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Bahan ki ichha -बहन की इच्छा compleet

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फिर ऊर्मि दीदी बेड'पर बैठ गयी. मेने खिसक के उसे जगहा दे दी और वो मेरे दाईं तरफ बेड'पर लेट गई. हमारे बीच मुश्कील से एक दो इंच का फासला था. हम'ने तकिये बेड 'पर तिरछे रखे थे और उस'पर हम पड़े थे और टीवी देख'ने लगे. हम दोनो दिन भर हुई घटनाएँ के बारे में बातें कर'ने लगे. बीच बीच में में टीवी का चॅनेल चेंज कर रहा था और अलग अलग प्रोग्राम देख रहा था. एक चॅनेल पर एक इंग़लीश मूवी चल रही थी. मेने झट से पहेचान लिया के वो कौन सी मूवी थी. उस मूवी में एक दो एरॉटिक बेड सीन भी थे. में वो चॅनेल रख'कर मूवी देख'ने लगा.

ऊर्मि दीदी भी मेरे साथ बातें कर'ते कर'ते मूवी देख'ने लगी. बीच बीच में वो मुझे मूवी के बारे में पुच्छ रही थी और में उत्साह से उसे क्या हो रहा है ये बता रहा था. जल्दी ही एक बेड सीन चालू हुआ, जिस'की में राह देख रहा था. स्क्रीन'पर हीरो ने हीरोइन का चुंबन लेना चालू किया और वो देख'कर ऊर्मि दीदी बेचैन होने लगी.

उसकी बेचैनी मुझे तूरंत महेसूस हुई लेकिन मेने उसकी तरफ ध्यान नही दिया और गौर से सीन देख'ने का नाटक कर'ने लगा. जैसे हीरो ने हीरोइन के कपड़े निकालना चालू किया वैसे ऊर्मि दीदी कुच्छ ज़्यादा ही बेचैन हो गयी.

"सागर! चॅनेल बदल!" उस'ने बेचैनी से कहा.

"क्यों, दीदी? आच्छी मूवी है ये.."

"हाँ!. मुझे दिख रही है कित'नी अच्छी मूवी है ये. जल्दी बदल दे चॅनेल!" उस'ने मुझे डान्ट'ते हुए कहा.

"तुम्हें इस सीन की वजह से खराब लग रहा है क्या, दीदी? ये सीन तो अभी ख़त्म हो जाएगा" मेने स्क्रीन से नज़र ना हिलाते कहा. जाहिर है के वैसा कामुक सीन अप'ने भाई के साथ देख'ते हुए उसे अजीबसा लग रहा था. और वो भी उसके साथ होटेल के कमरे में अकेले होते सम'य? जैसे ही हीरो ने हेरोइन का टॉप निकाल दिया और पिछे से ब्रेसीयर खोल'ने लगा तो वैसे ही ऊर्मि दीदी की सह'ने की शक्ती ख़त्म हो गयी. उस'ने मेरे हाथ से रिमोट कंट्रोल छीन लिया और झट से चॅनेल चेंज किया. उस'से में मायूस हो गया. उस सम'य में किसी को नंगी या अध नंगी देख'ने के लिए तरस रहा था भले ही वो टीवी स्क्रीन पर क्यों ना हो लेकिन ऊर्मि दीदी ने चॅनेल बदल दिया और सब मज़ा किर'कीरा हो गया.

"चॅनेल क्यों बदल दिया, दीदी? वो अच्छी मूवी थी" मेने थोड़ी नाराज़गी दिखाकर कहा.

"होगी अच्छी.. लेकिन तुम्हें ऐसे गंदे सीन अप'नी बहन के साथ होते हुवे देख'ने नही चाहिए."

"उसमें क्या गंदा था??"

"अच्च्छा भी क्या था उस सीन में? वो दोनो किसींग कर रहे थे और क्या क्या हरकते कर रहे थे. और तुम कह रहे हो उस में गंदा क्या था?" ऊर्मि दीदी ने हैरानगी से पुछा.

"कमाल है, दीदी! आज कल मूवी में ऐसे सीन होना तो आम बात हो गयी है तो फिर उस में इतना स्ट्रेंज क्या है?"

"कमाल तो तुम्हारी है, सागर. तुम्हें शरम नही आती बहन के साम'ने ऐसे गंदे सीन देख'ते हुए?"

"अब उस में शरमाना क्या, दीदी? तुम्हें मालूम है वो क्या कर'नेवाले थे. मुझे मालूम है वो क्या कर'नेवाले थे. हम दोनो भी उम्र से बड़े है तो फिर ऐसे सीन देख'ने में बुराई क्या है?"

"कोई बुराई नही है, सागर! लेकिन तुम्हें क्या मालूम वो दोनो क्या कर'नेवाले थे?"

"मुझे सब मालूम है, दीदी! में अभी छोटा नही रहा. मुझे अच्छी तरह से मालूम है वो दोनो क्या कर रहे थे और क्या कर'नेवाले थे. ठीक है!. मेने खुद कभी वैसा कुच्छ नही किया है ना तो मुझे कुच्छ प्रॅक्टिकल अनुभव है लेकिन मुझे इस बारे में अच्छी तराहा से मलूमात है."

"ठीक है! ठीक है! लेकिन इत'नी जल्दी तुम्हें इन बातों में इंटरेस्ट नही लेना चाहिए."

"क्यों नही, दीदी? में अब बड़ा हो गया हूँ. अब मुझे हक है ये सब जान लेने का. मेरे मन में बहुत उत्सुकता है के लड़किया कप'डो में इत'नी सेक्सी दिख'ती है तो फिर बीना कपड़े वो कैसे दिख'ती होंगी? मेरे मन में हमेशा ये ख़याल आता है के क्या में किसी लड़'की को बीना कपड़े देख सकता हूँ क्या? बीना कपड़े यानी. पूरी तरह से नग्न!"

"देख सकते हो, सागर! किसी लड़'की के साथ तुम्हारी शादी होने के बाद" ऊर्मि दीदी ने चुपके से जवाब दिया.

"शादी के बाद??"

"हाँ! शादी के बाद. तुम तुम्हारी पत्नी को पुछ सकते हो!" ऊर्मि दीदी ने हँसके जवाब दिया.

"पत्नी??. शादी?. उसके लिए तो काफ़ी साल लगेंगे, दीदी! में तब तक रुक नही सकता!"

"नही रुक सकते हो. तो फिर. पुच्छ लो तुम्हारी गर्ल फ्रेंड को."

"गर्ल फ्रेंड? मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नही है, दीदी."

"क्या कह रहे हो, सागर? तुम इत'ने हॅंड'सम और तुम्हारी कोई गर्ल फ्रेंड नही?? में विश्वास ही नही करूँगी!"

"में झूठ थोड़ी बोल रहा हूँ, दीदी! मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नही है" में उसकी तरफ घूम गया और चुपचाप बोला.

"क्या कह'ते हो, सागर? ऐसी कोई लड़'की तुम्हारी दोस्त नही जो तुम्हारे दिल के बिल'कुल करीब हो. जिसे तुम चाहते हो, प्यार कर'ते हो. ऐसी कोई लड़'की नही?" ऊर्मि दीदी ने हैरान होकर पुछा.

"सच्ची, दीदी! ऐसी कोई लड़'की नही जो मेरे दिल के करीब है या जिसे में प्यार करता हू.. सिर्फ़.."

"सिर्फ़ क्या, सागर?." ऊर्मि दीदी ने उत्सुकता से पुचछा.

"सिर्फ़ तुम, दीदी!!. तुम ही हो. जो मेरे दिल के करीब है. जिसे में चाहता हूँ.. जिसे में प्यार करता हूँ."

"कौन में??" ऊर्मि दीदी आश्चर्य से चीख पड़ी और बोली, "लेकिन में तुम्हारी बहन हूँ, सागर! तुम्हारी गर्ल फ्रेंड नही.."

"ठीक है, दीदी! माना के तुम मेरी गर्ल फ्रेंड नही हो लेकिन तुम मेरी दोस्त तो हो? तुम ही एक ऐसी हो जिसे में बीना जीझक पुच्छ सकता हूँ!"

"पुच्छ सकता हूँ?. क्या??" ऊर्मि दीदी की आवाज़ चढ़ गयी.

"यानी मुझे ये कह'ना है के.. जैसे तुम'ने कहा के जो लड़'की मेरे दिल के करीब है उसे में पुच्छ सकता हूँ और तुम ही हो जो मेरे दिल के करीब हो. इस'लिए में तुम्हें ही पुछता हूँ. क्या तुम मुझे दिखा सक'ती हो के बीना कप'डो के तुम कैसी दिख'ती हो?? यानी पूरी नग्न!!"
 
"क्या??" ऊर्मि दीदी चिल्लाई, "तुम पागल तो नही हो गये हो?? में कैसे दिखा सक'ती हूँ, सागर? में तुम्हारी बहन हूँ."

"लेकिन हम दोनो दोस्त भी है ना, दीदी?"

"हा! लेकिन में ये कैसे भूलू के हम दोनो भाई-बहेन है, सागर?"

"ओह ! कम ऑन, दीदी!. तुम'ने वैसा किया तो तुम्हारा कोई नुकसान नही होगा. उलटा तुम मेरी मदद कर रही हो, मेरी जिग्यासा पूरी कर'ने के लिए."

"जिग्यासा पूरी कर'ने के लिए???. तुम्हारी ये जिग्यासा बहुत ही अजीब है, सागर!. एक बहन को पूरी कर'ने के लिए!" इसके बाद ऊर्मि दीदी बिल'कुल सिरीयस हो गयी. में उस'से बिन'ती कर रहा था, उस'को मनाने की कोशीष कर रहा था और वो मेरा विरोध कर'ती रही और मुझे ना कह'ती रही. आखीर मायूस होकर मेने कहा,

"ये देखो, दीदी! तुम्हें खूस कर'ने के लिए मेने क्या क्या किया. तुम इत'नी खूस थी के थोड़ी देर पह'ले तुम ही कह रही थी मेरे लिए तुम कुच्छ भी कर'ने के लिए तैयार हो. और अब जब में तुम्हें कुच्छ कर'ने के लिए कह रहा हूँ तो तुम ना बोल रही हो."

"में कैसे करू, सागर? तुम मुझे जो कर'ने के लिए कह रहे हो ये दुनिया की कोई बहन नही कर सक'ती."

"तो ठीक है, दीदी! भूल जाओ जो कुच्छ मेने तुम्हें कहा वो! मुझे लगा तुम मुझे बहुत प्यार कर'ती हो इस'लिए तुम मुझे नाराज़ नही करोगी. लेकिन अब मुझे मालूम पड़ गया के तुम मुझे कित'ना प्यार कर'ती हो."

ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी की तरफ पीठ करके में घूम गया. उस'ने मुझे वापस अप'नी ओर घुमाने की कोशीस की लेकिन में अप'नी जगह से नही हिला. फिर उस'ने कहा,

"ऐसे क्या कर रहे हो, सागर? नाराज़ क्यों होते हो जल्दी? ज़रा मेरे बारे में तो सोचो.. मेरे से कैसे होगा वो? अपना नाता में कैसे भूल जाउ?"

मेने कुच्छ नही कहा और चुप'चाप पड़ा रहा. मेरे हाथ को पकड़'कर वो मुझे हिलाने लगी और मुझे समझाने लगी लेकिन में अप'नी जगहा से हिला भी नही और मेने उस'का कहा सुना भी नही. आखीर हताश होकर उस'ने कहा,

"सागर. मेरे प्यारे भाई! सुबह से अब तक हम कित'ना मज़ा कर रहे है और अब आखरी सम'य उस मज़े को में किर'कीरा नही कर'ना चाह'ती हूँ. तुम'ने दिन भर मुझे खूस रखा इस'लिए अब में तुम्हें नाराज़ नही कर'ना चाह'ती. ठीक है! अगर तुम्हें यही चाहिए तो में तैयार हूँ!!"

ऊर्मि दीदी के शब्द सुन'कर में खिल उठा लेकिन में अप'नी जगहा से नही हिला और मेने उसे कहा,

"नही, दीदी! अगर तुम्हारे दिल में नही है तो तुम मत करो कुच्छ.. तुम्हारे मन के खिलाफ तुम कुच्छ करो ऐसा में नही चाहता."

मेरे मन में तो खुशीयों के लड्डू फूट रहे थे. अगर ऊर्मि दीदी सचमुच नंगी होने के लिए तैयार हो रही होगी तो सुबह से मेने की हुई मेहनत और खर्च किया हुआ पैसा सब वसूल होनेवाला था. लेकिन मेरी वो खुशी मेने अप'ने चह'रे पर नही दिखाई और घूम के मेने उसकी तरफ देखा. ऊर्मि दीदी को सीरीयस देख'कर मेने कहा,

"ये देखो, दीदी! इत'नी सिरीयस मत हो जाओ. इसमें भी तो मज़ा है. थोड़ा अलग. दिन भर कैसे हम मज़ा मज़ा कर रहे थे?.. दोस्त बन'कर. ये भी उसी मज़ा का एक भाग है ऐसा समझ लो. तो ही तुम्हें अजीब नही लगेगा. और फिर तुम्हें भी मज़ा आएगा इस में."

"ठीक है. ठीक है! मुझे नही लग रहा है अट'पटा अभी." ऊर्मि दीदी ने मुश्कील से हंस'ते हुए कहा, " आखीर क्या. में मेरे लाडले भाई को खूस कर रही हूँ. उस'ने मुझे दिन भर खूस रखा अब मेरी बारी है उसे खूस कर'ने की" ऐसा कह'कर वो अच्छी तरह से हँसी. उसकी अच्छी हँसी देख'कर में भी दिल से हंसा.

मुझे मेरा सपना पूरा होते नज़र आ रहा था. मेरे बहन को जी भर के पूरी नंगी देख'ने के लिए में मर रहा था और वो घड़ी अब आ गई थी. सिर्फ़ उस ख़याल से में हद के बाहर उत्तेजीत होने लगा. मेरे लंड में कुच्छ अलग ही काम संवेदना उठ'ने लगी और वो गल'ने लगा. मुझे ऐसा लग'ने लगा के किसी भी समय मेरा वीर्य पतन हो जाएगा. मेने सोचा के झट से बाथरूम में जा के ठंडा होकर आना ही चाहिए.

क्रमशः……………………………

 


gataank se aage…………………………………..

Us sama'y mujhe laga ke men Urmi Didi ko bataa doon. Meree 'ichchha'. Mera sapana. Meree kalpana.. Yaani ek hee!! 'Urmi Didi tumhen chodana!!'.. Lekin agale hee pal mene socha ke 'nahee' ye vakta thik nahee hai is'liye mene sirph itana kaha,

"Philahal to mujhe yaad nahee aa raha hai mera koi sapana. Lekin jab yaad aayega to tumhen jaroor bataaunga, didee!"

"Jaroor bataana, Sagar. Men puree kosheesh karoongee tumhaaree 'ichchha' puree kar'ne kee."

"Achchha! Chalo ab. Ja ke fresh hokar aa jaavo, didee!" mene use aisa kaha lekin men us se door nahee hua.

"oh ! Sagar! Mujhe aisa lag raha hai ke aise hee jindagee bhar rahe. Mera matalab hai aise kapade pahan ke.. Lekin mujhe maaloom hai ye sambhav nahee hai" Urmi Didi ne thode udas swar men kaha.

"Tum udaas kyon hotee ho, didee? Thik hai, tum aise kapade ghar men nahee pahan sak'tee ho lekin akele men to pahan sak'tee ho? jab ham dono akele honge tab tum beshak mere kapade pahan liya karo."

"Vo to thik hai, Sagar. Lekin tumhaare kapade mujhe kit'ne tight ho rahe hai, dekho na. Ham! Agar tum'ne apana saij badal diya to phir thik hai. Yaani men kah'na chaah'tee hoon ke tum'ne agar tumhaaree body badhai to."

"Didee!. Meree body badh'ne ke bajay. Tum thodee sleem kyon nahee ban jaatee ho? Sach kahoom to tumhen 'yahaan kee' thodee charabee kaam kar'nee chaahiye." Aisa kah'kar mene mere dono haath uskee kamar kee charabee par rakh diye aur use halake se dabaya.

"jyaada shararat mat karo ham, Sagar!" Aisa kah'kar us'ne apana ek haath pichhe liya aur mera peT pakad'kar ghuma diya. Mene jhaT se mere ek haath se Urmi Didi ka haath pakad liya aur dusare haath se uske mansal chuttaR ko dabaakar kaha,

"Ya to tumhen 'yahaan' kee charabee kaam kar'nee chaahiye, didee!"

"Tum na. Bahut naalaayak hote ja rahe ho, Sagar!. Thair!. tumhen jara do chaar phatake detee hoon." Aisa kah'kar vo ghum gai aur us'ne mujhe halake se chaaTa maar diya.

Urmi Didi ne mujhe chaaTa maara to mene bhee use halakasa chaaTa maar diya. Us'se vo jhuthamooth ka gussa dikh'tee aur mujhe phir chaaTa mar'tee thee. Us'ne phir maara to mene bhee vaapas maar diya. Aisa kai baar hua aur ham kaaphee baar ek dusare ko chaaTa maarate rahe, hans'te khel'te, yahaan vahan bhaagate.. Uske chaaTe se men ap'ne aap ko bachaaTa tha lekin vo mere chaaTe se bacha'tee nahee thee. Akheer vo pareshan ho gai aur mere chhaatee par muththee bhar ke maar'ne lagee. Mene hans'te hans'te uske haath pakad liye aur vo bhee hans'ne lagee. hans'te hans'te us'ne mujhe baanhon men bhar liya. hamaara hansana ruk'ne tak ham ek dusare kee baanhon men jakaRe huye the.

Phir Urmi Didi mujh'se door ho gayee. Us'ne bag men se apana night gown nikaala aur vo batharoom men fresh hone ke liye gayee. Mene phir TV ka rimot kantrol liya aur TV chaloo kar ke kuchh channel chhek kiye. Men ek music channel par rook gaya. Baad men men bed'par let gaya aur TV dekh'ne lag. Men TV to dekh raha tha lekin mere kaan batharoom se aa rahee aavaaj par the. Urmi Didi ne toilet istemaal kiya phir shavar ke niche snaan kiya vagaira vagaira sabaka men aavaaj se andaja le raha tha. Thodee der baad Urmi Didi baahar aayee. Us'ne gulabee rang ka night gown pahana tha. Vo meree taraph dekh'kar hansee aur phir jaakar us'ne meree jeens aur ti-shirt wardrobe men Taang diye.

"Are, didee!! Tum'ne meree jeens aur ti-shirt vaapas nahee pahanee??" Mene hans'kar use puchha.

"Kaise pahan letee, Sagar? Aur vo bhee sote sama'y? kit'ne tight ho rahe the tumhaare vo kapade mujhe. Jaise kisee ne jakaR liya ho. Mujhe to aise kapade pahan'kar sona achchha lag'ta hai." Aisa kah'kar us'ne apana gaun dono baajoo se uthaya aur ajoo baajoo men hil'kar dikhaate kaha, "dhile dhaale.. Beena bandhan ke. Khule khule. Hava jaanevaale."

"Achchha? isaka matalab is gaun ke niche tum'ne kuchh nahee pahana hai, didee?. Khula khula lag'ne ke liye??"

"naalaayak! Besharama!!. Teree jaban bahut hee tej chal rahee hai." Aisa kah'kar us'ne mujhe ek chaaTa maara. Mene hans'te hans'te us'ka chaaTa jhel liya. Bhale hee mene vaise majak men kaha tha lekin mujhe achchhee taraha se maaloom tha ke andar breseeyar aur painty pahanee thee. Us'ka gulabee jhina gaun kuchh chhupa nahee raha tha. aam taur par vo agar ghar men hotee aur us'ne ye gaun pahana hota to uske andar vo peteekot aur sleep pahan letee jis'se andar ka kuchh dikhai nahee deta. Lekin is sama'y yahaanpar us'ne andar vaise kuchh pahana nahee tha is'liye mujhe uskee breseeyar aur painty najar aa rahee thee. Jab vo bag men kapade rakh'ne ke liye niche jhuk gayee tab pichhe se mene uske chuttaR ko dekha to mujhe uske andar pah'nee hui kaale rang kee painty najar aayee.

Phir Urmididee bed'par baith gayee. Mene khisak ke use jagaha de dee aur vo mere daayeen taraph bed'par let gai. Hamare beech mushkeel se ek do inch ka phasala tha. Ham'ne takiye bedarest'par tirachhe rakhe the aur us'par ham pade the aur TV dekh'ne lage. Ham dono din bhar hui ghatanayen ke baare men baaten kar'ne lage. Beecha beecha men men TV ka channel chenj kar raha tha aur alag alag program dekh raha tha. Ek channel par ek ingleesh moovhee chal rahee thee. Mene jhaT se pahechan liya ke vo kaun see moovhee thee. Us moovhee men ek do erotic bed scene bhee the. Men vo channel rakh'kar moovhee dekh'ne laga.

Urmi Didi bhee mere saath baaten kar'te kar'te moovhee dekh'ne lagee. Beech beech men vo mujhe moovhee ke baare men puchh rahee thee aur men utsaha se use kya ho raha hai ye bataa raha tha. Jaldee hee ek bed scene chaloo hua, jis'kee men raah dekh raha tha. Skreen'par hiro ne hiroin ka chumban lena chaloo kiya aur vo dekh'kar Urmi Didi bechain hone lagee.

Uskee bechainee mujhe toorant mahesoos hui lekin mene uskee taraph dhyaan nahee diya aur gaur se seen dekh'ne ka naatak kar'ne lag. Jaise hiro ne hiroin ke kapade nikaalana chaloo kiya vaise Urmi Didi kuchh jyaada hee bechain ho gayee.

"Sagar! channel badal!" us'ne bechainee se kaha.

"kyon, didee? Achchhee moovhee hai ye.."

"Ham!. Mujhe dikh rahee hai kit'nee achchhee moovhee hai ye. Jaldee badal de channel!" us'ne mujhe DaanT'te huye kaha.
 
"tumhen is seen kee vajaha se kharaab lag raha hai kya, didee? Ye seen to abhee khatm ho jayega" mene skreen se najar na hilaate kaha. jaahir hai ke vaisa kaamuk scene ap'ne bhai ke saath dekh'te huye use ajeebasa lag raha tha. Aur vo bhee uske saath hotel ke kamare men akele hote sama'y? Jaise hee hiro ne heroin ka top nikaal diya aur pichhe se breseeyar khol'ne laga to vaise hee Urmi Didi kee sah'ne kee shaktee khatm ho gayee. Us'ne mere haath se rimot kantrol chhin liya aur jhaT se channel chenj kiya. Us'se men mayoos ho gaya. Us sama'y men kisee ko nangee ya adh nangee dekh'ne ke liye taras raha tha bhale hee vo TV skreen par kyon na ho lekin Urmi Didi ne channel badal diya aur sab maja kir'keera ho gaya.

"channel kyon badal diya, didee? Vo achchhee moovhee thee" mene thodee narajagee dikhaakar kaha.

"Hogee achchhee.. Lekin tumhen aise gande scene ap'nee bahan ke saath hote huve dekh'ne nahee chaahiye."

"Usamen kya ganda tha??"

"Achchha bhee kya tha us scene men? Vo dono kiseeng kar rahe the aur kya kya harakate kar rahe the. Aur tum kah rahe ho us men ganda kya tha?" Urmi Didi ne hairanagee se puchha.

"Kamaal hai, didee! aaj kal moovheeja men aise scene hona to aam baat ho gayee hai to phir us men itana strenj kya hai?"

"kamaal to tumhaaree hai, Sagar. tumhen sharam nahee aatee bahan ke saam'ne aise gande scene dekh'te huye?"

"Ab us men sharamaana kya, didee? tumhen maaloom hai vo kya kar'nevaale the. Mujhe maaloom hai vo kya kar'nevaale the. Ham dono bhee umr se bade hai to phir aise scene dekh'ne men burai kya hai?"

"Koi burai nahee hai, Sagar! Lekin tumhen kya maaloom vo dono kya kar'nevaale the?"

"Mujhe sab maaloom hai, didee! Men abhee chhota nahee raha. Mujhe achchhee taraha se maaloom hai vo dono kya kar rahe the aur kya kar'nevaale the. Thik hai!. Mene khud kabhee vaisa kuchh nahee kiya hai na to mujhe kuchh practical anubhav hai lekin mujhe is baare men achchhee taraha se maloomaat hai."

"Thik hai! Thik hai! lekin it'ne jaldee tumhen in baaton men intarest nahee lena chaahiye."

"kyon nahee, didee? Men ab baRa ho gaya hoon. Ab mujhe hak hai ye sab jaan lene ka. Mere man men bahut utsukata hai ke ladkiyon kap'Ron men it'nee sexy dikh'tee hai to phir beena kapade vo kaise dikh'tee hongee? mere man men hamesha ye khayaal aata hai ke kya men kisee laR'kee ko beena kapade dekh sakata hoon kya? beena kapade yaani. Puree taraha se nagn!"

"Dekh sakate ho, Sagar! Kisee laR'kee ke saath tumhaaree shaadee hone ke baad" Urmi Didi ne chupake se javaab diya.

"shaadee ke baad??"

"Ham! shaadee ke baad. Tum tumhaaree patnee ko puchh sakate ho!" Urmi Didi ne hansake javaab diya.

"Patnee??. shaadee?. Uske liye to kaaphee saal lagenge, didee! Men tab tak ruk nahee sakata!"

"Nahee ruk sakate ho. To phir. Puchh lo tumhaaree girl friend ko."

"Girl friend? Meree koi girl friend nahee hai, didee."

"Kya kah rahe ho, Sagar? Tum it'ne hand'sam aur tumhaaree koi girl friend nahee?? Men vishwas hee nahee karungee!"

"Men jhooth thodee bol raha hoon, didee! Meree koi girl friend nahee hai" men uskee taraph ghum gaya aur chupachap bola.

"Kya kah'te ho, Sagar? Aisee koi laR'kee tumhaaree dost nahee jo tumhaare dil ke bil'kul kareeb ho. Jise tum chaahate ho, pyaar kar'te ho. Aisee koi laR'kee nahee?" Urmi Didi ne hairaan hokar puchha.

"Sachchee, didee! Aisee koi laR'kee nahee jo mere dil ke kareeb hai ya jise men pyaar karta hoo.. Sirph.."

"Sirph kya, Sagar?." Urmi Didi ne utsukata se puchha.

"Sirph tum, didee!!. Tum hee ho. Jo mere dil ke kareeb hai. Jise men chaahata hoon.. Jise men pyaar karta hoon."

"Kaun men??" Urmi Didi ashcharya se cheekh padee aur bolee, "lekin men tumhaaree bahan hoon, Sagar! tumhaaree girl friend nahee.."

"Thik hai, didee! Maana ke tum meree girl friend nahee ho lekin tum meree dost to ho? Tum hee ek aisee ho jise men beena jijhak puchh sakata hoon!"

"Puchh sakata hoon?. Kya??" Urmi Didi ka aavaaj chadh gaya.

"Yaani mujhe ye kah'na hai ke.. Jaise tum'ne kaha ke jo laR'kee mere dil ke kareeb hai use men puchh sakata hoon aur tum hee ho jo mere dil ke kareeb ho. is'liye men tumhen hee puchhata hoon. Kya tum mujhe dikha sak'tee ho ke beena kap'Ron ke tum kaisee dikh'tee ho?? Yaani puree nagn!!"

"Kya??" Urmi Didi chillai, "tum paagal to nahee ho gaye ho?? men kaise dikha sak'tee hoon, Sagar? men tumhaaree bahan hoon."

"Lekin ham dono dost bhee hai na, didee?"

"Ha! Lekin men ye kaise bhuloo ke ham dono bhai-bahen hai, Sagar?"

"Oh ! come on, didee!. Tum'ne vaisa kiya to tumhara koi nukasaan nahee hoga. Ulata tum meree madad kar rahee ho, meree jigyaasa puree kar'ne ke liye."

"jigyaasa puree kar'ne ke liye???. tumhaaree ye jigyaasa bahut hee ajeeb hai, Sagar!. Ek bahan ko puree kar'ne ke liye!" isake baad Urmi Didi bil'kul sireeyas ho gayee. Men us'se bin'tee kar raha tha, us'ko manaane kee kosheesh kar raha tha aur vo mera virodh kar'tee rahee aur mujhe na kah'tee rahee. Aakheer mayoos hokar mene kaha,

"Ye dekho, didee! tumhen khoosh kar'ne ke liye mene kya kya kiya. Tum it'nee khoosh thee ke thodee der pah'le tum hee kah rahee thee mere liye tum kuchh bhee kar'ne ke liye taiyaar ho. Aur ab jab men tumhen kuchh kar'ne ke liye kah raha hoon to tum na bol rahee ho."

"Men kaise karoo, Sagar? Tum mujhe jo kar'ne ke liye kah rahe ho ye duniya kee koi bahan nahee kar sak'tee."

"To thik hai, didee! Bhool jaavo jo kuchh mene tumhen kaha vo! mujhe laga tum mujhe bahut pyaar kar'tee ho is'liye tum mujhe naaraaj nahee karogee. Lekin ab mujhe maaloom pad gaya ke tum mujhe kit'na pyaar kar'tee ho."

Aisa kah'kar Urmi Didi kee taraph pith karake men ghum gaya. Us'ne mujhe vaapas ap'nee or ghumaane kee kosheesh kee lekin men ap'nee jagaha se nahee hila. Phir us'ne kaha,

"Aise kya kar rahe ho, Sagar? naaraaj kyon hote ho jaldee? jara mere baare men to socho.. Mere se kaise hoga vo? Apana naata men kaise bhool jaaun?"

Mene kuchh nahee kaha aur chup'chaap pada raha. Mere haath ko pakad'kar vo mujhe hilaane lagee aur mujhe samajhaane lagee lekin men ap'nee jagaha se hila bhee nahee aur mene us'ka kaha suna bhee nahee. Akheer hatash hokar us'ne kaha,

"Sagar. Mere pyaare bhai! Subaha se ab tak ham kit'na maja kar rahe hai aur ab aakharee sama'y us maja ko men kir'keera nahee kar'na chah'tee hoon. Tum'ne din bhar mujhe khoosh rakha is'liye ab men tumhen naaraaj nahee kar'na chah'tee. Thik hai! Agar tumhen yahee chaahiye to men taiyaar hoon!!"

Urmi Didi ke shabd sun'kar men khil utha lekin men ap'nee jagaha se nahee hila aur mene use kaha,

"Nahee, didee! Agar tumhaare dil men nahee hai to tum mat karo kuchh.. tumhaare man ke khilaaph tum kuchh karo aisa men nahee chaahata."

Mere man men to khusheeyon ke laddoo phoot rahe the. Agar Urmi Didi sachamuch nangee hone ke liye taiyaar ho rahee hogee to subaha se mene kee hui mehanat aur kharch kiya hua paisa sab vasoola honevaala tha. Lekin meree vo khushee mene ap'ne cheh're par nahee dikhai aur ghum ke mene uskee taraph dekha. Urmi Didi ko serious dekh'kara mene kaha,

"Ye dekho, didee! it'nee sireeyas mat ho jao. isamen bhee to maja hai. Thoda alag. din bhar kaise ham maja maja kar rahe the?.. Dost ban'kar. Ye bhee usee maja ka ek bhaag hai aisa samajh lo. To hee tumhen ajeeb nahee lagega. Aur phir tumhen bhee maja aayega is men."

"Thik hai. Thik hai! Mujhe nahee lag raha hai aT'paTa abhee." Urmi Didi ne mushkeel se hans'te huye kaha, " aakheer kya. Men mere laadale bhai ko khoosh kar rahee hoon. Us'ne mujhe din bhar khoosh rakha ab meree baree hai use khoosh kar'ne kee" aisa kah'kar vo achchhee taraha se hansee. Uskee achchhee hansee dekh'kar men bhee dil se hansa.

Mujhe mera sapana pura hote najar aa raha tha. Mere bahan ko jee bhar ke puree nangee dekh'ne ke liye men mar raha tha aur vo ghaRee ab aa gai thee. Sirph us khayaal se men had ke baahar uttejeet hone laga. Mere lunD men kuchh alag hee kaam samvedana uth'ne lagee aur vo gal'ne laga. Mujhe aisa lag'ne laga ke kisee bhee samay mera viry patan ho jayega. Mene socha ke jhaT se batharoom men ja ke thanda hokar aana hee chaahiye.

kramashah……………………………

 
dosto update de diya hai. mujhe lagta hai ye kahaani kisi ko bhi pasand nahi aa rahi hai . isiliye to shaayad kisi ka coment nahi milta. aap kahe to ye stori yahi band kar di jaay
 
बहन की इच्छा—7

गतान्क से आगे…………………………………..

मेने ऊर्मि दीदी को कहा के में टायलेट जाकर आता हूँ. बाथरूम में आकर मेने झट से मेरी शर्ट-पॅंट अंडरावेअर के साथ नीचे खींच ली और मेरा कड़ा लंड मुठ्ठी में पकड़'कर मेने पाँच छे स्ट्रोक मारे. अगले ही पल मेरा पानी छूट गया और वीर्य की छ्होटी मोटी, चार पाँच पिच'कारीया छिटक गयी. कुच्छ पल में मेरा लंड हिला रहा था. शांत हो जा'ने के बाद मेने पेशाब किया और फिर मेरा लंड पानी से साफ किया. झाड़'ने के बाद भी मेरा लंड थोड़ा कड़ा था फिर भी मेने उसे अंडरावेा में ठूंस लिया और शर्ट-पॅंट अच्छी तरह से पहन ली. सब कुच्छ ठीक ठाक है ये चेक कर के में बाथरूम से बाहर आया.

मेने देखा के ऊर्मि दीदी टीवी देख रही थी. में बाहर आया तो उस'ने हंस के मेरी तरफ देखा और वापस वो टीवी देख'ने लगी. में आकर बेड के कोनेपर उसके पैरो तले बैठ गया और उसकी तरफ देख'ने लगा. पाँच मिनट तो ऐसे ही गये, में ऊर्मि दीदी की तरफ देख रहा हूँ और वो टीवी की तरफ देख रही है. बीच बीच में वो मेरी तरफ देख'ती थी और शरम से हंस'ते हंस'ते वापस टीवी देख'ती थी. में बावले की तरह देख रहा था के वो अभी उठेगी या बाद में उठेगी लेकिन वो हिल भी नही रही थी. आखीर मेने उसे कहा,

"दीदी! तुम तैयार हो ना?"

"तैयार??.. किस लिए??"

"मुझे दिखाने के लिए. के नग्न स्त्री कैसी दिख'ती है."

"हां ! में तैयार हूँ!!"

"तो फिर दिखाओ ना मुझे.."

"में कैसे दिखाउ तुम्हें, सागर??"

"कैसे यानी? अभी तो तुम'ने कहा था के तुम तैयार हो दिखाने के लिए?"

"हां !. लेकिन में कैसे अप'ने भाई के साम'ने नंगी हो जाउ??"

"क्या मतलब, दीदी?? पहेलीया मत बुझाओ. साफ साफ कहो तुम क्या कह'ना चाह'ती हो?"

"अरे पागले!! तुम्हारी समझ में क्यों नही आ रहा है.. में कैसे तुम्हारे साम'ने मेरे कपड़े निकालू?? मुझे शरम आ रही है ना खुद के कपड़े निकाल'ने में! इस'लिए तुम्हें ही वो काम कर'ना पड़ेगा अगर तुम्हें मुझे नंगी देख'ना है तो."
 
"यानी, दीदी.. में तुम्हारे कपड़े निकालू???" मेने बड़े उत्साह से उसे पुछा और उस'ने अपना सर हिलाके मुझे 'हां' कहा.

"ठीक है, दीदी.. तुम अगर यही चाह'ती हो तो में करता हूँ ये काम!"

"अरे नालायक!. ये में नही. तुम चाहते हो."

"हां, दीदी. हां !! में चाहता हूँ. तो फिर में चालू करू अभी??"

"अगर तुम्हें चाहिए तो. कर चालू!!." ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी ने रिमोट से टीवी बंद किया और नीचे सरक के वो अप'नी पीठ'पर सीधा लेट गयी. उसके चह'रे पर शरारती हँसी थी. में थोड़ा आगे सरक गया और मेरे दोनो हाथ मेने उसके पाँव के पंजो के आगे, उसके गाउन'पर रख दिए. धीरे धीरे दोनो हाथों से में ऊर्मि दीदी का गाउन उप्पर सरकाने लगा.

मेने गाउन ऊर्मि दीदी के घुट'ने तक उप्पर किया. आगे का गाउन उसके पैरो तले अटका हुआ था इस'लिए उस'ने अप'ने घुट'ने थोड़े उप्पर लिए और मेने गाउन उसके घुटनो के उप्पर सर'काया. फिर में उठा के उसकी कमर के यहाँ बैठ गया. में ऊर्मि दीदी का गाउन उप्पर कर रहा था और वो आँखें बंद करके पड़ी थी. मेने उसे कहा,

"दीदी! तुम'ने अप'नी आँखें क्यों बंद रखी है?"

"क्योंकी.. में तुम्हारी तरह बेशरम नही हूँ." उस'ने आँखें बंद रख के ही जवाब दिया.

"यानी क्या, दीदी?"

"यानी ये के.. में कैसे देख सकूँगी के मेरा छोटा भाई मुझे नंगी कर रहा है? मुझे ये बात बिल'कुल शर्मनाक लग रही है."

"ओह ! दीदी! अगर ऐसा है तो मुझे नही कुच्छ देख'ना." ऐसे कह'ते मेने मेरे हाथ पिछे लिए. उस पर ऊर्मि दीदी ने आँखें खोल'कर मेरी तरफ देख'कर कहा,

"तुम चालू रखो, सागर!. अब मुझे थोड़ा बहुत अट'पटा तो लगेगा ही ना?. इस'लिए मेने आँखें बंद रखी है. तुम अपना काम चालू रखो." ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी ने अप'नी आँखें वापस बंद कर ली. मेने मेरे हाथ वापस उसके गाउन के उप्पर रख दिए और में उसे और उप्पर सरकाने लगा.

मेने जान बूझ'कर मेरे पूरे पंजे उसकी टाँगों पर फैलाए थे जिस'से गाउन सरकाते सम'य में उसकी मुलायम टाँगों का स्पर्शसूख ले सकू. फिर मेने उप्पर सर'काया पूरा गाउन उसकी कमर के उप्पर धकेल दिया.

अब ऊर्मि दीदी कमर के नीचे खुली पड़ी थी. उस'ने आँखें बंद की थी इस'लिए में उसे अच्छी तराहा से आँखें भर के (कह'ने की बजाए आँखें फाड़'कर) देख सकता था. मुझे उसकी गोरी गोरी टाँगे और टाँगों के बीच का त्रिकोण भाग दिख रहा था. उस'ने डार्क नीले रंग की पॅंटीस पहनी थी जो कुच्छ देर पह'ले मुझे उसके गाउन के उपर से काली नज़र आई थी. उसकी चूत का उभार उसके पॅंटीस के उपर से साफ दिखाई दे रहा था. चूत के बीच के छेद में पॅंटीस थोड़ी घुसी थी जिस'से उसकी चूत का छेद भी समझ में आ रहा था. पॅंटीस के साइड से चूत के भूरे रंग के बाल बाहर आए थे. में उसे और थोड़ी देर निहारना चाहता था लेकिन मेरा अन्तीम 'लक्ष्य' और ही था.

मेने गाउन और उप्पर सर'काने की कोशीष की लेकिन वो ऊर्मि दीदी के चुत्तऱ के नीचे अटका हुआ था. इस'लिए मेने सिर्फ़

"दीदी" इतना कहा और उसकी समझ में आया.! उस'ने अप'नी कमर थोड़ी उप्पर उठाई और मेने झट से गाउन उसके चुत्तऱ के नीचे से सर'काया. फिर वैसे ही में गाउन उसके नाभी और पेट से उप्पर करता गया. अब तक में उस'का गाउन सरका रहा था और वो लेटी हुई थी लेकिन अब बाकी गाउन उठा'ने के लिए उसे उठ के बैठना ज़रूरी था. ये बात उसके भी ध्यान में आई क्योंकी उस'ने अप'ने दोनो हाथ उप्पर मेरी तरफ किए. उसकी आँखें बंद थी और चह'रे पर लज्जा मिश्रीत, शरारती हँसी थी. मेने भी हंस'ते हुए उसके हाथ पकड़ लिए और उसे उप्पर खींच लिया.
 
अब ऊर्मि दीदी पाँव पसारे बैठी थी और गाउन उसके कमर'पर गिर गया था. मेने दोनो बाजू से गाउन पकड़ लिया और उसके छाती के उभारों से उप्पर खींच लिया. उस'ने अप'ने दोनो हाथ उप्पर किए और एक झटके में मेने उसके सरीर से गाउन निकाल दिया और बाजू के कुर्सी'पर डाल दिया.

अप'नी आँखें बंद रख के वो वापस पिछे लेट गयी. अब ऊर्मि दीदी सिर्फ़ ब्रेसीयर और पॅंटीस में मेरे साम'ने पड़ी थी. उसके गोरे गोरे बदन पर वो काले रंग की ब्रेसीयर और नीले रंग की पॅंटीस खुल के दिख रही थी. इस तरह से बीना रोक टोक उसे देख'ने का ये मेरा पह'ला मौका था और इस मौके का में पूरी तरह से फ़ायदा ले रहा था. काफ़ी देर में मेरी बहन के अध नंगे बदन को वासानभारी निगाह से देख रहा था.

"क्या हुआ, सागर?. तुम रुक क्यों गये??" ऊर्मि दीदी ने बंद आँखों से मुझे पुछा.

"कुच्छ नही, दीदी! तुम्हें इन अंतर्वस्त्रो में थोड़ा निहार रहा हूँ. इस काली ब्रेसीयर और नीली पॅंटीस में तुम बहुत सेक्सी दिख'ती हो!"

"मुझे लग'ता है. इन अंतर्वस्त्रो के नीचे 'क्या' छुपा है उसे देख'ने में तुम्हें ज़्यादा दिलचस्पी है. है ना, सागर?"

"हाँ. हाँ. दीदी! ज़रूर!"

"तो फिर टाईमपास क्यों कर रहे हो, सागर? निकाल दो उन्हे. और पूरी कर लो अप'नी 'जिग्यासा'!" ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी घूम गयी और अप'ने पेट'पर लेट गयी. अब मुझे उसके पिछले भाग का दर्शन हो रहा था. वो पिछे से भी काफ़ी सेक्सी नज़र आ रही थी. उसके दूध जैसे गोरी गोरी पीठ पर उसके ब्रेसीयर की तीन काली पट्टी नज़र आ रही थी. दो पट्टी उसके कंधे से आकर एक आधी पट्टी पर रुक रही थी. उसकी ब्रेसीयर काफ़ी टाइट थी जिस'से उसकी ब्रा की पट्टी के बाजू से उसकी त्वचा उभर'कर आई थी. नीचे उसके गोल गोल मांसल चुत्तऱ उसके पॅंटीस में से बिल'कुल भरे हुए नज़र आ रहे थे. और उसके नीचे उसकी गोरी लंबी टाँगें और भी बेहतरीन नज़र आ रही थी.

मेने मेरा हाथ ऊर्मि दीदी की पीठ'पर, ब्रा के हुक'पर रख दिया. जैसे ही मेरी उंगलीयों का स्पर्श उसे हुआ वैसे उसके बदन'पर रोंगटे खड़े हो गये. मेने मेरे दोनो हाथों की उंगलीया उसके ब्रा के हुक के दोनो बाजू से पट्टी के नीचे घुसा दी और में उस'का हुक निकाल'ने लगा. ब्रेसीयर टाइट थी इस'लिए मुझे हुक निकाल'ने में परेशानी हो रही थी लेकिन फिर भी में हुक निकाल'ने में काम'याब हो गया. हुक खुलते ही ब्रा की पट्टी छिटक गयी और उसकी बगल में जाकर गीर गई.

फिर में उठ गया और वापस ऊर्मि दीदी के पैरो तले बैठ गया. मेने मेरी उंगलीया उसकी कमर'पर पॅंटीस के इलास्टीक में घुसा दी और में उसकी पॅंटीस नीचे खींच'ने लगा. जैसे जैसे में पॅंटीस नीचे खींच रहा था वैसे वैसे उसके चुत्तऱ मेरी आँखों को नज़र आते गये. वो! क्या मस्त दिख रहे थे मेरी बहन के भरे हुए चुत्तऱ!! में जल्दी जल्दी पॅंटीस नीचे खींचता गया और फिर उसके पैरो से मेने उसे निकल दिया.

अब ऊर्मि दीदी. मेरी लाडली बड़ी बहन. मेरे साम'ने. पूरी नंगी. अप'ने पेट'पर लेटी हुई थी..

वो मुझे देख नही रही थी इस'लिए मेने उसकी पॅंटीस, जो पैरो से निकालते सम'य लपेट के उल'टी हुई थी, उसे सीधी की और में उस'को गौर से देख'ने लगा. जब मेने पॅंटीस का चूत का भाग देखा तो वहाँ मुझे गीला स्पॉट नज़र आया. वो स्पॉट देख'कर मुझे आश्चर्य लगा. क्योंकी थोड़ी देर पह'ले जब मेने देखा था तब वो स्पॉट वहाँ पर नही था. मेने उस स्पॉट को उंगली लगा'कर चेक किया तो मुझे पता चला के वो ऊर्मि दीदी की चूत का रस था. इसका मतलब ये था के वो उत्तेजीत हो गयी थी.

में ऊर्मि दीदी को नंगी कर रहा था और उस'से अगर वो उत्तेजीट हो रही थी तो मेरा आगे का काम आसान था. अगर मेने कोशीष की तो उसकी उत्तेजना का फ़ायदा उठाकर में उसके साथ बहुत कुच्छ कर सकता था ये जान'कर में खूस हो गया. एक पल के लिए मुझे लगा के में उसकी चूत रस का वो गीला स्पॉट चाट लू लेकिन फिर मेने सोचा के उस'का चूत रस उसकी पॅंटीस से चाट'ने की क्या ज़रूरत है अगर वो 'सोमरस' सीधा मुझे जहाँ से पैदा हुआ है वहाँ से पीने को मिले तो?? यानी के ऊर्मि दीदी की चूत अगर मुझे चाट'ने को मिल'नेवाली होगी तो..??
 
ऊर्मि दीदी के नंगे बदन को आगे से देख'ने के लिए मेने धीरे से उसे पेट से पीठ'पर घुमा लिया. वो घूम गयी और मेने देखा के उस'ने अप'नी आँखें ज़ोर से बंद की थी. जैसे ही वो घूम गई उस'ने अपना एक हाथ अप'नी चूत'पर रख'कर उसे छुपाने की कोशीष की. उसके ब्रा के पत्ते अब भी उसके कन्धोपर थे इस'लिए घूम'ने के बाद भी वो ढीली ब्रेसीयर उसके छाती के उभारो पर थी. और फिर भी उस'ने अपना दूसरा हाथ अप'ने उभारोपर आढा रख'कर उन्हे मेरी नज़ारो से च्छुपाने की कोशीष की.

ऊर्मि दीदी की ब्रेसीयर निकाल'ने के लिए मेने उसके पत्ते दीदी के कंधो से खींच लिए. उसे अप'ने हाथ उठाने पड़े और फिर मेने पूरी ब्रेसीयर निकाल के बाजू में डाल दी. उस'ने वापस अपना हाथ अप'नी छाती पर आढा रख दिया. मेने उस'का हाथ पकड़ा और खींचा लेकिन वो ज़ोर से अपना हाथ छाती पर रखे हुए थी. मेने दो तीन बार खींच'ने की कोशीष की लेकिन उस'का हाथ हटा नही. आखीर मेने ज़ोर लगा के उस'का हाथ खींचा और उसकी छाती से हटा दिया. बड़ी मुश्कील से उस'ने हाथ हटाया और ले जाकर अप'नी चूत पर रख'कर दोनो हाथों से चूत छुपा ली.

अब मुझे ऊर्मि दीदी के गदराई छाती के उभार साफ साफ नज़र आ रहे थे. वो लेटी थी इस'लिए वो बाजू में थोड़े गिरे हुए थे लेकिन फिर भी उनमें अच्च्छा ख़ासा उभार था. उसके छाती पर डार्क चाकलेटी रंग का गोल अरोला और उसके बीच में उस'का निप्पल उभर के दिख रहा था. उस'का निप्पल तकरीबन एक सेंटीमीटर लंबा हो गया था और अच्छा ख़ासा कड़ा हो गया था. उसे देख'कर मुझे तो यकीन हो गया के मेरी बहन उत्तेजीत हो गयी थी. आखीर क्यों नही होंगी?? किसी मर्द के साम'ने नंगी होने के बाद कौन उत्तेजीत नही होंगी? भले वो मर्द खुद का सगा भाई क्यों ना हो.!

अब मेने मेरा ध्यान ऊर्मि दीदी की जांघों के बीच लाया. मेने उसके हाथ उसकी चूत से निकाल'ने की कोशीष की लेकिन यहाँ भी उस'ने ज़ोर से पकड़ के रखे थे. एक दो बार उसके हाथ निकाल'ने की कोशीष कर'ने के बाद मेने उसे कहा,

"कम ऑन, दीदी! देख'ने दो ना. मुझे ये तुम्हारा 'मुख्य' भाग.. औरत का यही तो 'ख़ास' भाग देख'ने के लिए में तरस रहा हूँ." उस'पर ऊर्मि दीदी मूँ'ह से कुच्छ ना बोली लेकिन उस'ने अपना सर हिला के 'नही' का इशारा किया. उस'का चेह'रा शरम से लाल हो गया था और होंठो पर शरारती हँसी थी. मेने फिर ज़ोर लगा के उस'का हाथ चूत से हटा दिया. इस बार उस'ने चूत को च्छुपाया नही और वैसे ही पड़ी रही. फिर मेरी बहन के नंगे बदन पर में अप'नी वास'ना से भरी नज़र उप्पर नीचे घुमाने लगा और उसे निहार'ने लगा. उसके जवाना अंगो को देख'कर अप'ने आप मेरे मूँ'ह से निकल गया,

"वो.! ब्यूटीफूल.! बिल'कुल सेक्सी..!"

"नालायक, कही का!! " ऊर्मि दीदी ने झुटे गुस्से से कहा, "तुम्हें शरम नही आती अप'नी सग़ी बहन को नंगी देख'ते हुए??"

"उस में शरमाना क्या, दीदी?" मेने बेशरामी से हंस के जवाब दिया, "अगर तुम्हें शरम नही आ रही है अप'ने भाई के साम'ने नंगी होने में तो फिर भाई को क्यों शरम आएगी बहन को नंगी देख'ने में??"

"छी, सागर! तुम'ने तो मुझे बिल'कुल निर्लज्ज और बेशरम बना दिया." ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी लज्जा के मारे घूम गयी और मेरी तरफ पीठ करके लेट गयी. a
 
"सॉरी! सॉरी!. सॉरी, दीदी! मेने मज़ाक में वैसे कहा. नाराज़ मत होना . में रियली सॉरी." ऐसा कह'कर मेने वापस उसे सीधा किया. ऊर्मि दीदी चुप'चाप सीधी हो गई और में वापस उस'का ननगपन आँखों से निरिक्षण कर'ने लगा.

"तुम आँखें क्यों नही खोल'ती, दीदी? अब और कित'ना शरमाओगी? आलरेडी तुम काफ़ी देर से मेरे साम'ने नंगी हो."

"हाँ ! मुझे मालूम है. लेकिन फिर भी.. मुझे बहुत शरम आ रही है के मेरा भाई मुझे नंगी देख रहा है इस'लिए. और अगर आँखें खोल के में निर्लज्ज की तरह तुम्हें देख'ती रही तो तुम्हें शरम आएगी मेरा ननगपन देख'ने के लिए. तुम अच्छी तरह से देख सको इस'लिए मेने आँखें बंद रखी है इस ख़याल से के मुझे कोई नही देख रहा है. जैसे बिल्ली आँखें बंद कर के दूध पीती है और उसे लग'ता है के कोई उसे नही देख रहा है. वैसे." ऐसा कह'कर ऊर्मि दीदी हंस'ने लगी.

"थॅंक्स, दीदी!" मेने ऊर्मि दीदी को दिल से धन्यवाद देते हुए कहा, "मुझे मालूम है. इस दूनीया की कोई भी बहन अप'ने भाई के साम'ने ऐसी नंगी नही होगी. लेकिन तुम तैयार हो गयी और तुम'ने कर के दिखाया. सिर्फ़ मेरे लिए! में हरदम तुम्हारा आभारी रहूँगा! थॅंक्स!!"

"अरे इस में थॅंक्स क्या कह'ना, सागर? उलटा मुझे अच्च्छा लगा के मेने तुम्हें खूस किया. तुम'ने मुझे दिन भर खूस रखा इस बात का थोड़ा बहुत अहसान में चुका सकी. तुम चाहे उतना सम'य ले लो. बिल'कुल बीना जीझक मुझे निहार लो. और अप'नी जिग्यासा पूरी कर लो."

क्रमशः……………………………
 
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