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हँसी तो फँसी

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हँसी तो फँसी

मेरा नाम दीपक है। यह वाक्या कुछ सालों पहले का है। मैं उन दिनों लखनऊ में रहता था।

एक प्राइवेट कंपनी ने में सेल्स डिपार्टमेंट में मार्किट डेवलपमेंट मैनेजर था। मेरा परफॉरमेंस अच्छा था और सेल्स में मैं हमारी कंपनी में अक्सर अव्वल या पुरे इंडिया में पहले पांच में रहता था। मेरे बॉस मिस्टर सोमेन सोमेंद्र मल्होत्रा मुझसे बहुत खुश थे। मेरी प्रमोशन के चाँस अच्छे थे। बॉस एक मध्यम साइज की कंपनी के सीईओ और डाइरेक्टर थे। बॉस का नाम 'सोमेंद्र' था। करीबी लोग उन्हें 'सोम' कह कर बुलाते थे। बॉस बड़े ही गतिशील, कार्यक्षम, तेजस्वी, युवा मुझसे चार पांच साल बड़े थे। हमारी कंपनी नयी स्टार्टअप थी पर पुरे भारत में काफी अच्छा काम कर रही थी। हमारी कंपनी पर कर्जा था पर जिस तरह से हम काम कर रहे थे तो लगता था की जल्द ही हम कर्जे को चुकता कर हम प्रॉफिट करना शुरू कर देंगे। बॉस मुझे बहोत सपोर्ट करते थे।

मेरे अव्वल रहने के एक ख़ास कारण था। वह था मेरे और मेरे बॉस के बिच का सटीक तालमेल। मुझे मेरे बॉस में अद्भुत विश्वास था। या यूँ कहिये की मैं मेरे बॉस में अंधविश्वास रखता था। और इसका ख़ास कारण था की मेरे बॉस एक असामान्य सेल्समैन थे। हमारी कंपनी एक ख़ास एप्लीकेशन सॉफ्टवेयर बनाती थी।

मेरे बॉस ना सिर्फ हमारी ऍप्लिकेशन्स बेचने में माहिर थे बल्कि वह खुद भी एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर होने के कारण हमारे ग्राहकों की जरुरियातों को कैसे समझना, ग्राहकों को हमारे डिज़ाइन स्ट्रक्चर के कान्सेप्ट के बारे में कैसे समझाना और हमारी प्रोडक्ट को ग्राहक के बिज़नेस में कैसे लागू कर उसे कैसे बेचना वह उनके बाँये हाथ का खेल था। बॉस की सफलता का एक और भी कारण था। वह ग्राहकों की दिक्कत और परेशानियों को फ़ौरन भाँप लेते थे और ग्राहक कुछ विस्तार से समझाए उसके पहले ही उस दिक्कत का निदान कर देते थे। यह कहना गलत नहीं होगा की एक बार जो हमारा ग्राहक हो गया उनके वहाँ प्रतिस्पर्धी का दाखिला करीब नामुमकिन था। हमारी कंपनी धीरे धीरे बड़ी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों में अपनी पकड़ जमा रही थी। कंपनी की सालाना आय बढ़ती जा रही थी।

साथ ही साथ में बॉस हमारी टीम की जान थे। कर्मचारियों का कैसे ध्यान रखना, उनकी मुश्किलों में उनकी कैसे सहायता करना और उनके हौसले को कैसे बढ़ाना उसकी उनको गजब की समझ थी। सारे कर्मचारी दिन रात मेहनत कर के समय पर काम ख़तम कर देते थे। इसी लिए हमारी कंपनी को कभी भी प्रोडक्ट को डिलीवर करने में देरी नहीं होती थी। हमारे ग्राहक को किसी और कंपनी के पास जाने का वह कोई कारण ही नहीं देते थे।

मैं उनकी हर बात मानता और उनके बताये रस्ते पर ही चलता था। मेरी और मेरे बॉस की जोड़ी हमारी पूरी कंपनी में करन अर्जुन की जोड़ी के नाम से जानी जाती थी। मुझे उनमें और उनको मुझमें पूरा विश्वास था। जिससे ग्राहक बहुत संतुष्ट रहते थे और हमारे प्रोडक्ट मार्किट में दिन दुगुने रात चौगुने बिक रहे थे।

मेरे बॉस एकदम जिवंत प्रतिभावान, मनमोहक व्यक्तित्व वाले, उमंगी, रंगीले स्वभाव के और अपने काम में पूरी क्षमता रखते थे। वह लोगों का दिल चुटकियों में जित लेते थे और ख़ास कर महिलाएं उनकी दीवानी होती थीं। उनकी पत्नी जो की बहोत बड़े रईस बिज़नेस मैन की बेटी थी वह बॉस से पहली मुलाक़ात में ही अपना दिल दे बैठी और अपने पिता को आग्रह किया वह उसकी शादी सोमेन (बॉस) से करवाए। शादी जल्दबाजी में हो भी गयी।

मैं उस समय की बात कर रहा हूँ जब मुझे कंपनी ज्वाइन किये हुए करीब एक साल होने के आया था। तब तक ऐसा कोई मौक़ा ही नहीं मिला था की मैं बॉस का मेरी पत्नी से परिचय करवा सकूँ।

एक बार नए साल की एक बड़ी पार्टी में जहां मैं मेरी पत्नी दीपा के साथ गया हुआ था। मैं मेरी पत्नी दीपा के साथ उस पार्टी में कुछ जल्दी ही पहुँच गया था। तब तक पार्टी शुरू होने में कुछ समय था। मैंने देखा तो मेरे बॉस भी वहाँ जल्दी ही पहुँच गए थे। वहाँ मैंने बॉस को मेरी पत्नी से मिलाया। शायद उनकी पत्नी उस समय अपने मायके गयी हुई थी। जैसे ही दीपा मेरे बॉस से मिली और उनसे हाथ मिलाया तो दीपा एकदम खिलखिला कर हँस पड़ी। मैं और बॉस सब हैरान हो कर दीपा को देखते ही रहे की इसमें हँसने वाली बात क्या थी? जब दीपा ने हमें उसकी और आश्चर्य से ताकते हुए देखा तो दीपा हँसते हँसते बोल पड़ी, "दीपक, लोगों के मन में बॉस की क्या इमेज होती है? तुम्हारे बॉस तो इतने हैंडसम, सॉलिड और पिक्चर के हीरो जैसे यंग हैं यार! मैं उम्मीद कर रही थी, मतलब मैंने सोचा था की वह कोई सफ़ेद बाल वाले खड्डूस बुड्ढे होंगे।"

दीपा की बात सुन कर मैं एकदम स्तब्ध हो गया। सोचा कहीं बॉस बुरा ना मानलें। पर बॉस दीपा के इस तरह खिलखिला कर हँसने से खुद भी हँस पड़े। वह दीपा का हाथ पकड़ कर हँसते हुए बोले, "मैं आपका शुक्रिया करता हूँ की आपने मुझे इतने विशेषणों से नवाजा। मैं अभी तो जवान हूँ, पर एक ना एक दिन आपकी तमन्ना जरूर पूरी हो जायेगी।"

 
बॉस की बात सुन कर दीपा और जोर से हंस पड़ी और बोली, "ना ना मैं चाहती हूँ की आप सदा जवान ही रहें।"

दीपा की बात सुन कर और उसे देख कर मेरे बॉस काफी प्रभावित हुए। दीपा भी मेरे बॉस की प्रतिभा और व्यक्तित्व की कायल हो गयी। बॉस ने पहली मुलाक़ात में ही मेरी बीबी का दिल जित लिया। बॉस मेरी पत्नी से इतने प्रभावित हुए की काफी देर तक वह दीपा से बातें करते रहे। मैं देख रहा था की जैसे जैसे बॉस मेरी पत्नी से बात करते रहे वैसे वैसे मेरे बॉस के चेहरे पर कुछ अजीब से भाव मुझे नजर आये। जाहिर था मेरे बॉस मेरी पत्नी की खूबसूरती और कामुकता के अलावा और कई खूबियों से बड़े ही प्रभावित हुए थे।

जब मेरे साथ बॉस ने बात की तो उन्होंने मेरी बीबी के पति होने के लिए मुझे बहोत बधाई दी और कहा की मैं दुनिया का एक बहोत ही भाग्यशाली पति हूँ। बॉस ने दीपा में एक सक्षम प्रशासक, कारगर प्रेरक, निष्णात प्लानर और अद्भुत व्यवस्थापक देखा। वह मुझे कहने लगे की काश मेरी पत्नी दीपा कॉर्पोरेट दुनिया में होती तो पता नहीं कहाँ से कहाँ पहुंची होती। बॉस मुझे मेरी पत्नी की एक एक खूबियां जो उन्होंने दीपा में देखि थीं वह मुझे गिना रहे थे और मेरी बीबी की बड़ी तारीफ़ कर रहे थे। तब तक मुझे भी नहीं पता था की मेरी पत्नी में इतनी सारी खूबियां थीं।

धीरे धीरे पार्टी में लोग आना शुरू हुए। पार्टी में थ्री डी (डान्स, ड्रिंक और डिनर) का प्रोग्राम था।

उस पार्टी में बॉस ने दीपा से काफी इधर उधर की बातें की। पर मुख्यतः उनकी बातें बिज़नेस डेवलपमेंट और कर्मचारियों के योगदान और कुशल मंगल पर केंद्रित थीं। बॉस ने दीपा से इतने खुले दिल से बात की थी उतनी शायद मेरे साथ भी कभी नहीं की। बॉस मेरी पत्नी के बात करने मात्र की दक्षता से ही नहीं, पर उसकी निखालिस हँसी, उसके व्यक्तित्व, उसकी प्रतिभा, दीपा की परिपक्वता (मेच्योरिटी) और ख़ास कर उसकी कामुकता भरी सुंदरता पर तो जैसे कुर्बान ही हो गए। पार्टी में और भी कई महिलाएं थीं जो बॉस से मिलना और बात करना चाहती थीं। पर बॉस और लोगों से कुछ हलकी फुलकी औपचारिक बात कर उनसे अलग हो जाते थे और दीपा को ही ताकते रहते थे या उससे मिलने अथवा बात करने का मौक़ा ढूंढते मुझे दिख रहे थे।

मेरी पत्नी दीपा भी तो कोई कम नहीं थी। उसकी पुर बहार जवानी उस शाम और भी खिली हुयी लगती थी। वह उस समय कोई २८ साल की होगी। करीब तीन या चार साल पहले ही हमारी शादी हुई थी। दीपा ना सिर्फ अत्यन्त सुन्दर थी, वह अपनी चाल, ढाल, बातें करने की स्टाइल, अपनी अदा और अपने मृदुल व्यक्तित्व के कारण बेहद सेक्सी भी लग रही थी। दीपा का चेहरा लंबा सा था। उसकी आँखें धारदार थीं और पलकें घनी, पतली और काली थीं। दीपा नाक नुकीली सीधी सुआकार थी।

दीपा के गाल गुलाब की तरह खिले हुए थे। वह बिलकुल सही मात्रा में भरे हुए थे। दीपा के कान के इर्दगिर्द उसके बालों की जुल्फ घूमती हुई देखने वाले मर्दों का जिगर काट कर रख देती थीं। घने और काले बाल दीपा की कमर तक लम्बे थे जिन्हें वह अक्सर बाँध कर रखती थी जिससे उसके सौन्दर्य में चार चाँद लग जाते थे। देखने में मेरी पत्नी कुछ हद तक हिंदी फिल्मों की पुराने जमाने की अभिनेत्री राखी की तरह दिखती थी, पर राखी से कहीं लम्बी थी। आजकल फिल्मों में उसे परिणीति चोपड़ा से कुछ हद तक तुलना कर सकते हैं।

दीपा कमर से तो पतली थी पर उसके उरोज (मम्मे) पूरे भरे भरे और तने हुए थे। दीपा की पतली फ्रेम पर उसके दो गुम्बज को देखने से कोई भी मर्द अपने आप को रोक ही नहीं पाये ऐसे उसके भरे हुए सुडोल स्तन थे। देखने वाले की नजर दीपा के चेहरे के बाद सबसे पहले उसके दो फुले हुए गुम्बजों (मम्मों) पर मजबूरन चली ही जाती थी। उसके तने हुए ब्लाउज में से वह इतने उभरते थे, की मेरी बीबी के लिए उन्हें छिपा के रखना असंभव था। सबकी नजर से उन्हें उतना उभरे हुए दिखाने से वह बचना चाहती थी। मैंने उसे कहा की वह कुदरत की देन है, उन्हें छुपा ने की कोई जरुरत नहीं है। इसी लिए काफी गेहमागहमी करने के बाद आखिर में तंग आकर उसने अपने बूब्स छुपाने का विचार छोड़ दिया।

उसका बदन लचीला और उसकी कमर से उसके उरोज का घुमाव और उसके नितम्ब का घुमाव को देख कर पुरुषों के मुंह में बरबस पानी आ जाना स्वाभाविक था। ज्यादातर दीपा साडी पहनकर ही बाहर निकलती थी। वह जीन्स पहनना टालती थी क्यूंकि उसकी लचिली जाँघें, गाँड़ और चूत का उभार देख कर मर्दों की नजर उसीके ऊपर लगी रहती थी। जब कभी दीपा जीन्स या लेग्गीन पहनती थी तो दीपा बड़ी ही अजीब महसूस करती थी क्यूंकि सब मर्द और कई औरतें भी दीपा की दोनों जाँघों के बिच में ही देखते रहते थे।

मेरी पत्नी को टी शर्ट, स्लैक्स, जीन्स पहनने का शौक था पर चूँकि उसकी फिगर को ही लोग ताकते रहते थे तो दीपा उन्हें कम पहनती थी। मैं उसे बार बार आग्रह करता था की वह ऐसे ड्रेस को पहने, भले ही लोग ताकते रहे। मैंने एक दाखिला देते हुए कहा, "अगर किसी का घर दूसरों के घर से बहोत अच्छा हो तो क्या लोग उसे ताकेंगे नहीं? किसी की कार अगर दुसरी कारों से ज्यादा खूब सूरत और अच्छी हो तो भी लोग उसे देखेंगे। वैसे ही तुम दूसरी औरतों से अच्छी होगी तो लोग जरूर तुम्हें ताकेंगे। दूसरों के ताकने की चिंता किये बिना बिंदास रहो और जो चाहो वह पहनो।"

तब से दीपा ने जीन्स, स्लैक्स, टी शर्ट पहनना शुरू किया। मेरा "बिंदास" शब्द दीपा को बड़ा जँच गया। मेरी बीबी की पर्सनालिटी से वह बड़ा मैच भी करता था। मुझसे शादी होने तक स्कूल में, कॉलेज में और उसके बाद भी वह बड़ी बिंदास रहती थी। शादी के बाद मेरी माँ के नियंत्रण में रह कर उसे अपने आप को कण्ट्रोल करना पड़ा। फिर भी वह अकेले में या जब बाहर जाती थी तब उसका "बिंदासपन" साफ़ दिखता था।

शादी के पहले दीपा एक मैनेजमेंट कंपनी में सेक्रेटेरियल जॉब कर रही थी। उसने तीन साल जॉब की पर उन तीन सालों में वह सेक्रेटरी से मैनेजर बन गयी। शादी के बाद उसे लखनऊ शिफ्ट करना पड़ा तो उसने तय किया की वह मेरे साथ घर गृहिणी बन कर रहेगी। उसने कहीं जॉब के लिए अर्जी ही नहीं डाली।

जब मुझे अच्छी जॉब मिली और घर और माँ बाप को छोड़ कर लखनऊ आना पड़ा उसके बाद मेरी बीबी का "बिंदासपन" पूरा उभर कर सामने आया। मुझे सहगल के गाने और पुराने जमाने के गानों का बड़ा शौक था। मैं जब उन्हें बजाता तो दीपा गुस्सा हो जाती। वह मुझे ताने मारती और कहती, "पता नहीं तुम भरी जवानी में भी ऐसे रोते हुए गाने क्यों बजाते रहते हो? जिंदगी नाचने, गाने और मौज करने के लिए है। रोने के लिए तो पूरी जिंदगी पड़ी है।"

 
मेरी बीबी को नाचना, कूदना, घूमना बहोत पसंद था। कभी कभी तो वह सहगल के गाने पर भी नाचने लगती थी।

दीपा बातूनी भी बड़ी थी। बचपन से ही उसे काफी बात करने की आदत थी। उसे पुरुषों से बात करने में कोई झिझक नहीं होती थी। उसकी इसी आदत के कारण कई बार मैं मजाक में ताने मार कर उसे "बसंती" (शोले पिक्चर वाली हेमामालिनी) कहकर बुलाता था। बात करते करते वह अक्सर खिल खिलाकर हँस भी पड़ती थी। दीपा की इसी मस्ती भरी बात करने की आदत और हँसी के कारण मैं दीपा से आकर्षित हुआ था। साथ साथ में वह काफी संवेदनशील (इमोशनल) भी थी।

किसी अपाहिज को अथवा गरीब भिखारी को देख कर उसकी आँखों में आँसूं भर आते थे। हम जब कोई हिंदी मूवी देखने जाते तो करुणता भरा दृश्य देख कर वह रोने लगती थी। मैं जितना मेरे बॉस से प्रभावित था शायद उतना ही मेरी बीबी से था। यह कहना गलत नहीं होगा की मुझे मेरी बीबी में भी अंध विश्वास था। और वह इस काबिल थी भी। वह मुझे बहोत प्यार करती थी और कभी मेरे कहने के विरुद्ध नहीं जाती थी। यह बात और है की मुझे कभी कुछ कहने का मौक़ा ही नहीं मिलता था। मैं मेरी बीबी की हर बात मानता था और मेरी बीबी की हर बात मान कर मुझे खशी मिलती थी। मैं उसके अनुसार ही काम करता था जिसके कारण हमारा जीवन बड़ी सरलता से चल रहा था।

मेरी बीबी की एक और खासियत थी। वह सफाई और सजावट की बड़ी ही हिमायती थी। उसे थोड़ी भी अव्यवस्था और गन्दगी बिलकुल पसंद नहीं थी। इसी कारण हमारा घर हमेशा चकाचौंध रहता था। अगर किसी ने उसे गंदा या अव्यवस्थित किया तो वह गरज पड़ती थी। वह बोलने में कुछ हद तक मुंहफट थी। कई बार वह जो मनमें आये वह बोल देती थी।

उस नए साल के अवसर पर की गयी की पार्टी में में एक प्रख्यात बैंड था और साथ में डान्स का कार्यक्रम था। पार्टी काफी बड़े फार्म हाउस में की जा रही थी। मेरे बॉस दिल फेंक और जानदार मर्द के उपरान्त एक माहिर डान्सर भी थे। उस पार्टी में इधर उधर घूमते फिरते डान्स करते हुए जब बॉस मेरी बीबी दीपा के करीब पहुंचे तो उन्होंने उसे बाँहें फैला कर डान्स के लिए आमंत्रित किया। दीपा ने मुस्करा मेरी और देख कर एक आँख मटका कर बॉस के आमंत्रण को स्वीकार किया और ज़रा सा भी समय ना गँवाते हुए वह मेरे बॉस की बाँहों में चली गयी।

उसने बॉस से कहा की उसे डान्स करना नहीं आता। बॉस ने उसे कहा की कुछ ही देरमें वह दीपा को डान्स के स्टेप्स सीखा देंगे। जैसे जैसे बॉस उसे एक के बाद एक स्टेप्स सीखा रहे थे वैसे दीपा भी बॉस के साथ डान्स करने लगी। बॉस दीपा को डान्स स्टेप सिखाते हुए दीपा के कान के एकदम करीब जाकर उसके कानों में बातें करते रहते थे। दीपा को मैंने बार बार जोरसे वैसे ही खिलखिला कर हँसते हुए और अक्सर अपना सर हिला कर सहमति जताते हुए देखा।

वैसे भी दीपा ने स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई के साथ साथ हिंदुस्तानी डान्स और थोड़ा पाश्चात्य नृत्य भी तो सीखा ही था। उसे डान्स के स्टेप्स समझने में वक्त नहीं लगा। आश्चर्य तो यह था की जब सालसा की धुन पर बॉस और दीपा तेजी से नाचने लगे तो सारे देखने वाले दाँतों तले उंगलियां दबा कर देखने लगे। देखते ही देखते वह सारी पार्टी की लोकप्रिय डान्सर बन गयी। बॉस ने दीपा के साथ करीब एक घंटे से भी ज्यादा वक्त डान्स किया।

जब संगीत एकदम मंद लय में बज रहा था तब बॉस ने दीपा के अंग से अंग सटा कर बड़ा ही कामुक मुद्राएं करते हुए डान्स किया। मैं कहीं जा कर उन दोनों की नज़रों से ओझल हो गया ताकि दीपा और बॉस मुझे देख कर नर्वस ना हो जाए। मुझे बड़ा ही आश्चर्य हुआ की उस समय मेरी बीबी ने कोई विरोध नहीं किया और बॉस को पूरा सहयोग देते हुए गजब का डान्स किया।

डान्स खतम होने के बाद जब बॉस मेरी पत्नी का हाथ थाम कर मेरे सामने आये तब उन्होंने कहा, "दीपक, तुम बड़े लकी हो की तुम्हें दीपा जैसी पत्नी मिली है। वह एक गजब की डान्सर ही नहीं, एक सच्चे दिल की खूबसूरत इंसान भी है।" फिर मुड़ कर दीपा की और देख कर बोले, "दीपा, आज तुमने मुझ में जान डाल दी। मैंने सोचा भी नहीं था की मैं ऐसे डान्स कर सकता हूँ। मैंने तुम्हें नहीं, आज तुमने मुझे डान्स करना सीखा दिया। बल्कि अगर मैं कहूं की तुमने मुझे जीना सीखा दिया तो गलत नहीं होगा।"

बॉस की प्रशंसा सुन कर दीपा शर्मा गयी। उसने अपनी नजरें झुकाते हुए बॉस से कहा, "सर आप इतने अच्छे डान्सर हो। आपने मुझ जैसी अनाड़ी को भी डान्स करना सीखा दिया। इसके पहले मैंने कभी किसी के साथ डान्स नहीं किया।"

मेरे बॉस भी बेचारे सोच रहे होंगे की यह कैसी औरत है जो कभी खिलखिला कर हँसती है तो कभी शर्म के मारे लाल हो जाती है और अपनी नजरें झुका लेती है तो कभी पूरी गंभीरता से बिज़नेस के बारे में ऐसी सटीक बातें बताती है की उनके जैसे बिज़नेस के महारथी को भी अपने दांतों तले उंगलिया दबा कर दीपा की बातें बड़े ध्यान से सुननी पड़ती है।

बॉस हर रोज कम से कम तीन चार बार दीपा के बारे में जरूर पूछते और मौक़ा मिलने पर दीपा की तारीफ करते हुए न थकते।

बॉस ने एक बार मुझे और दीपा को घर पर डिनर के लिए आमंत्रित किया। उन के घर में उनकी पत्नी से हमारी मुलाक़ात हुई। बॉस का घर काफी बड़ा था और उसमें कई कमरे थे और आगे एक बढ़िया सा बगीचा भी था। बॉस की बीबी कुछ रिजर्व्ड नेचर की थी और बहुत कम बोलती थी। बॉस स्मार्ट और हैंडसम थे।

हमारे आते ही हमें बॉस ने हमें चाय और कुछ नाश्ता लेने को कहा। बॉस की बीबी तो हमारे आते ही हमारी औपचारिक मुलाक़ात करने के तुरंत बाद अपने कमरे में गायब हो गयी। मैं थोड़ा अचरज में पड़ गया जब मैंने बॉस की बीबी को देखा। बॉस की पत्नी की शकल दीपा से मिलती जुलती थी या वह मेरे मन का वहम था, कह नहीं सकता। पर काफी कुछ फर्क भी था दोनों में। दीपा के स्तन भरे हुए मस्त थे और उसके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। बॉस की बीबी पतली, गहनों में सजी, महंगे कपडे पहनी हुई, छोटी छोटी चूँचियों वाली और मेरे ख़याल में निहायत ही अरसिक अभद्र स्वभाव की थी। मुझे लगा की उसे हमारे आनेसे उन्हें कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई थी, और उसे वह जाहिर करने में कोई झिझक नहीं दिखा रही थी।

जब बॉस खड़े हो कर हमें चाय देने लगे तो दीपा ने उन्हें बिठा दिया और खुद चाय देने के लिए खड़ी हुई। दीपा ने भी बॉस की बीबी का रवैया महसूस किया। उस दिन दीपा ने अनजाने में ही गले से काफी निचे तक जाता हुआ लौ कट ब्लाउज पहना था। दीपा के उदार स्तन ब्लाउज में से उभर कर बाहर निकल ने को जैसे तड़प रहे थे। जब दीपा ने झुक कर बॉस को चाय दी तो बॉस की आँखें दीपा के ब्लाउज के अंदर उसके उदार स्तन मंडल के दर्शन करने में ही जड़ सी गयी। जब दीपा ने बॉस की नजर की दिशा देखि तो आननफानन में चुन्नी ओढ़ कर उन्हें छुपाने की नाकाम कोशिश की।

 
चाय लेने के बाद बॉस और दीपा पहले घर के बारे में फिर मौसम के बारे में, बगीचे के बारे मैं उस समय की आर्थिक स्थिति और बिज़नेस के बारेमें और ऐसे कई विषय पर बातचीत में मशगूल हो गए। बॉस ने देखा की मैं कुछ बोर होने लगा था तब बॉस ने टीवी चालु किया और मैं अपना चाय का कप और कुछ बिस्कुट लेकर उस समय टीवी पर कोई अच्छा प्रोग्राम चल रहा था उसे देखने लगा।

बीबी के और मेरे वहाँ से हटते ही बॉस तो जैसे आझाद पंछी हो गए और दीपा से बिंदास बातें करने में लग गए। दीपा बातूनी तो थी ही। सही श्रोता मिल जाने पर उसे बोलने से रोकना बड़ा ही मुश्किल था। दीपा को मेरे बॉस के साथ खुले दिल से बात करने में कोई हिचकिचाहट नहीं महसूस हुई। बातें करते हुए अक्सर ही वह बॉस के कोई जोक पर अथवा किसी भी बात पर हँस पड़ती थी और बॉस उसे बड़ी प्रसन्नता से देखते ही रहते थे। मेरे बोस को दीपा की यह बात बड़ी पसंद आयी। बॉस और दीपा ने काफी इधर उधर की बातें की। वह तो वैसे ही सेल्स के आदमी थे, बातें बनाने में माहिर थे।

दीपा उनसे बातें करते हुए उतनी उत्साहित हो जाती की यह ख्याल किये बगैर की वह मेरे बॉस थे, दीपा कई बार बातों के जोश में बॉस का हाथ थाम लेती या उनकी जांघ के ऊपर या पीठ के ऊपर हलकी सी टपली लगा देती। दीपा के लिए वह आम बात थी पर शायद बॉस का इस के कारण क्या हाल हो रहा था वह मैं कुछ दूर बैठा उनकी नजर और उनके चेहरे के भाव देखा कर समझ सकता था। पर मेरी बीबी तो 'शौले' की बसंती की तरह बोले जा रही थी।

उसे अपनी बातों की व्यस्तता में बॉस की पैनी नजर, जो दीपा के ब्लाउज और ब्रा की सीमा को तोड़ते हुए स्तनों पर बार बार जाती रहती थी, उस की और देखने की शायद फुर्सत ही नहीं थी। बॉस भी बड़ी उत्सुकता से मेरी बीबी की बातों में बार बार हामी भरते हुए बड़ी उत्सुकता से सब कुछ देखते और सुनते जाते थे। बिच बिच में वह दीपा के विचारों की तारीफ़ करने लगते तो कई बार ऐसे सरल और पसंदीदा प्रश्न पूछते जिसका जवाब देने के लिए दीपा बड़ी ही उत्सुक और कई बार उत्तेजित भी हो जाती थी।

मुझे यह समझने में देर नहीं लगी की मेरे बॉस दीपा पर फ़िदा हो चुके थे और दीपा पर लाइन मार रहे थे। जब मैं टीवी देखने में उलझा हुआ लगता था तब मौका मिलते ही बातें करते हुए जैसे उत्सुकता से बॉस भी हलके से दीपा का हाथ थाम लेते थे। पर दीपा का बॉस का हाथ थामना और बॉस का दीपा का हाथ थामने में फर्क था। दीपा तो हाथ पकड़ कर छोड़ देती थी। पर बॉस दीपा का हाथ थामे रखते थे जब तक दीपा उसे अपने हाथों से छुड़ा ना लेती थी। मुझे लगा की शायद दीपा ने भी यह महसूस किया था। पर उसने उसको नजर अंदाज कर दिया। बॉस की नजरें दीपा के सुआकार कूल्हों पर और दीपा की उभरी हुई छाती पर अक्सर टिकी रहती थीं।

दीपा कुछ भी ना समझते हुए हँसती रहती थी और बातों पर बातें करे जा रही थी। कुछ देर बाद जब बॉस की बीबी आयी और उसने देखा की उस के पति दीपा से कुछ ज्यादा ही बात करने में जुटे हुए थे तब उसने सब को खाने के लिए डाइनिंगरूम में आने को कहा। तब कहीं जा कर उनकी बातों का दौर खत्म हुआ।

खैर दीपा के बातूनीपन से मुझे यह फायदा हुआ की मैं बॉस का और भी पसंदीदा बन गया। मुझे बॉस से कुछ ज्यादा ही मदद मिलने लगी। बॉस जब भी मुझे मिलते दीपा के बारे में जरूर पूछते।

उन दिनों दो बड़ी ही परिवर्तनशील घटनाएं हुईं जिन्होंने हमारे जीवन को एक नया ही मोड़ दे दिया।

दीपा के पिता को अचानक ह्रदय की बिमारी के कारण हॉस्पिटल में दाखिला हुआ और उसके लिए दीपा की फॅमिली को अतिरिक्त पांच लाख रुपये की जरुरत पड़ी। जब मेरी दीपा से बातचीत हुई तो मैंने कहा एक ही आदमी हमारी मदद कर सकता है और वह है बॉस। पर मुझे बॉस से पैसे मांगने में हिचकिचाहट हो रही थी। दीपा ने कहा की वह मेरे बॉस से बातचीत करेगी।

दूसरे दिन दीपा मेरे ऑफिस में आयी और बॉस की केबिन में जा कर उसने बॉस से अपने पिताजी के हार्ट अटैक के बारेमें बात की। दीपा की बात सुन कर बॉस का दिल पसीज गया। उन्होंने कहा, "दीपाजी, आप मुझे एक दिन का समय दीजिये। कल आपको मेरे साथ चलना होगा।"

दूसरे दिन बॉस दीपा को लेकर उनके बैंक में गए। दीपा को बड़ा आश्चर्य हुआ जब बॉस ने अपनी पंद्रह लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉज़िट तुड़वाकर उसमें से सात लाख रुपये दीपा के भाई के नाम ट्रांसफर किये। दीपा ने कहा, "सर, मुझे सिर्फ पांच लाख चाहिए।"

बॉस ने कहा, "हॉस्पिटल में बड़े खर्चे होते हैं। पता नहीं शायद जरुरत पड़ जाए। आप दो लाख और रख लीजिये। जरुरत पड़े तो इस्तेमाल करना वरना वापस कर देना।"

बॉस की बात सच्ची साबित हुई। दीपा के भाई ने कहा की बिल कुछ ज्यादा हुआ और एक लाख रुपया और लग गया। ऑपरेशन के बाद पिताजी के ठीक हो जाने पर वापस आ कर दीपा एक लाख रुपये का चेक लेकर एक बार फिर बॉस का शुक्रिया अदा करने हमारे ऑफिस में आयी।

उस समय दीपा बॉस की इतनी ऋणी हो गयी थी की उस दिन मेरी बीबी के पास बॉस का शुक्रिया अदा करने के लिए शब्द नहीं थे। ऑफिस में बॉस की केबिन में मेरे सामने मेरी बीबी दीपा बॉस के कंधे पर सर रख कर फफक फफक कर रो पड़ी। बॉस दीपा की पीठ पर अपना हाथ सहलाते हुए उसे ढाढस देने की कोशिश कर रहे थे। थोड़ा सम्हल ने के बाद दीपा ने जब पूछा की उन्हें वह छह लाख रुपये वापस कैसे करने होंगें।

 
उस समय दीपा बॉस की इतनी ऋणी हो गयी थी की उस दिन मेरी बीबी के पास बॉस का शुक्रिया अदा करने के लिए शब्द नहीं थे। ऑफिस में बॉस की केबिन में मेरे सामने मेरी बीबी दीपा बॉस के कंधे पर सर रख कर फफक फफक कर रो पड़ी। बॉस दीपा की पीठ पर अपना हाथ सहलाते हुए उसे ढाढस देने की कोशिश कर रहे थे। थोड़ा सम्हल ने के बाद दीपा ने जब पूछा की उन्हें वह छह लाख रुपये वापस कैसे करने होंगें।

बॉस ने कहा, " दीपा, मैं एक बिजनेसमैन हूँ। मैं अपने पैसे कभी नहीं छोड़ता। अभी दीपक को और आपको इस के बारे में सोचने की कोई जरुरत नहीं है। जब आप लोगों के पास अतिरिक्त राशि हो तो धीरे धीरे देते रहना। वैसे भी मेरे ख़याल से आप लोगों को यह पैसे वापस देने की जरुरत नहीं होगी, क्यूंकि मुझे पूरा भरोसा है की दीपक ऐसा काम करेगा की मैं दीपक के परफॉरमेंस इन्सेंटिव (कार्यक्षमता आधारित अधिकृत बोनस) में से अगले दो तीन सालों में ही यह पैसे वसूल कर लूंगा। आप इत्मीनान रखिये की यह पैसे मैं आप से ऐसे निकलवा लूंगा की आपको कमी भी नहीं पड़ेगी और मैं अपने पैसे भी वसूल लूंगा। पर मैं आपको इस की वजह से आपकी रोजमर्रा की जिंदगी में कोई भी परेशानी नहीं होने दूंगा। यह मेरा वादा है। अगर दीपक से दो तीन सालों में वसूल नहीं कर पाया तो मेरे पास और भी कुछ आईडिया हैं की यह पैसों से कहीं ज्यादा मैं आप दोनों से कमा लूंगा।"

उन्हें पक्का भरोसा था की अगले एक दो साल में इतना अधिक सेल तो मैं कर ही लूंगा। पिता के ऑपरेशन के बाद दीपा इस चिंता में डूबी हुई इतनी ज्यादा परेशान हो रही थी की पैसे तो उधार ले लिए पर वापिस भी तो करने होंगे। जब दीपा ने बॉस की बात सुनी तो उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। दीपा बॉस की इस उदारता से इतनी गदगद हो गयी की उस की आँखों में आँसूं भर आये और वह अनायास ही बॉस से लिपट गयी और बॉस के दोनों हाथ पकड़ कर बार बार शुक्रिया अदा करने लगी। मेरे बॉस बेचारे भौंचक्के से खड़े होकर मेरी बीबी को बार बार 'इट्स ओके' कहते रहे।

उसी दिन से स्वाभाविक रूप से मेरी बीबी मेरे बॉस की बड़ी फैन हो गयी। उसे जब भी मौक़ा मिलता वह मेरे बॉस की तारीफ़ करते हुए न थकती।

एक रात बातों ही बातों में बॉस की बात शुरू हुई। दीपा ने कहा, "तुम्हारे बॉस को तुम पर बहोत भरोसा है। उन्होंने मेरे मांगने पर अपनी डिपॉज़िट तोड़ कर फ़ौरन सात लाख रुपये बिना कोई कागज़ पत्तर किये दे दिए। मजे की बात तो यह है की उन्होंने हमें पैसे वापिस करने के लिए भी नहीं कहा। उन्हें तुम्हारे परफॉरमेंस पर जबरदस्त भरोसा है। उन्हें पता है की अगले दो तीन सालों में तुम अपने इंसेंटिव में से इतना तो कमा ही लोगे। यह बहोत बड़ी बात है।"

मैंने कहा, "दीपा क्या तुम्हें पता है की बॉस ने वह रकम बढ़िया सा ऑफिस खरीदने के लिए इकट्ठी कर रक्खी थी। यह उनकी बहोत जरुरी बचत थी जो उन्होंने हमें दे दी। उसके साथ एक बात और है जो तुमने नहीं नोटिस की।"

दीपा ने मेरी और देख कर पूछा, "क्या? कौनसी बात?"

मैंने कहा, "उन्होंने मुझ पर शायद भरोसा किया होगा। पर उससे कहीं ज्यादा भरोसा उन्होंने तुम पर किया। वह तुमसे बहोत इम्प्रेस्ड हैं। तुम उनके पास पैसे मांगने गयी इसी लिए उन्होंने यह पैसे दिए। अगर मैं उनके पास पैसे मांगने गया होता तो शायद वह ना देते। यह हकीकत है।"

दीपा ने टेढ़ी नजर से मुझे देखा और बोली, "ऐसा तुम्हें क्यों लगा? मैं तो सिर्फ इस लिए गयी थी की तुम जाने से झिझक रहे थे। हालांकि मैं तैयार थी की वह मना करेंगे। अगर वह मना करते तो मुझे आघात नहीं लगता। क्यूंकि मैं तो यही सोच रही थी की आज कल के जमाने में कोई भी अपने साथीदार पर इतनी बड़ी रकम के लिए ऐसे बिना लिखापढ़ी के इतना भरोसा नहीं करता और इतनी आसानी से पैसे नहीं देता। मानलो अगर तुमको कोई बेहतर जॉब मिल जाए और तुम कंपनी छोड़ दो तो वह क्या करेंगे? इसी लिए मैं तो खाली हाथ वापस आने के लिए तैयार थी। पर फिर भी कोशिश करने से मैं पीछे नहीं हटी और सफल भी हुई।"

मैंने कहा, "तुमने ही तुम्हारे सवाल का जवाब दे दिया। तुमने कहा की इतनी आसानी से कोई अपने साथीदार पर भरोसा नहीं करता। फिर बॉस ने क्यों किया? क्यूंकि तुम बॉस के पास गयी और बॉस ने तुम पर भरोसा किया। तुम्हें वह मना नहीं कर सके। तुम्हारी खूबसूरती और तुम्हारी सख्सियत के वह कायल हैं। यह तो तुमने भी महसूस किया ही है ना?"

दीपा ने शर्माते हुए अपनी मुंडी तो हिलायी पर कुछ ना बोली। मैंने कहा, "हम उनके इतने एहसानमंद हैं की अगर हम उनके लिए कुछ भी कर लें तो भी हम उनके एहसानों का बदला चुका नहीं पाएंगे। आज कल के जमाने में कोई किसी पर भरोसा नहीं करता।"

 
दीपा ने कहा, "यह तो सच कहा तुमने। पर हम भला इतने बड़े आदमी के लिए क्या कर सकते हैं?" और मैंने देखा की वह अचानक ही गहरे सोच में खो गयी।

अचानक मैंने कहा, "एक बात कहूं?"

दीपा ने मेरी और देखा। मैंने कहा, "देखो, यह तो तुम नकार नहीं सकती की बॉस तुम्हारे ऊपर फ़िदा हैं। जब देखो उनकी नजर चोरी छुपकर तुम्हारी छाती और तुम्हारे पिछवाड़े पर ही होती है। मुझे लगता है तुम उनसे जो चाहो करवा सकती हो।"

दीपा मेरी बात सुनकर शर्मायी और फिर हंसने लगी। उसने कहा, "क्यों? जलन हो रही है क्या? वैसे तुम्हारे बॉस है ही इतने अच्छे। स्मार्ट हैं, यंग हैं, भले आदमी हैं। और उनकी बीबी को तो देखो? जितने बॉस अच्छे हैं बीबी बिलकुल उलटी है। पता नहीं उन्होंने ऐसी औरत के साथ शादी क्यों की? उन्हें तो अच्छे से अच्छी लड़की मिल सकती थी। शायद इसी लिए बॉस दुखी लगते हैं, और शायद इसी लिए मुझे घूरते होंगे। पता नहीं। क्या तुमने नोटिस किया की उनकी बीबी की शकल मुझसे कुछ मिलती जुलती है? शायद जो उनको अपनी बीबी में नहीं मिला वह मुझमें खोजते होंगे। खैर यही जिंदगी का चक्कर है। मुझे तुम्हारे बॉस से और कुछ नहीं चाहिए। उन्होंने मेरे पिताजी की जान बचाइ है यह ही मेरे लिए बहोत बड़ा तोहफा है। उनका यह एहसान मैं कैसे चुकाऊं यही मैं सोचती रहती हूँ। अगर तुम्हारे बॉस कुछ पल के लिए मुझे देख कर खुश होते हैं तो यह तो मेरे लिए ख़ुशी की बात है। वैसे सारे मर्द यही तो करते हैं। तो फिर बॉस को क्यों दोष दें? इसमें क्या बुराई है?"

मैंने कहा, "बॉस की नजर तुम पर काफी तेज हो रही है। वह जब तुम्हें देखते हैं तब ऐसा लगता है जैसे वह तुम्हें निगल जाएंगे। जब भी तुम झुक कर कुछ देती हो ना तो बेचारे तुम्हारे ब्लाउज के अंदर झांकते ही रहते हैं।"

दीपा ने मेरी बात को खारिज करते हुए कहा, "मैंने तुम्हें दूसरी औरतों पर लाइन मारते हुए नहीं देखा क्या? बड़े शरीफ बनते हो? तुम्हारे बॉस तो तुमसे फिर भी बहोत अच्छे हैं। उन की बीबी को देखो तो समझ में आता है की बेचारे बॉस भी क्या करे? उसकी छाती तो है ही नहीं। मेरे मम्मे इतने मस्त भरे हुए हैं फिर भी तुम दूसरे की बीबियों की छाती पर नहीं ताकते हो? तुम मर्दों की तो फितरत ही ऐसी होती है। पर क्या करें मर्दों के बिना जिया भी तो नहीं जाता। इसमें कोई नयी बात नहीं। मेरे लिए यह अब आम बात हो चुकी है। मुझे उनकी बीबी निहायत ही घमंडी और सूखे स्वभाव की लगी। तो बेचारे बॉस अगर मेरे भरे हुए मम्मे ताकते हैं तो ताकने दो। तुम्हें कोई एतराज है तो बोलो। मैं तुम्हारे बॉस के सामने नहीं जाउंगी।"

मैंने कहा, "अरे भाई, तुम तो ख्वामखा: नाराज हो गयी। मुझे बॉस से कोई जलन नहीं हो रही। मेरा कहने मतलब यह बिलकुल नहीं था। तुम्हारी बात बिलकुल सच है। बस मैं तो यूँही मजाक कर रहा था।"

दीपा ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा, "ऐसे किसी भले आदमी पर मजाक में भी गलत तोहमत नहीं लगाते।"

मुझे उस रात को सपना आया की जब मैं टूर पर गया था तो बॉस मेरे घर आये और दीपा और बॉस दोनों ने मिलकर जमकर चुदाई की। मैं इस सपने को देख कर इतना उत्तेजित हो गया की रात को नींद में मेरे पाजामे में ही मेरा छूट गया।

पहली बार मैंने महसूस किया की मैं भी एक तरह से ककोल्ड हूँ। ककोल्ड का मतलब है अपनी पत्नी को किसी गैर मर्द से चुदाई करवाने के लिए लालायित मर्द। शायद उसी दिन से किसी गैर मर्द से (और अगर हो सके तो बॉस से) मेरी बीबी को चुदते हुए देखने की एक ललक मेरे मन में घर कर गयी।

दीपा मेरे बॉस की ऐसी ऋणी हो गयी की उनका जन्म दिवस या कोई भी त्यौहार पर समय समय पर वह उन्हें कोई ना कोई गिफ्ट भेजती और जब बॉस की बीबी नहीं होती तो उन्हें खाना खाने के लिए बुलाती या खाना भिजवाती। बॉस भी मौक़ा मिलते ही दीपा को मिलने आ जाते या जन्म दिवस या शादी की सालगिराह पर आ जाते और महंगे तोहफे देते। ऐसे मुझे लगा की बॉस और दीपा के बिच में कुछ ना कुछ आकर्षण की बात बन रही थी।

दूसरी हमारे जीवन में परिवर्तन लाने वाली घटना यह हुई की इस दौरान ही अचानक बॉस के जीवन में एक गज़ब का भूचाल सा आया। बोस और उनकी पत्नी के बिच में कुछ मनमुटाव की ख़बरें आने लगीं। जो बॉस दिन रात मेहनत कर बिज़नेस लाते थे और हमारे सारे ग्राहक के अति प्रिय थे वह एकदम मुरझा से गए। अब पहले की तरह वह भाग कर ग्राहक की समस्या का समाधान हल नहीं कर रहे थे। सब ग्राहक नाराज होने लगे। ग्राहक एक के बाद एक छुटते गए। देखते ही देखते सेल निचे जाने लगी। मेरा इंसेंटिव भी निचे चला गया। पूरी कंपनी में गजब का मायूस सा वातावरण छा गया। और एक दिन बॉस को उनकी बीबी से तलाक का नोटिस भी आ गया। बॉस की पत्नी बॉस को छोड़ कर चली गयी। बॉस के सपनों का महल जैसे टूट गया। बॉस वैसे ही बड़े संवेदनशील थे। वह इस हादसे से बिखर से गए। अब बॉस अकेले ही उनके बड़े घर में रहते थे।

 
दूसरी हमारे जीवन में परिवर्तन लाने वाली घटना यह हुई की इस दौरान ही अचानक बॉस के जीवन में एक गज़ब का भूचाल सा आया। बोस और उनकी पत्नी के बिच में कुछ मनमुटाव की ख़बरें आने लगीं। जो बॉस दिन रात मेहनत कर बिज़नेस लाते थे और हमारे सारे ग्राहक के अति प्रिय थे वह एकदम मुरझा से गए। अब पहले की तरह वह भाग कर ग्राहक की समस्या का समाधान हल नहीं कर रहे थे। सब ग्राहक नाराज होने लगे। ग्राहक एक के बाद एक छुटते गए। देखते ही देखते सेल निचे जाने लगी। मेरा इंसेंटिव भी निचे चला गया। पूरी कंपनी में गजब का मायूस सा वातावरण छा गया। और एक दिन बॉस को उनकी बीबी से तलाक का नोटिस भी आ गया। बॉस की पत्नी बॉस को छोड़ कर चली गयी। बॉस के सपनों का महल जैसे टूट गया। बॉस वैसे ही बड़े संवेदनशील थे। वह इस हादसे से बिखर से गए। अब बॉस अकेले ही उनके बड़े घर में रहते थे।

मुझे मेरा भविष्य अंधकारमय लग रहा था। मुझे तब समझ में आया की मेरी सफलता में मेरे बॉस का कितना बड़ा योगदान था। यही हाल पुरे दफ्तर का था। हम एक असफलता के कगार पर खड़े थे। बात यहां तक पहुँच गयी की हमारी कंपनी के फाइनेंसर हमारी ऑफिस आये और बड़े ही निराश और शायद थोड़े ग़ुस्से में उन्होंने सबके साथ और खास तौर से बॉस के साथ बात की। पर उसके बाद भी बॉस पर उस बात का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। ऑफिस में हम सब को लगने लगा की या तो हम सब की छुट्टी हो जायेगी या फिर कंपनी ही बंद हो जायेगी।

कुछ दिनों तक वैसे ही चलता रहा। बॉस कुछ दिनों तक ऑफिस भी नहीं आये। सब निराश और हतप्रभ हो गए। सब ने मिल कर मुझे कहा की मैं बॉस को समझाऊं की बॉस वापिस अपना काम उसी ताकत और जोश के साथ शुरू करे। मैं बड़ा ही परेशान हो कर यही सोचता रहा की बॉस को इस अंधेरे कुवें में से कैसे निकाला जाए। पत्नी के चले जाने के सदमे से बॉस ने ऑफिस में आना ही बंद कर दिया था।

मैं अगले दिन बॉस के घर गया और बॉस को समझाबुझा कर ऑफिस में तो ले आया। पर बॉस में वह जान नहीं थी। जो बॉस सब लोगों को ऐसे प्यार और दुलार से मिलते थे जैसे वह उनके बड़े की करीबी हों और कई महीनों के बाद मिले हों। पर बॉस जब ऑफिस में आये तो उन्होंने किसी की और एक नजर देखा तक नहीं। जो लड़कियों को "हाय डार्लिंग! हाय बेबी!" बगैरह कह कर प्यार से बुलाते थे वह अब उन लड़कियों को देख कर हँस भी नहीं पा रहे थे। ऐसा लगता था जैसे वह बॉस नहीं बॉस का भूत था।

बॉस ने ऑफिस आने के बाद मुझे दीपा के बारे में पूछा। जब हम दीपा के बारे में बात करने लगे तो मैं हैरान रह गया की बॉस में अचानक ही कुछ जोश का संचार सा हुआ। वह बड़े चाव से मेरी बात सुनने लगे। मुझे लगा की शायद दीपा के बारे में बात करने से उनमें कुछ देर के लिए थोड़ा सा शुमार आया था। वह शुमार ज्यादा देर नहीं टिक पाया। जैसे ही लोग उनको उनकी पत्नी के बारे में पूछने लगे की बॉस फिर हताशा और कुंठा की दशा में चले गए।

उस दिन शाम को अचानक ही मेरे मोबाइल में मेरे बॉस का दीपा के साथ डान्स करता हुआ वीडियो मैंने शूट किया था वह देखा। उस वीडियो में बॉस दीपा के साथ इतने जोश में नजर आ रहे थे। मुझे बॉस के शब्द भी याद आये जो उस पार्टी में डान्स करने के बाद उन्होंने मुझे कहे थे। उन्होंने कहा था, "दीपक तुम्हारी बीबी, मुर्दे में भी जान डाल सके ऐसी काबिल और सेक्सी है। सालों के बाद मैंने इस तरह डान्स किया है। और मुझसे ऐसा डान्स करवाने का श्रेय तुम्हारी पत्नी दीपा को जाता है। वरना मैं ऐसे नाच नहीं पाता।"

अचानक मुझे ख्याल आया की क्यों ना मेरे बॉस को एक बार फिर दीपा से मिलाया जाये? शायद उनमें कुछ जान आ जाये। वैसे मुझे लगता तो नहीं था की ऐसा कुछ होगा, पर कोशिश करने में कोई नुकसान भी तो नहीं था। मुझे घने अँधेरे में आशा की एक किरण नजर आयी। मुझे लगा की शायद बॉस को अपने मूल जोश में लाने की तरकीब मेरे हाथ में लग गयी थी। यह कामयाब हो सकती थी। हालांकि उसमें मुझे मेरी पत्नी की सहायता की जरुरत थी। मैंने उस बात पर काफी मंथन किया और हर बार मेरा निष्कर्ष वही था। अब मुझे यह देखना था की क्या मेरा सोचना सही था या गलत।

उसी दिन रात को मैंने मेरी बीबी को कहा, "बॉस की कुछ समस्याएं हैं और वह तकलीफ में हैं। मुझे लगता है तुम उनकी मदद कर सकती हो।"

 
दीपा मेरी और आश्चर्य से देखने लगी। मैंने कहा, "उस दिन हमें बॉस की जरुरत थी। आज बॉस को हमारी जरुरत है, ख़ास तौर से तुम्हारी मदद की जरुरत है। मेरा मानना है की अगर हम बॉस के जीवन में एक नयी ऊर्जा का संचार कर पाएं तो हम सब के लिए एक नयी जिंदगी होगी। यह बहुत जरुरी है की बॉस को खुश रखने की ख़ास कोशिश की जाए। फिर मैंने दीपा को बॉस के बारे में सारी बातें बतायी और ख़ास कर मेरा जो अवलोकन था की अगर बॉस दीपा के साथ कुछ समय गुजारें तो शायद उनमें वह जोश और जज़्बा धीरे धीरे वापस आ जाय। मैंने दीपा को यह भी बताया की अगर बॉस उस दौर से वापस नहीं आये तो हमारी कंपनी बंद हो सकती है और ख़ास कर मैं बेरोजगार हो जाऊंगा और बॉस के उधार पैसे हम उन्हें चुका नहीं पाएंगे।

मैंने दीपा को कहा की शायद मेरे बॉस को वापस उनकी पुराने जोश में लाने की चाभी दीपा के पास थी। अगर दीपा चाहे तो बॉस को अपनी पुरानी पर्सनालिटी में वापस ला सकती है। दीपा की बात होते ही बॉस की आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती है। दीपा को देखते ही बॉस आवेश में आ जाते हैं, और उनके पुरे बदन में ऊर्जा का संचार हो जाता है। मेरा मानना था की कुछ देर दीपा के संपर्क में आने से बॉस जल्दी ही अपना पुराना फायर पावर पा सकते हैं।

दीपा मेरी बात सुनकर एकदम सोच में डूब गयी। दीपा ने कहा, "ठीक है। मैं समझ गयी। अब तुम यह सब मुझ पर छोड़ दो। मुझे सोचने दो। फिर मैं देखती हूँ की क्या हो सकता है।"

मैंने कहा, "जो तुम कहोगे वह मैं करूंगा। मैं उस काम के लिए कुछ भी करने को तैयार हूँ। अब आगे क्या करना है?

दीपा ने मेरी और तीखी नजर कर देखा और बोली, "अब तुम सब मुझ पर छोड़ दो। सब से पहले तो तुम बॉस को कल घर पर डिनर के लिए यह कह कर बुलाओ की उन्हें खाने पर मैंने ख़ास आग्रह कर बुलाया है। देखते हैं क्या होता है।"

मैंने बॉस से अगले दिन खाने का निमत्रण देते हुए कहा, "दीपा आपको बहोत याद कर रही थी। वह काफी समय से आप से नहीं मिली है ना, तो कह रही थी की सर को खाने पर बुलाओ। तो सर क्या आप हमारे यहां कल रात को खाना खाने के लिए आओगे?"

जैसा मैंने सोचा था वैसा ही हुआ। दुःख के सागर में डूबे हुए बॉस ने जब दीपा का नाम सूना तो उनके चेहरे पर रौनक आ गयी। वह बोल, क्या, दीपा ने बुलाया है? मैं क्यों नहीं आऊंगा? मैं दीपा से मिलकर खुश होऊंगा। मैं जरूर आऊंगा।"

बॉस शाम को आये। दीपा को देखते ही उनके मुरझाये हुए चेहरे पर रौनक आ गयी। दीपा ने उनको गेट पर ही खड़ा कर दिया और उनकी आरती उतारी, उनको तिलक किया और उन पर फूल बरसाए। मेरी पत्नी के कहने पर मैंने उस का वीडियो बनाया। घरमें प्रवेश कर उन्होंने जब हमारे घर की सजावट देखि और बाहर घर के आँगन में घाँस की लॉन में कुर्सी डालकर बैठे तो मुझे उनके चेहरे पर वही पुरानी रौनक दिखाई दी।

बॉस सारी सजावट की तारीफ़ करने लगे। मैंने उन्हें बताया की वह सारी करामात दीपा की थी। यह सुन कर वह बड़े खुश हुए। बॉस दीपा की तारीफों के पूल बाँधने लगे। दीपा की अक्लमंदी, उसकी सुंदरता, उसका भोलापन, कपडे पहनने की काबिलियत बगैरह की बड़ी प्रशंशा की। बॉस ने मुझे कहा की दीपा में एक बड़ी ही सक्षम प्रशासक और व्यवस्थापक होने की क्षमता है। उस समय दीपा का हाल देखने वाला था। दीपा के लाल गाल शर्म के मारे और लाल हो गए। वह बॉस की भूरी भूरी तारीफ़ सुनकर अपना सर ऊंचा नहीं कर पा रही थी। मुझे काफी समय के बाद अंधेरी टनल के दूसरे छोर पर हलकी सी रौशनी दिखाई दे रही थी।

बातचीत करते हुए बॉस ने बताया की उन्हें आइसक्रीम बहोत पसंद है। यह सुन कर दीपा ने फ़ौरन मुझे आइसक्रीम लाने के लिए बाजार में भेजा। आइसक्रीम की दूकान हमारे घर के पास ही थी। मैंने फ़टाफ़ट आइसक्रीम ली और वापस घर पहुंचा।

मैं वहाँ पहुंचा तो मैंने देखा की दीपा रसोई में खाना बनाने गयी थी। उसके पीछे पीछे बॉस भी वहाँ चले गए थे और दीपा के पीछे खड़े खड़े दीपा को देखते हुए दीपा से इधर उधर की बातें कर रहे थे। मैं चुप चाप दरवाजे के पीछे छिपकर सारा नजारा देखने लगा। दीपा जब रसोई में व्यस्त थी तो बॉस रसोई में दीपा की पीछे कुछ दूर खड़े हुए दीपा से इधर उधर की बातें करते करते दीपा की साडी में छिपी हुई सुआकार गाँड़ का घुमाव देख कर अपनी आँखें सेक रहे हुए पाया।

 
दीपा जब अचानक कुछ लेने के लिए मुड़ी तो उसने पाया की बॉस उसके एकदम पीछे खड़े हुए थे। दीपा बॉस को इतने करीब देख कर चौंक गयी और अपने आप को सम्हाल नहीं पायी और लड़खड़ाई तब बॉस ने दीपा की कमर में हाथ डाल कर उसे अपनी बाँहों में उठा कर गिरने से बचा लिया। कुछ देर तक वह दोनों उसी पोज़ में राजकपूर और नरगिस की तरह खड़े खड़े एक दूसरे की आँखों में झांकते रहे। मैंने देखा की बॉस की आँखों में अजीब सी प्यास और काम वासना साफ़ झलक रही थी। दीपा शायद बॉस की आँखों के भाव पढ़ने की कोशिश कर रही थी।

बिना हिले डुले कुछ देर तक ऐसे ही रहने के कारण कमरे में माहौल कुछ गरमा सा गया था। ना तो बॉस ने दीपा की कमर पर से अपनी पकड़ ढिली की और ना ही दीपा ने बॉस के आहोश में से खिसक ने की कोई कोशिश की। कुछ देर तक ऐसे ही रहने के बाद बॉस ने झुक कर दीपा को थोड़ा ऊपर उठा लिया। दीपा के होँठों को अपने होँठ के एकदम करीब ले आये। उन्होंने अपने होँठ दीपा के होँठ पर रखना चाहा तब दीपा अचानक हँस पड़ी और बॉस से कुछ हट कर खड़ी हुई। दीपा बॉस की और देख कर हँसते हुए बोली, "सर आप तो बड़े तेज निकले! इतनी देर में ही कहाँ से कहाँ पहुँच गए!"

मैंने देखा तो मुझे ऐसा लगा जैसे दीपा शर्म के मारे पानी पानी हुई जा रही थी। बॉस अपनी करतूत पर शर्मा कर दीपा से माफ़ी मांगने लगे। बॉस ने कहा, "दीपाजी, आई एम् वैरी सॉरी। मुझसे गलती हो गयी। मैं कुछ परेशानी में हूँ ........ मैं अपने आप पर नियत्रण नहीं रख पाया। मुझे माफ़ करना।"

यह कह कर वह चुप हो गए। बॉस की आँखों में आंसूं भर आये। बॉस के चेहरे पर फिर वही दुःख की सियाही छा गयी। वह वहाँ से निकल कर दीपा से दूर जब बाहर बरामदे की और जाने लगे तो दीपा ने लपक कर उनका हाथ थाम लिया और उनको बाहर जाने से रोका। बॉस दीपा की और देखने लगे।

हमारी रसोई और डाइनिंग रूम जुड़ा हुआ था। दीपा ने बॉस को एक कुर्सी पर बिठाया और खुद उनके सामने खड़ी हुई। दीपा की छाती में फुले हुए उरोज बॉस की आँखों के ठीक सामने थे। मैं देख रहा था की बॉस की आँखें वहीँ गड़ी हुईं थीं। दीपा ने बॉस की आँखों को अपनी छाती मर टकटकी लगाए हुए पाया तो थोड़ी सी सहम कर अपनी चुन्नी छाती पर बिछाती हुई बोली, "सर कोई बात नहीं। आप मुझे अपना समझिये। आप इतने परेशान क्यों हैं? बताइये ना क्या बात है जिसे कहने से आप इतना हिचकिचाते हैं? मुझे नहीं बताएंगें?"

जब बॉस ने यह सूना तो वह कुर्सी पर लुढ़क से गए और बोले, "दीपाजी, मैं ना सिर्फ आप और दीपक पर, और ख़ास कर आप पर बहोत विश्वास करता हूँ; बल्कि मैं आप की काबिलियत और व्यवस्थापक क्षमता का भी मुरीद हूँ। मैं आप को वाकई में अपना समझने लगा हूँ। मैं आप को भला क्यों नहीं बताऊँगा? पर सबसे पहले तो मैं इस लिए बहोत दुखी हूँ की मैं तो आप को अपना समझता हूँ पर आप मुझे अपना नहीं समझतीं। क्यों की आप मुझे सर कहकर बुलाती हो। सर कहने से अपनापन खतम हो जाता है। मेरा नाम सोम है। आप मुझे सोम कह कर बुला सकती हैं।"

दीपा ने फ़ौरन कहा, "यह तो उलटी गंगा हो गयी। आप मुझसे उम्र, ओहदे और समझदारी में बड़े हैं। आप क्यों मुझे दीपाजी अथवा 'आप' कह कर बुला रहे हो? मुझे आप 'आप' कह कर मत बुलाओ। तुम या दीपा बल्कि तू भी कहेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा। मैं आपको सर भी नहीं कहूँगी और सोम भी नहीं कहूँगी। मैं आपको सोमजी कहूँगी। अब आप मुझे बताइये की आप इतने परेशान क्यों हैं? आपकी इतनी परेशानी है तो आपने हमें पराया क्यों समझा? क्या आप हमें बता नहीं सकते थे?"

बॉस ने कहा, "फिर तुम भी मुझे आप कह कर हमारे बिच की दूरियां मत बढ़ाओ। अब तुम भी मुझे तुम या सोमजी कह कर बुलाओ।"

दीपा ने कुछ नकली अकड़ दिखाते हुए कहा, "नहीं मैं आपको तुम नहीं कह सकती। मैं आपसे हर नाप दंड में छोटी हूँ। मैं आप को आप ही कहूँगी। जहां तक दूरियां नहीं बढ़ाने की बात है तो लो मैं आपके एकदम करीब खड़ी हो गयी। अब कोई दूरियां नहीं बस?" ऐसा कह मेरी बीबी मुस्का कर बॉस के बिलकुल सामने जा कर खड़ी हो गयी। दीपा के फुले हुए अल्लड़ बॉल बॉस की नाक को लगभग छू रहे थे।

बॉस ने बिना कुछ सोचे समझे अपनी बाँहें दीपा की कमर के इर्दगिर्द लपेट कर दीपा को अपनी और खींचा और अपनी बाँहों में ले लिया। दीपा के होँठों पर अपने होँठ रखते हुए बोले, "दीपा, पहले तुम यह कहो की तुमने बुरा नहीं माना और मुझे माफ़ कर दिया।"

यह कह कर बॉस ने दीपा के रसीले होँठों पर अपने होँठ चिपका दिए और वह दीपा को किस करने लगे। कुछ पलों तक दीपा मंत्रमुग्ध सी खड़ी रही। उसकी समझ में नहीं आया की वह क्या करे। फिर धीरे से बॉस को धक्का दे कर बॉस के बाहुपाश से अपने आप को छुड़ाया और कुछ दूर खड़ी रहकर अचानक फिर हँस पड़ी और बोली, "अरे कमाल है! पहले किस करते हो और फिर कहते हो माफ़ करो? गुनाह भी करते जाते हो और माफ़ी भी मांगते रहते हो? बॉस, सॉरी सोमजी, आप बड़े चालु हो, पर हो बड़े हैंडसम! कोई बात नहीं। चलो माफ़ कर दिया पर सोमजी, मैंने तुम्हें रोका क्यूंकि वह आते ही होंगे। ऐसा मत करो, कहीं पकडे ना जाएँ। मैं तुम्हें मेरे पति के सामने शर्मिन्दा या लज्जित नहीं देखना चाहती।"

क्या दीपा बॉस को साफ़ साफ़ सन्देश दे रही थी की अगर उसे यह डर नहीं होता की कोई देख लेता तो शायद वह विरोध नहीं करती?
 
बॉस ने कहा, "दीपा, आई एम् रियली सॉरी। तुम मेरी कहानी सुनना चाहती हो ना? तो सुनो। मैं अपनी क्या बताऊँ? कहते हुए बहोत दुःख होता है। शिखा (बॉस की बीबी का नाम शिखा था) पिछले एक महीने से घर छोड़ कर चली गयी है और अब वह वापस ही नहीं आएगी। उसने मुझे तलाक का नोटिस भेज दिया है। मैंने कभी लीगल लड़ाइयां नहीं लड़ीं। मैं बहोत परेशान हूँ और अकेला महसूस कर रहा हूं। क्या करूँ? तुम्हारी सहानुभूति भरा प्रेम देख कर मुझ से रहा नहीं गया और तुम्हें इतने करीब देख कर मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और आप को छूने की घृष्टता कर बैठा।"

बॉस के चेहरे पर हताशा और परेशानी साफ़ झलक रही थी और उनकी आँखों में आँसू छलक रहे थे। दीपा यह देख कर परेशान हो गयी। दीपा बॉस के सामने दूसरी कुर्सी पर बैठ गयी और एक हाथ से बॉस का हाथ पकड़ा और दूसरे हाथ से बॉस के आँसूं अपनी उँगलियों से पोंछते हुए बोली, "इतनी बड़ी कंपनी के मालिक और ऐसी जिंदगी की कस म कस पर ऐसे मायूस हो कर आंसूं बहाते हो? आपके आंसूं बड़े कीमती हैं। उन्हें वेस्ट मत कीजिये। और हाँ, अगर आप मुझे "आप" कहेंगे तो मैं आप से नहीं बोलूंगी।"

बॉस ने दीपा के हाथ को अपने हाथों में पकड़ कर बोले, "दीपा मैं अभी से आगे तुम्हें आप नहीं कहूंगा बस कसम। पर तुम भी वादा करो की तुम मुझे तुम कह कर बुलाओगी। और मुझे यह मत जताओ की मैं तुमसे बड़ा हूँ।"

दीपा ने अपने कान पकडे और बोली, "अब मुझे माफ़ करोगे? आगे से मैं तुम्हें आप कह कर नहीं बुलाऊंगी। तुम या फिर सोमजी कह कर बुलाऊंगी। बस? और जहां तक तुम्हारी घृष्टता का सवाल है तो मैं कहूं की मुझे तुम्हारी हरकत से कतई भी बुरा नहीं लगा। अपनों से प्यार जताने में कोई बुराई नहीं। प्यार के जोश या आवेश में ऐसा अक्सर हो जाता है। मैं समझ सकती हूँ। मैं तुम्हें अपना अंतरंग मित्र समझती हूँ इस लिए तुम ने जो किया उसके लिए तुम अपने आप को दोषी मत समझो।"

फिर मेरी पत्नी ने अचानक ही आगे बढ़ कर बॉसके कान पकड़ कर पूछा (जब मैंने यह देखा तो मेरी जान हथेली में आ गयी), "अंतरंग का मतलब समझते हो? मैं बताती हूँ। इसे याद रखना। अंतरंग माने जो अपने अंतःकरण के अंग जैसा हो। जिससे कोई भी, मतलब कोई भी, बात की जा सकती है; फिर वह चाहे सेक्स की हो या कोई और समस्या की हो या कोई और कितनी प्राइवेट या गुह्य क्यों ना हो। इसमें प्रिय, प्रियतम, पति, पत्नी (अगर उनमें गहरी आत्मीयता हो तो) या गहरा दोस्त भी आता है, उसे अंतरंग कहते हैं। इस में पिता, माँ, बेटी, भाई या बहन नहीं आते, हालांकि वह बहोत ही प्यारे होते हैं; क्यूंकि इन संबंधों में कुछ बंदिशें हैं। खून के रिश्तों में होती हैं। तुम सोमजी, मेरे अंतरंग हो और मैं भी तुम्हारी अंतरंग हूँ। हम कोई बाप बेटी या भाई बहन तो है नहीं। हमारे बिच ऐसी कोई बंदिशें नहीं की तुम मुझसे माफ़ी मांगो। तुमने मुझे छूकर कोई घृष्टता नहीं की। रिलैक्स! आवेश में ऐसा हो जाता है। बस मैं सिर्फ मेरे पति के आने से डर रही थी। मैं नहीं चाहती की तुम मेरे पति के सामने अपने आपको छोटा महसूस करो।"

दीपा की बात सुनकर बॉस की आँखों में एक अजीब सी चमक आ गयी। बॉस को डर था की कहीं दीपा उनकी हरकत से नाराज या गुस्सा ना हो जाए।

दीपा ने बॉस के हाथों की उँगलियों से खेलते हुए पूछा, "सोमजी पर ऐसा क्या हुआ? शिखाजी के साथ कुछ बोलचाल हुई थी क्या?"

शिखा का नाम सुनते ही बॉस के चेहरे पर वही दुःख की सियाही छाने लगी। पर फिर भी बॉस ने कहा, "दीपा यह लम्बी कहानी है। कहानी सब को पता है। तुम मुझसे पूछ कर मेरे घाव ताजा मत करो। मैं उसे भूल जाना चाहता हूँ। मुझे उसकी याद मत दिलाओ। शिखा के पिता हमारी कंपनी में इन्वेस्टर थे। मुझसे प्रभावित हो कर उन्होंने मेरी शिखा के साथ शादी करने का प्रस्ताव रखा। शायद पिता की बातों में आकर शिखा ने भी मान लिया। पर अब मुझे लग रहा है की मैंने शिखा से शादी कर के भारी गलती कर दी थी। शिखा के मन में मेरी कोई हैसियत नहीं थी। वह सिर्फ एक रईस बाप की बेटी थी। वह पूरी तरह से मेरी पत्नी बनाना ही नहीं चाहती थी। नाही उसमें मेरे लिए प्यार था और नाही उसने हमारी शादी को सफल बनाने की कोशिश की। पर फिर भी मैंने उसे मेरा सब कुछ दिया।
 
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