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स्वाहा

बकाल रेखा का हाथ थामे अंदर दाखिल हुई और उस चबूतरे के निकट पहुंचकर रुक गई। उसने सिर उठाया और उस एक टांग वाले उल्लू के सामने आदर से सिर नवाया। उसने रेखा को भी झुकने का इशारा किया था लेकिन रेखा सीधी खड़ी रही। तब उस विशालकाय उल्लू ने अपनी दूसरे आंख खोल दी और अपनी दोनों आंखों से पहले बकाल और फिर रेखा को देखा।

"राकल, मेरे भाई! तेरी अमानत ले आई हूँ... इसे कबूल कर।" बकाल ने बड़े आदर से कहा ।

. उस उल्लू ने अपनी एक टांग पर खड़े-खड़े ही अपने दोनों पंख खोलकर फड़फड़ाये। उसके पंख इतने बड़े थे कि उनके हिलने से रेखा और बकाल को अपने चेहरों पर हवा के थपेड़ों का अहसास हुआ।

उसके पंख फड़फड़ाने का मतलब यह था कि उसने रेखा को कबूल कर लिया है।

"मैं तेरी शुक्रगुजार हूँ मेरे भाई।" बकाल फिर सम्मानपूर्ण लहजे में झुकी।

तभी बराबर वाले विशाल स्तम्भ के पीछे से एक के बाद दूसरी औरत निकलती नजर आई। वे सात औरतें थीं। चित्ताकर्षक सफेद रंगत, गोल खूबसूरते चेहरे, एक जैसे छोटे कद, एक जैसा सुर्ख रंग का लिबास । शायद उनके चेहरे भी एक जैसे ही थे। अगर कोई अंतर था भी वो वह एक नजर देखने में महसूस नहीं होता था ।

औरतें, पंक्तिबद्ध चलती हुई, उस विशालकाय उल्लू के पीछे से घूमती, सीढ़ियां उतरकर रेखा के गिर्द घेरा डालकर

खड़ी हो गई।

फिर इन सात औरतों में से दो ने रेखा के हाथ पकड़ लिए। तीसरी औरत ने उसे पीठ से कोमलता से आगे धकेला । वे दोनों औरतें रेखा के हाथ थामे आगे चलने लगीं। शेष पांच उसके पीछे चल दीं।

वे सीढ़ियां चढ़कर उस उल्लू के पीछे आई और वहां से बढ़कर सतम्भ की ओट में चली गई। रेखा ने देखा कि इस

स्तम्भ के पीछे की तरफ एक दरवाजा था जो नीचे से नजर नहीं आता था। इस दरवाजे में से सीढ़ियां नजर आ रही

थीं, जो नीचे की तरफ चली गई थीं।

वे दोनों औरतें रेखा का हाथ पकड़े नीचे उतरने लगीं।

रेखा के चले जाने के बाद बकाल, राकल से मुखातिब होकर बोली- "सकल, मेरे भाई! मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं।"

काल की बात सुनकर उस विशालकाय, खौफनाक उल्लू ने उसे घूरकर देखा फिर अपनी एक आंख बंद कर ली... और साकत ही गया।

बकाल न महसूस कर लिया कि, राकल अब यहां नहीं है। सो वह भी सीढ़ियां चढ़कर स्तम्भ के पीछे पहुंची और

दरवाजे में प्रवेश करके तेजी से सीढ़ियां उतरने लगी।

यह एक बहुत बड़ा तहखाना था जहां जगह-जगह रोशनी हो रही थी। तहखाने में दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था। वे औरते रेखा को अपने ठिकाने पर ले जा चुकी थीं।

काल सीढ़ियां उतरकर आगे बड़ी तो उसे गोल चेहरे वाली एक सेविका दिखाई दी। वो एकाएक ही कहीं से प्रकट हुई थी। वह बकाल को देख, उसके सामने आदर से सिर नवांकर खड़ी हो गई। .

"राकल कहां है?" बकाल ने उसके निकट पहुंचकर पूछा।

उस सेविका ने मुंह से कुछ कहने की बजाय एक तरफ इशारा किया। बकाल उसके पीछे-पीछे चलने लगी। यूं वह विभिन्न दरवाजों के सामने से हुई, एक बड़े से दरवाजे के सामने आकर रुक गई। और जब बकाल भी इस दरवाजे के सामने पहुंच गई तो वह सेविका उल्टे कदमों लौट गई।

बकाल ने दरवाजे पर हाथ रखा तो वह फौरन खुल गया। वह बेधड़क दरवाजे में प्रवेश कर गई। अन्दर आकर उसने पलटकर दरवाजा बन्द किया और आगे बढ़ी। दरवाजे से कुछ ही कदम के फासले पर एक पर्दा लटक रहा था। वह
 
पर्दा हटाकर दूसरी तरफ पहुंची तो उसने देखा कि कमरे के ठीक बीचों-बीच एक ऊंची मसन्द पर शकल शोख रंग शाही लिबास पहने बैठा है। कमरे में सुख रंग का मोटा कालीन बिछा हुआ था और कमरा भरपूर रोशनी में जगमगा रहा था।

राकल - सिंहासननुभा मसंद पर किसी राजा की तरह बैठा हुआ था। उसके गले में मोतियों का कीमती हार पड़ा आ था। घुघराले बाल, सुर्खी लिए सांवली रंगत, बलिष्ट, स्वस्थ बदन और एक हाथ में सांप की तरह बल खाया हुआ राज-दण्ड।

वह बकाल को देखकर मुस्कराया बकाल उसे देखकर मुस्कराई और उसके चरणों में बैठ गई।

"वो कहां है, मेरे भाई?" बकाल ने पूछा।

"कौन रेखा ?" राकल ने जानना चाहा।

"नहीं, वह चमगादड़ का बच्चा।" बकाल विफर गई।

कल ने यह सुनकर एक गगनभेदी कहकहा लगाया, फिर बोला- "तूने उसका नाम खूब रखा है, बकाल!"

"वह है कहां?"

"हमारी कैद में...।" राकल ने बताया- "वैसे बकाल तूने उसके साथ बड़ा जुल्म किया है?"

"मेरे भाई, क्या तुम चाहते हो कि मैं उस चमगादड़ के बच्चे के साथ शादी कर लूं?"

"यह मैंने कब कहा । देवा काली की कसम वो है तेरा सच्चा आशिक ।" राकल बोला "सच तो यह है कि मुझे उस पर रहम आता है।"

"यह राकल को रहम कब से आने लगा।" बकाल ने व्यंग्य कसा।

"खैर छोड़, यह बता तू यहां मुझसे क्या बात करने आई थी?" राकल ने विषय बदलते हुए पूछा।

"मैं तुमसे इन्द्रजीत के बारे में बात करना चाहती थी...।"

"क्या हुआ उसे...?"

"मेरे भाई, तू जानता है कि मैं उसके बिना नहीं रह सकती।" बकाल ने अपनी इच्छा स्पष्ट की। मैं उसे जीवन भर के लिए अपना बनाना चाहती हूँ।

"उसके लिए तू अमल कर तो रही है।" राकल संजीदा दिखने लगा। "उसका क्या बना?"

"वह एक लम्बा अमल है। अभी प्रारम्भ ही हुआ है। जाने उसमें कितना वक्त लगे।" बकाल ने समस्या बताई।

"वक्त की क्या चिन्ता है।"

"वक्त की तो मुझे बिल्कुल परवाह नहीं है। परवाह मुझे उस चमगादड़ के बच्चे की है। वह निरन्तर मेरे खिलाफ साजिशों में लगा है। मुझे उसकी सूरत से भी नफरत है। मैं चाहती हूँ कि उसे आंसूओं की दीवार में चिनका दिया जाए। वह जब तक जिन्दा रहेगा मुझे बेचैन और अशांत करता रहेगा।"

"यह काम इतना आसान नहीं है। सरदार कोलाना, अपने काले चिराग जैसे महत्वपूर्ण बन्दे की मौत पर एक तूफान खड़ा कर देगा।"

"मैं कुछ नहीं जानती, मेरे भाई। मुझे इस काम को आसान बनाना होगा।" बकाल ने जिद की।

"अच्छा! ठीक है। तू परेशान न हो, मैं करता हूँ कुछ।" राकल ने उसे बहलाना चाहा।
 
मैं उसे आंसुओं की दीबार में चिना हुआ देखना चाहती हूँ।"

"इस काम को बहुत होशियारी से करना होगा...।" राकल सोचपूर्ण लहजे में बोला- "पूरी गोपनीयता के साथ करना होगा।"

"मैं जानती हूँ कि तू चाहेगा तो हजार रास्ते निकाल लेना...।" बकाल की आंखों में आशा की चमक भर आई थी।

" अच्छा अब मैं चलती हूँ तुझे रेखा का साथ मुबारक हो।"

"वह कहां है?" राकल ने पूछा।

"सेविकाएं उसे तैयार कर रही होंगी। थोड़ा धैर्य करो आने ही वाली है।" बकाल अपनी मुस्कान दबाते बोली- "वैसे तू उसे वहां से लेकर आया खूब वह तेरी अय्यारी को उम्र भर नहीं समझ सकती।”

इस पर राकल ने फिर एक जोरदार कहकहा लगाया और फिर अपनी राजदण्ड-सी दिखती लाठी का सहारा लेकर उठ खड़ा हुआ। उसने इस राजदण्ड को बैसाखी की तरह अपनी बगल में दबाया और अभी मसंद से उतरकर वह दो कदम ही चला था कि देखते ही देखते नजरों से ओझल हो गया।

फिर बकाल भी उठी और वह पर्दा हटाकर दरवाजे से बाहर निकल गई।

काल के बाहर जाते ही राकल फिर अचानक प्रकट आ अरि अपने राजदण्ड को बैसाखी की तरह बगल में लगाये फिर मसंद कर मसंद पर आ बैठा। उसके होठों पर मुस्कराहट थी और आंखों में ख्वाहिशों के दीये टिमटिमा रहे थे। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और राकल बोला- "आ जाओ...।"

पर्दा हटाकर थे दोनों उसके सामने आकर खड़ी हो गई। उन दोनों के सिर झुके हुए थे।

"क्या हुआ?" राकल ने पूछा। ने

"वह न स्नान करती है, न लिबास बदलती है और न ही यहां आने के लिए तैयार है।"

"क्या तूने उसे बताया कि उससे कौन मिलना चाहता है?"

"नहीं, हमने उसे तेरा नाम नहीं बताया है-वैसे वो काले चिराग के बारे में बार-बार पूछती है।"

"उससे कहो कि तुम्हें राकल ने बुलाया है। राकल से मिल लो कि उसे काले चिराग से राकल ही मिलवा सकता।" राकल के होठों पर धूर्ततापूर्ण मुस्कान थी।

"ठीक हैं।" दोनो सेविकाओं ने सिर नवाया और उल्टे कदम चलती हुई पर्दे के पीछे चली गई।

वे दोनों दरवाजे से निकलकर तेज-तेज चलती उस जगह पहुंची जहां रेखा को रखा गया था। रेखा मसहरी के कोने पर सिर झुकाए बैठी थी।

वह कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे। हालात ने इस कदर से और विपरीत दिशा में पलटा खाया था कि बेबस होकर रह गई थी।

उसने तो सोचा था कि काले चिराग की मदद से अपने भाई को लेकर अपनी दुनिया में चली जाएगी और वहां पहुंचकर उसका उपचार कराएगी। वह अपने भाई को पूर्णतः स्वस्थ देखना चाहती थी और फिर अभी तो उसके जीवन का अति महत्वपूर्ण काम बाकी है। अभी उसे अपने भाई की बर्बादी और बाप की हत्या का प्रतिशोध लेना है। वह रमाकांत को किसी कीमत पर नहीं बख्शेगी। उसे एक न भूलने वाला पाठ पढ़ाकर रहेगी पर यहां तो पासा ही पलट गया था। वह मंजिल के करीब आकर अचानक मंजिल से दूर हो गई थी।

काला चिराग बन्दी बना लिया गया था। वह एक हमदर्द इंसान था। यह सत्य था कि वह रेखा की मदद अपने स्वार्थ. हेतू यानी बकाल को पाने के लिए कर रहा था लेकिन उसकी इस चाहत से उसके भाई को भी तो छुटकारा मिल रहा
 
था। अब जाने काले चिराग के जहन में क्या मन्सूबा... कैसी योजना थी। काश! बकाल कुछ देर और न आती तो काला चिराग उसे अपनी योजना बता चुका होता और उस पर अमल करके अपने भाई की मुक्ति के लिए संघर्षरत होती। अब वह एक गहरे कुएं में थी जिसके पानी में वह तैर तो सकती थी लेकिन उसमें से निकल नहीं सकती थी। दरवाजे पर आहट हुई। रेखा ने सिर उठाया तो अपने सामने दो सेविकाओं को पाया। वे अपनी शक्लो-सूरत से जुड़वां

बहनें लगती थीं। वे उसके निकट आकर बड़े अदब से खड़ी हो गई।

. फिर उसके सामने जरा-सा झुकी और सीधी हो गई। उनमें से एक बोली-

"तुझे बुलाया है।" अजीब अंदाज था यह बातचीत का ।

"किसने बुलाया है?" रेखा ने पूछा।

"राकल ने।" बताया गया।

"तो चलो।" रेखा यह सुनते ही अपना बैग कन्धे पर डालकर चलने के लिए तैयार हो गई।

"ऐसे नहीं।" दासी बोली ।

"फिर कैसे ?" रेखा ने पूछा।

"पहले स्नान कर लो... तुम थक गई होंगी। नहा-धोकर लिबास बदल लो फिर चलो...।"

"नहीं, मैं थकी नहीं हूँ। मैं फौरन राकल से मिलना चाहती हूँ। मेरा भाई रेगिस्तान में जाने कैसा होगा ?"

"हमें नहीं मालूम कि तू क्या कह रही है।" दासी धीमे से बोली।

"तुम्हें समझने की जरूरत भी नहीं है।" रेखा बेचैन-सी बोली- "तुम लोग बस मुझे राकल के पास ले चलो।"

"इस तरह सकल नाराज होगा। तू उसका आदेश मान लेगी तो वह तुझे काला चिराग से मिला देगा... उसने यही कहा है।" दासी बदरस्तूर धीमे से बोली थी।

रेखा चौंकी। दासी के इस कथन से उसे राकल की नीयत का अंदाजा करते देर न लगी। उसका दिमाग घूम गया। वह

बिफरकर बोली- "राकल से जगाकर बोलो कि आने से इंकार कर दिया है।"

"नहीं, ऐसा न करो।" दासी सहमकर बोली- "आप उसके क्रोध से वाकिफ नहीं।"

"जो मैन कहा है उससे जाकर कह दो। रहा उसका गुस्सा तो वह में देख लूंगी। उसने मुझे समझा क्या है?"

"एक बार और सोच लें।" दोनों दासियां जाते-जाते रुक गई।

"सोच लिया। इज्जत है तो सबकुछ है। इज्जत नहीं तो कुछ भी नहीं। तुम जाओ।" दासियां सहमी-सहमी सी कमरे से निकल गई।

रेखा का दिमाग तप रहा था। वह गुस्से में कमरे में चहलकदमी करने लगी। तपते जहन में सोचें बवण्डर बन चली थीं।

"आखिर उसने मुझे समझ क्या रखा है। ये किस तरह के दुष्ट लोग हैं। एक यह इसकी बहन है जिसने मेरे भाई पर कब्जा कर रखा है, जोर-जबरदस्ती से काम ले रही है और एक यह है जो मुझ पर कब्जा जमाने की सोच रहा है। आखिर वह काला चिराग भी तो है-उसने तो कभी गलत निगाहों से नहीं देखा हालांकि मैं उसके साथ रही। वह एक सच्चा और नेक दिल आदमी था। जाने राकल ने उसका क्या हश किया होगा। आह! चाहत ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा एक ऐसी औरत के पीछे बर्बाद हो रहा था जो उससे सीधे मुंह बात करने को तैयार न थी।"

"बकाल का दीवाना है वो और बकाल उसे चमगादड़ का बच्चा कहकर पुकारती थी। वह ऐसा क्यों कहती थी महज अपमानित करने के लिए या इसके पीछे भी कोई भेद है।
 
"भेद..."

और तब रेखा को याद आया कि जब काला चिराग उसे महल में लेकर गया था तो वहां कोई नहीं था। और रेखा के पूछने पर क्या यहां कोई नहीं है तो काला चिराग ने उसे जो मंजर दिखाया था...वह बड़ी-बड़ी चमगादड़ों का था। फिर रात जब वह सोई थी तो आंखें बंद करते ही वह को एक पत्थर पर सोता पाती थी और उसके इर्द-गिर्द चमगादड़े ही दिखाई देता थीं।

सोचों में अन्देशों का जहर घुलने लगा।

"कहीं काला चिराग कोई ऐसा ही प्राणी तो नहीं।" वह सोचते-सोचते रुक गई- "क्या ऐसा कुछ भी हो सकता है। कहीं वह चमगादड़ तो नहीं। हां, नहीं।" यह सोचकर ही रेखा को पसीना आ गया।

वह अभी इन्हीं कल्पनाओं में उलझी हुई थी कि अचानक दरवाजा खुला और राकल मुस्कराता हुआ अपने राजदण्ड

को बैसाखी बनाए बड़े इत्मीनान से अन्दर दाखिल हुआ।

रेखा टहल रही थी। वह फौरन घबराकर मसहरी पर बैठ गई। राकल उसके करीब आकर रुक गया।

"मुझे पहचाना।" उसके चेहरे पर एक शैतानी मुस्कराहट थी ।

"जी हां, पहचान लिया। आपके तो मुझ पर बहुत से अहसान हैं...।" रेखा को सम्भालते हुए बोली- "और मैं...।" लेकिन राकल ने उसकी बात काटते हुए कहा- 'आपके' नहीं, 'तेरे' कहो।" उसने अपने एक हाथ उंगली इंकार में हिलाई।

"तेरा" कहो। यहां तेरा कहा जाता है।

"यह तो धृष्टता है।" रेखा बोली।

"हमारे यहा इसे धृष्टता नहीं समझा जाता । "

" अच्छा खैर, मैं यह कह रही थी कि...।"

"मैंने तुझे बुलाया था तू आई क्यों नहीं तू नहीं जानती कि राकल से इकार का क्या मतलब होता है।"

"नहीं, मैं नहीं जानती । तू क्या...।"

"ठीक है, मैं ही तुझे बतलाता हूँ। पर पहले यह भी सुन ले कि सच यह है कि मैं तुझसे प्यार करता हूँ।"

रेखा विफर उठी, फुफकार कर बोली- "और मैं तेरी सूरत पर थूकने के लिए भी तैयार नहीं । आखिर तू भी चुड़ैल बकाल का भाई निकला। "

कल के लिए रेखा के ये तेवर और उसका यह जवाब अप्रत्याशित था। वह एक क्षण के लिए सिट-पिटा गया। अपने अंदर सिमट गया, सहम गया। पर फिर उसने फौरन ही खुद को सम्भाल लिया। उसे एक कमजोर इंसान वह भी एक औरत से डरने की भला क्या जरूरत थी। .

राकल ने अपना एक अमल किया और रेखा चकरा कर रह गई।

राकल ने सांप की तरह बल खाया हुआ अपना राजदण्ड अपनी बगल से निकाला और उसे मध्य से पकड़कर अपना हाथ ऊपर उठाया और अपनी एक टांग पर नाचना शुरू कर दिया।
 
रेखा मसहरी पर बैठी थी।

मसहरी कमरे के ठीक मध्य में थी। राकल ने मसहरी के गिर्द नाचते हुए चक्कर लगाने शुरू कर दिये। वह बिल्कुल मलंगों की तरह नाच रहा था। हालांकि उसके पैर या हाथ में घुघरू नहीं थे... लेकिन छम-छम की आवाजें आ रही थीं।

लगड़े राकल के इस बेहूदा अमल पर रेखा चकराकर रह गई। वह परेशान-सी उसे नाचते हुए देख रही थी। रेखा का ख्याल था कि यह लगड़ा प्रेत उसके इंकार पर, सख्त जवाब पर, उसे कोई सख्त सजा देगा। लेकिन यहां तो मामला . ही उल्टा हो गया था। वह क्रोधित होने की बजाय नाच रहा था, वह भी एक टांग पर ।

उसके नाच में एक विशेष निपुणता थी और वह बेहद तेजी से नाच रहा था और यह तेजी क्षण प्रतिक्षण बढ़ती जा रही थी। उसके होंठ सख्ती से भिंचे हुए और निगाहें रेखा पर केन्द्रित थीं। उसको इस कदर तेजी से घूमते देखते रहने पर रेखा को चक्कर आने लगे थे। लेकिन राकल तो जैसे इस क्षण जुनून के हवाले था।

उसकी गर्दिश तेज से अधिक तेज होती जा रही थी।

ऐसी खेज कि अब उस पर नजर जमाना भी कठिन हो रहा था।

फिर वह क्षण आया कि वह नजर आना बंद हो गया था और अगले ही क्षण जो चीज चराती हुई नजर आई वह राकल न था।

छमछम की आवाज बन्द हो चुकी थी। नाच खत्म हो चुका था और अब एक उल्लू उस बड़े कमरे में रेखा के गिर्द घूम रहा था। इस उड़ते उल्लू को देखकर रेखा की चींख निकलते-निकलते रह गई थी।

अभी वह सोच ही रही थी कि क्या करे कि उस उल्लू ने अपने पंजे निकालकर उस पर हमला कर दिया। और यह

हमला सीधे उसकी आंखों पर था, रेखा अगर एक तरफ झुककर तत्काल ही लेट न गई होती तो उल्लू उसकी आंख

जख्मी कर गया होता। फिर भी उसके सिर के कुछ बाल उसके पंजे में उलझकर टूट गये थे।

इससे पहले कि उल्लू उस पर दूसरा वार करता रेखा फैसला कर चुकी थी कि उसे क्या करना है। उसने तेजी से करवट ली और हुए मसहरी पर रखा अपना बैग पकड़ लिया। वह खड़ी हुई इधर उल्लू ने उस पर पलटकर हमला किया -उधर रेखा ने भरा बैग घुमाकर उस पर मारा। उल्लू बैग की जद में आ गया। बैग ऐसे वेग और ताकत से उसके लगा कि वह पलटकर दीवार से जा टकराया और फिर पट-से फर्श गर गिरा।

दरवाजा खुल गया था। बैग कंधे पर डाल, रेखा ने दरवाजे की तरफ दौड़ लगा दी और तेजी से कमरे से बाहर निकल गई। निकलते ही पलटकर दरवाजा भी बंद कर दिया था उसने।

बाहर से दरवाजे की चिटकनी बंद की और तेजी से इधर-उधर देखा ।

आस-पास कोई न था। पूरा हॉल खाली पढ़ा था। दूर सामने तहखाने की सीढ़ियां नजर आ रही थीं। एक भी क्षण गंवाये बिना रेखा ने पूरी ताकत से सीढ़ियों की तरफ दौड़ लगा दी।

सीढ़ियां चढ़कर जब वह बड़े स्तम्भ के दरवाजे से बाहर आई तो उसका ख्याल था कि यहां उसे जरूर दासियां नजर आएंगी। लेकिन यहां भी सन्नाटा व्याप्त था। जब वह उस स्तून के गिर्द घूमता चबूतरे की तरफ आई तो वहां वह विशालकाय उल्लू एक टाग पर खड़ा नजर आया।

इस विशालकाय उल्लू का रुख सामने दरवाजे की तरफ था और वह बिल्कुल उसी तरह साकत निश्चल खड़ा

था जैसा रेखा ने उसे छोड़ा था। रेखा इस वक्त उसकी पीठ पर थी।

वह धीरे-धीरे चलती हुई की सीढ़ियां उतरने लगी। दरवाजे के लिए उस उल्लू के से गुजरना जरूरी था । उसने सीढ़ी की ओट में बैठकर तेजी से बैग खोला और उसमें से चाकू निकाल लिया।

यह एक बड़े फल का चाकू था। उसने सोच लिया था कि अगर इस उल्लू ने उस पर हमला किया तो वह इस चाकू से उसका मुकाबला करने की कोशिश करेगी।
 
चाकू हाथ में थामकर वह बड़ी सतर्कता के साथ नीचे उतरी और फिर चबूतरे की दीवार के साथ चलती हुई उस जगह

पहुची जहां उल्लू खड़ा हुआ था। फिर वह तेजी से आगे बढ़कर फौरन पलटी चाकू वाला हाथ उसने उठाया आ था

कि अगर उस उल्लू ने उसे देखकर पीछे से हमला किया ती वह इसके लिए तैयार थी। लेकिन उल्लू तो आराम से अपनी जगह खड़ा रहा यथावत निश्चल साकत। उसकी एक आंख बन्द थी और वह एक

टांग पर खड़ा था। जाने क्यों रेखा को लगा जैसे उल्लू में जान ही नहीं है। .. उल्लू की एक आंख खुली हुई थी और रेखा हाथ में खुला चाकू लिए खड़ी थी।

लेकिन उल्लू की आंखों में कोई गर्दिश नहीं दिखी थी। वैसे भी वह असाधारण विशाल आकार का उल्लू था... असली की बजाये नकली दिखाई देता था। इस वक्त वह बिल्कुल निर्जीव दिखाई दे रहा था। रेखा जब बकाल के साथ पहली बार उसके सामने आई थी तो उसकी आंखों में गर्दिश दिखाई दी थी और उसने अपने 'जहली पंख' भी फड़फड़ाये थे।

बहरहाल, इस क्षण यह अच्छी ही बात थी कि वह किसी बेजान की तरह स्थापित था ।

रेखा फौरन हो दरवाजे की तरफ झुकी।

बंद दरवाजे को जब उसने खोला और सिहर एक कदम रखा तो उसके सिर पर कोई चीज गिरी और फिसलकर गर्दन में आ गई। फिर एक जोरदार झटका लगा और उसका दम घुटने लगा। उसने चाहा कि सम्भलकर अपनी गर्दन में लगने वाले रेशमी फन्दे को किसी तरह तंग होने से रोक सके। लेकिन उसे इसका मौका नहीं मिला।

जो कुछ हुआ आनन-फानन हुआ!

उसकी गर्दन फंदा तंग होता गया। वह उतरकर पीछे की तरफ गिरी और बेहोश हो गई। उसके गले में फंदा डालने वाली दो देबकाय औरतें थीं। काली भुजंग भयावह...। अगर यह औरतें रेखा के गले में फंदा डालने की बजाय अपनी शक्ल ही उसे दिखा देतीं तो रेखा ने फौरन ही बेहोश होकर गिर जाना था।

इन औरतों ने पीछे से रेशमी फंदा रेखा पर फेंका था। वे उल्लू के विशालकाय बुत के बराबर चबूतरे पर खड़ी थीं और बड़ी तेजी से ही स्तम्भ के दरवाजे से निकलकर चबूतरे पर पहुची थीं और उन्होंने रेखा के दरवाजे से निकल सकने से पहले बड़ी दक्षता के साथ उसके गले में फंदा डालकर उसे पीछे घसीट लिया था।

इन दोनों काली-भुजंग, खौफनाक औरतों ने बेहोश रेखा को अपने कंधो पर डाल लिया और बड़ी फुर्ती से चबूतरे की सीढ़ियां चढ़कर स्तून के पीछे पहुची और भूमिगत तहखाने के दरवाजे में प्रवेश कर, खटाखट सीढ़िया उतरती चली गई।

वे राकल के कमरे में पहुंचीं और उन्होंने रेखा को राकल के कदमों में डाल दिया। यहां कदमों की बजाये 'कदम' कहना चाहिये। क्योंकि राकल तो एक टांग का था। वह भारी चादर ओढ़े मसन्द पर बैठा था। उसकी सांप की तरह बल खाती लाठी उसके हाथ में थी और चेहरे पर पीड़ा के तीखे भाव थे। उसके दांये हाथ पर गम्भीर चोट आई थी ऐसी कि वह अपने इस हाथ को हिलाने में भी असमर्थ था।

उसने अपने बल खाये राजदण्ड से रेखा के शरीर को इस बीच वे वहशी औरतें उसके गले से फंदा निकाल चुकी थी और वापस जा चुकी थी।

राकल की के शरीर से स्पर्श करते ही रेखा के बदन में भूचाल सा आ गया। उसने फौरन आंखें खोल दीं। आंखें

में

खुलते ही उसकी नजर सीधी राकल पर पड़ी। वह अपनी पीड़ा के बावजूद उसे बड़े पार और चाव से देख रहा था ।

रेखा फौरन उठकर खड़ी हो गई। उसका बैग और चाकू निकट कालीन पर पड़े थे। उसने सोचा कि झुककर उठा ले, लेकिन इरादे के वह ऐसा नहीं कर सकी। क्योकि राकल ने उसके इरादे को भांप लिया था और उसने अपनी छड़ी से चाकू को अपनी तरफ घसीटकर अपने पांव तले तबा लिया था और फिर बड़े अजीब से लहजे में बोला था-

"वार करना चाहती हो?"
 
"हां।" रेखा ने बेधड़क कहा।

"और कितने वार करेगी। अभी तो मुझ पर वार करके भागी है।"

"मैं तेरी सूरत बिगाड़ देना चाहती हूँ।" रेखा अपने रोष पर काबू नहीं पा सकी थी।

" तू जानती है कि तूने क्या कर दिया है तूने मेरा एक बाजू बेजान कर दिया है।" राकल का लहजा सयत लेकिन शिकायत भरा था।

"काश! मैं तुझे खत्म कर सकती।"

"मैं तो वैसे ही मरा हुआ हूँ मुझे और क्या मारना ?" राकल ने फिर शिकायती अंदाज अपनाया।

"अभी तू भरा नहीं। भगवान ने चाहा तो जरूर मरेगा, मेरे ही हाथों मरेगा और साथ में तेरी बहन की भी अर्थी उठेगी।" रेखा भड़क रही थी।

"हा.... हा... हा...।" उसने एक घिनौना कहकहा लगाया, फिर नाटकीय अंदाज में बोला- "क्या औरतों वाली बात करती हो।"

" औरत को कमजोर न समझ । " रेखा फुफकारी ।

"तू नहीं जानती कि तू कहां है। तू यह नहीं जानती कि तू किसकी कैद में है। तेरी खुद की अर्थी उठने में यहां देर न लगेगी।" राकल ने अब तेवर बदले।

"मेरा मुझे दे दे।" रेखा ने जैसे दी।

“ले उठा ले ।" कहते हुए उसने चाकू में ठोकर मार दी। चाकू रेखा के पैरों में आ गया।

पर फिर रेखा जैसे ही चाकू उठाने के लिए झुकी राकल ने उसके सिर पर अपनी भारी छड़ी से वार किया। रेखा

झुकी झुकी वहीं त्यौरा कर गिर पड़ी।

तब राकल ने बैठे-बैठे अपनी छड़ी मसंद पर खट-खट बजाई और यह आवाज सुनते ही वही दोनों वहशी औरतें पर्दा हटाकर अंदर आ गई।

"उठाओ इसे और कैदखाने में फेंक दो, तीन दिन भूखा रखो जाओ...।" राकल दहाड़ा था।

उन दोनों काली-भुजंग औरतों ने उसे उठाकर कन्धों पर डाला और कमरे से निकल गई।

उन्होंने रेखा को इस मायावी धरती के कैदखाने के दरवाजे

पर पहुंचा दिया। कैदखाने के इस दरवाजे से भी उन्ही जैसी एक काली भुजंग देवकाय औरत बाहर आई थी। उसने एक नजर बेहोश रखा को देखा, जो उनके कन्धों पर सोई हुई थी और फिर उसने उनसे सम्बोधित होते पूछा-

"कौन है यह...?"

"हमें नहीं मालूम कौन है?" एक औरत ने जवाब दिया।

"फिर यहां लाने का मकसद...?"

कल ने भेजा है। उसका हुक्म है इसे तीन दिन तक भूखा रखना है। "

"ठीक है। इसे नीचे लिटा दो। इसे बेहोश किसने किया है?"

"सकल ने...।" यह कहकर उन औरतों ने रेखा को जमीन पर लिटा दिया। उसका बैग भी उसके साथ रखा और वापस चली गई।

उस पहाड़ जैसी औरत ने रेखा को किसी गुड़िया की तरह अपने हाथों पर उठाया और फिर उसे एक कमरे में बंद करके बाहर से ताला लगा दिया।
 
कुछ देर बाद जब रेखा को होश आया तो उसने स्वयं को एक छोटे से कमरे में बंद पाया।

वह फौरन उठकर बैठ गई। विवेक जागा, हवास बहाल हुए तो उसने दरवाजे को झंझोड़ा, दरवाजा बाहर से बंद था। कमरे में कोई झरोखा या खिड़की इत्यादि भी न थी। हां, काफी ऊंचाई पर एक रोशनदान जरूर था। रोशनदान बड़ा था लेकिन इतना ऊंचा था कि रेखा उसमें से झांककर बाहर नहीं देख सकती थी। जमीन पर एक चटाई पड़ी हुई थी।

शुक्र था कि उसका बैग उसके पास पड़ा था। रेखा ने बैग अपनी तरफ खींचकर उसकी तलाशी ली। चाकू बैग में नहीं था, जबकि उसकी बाकी चीजें बैग में ही थीं। उसे याद आया कि वह चाकू उठाने के लिए थी कि कोई भारी चीज उसके सिर पर आकर लगी थी। फौरन अपने सिर पर हाथ फेरा। सिर में किसी प्रकार का जख्म, निशान या पीड़ा न थी।

राकल ने उससे प्रतिशोध लिया था और उसे कैदखाने में डलवा दिया था।

रेखा ने एक गहरी सांस ली।

जो आ था वह उसकी आशाओं के विपरीत था। वह नहीं जानती थी कि राकल ने उसके बारे में कैसा आदेश दिया है। वह आगे के बारे में सोचती रही। उसे कैद की कठिनाईयों का अहसास न था, जबकि आ यह था कि वे लोग उसे इस कोठरी में डालकर जैसे भूल ही गये थे।

दो दिन बीत गए और इस कमरे का दरवाजा किसी ने नहीं खोला। उसके कान किसी आहट को तरस गए थे। भूख के मारे उसका बुरा हाल था। एक छोटी-सी सुराही में पानी मौजूद था और अब वह भी खत्म हो रहा था। उस पर कमजोरी छाने लगी थी। वह निढाल सी पड़ी थी। आंखे बार-बार बंद हो जाती थीं।

उस पर गशी बेहोशी के दौरे पर रहे थे।

इस अवस्था में जबकि वह न होश में थी न बेहोश थी। जाग रही थी, न सो रही थी, या फिर वह जैसे गहरी नींद में थी, रेखा को यूं लगा जैसे बड़े दादा हरिम- उसके करीब बैठे हुए हों। वही दादा हरिओम, जिनके मृत्यु-पूर्व के छोड़ पत्र ने ही रेखा के लिए इस वर्तमान घटनाक्रम के द्वार खोले थे। दादा का नूरानी चेहरा देखकर उसे सुकून महसूरा हुआ। वह उनसे कुछ कहना चाहती थी...लेकिन वह बोल नहीं पाई।

दादा हरिओम भी जैसे उसकी बेबसी को समझ जाते हैं और हाथ के इशारे से उसे शांतचित रहने का सुझाव देते हैं।

रेखा अब शांतचित थी। धैर्य धीरज वाली थी। उसने आंखें मूंद लीं और सोने की कोशिश की। अपनी इस कोशिश में वह सफल रही थी या फिर सुध खो बेटी थी।

कितनी ही देर वह इसी बेसुधी में रही और फिर जब उसकी आंख खुलीं, या उसको सुध लौटी और विवेक जागा तो

उसे अपने पास कोई नजर नहीं आया। पर वह अब शांतचित थी, संयत थी ।

कसक थी तो बस इसकी कि काश! बड़े दादा ने उससे बात की होती पर ऐसा न हो सका था।

पर अब एक नया हौसला उसके साथ था। वह अब तक अकेली और असहाय थी पर अब दादाजी के हाथ अपनी पीठ पर होने का अहसास उसकी हिम्मत बढ़ा गया था।

वह धीरे-धीरे उठकर बैठ गई।

तभी एक आहट सी महसूस हुई। यह आहट दरवाजे पर नहीं हुई थी। यह आवाज ऊपर रोशनदान से आई थी। गिलहरी को आवाज के साथ ऊपर रोशनदान में कोई चीज लुढ़की थी।

रेखा ने रोशनदान क तरफ देखा तो उसे गिलहरी की दुम दिखाई दी। और फिर फौरन ही कोई चीज लुढ़ककर उस

पर आ गिरी। रेखा ने ऊपर से गिरने वाली इस चीज को देखा तो उसकी खुशी का ठिकाना न रहा।

वह सुर्ख रंग का एक सेव था ।
 
रेखा उसे उठा लिया और आभारी नजरों से ऊपर देखा। रोशनदान में से एक गिलहरी का दिखाई दे रहा था। उसके देखते ही गिलहरी पीछे हट नजरों से गायब हो गई।

रेखा को अब पुख्ता यकीन हो गया कि वह अकेली नहीं है।

सेव खासा बड़ा था। बड़ा लजीज खुशबूदार और मीठा भी था। इस सेव में जाने क्या बात थी कि उसे खाकर पेट

भरने का अहसास हुआ। रेखा के होशो हवास बहाल हुए और वह अब सोचने-समझने योग्य हो गई।

"रेखा ने अग्यार राकल की बात मानने से इंकार कर दिया था फिर अपना बैग मारकर उसका एक बाजू भी घायल कर दिया था। परिणामस्वरूप उसे कैदखाने में डाल दिया गया था और फिर दो दिन बीत गए थे। किसी ने भी पलटकर इस कमरे की तरफ देखने का कष्ट नहीं किया था।

दरवाजा बंद था। फरार का कोई रास्ता न था। छत के करीब एक रोशनदान था भी तो रेखा की पहुंच से बहुत दूर था।

रेखा नहीं जानती थी कि इस रोशनदान के उस तरफ क्या है। काश! वह किसी तरह रोशनदान से बाहर का निरीक्षण

कर पाती।

रेखा को अपना भाई इन्द्रजीत याद आया । जाने वह किस हाल में होगा ? चुड़ैल बकाल ने यहां से वापस जाकर इन्द्र के साथ जाने क्या सलूक किया होगा।

रेखा को काले चिराग की भी फिक्र थी। जाने उसके इस हमदर्द पर क्या बीती है और उसका क्या हश किया जा चुका है । बह अब क्या करे। वह तो अपने भाई इन्द्रजीत को बचाने के लिए आई थी पर वह अब खुद विपदा में फंस गई थी। अगर देवयोग से उसे यह सेव न मिलता तो उसकी तो हालत और भी बिगड़ जानी थी।

उसने सेब के बारे में सोचा।

प्रश्न यह भी था कि यह सेब कहां से आया था? इस रेगिस्तान में और ऐसा रसीला और खुशबूदार सेव। फिर इसे

रोशनदान तक किसने पहुंचाका गिलहरी तो ऐसे फूल खाने की

खुद शौकीन होती है। उसने खुद क्यों नहीं खाया? नीचे क्यों लुढ़का दिया? फिर इस सेव मे ऐसी पौष्टिकता कहां से आई कि खाते ही भर पेट खाने की तृप्ति महसूस हुई? क्या यह सिलसिला जारी रहेगा या महज संयोग से ऐसा हो गया है?

और फिर बह दादा हरिओम के यहां आने का अहसास महज एक ख्वाब था ...उसका भ्रम था या वो वास्तव में ही उसका हौंसला बढ़ाने को यहां आए थे?

बड़े दादा से इन कठिन घड़ियों में सहायता व हौसला अफजाई की आशा की जा सकती थी।

रेखा इन्ही उलझनों का शिकार थी और अपनी मुक्ति का रास्ता सोच ही रही थी कि दरवाजे पर कुछ हलचल की आवाज आई-जैसे कोई बाहर से दरवाजा खोल रहा हो।

रेखा कुछ सम्भलकर बैठ गई।

कुछ क्षणों बाद दरवाजा खुला। उसके सामने राकल खड़ा था। बगल में, बैसाखी की तरह अपनी छड़ी दबाये और कन्धे पर एक भारी चादर डाले।

राकल ने रेखा को चाक-चौबन्द बैठे देखा तो बड़ा हैरान हुआ। दो दिन की भूख ने उस पर जरा भी असर नहीं किया

था। वह तो समझ रहा था कि मारे भूख के रेखा की बुरी हालत होगी। यहां तो मामला ही कुछ और निकला।

"कैसी है तू ।" वह राजदण्ड नुमा छड़ी के सहारे कमरे में आया।

"देख ले। इतनी मोटी-मोटी आंखें तो हैं तेरी । "

" पर... पर यह कैसे सम्भव है।" वह अभी तक हैरान था ।
 
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