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घर वापस आने में अपना ही आनंद है। नाना, दादा और दादीजी ने दिल भर कर चूमा जैसे मैं एक हफ्ता नहीं बाद मिल रही थी। दोनों मामा भी प्रेम दिखने से नहीं थके।
घर वापस आने पर थोड़ी देर तक तो मम्मी और बुआ ने खूब प्यारा चूमा फिर सुशी बुआ ने टांग खींचनी शुरू कर दी, "क्या हुआ नेहा बिटिया। क्या अकबर भैया ने काफी काम करवाया ? इतनी चाल तो मेरी कभी भी ख़राब नहीं हुई। मुझे लगता है आदिल बेटे ने ज़रूर टेनिस के खेल खेल में ज़ोर के शॉट मार दिए होंगे? "
मैं शर्मा कर लाल हो गयी ,"बुआ आप भी ना क्या क्या बोल जाती हैं। आपने ही तो ज़रूरी काम की लिस्ट थमाई थी। टेनिस केहेलने का तो टाइम ही नहीं मिला। "
मैं अपनी बुद्धूपने पर और भी शर्मा गयी। मम्मीमन्ड मंद मुस्करा रहीं थीं।
"चल तू आज मेरे साथ सोना। मुझे सब सुनना है की अकबर, शब्बो, नूसी आदिल, शानू कैसे हैं ," सुशी बुआ मुझसे आखें मटकाते हुए बोलीं।
"भाई मुझे गोल्फ के बाद थकन हो रही है ,"दादीजी बोलीं पर उनकी आँखें प्यार से अपने बेटे को निहार रहीं थीं।
"मम्मी चलिए मैं आपकी मालिश कर दूंगा ," पापाजी प्यार से बोले और अपनी मम्मी कके साथ अपने सुइट की ओर अग्रसर हो गए।
अब मुझे सुशी बुआ की कहानी याद आयी। पापाजी और दादी जी के इकठ्ठे प्यार करने के ख्याल से ही माओं रोमांचित हो गयी। माँ बेटे के अनुचित अगम्यगमनी प्यार सबसे वर्जित होता है और इसी लिए उतना ही मीठा और आनंददायी होता है।
दादा जी ने नानाजी जी से कहा, "रूद्र चल यार कुछ गेम हो जाएँ चैस के ? सुनी सुबह से हराने का एलान कर रही है को। "दादा जी ने प्यार से अपनी बहु को निहारा।
"सुनी बेटा हम दोनों थोड़े बूढ़े सही पर दोनों मिल गए तो जीतना मुश्किल है तुम्हारा ," नानाजी रूपवती बेटी की और देख कर मुस्कराते हुए कहा।
"पापाजी कोशिश तो ज़रूर करूंगी। और यहाँ कौन बूढ़ा है। बूढ़े होंगे आपके और बाबूजी के दुश्मन। और फिर कुछ हार तो जीतने से भी मधुर होतीं हैं। " मम्मी ने अपने पिताजी और ससुर जी का हाथ थाम लिए उनके कमरे की ओर जाते हुए।
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"चल अब नेहा मेरे साथ विस्तार से बता सारे हफ्ते की दास्तान ," सुशी बुआ ने मुझे उठाते हुए कहा , "और सुनिए जी आप और जेठजी जल्दी से आइये। आपको नहीं सुन्नी हमारी नेहा के अद्भुद कारनामे ?"
बड़े मां और छोटे मामा लपक कर खड़े हो गए। बड़े मामा ने मुझे बाँहों में उठा लिया ," भाई वाकई नेहा बिटिया , तुम्हारी चल तो वाकई दर्दीली से दिख रही है। "
"बड़े मामू , आदिल भैया और अकबर चाचू के मूसल साड़ी रात सहने पड़े तो किसी भी लड़की की चाल दर्दीली हो जाएगी," मैंने बड़े मां के कटाक्ष का जवाब बेहरमी से दे तो दिया पर जैसे ही छोटे मामा के ऊपर नाज़ा पड़ी तो शर्म से लाल हो गयी।
"अरे शर्मा क्यों रही है। कमरे में पहुँचते ही अपने छोट मामा से भी दोस्ती कर लेना।," सुशी बुआ ने मेरा और भी मज़ाक बनाया।
कमरे में बुआ हम सबको लाल मदिर के गिलास बनाये और एलान किया ,"चलिए आप दोनों अपनी भांजी के कपडे उतरिये। उसका किस्सा कपडे पहन कर नहीं ," शर्माती तो रही पर बड़े मामा और छोट मामा ने मेरा कुरता उतार दिया। मैंने ब्रा नहीं पहनी थी। बड़े मामा ने सलवार का नाड़ा खोल कर सलवार ही नहीं मेरा जांघिया भी उतर फेंका।
"चल अब इन्तिज़ार किस बात का है। अपने छोटे मामा के कपडे उतार नेहा। जब तक मैं अपने प्यारे जेठजी का ख्याल करतीं हुँ। " सुशी बुआ ने बड़े मामा को वस्त्रहीन करने में बहुत देर नहीं लगायी।
मैंने भी शर्म का आँचल छोड़ कर छोटे मामा का कुरता पजामा उतार दिया। छोटे मामा ने बड़े मामा की तरह पाजामे के नीचे कच्चा नहीं पहना था। उनका दानवीय लंड हाथी की सूंड की तरह उनकी विशाल बालों से भरी जांघों के बीच लहरा रहा था।
"अरे नेहा क्या नाटक कर रही है। अब तक तेरे छोटे मामू का लंड तेरे मुंह में क्यों नहीं है। जल्दी से तैयार कर अपने छोटे मामू का लंड। मुझे अकबर भैया के घर में हुए तेरे कारनामों की कहानी सुननी है ," सुशी बुआ ने मुस्करा कर तना मारा और अगले क्षण उनका मुँह बड़े मामा के मोटे लंड से भर गया।
मैंने भी थोड़ा सा , बस थोड़ा सा ही, शरमाते हुए छोटे मामू का भारी भरकम लंड के सेब जैसे मोटे सुपाड़े को मुश्किल से अपने मुंह में ले लिया। मुश्किल से जगह बची थी मेरे मुँह में अपनी जीभ को उनके सुपाड़ी को सहलाने के लिए। मैं अपने नन्हे हाथों से उनके मुस्टंड होते लंड के खम्बे को सहलाते हुए अपने छोटे मामू की लंड को अपनी आफत बुलवाने के लिए तैयार करने लगी। बड़े मामू और छोटे मामू के लंड कुछ ही क्षणों में प्रचंड हो चले थे। उनके भीमकाय पुरुषत्व विज्ञप्ति के हथियार अपनी छोटी बहु और नन्ही भांजी की निर्मम पर अगम्यागमनी वासनामयी चुदाई के लिए न केवल तैयार थे पर हिंसक ठर्राहट से चुनौती से दे रहे थे।
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घर वापस आने में अपना ही आनंद है। नाना, दादा और दादीजी ने दिल भर कर चूमा जैसे मैं एक हफ्ता नहीं बाद मिल रही थी। दोनों मामा भी प्रेम दिखने से नहीं थके।
घर वापस आने पर थोड़ी देर तक तो मम्मी और बुआ ने खूब प्यारा चूमा फिर सुशी बुआ ने टांग खींचनी शुरू कर दी, "क्या हुआ नेहा बिटिया। क्या अकबर भैया ने काफी काम करवाया ? इतनी चाल तो मेरी कभी भी ख़राब नहीं हुई। मुझे लगता है आदिल बेटे ने ज़रूर टेनिस के खेल खेल में ज़ोर के शॉट मार दिए होंगे? "
मैं शर्मा कर लाल हो गयी ,"बुआ आप भी ना क्या क्या बोल जाती हैं। आपने ही तो ज़रूरी काम की लिस्ट थमाई थी। टेनिस केहेलने का तो टाइम ही नहीं मिला। "
मैं अपनी बुद्धूपने पर और भी शर्मा गयी। मम्मीमन्ड मंद मुस्करा रहीं थीं।
"चल तू आज मेरे साथ सोना। मुझे सब सुनना है की अकबर, शब्बो, नूसी आदिल, शानू कैसे हैं ," सुशी बुआ मुझसे आखें मटकाते हुए बोलीं।
"भाई मुझे गोल्फ के बाद थकन हो रही है ,"दादीजी बोलीं पर उनकी आँखें प्यार से अपने बेटे को निहार रहीं थीं।
"मम्मी चलिए मैं आपकी मालिश कर दूंगा ," पापाजी प्यार से बोले और अपनी मम्मी कके साथ अपने सुइट की ओर अग्रसर हो गए।
अब मुझे सुशी बुआ की कहानी याद आयी। पापाजी और दादी जी के इकठ्ठे प्यार करने के ख्याल से ही माओं रोमांचित हो गयी। माँ बेटे के अनुचित अगम्यगमनी प्यार सबसे वर्जित होता है और इसी लिए उतना ही मीठा और आनंददायी होता है।
दादा जी ने नानाजी जी से कहा, "रूद्र चल यार कुछ गेम हो जाएँ चैस के ? सुनी सुबह से हराने का एलान कर रही है को। "दादा जी ने प्यार से अपनी बहु को निहारा।
"सुनी बेटा हम दोनों थोड़े बूढ़े सही पर दोनों मिल गए तो जीतना मुश्किल है तुम्हारा ," नानाजी रूपवती बेटी की और देख कर मुस्कराते हुए कहा।
"पापाजी कोशिश तो ज़रूर करूंगी। और यहाँ कौन बूढ़ा है। बूढ़े होंगे आपके और बाबूजी के दुश्मन। और फिर कुछ हार तो जीतने से भी मधुर होतीं हैं। " मम्मी ने अपने पिताजी और ससुर जी का हाथ थाम लिए उनके कमरे की ओर जाते हुए।
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"चल अब नेहा मेरे साथ विस्तार से बता सारे हफ्ते की दास्तान ," सुशी बुआ ने मुझे उठाते हुए कहा , "और सुनिए जी आप और जेठजी जल्दी से आइये। आपको नहीं सुन्नी हमारी नेहा के अद्भुद कारनामे ?"
बड़े मां और छोटे मामा लपक कर खड़े हो गए। बड़े मामा ने मुझे बाँहों में उठा लिया ," भाई वाकई नेहा बिटिया , तुम्हारी चल तो वाकई दर्दीली से दिख रही है। "
"बड़े मामू , आदिल भैया और अकबर चाचू के मूसल साड़ी रात सहने पड़े तो किसी भी लड़की की चाल दर्दीली हो जाएगी," मैंने बड़े मां के कटाक्ष का जवाब बेहरमी से दे तो दिया पर जैसे ही छोटे मामा के ऊपर नाज़ा पड़ी तो शर्म से लाल हो गयी।
"अरे शर्मा क्यों रही है। कमरे में पहुँचते ही अपने छोट मामा से भी दोस्ती कर लेना।," सुशी बुआ ने मेरा और भी मज़ाक बनाया।
कमरे में बुआ हम सबको लाल मदिर के गिलास बनाये और एलान किया ,"चलिए आप दोनों अपनी भांजी के कपडे उतरिये। उसका किस्सा कपडे पहन कर नहीं ," शर्माती तो रही पर बड़े मामा और छोट मामा ने मेरा कुरता उतार दिया। मैंने ब्रा नहीं पहनी थी। बड़े मामा ने सलवार का नाड़ा खोल कर सलवार ही नहीं मेरा जांघिया भी उतर फेंका।
"चल अब इन्तिज़ार किस बात का है। अपने छोटे मामा के कपडे उतार नेहा। जब तक मैं अपने प्यारे जेठजी का ख्याल करतीं हुँ। " सुशी बुआ ने बड़े मामा को वस्त्रहीन करने में बहुत देर नहीं लगायी।
मैंने भी शर्म का आँचल छोड़ कर छोटे मामा का कुरता पजामा उतार दिया। छोटे मामा ने बड़े मामा की तरह पाजामे के नीचे कच्चा नहीं पहना था। उनका दानवीय लंड हाथी की सूंड की तरह उनकी विशाल बालों से भरी जांघों के बीच लहरा रहा था।
"अरे नेहा क्या नाटक कर रही है। अब तक तेरे छोटे मामू का लंड तेरे मुंह में क्यों नहीं है। जल्दी से तैयार कर अपने छोटे मामू का लंड। मुझे अकबर भैया के घर में हुए तेरे कारनामों की कहानी सुननी है ," सुशी बुआ ने मुस्करा कर तना मारा और अगले क्षण उनका मुँह बड़े मामा के मोटे लंड से भर गया।
मैंने भी थोड़ा सा , बस थोड़ा सा ही, शरमाते हुए छोटे मामू का भारी भरकम लंड के सेब जैसे मोटे सुपाड़े को मुश्किल से अपने मुंह में ले लिया। मुश्किल से जगह बची थी मेरे मुँह में अपनी जीभ को उनके सुपाड़ी को सहलाने के लिए। मैं अपने नन्हे हाथों से उनके मुस्टंड होते लंड के खम्बे को सहलाते हुए अपने छोटे मामू की लंड को अपनी आफत बुलवाने के लिए तैयार करने लगी। बड़े मामू और छोटे मामू के लंड कुछ ही क्षणों में प्रचंड हो चले थे। उनके भीमकाय पुरुषत्व विज्ञप्ति के हथियार अपनी छोटी बहु और नन्ही भांजी की निर्मम पर अगम्यागमनी वासनामयी चुदाई के लिए न केवल तैयार थे पर हिंसक ठर्राहट से चुनौती से दे रहे थे।