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हंग्री वुल्फ गेम (इंसान या भूखे भेड़िए ) complete

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हंग्री वुल्फ गेम (इंसान या भूखे भेड़िए )

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[COLOR=#4000BF] भूख जब हद से बढ़ जाए तो उसे मिटाने के तरीके अक्सर अजीब ही होते हैं. फिर ना तो कुछ सही होता है, और ना ही कुछ ग़लत... दरिंदगी की कोई हद नही होती, बस जो सामने आए उसे खाते चले जाओ.

हंग्री वुल्फ गेम शुरू हो चुका था. भूखे भेड़िए की तरह सब नज़र गढ़ाए थे. जल्द ही कुबेर का पिटारा खुलने वाला था, और किस के हिस्से मे क्या गया वो पता चलना था.

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एक कुत्ता अपने परिवार के साथ विचरण कर रहा था. साथ में कुतिया थी, उसकी पत्नी, और छोटे–बड़े कई बच्चे भी. जिनमें तीन नर थे, बाकी मादा. परिवार के छोटे बच्चे अपने स्वभाव के अनुसार रास्ते में शरारत करते हुए चल रहे थे. कुत्ता कभी उन्हें फटकारता, कभी पीठ थपथपाकर आगे बढ़ने का हौसला देता.

व्यस्त चैराहा पार करने के बाद जैसे ही वे एक बस्ती में घुसे, छोटे बच्चे वहां बड़े–बड़े, शानदार मकानों को देखकर हैरान रह गए.

‘मां, क्या हम कुछ दिनों तक यहां नहीं रह सकते?’ एक बच्चे ने पूछा.

‘नहीं मेरी बच्ची, यह बस्ती हम जैसों के लिए नहीं है?’ मां ने सहजभाव से उत्तर दिया.

‘क्या इन लोगों को कुत्तों से कतई प्यार नहीं है?’

‘ऐसा नहीं है, इनमें से अधिकांश घरों में कुत्ते हैं, जिन्हें उनके मालिक खूब प्यार करते हैं—और उनको अपने घर की शान समझते हैं. लेकिन वे हमसे अलग हैं.’

‘जब कुत्ते हैं तो हमसे अलग कैसे हुए मां?’ दूसरा बच्चा बोला. फिर तो उस बहस में दूसरे बच्चे भी शामिल हो गए.

‘मैंने सुना है कि आदमी जाति–पांति में विश्वास करता है, क्या हम कुत्तों में भी…’

‘हम जानवर है बेटा, अपने मुंह से आदमी की बुराई कैसे करें…’ कुत्ता जो अभी तक चुप था, बोला.

‘साफ–साफ क्यों नहीं कहते कि आदमी के साथ रहते–रहते कुत्ते भी जातियों में बंट चुके हैं.’ कुतिया सहसा उग्र हो उठी.

‘मैंने उन्हें देखा है, वे हमसे अलग हैं. उनमें से कोई भेड़िये के डीलडौल वाला, बहुत ही डरावना है. कोई एकदम खरगोश के बच्चे जैसा, छोटा, नर्म–मुलायम सफेद–झक्क बालों वाला, जो सिर्फ ‘कूं–कूं’ करना जानता है. फिर भी आदमी उन्हें बहुत प्यार करता है.’ बड़े बच्चे ने कहा.

‘भेड़िये जैसे डीलडौल वाला तो ठीक है. चोर–उच्चके उसको देखते ही घबरा जाते होंगे. लेकिन खरगोश के बच्चे जैसा कुत्ता पालने की कौन–सी तुक है. उनसे अधिक रखवाली तो मैं भी कर सकता हूं.’ एक बच्चे ने ताल ठोकी.

‘बेटा, ऐसे कुत्ते रखवाली के लिए नहीं पाले जाते….’ कुत्ता धीर–गंभीर स्वर में बोला.

‘तो फिर…?’ एक साथ कई बच्चे बोल पड़े.

‘बड़े आदमियों का अहम् उनसे भी बड़ा होता है बेटा. वही उनके भीतर डर बनकर समाया होता है. इसी कारण वे अपने भीतर इतने सिमट जाते हैं कि उनके लिए पड़ोसियों से बात करना तो दूर, परिवार के सदस्यों के बीच आपस में संवाद करने का भी समय नहीं होता. बाहर से तने–तने नजर आने वाले वे लोग भीतर से एकदम अकेले और वीरान होते हैं. पालतू कुत्ते उनके खालीपन को भरने के काम आते हैं.’

‘मां तू इस बस्ती से जल्दी बाहर निकल. जो आदमी अपनों का सगा नहीं है, वह हम कुत्तों के साथ क्या संबंध निभाएगा.’ एक पिल्ला घबराया–सा बोल पड़ा.

‘मुझे तो इन आदमियों के साथ–साथ यहां के कुत्तों पर भी तरस आ रहा है, जो आदमी की गोदी में पड़े–पड़े चुपचाप किकयाते रहते हैं. मन होने पर किसी पर भौंक भी नहीं सकते…’ दूसरे पिल्ले ने कहा.

’गुलाम कहीं के…‍’ दूसरे ने साथ दिया और आसमान की ओर मुंह करके जोर–जोर से भौंकने लगा.

कुत्ता–कुतिया बिना कुछ कहे, दूसरी ओर मुड़ गए.


कुछ अंश/////////////////

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कुत्ते का मन बस्ती से ऊबा तो सैर–सपाटे के लिए जंगल की ओर चल पड़ा. थोड़ी ही दूर गया था कि सामने से यमराज को आते देख चौंक पड़ा. भैंसे की पीठ, चारों पैर, पूंछ, सींग और माथा सब तेल और सिंदूर से पुते हुए थे. तेल इतना अधिक कि बहता हुआ खुरों तक पहुंच रहा था. कुत्ता देखते ही डर गया—

‘लगता है मेरी मौत ही मुझे जंगल तक खींच लाई है. हे परमात्मा! मेरे जाने–अनजाने पापों से मुक्ति दिला.’ कुत्ते ने प्रार्थना की और एक ओर खड़ा होकर यमराज के रूप में अपनी मौत के करीब आने की प्रतीक्षा करने लगा.

‘प्रणाम महाराज!’ निकट पहुंचते ही कुत्ते ने यमराज की अभ्यर्थना की. यमराज आगे बढ़ते गए. उसकी ओर देखा तक नहीं.

‘शायद किसी ओर के लिए आए है, मैं तो व्यर्थ ही डर गया…’ कुत्ते का बोध जागा. उसने सुन रखा था कि यह यमराज नामक देवता बड़ा बेबस होता है. सिवाय उसके जिसकी मौत आ चुकी है, यह किसी का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता. च्यूंटी को भी ले जाना हो तो ऊपर का आदेश चाहिए. इस बोध के साथ ही उसका कुत्तापन हहराने लगा. एक लंबी–सी सांस भीतर खींच उसने गले को जांचा–परखा और जोर से भौंकने लगा. यमराज तो नहीं पर उनका भैंसा बिदक गया—

‘मूर्ख कुत्ते शांत हो.’ यमराज ने कंधे पर रखी गदा हिलाई. कुत्ता उसकी विवशता से परिचित था. जानता था कि गदा चला ही नहीं सकते, गदा चलाई और कहीं प्राण निकल गए तो इन्हें लेने के देने पड़ जाएंगे. सो यमराज की गदा से डरे बिना बोला—‘महाराज! वर्षों से इस भैंसे को बोझ मारते आ रहे हो, अब तो इस बूढ़े पर तरस खाएं. कुछ न हो तो एक नैनो ही ले लीजिए.’

जैसे किसी ने यमराज की दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. यमराज के दिल की व्यथा उनके चेहरे पर आ गई. तेल पुती दिपदिपाती देह की चमक फीकी पड़ने लगी. धरती पर प्राय: रोज ही आना पड़ता है, पर यहां सब डरते हैं. बात करना तो दूर कोई चेहरा भी देखना नहीं चाहता. ऊपर देवता उनके विभाग के कारण ढंग से बात नहीं करते. कुत्ते को बात करते देख मन के सारे जख्म हरे हो गए—

‘मेरा बस चलता तो कभी का ले लेता. एक सेठ जो हर मिनट लाखों कमाता था, सिर्फ एक घंटे की मोहलत के बदले मर्सडीज देने को तैयार था.’

‘तो ले लेते…कह देते कि भैंसे के पैर में मोच आ गई थी. हम जैसे प्राणियों को, मौत के बाद ही सही, मर्सडीज में सफर करने का आनंद तो मिलता…’

‘प्राणियों की आत्मा उनकी देह से ठीक समय पर खींच ली जाए, जिससे लोगों में डर बैठा रहे. सोमरस में डूबी अमरपुरी को इससे अधिक चिंता नहीं होती. लेकिन देवताओं की आचारसंहिता…’

‘देवताओं की आचारसंहिता?’ यमराज कहते–कहते रुके तो कुत्ते ने कुरेदा.

‘उसमें लिखा है कि देवता अपने घरों में चाहे जो रंग–रेलियां मनाएं, जैसा चाहें खाएं–पिएं, नंगे–उघाड़े रहें, लेकिन सार्वजनिक स्थल पर अपनी छवि का पूरा ध्यान रखें, टस से मस होते ही देवत्व छिन जाता है.’

‘जरा अपने भैंसे की हालत तो देखिए, त्वचा रोग से पीड़ित है. आप भी छूत से परेशान दिखते हैं!’

‘ठीक कहते हो, कुछ महीनों से हम दोनों स्कर्बी से ग्रसित हैं.’ यमराज अपना पेट खुजाने लगे.

‘तो कम से कम भैंसा ही बदल लीजिए.’

‘बहुत खोजा, पर हू–ब–हू ऐसा भैंसा तीनों लोकों में कहीं नजर नहीं आया…’

‘तब तो बाकी जिंदगी इसी भैंसे पर काटनी पड़ेगी, क्यों?’ कुत्ते ने कटाक्ष किया.

‘देवता हूं, बदल नहीं सकता.’ कहते हुए यमराज ने भैंसे को इशारा किया. हिलता–डुलता भैंसा आगे रेंगने लगा. इस बीच न जाने कहां से इधर–उधर से मक्खियां आकर भैंसे के घावों पर मंडराने लगीं.

‘गंदा है, पर धंधा है’— मृत्यु देवता की हालत देखकर कुत्ता मुस्कुराया और आगे बढ़ गया.


 
50 मंज़िली आलीशान इमारत के टॉप फ्लोर पर, एमडी के ऑफीस मे.....

"गुड मॉर्निंग सर, आज आप काफ़ी परेशान दिख रहे हैं"...... स्नेहा ने कुछ फाइल्स इधर-उधर करते, अपने बॉस जूनियर एमडी मनु से कही.

मनु अपना सिर उपर उठा कर उसे देखा, और फिर अपना काम करने लगा..... दोनो शांति से अपना करने मे लग गये. कुछ देर बाद स्नेहा सामने के चेयर पर बैठ कर पेपर वेट को गोल-गोल घुमाने लगी.

मनु.... स्टॉप इट स्नेहा, और कॉफी बुलवाओ.

स्नेहा..... एस सर...

(पता नही बॉस का आज मूड उखड़ा-उखड़ा क्यों है) ... स्नेहा अपने मन मे सोचती चुप-चाप अपना काम करने लगी. मनु को कभी आज से पहले इतना शांत नही देखी, हरदम वो खिला-खिला ही रहता था.

थोड़ी देर बाद पीयान दो कप कॉफी ले कर आया. स्नेहा एक बार फिर मनु के सामने चेयर पर बैठ कर कॉफी पीने लगी. मनु की ओर से कोई प्रतिक्रिया ना होने पर, स्नेहा ने एक कागज का टुकड़ा उसकी ओर उछाला.

मनु..... विल यू स्टॉप दीज़ नोन-सेन्स स्नेहा....

स्नेहा अपने जगह से उठ गयी, और मनु के चेयर के पास जा कर, उसके रोलिंग चेयर को थोड़ा पिच्चे की, और ठीक सामने उपर डेस्क पर बैठ गयी.

22 साल की एक बेहद खूबसूरत बाला, जिसके चेहरे की कशिश इस कदर थी कि लड़के मूड-मूड कर देखने पर मजबूर हो जाए. उस पर से, जब वो रोज आग लगाने वाले पोशाक मे आती...... घुटनो से 5 इंच उपर के टाइट स्कर्ट, जिसमे उसकी कसी मांसल जंघें बिल्कुल झलकती रहती, और उपर उसके वो शरीर से चिपके बिल्कुल टाइट शर्ट, जिसमे उसके स्तन के आकार सॉफ पता चलते थे.

देखने वाले जब भी उसको इस हॉट लुक मे देखते तो अपने दिल पर हाथ रख कर ठंडी आहें भरने लगते थे. हालाँकि ये बात अलग थी कि ऑफीस के वर्किंग स्टाफ्स और एमडी फ्लोर अलग-अलग था, इसलिए ऑफीस के मनचले स्टाफ को जब भी स्नेहा को देखना होता तो बस किस्मत के भरोसे ही रहते.

वहीं स्नेहा का बॉस मनु मूलचंदानी, 25 साल का एक यंग और डाइयेनॅमिक पारसनालटी था. दिमाग़ से बिल्कुल शातिर और पूरा धूर्त था. उसके कुटिल सी हँसी के पिछे का राज पता कर पाना किसी के बस की बात नही थी.

जितना मनु शातिर उतने ही दिमाग़ वाली स्नेहा भी थी, और जब से इन दोनो का साथ हुआ था, कयि कारनामे अंजाम दे चुके थे.

स्नेहा, ठीक सामने डेस्क पर बैठ कर, अपने सॅंडल के हील को मनु के लंड पर रख कर उससे प्रेस करने लगी.....

मनु.... स्नेहा प्लीज़ डिस्ट्रब मत करो अभी मेरा मूड ऑफ है.

स्नेहा.... उसी ऑफ मूड को तो ऑन कर रही हूँ बॉस.... कम-ऑन अब मूड मे आ भी जाओ.

स्नेहा, इतना कहती हुई अपनी हील थोड़ा अंदर की ओर पुश कर दी..... "उफफफफफफफफ्फ़" करते हुए मनु ने उसे कमर से पकड़ा और डेस्क के नीचे उतरने लगा. लेकिन स्नेहा डेस्क को ज़ोर से पकड़ ली और नीचे नही उतरी.

 
मनु हार कर स्नेहा की तरफ देख कर कहने लगा..... "मूड नही बेबी अभी, दो महीने बाद, काया के बर्तडे पर दादा जी वसीयत डिक्लेर करेंगे, और इधर मेरे बाप ने मेरा पत्ता सॉफ कर दिया".

स्नेहा, के हिल्स अब भी मनु के लंड पर थे, और उसे वो धीरे-धीरे प्रेस करती, अपने हाथों से अपनी शर्ट के बटन खोली, अपने ब्रा को बाहर निकालती, वो जा कर मनु के चेयर पर, अपने दोनो पाँव दोनो ओर लटका कर बैठ गयी.

"क्यों टेंशन लेते हैं सर, चिंता से कुछ हासिल नही होगा".... इतना कह कर स्नेहा ने मनु के हाथ को अपने शर्ट के अंदर डाल दिए, और होंठो से होंठो को चूसने लगी. मनु चिढ़ कर पूरी ताक़त से उसके बूब्स को दबा कर निचोड़ दिया....... "मेरा दिमाग़ काम नही कर रहा, और तुम्हे मस्ती चढ़ि है"

स्नेहा दर्द और मज़े मे पूरी तरह तड़प गयी..... "उफफफफफफफ्फ़, मनु... मर गयी..... पूरी ताक़त झोक दिए..... रूको अभी दिमाग़ ऑन करती हूँ तुम्हारा."

स्नेहा चेयर से उतर कर नीचे बैठ गयी, और मनु की बेल्ट को खोल कर उसके पैंट को घुटनो मे ले आई, और उसके शांत लंड को उलट-पलट कर देखने लगी. जैसे स्नेहा का हाथ मनु के लंड पर गया, उसके मूह से ठंडी "आआहह" निकल गयी, और वो खुद को ढीला छोड़ दिया.

स्नेहा ने मूह खोला और बॉल्स की जड़ पे जीभ टिकाती हुई, उसे नीचे से उपर तक चाट'ती चली गयी..... "ओह बाबयययी.... प्लीज़्ज़ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज्ज रहने दो".... सिसकारियाँ निकालता मनु जैसे स्नेहा से अर्जी कर रहा हो.

पर स्नेहा नही मानी और अपनी लार को लंड पर टपकाती, उसे चाट'ती रही. स्नेहा की जीभ पड़ने से लंड हल्के-हल्के झटके ख़ाता अपना आकार लेने लगा... स्नेहा अपना बड़ा सा मूह खोली और लंड को मूह मे ले कर पूरा अंदर घुसा लिया.

मनु... "उफफफफफफफ्फ़" करता उसके सिर को ज़ोर से पकड़ कर तेज़ी से हिलने लगा..... वो भी अपने फुल मूड मे आ गया. तभी बेल बजी और बाहर से एक आवाज़ आई... "क्या मैं अंदर आ सकता हूँ"

मनु की आखें बड़ी हो गयी, और वो नीचे देखने लगा....

स्नेहा, लंड को मूह से निकालती हुई कहने लगी.... "बुला लो" ... इतना कह कर वो जल्दी से डेस्क के नीचे घुसी, और चेयर को अंदर तक खींच ली. मनु का पेट बिल्कुल डेस्क के किनारे से लगा था, और नीचे कुछ देख पाना किसी के बस की बात नही...

मनु.... यस अंकल आ जाइए....

मनु के पापा हर्षवर्धन के दोस्त और कंपनी बोर्ड ऑफ डाइरेक्टर्स मे से एक, रौनक गुप्ता, अंदर आते ठीक उसके सामने बैठ गये....

मनु..... कहिए अंकल कैसे आना हुआ....

मनु ने इधर सवाल पुछा, और उधर नीचे बैठी स्नेहा ने, लंड की चमड़ी को ज़ोर से पीछे करती, जीभ को उसके टॉप से लगा कर गोल-गोल फिराने लगी. मनु का चेहरा वासना की आग मे तप कर खिंच गया... सामने रौनक अंकल और नीचे लंड पर स्नेहा मेहरबान थी.

रौनक..... मेरे पास तुम्हारे लिए एक प्रपोज़ल है....

मनु..... "आहह, काअ.. कैसा प्रपोज़ल"

 
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