अंदर ममता और नूतन दुनियादारी से बेखबर अपनी जवानी की आग को और हवा देने में लगी हुई थी।
वो घबरा जाती है और ममता अपना दुपट्टा ठीक करके दरवाज़ा खोलती है।
ममता; भाई क्या हुआ।
देवा;ममता को घुर के देखता है
क्या कर रहे हो तुम दोनो।
ममता; कुछ भी नहीं बस बैठी थी बातें करते हुए।
देवा; जा माँ का पेट दर्द कर रहा है उनके पास जाके बैठ।
ममता; रत्ना की तरफ चली जाती है।
नुतान अब भी कमरे के अंदर बैठी हुई थी दिल तेज़ी से धड़क रहा था और होंठ काँप रहे थे।
देवा;उसके पास जाके बैठ जाता है।
नुतन इतनी डरी हुई क्यों है।
नुतन ; कुछ नहीं भाई मै काकी के पास से आती हूँ।
देवा;उसका हाथ पकड़ के वापस उसे अपने पास बैठा देता है।
अरे कहाँ चली दिन भर तो ममता के साथ चिपकी रहती है थोडी मेरी बात तो सुन ले।
नुतन; चिपके रहने से आपका क्या मतलब है।
वो देवा को ग़ुस्से से पुछने लगती है।
देवा; अच्छा बडी ऑखें दिखा रही है ।
मैने भी सुबह अपने ऑखों से कुछ देखा है।
नुतन ; क्या देखा है आपने।
देवा;तुझे और ममता को इस कमरे में बिना कपडो के एक दूसरे के साथ।
और सुनाऊँ।
जितनी तेज़ी से नूतन को देवा की बात पे ग़ुस्सा चढा था उतने ही तेज़ी से उतर भी जाता है और अब ग़ुस्से में दिखते ऑखों में शर्म उतर आती है जो होंठ कुछ देर पहले ममता के साथ चिपके हुए थे। अब उन होठो में कंपकपाहट बढ़ने लगती है।
बस इस ख्याल से देवा ने उसे बिलकुल नंगी देखा है
कही न कही चूत की कोमल से पंखुड़िया भी थिरकने लगी थी।
नुतन ; मुझे जाने दो ।
देवा; मुझे देखना है।
नुतन ;क्या।
देवा;वो जो मुझे ठीक से दिखाई नहीं दिया।
नुतन ; कभी नहीं खवाब देखते रह जाओंगे आप भाई मैं नहीं दिखाने वाली।
देवा; अच्छा ये बात है।
वो नूतन को बिस्तर पे लिटा देता है और उसके पेट को चुमते हुए ऊपर की तरफ बढ़ने लगता है।
देवा को अपने अंघूठे से ठेंगा दिखाते हुए अपने ज़ुबान को बाहर निकाल के देवा को चिढ़ाने लगती है।
देवा;नूतन देख सांप(स्नेक)
नुतन ; कहाँ है भागते हुए देवा से आके चिपक जाती है।
देवा;नूतन को अपने सीने से चिपका लेता है।
साँप मेरे पेंट में है।
नुतन ; देवा के झाँसे में फँस चुकी थी।
देवा;मुझे ज़ुबान दिखा के चिढाती है चल अब निकाल बाहर तेरी ज़ुबान।
नुतन;मुझे जाने दो ना भाई।
देवा;मैंने कहा ज़ुबान बाहर निकाल वरना तेरी माँ को बता दूंगा जो मैंने देखा था सुबह।
नुतन डर के मारे अपनी ऑखें बंद कर लेती है और सर ऊपर उठाके के ज़ुबान बाहर निकालती है।
देवा उसी वक़्त उसके गुलाबी ज़ुबान को अपने मुँह में ले लेता है और उसे चूस चूस के पीने लगता है।
गलप्प गलप्पम।
नुतन का बदन ढिला पडने लगता है अब तक चूत से चूत को घिसके अपने शरीर को शांत करने वाली नूतन को पहली बार कोई मरद चूम रहा था।
बाहर किचन में से कुछ गिरने की आवाज़ आती है और नूतन देवा के छाती पे मुक्का मारते हुए वहां से भाग जाती है।
देवा;अपना सर खुजाता रह जाता है।
शाम ढलते ही देवा के लंड को चूत के तलब लगने लगती है जैसे कोई शराबी को अपने शराब रोज़ चाहिए ही होता है उसी तरह देवा को दिन भर में कम से कम एक बार औरत अब चाहिए ही चाहिए।
वो पदमा के घर चला जाता है।
अपने बिस्तर पे पडी पदमा देवा को देखते ही खडी हो जाती है और देवा के छाती से लग जाती है।
देवा;बस कुछ देर के लिए आया हूँ माँ की तबियत ठीक नहीं है मुझे जाना पडेगा।
पदमा;जल्दी वल्दी कुछ नहीं अब आया तो। तुझे तब ही जाने दूंगी जब मेरा दिल भरेगा और चूत भी।
देवा;पदमा के नरम मुलायम ब्रैस्ट को मसलने लगता है।
पदमा;आहह बहूत कठोर हो गये है ये ज़रा ज़ोर से दबा ना आह्हह्हह्हह्हह।
देवा के हाथों में तो जादू था।
वो अपनी ताकत से पदमा की दोनों चूचि को मरोड़ के रख देता है।
पदमा की ढीली ढाली साडी उसका बदन छोड़ने लगती है और बाकी के कपडे देवा निकाल देता है।
दोनो के होंठ एक दूसरे में खो जाते है ज़ुबान से निकलता थूक देख ये बताना मुश्किल था की किसका है दोनों के मुँह एक दूसरे में इस प्रकार चिपके हुए थे की साँस लीने में भी दुश्वारी हो रही थी।
देवा;अपना एक हाथ पदमा की चूत पे रखते हुए उसके जांघ को दबाने लगता है।
पदमा;देवा की पेंट खोल देती है और लंड को बाहर निकाल के उसे मुठियाने लगती है।
खड़े खड़े अब बाकि का काम करना बहूत मुस्किल था
इसलिए पदमा नीचे बैठ के देवा के लंड पे अपना थूक गिराती है।
और फिर उसी थूक को चाटते हुए देवा के लंड को भी चाटने लगती है गलप्प गलप्प।
देवा;आहह साली धीरे किया कर आह्ह्ह्ह्ह्ह।
पदमा के गलप्प मुँह से निकलता थूक ज़मीन पे गिरने लगता है और कुछ पानी नंगी चूचि पर।
कई दिनों की प्यासी पदमा की चूत जल के राख सी हो गई थी मगर उस राख में भी कुछ चिंगारियाँ बाकि थी जो बदन को झुलसाने के लिए काफी थी।
थोड़ी देर के बाद जब दोनों माँ बेटी के ऑंसू रुक जाते है तो शालु रश्मि को लिटा देती है और वैध जी के हाथ का मलहम लेके रश्मि के कटी फटी चूत पे लगाने लगती है।
थोडा मलहम लगते ही रश्मि की चूत में कुछ होता है और उसके मुँह से एक सिसक निलकती है जिसे सुनके शालु के होठो पे हलकी सी मुस्कान आ जाती है।
चूत से लेके गाण्ड तक मलहम लगाने के बाद भी शालु उसकी चूत पे उँगलियाँ फेरती रहती है।
अपने खयालो में डूबी शालु सोच रही थी की इसकी चूत को कैसे लगा होगा जब वो मोटा देवा का लंड इसे चिरता हुआ अंदर गया होगा।
लगातार रश्मि की चूत को देखते देखते शालु को तब होश आता है जब बाहर दरवाज़े पे नीलम खटखटाती है।
रश्मी अपनी सलवार ठीक कर लेती है और शालु अपने हाथ धोने चली जाती है।
रात का खाना खाने के बाद और पदमा को जम के चोदने के बाद देवा हवेली सोने चला जाता है।
हवेली पहुँचने पे उसे पहला झटका लगता है आज उसका बिस्तर बाहर नहीं बल्कि रुक्मणी के कमरे में लगा हुआ था।
दूसरा झटका रुक्मणी ने आज साडी या शलवार नहीं बल्कि शहर से लाये हुए नाईट पेंट पहनी हुई थी बदन से एकदम चिपका हुआ ऊपर लम्बा सा कुर्ता था।
देवा;रानी और रुक्मणी से कुछ देर बाते करने के बाद अपने बिस्तर पे लेट जाता है।
मालकिन मेरा बिस्तर बाहर क्यों नहीं लगवाई।
रुक्मणी;वो बाहर बहूत ठण्ड है तुझे कुछ हो गया तो तेरी माँ क्या सोचेंगी।
देवा;हमम।
(दिल में) तेरी चूत क्या सोच रही है मै अच्छे से जानता हूँ।
रात धीरे धीरे घिरने लगती है और पूरा गांव नींद के आग़ोश में चला जाता है।
देवा उठके रुक्मणी की तरफ देखता है वो गहरी नींद में सोई हुई थी।
वो चुप चाप उठके उसके पास जाके बैठ जाता है।
रुक्मणी के चेहरे पे आते उसके बाल उसकी खूबसूरती को चार चाँद लगा रहे थे। एक पल के लिए तो देवा भी उसे देखता रह जाता है।
वो धीरे से रुक्मणी के नाईट पेंट को पकड़ के उसे नीचे खीचने लगता है।
रुक्मणी कोई हरकत नहीं करती मगर उसके तेज़ साँसे देवा को बता देती है की चिडीया जग चुकी है।
देवा;कमर के थोड़े निचे पेंट को कर देता है। अंदर रुक्मणी ने पेंटी पहनी हुई थी।
देवा;अपना हाथ उसके पेट पे रख के धीरे धीरे उसे अंदर सरकाने लगता है।
जैसे जैसे देवा का हाथ रुक्मणी के पेट पे घुमता हुआ पेंटी की तरफ बढ़ने लगता है वैसे वैसे रुक्मणी की साँसे ऊपर नीचे होने लगती है।
रुक्मणी अपने नीचले होंठ को अपने मुँह के अंदर लेके किसी तरह अपनी सिसकारियां रोकने की कोशिश कर रही थी
एक पतिवरता पत्नी अपने पति को धोखा नहीं देना चाहती थी मगर वो इस वक़्त देवा को भी कुछ कहने कुछ करने से रोकने के स्तिथि में नहीं थी।
देवा का हाथ रुक्मणी की पेंटी में चला जाता है और वो उसे नीचे सरका देता है।
रुक्मणी अभी भी अपनी ऑंखें बंद किये हुई थी। शायद डर भी था और वो देखना भी चाहती थी की देवा क्या करता है।
रुक्मणी का शरीर उस वक़्त हिलने डूलना बंद कर देता है जब उसे अपनी चूत पे देवा का लंड महसूस होता है।
वो झट से अपने ऑंखें खोल के बंद कर देती है।
देवा;अपने लंड को पेंट से बाहर निकाल के उसे रुक्मणी के चूत पे घीसने लगता है।
रुक्मणी का सारा बदन उसे टाँगें खोल के देवा का स्वागत करने पे मजबूर कर रहा था । मगर अब भी थोड़ा हिम्मत राव का मान रुक्मणी के दिल में बाकी था।
रुक्मणी अपने जिस्म की बात सुनते हुए अपने पैर खोलने ही वाली थी की देवा अपने लंड को रुक्मणी की चूत से हटा के वापस उसकी पेंटी और नाईट पेंट ऊपर चढा के अपनी जगह सोने चला जाता है।
उस वक़्त रुक्मणी को जीतनी गलियां आ सकती थी वो सारी की सारी गालियां देवा को मन ही मन में देने लगती है और अपने जिस्म पे चादर डालके अपने हाथ की दो उँगलियाँ चूत में डालके उसे ज़ोर से रगडने लगती है।
चूत इतनी ज़्यादा मस्त हो चुकी थी की कुछ ही पलों में वो ढेर सारा पानी रुक्मणी के हाथों पे छोड़ देती है।
और रुक्मणी देवा को गलियां देते हुए और कल उसे बाहर सुलाने का सोच के सोने की कोशिश करती है। उसे समझ नहीं आ रहा था की देवा उसके साथ ऐसा क्यों कर रहा है। दो दिन से चूत के पास माचिस ला के उसे बुझा देता था।
आखीर देवा चाहता क्या है इस सवाल का जवाब देवा के पास था जो अपनी जीत पे मुस्कुरा रहा था उसे यक़ीन हो चला था की वो दिन बहूत क़रीब है जब रुक्मणी ख़ुद नंगी होके देवा के पास आयेंगी।