मेरे लिए बड़ी कुर्बानी दी...।" रेखा का स्वर भर्रा गया था।

"कैसे हैं पापा और मम्मी का क्या हाल है। मम्मी तो मेरी गुमशदगी पर रो-रो कर पागल ही हो गई होंगी।"

रेखा के दिल में आया कि बता दे कि वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे हैं पर फिर यह सोचकर रुक गई कि अभी यह खबर इन्द्र के लिए तीव्र सदमे का कारण बन जाएगी पहले ही सूखकर दृष्टियों का ढांचा बना हुआ है-मां-बाप की मौत की सूचना उसे मिट्टी का ढेर बना देगी।

"वे दोनों सकुशल हैं, भैया!" उसने सफेद झूठ बोला- "और आपको बहुत याद करते हैं।"

" और वो शैतान... कमीना शख्स?" इन्द्र के लहजे में नफरत भर आई।

"कौन? चाचा रमाकांत...?"

"हां, उसी की बात कर रहा हूँ।"

"वह हमारे प्रतिशोध का इंतजार कर रहा है।"

इन्द्रजीत भड़ककर बोला- "ठीक कहा तुमने रेखा । तुम देखोगी मैं उससे ऐसा इंतकाम लूंगा कि उसकी रूह तक काप जाएगी।"

रेखा सजल आंखों से उसे देखने लगी। इन्द्रजीत अभी तक पूरी तरह चादर ओढ़े बैठा था। बस, उसकी सिर्फ एक आंख जरूर दिखाई दे रही थी। रेखा समझ नहीं पा रही थी कि उसने अपना चेहरा चादर में क्यों छिपा रखा है।

"भाई, एक बात पूछूं?" रेखा बोली।

"हां, पूछो।"

"आप बुरा तो नहीं मानोगे?"
 
"नहीं, हर्गिज नहीं...।"

"यह आपने अपना चेहरा चादर में क्यों छिपाया हुआ है?"

"वह हवा लगती हैं ना, उससे बचने के लिए।" इन्द्र ने शायद बात बनाने की कोशीश को था।

"लेकिन झोंपड़ी मे तो इस वक्त काफी गर्मी हो रही है और आप हैं कि न केवल चादर ओढ़े वैठें हैं बल्कि अपना मुंह भी ढक रखा है भैया ! अपने चेहरे से चादर हटाईये न करा अपनी बहन को चेहरा भी नहीं दिखायेंगे?" रेखा बेहद 'जज्बाती अंदाज में बोली रेखा की इस ख्याहिश पर इन्द्रजीत भीतर ही भीतर कांप उठा। वह समझ नहीं पा रहा था कि अपनी बहन को किस तरह बताए कि अब उसका चेहरा देखने लायक ही नहीं रहा है। एक वक्त था लड़कियां उसका चेहरा देखते नहीं थकती थीं... नजरें हटाना भी भूल जाती थीं और अब वह वक्त आ गया था कि आज अगर कोई लड़की उसका चेहरा देखती तो फिर जीवन भर न देखने की कसम खा लेती।

हां ऐसा ही हो गया था उसका चेहरा।

"रेखा, अगर तुम मेरा चेहरा न ही देखो तो अच्छा है।" इन्द्रजीत ने व्यथित लहजे में जैसे अनुरोध किया था।.

"क्यों आखिर... मैं अपने भाई का चेहरा क्यों न देखूं? क्या हुआ है आपके चेहरे को ? चादर हटाएं...।" कहते हुए रेखा ने चादर की तरफ हाथ भी बढ़ा दिया था।

"पछताओगी।" कराहती सी आवाज में बोला था इन्द्र ।

"मेरा दिल पत्थर का है।" रेखा उसका आशय समझकर बोली- "प्लीज चादर हटाने दें भैया!"

"अच्छा, ठहरो मैं खुद उतारता हूँ चादर सिर से...।"

"ठीक है, हटाएं...।" रेखा ने अपने हाथ गिरा लिए।

और अब इन्द्रजीत ने अपने दोनों हाथ चादर से निकाले और फिर अपने चेहरे से घूंघट उठा दिया।

उसका चेहरा देखकर रेखा की चींख निकल गई।

इन्द्रजीत ने फौरन ही अपना चेहरा दोबारा ढांप लिया और कांपते हुए व्यथित स्वर में बोला- "मैंने तुमसे कहा था न कि मेरा चेहरा मत देखो। मगर तुम नहीं मानी।"

"यह... यह सब क्या है, भैया! यह आपके चेहरे को क्या हुआ है?" रेखा की आंखों से आंसू छलक आए थे।

इन्द्रजीत का आधा चेहरा बिल्कुल ठीक था लेकिन आधा चेहरा किसी दीमक लगी लकड़ी की तरह हा गया था। मांस में छोटे-बड़े बेशुमार सुराख थे और यूं लगता था जैसे हाथ लगाने पर आधा चेहरा झड़कर नीचे गिर जाएगा।

"मैं कुछ नहीं जानता रेखा, मेरी बहन ! मैं तो बस जिन्दगी का श्राप काट रहा हूँ।" इन्द्र का गला भर आया था, "जाने किस जन्म के पापों का प्रकोप है यह। "

"मेरा जी चाह रहा है कि उस कमीनी बकाल को कत्ल कर दूं।" रेखा अपने आसूं साफ करते हुए बोली। वह सम्भल- चुकी थी और दुःख रोष में बदल चुका था।

"उसे कत्ल करना इतना आसान नहीं है। फिर में तुम्हें उसे कत्ल करने भी नहीं दूंगा।" यह काले चिराग की आवाज

थी।

रेखा ने पीछे मुड़कर देखा तो वह उसके पीछे खड़ा हुआ था। अंदर आते हुए उसने रेखा की बात सुन ली थी। "आप जरा देखें तो उसने भैया की क्या दुर्गत बना रखी है। क्या इसके बाद भी उसे जिंदा रहने का हक ?"

"तुम ठीक कहती हो । उसका यह अपराध वास्तव में ही बहुत बड़ा है। बड़ा और जघन्य ! वह इसी योग्य है कि उसका
 
कझ कर दिया जाए। लेकिन मेरी विवशता यह है कि मैं उससे प्रेम करता हूँ। मैं तो उसे कोई क्षति पहुंचाने की सोच भी नहीं सकता।"

"कुछ देखकर तो प्रेम किया होता।" रेखा झल्लाकर बोली- "ऐसी बुरी और दुष्ट औरत से मुहब्बत कर बैठे।" "प्रेम देखकर कब किया जाता है-प्रेम हो जाता है।" काले चिराग के होठों पर मुस्कान तैर आई थी।

"ओह! तो आप लोगों की दुनिया में भी मुहब्बत का यही दर्शन है...। यही मानते हैं आप भी?" रेखा ने पूछा। "हमारे तुम्हारे यहां क्या यह तो प्रेम का विश्वव्यापी दर्शन है।" काले चिराग न ठहरे हुए सहज में कहा- "दिल और

दिल से जुड़ी भावनाएं भी क्या जुदा होती हैं।" रेखा कुछ क्षण खामोश रही फिर बोली-

"अब बकाल का क्या करें? उसने तो मेरे भाई को कहीं का नहीं छोड़ा है।" रेखा परेशान थी। उसकी आंखों में बार-बार आंसू छलक आते थे।

"परेशान न हो, मेरी बहन! सब ठीक हो जाएगा।" इन्द्र ने सर्द आह भरी थी। "आप बैठ जाएं।" रेखा काले चिराग से सम्बोधित हुई।

''अब बैठने का वक्त नहीं है।" काले चिराग ने रेखा के बराबर बैठते कहा "अब कुछ कर गजरने का वक्त है।" " बताईये, क्या किया जाए ।" रेखाँ बोली- "मैं इस नर्क से अपने भैया की मुक्ति के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ।" "मैं... मै डरता हूँ रेखा, कि कहीं तुम भी किसी मुसीबत में न फंस जाओ।" इन्द्र बोला ।

और इसका जवाब काले चिराग ने दिया।

"इन्द्रजीत ! अगर तुम्हें बकाल के चुंगल से कोई बचा सकता है तो तुम्हारी बहन ही है। वरना वह दिन अधिक नहीं जब तुम्हारे तेहरे की यह दीमक तुम्हारे पूरे शरीर पर फैल जाएगी।"

"हाय, नहीं ।" रेखा चीख ही तो उठी थी, "मैं अपने भाई पर वह दिन कभी नहीं आने दूंगा...!"

"मैं अपने स्वस्थ... अपनी आजादी और अपनी जिन्दगी के लिए अपनी बहन को किसी नर्क-कुण्ड में नहीं झौंक सकता।" इन्द्रजीत बोला, फिर उसने अपनी बहन को सम्बोधित करके कहा- "रेखा, तुम वापस चली जाओ। तुम एक सीधी-साधी लड़की हो। तुम इन मायावियों का मुकाबला नहीं कर सकोगी। मैं एक जादूगर होकर भी बकाल का कुछ नहीं बिगाड़ सका। तुम तो कोई चीज ही नहीं हो। तुम यहां तक आ गई, मैंने तुम्हें देख लिया, मुझे चैन मिल गया। बाकी जिन्दगी में इसी मुलाकात की कल्पना में काट दूंगा। मेरी बहन, मेरा कहना मानो, वापस चली जाओ। तुम बकाल को नहीं जानतीं, वह एक बहुत ही ताकतवर और अम्पार औरत है। उसका मुकाबला आसान नहीं, फिर तुम इसी से बकाल की ताकत का लगा लो कि यह काला चिराग आज तक उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका। उसके मुकाबले के लिए यह तुम्हें तो इनिया से ले आए हैं, लेकिन अपनी दुनिया के प्राणी को खुद कोइ अकुश नहीं लगा सके हैं। है न आश्चय की बात। जबकि यह बकाल से मुहब्बत के भी दावेदार हैं।"

"देखे, मेरे प्यार का मजाक न उड़ाओ।" काले चिराग ने रूखे लहजे में कहा- "जो बात तुम नहीं जानते उस बारे में इस विश्वास से बात करना स्वयं को धोखा देना है। में बकाल से प्यार करता हूँ-इसमें कोई सन्देह नहीं है। रह गई यह बात कि बकाल का मुकाबला मैंने स्वयं क्यों नहीं किया और इसके लिए में तुम्हारी बहन को क्यों लेकर आया हूँ? तो इन्द्रजीत, सुन लो कि बकाल ने महीनों मुझे इस बात का पता ही नहीं चलने दिया कि वह तुम्हे जंगल सं उठा लाई है और तुम पर आसक्त है। जब मुझे संदेह हुआ और में उसका पीछा करते हुए यहां तक पहुंचा तो यह सच्चाई मेरे सामने आई।"

"फिर...?" रेखा बोली।

"और फिर जब मैंने इस समस्या पर बकाल को पकड़ क की पकड़ की तो उसने दवा काली का नाम लिया और राज मदारी का
 
स्वाहा किस्सा सुनाया। उसने मुझे बताया कि वह देवा काली के आदेशानुसार, राजू मदारी की इच्छा पर इसे दण्ड दे रहो है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बकाल तुम्हारे साथ जिस तरह पेश आ रही है वह किसी प्रकोप से कम नहीं। लेकिन इस सजा में उसके लिए आत्म-तृप्ति और सन्तुष्टि है। उसने अपने स्वार्थ हेतु तुम्हें जीवित रखा हुआ है और यह एक गम्भीर घिनौना अपराध है। हमारी दुनिया का कानून इस बात की इजाजत नहीं देता और फिर मेरे लिए तुम्हें...।" उसने इन्द्र की तरफ इशारा किया, खत्म करना कोई कठिन काम नहीं अब भी खत्म कर सकता हूँ और कल भी खत्म कर सकता था। तुम्हारी मौत के साथ ही बकाल का यह खेल समाप्त हो जाता, लेकिन तुम्हारी हत्या बकाल से नहीं छिपती । वह जान जाती नतीजे में मेरी दुश्मन हो जाती और यूं मेरा प्यार खाक में मिल जाता। इसलिए मैंने यह • रास्ता नहीं अपनाया, सोचता रहा कि क्या करना चाहिये ।

"... समय बीतता रहा। एक बात तुम्हे और बता दूं। हमारे प्रेतलोक के वक्त में और तुम्हारी दुनिया वक्त में बहुत अन्तर है तुम्हारी गणना के अनुसार बकाल की कैद में तुम्हें सत्रह- अट्ठारह बरस होते हैं लेकिन मेरी गणना से केवल सात-आठ माह । खैर, जब मैंने तुम्हारी दुनिया में जाकर तुम्हारे खानदान की खोज लगाई तो मुझे तुम्हारी बहन रेखा नजर आई और मैंने तत्काल ही अपनी योजना बना डाली और इसे यहां ले उसया। क्योंकि यह रेखा ही एकमात्र जरिया है, तुम्हारी का और तुम्हारी मुक्ति में मेरी मुक्ति भी है। यह जो तुम्हारी चेहरे को दीमक लग गई है... यह धीरे-धीरे फैलती हुई तुम्हारे पांव के अंगूठे तक पहुंच जाएगी। अगर ऐसा हो गया तो दुनिया की कोई भी ताकत तुम्हें इस विपदा से मुक्ति नहीं दिला सकेगी। तुम्हारा रोग बढ़ता जाएगा और तुम हमेशा-हमेशा के लिए बकाल के हो जाओगे | और यूं मेरे प्यार मेरी चाहत की मौत हो जाएगी। में किसी की मौत नहीं चाहता। न अपनी न तुम्हारी। मैं चाहता हूँ कि रेखा को उसका भाई मिल जाए और मुझे मेरी बकाल ।"

"मैं क्षमा चाहता हूँ कि मेरी बात से आपको दुःख पहुंचा । " इन्द्र शर्मिन्दा था। "कोई बात नहीं। मुझे अब खेद इस बात का है कि मुझे अपनी दुनिया के कुछ रहस्य खोलने पड़े।" काले चिराग ने कहा।

कुछ क्षण खामोशी रहे, और इस खामोशी को रेखा ने तोड़ा, उसने पूछा- "फिर अब करना क्या है, बताइये? मुझे बस

अपना भाई चाहिये... जीवित, स्वस्थ । "

"मेरी तो यही कोशिश है।" काले चिराग नें ठण्डा सांस लेकर कहा- "अतु हमें...।" वह कुछ कहते-कहते अचानक खामोश हो गया। उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं। तभी पंखों की फड़फड़ाहट सुनाई दी। यूं लगा जैसे कोई पक्षी झोपड़ी की छत पर आ बैठा हो। "लगता है, बकाल आ गई।" काला चिराग मुश्किल से ही बोल सका था।

"क्या हुआ...?" रेखा उसे परेशान देखकर खुद भी परेशान हो गई।

"अब क्या होगा?" रेखा एकदम घबरा गई।

"यह तो बहुत बुरा हुआ।' इन्द्र भी सहम गया था।

"मैं देखता हूँ क्या मामला है।" काला चिराग उठता हुआ बोला "अगर बकाल ही आई है तो वह अभी तक अन्दर क्यों नहीं आई।" वह कांपते कदमों से दरवाजे की तरफ बढ़ गया।

रेखा और इन्द्रजीत की निगाहें उसी पर टिकी हुई थीं।

काला चिराग दरवाजे के पास पहुंचकर जैसे ही बाहर जाने के लिए झुका तो कुक्षेक क्षणों के लिए झुका का झुका रह गया। फिर वह खौफजदा होकर पीछे हटा और तेजी से पलटकर इन दोनों के निकट आ गया।

" मारे गए।" उसके मुंह से निकला था।

"क्या हुआ? कौन है बाहर...?" रेखा ने पूछा।
 
"हम घेर लिए गये हैं।" बाहर बकाल के कारिन्दे मौजूद हैं।"

" और बकाल?" इन्द्रजीत ने पूछा। ने

"वह मुझे सामने दिखाई नहीं दी है। पर वह भी आस-पास ही होगी। मेरा ख्याल है आना ही चाहती है, यह अच्छा नहीं हुआ। उसने मेरे जाल फेंकने से पहले ही अपना जाल फेंक दिया।" काला चिराग अपना खौफ छिपा नहीं पा रहा था।

इन्द्रजीत कुछ पूछने ही वाला था कि बाहर से आवाज आई और यह आवाज निःसंदेह बकाल की ही थी।

“झोपड़ी में बैठकर मेरे विरुद्ध षड्यन्त्र रचने वालो, सुनी! मैं आ गई है। तुम क्या समझते हो तुम डेढ़-दो आदमी मुझे अपने जाल में फसा लोगे। भूल है यह तुम्हारी, में तुम्हारी यह साजिश कभी सफल नहीं होने दूंगी। और सुन लो, चमगादड़ के बच्चे । अब तू बाहर आ जा तुझे हिरासत में लिया जाता है...।"

बकाल कुछेक क्षण चुप रही, फिर आगे बोली "चल, जल्दी कर! फौरन बाहर आ जा....।"

यह घोषणा सुन काले चिराग ने बड़े निराशा के साथ ही रेखा और इन्द्र की तरफ देखा और धीरे से बोला- "अच्छा में चलता हूँ। मेरे पंख कट गए हैं। मैं अब न अपने लिए कुछ कर सकता हूँ और न तुम्हारे लिए। मेरे लिए दुआ करना। जीवन रहा तो फिर मिलेंगे...।”

"जल्दी कर ओ चमगादड़ के बच्चे।" बाहर से बकाल की फुंफकारती आवाज आई।
 
काला चिराग, उन दोनों से विदा ले, जैसे ही झोपड़ी से बाहर आया, उसने बकाल को घोड़े पर सवार अपने सामने पाया।

घोड़े पर बैठी वह एक शहजादी-सी लग रही थी।

काले चिराग को देखकर उसने एक कहकहा लगाण। फिर व्यंग्यपूर्ण आवाज में बोली- "आ गया तू मेरी जान के दुश्मन?"

काला चिराग असहाय सा बोला- मैं तेरी जान का दुश्मन नहीं हूँ बकाल । "

"फिर तू अन्दर बैठा क्या मेरी कुशलता की दुआ मांग रहा था?" व्यंग्य भरे स्वर में पूछा बकाल ने।

"हां, यही समझ मैं चाहता हूँ कि तू इस मासूम इन्सान को छोड़ दे और मेरी हो जा...!" "तेरी हो जाऊं।" यह कहकर बकाल बहुत जोर से हंसी- "चमगादड़ की संतान तू है क्या, कभी तूने अपनी औकात पर गौर किया है। "

"मैं जो कुछ भी हूँ बस तेरा हूँ तुमसे प्रेम करता हूँ।"

"मैं तेरी मुहब्बत को अपने घोड़े की 'सूम' तले रखती हूँ।"

"बकाल तू मेरा चाहे जितना अपमान कर ले पर मेरी मुहक्वत को बेइज्जत न कर।" वह तड़प उठा ।

"नहीं तो क्या होगा ?" वह फुंफकारी।

"मैं देवा काली के दरबार में जाऊँगा।" काले चिराग ने सिर उठाया।

"दरबार में?" बकाल जैसे यह बकाल सुनकर पागल हो गई। पागलों की तरह हंसने लगी। फिर हसंते हुए बोली "तू जाएगा देवा काली के दरबार में तू देवा काली के स्नानागार में तो जा सकता है पर तेरा दरबार में जाना आसान नहीं। चमगादड़ के बच्चे, अपनी औकात न भूल... अपनी जात न भूल । "

"प्यार की कोई जात नहीं होती। कोई नस्त नहीं होती। प्रेम तो अंधा होता है।" वह जैसे अपने आप में गुम था ।

"चिन्ता न कर, मैं तुझे तेरी मुहब्बत की तरह अंधा कर दूंगी।" फिर उसने हाथ उठाकर इशारा किया- “बन्दी बना लो इसे ।"

उसके आदेश का तत्सलं पालन हुआ। दो देवकाय खौफनाक सूरत बन्दे आगे बड़े और उन्होंने देखते ही देखते काले

चिराग को जंजीरों में जकड़ लिया और फिर उसे खींचते हुए बकाल के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया।

"मैं जानती हूँ तू अन्दर बैठा क्या कर रहा था। तू इन्द्रजीत की बहन को लेकर, देवा काली के दरबार में मेरा मुकद्दमा पेश करने की मंत्रणा कर रहा था। तेरी मंशा मुझे दण्ड दिलवाने की है और तू इन्द्र को उसकी दुनिया में वापस भिजवाना चाहता है कि तेरा रास्ता साफ हो जाए और मैं तुझसे प्रेम करने लगूं। तेरी तरफ झुक जाऊं। ओ काले चिराग, क्या तूने भी अपनी सूरत देखी है? नहीं देखी तो किसी गन्दे जोहड़ किनारे खड़े होकर अपनी शक्ल देख । फिर मुझसे प्रेम करना । जाओ, ले जाओ इसे।"

वे दोनों खौफनाक देवकाय शख्स अपने घोड़ों पर सवार हुए। दोनों के हाथ में जंजीर का सिरा था। दोनों ने एक

अजीब सी आवाज निकालकर एक-साथ अपने घोड़ों को एड़ लगाई। घोड़े सरपट दौड़ने लगे।

काला चिराग जंजीरों में बंधा रेत पर घसीटता चला जा रहा था। बकाल इस नजारे को बड़े गर्वित अंदाज में देखती रही। यहां तक कि काला चिराग उड़ती रेत के बीच गायब हो गया।

तब बकाल अपना घोड़ा बढ़ाकर झोपड़ी के दरवाजे पर पहुंची।

रेखा झोपड़ी के अन्दर बैठी बाहर होने वाली कोई भी कार्रवाई को देख और सुन रही थी। बकाल को निकट आते
 
देखकर वह फौरन उठकर इन्द्र के पास चली गई। वह समझ नहीं पा रही थी कि वह इस चुड़ैल का सामना किस तरह करे।

इन्द्रजीत ने अपना सूखा हाथ रेखा के कंधे पर रखकर धीरे से दबाया। जिसका मतलब था कि परेशान न हो।

काल अन्दर आई। उसने तीखी निगाहों से रेखा को देखा। रेखा ने भी उसे सिर से पांव तक देखा। फिर दोनों एक-दूसरे की आंखों में आंखें डालकर देखने लगी। कितने ही क्षण दोनों इसी मुद्रा में रहीं।

""बहुत खूबसूरत हो ?" बकाल ने पहल की। पता नहीं यह सवाल था या उद्द्वार !

"कम कुछ तुम भी नहीं हो।" रेखा तीखे स्वर में बोली।

"तुम मेरे बारे में अभी कुछ नहीं जानती।" यह हंसी ।

"मैं अपने भाई की हालत देख रही हूँ। इससे अधिक जानने की कामना भी नहीं है।"

"तुम्हारा भाई मुझे बहुत अच्छा लगता है।" वह हंसकर बोली।

"जो अच्छा लगता हो उसकी ऐसी दुर्गत बना देना शायद तुम्हारी दुनिया की रीत है।"

"बस, अब कुछ ही दिनों की बात है। उसके बाद तुम्हारा भाई हर दुःख, ही पीड़ा से मुक्त हो जाएगा। इसके चेहरे पर ग्रहण लगा हुआ है, बस...।" "हां! चांद को ग्रहण लग चुका है और यह शुभ और अच्छी बात नहीं।" रेखा ने उसकी बात काटी।

"तुम्हारी दुनिया में इसे बुरा समझा जाता होगा। मेरे लिए तो यह अपार प्रसन्नता की बात है। मैंने बड़ी मेहनत की है।

बड़े यत्न किए हैं। अब मुझे इसका फल मिलने वाला है।" वह चहकती-सी बोली थी।

"भूल जाओ...।" रेखा ने बड़ी रूखाई से कहा ।

"किस बात को ?" बकाल हैरान हुई।

"मेहनत के फल को । अब तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा । " रेखा ने दृढ़ लहजे में कहा।

"वह क्यों...?" बकाल ने पूछा।

"मैं जो आ गई।"

"तुम आई नहीं हीं लाई गई हो...।"

"जानती हूँ । काला चिराग मुझे लेकर आएं हैं।" रेखा बोली- "बहुत ही अच्छा और नेकदिल इंसान है वह । " "उस चमगादड़ के बच्चे का नाम इतने सम्मान के साथ न लो। वह तुम्हें तुम्हारी दुनिया से नहीं लाया है।" बकाल गुस्से से बोली।

"अच्छा, फिर कौन लाया है?" रेखा उसे घूरने लगी।

"मेरा भाई लाया है।" बकाल ने बताया।

"कौन भाई?" रेखा की समझ में नहीं आया।

"वह भाई जिसने तुम्हें डायरी भेंट की थी...।"

"तुम्हारे भाई का नाम राकल तो नहीं..?"
 
"हा, मेरे भाई का नाम राकल है और यह नाम तुम्हें इस चमगादड़ के बच्चे ने बताया होगा।"

"उन्होंने नाम ही नहीं, तुम्हारे भाई की खूबियां भी बनाई थी।"

"वह क्या?"

"यही कि राकल, एक शक्तिशाली, अभ्यास-विलासी, रंगबाज शख्त का नाम है।" "ज्यादा बकवास मत करो।" बकाल विफर उठी।

"यह मैंने नहीं कहा। मैं तो उनकी अहसानमंद हूँ। उनकी दी हुई डायरी से मुझे अपने अज्ञात अतीत का पता मिला...।'' रेखा ने होशियारी से बात का रुख बदलते हुए कहा ।

"कहां है वह डायरी?" बकाल का लहजा नर्म हुआ।

"यहां है... मेरे पास... मेरे बैग में...।" रेखा ने बताया। "निकालो...।" बकाल ने आदेश दिया।

इन्द्रजीत खामोश निगाहों से उसे देख रहा था। बकाल अभी तक उससे सम्बोधित नहीं हुई थी। रेखा डायरी निकालने के लिए उठी तो उसका ध्यान इन्द्र की तरफ गया। इन्द्रजीत को अपनी तरफ देखते पाकर वह बड़े ही मोहक अंदाज में मुस्कराई और बड़े प्यार भर लहजे में बोली-

"कैसे हो प्रियतम...?"

"ठीक हूँ। तुम्हारी कृपा दृष्टि है।"

तभी रेखा ने डायरी बेग से निकालकर उसकी तरफ बढ़ाई "यह लो...। तुम इसे वापस लेना चाहती हो तो ले लो।"

बकाल ने कोई जवाब नहीं दिया। वह खामोशी से डायरी के पेज पलटती रही। पृष्ठ पलटते हुए उसके चेहरे पर मुस्कराहट फैलती जा रही थी। फिर अचानक उसने डायरी बंद की और रेखा से सम्बोधित होते हुए बोली- "यह डायरी अब तुम्हें वापस नहीं मिल सकती।"

"तोहफा देकर वापस लेना....क्या यह भी तुम्हारी दुनिया की रीत है?" रेखा ने व्यंग्य से कहा ।

" अब यह डायरी तुम्हारे लिए बेकार है। तुम इससे जो लाभ उठा सकती थी वह उठा चुकी। अब इस डायरी को तुम्हारे पास नहीं रहना चाहिये। तुम्हें इससे नुकसान पहुंच सकता।"

"यह डायरी भला क्या नुकसान पहुचा सकती है?" इस बार इन्द्र ने मुंह खोला। उसी ने पूछा था।

"अरे, कुछ नहीं भैया, यह इस डायरी को वापस लेना चाहती थी...सो ले ली...1" रेखा बोली।

"जाहिर है यह नहीं चाहती कि इस डायरी से हमें आईदा कोई लाभ मिले।"

"बकाल ने रेखा को घूरकर देखा लेकिन बोली कुछ नहीं। फिर उसने वह डायरी झोपड़ी की छत की तरफ उछाली और वह डायरी देखते ही देखते तोता बन गई। और तोता बनकर झोंपड़ी का एक चक्कर लगाकर दरवाजे से बाहर निकल गया।

"चलो, उठो...।" तोते के निकल जाने के बाद बकाल बोली।

"" कहां चलूं..?" रेखा ने पूछा।

"तुम्हें मेरे साथ चलना होगा।" बकाल का लहजा आदेशपूर्ण था।

"तुम मेरी बहन को कहां ले जान चाहती हो? इन्द्र ने परेशान होकर पूछा।
 
"यह मेरे भाई राकल की अमानत है। इसे राकल के पास होगा।" बकाल ने बड़े रहस्यमय अंदाज में कहा-"आओ, उठो । रेखा या शीना ... जो भी तुम्हारा नाम है। "

"मेरा नाम रेखा है। लेकिन मुझे शीना बनते ज्यादा देर नहीं लगती...!"

"मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा।" बकाल उपहासपूर्ण मुस्कान साथ बोली- "यहां किसी को भी कोई फक नहीं पड़ेगा। आओ, चलो। बाहर सवारी तुम्हारी प्रतीक्षक है।" यह कहकर उसने रेखा का हाथ पकड़ लिया।

'उसके हाथ पकड़ते ही रेखा जैसे सम्मोहित-सी उठी, बकाल के हाथ पकड़ने के अंदाज में ही कुछ ऐसी बात थी कि रेखा विरोध की इच्छा करते हुए भी विरोध नहीं कर पाई। दरवाजे की तरफ बढ़ने से पहले बकाल की नजर उसके बैग पर पड़ी तो उसने पूछा- "यह तुम्हारा बैग है?"

" और किसका होगा?"

"क्या है इसमें...?"

"मेरी जरूरत की चीजें।"

"फिर बैग भी साथ ले लो...।"

"बकाल, तुम मेरी बहन को नहीं ले जा सकती।" इन्द्रजीत को अचानक जोश आ गया।

"कौन रोकेगा मुझे...?" बकाल ने एक जोरदार कहकहा लगाया- "क्या तुम? जिससे हिला भी नहीं जाता।" "बकाल, तुमने मुझे तो बर्बाद कर दिया है, लेकिन मेरी बहन पर दया करो। " इन्द्रजीत ने अनुरोध किया।

"न मैंने तुम्हें बर्बाद किया है, न तुम्हारी बहन बर्बाद होगी, समझे...।" बकाल ने शुष्क स्वर में जवाब दिया- फिर रेखा से मुखातिब हो बोली - "आओ, चलो।"

और वह रेखा का हाथ पकड़कर तेजी से बाहर निकल गई। इन्द्रजीत कुछ बोलना चाहता था, लेकिन बोल न सका। वह अपने दोनों हाथ मलता रह गया।
 
रेखा बाहर निकली तो उसने झोपड़ी के सामने एक सजी-सजाई ऊंटनी को पाया, जो बैठी हुई थी।

बकाल ने उसे उस ऊंटनी पस सवार कर दिया और खुद निकट खड़े घोड़े पर बैठ गई। बकाल के पीछे आठ सशस्त्र घुड़सवार मौजूद थे, बकाल के इशारे पर दो घुड़सवार आगे आए ऊंटनी के आगे खड़े हो गए। दो घुड़सवार ऊंटनी के पीछे और उनके पीछे- बकाल और शेष चारों घुड़सवार ।

तब बकाल ने कूच का इशारा किया। दो घुड़सवारों ने अजीब सी आवाज निकाली। वह ऊंटनी उठकर खड़ी हो गई। . और फिर यूं अगले ही क्षण बकाल का यह छोटा-सा काफिला दक्षिण दिशा की तरफ धूल उड़ाता हुआ रवाना हो गया। तीन घन्टे के फासले के बाद, जब सूर्य पश्चिम में झुकने लगा, सामने किसी इमारत के आसार नजर आए। यह किसी

प्राचीन भवन के खण्डहर थे। खण्डहर, सूरज की पीली रोशनी में इन खण्डहरों का रंग और भी चमक उठा था। फिर

वे लोग इन खण्डहरों में प्रवेश कर गये। इन खण्डहरों के बीच एक रास्ता अन्दर को जाता था, रास्ता तंग था, लेकिन

इतना तंग नहीं था कि दो साथ न गुजर सकें।

ये बड़े अजीब से खण्डहर थे। ऊंची-नीची दीवारें थीं। इन दीवारों के बीच अंदर दाखिल होने को बिना 'पट' के दरवाजे थे। ये दीवारें न तो टूटी-फूटी थीं और न ही राह अहसास होता था कि यह कोई विधिवत् भवन है।

यह छोटा-सा काफिला इन खण्डहरों के बीच घूमता-घामता काफी अन्दर तक चला गया।

तब अचानक ही एक बड़ा-सा दरवाजा नजर आया। यह विशाल फाटकनुमा दरवाजा बन्द था, अगले दो घुड़सवारों ने दरवाजे के सामने खड़े होकर चीखकर कहा-

"दरवाजा खोलो बकाल की सवारी आई है।"

यह आवाज सुनते ही छ: आदमी दरवाजे की दाहिनी दिशा में बनी कोठरी से निकले और छ: आदमी बाई तरफ की

कोठरी से बाहर आर और उन सबने मिलकर उस विशाल भारी दरवाजे को खोला।

दरवाजा खुलते ही सारे घुड़सवार घोड़ों से उतर गए। रेखा को ऊंटनी से उतारा गया। बकाल भी अपने घोड़े से कूद आई थी। जैसे ही रेखा ऊंटनी से नीचे उतरी, बकाल ने उसका हाथ थाम लिया और वे दोनों दरवाजे के अन्दर दाखिल हो गई। उनके भीतर जाते ही उन बारह आदमियों ने मिलकर पट बन्द कर दिये और अपनी कोठरियों में वापस चले गए।

फाटक के दूसरी तरफ सामने ही सीढ़ियां थीं।

दरवाजा बन्द होते ही बकाल ने सीढ़ियां चढ़ना शुरू की। सीढ़ियां चढ़ते-बढ़ते रेखा को ऊपर एक दरवाजा नजर आया। इस दरवाजे पर एक हथियारबंद दरबान मौजूद था। वह बकाल को देखकर उसके सम्मान में कमर के बल झुका, फिर सीधा होकर बोला- "क्या आदेश है, बकाल?"

"राकल से मिलना चाहती हूँ। उसकी अमानत उसे सौंपने आई हूँ..।"

"अच्छा, ठहरो।" दरबान ने आगे बढ़कर बंद दरवाजे पर लगी जंजीर को एक विशिष्ट अंदाज में बजाया । कुछ ही क्षणों में दरवाजे में एक छोटी-सी खिड़की खुली और उसमें से एक शख्स ने अपना मुंह चमकाया, बोला-

" हा क्या कहते हो?"

"राकल को एचना दो, बकाल आई है...साथ ही उसकी अमानत भी साथ लाइ हे। " दरबान ने बताया।

"ठीक है। " कहते हुए उस शख्स ने खिड़की बन्द कर ली।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला। रेखा को दूसरी तरफ एक बहुत बड़ा उल्लू नजर आया जो सामने के चबूतरे पर अपनी एक टांग पर खड़ा था और उसने अपनी एक आंख बन्द कर रखी थी बराबर में एक बहुत बड़ा स्तून था ।
 
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