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Fantasy कालदूत(पूर्ण)


[color=rgb(184,]भाग ११[/color]


सबका खाना हो चूका था, रमण अब भी अपने की खयालो मैं गम था, रमण इस वक़्त अपने घर की छत पर खड़ा हो कर अपने केस बे बारे मैं सोच रहा था तभी राघव वहा आया

राघव-कालदूत के बारे मैं सोच रहे हो भाई

रमण-ह...क....क्या मैं समझा नहीं?

राघव के अचानक वहा आने और सीधे कालदूत के बारे मैं पूछने से रमण चौका

राघव-आपका नया केस जो आप संभल रहे हो वो कालदूत से जुडा हुआ है न

रमण-हा...पर तुम्हे इसके बारे मैं कैसे पता मैंने तो आज इस बारे मैं घर मैं भी कोई बात नहीं की

राघव ने फिर रमण दिन भर मैं हुयी घटनाओ के बारे मैं बताया और ये भी बताया के कैसे उस माला की मदद से उसके रमण का दिमाग पढ़ा और उसके दादा की किताब और कालदूत के बारे मैं भी रमण साडी बातो को गौर से सुन रहा था

रमण-राघव तुम्हे सच मैं लगता है की कोई कालदूत होगा

राघव-पता नहीं भाई इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं है फिलहाल पर आप बताओ आपको क्या लगता है और इस कालदूत नाम से आपका पला कैसे पडा

रमण ने फिर संतोष से हुयी पूरी बात राघव को बताई और साथ ही अपनी शंका भी की उसे संतोष मैं कुछ गड़बड़ लग रहा है

रमण- राघव मैं नहीं जनता की ये लोग कौन है और कोई कालदूत है भी या नहीं मैं बस इतना जनता हु के ये कुछ दिमाग से विक्षिप्त लोग है जोइस समाज के लिए एक खतरा है और इन्हें अगर यहाँ नहीं रोका गया तो पता नहीं और कितनी जाने जाएँगी

रमण राघव से बात कर रहा था उर राघव कुछ सोच रहा था

रमण-क्या सोच रहे हो

राघव-भाई आप जब उन लडको को वह बचने गए थे तब वह उनके अलावा भी कोई था क्या

रमण-नहीं हमें वह बस संतोष और रोहित की जली हुयी लाश ही मिली और हम संतोष को अपने साथ ले आये

राघव-आपने उस जगह को छान मारा था

रमण-हा मगर हमें वहा कुछ नहीं मिला संतोष ने कहा था के वो लोग दोबारा आयेंगे उसकी बलि देने ऐसा कह कर वह से चले गए थे

राघव-मतलब उनलोगों को पता नहीं था के पुलिस ने संतोष को बचा लिया है, भाई मुझे लगता है वो लोग संतोष की बलि देने वह जरूर आये होंगे उन्हें रेंज हाथ पकड़ा जा सकता था

राघव की बात सुन कर अचानक रमण के दिमाग मैं कुछ आया और वो वहा से उठकर कही जाने लगा

राघव-अरे अचानक कहा चले

रमण- एक काम याद आ गया बस वही पूरा करने

राघव-रुको भाई अकेले मत जाओ मैं भी साथ मैं चलता हु

रमण-तुम क्या करोगे मेरे साथ मै यु गया और आया

राघव-मैं जनता हु भाई तुम किस काम के लिए जा रहे हो मैं तुम्हारे दिमाग मैं झक सकता हु इसीलिए मैं तुम्हारे साथ चलूँगा और अब पहले पुलिस स्टेशन चलो और अपनी टीम को साथ लो क्युकी आगे क्या खतरा आने वाला है हम नहीं जानते

रमण को भी राघव की बात सही लगी और वो उसे साथ लेकर पुलिस स्टेशन की तरफ निकल गया...

रमण राघव पुलिस स्टेशन मैं पहुचे...संतोष अब भी स्टेशन मैं ही था जैसा उसे रमण से कहा था, राघव ने संतोष को देखते ही सबसे पहले उसकी आँखों के जरिये उसके दिमाग मैं झाकने की कोशिश की मगर संतोष पता नहीं क्यों उससे नजरे नहीं मिला रहा था, राघव को कुछ खटका पर अभी उसने इस बात पर धयन नहीं दिया, रमण ने चन्दन और ३ हवलदारो को अपने साथ लिया और उन्हें साडी बात समझाई

संतोष-सर क्या मैं आपके साथ चल सकता हु

रमण-क्या??लेकिन अभी अभी ट्यूम मौत के मुह से बचकर इतनी मुश्किल से आये हो फिर वापिस क्यों जाना चाहते हो

संतोष-उन्होंने मेरे सबसे आचे दोस्त को मारा है इंस्पेक्टर , मुझे उम्मीद है की आप समझोगे मेरी बात

रमण(कुछ सोचकर)-हां, ठीक है तुम आ सकते हो लेकिन ध्यान रहे की हमको सही मौका मिलने तक छिप कर रहना है ये लोग काफी खतरनाक है

संतोष- मैं समझ गया

अँधेरा हो चूका था रमण राघव संतोष और अपनी टीम के साथ उस कब्रिस्तान वाली जगह पर पहुच गया और वो लोग वह छिप कर बैठ गए, इस वक़्त कब्रिस्तान मैं चाँद की रौशनी फैली हुयी थी और वह केवल एक कालसैनिक था, रमण ने आगे बढ़ कर उसके पकड़ना चाह पर राघव ने उसे वही कुछ देर रुक कर इंतजार करने कहा,

कुछ ही देर मैं वहा एक काले रंग की बडी सी वैन आकर रुकि और उसमे से काले चोगे और नकाब वाले कुछ लोग उतरे, वो लोग आपस मैं कुछ बात कर रहे थे और चुकी रमण और बाकि सब पास ही छिपे हुए थे वो उनकी आवाज़ इन लोगो तक पहुच रही थी

व्यक्ति१- मुझे लगता है उन्होंने यहाँ तक हमारा पीछा किया है

व्यक्ति२-तो तयार रहो याद है न पिछली बार क्या हुआ था?

व्यक्ति३- वह देखो वे जानते है की हम यहाँ पर है

ये लोग किस बारे मैं बात कर रहे थे ये रमण और बाकि सबको समझ नहीं आ रहा था लेकिन रमण इतना समझ गया था की इन लोगो को अब तक संतोष के गायब होने का पता नहीं चला है तभी उन्होंने देखा के वहा पर एक सफ़ेद रंग की वैन आकर उस काली वैन के आगे रुकी जिसमे से कुछ लोग उतरे जिनका पहनावा कालसैनिको की तरह था बस कपडे का रंग काले की बजाय नीला था

संतोष(धीमी आवाज मैं)- इनके भी ग्रुप्स है क्या

रमण-मैं भी स्तिथि को समझने का प्रयास कर रहा हु श्श्श...लगता है कुछ बोल रहे है

काले और नीले चोगे वाले आमने सामने थे

व्यक्ति१(नीले चोगे वाला)- लगता है आपने कुर्बानी का इंतजाम कर लिया है, उसे हारे हवाले कीजिये और अपने प्राण बचाइए

ब्यक्ति२(काला)- पिछले २ लोगो को ढूंढने मैं काफी समय लगा है और इसमें हम एक आदमी भी मारा गया है तो बेहतर होगा तुम कुर्बानी भूल जाओ और यहाँ से चलते बनो

व्यक्ति१(नीला)- लगता है तुम ब्लैक हुड वालो को विनम्रता रास नहीं आती तो हमें दूसरा तरीका अपनाना होगा

वहा मौजूद काले और नीले चोगे वाले लोगो ने अपनी बंदूके निकाल की, रमण समझ गया की अगर उन्होंने बीच मैं दखल नहीं दी तो यहाँ भीषण रक्तपात हो जायेगा वो तुरन अपने साथियों को लेकर उन लोगो के सामने पहुच गया जबकि राघव और संतोष अब भी छिपे हुए थे

रमण- freeze everyone freeze और अपनी अपनी बंदूके निचे गिरा दो

वो लोग इस घटना से आश्चर्यचकित जरूर हुए लेकिन तुरंत ही अपने बीच का झगडा भूल कर उन्होने अपनी बंदूके पुलिस की और तान दी और फायर करने लगे, पुलिस ने भी जवाबी हमला किया जिसमे दो पुलिस वाले घायल भी हुए वही रमण ने अपने अचूक निशाने का प्रदर्शन करते हुए कई कालसैनिको की खोपड़ी उदा दी,

अचानक हुए इस हमले से वो लोग घबरा गए और अपनी बंदूके छोड़ कर भागने लगे तभी वहा एक अदभुत घटना घटी

एक काले चोगे वाला कालसैनिक पीछे मुडा और उसने अपना हाथ एक विशेष मुद्रा मैं हवा मैं घुमाया जिसके साथ ही रमण की बन्दूक भी उसके हाथो से छूटती चली गयी, ये देख कर रमण हैरान रह गया उसे समझ नहीं आया की कैसे इस व्यक्ति ने हवा मैं हाथ घुमा कर उसकी बन्दूक उसके हाथ से छुटा दी लेकिन उसे इस बारे मैं ज्यादा सोचने का मौका नहीं मिला क्युकी वो कालसैनिक बेतहाशा भगा जा रहा था

रमण से छलांग लगा कर उसे पकड़ लिया लेकिन उस कालसैनिक मैं बहुत शक्ति थी और रमण का उसे पकडे रखना मुश्किल ताल तभी राघव और संतोष उसकी मदद को वहा आये और संतोष ने एक पत्थर का प्रहार इस कालसैनिक के सर परे किया जिससे उसकी आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा और रही सही कसार रमण और राघव के मुक्को ने पूरी कर दी पर इस चक्कर मैं बाकि लोग वहा से भाग गए थे

रमण ने हाँफते हुए संतोष की तरफ देखा

रमण-मदद के लिए शुक्रिया

सभी लोग उस बेहोश कालसैनिक के पास जमा हो गए थे

रमण-राघव इसका नकाब हटाओ मुझे इसका चेहरा देखना है

जैसे ही राघव ने उस कालसैनिक का नकाब हटाया तो संतोष बुरी तरह चौका

संतोष- विक्रांत....!
 

[color=rgb(184,]भाग १२[/color]


संतोष- विक्रांत...!

रमण-तुम जानते हो इसे?

संतोष- ये..ये हमारा दोस्त विक्रांत है सर यही तो हमसे यहाँ मिलने आने वाला था पर...

संतोष दुविधा मैं था, उसे समझ नहीं आ रहा था के विक्रांत ऐसा क्यों करेगा, रमण भी संतोष के मुह से विक्रांत के बारे मैं सुन कर कुछ सोच रहा था और राघव जो हो रहा है उसे समझने की कोशिश कर रहा था उसे फिलहाल इस बात से कोई मतलब नहीं था के ये विक्रांत है या कोई और वो तो बस कुछ समय पहले किये विक्रांत के हाथ हवा मैं हिलाकर बन्दूक गिराने वाले कारनामे के बारे मैं सोच रहा था

विक्रांत के मुह पर पानी फैंककर उसे होश मैं लाया गया, उसके हाथो मैं पहले की हथकडिया लगायी जा चुकी थी ताकि वो भागने की कोशिश न कर सके, विक्रांत होश मैं आते ही जोर जोर से हसने लगा, इस वक़्त वह कोई इंसान नहीं बल्कि पिशाच लग रहा था

संतोष(गुस्से मैं)- तुमने ऐसा क्यों किया विक्रांत? क्यों अपने ही दोस्त की जान ले ली तुमने और तुम्हारे लोगो ने?

विक्रांत- हा हा हा, हाँ मार डाला मैंने उसे, उस कमीने का चक्कर था मेरी बीवी के साथ इसीलिए मैंने मार डाला उसे!

संतोष- तुम्हे कैसे पता, ये...ये तो बहुत समय पहले की बात है

विक्रांत- उसका मेरी बीवी के साथ अफेयर था संतोष ऐसी बात मैं कभी नहीं भूल सकता, मैं नंदिनी के साथ सेटल तो हो गया लेकिन रोहित और उसकी पस्त रिलेशनशिप की सच्चाई जानने के बाद मेरा दिल बुरी तरह से टूट चूका था, मैं डिप्रेशन मैं चला गया था, मैं एक मनोचिकित्सक के पास जाने लगा, जब उसे मेरी स्तिथि का पता चला तब उसने मुझे कुछ लोगो से मिलवाया, वो मनोचिकित्सक खुद कालसेना का सदस्य था, कालसेना से साथ जुड़ने के बाद मुझे पता चला की जिस दुनिया मैं हम रह रहे है वो कितनी खोकली है, कितनी मतलबी है कितनी नकली है और कितना नकली है इसे बनाने वाला भगवान! इसीलिए मैंने अपने लिए नया भगवान ढूंढ लिया जो मुझे वाकई मैं समझता है जो वाकई हमारे पास है और कैद है समुद्रतल की गहराइयों मैं लेकिन एक बाधा थी, हम लोगो को कुछ कुर्बानिया देनी थी ताकि कालदूत हमारा देवता समुद्रतल से बहार आ सके इसलिए हमने निशाना बनाया धर्मगुरूओ, मौलवियों और धार्मिक कार्य मैं संलग्न और लोगो को, ऐसा हमने ये देखने के लिए किया की उनको बचने उनका भगवन आता है या नहीं लेकिन कोई नहीं आया, हा हा हा...हमने उनको रोहित की तरह ही लोहे की जंजीर मैं बांधकर जला दिया लेकिन कोई नहीं आया, रोहित से बदला लेना और कुर्बानी के रिवाज को पूरा करने का परफेक्ट प्लान था मेरे पास, इसीलिए मैंने नंदिनी को बगैर बाते तुम दोनों को यहाँ बुलाया ताकि मैं रोहित को अपने हाथो से मर्टने का आनंद ले सकू और कसम से बता रहा हु संतोष उस कमीने की चीखे सुनकर आग के द्वारा उसके पिघले मांस को देखकर, उसकी छटपटाहट देखकर जो सुकून मिला वो किसी और चीज़ मैं नहीं, तुम तो बेकार ही रस्ते मैं आ गए तुमसे मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी लेकिन एक और कुर्बानी ढूंढने मैं समय लग जाता इसीलिए तुमको भी स्वः करने की योगना बनानी पड़ी, आज रोहित की कुर्बानी के साथ ही हमने अलग अलग जगहों पर कई कुर्बानिय दी है और बस बस १ कुर्बानि शेष है जो कि आने वाली पुरनमासी की रात को दी जाएगी और हमारे देवता आजाद होंगे, हा हा हा.

तुम और तुम्हारे लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त है जो एक काल्पनिक देवता को पूजते है और उसके नाम पर क़त्ल करते है, इंस्पेक्टर प्लीज इसे यहाँ से ले जाइये न जाने मैं क्या कर दूंगा

रमण-ठीक है पर क्या तुम ठीक हो, खुद को संभल लोगे

संतोष-हम्म

रमण विक्रांत को अपने साथ ले अपनी जीप मैं ले गया साथ मैं वो घायल पुलिस वाले भी थे और एक हवलदार को उसने संतोष को होटल पहुचांने कहा

जिस केस ने रमण को बुरी तरह उलझा रखा था वो केस अब उसके सामने स्पष्ट था, विक्रांत ने बगैर किसी जोर जबरदस्ती के रमण के आगे सब बक दिया था की कैसे इन लोगो ने कई लोगो का अपहरण करके उन्हें जला कर मार दिया था और साथ ही उसने कालसेना के बारे मैं भी कई साडी बाते बताई थी

रमण ने विक्रांत को पुलिस स्टेशन मैं लॉकअप मैं बंद कर दिया और राघव के साथ घर की और निकला, राघव जब से कब्रिस्तान से निकला था तब से चुप चाप था और अब भी जब गाड़ी मैं सिर्फ वो दोनों भाई थे तब भी राघव एकदम चुप था

रमण- राघव क्या हुआ इतने चुप क्यों हो अब तो एक आरोपी पकड़ा गया था जल्द ही इससे और भी जानकारी मिलेंगी, क्या सोच रहे हो

राघव-आप जितना सोच रहे हो ये सब उतना आसान नहीं है भैया, आपसे उस आदमी की बाते नहीं सुनी थी की अब केवल एक कुर्बानी शेष है मैं ये सोच रहा हु की यदि कोई कालदूत सच मैं है और अगर आपने संतोष को बचाया न होता और ये आखरी कुरबानु पूरी हो जाती तो क्या होता

रमण- तुम उसकी बातो पर विश्वास तो नहीं कर रहे?

राघव- विश्वास न करने का एक कारण बताइए, मैंने पछले २४ घंटो मैं बहुत अकल्पनीय चीज़े देखि है भाई और इसका सीधा उदहारण है मेरा घर पर आपका दिमाग पढ़ पाना, आपने कब्रिस्तान मैं उस आदमी ने क्या किया था देखा नहीं था, कैसे उसने बस अपने हाथो के इशारे से आपकी गन गिरा दी थी

अब रमण चुप था, विक्रांत को पकड़ने की जो ख़ुशी उसके मन मैं थी उसे राघव ने एक पल मैं मिटा दिया था

रमण- उस कारनामे से तो मैं भी चौक गया था

राघव-वो तेलेकिनेसिस जनता है भाई मैंने उसकी मानसिक तरंगो को महसूस किया है जो काफी प्रबल है और मेरा मन कहता है के इसके जैसे और भी होंगे

रमण-कहा मैं सोच रहा था की ये केस मैं जल्द से जल्द ख़तम कर दूंगा पर तुम्हारी बातो ने मुझे डरा दिया है

राघव- अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है भाई हम विक्रांत से और भी बहुत साडी बाते जान सकते है बस मुझे उसके दिमाग मैं झाकने की देर है

रमण-तो तुमने ये अभी क्यों नहीं किया

राघव-क्युकी मैं कुछ और सोच रहा हु

रमण-क्या?

राघव-भाई हमारे पास एक महीने का समय है क्युकी जैसा विक्रांत ने बताया अगर वो बात सही है तो आज पुरनमासी की रात है और अगली पुरनमासी को अंतिम कुर्बानी होगी अगर हम किसी तरह ये पता लगा ले की वो अंतिम कुर्बानी किसकी होगी तो हम उस इंसान को बचा सकते है और उसके जरिये इस कालसेना के मुखिया तक भी पहुच सकते है

रमण- पर ये लोग किसीकी भी बलि दे सकते है उस इंसान का पता कैसे लगाये

राघव-किसी की भी नहीं भाई ये लोग जिनकी कुर्बानी देनी होती है उन्हें चुनते है जैसे विक्रांत ने कहा था की धर्मगुरु, और धार्मिक कार्य से जुड़े लोग

रमण- पर अब राजनगर मैं ऐसा कौन है?

राघव-वही तो पता लगाना है कल सुबह विक्रांत से मिल कर आगे क्या करना है देखते है

दोनों बात करते हुए घर पहुच चुके थे वही दूसरी तरफ संतोष अपने होटल पहुच चूका था और ईस्वक्त वो अपने रूम मैं बैठ कुछ सोच रहा था तभी उसका फ़ोन बजा

संतोष- हा काम हो गया है! ब्लैक हुड के एक सदस्य को पुलिस ने पकड़ लिया है...नहीं किसी को मुझपर कोई शक नहीं हुआ लेकिन इस पुरे नाटक मैं मैं मरते मरते बचा हु, अगर वो इंस्पेक्टर सही समय पर नहीं आता तो ये ब्लैक हुड वाले मेरी जान ले लेते लेकिन कोई बात नहीं, हमारे महान उद्देश्य के लिए अगर मेरी जान भी चली जातो तो मुझे कोई अफ़सोस नहीं होता, जय कालसेना, जय कालदूत!

संतोष के चेहरे के भाव बदल चुके थे और अब उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी....
 

[color=rgb(184,]भाग १३[/color]


अगली सुबह रमण जल्दी पुलिस स्टेशन के लिए निकल गया वो विक्रांत से मिल कर जल्द से जल्द उसके मुह से कालसेना के ठिकाने का पता लगाना चाहता था, साथ ही उसके दिमाग मैं संतोष की बताई बाते भी थी, कल संतोष ने उन्हें बताया था के उसके और रोहित के हाथो से एक आदमी का खून हुआ था, रमण ने संतोष से इस घटना की पूरी जानकारी ली और एक सर्च टीम भी उस लाश की तलाश मैं लगायी थी और पुलिस को उस 7 फूट के इंसान की लाश भी मिल गयी थी

विक्रांत को इस वक़्त एक अँधेरे लॉकअप मैं बंद किया हुआ था, उस कमरे मैं केवल एक बल्ब की मधिम रोशनी थी और वो मद्धिम रौशनी उस पुरे कमरे के लिए काफी नहीं थी, रमण और विक्रांत एक दुसरे के सामने लकड़ी की खुर्ची पर बैठे हुए थे, विक्रांत के चेहरे पर पिछली लादे के कारन कई चोटों के निशान थे और उसके हाथो मैं हथकड़ी लगी हुयी थी, उस लॉकअप मैं मौत जैसा सन्नाटा था जिसे रमण की आवाज ने भंग किया

रमण- मैंने हर एक पुलिस वाले तुम्हरू सेल से दूर रहने को कहा है ताकि मैं तुमसे अकेले मैं कुछ पूछताछ कर सकू

विक्रांत- क्या जानना चाहते हो इंस्पेक्टर जो तुम्हे बताना था मैं बता चूका हु इससे ज्यादा मैं कुछ नहीं बताऊंगा, काफी हिम्मत मैं तुममे तुम भी मेरी तरह कालदूत की भक्ति करो ताकतवर भक्तो की वे कदर करते है

रमण-अपनी बकवास बंद करो और मुझे अपने मुखिया के अड्डे का पता बता दो

विक्रांत(कुटिल मुस्कराहट के साथ)- तुम उसे कभी ढूंढ नहीं पाओगे, एक आखरी कुर्बानी और कालदूत को स्वतंत्र करा देंगे हम लोग

रमण-तुम अंधविश्वासी लोगो से तंग आ गया हु मैं, तुम लोग मानसिक रूप से विक्षिप्त हो

विक्रांत-यानि की तुम्हे लगता है कालदूत सिर्फ एक मिथ्या रचना है? काश मेरे हाथ इस वक़्त खुले होते तो मैं तुम्हे बताता, telekinesis करके तुम्हारी खोपड़ी खोल देता

रमण-मुझे यकीन है की ये जो telekinesis तुम लोग करते हो इसके पीछे भी अवश्य कोई वैज्ञानिक कारण होगा,

विक्रांत-गलत इंस्पेक्टर, हमारे देवता ने हमें ये शक्तिया दी है

रमण-यानि कालदूत ने? वो इतना ही शक्तिशाली है तो अपनी कैद से खुद आजाद क्यों नहीं हो जाता? उसे तुम लोगो की जरुरत क्यों है?

विक्रांत-चाहे कोई भी आराध्य देव हो, उसे अपने भक्तो की शक्ति की जरुरत होती है जैसे तुम्हारे इश्वर को तुम्हारी भक्ति की अवशकता है वैसे ही हमारे इश्वर को हमारी भक्ति की अवशकता है, कालदूत तुम्हारे देवताओ के शाराप के कारन युगों युगांतर से समुद्रतल की गहराइयों मैं कैद है, उनको आत्माओ की शक्त चाहिए जिससे वो अपने बन्धनों से आजाद हो सके, बस एक इंसानी रूह और हमारा देवता समुद्रतल से धरातल पर आ जायेगा, हमारी १००० वर्षो की तपस्या रंग लाएगी

रमण- बस बहुत हुआ मैं तुम्हारी बकवास और नहीं सुनूंगा, तुम्हारा तथाकथित भगवान आजाद होगा या नहीं मैं नहीं जनता पर इतना जरूर जनता हु की तुम अब इस चारदीवारी से कभी बहार की दुनिया नहीं देख पाओगे,

रमण बहार आकर अपने केबिन मैं बैठा हुआ था, विक्रांत की बातो ने उसके दिमाग को विचलित किया हुआ था,

वही घर पर राघव इस समय ध्यान लगाये बैठा था और कल से उसने जितनी भी बाते उसने कालसेना और कालदूत के बारे मैं देखि और सुनी थी उन सबका आकलन अपने दिमाग मैं कर रहा था

राघव के दादाजी की उस सिद्ध माला का असर इतना जबरदस्त था की जिसे पहनते ही राघव की सुनने की क्षमता बढ़ गयी थी वो अगर पूर्ण एकाग्र होकर किसी आवाज पर धयान लगाये तो करीब १ किलोमीटर तक की आवाज सुन सकता था और अपनी इस काबिलियत का पता उसे कल शाम ही चला था जब उन्होंने विक्रांत को पकड़ा था तब राघव को कुछ लोगो की अस्पष्ट आवाजे आये थी जो जंगल मैं किसी ठिकाने की बात कर रहे थे, राघव ने जब आजू बाजु मैं नजर दौडाई तो उसे वहा कोई नहीं दिखा और फिर विक्रांत की बातो ने उसका ध्यान अपनी और खीचा था, इस वक़्त राघव अपना मस्तिष्क एकाग्र करके उन्ही आवाजो को स्पष्ट करने की कोशिश कर रहा था पर उसका कोई खास फायदा नहीं हो रहा था आखिर मैं उसे उन आवाजो से जो इन्फो मिली थी उसी के सहारे उसने आगे जाने का सोचा, राघव ने अपना ध्यान समाप्त किया और बगैर किसी को बताये घर से निकल गया, कहा जाना है वो नहीं जनता था बस उन अनजान आवाजो से उसे एक ठिकाने का पता चला था और राघव उसी की खोज मैं निकला....

राघव ने अपनी खोज की शुरुवात कल की घटना वाली जगह से करने की सोच और वो जंगल मैं उस पुराने कब्रिस्तान मैं पहुच गया पर कल ही तरह उसे आज भी वहा कुछ नहीं मिला तभी उसे कुछ दुरी पर कदमो की हलकी हलकी आवाजे सुने दी और राघव ने उनका पीछा किया, वो कदमो की आवाजे उसे जंगल के दूसरी तरफ वाले बहरी इलाके की और ले आयी,

जंगल के बहार वीरान इकले मैं एक दो मंजिला इमारत बनी हुयी थी और इस दो मंजिला ईमारत मैं कुछ हलचल हो रही थी, उस इमारत की सुरक्षा के लिए कुछ १०-१२ लोग हाथ मैं बन्दूक लिए बहार तैनात खड़े थे राघव कुछ समझ नहीं पा रहा था, उसने कभी सपने मैं भी नहीं सोचा था की उसके शहर के बहार उसे ऐसा कुछ देखने मिलेगा, राघव ने अब अपनी दूर का सुनने की काबिलियत का इस्तमाल करने का सोचा और वही छिप कर उस इमारत से आती आवाजो पर ध्यान केन्द्रित किया,

उस इमारत के उपरी हिस्से मैं एक बहुत ही आलिशान शयनकक्ष बना हुआ था वहा बिस्तर पर एक व्यक्ति चिंता की मुद्रा मैं बैठा हुआ था, लगभग ३५ की उम्र और बलिष्ट शारीर वाला वो व्यक्ति जिसकी दाढ़ी उसकी छाती तक आ रही थी, चेहरा दाढ़ी से ढका हुआ लेकिन बहुत प्रभावशाली था, जीन्स और ढीली ढली बनियान पहने वो व्यक्ति ठोड़ी पर हाथ रखकर किसी गहन चिंतन मैं डूबा हुआ था, घडी की टिक टिक उस शांत कमरे की शांति को भंग कर रही थी तभी उस कमरे मैं एक खबसूरत महिला आई और व्यक्ति की तन्द्रा को उसके कंधे पर हाथ रखकर भंग कर दिया.....

To be continue......
 

[color=rgb(209,]भाग १५[/color]

सुशेन सिद्धार्ट को साथ लेकर अपनी कार से अपने भाई शक्ति से मिलने निकल गया

सिद्धार्थ- सर क्या आपको सचमे लगता है के रमेश को मारने मैं ब्लू हुड वालो का हाथ है

सुशेन- कभी कभी जो हम सोचते है वो सही नहीं होता सिद्धार्थ, मैं ये नहीं कहता की मेरा भाई ऐसा नहीं कर सकता मगर मेरी चिंता का विषय शक्ति नहीं है, जितना मैं मेरे भाई को जानता हु उस हिसाब से शक्ति ने अगर रमेश को मारा होता तो वो ये काम छिपकर नहीं करता बल्कि बता कर करता, शक्ति कायर नहीं,

सिद्धार्थ-तो आपके हिसाब से ये काम ब्लू हुड का नहीं है

सुशेन-हम सिर्फ चीजों का अनुमान लगा सकते है सिद्धार्थ और मेरा यकीं करो अगर रमेश की हत्या मैं कही भी ब्लू हुड शामिल रहा तो मैं शक्ति समेत सरे ब्लू हुड को ख़तम कर दूंगा, पर फिलहाल मुझे एक और बात ने परेशां किया हुआ है

सिद्धार्थ-किस बात ने?

सुशेन-बात ऐसी है की सिर्फ रमेश ही नहीं मरा है और भी कई लोग मरे है..

सिद्धार्थ- क्या?कौन? कैसे?

सुशेन- ये कालसेना काफी बडी है सिद्धार्थ, हमारे लोग साडी दुनिया मैं मौजूद है और कालदूत की भक्ति करते है, कालसेना के मुखिया को एक शक्ति विरासत मैं मिलती है....चुकी अभी मैं इस कालसेना का मुखिया हु तो हर कालसैनिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मेरी मानसिक तरंगो से जुडा हुआ है और मेरे जरिये भगवन कालदूत से फिर वो चाहे ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड, कालदूत हमें इसी माध्यम से शक्तिया प्रदान करते है, पिछले कुछ दिनों मैं मैंने अपनी इन मानसिक तरंगो मैं थोड़ी कमी महसूस की है, जब मैंने इसकी छानबीन की तोमैने पाया की हमारे कई कालसैनिक दुनिया के अलग अलग कोनो मैं मरे पाए गए है, पिछले कुछ दिनों मैं हमने जितनी भी बलिया दी है उससे कई ज्यादा अपने लोगो को खोया है, कोई तो है जो सालो से छिपी हमारी कालसेना से बारे मैं जानता है और हमपर पीछे से वार कर रहा है ताकि हमें कमजोर कर सके और उसका यु छिपा होना ही मेरे लिए सबसे बडी चिंता का विषय है....

सिद्धार्थ-ये तो काफी गंभीर बात है

सुशेन-इसीलिए मैं शक्ति से मिलना चाहता हु ताकि आपसी मतभेद मिटा कर कालसेना को और भी मजबूत कर सकू.....

डिक्की मैं छुपा राघव सुशेन और सिद्धार्थ की बाते सुन रहा था, उसे सुशेन की बाते सुन कर आश्चर्य और ख़ुशी हो रही थी...आश्चर्य इस बात का की जहा उसे कालसेना और कालदूत के बारे मैं कुछ ही दिन पहले पता चला था वही इस दुनिया मैं कोई ऐसा था जो स कालसेना से मुकाबला कर रहा था और उसके लोगो को मार भी रहा था और ख़ुशी इस बात की की इस लडाई मैं वो अकेला नहीं था, उसके दादाजी की लिखी बात उसे याद आ गयी की इस लडाई मैं उसे और भी लोगो की जरुरत होगी और शायद ये वही लोग थे जिनके बारे मैं सुशेन बात कर रहा था.....

कुछ समय बाद....

शहर के बाहर एक सुनसान इलाके मैं सन्नाटे को चीरती हुयी सफ़ेद रंग और काले रंग की गाडिया आमने सामने जा खड़ी हुई, काले रंग की गाड़ी से सुशेन और सिद्धार्थ निकले और सफ़ेद रंग की गाड़ी से शक्ति जो की सिद्धार्थ की ही उम्र का था, बाहर आया, राघव अब भी गाड़ी की डिक्की मैं छिपा हुआ था, वो सुन सब सकता था पर किसी को देख नहीं सकता था,

शक्ति- बहुत दिनों बाद मिले बड़े भाई

सुशेन-तुमने ऐसा क्यों किया शक्ति? तुमने रमेश को क्यों मारा?

शक्ति(हतप्रभ होकर)- क्या? मैंने किसी को नहीं मारा!

सुशेन(क्रोध मैं)- बहुत हुआ! पहले तुम्हारे लोगो ने कब्रिस्तान मैं आखरी कुर्बानी होने नहीं दी फिर तुम्हारी वजह से मेरा एक आदमी विक्रांत पुलिस कस्टडी मैं है और अब ये क़त्ल!

शक्ति- क्या बकवास कर रहे हो भाई, तुम अच्छी तरह जानते हो शक्ति जो भी करता है डंके की चोट पर करता है ऐसे कायरो की तरह छिप कर वार नहीं करता और हा वो आखरी कुर्बानी जिसकी तुम बात कर रहे हो वो मेरा ही आदमी था...संतोष!

सुशेन-क्या?

सुशेन की तरह राघव भी इस बात से काफी हैरान हो गया था....

शक्ति-हा, दरअसल लगातार हो रहे अपहरणों और हत्याओ की वजह से पुलिस ने जगह जगह घेराबंदी कर राखी थी इसीलिए मैंने संतोष को अपने किसी जान पहचान वाले को कुर्बानी के लिए लाने कहा क्युकी उसकी मौत से इतना हल्ला भी नहीं मचता लेकिन मेरे कुछ करने से पहले ही तुम्हारे आदमी विक्रांत ने जाकर दोनों को पकड़ लिया, रोहित को तो उसने मार दिया लेकिन किस्मत से संतोष बच गया, हम कुछ करते इससे पहले ही उस इंस्पेक्टर ने उसे बचा लिया

सुशेन- पर तुमको कैसे पता चला की हमने रोहित और संतोष को कहा रखा है

शक्ति-विक्रांत की बीवी हमारे ब्लू हुड की मेम्बर है

सुशेन- या? मतलब तुम्हे नंदिनी के जरिये विक्रांत और हमारी सारी गुप्त खबरे मिलती थी

शक्ति- सारी तो नहीं लेकिन थोडा बहुत पता चल ही जाता था, जब विक्रांत का अचानक राजनगर आने का प्लान बना तभी नंदिनी ने हमको सतर्क कर दिया था, दरअसल विक्रांत और नंदिनी अपने आपसी रिश्ते के कारन बहुत परेशां थे और कई बार बात तलाक तक पहुच चुकी थी, जब तुमने विक्रांत को ब्लैक हुड मैं शमिल किया तभी मैंने नंदिनी को ब्लू हुड का सदस्य बनाया, इसके लिए मुझे ज्यादा म्हणत भी नहीं करनी पड़ी, नंदिनी जानती थी की विक्रांत ब्लैक हुड का मेम्बर है जबकि विक्रांत नंदिनी की सच्चाई के बारे मैं अनजान था, एक ही छत के निचे दो अलग अलग दलों के सदस्य रह रहे थे और जहा तक बात पुलिस की है तो तुम्हारा आदमी विक्रांत अपनी मुर्खता की वजह से पकड़ा गया है

सुशेन- लेकिन.....

सुशेन कुछ बोलता तभी अचानक शक्ति का फ़ोन बजा, उसने फ़ोन उठाया लेकिन कुछ सुनने के बाद एकदम हैरान रह गया

सुशेन-क्या हुआ?

शक्ति- मेरे दो लोगो को किसी ने एक पेड़ पर फासी से तांग दिया है

सुशेन-ये सब आखिर हो क्या रहा है? हम कालसेना है हमें मारने की हिम्मत किसमे आ गयी वो भी इतना चोरी छिपे और इतनी सफाई के साथ?

शक्ति-लोगो को मारते वक़्त कभी ये ख्याल आया ही नहीं की हम भी मारे जा सकते है, हमें लगने लगा था की कालदूत के भक्त होने के कारन हम अभेद्द है लेकिन अब इस बात पर मुझे संशय होने लगा है

सुशेन-किसी भी प्रकार के संशय मैं मत रहो छोटे भाई, कालदूत के भक्त भले ही संख्या मैं कम हो लेकिन सबसे शक्तिशाली थे और सबसे शक्तिशाली रहेंगे, हमारे दल के कुछ लोग मरे गए इसका ये अर्थ नहीं की पूरी कालसेना कमजोर है, ये जो कोई भी है इसे अपने किये की भरी कीमत चुकानी पड़ेगी, हमारे बिच मतभेद हो सकते है लेकिन किसी भी बाहरी समस्या से लड़ने के लिए हमें एकजुट हो जाना चाहिए

शक्ति-सही कहा तुमने भाई, आखरी कुर्बानी कोई भी दे बस कालदूत का जागना आवश्यक है, अभी मैं चलता हु कुछ होगा तो खबर कर दूंगा

सुशेन- ठीक है

शक्ति अपनी सफ़ेद गाडी मैं बैठकर निकल गया और सुशेन भी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ा ही था की तभी अचानक उसके कानो को हवा मैं एक तेज सरसराहट की आवाज सुने दी, उसने देखा की एक तेज धार चाकू गाड़ी के पास खड़े असावधान सिद्धार्थ की ओर तेजी से बढ रहा है, सुशेन ने तुरंत अपना हाथ उठाया और telekinesis द्वारा उस चाकू को हवा मैं ही रोक दिया फिर सुशेन और सिद्धार्थ दौड़ कर उस दिशा मैं गए जहा से चाकू आया था पर वहा उन्हें कोई नहीं मिला जिसके बाद वो वापिस गाड़ी के पास आये

सुशेन-तुम ठीक हो न लड़के?

सिद्धार्थ-ज..जी,, ये चाकू मैं कुछ लगा है?

तब सुशेन का ध्यान गया की चाकू मैं एक छोटा कागज का टुकड़ा लगा हुआ है, उसने चाकू उठाकर कागज का टुकड़ा उसकी नोक से बाहर निकाला, उसपर लिखा था "दो घंटे मे हीरालाल रेस्टोरंट आ जाओ, जिसे तुम धुंध रहे हो वो मैं ही हु" ये पढ़ते ही सुशेन की आँखें क्रोध से लाल हो गयी

सिद्धार्थ-क्या हुआ?

सुशेन-उसकी इतनी हिम्मत? मेरे लोगो को मारकर मुझे ही रेस्टोरंट मैं बुलाता है

सिद्धार्थ-कौन है ये?

सुशेन-वही, ब्लैक और ब्लू हुड के लोगो का कातिल

सिद्धार्थ-मैं चलता हु आपके साथ

सुशेन-नहीं तुम वापस जाओ मैं अकेले जाऊंगा

सिद्धार्थ-लेकिन सर....

सुशेन-मैंने कहा न जाओ मुझे कुछ नहीं होगा, जाओ...

सिद्धार्थ चला गया और सुशेन गाड़ी लेकर हीरालाल रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ गया और उसकी के साथ राघव भी......
 

[color=rgb(184,]भाग १४[/color]


राघव अपने ध्यान मैं उस इमारत की आवाजे सुनने की कोशिश कर रहा था, उसे इस जगह पर ये इमारत और ये लोग देख के अचंभा भा था क्युकी उसने नहीं सोचा था की शहर के इस इलाके या यु अकाहे की जंगल की तरफ कोई रह सकता है वो जानना चाहता था की ये लोग कौन है पर उसे क्या पता था की जिन लोगो की तलाश मैं वो निकला है किस्मत उसे वही ले आई है

उस इमारत के उपरी हिस्से मैं एक बहुत ही आलिशान शयनकक्ष बना हुआ था वहा बिस्तर पर एक व्यक्ति चिंता की मुद्रा मैं बैठा हुआ था, लगभग ३५ की उम्र और बलिष्ट शारीर वाला वो व्यक्ति जिसकी दाढ़ी उसकी छाती तक आ रही थी, चेहरा दाढ़ी से ढका हुआ लेकिन बहुत प्रभावशाली था, जीन्स और ढीली ढली बनियान पहने वो व्यक्ति ठोड़ी पर हाथ रखकर किसी गहन चिंतन मैं डूबा हुआ था, घडी की टिक टिक उस शांत कमरे की शांति को भंग कर रही थी तभी उस कमरे मैं एक खबसूरत महिला आई और व्यक्ति की तन्द्रा को उसके कंधे पर हाथ रखकर भंग कर दिया.

सारा-क्या कल की घटना को लेकर अभी तक चिंतित हो?

सुशेन-कल हमारे एक आदमी को पुलिस ने पकड़ लिया

सारा-चिंता मत करो विक्रांत अपना मुह कभी नहीं खोलेगा

सुशेन- मुझे उसकी चिंता नहीं है, मैं जनता हु विक्रांत अपना मुह नहीं खोलेगा मुझेतो एक बात समझ मैं नहीं आ रही है की ये ब्लू हुड वालो को कैसे पता चला की हम उस जगह अंतिम कुर्बानी देने वाले थे?

सारा-हा, पूरा प्लान एकदम सही था, कल के दिन हमने इतनी साडी कुर्बानिय दी और बस एक अंतिम कुर्बानी देनी बची थी लेकिन ब्लू हुड और पुलिस दोनों हमारी लोकेशन जान गए

सुशेन- हमारा एक आदमी अब इंस्पेक्टर रमण की गिरफ्त मैं है

सरह-ये रमण आजकल कुछ ज्यादा ही तंग कर रहा है तुम्हे हनी

सुशेन- इसका भी बंदोबस्त जल्द ही होगा सारा इसे भी भगवान कालदूत के काम मैं रोड़ा बनने की सजा मिलेगी

तभी एक २७ वर्ष का लड़का तेजी से दौड़ते हुए कमरे मैं आया,उसके चेहरे पर चिंता साफ़ झलक रही थी और उसका पूरा चेहरा पसीने से भरा हुआ था

सुशेन(गुस्से से )- क्या है सिद्धार्थ? क्या हुआ जो तुमने दरवाजा खटखटाना जरुरी नहीं समझा

सिद्धार्थ-क्षमा करे लेकिन बात ही कुछ ऐसी है की..

सुशेन-क्या बात है

सिद्धार्थ-हमारे ब्लैक हुड का एक कालसैनिक रमेश जंगल मैं मरा पड़ा मिला है, पुलिस ने लाश बरामद कर ली है

सारा(चौक कर)- क्या! पर उसे कौन मार सकता है?

सुशेन-सामान्य व्यक्ति के लिए रमेश को मारना बड़ा मुश्किल था क्युकी रमेश telekinesis का अच्छा ज्ञाता है

सारा-तो क्या ये ब्लू हुड का काम हो सकता है ?

सुशेन-इशारा तो इसी तरफ है हर चीज़ का, मुझे अपने छोटे भाई से बात करनी होगी

सारा-तुम्हारा भाई शक्ति आखिर ऐसा कर क्यों रहा है? कालदूत की पूजा तो हम सबको मिलकर करनी चाहिए चाहे वो ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड, कालदूत हम सबके आराध्य देव है

सुशेन (गहरी सास लेकर)- जैसा की तुम्हे पता है की कालसेना के मुखिया की मृतु होने पर मुखिया के पद के लिए कालसेना के सबसे काबिल सदस्यों के बीच जंग होती है, ये पद हमेशा से मेरे परिवार के पास रहा है क्युकी तंत्र, मंत्र और telekinesis मैं हमसे अच्छा ज्ञाता कोई नहीं है, जब पिताजी की मृतु हुयी तब मैंने भी हर शक्तिशाली कालसैनिक से लड़ कर ये पद जीता है लेकिन मुझे बराबर की चुनौती अगर किसी से मिली तो मेरे खुद भाई से, शक्ति से....लेकिन जब काफी समय तक लड़ते रहने के बाद भी हमारे बीच कोई हल नहीं निकला तो पूरी कालसेना के बीच मतदान कराया गया, उसमे भी ७५% लोगो ने मुझे ही अपना मुखिया चुना लेकिन शक्ति को ये गवारा नहीं हुआ और वो अपने २५% समर्थक लेकर कालसेना से अलग हो गया और तबसे ये कालसेना दो भागो मैं बट गयी...ब्लैक हुड और ब्लू हुड

सारा- एक मिनट! मुझे तो लगा था के ब्लू हुड और ब्लैक हुड को उगम एक साथ हुआ है

सुशेन-नहीं सारा! ब्लैक हुड जो की मुख्या रूप से कालसेना कहा जाता है उसकी स्थापना मेरे महँ पूर्वज बिरजू नाम के एक नाविक ने १००० साल पहले की थी जबकि बलुद हुड अभी ६ साल पहले बना है जिसे मेरे भाई शक्ति ने बनाया है, तुम ये सब बाते नहीं जानती क्युकी तब तुम हमारे साथ नहीं थी बाद मैं आई हो

सिद्धार्थ-तो...आपको लगता है के रमेश को बलौर हुड के लोगो ने मारा है?

सुशेन-मुझे शक्ति से इस बारे मैं बात करनी होगी तभी मैं कुछ कह पाउँगा मुझे उससे मिलना होगा

सारा-पर तुम अकेले नहीं जाओगे सिद्धार्थ भी तुम्हारे साथ जायेगा

सुशेन- ठीक है उसके पहले सिद्धार्थ तुम ब्लू हुड से संपर्क करो और उन्हें मिलने की जगह बताओ

सिद्धार्थ- ठीक है

उसके बाद सिद्धार्थ ने ब्लू हुड के लोगो से फ़ोन पर बात की और उन्हें सुशेन की बताई जगह पर मिलने बुलाया,

राघव जो उस इमारत से कुछ दुरी पर बैठा था उसने अपनी शक्ति के इस्तमाल से ये सारी बाते सुनी थी, राघव ने अनजाने मैं ही कालसेना के मुखिया का पता लगा लिया था साथ ही उसे ये भी पता चल गया था की १००० वर्षो पुराणी इस कालसेना मैं फूट गिरी है, इसके लोग आपस मैं ही एकदूसरे को पसंद नहीं करते और इसका उदहारण भी वो पिछली रात को देख चूका था जब भैक और बलुद हुड के लोगो ने एकदूसरे पर बन्दूक तानी हुयी थी,

अब राघव ने वहा से न हटने की ठान ली वो अब इस कालसेना को पूरी तरह से जानना चाहता था इनकी शक्तियों के बारे मैं पता लगाना चाहता था, कुछ समय बाद राघव को उस घर मैं कुछ हलचल होती दिखी वहा उस घर के बहार कुछ काले रंग की कार आकर खडी हुयी और उसमे एक कालसैनिक कुछ सामान रखने लगा जिसके बाद वो अंदर चला गया, इस वक़्त घर के बहार पहरा देने केवल एक आदमी खड़ा था और वो हर दिशा मैं घूम कर निगरानी कर रहा था, बाकि सब लोगो अंदर बुलाया गया था, अंदर कोई मीटिंग चल रही थी

राघव ने इसी बात का फायदा उठाया और बगैर किसी की नजर मैं आये cctv कैमरे से बचते हुए वो एक कार की डिक्की मैं जाकर छिप गया, कुछ समय बाद कुछ कालसैनिक आकर उस गाड़ी मैं बैठे और मीटिंग वाली जगह की और निकल गए.....
 

[color=rgb(209,]भाग १५[/color]

सुशेन सिद्धार्ट को साथ लेकर अपनी कार से अपने भाई शक्ति से मिलने निकल गया

सिद्धार्थ- सर क्या आपको सचमे लगता है के रमेश को मारने मैं ब्लू हुड वालो का हाथ है

सुशेन- कभी कभी जो हम सोचते है वो सही नहीं होता सिद्धार्थ, मैं ये नहीं कहता की मेरा भाई ऐसा नहीं कर सकता मगर मेरी चिंता का विषय शक्ति नहीं है, जितना मैं मेरे भाई को जानता हु उस हिसाब से शक्ति ने अगर रमेश को मारा होता तो वो ये काम छिपकर नहीं करता बल्कि बता कर करता, शक्ति कायर नहीं,

सिद्धार्थ-तो आपके हिसाब से ये काम ब्लू हुड का नहीं है

सुशेन-हम सिर्फ चीजों का अनुमान लगा सकते है सिद्धार्थ और मेरा यकीं करो अगर रमेश की हत्या मैं कही भी ब्लू हुड शामिल रहा तो मैं शक्ति समेत सरे ब्लू हुड को ख़तम कर दूंगा, पर फिलहाल मुझे एक और बात ने परेशां किया हुआ है

सिद्धार्थ-किस बात ने?

सुशेन-बात ऐसी है की सिर्फ रमेश ही नहीं मरा है और भी कई लोग मरे है..

सिद्धार्थ- क्या?कौन? कैसे?

सुशेन- ये कालसेना काफी बडी है सिद्धार्थ, हमारे लोग साडी दुनिया मैं मौजूद है और कालदूत की भक्ति करते है, कालसेना के मुखिया को एक शक्ति विरासत मैं मिलती है....चुकी अभी मैं इस कालसेना का मुखिया हु तो हर कालसैनिक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मेरी मानसिक तरंगो से जुडा हुआ है और मेरे जरिये भगवन कालदूत से फिर वो चाहे ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड, कालदूत हमें इसी माध्यम से शक्तिया प्रदान करते है, पिछले कुछ दिनों मैं मैंने अपनी इन मानसिक तरंगो मैं थोड़ी कमी महसूस की है, जब मैंने इसकी छानबीन की तोमैने पाया की हमारे कई कालसैनिक दुनिया के अलग अलग कोनो मैं मरे पाए गए है, पिछले कुछ दिनों मैं हमने जितनी भी बलिया दी है उससे कई ज्यादा अपने लोगो को खोया है, कोई तो है जो सालो से छिपी हमारी कालसेना से बारे मैं जानता है और हमपर पीछे से वार कर रहा है ताकि हमें कमजोर कर सके और उसका यु छिपा होना ही मेरे लिए सबसे बडी चिंता का विषय है....

सिद्धार्थ-ये तो काफी गंभीर बात है

सुशेन-इसीलिए मैं शक्ति से मिलना चाहता हु ताकि आपसी मतभेद मिटा कर कालसेना को और भी मजबूत कर सकू.....

डिक्की मैं छुपा राघव सुशेन और सिद्धार्थ की बाते सुन रहा था, उसे सुशेन की बाते सुन कर आश्चर्य और ख़ुशी हो रही थी...आश्चर्य इस बात का की जहा उसे कालसेना और कालदूत के बारे मैं कुछ ही दिन पहले पता चला था वही इस दुनिया मैं कोई ऐसा था जो स कालसेना से मुकाबला कर रहा था और उसके लोगो को मार भी रहा था और ख़ुशी इस बात की की इस लडाई मैं वो अकेला नहीं था, उसके दादाजी की लिखी बात उसे याद आ गयी की इस लडाई मैं उसे और भी लोगो की जरुरत होगी और शायद ये वही लोग थे जिनके बारे मैं सुशेन बात कर रहा था.....

कुछ समय बाद....

शहर के बाहर एक सुनसान इलाके मैं सन्नाटे को चीरती हुयी सफ़ेद रंग और काले रंग की गाडिया आमने सामने जा खड़ी हुई, काले रंग की गाड़ी से सुशेन और सिद्धार्थ निकले और सफ़ेद रंग की गाड़ी से शक्ति जो की सिद्धार्थ की ही उम्र का था, बाहर आया, राघव अब भी गाड़ी की डिक्की मैं छिपा हुआ था, वो सुन सब सकता था पर किसी को देख नहीं सकता था,

शक्ति- बहुत दिनों बाद मिले बड़े भाई

सुशेन-तुमने ऐसा क्यों किया शक्ति? तुमने रमेश को क्यों मारा?

शक्ति(हतप्रभ होकर)- क्या? मैंने किसी को नहीं मारा!

सुशेन(क्रोध मैं)- बहुत हुआ! पहले तुम्हारे लोगो ने कब्रिस्तान मैं आखरी कुर्बानी होने नहीं दी फिर तुम्हारी वजह से मेरा एक आदमी विक्रांत पुलिस कस्टडी मैं है और अब ये क़त्ल!

शक्ति- क्या बकवास कर रहे हो भाई, तुम अच्छी तरह जानते हो शक्ति जो भी करता है डंके की चोट पर करता है ऐसे कायरो की तरह छिप कर वार नहीं करता और हा वो आखरी कुर्बानी जिसकी तुम बात कर रहे हो वो मेरा ही आदमी था...संतोष!

सुशेन-क्या?

सुशेन की तरह राघव भी इस बात से काफी हैरान हो गया था....

शक्ति-हा, दरअसल लगातार हो रहे अपहरणों और हत्याओ की वजह से पुलिस ने जगह जगह घेराबंदी कर राखी थी इसीलिए मैंने संतोष को अपने किसी जान पहचान वाले को कुर्बानी के लिए लाने कहा क्युकी उसकी मौत से इतना हल्ला भी नहीं मचता लेकिन मेरे कुछ करने से पहले ही तुम्हारे आदमी विक्रांत ने जाकर दोनों को पकड़ लिया, रोहित को तो उसने मार दिया लेकिन किस्मत से संतोष बच गया, हम कुछ करते इससे पहले ही उस इंस्पेक्टर ने उसे बचा लिया

सुशेन- पर तुमको कैसे पता चला की हमने रोहित और संतोष को कहा रखा है

शक्ति-विक्रांत की बीवी हमारे ब्लू हुड की मेम्बर है

सुशेन- या? मतलब तुम्हे नंदिनी के जरिये विक्रांत और हमारी सारी गुप्त खबरे मिलती थी

शक्ति- सारी तो नहीं लेकिन थोडा बहुत पता चल ही जाता था, जब विक्रांत का अचानक राजनगर आने का प्लान बना तभी नंदिनी ने हमको सतर्क कर दिया था, दरअसल विक्रांत और नंदिनी अपने आपसी रिश्ते के कारन बहुत परेशां थे और कई बार बात तलाक तक पहुच चुकी थी, जब तुमने विक्रांत को ब्लैक हुड मैं शमिल किया तभी मैंने नंदिनी को ब्लू हुड का सदस्य बनाया, इसके लिए मुझे ज्यादा म्हणत भी नहीं करनी पड़ी, नंदिनी जानती थी की विक्रांत ब्लैक हुड का मेम्बर है जबकि विक्रांत नंदिनी की सच्चाई के बारे मैं अनजान था, एक ही छत के निचे दो अलग अलग दलों के सदस्य रह रहे थे और जहा तक बात पुलिस की है तो तुम्हारा आदमी विक्रांत अपनी मुर्खता की वजह से पकड़ा गया है

सुशेन- लेकिन.....

सुशेन कुछ बोलता तभी अचानक शक्ति का फ़ोन बजा, उसने फ़ोन उठाया लेकिन कुछ सुनने के बाद एकदम हैरान रह गया

सुशेन-क्या हुआ?

शक्ति- मेरे दो लोगो को किसी ने एक पेड़ पर फासी से तांग दिया है

सुशेन-ये सब आखिर हो क्या रहा है? हम कालसेना है हमें मारने की हिम्मत किसमे आ गयी वो भी इतना चोरी छिपे और इतनी सफाई के साथ?

शक्ति-लोगो को मारते वक़्त कभी ये ख्याल आया ही नहीं की हम भी मारे जा सकते है, हमें लगने लगा था की कालदूत के भक्त होने के कारन हम अभेद्द है लेकिन अब इस बात पर मुझे संशय होने लगा है

सुशेन-किसी भी प्रकार के संशय मैं मत रहो छोटे भाई, कालदूत के भक्त भले ही संख्या मैं कम हो लेकिन सबसे शक्तिशाली थे और सबसे शक्तिशाली रहेंगे, हमारे दल के कुछ लोग मरे गए इसका ये अर्थ नहीं की पूरी कालसेना कमजोर है, ये जो कोई भी है इसे अपने किये की भरी कीमत चुकानी पड़ेगी, हमारे बिच मतभेद हो सकते है लेकिन किसी भी बाहरी समस्या से लड़ने के लिए हमें एकजुट हो जाना चाहिए

शक्ति-सही कहा तुमने भाई, आखरी कुर्बानी कोई भी दे बस कालदूत का जागना आवश्यक है, अभी मैं चलता हु कुछ होगा तो खबर कर दूंगा

सुशेन- ठीक है

शक्ति अपनी सफ़ेद गाडी मैं बैठकर निकल गया और सुशेन भी अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ा ही था की तभी अचानक उसके कानो को हवा मैं एक तेज सरसराहट की आवाज सुने दी, उसने देखा की एक तेज धार चाकू गाड़ी के पास खड़े असावधान सिद्धार्थ की ओर तेजी से बढ रहा है, सुशेन ने तुरंत अपना हाथ उठाया और telekinesis द्वारा उस चाकू को हवा मैं ही रोक दिया फिर सुशेन और सिद्धार्थ दौड़ कर उस दिशा मैं गए जहा से चाकू आया था पर वहा उन्हें कोई नहीं मिला जिसके बाद वो वापिस गाड़ी के पास आये

सुशेन-तुम ठीक हो न लड़के?

सिद्धार्थ-ज..जी,, ये चाकू मैं कुछ लगा है?

तब सुशेन का ध्यान गया की चाकू मैं एक छोटा कागज का टुकड़ा लगा हुआ है, उसने चाकू उठाकर कागज का टुकड़ा उसकी नोक से बाहर निकाला, उसपर लिखा था "दो घंटे मे हीरालाल रेस्टोरंट आ जाओ, जिसे तुम धुंध रहे हो वो मैं ही हु" ये पढ़ते ही सुशेन की आँखें क्रोध से लाल हो गयी

सिद्धार्थ-क्या हुआ?

सुशेन-उसकी इतनी हिम्मत? मेरे लोगो को मारकर मुझे ही रेस्टोरंट मैं बुलाता है

सिद्धार्थ-कौन है ये?

सुशेन-वही, ब्लैक और ब्लू हुड के लोगो का कातिल

सिद्धार्थ-मैं चलता हु आपके साथ

सुशेन-नहीं तुम वापस जाओ मैं अकेले जाऊंगा

सिद्धार्थ-लेकिन सर....

सुशेन-मैंने कहा न जाओ मुझे कुछ नहीं होगा, जाओ...

सिद्धार्थ चला गया और सुशेन गाड़ी लेकर हीरालाल रेस्टोरेंट की तरफ बढ़ गया और उसकी के साथ राघव भी......
 

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सुशेन ने सिद्धार्थ को रवाना कर दिया था और खुद गाडी लेकर हीरालाल रेस्टोरंट की और निकल गया और कुछ ही समय मैं वो हीरालाल रेस्टोरंट मैं था, सुशेन ने अपनी गाड़ी भीड़ भाड से दूर शांत जगह पार्क की और रेस्टोरंट मैं चला गया,

जब कुछ समय तक गाडी की कोई हलचल नहीं हुयी तो राघव ने बहार निकलने का सोचा, उसने डिक्की को हल्का सा खोलकर बाहर का जायजा लिया की कही कोई उसे देख तो नहीं रहा और जब वो पूर्ण निश्चिन्त हो गया तब वो डिक्की से निकलकर बहार आया, गाडी पहले ही भीडभाड से दूर कड़ी होने की वजह से राघव का काम आसान हो गया था और अब वो भी हीरालाल रेस्टोरंट की और जाने लगा तभी उसे उसका दोस्त सूरज वहा मिल गया

सूरज-ओए राघव

राघव-सु..सूरज तू...तू यहाँ क्या कर रहा है

सूरज-वही सवाल मुझे पूछना है, जब मैंने तुझे सुबह फ़ोन किया था तब तो तू बोल रहा था के तेरी तबियत ख़राब है और अब तू यहाँ रेस्टोरंट मैं जा रहा है, कोई लड़की वडकी पता ली क्या जो छिप कर उससे मिलने जा रहा था

राघव-अरे नहीं भाई वो...कुछ काम से आया था

सूरज-वो सब काम बादमे करियो पहले मेरे साथ चल मेरा काम ज्यादा जरुरी है

राघव-पर..भाई...वो...

सूरज-पर वर नहीं बैठ गाड़ी पे और चल

राघव ने सूरज को टालने की काफी कोशिश की लेकिन आखिर मैं उसे सूरज के साथ जाना पड़ा

वही दूसरी तरफ सुशेन रेस्टोरंट मैं पंहुचा वो वहा पहुचकर इधर उधर देख ही रतः था के तभी एक २०-२२ साल के लड़के ने उसकी तरफ देख्कर हाथ हिलाया, सुशेन उस तरफ गया, लड़का काला चश्मा लगाकर एक ब्राउन लंग का ब्लेजर और जीन्स पहनकर बैठा था, सुशेन को देखकर वो मुस्कुराता हुआ बोला "बडी ठण्ड है न राजनगर मैं, है न?

सुशेन को यकीन नहीं हो रहा था के इन हत्याओ के पीछे इस लड़के का हाथ हो सकता है, उसने पैनी नजरो से उसे देखते हुए पुचा "तो कालसैनिको को मारने के पीछे तुम्हारा हाथ है?"

वो लड़का बड़े हिउ निश्चिन्त भाव से बोला "हा, और हाथ नहीं उनको मारने के पीछे पूरा का पूरा मैं ही हु"

सुशेन अविश्वास से बोला "यकीन नहीं होता की एक बच्चा इतने काबिल लोगो को मार सकता है जो काले जादू और telekinesis मैं विशेषज्ञ थे"

लकड़ा फिर मुस्कुराता हुआ बोला.."दाढ़ी बढ़िया राखी है तुमने"

सुशेन को अब काफी गुस्सा आ रहा था लेकिन उस समय वहा रेस्टोरंट मैं काफी लोग थे इसीलिए सुशेन इस समय कुछ नहीं कर सकता था, उसने क्रोध से तमतमाते हुए पूछा "तुझे डर नहीं लग रहा लड़के?"

लड़के ने फिर बेफिक्री से कहा "मुझे भला क्यों डर लगेगा?"

सुशेन ने फिर अपनी मुट्ठी भींच ली थी, उसके क्रोध के कारण मेज पर रखे चाय के कप हिलने लगे थे, उसने उस लड़के को फाड़ कर खा जाने वाली नजरो से घूरते हुए जवाब दिया.."पता नहीं तुम बहुत ज्यादा हिम्मत वाले हो या बहुत ही ज्यादा बेवकूफ जो मेरे ही लोगो को मारकर मुझे यहा मिलने का न्योता दिया, अब तू इओस धरती पर ज्यादा दिनों का मेहमान नहीं है, पूरी कालसेना तेरे पीछे पड़ जाएगी फिर चले वो ब्लैक हुड हो या ब्लू हुड"

उस लड़के की जगह अगर कोई और होता तो सुशेन का वो अवतार देख कर सूखे पत्ते की तरफ डर से कांपने लगता लेकिन उस लड़के पर कोई असर नहीं हो रहा था

उस लड़के से सुशेन से घूरते हुए पूछा "और मुझे मरोगे कैसे? अपने काले जादू या telekinesis से? क्युकी मुझपर दोनों ही असर नहीं करते, तुम कहो तो कोशिश करके देख लो"

सुशेन(आश्चर्य से)-तुम कौन हो??

लड़के ने जवाब दिया "मेरा नाम रूद्र है और इससे ज्यादा तुम्हे बस ये जानने की जरुरत है की तुम लोग अपने अंत के लिए तयार रहो, तुम कालसेना के लोगो का पाप का घड़ा भर गया है"

सुशेन-लेकिन क्यों? क्यों मार रहे हो तुम मेरे लोगो को?

रूद्र-हा हा हा, देखो पूछ भी कौन रहा है? उस सेना का मुखिया जो १००० वर्षो से हर तीन साल के भीतर १०० लोगो की बलि दे रहा है

सुशेन-ये...ये जानकारी तुझे कैसे मिली?

रूद्र-मैंने भी अपनी रिसर्च की है कालसेना पर, खैर जो मेरी समझ मैं नहीं आया वो ये के ऐसा क्या हुआ था १००० साल पहले जो इस कालसेना की स्थापना की गयी?

सुशेन-मैं तुमको कुछ भी नहीं बताने वाला

रूद्र-देखो तुम मुझपर यहा हमला तो वैसे भी नहीं करने वाले क्युकी ये एक सार्वजनिक जगह है और तुम लोगो की आदत है छिपकर वार करना और हमला करके भी तुम खुदको ही हानि पहुचाओगे क्युकी तुम्हारा जादू मुझपर असर नहीं करता हा पर मेरे वारो का असर तुमपर जरूर पड़ेगा और वैसे भी व्यर्थ के झगडे से अच्छा है समय का सदुपयोग किया जाये

रूद्र की बातो ने सुशेन पर जादू जैसा असर किया, वो खुद को एकदम बेबस महसूस कर रहा था, आखिर वो गहरी सास लेकर बोला

सुशेन-ठीक है, वैसे भी तुमको बताने मैं कोई हानि नहीं है, हम तो चाहते है कि ये कहानी ज्यादा से ज्यादा लोग जाने और हमारे आराध्य कालदूत की शरण मैं आये तो सुनो, आज से १००० साल पहले.......(पूर्ण कहानी विस्तृत रूप से पहले और दुसरे भाग मैं बताई गयी है) बिरजू ने समुरतल से बहार आकर ऐसे लोगो को ढूंढा जो इश्वर से असंतुष्ट और नाराज थे, उनमे ऐसे लोग भी शामिल थे जिन्होंने किसी न किसी प्रकार के युद्ध मैं, महामारी के कारन या फिर किसी और वजह से अपनों को खो दिया था जिसकी वजह से इश्वर पर उनका अटूट विश्वास बुरी तरह डगमगा गया था, ऐसे लोगो को कालसेना मैं शामिल किया गया, कालसेना मैं कालदूत के भक्त सिमित संख्या मैं थे लेकिन वो ऐसे लोग थे जिनकी पहुच राजनीति, मीडिया अभिनय जैसे बड़े बड़े क्षेत्रो मैं थी, फिर शुरू हुआ बलि देने का दौर, सर्वप्रथम महात्मा बिरजू ने अपने ही पिता की बलि दी थी जो उनकी कालदूत की भक्ति के आड़े आ रहे थे, हर ३ सालो मैं कालसेना के लोग बहार निकलते और और कुर्बानी देते और फिर से गायब हो जाये और अगले तीन सालो मैं किसकी कुर्बानी देनी है इसकी प्लानिंग करते, हमारा निशाना मुख्य रूप से वो लोग रहे जो धार्मिक क्रियाओ मैं सम्मिलित रहते, कल कालसेना के लोग प्राण त्याग देते थे तब उनकी जगह उनके बच्चे ले लेते है और साथ ही नए लोग भी शामिल हो जाते है,मुखिया की म्रोत्यु के बाद सबसे काबिल लोगो मैं जंग होती है और जीतने वाले को मुखिया बनाया जाता है, अब इसे संयोग कहो या कालदूत का आशीर्वाद बिरजू के वंशजो ने हमेशा खुद को साबित करके सत्ता को अपने हाथ मैं रखा है, हमने अलग अलग देशो मैं इतनी सफाई के साथ हत्याए की थी की पुलिस प्रशासन का हमें पकड़ना नामुमकिन था, लोगो के सामने तो कालसेना कभी आई ही नहीं, दरअसल हम ही लोगो के सामने नहीं आना चाहते थे और अदृश्य रहने का काम हमने बहुत सहजता पूर्वक किया, बड़े बड़े देशो की ख़ुफ़िया एजेंसीज जैसे रॉ, CIA आदि मैं भी हमारे लोग उची पोजीशन पर थे जिन्होंने हमारे राज को बनाये रखने मैं सहायत की...

रूद्र-और अब १००० साल पुरे होने को है

सुशेन-हा इन तीन सालो मैं हम लोगो ने ९९ कुर्बानि दे दी है एक आखरी कुर्बानी और फिर हमारा देवता आजाद होगा समुद्र की गहराइयों से

रूद्र-अब ऐसा कुछ नहीं होगा

सुशेन-तुम हमको रोक नहीं पाओगे

रूद्र-दरअसल मैं रोक सकता हु पूरी कालसेना को रोक सकता हु, पता है मैंने तुम्हारे लोगो को कैसे मारा? उन्होंने मुझसे याचना की ताकि मैं रहम खाकर उन्हें छोड़ दू लेकिन मैंने अपने इन्हों हाथो से उनकी गर्दन की हड्डी तोड़ डाली, तुमको मैं छोड़ रहा हु क्युकी कालसेना को ख़तम करने के लिए किसी को पहले ही चुन लिया गया है मैं तो बस उसका काम आसान कर रहा हु पर ऐसा मत सोचना की मैं हर बार तुम्हे छोड़ दूंगा, अगली बार जब हम मिलेंगे तब हम दोनों मैं से कोई एक ही जिन्दा जायेगा.....

इतना कहकर रूद्र तेजी से वहा से बाहर निकल गया लेकिन सुशेन अब भी वही बैठा था, वो पहली बार डर महसूस कर रहा था, वही डर तो कालसेना की वजह से राजनगर मैं व्याप्त था

रूद्र के रेस्टोरंट से बहार जाते ही उसने अपने एक आदमी को फ़ोन किया "हा, एक २०-२२ साल का लड़का है...हा पीछा करो उसका....वो अभी हीरालाल रेस्टोरंट से बाहर निकला है काले रंग का चश्मा और ब्राउन रंग का ब्लेजर पहना है, पता करो वो कहा जाता है बस उसे तुम्हारी भनक नहीं लगनी चाहिए......
 

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राजनगर एक बहुत ही खुबसूरत हिल स्टेशन था, चारो और पहाड़ो और घने पेडो बीच बसा हुआ पर पिछले कुछ दिनों मैं गायब हो रहे लोगो ने शहर मैं दहशत भर दी थी,

रूद्र सुशेन से मिल कर उसे चेता कर अपने रस्ते निकल गया था उर इस वक़्त वो एक सुनसान रस्ते पर अकेला चलता हुआ जा रहा था की तभी उसे अपने पीछे कुछ हलचल सुनाई दी, उसने जब पीछे मिदकर देखा तो वहा कोई नहीं था, वो थोडा मुस्कुराया और तेज आवाज मैं बोला "ऐसे कायरो की तरह छिपने का कोई फायदा नहीं है मैं जनता हु की तुम मेरा पीछा कर रहे हो" उसके इतना बोलते ही ६ लोग काले कपडे पहने हुए झाड़ियो से निकल कर उसके सामने आ गए, उनमे से एक बोला "वैसे तो हमें कहा गया था के सिर्फ चुपचाप तेरा पीछा करे लेकिनाब इस सुनसान इलाके मैं अगर हम तुझे मार भी दे तो शायद बॉस बुरा नहीं मानेंगे, उनको रेस्टोरंट मैं बुलाकर धमकाना तेरी आखरी गलती थी लड़के!"

रूद्र-और इस तरह मेरे सामने आना तुम सब की जिंदगी की आखरी गलती है

उन सब लोगो ने रूद्र को गोला बनाकर घेर लिया और उनमे से एक व्यक्ति धारदार कुल्हाड़ी लेकर रूद्र को मरने के लिए आगे आया लेकिन रूद्र ने तेजी से उसके हाथ को पकड़ा और एक झटके के साथ उसका हाथ उखाड़कर फेक दिया, वो आदमी दर्द के कारन जोर से चीखने लगा वही बाकि सब की आँखें ये दृश्य देख कर फटी रह गयी,

ये सब देखकर एक कालसैनिक दुसरे से बोला "ये आखिर है कौन? धरती पर कोई भी इस तरह हमारा मुकाबला नहीं कर सकता" इसपर दूसरा कालसैनिक बोला "इस पर telekinesis का प्रयोग करके देखो, ये हमसे बल मैं अधिक हो सकता है लेकिन इसके पास हमारी शक्तियों की कोई काट नहीं होगी"

सभी कालसैनिको ने अपना हाथ एक विशेष मुद्रा मैं घुमाया, इस दौरान रूद्र ने कुछ नहीं किया, वो बस खड़े खड़े मुस्कुरा रहा था और ये देखकर सभी कालसैनिक सकते मैं आ गए, उनमे से एक घबरायी आवाज मैं बोला "ये...ये तो हमारी शक्तियों का विरोध कर रहा है" तभी रूद्र के चेहरे से भाव तेजी से बदलने लगे, उसने तेजी से घूमकर एक कालसैनिक की छाती पर अपने हाथ से प्रहार किया जो इतना शक्तिशाली था के वो कालसैनिक वही धराशायी हो गया और ये देखकर बाकि सब के पैर उखड गए और वो वहा से भागने लगे

भागते हुए उनमे से एक ने कहा "ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता हमें फ़ौरन बॉस को इस बारे मैं खबर करनी होगी" लेकिन रूद्र की रफ़्तार उन सब से अधिक थी उसने आगे जाकर उनका रास्ता रोक लिया और बस फिर कुछ ही मिनटों मैं सभी कालसैनिको की लाश वहा पड़ी थी और रूद्र खून से सने हाथ लिए वहा खड़ा था

रूद्र-हम्म्फ़....जिन्हें लोगो को लाश बनाने का शौक था आज वो खुद लाश बन गए

फिर रूद्र वापिस अपने रस्ते किसी सामान्य नागरिक की तरह निकल गया जैसे कुछ हुआ ही न हो

राजनगर से बहार थोडा दूर खुबसूरत वादियों मैं एक छोटा सा घर बना हुआ था जिसकी दीवारे सफ़ेद और दरवाजा गोलाकार था और दरवाजे पर डोरबेल लगी थी, रूद्र इस समय इसी घर के बहार खड़ा था, उसने बेल बजायी तो दरवाजा एक ५०-५५ की उम्र के आदमी ने खोला, वो आदमी उम्र के हिसाब से काफी तंदरुस्त था, बाल हलके हलके सफ़ेद थे और चेहरा क्लीन शेव, उसने जीन्स और टीशर्ट पहना हुआ था और रूद्र को देखते ही वो बोला "मुझे ऐसा क्यों लग रहा है की तुम कही से दंगा फसाद करके आ रहे हो ?"

रूद्र- वो कुच्घ काले कपडे वाले कालसैनिको ने हमला कर दिया था मुझ पर नरेश जी

नरेश-हा हा...फिर तो मैं ये समझू की ये उनकी आखरी गलती थी

रूद्र-सही कहा

नरेश-आओ जल्दी अंदर आओ

रूद्र-बाकि सब कहा गए ?

नरेश-बाकी सब है ही कौन, एक अरुण ही तो है और वो किसी काम से बाहर गया हुआ है बाकी शिवानी राहुल और बाकि की टीम कल शाम तक आयेगी

रूद्र-अच्छी बात है वैसे भी अब ज्यादा समय नहीं बचा है, वो लोग अगर आखरी कुर्बानी देने मैं सफल हुए तो अनर्थ हो जायेगा

नरेश-सही कहा लेकिन अब किसी को मारना उनके लिए आसान नहीं होगा पुलिस को भी उनकी भनक लग चुकी है और मुझे लगता है अब समय भी हो गया है

रूद्र सोफे पर बैठा और उसने एक लम्बी सास की

रूद्र-मैं ये सब क्या कर रहा हु नरेश जी, लोगो को मारना मेरा काम नहीं है

नरेश-हममे से कोई भी किसी को भी मारना नहीं चाहता है रूद्र लेकिन उनलोगों को जिन्दा छोड़ना कितना खतरनाक हो सकता है इसका अंदेशा हम सबको है

रूद्र-हम्म

नरेश-मुझे लगता है अब यही समय है राघव को उसकी शक्तियों से अवगत करने का हमें जल्द से जल्द उसकी ट्रेनिंग शुरू करनी पड़ेगी

रूद्र कुछ बोलता उससे पहले ही नरेश का फ़ोन बजने लगा, फ़ोन अरुण का था नरेश ने फ़ोन स्पीकर पर डाला तो दूसरी तरह अरुण ने बस दो ही शब्द बोले..."रमण..शक्ति"

रूद्र जितनी तेजी के साथ घर आया था उतनी ही तेजी के साथ घर से निकल गया

इधर पुलिस स्टेशन मैं रमण विक्रांत से कुछ उगलवाने की कोशिश कर रहा था तभी उस कमरे मैं लगी एकमात्र लाइट जलने बुझने लगी जिससे रमण को परेशानि हो रही थी तो वो जोर से चिल्लाकर बोला "रामदास ये बल्ब क्यों काम नहीं कर रहा देखो जरा"

लेकिन रामदास की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो रमण अपनी खुर्ची से उठकर उस अँधेरे लॉकअप से बाहर आया और वहा उसने कुछ ऐसा देखा की उसे बहुत बड़ा झटका लगा, उसके सरे साथी मरे पड़े थे, किसी की आँखें निकली हुयी थी, किसी की अंतड़िया पेट के बाहर झाक रही थी, किसी की गर्दन फटी हुयी थी और हड्डिया साफ़ दिख रही थी,

रमण ने अपने पुरे जीवन मैं ऐसा वीभत्स दृश्य कभी नहीं देखा था, उसने लाशो को पार किया तो सामने नीला चोगा और नकाब पहने चार लोग खड़े थे, रमण पहचान गया की ये लोग कौन है, उनमे से एक ने अपना नकाब निकला, वो सुशेन का छोटा भाई शक्ति था जो फाड़ जाने वाली नजरो से रमण को घुर रहा था, रमण ने बगैर कुछ सोचे अपनी गन निकली लेकिन शक्ति ने अपने हाथ को हल्का सा झटका दिया और वो गन दूर जा गिरी

रमण- तुमने मेरे सभी साथियों को मार डाला दरिंदो!!

शक्ति-मगर तुम जिन्दा हो इंस्पेक्टर और वो भी शायद तुम्हारी बहादुरी की वजह से क्युकी मैं बहादुरों की क़द्र करता हु तुम जैसे बहादुर लोग कालदूत को काफी प्रिय है

रमण-भाड़ मैं गया तुम्हारा कालदूत, मुझसे क्या चाहते हो

शक्ति-विक्रांत को हमारे हवाले कर दो

रमण-नहीं होगा...और वो तो ब्लैक हुड का सदस्य है वो तुमको क्यों चाहिए?

शक्ति-वो एक कालसैनिक है और मेरे सम्बन्ध मेरे भाई से इतने भी ख़राब नहीं है की मैं उसके लोगो को तुम्हारे पास सड़ने दू

रमण- अच्छा भाईचारा है पर मैं किसी भी हाल मे विक्रांत को तुम्हे नहीं दूंगा और मेरे आदमियों की मौत का खामियाजा भी तुम्हे भुगतना होगा

शक्ति-तब तो मुझे तुम्हे भी ख़त्म करना होगा

शक्ति ने कुछ करने के लिए अपना हाथ हवा मैं उठाया लेकिन अचानक एक टेबल उडती हुयी उसकी तरफ आयी लेकिन शक्ति ने सही समय पर ध्यान देकर telekinesis से उसे हवा मे रोक दिया और उसके टुकड़े कर दिया, सभी लोगो का ध्यान टेबल फेकने वाले पर गया तो वहा रूद्र खड़ा था

रूद्र-हर बार telekinesis काम नहीं आयेगी

शक्ति(गुस्से से )- कौन हो तुम?

रूद्र-मेरे बारे मैं सोचने के लिए तुम जिन्दा नहीं रहोगे

शक्ति-इस लड़के और इंस्पेक्टर को पकड़ो

कालसैनिक दौड़कर रूद्र को पकड़ने गए लेकिन रूद्र एक एक जोरदार झापड़ से एक कालसैनिक की खोपड़ी 'चटाक' की आवाज से मुडी और वो धरती पर गिर गया, दुसरे से कालसैनिक ने telekinesis द्वारा रूद्र के शारीर को अंदर से फाड़ने की कोशिश की लेकिन रूद्र पर कोई असर नहीं हुआ जिससे रमण और शक्ति दोनों चकित हो गए, दो और लोग रूद्र की तरफ बढे लेकिन उनका भी वही हाल हुआ वो पहले वालो का हुआ था, पुलिस वालो को निर्ममता से मरने वाले अब खुद लाश बने हुए थे और सिर्फ शक्ति बचा था, उसने रमण की गन उठाई और रूद्र पर चलायी लेकिन गोलियों का रूद्र पर कोई असर नहीं हुआ

शक्ति-कौन हो तुम, तुम इंसान नहीं हो?
रूद्र-कोई ऐसा जिसके लिए इंसानी जाने मायने रखती है और तुम जैसो को मारने के लिए मजबूर हु ताकि दोबारा ऐसा न हो

रूद्र शक्तिके पास गया और उसे अपने दोनों हाथो से उठाकर उसने सामने वाली दिवार पर फेक दिया, शक्ति का शारीर इतना तेज इम्पैक्ट झेल नहीं पाया और उसने प्राण त्याग दिए

फिर रूद्र ने रमण की गन उठाई और उस सेल की तरफ गया जहा विक्रांत बंद था, रमण उसे रोकने की हालत मैं नहीं था फिर उस सेल से गोलिया चलने की कुछ आवाजे आयी और विक्रांत का शारीर शांत पड गया

लॉकअप से बहार आकर रूद्र रमण को गन थमाते हुए बोला

रूद्र-रमण आओ मेरे साथ चलो

रमण-रुको!! कौन हो तुम और तुमने ये सब कैसे किया

रूद्र- सब बताता हु अभी मेरे साथ चलो..

तभी वहा राघव आ पंहुचा जो सूरज से पीछा छुड़ा कर रमण से मिलने आया था और उसे अपनी सुनी हुयी सब बाते बताना चाहता था लेकिन पुलिस स्टेशन का नजारा देख उसकी आँखें फटी रह गयी

रुद्र- राघव अच हुआ तुमज भी आ गए अब तुम दोनो मेरे साथ चलो, कालसैनिको को यहाँ की घटना के बारे मैं पता चलने मैं ज्यादा समय नहीं लगेगा थोड़ी देर मैं ये इलाका इन लोगो से भर जायेगा इसीलिए जल्दी निकलो यहाँ से

रमण भी स्तिथि की गंभीरता को समझ रहा था इसीलिए बिना कोई न नुकुर किया तो रूद्र के साथ चलने को तयार हुआ और राघव को भी साथ चलने कहा जो की अब भी वहा क्या हुआ ये समझने की कोशिश कर रहा था....

वही दूसरी तरफ सुशेन अपने घर की छत पर खड़ा था सूरज ढल चूका था और आसमान मैं काले बदल छाये हुए थे और बिजलिया कड़क रही थी लेकिन इस बिजली की कडकडाहत का सुशेन पर कोई असर नहीं हो रहा था तभी पीछे से सारा ने आवाज लगायी "वहा क्या कर रहे हो सुशेन? घर मैं चलो"

सुशेन मुडा तो सारा ने महसूस किया की उसकी आँखों मैं एक सूनापन था बहुत सारा दुःख था, अब सारा को किसी अनिष्ट की आशंका हो रही थी

सारा-क्या हुआ है सुशेन?

सुशेन-वो मर गया सारा...उन लोगो ने मेरे भाई को मार दिया........
 

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रूद्र रमण और राघव को लेकर पुलिस जीप मैं काफी दूर निकल आया था, रमण अब वापिस बोलने की स्तिथि मैं आ चूका था, हालाँकि वो काफी साहसी व्यक्ति था लेकिन कुछ समय पहले उसने जो कुछ भी देखा था उससे वो बुरी तरह हिला हुआ था वही राघव पीछे बैठे हुए चुप चाप एकटक रूद्र को देख रहा था आखिर मैं रमण ने बोलना शुरू किया

रमण-तुम हमें कहा ले जा रहे हो?

रूद्र- किसी सुरक्षित स्थान पर, कालसेना के लोगो को अब तक पता चल चूका होगा इन सबकी मृत्यु का, वो तुम्हारे पीछे आयेंगे

रमण-मुझे अब भी समझ नहीं आ रहा की तुम पर इनके काले जादू का असर क्यों नहीं हुआ? आखिर तुम चीज़ क्या हो?

रूद्र-देखो रमण फिलहाल हम समय व्यर्थ नहीं कर सकते, मैं सही समय आने पर आपको सब कुछ बता दूंगा पहले हमें उनको आखरी कुर्बानी देने से रोकना होगा हम उन्हें कामयाब होने नहीं दे सकते वरना कालदूत जाग जायेगा औए हा राघव तुम जो ये इतने समय से मेरे दिमाग मैं झाकने की कोशिश कर रहे हो इसे प्लीज रोक दो, जब मुझपर telekinesis का असर नहीं हुआ तो तुम्हारी शक्तिया भी काम नहीं करेंगी

राघव-तुम..कैसे जानते हो मेरे और मेरी शक्तियों के बारे मैं?

रूद्र-मैं तुम्हारे बारे मैं तुमसे ज्यादा जानता हु दोस्त और मेरा यकीन करो मैं तुम्हारे ही साथ हु साडी बाते सही समय पर तुम्हे पता चलेंगी बस कुछ देर रुक जाओ

राघव-तुम कैसे जानते हो कालदूत के बारे मैं

रूद्र- वो....

रमण-पता नहीं क्या हो रहा है.....क्या सच मैं कोई कालदूत है भी...मैं अब इन सब अंधविश्वास से तंग आ गया हु

रूद्र-अपने भाई की दिमाग पढने की काबिलियत और पुलिस स्टेशन मैं जो कुछ हुआ उसे देखने के बाद भी तुम ऐसा कैसे कह सकते हो इंस्पेक्टर, जरा मुझे बताओगे की ये लोग बिना हाथ लगाये चीज़े कैसे हिला लेते है

रमण-इसके पीछे जरूर कोई न कोई कारन होगा, कोई ठोस कारण!

रूद्र-कारण है न!! कालदूत का शारीर जरूर समुद्र मैं बंधा हुआ है लेकिन वो मानसिक तरंगे भेजकर इन सबको इस तरह की शक्तिया प्रदान करता है, वो इनसे शक्तिया ले भी सकता है और इन्हें और शक्तिशाली भी बना सकता है इसीलिए अगर आखरी कुर्बानी दी गयी तो हम सब ख़तम हो जायेंगे

राघव-ये आखरी कुर्बानी है क्या?, अभी अभी इन लोगो ने पुलिस स्टेशन मैं इतना कुछ किया वो काफी नहीं था जो आखरी कुर्बानी बाकि है??

रूद्र-कुर्बानी के लिए इनके कुछ रिवाज मैं राघव और इन्हें उन रिवाजो के अनुसार चलना पड़ता है, व्यक्ति को लोहे की जंजीर मैं बांधकर जिन्दा जलना होता है तभी कुर्बानी मान्य होती है

राघव-ऐसा क्यों??
रूद्र-पता नहीं! शायद मानव आत्मा इस तरह से मारने पर ज्यादा समय तक इस लोक मे इस plane of existence पर बनी रहती है और कालदूत को आजाद होने के लिए आत्माओ की उर्जा की ही जरुरत है

रमण-ओह..तभी हमें रोहित की लाश जली हुयी मिली थी

रूद्र-हा..इन्होने सभी कुर्बानिया इसी प्रकार से दी है और अब अगर ये लोग आखरी कुर्बानी देने मैं सफल हो गए तो वो प्राणी सदियों की कैद से आजाद हो जायेगा जिसे ये लोग अपना इश्वर मानते है.....

राघव-पर आखरी कुर्बानी मैं अभी एक माह का समय है, आखरी कुर्बानी आने वाली पुरनमासी को होगी

रूद्र-हा हा हा, ये किसने कह दिया तुम्हे

रमण-विक्रांत ने ऐसा बताया था

रूद्र-देखो भाइयो ये कालसैनिक किसी भी मुहूर्त या दिन मैं विश्वास रखने वालो मैं से नहीं है अगर ऐसा होता तो हर कुर्बानी किसी विशिष्ट दिन दी जाती लेकिन ऐसा नहीं है इन्हें जब उचित लगे और कोई व्यक्ति कुर्बानी के लिए मिल जाये उसी दिन उसे जलाया जाता है, और आज जब मैंने कालसेना के मुखिया के भाई को मारा है तो ते लोग अब जल्द से जल्द आखरी कुर्बानी पूर्ण करने की कोशिश करेंगे

राघव-तुम जानते हो उन लोगो को मैंने.....(फिर राघव ने रूद्र और रमण को साडी बात बताई जो भी उसने देखा सुना था सब)

रूद्र-तुमने अपनी तरफ से काफी कुछ पता लगा लिया है राघव पर इनमे से ज्यादातर बाते मैं जानता हु..मैंने ही सुशेन को मिलने बुलाया था

राघव-वो तो मैं जान गया था जब पुलिस स्टेशन मैं तुम्हे उन लोगो को मरते देखा था

रूद्र-लो बातो बातो मैं हम पहुच गए....

राघव-कहा??

रूद्र-जहा इन कालसैनिको से भिड़ने वाले मौजूद है....

वो तीनो जीप से निकलकर घर के अंदर पहुचे जहा नरेश पहलेसे ही मौजूद था और उसके साथ २८-३० साल का एक आदमी संजय हॉल मैं बैठा था, संजय एक दुबला पतला आदमी था और घनी मुछे और रौबीले व्यक्तित्व का मालिक

रूद्र-क्या हाल है संजय भाई? बहुत समय बाद दिखे

संजय-तुम भी तो बहुत समय बाद मिले हो

रूद्र-और नरेश जी अरुण भाई नहीं आये अभी तक?

नरेश-आ जायेगा थोड़े समय मैं वो कुछ जरुरी काम से गया हुआ है...

रमण-ये सब क्या चल रहा है यहाँ पे? कौन है आप लोग?

नरेश-राघव, रमण आराम से बैठो सोफे पर हम तुम्हे सब बताएँगे

राघव और रमण दोनों ने एक एक खुर्ची ली और बैठ गए, नरेश गौर से राघव को देख रहा था, कुछ समय तक वहा अजीब सी शांति मैं सिर्फ घडी की टिक टिक सुनाई दे रही थी, सबसे पहले नरेश ने अपनी चुप्पी तोड़ी

नरेश-मेरा नाम नरेश है और ये है संजय, हमारे एक और साथी अरुण को अभी आना है और रूद्र से तो तुम लोग मिल ही चुके हो.....हम सभी ने कही न कही कालसेना की वजह से अपनों को खोया है...मेरी बीवी और भाई को उन्होंने बडी ही क्रूरता से मार दिया....

संजय-और मेरा तो पूरा परिवार ही ख़तम कर दिया गया...बीवी बच्चा माँ बाप बहन सब, सबसे बुरी बात तो ये है की ये लोग इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया मैं उच्च पद पर है जिसकी वजह से इनकी कोई खबर हम तक नहीं पहुचती, जब मैंने नेट पर लोगो के ब्लॉग पढ़े तब पता चला की कितने लोग इनके शिकार हुए है, मैंने नरेश और अरुण से वही मिला था थोडा समय लगा कालदूत का अस्तित्व स्वीकारने मैं लेकिन सच्चाई जो है वो हम सब जानते है

रमण-आप सब की कहानी जान कर बहुत दुःख हुआ लेकिन मैं ये जानना चाहता हु की आपलोग मुझे और राघव को कैसे जानते है और ये रूद्र कौन है?

राघव-हा....

नरेश(मुस्कुरा कर)- मैं तो तुम्हारे पिताजी को भी जानता हु रमण...मैं तुमदोनो को शुरू से सारी बात बताता हु तब शायद तुम्हे पूरी बात समझ मैं आये और ये भी समझ मैं आये की इस वक़्त ये दुनिया कितने बड़े खतरे मैं जिसे हमें रोकना है......

नरेश-बात ऐसी है की...............


To Be Continue.......
 

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नरेश(मुस्कुरा कर)- मैं तो तुम्हारे पिताजी को भी जानता हु रमण...मैं तुमदोनो को शुरू से सारी बात बताता हु तब शायद तुम्हे पूरी बात समझ मैं आये और ये भी समझ मैं आये की इस वक़्त ये दुनिया कितने बड़े खतरे मैं जिसे हमें रोकना है......

नरेश- राघव, रमण तुम्हारे दादाजी महंत शिवदासजी मेरे और मेरे भाई के गुरु थे, हमारे माता पिता मेरे छोटे भाई के जन्म के के बाद एक दुर्घटना मैं मारे गए थे हम दोनों भाई काफी छोटे थे हमारे रिश्तेदारों का हमारे प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था इसीलिए मैं एक दिन हिम्मत करके अपने रिश्तेदारों के पास से भाग तो निकला लेकिन अब आगे क्या करू मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था ऐसे मैं एक दिन भटकते हुए हमें गुरूजी ने देखा, तुम्हारे दादाजी एक नेक दिल इंसान थे और काफी विद्वान थे, राजनगर और बाकि आसपास के शहरों मैं उनका नाम चलता था, उन्होंने हम दोनों भाइयो को आसरा दिया, वो उस समय पुराने शिवमंदिर मैं रहते थे और हम दोनों भाई भी उन्ही के साथ रहते थे, मेरे छोटे भाई महेश की पढने मैं काफी रूचि थी और इसीके चलते गुरूजी ने अपनी पहचान से हम दोनों भाइयो का दाखिला स्कूल मैं करवाया था, हम अपनी पढाई के साथ साथ गुरूजी के अनुष्ठानो मैं हाथ भी बताया करते थे, गुरूजी के पास इंसान का दिमाग पढ़ सकने की अदभुत शक्ति थी और ये बात हम दोनों भाई जानते थे, धीरे धीरे समय बीता मैंने बस जरुरत जितनी पढाई की लेकिन मेरा छोटा भाई महेश उसके सपने काफी बड़े थे उसे अध्यात्म मैं विज्ञान और विज्ञान मैं अध्यात्म की झलक मिलती थी उसका कहना था की अगर विज्ञान को अध्यात्म का साथ मिल जाये तो इस दुनिया मैं ऐसे चमत्कार होंगे जो किसी ने सोचे नहीं होंगे, गुरूजी उसके मन की बात जानते थे उन्होंने उसे आगे बढ़ने से कभी नहीं रोका और महेश ने अपनी बुद्धि के बल पर काफी बडी जगह नौकरी पायी और विदेश चला गया उसके कुछ सालो बाद हमें तुम मिले राघव तुम्हे मिलने के बाद गुरूजी ने मुझसे कहा था की तुम ही वो लड़के बनोगे जो आने वाले समय मैं इस दुनिया के लिए कोई महान काम करोगे बस जरुरत होगी तो तुम्हे तुम्हारी शक्तियों से अवगत करने की, गुरूजी अपना पूरा ध्यान तुम पर लगाना चाहते थे राघव और इसीलिए उन्होंने मुझे अपने से दूर किया और मैं अपने भाई के पास आ गया और अपना छोटा सा काम शुरू करके शादी कर ली, जिंदगी हसी ख़ुशी कट रही थी,

मेरा भाई महेश बायो इंजीनियरिंग मैं एक महारत वाला वैज्ञानिक था जो उस समय किसी गुप्त आर्गेनाइजेशन के लिए काम करता था, वो आर्गेनाइजेशन पता नहीं कैसे महेश को इतने पैसे और संसाधन मुहैया कहा देती थी की जिससे उसके जीवन मैं रिसर्च मैं किसी प्रकार की बाधा न आये

राघव-किस प्रकार की रिसर्च?

नरेश-Artificial Metahumans यानि की कृत्रिम महामानवो पर रिसर्च, बात तब की है हम हम दोनों भाई अमेरिका मैं रहते थे मतलब मैं महेश और मेरी बीवी, महेश एक ऐसा शारीर या कहो मानव बनाना चाहता था जिसका शारीर हमारी तरह हो लेकिन हड्डियों मैं तरह तरह के मिश्रित धातुये यानि alloys का संगम को जौसे अभेद्द बना सके

रमण-यानि एक रोबोट जैसा?

नरेश-नहीं रोबोट नहीं वो तो केवल एक निर्जीव यन्त्र है, महेश कुछ ऐसा बनाना चाहता तह किसका शारीर हमारी तरह हो सरे अवयव हमारी तरह हो. जो इंसानों की तरह रोजमर्रा के काम करे लेकिन बहरी त्वचा इतनी सख्त हो की जिसपर बन्दुक की गोली भी असर न करे और आखिर मैं उसने एक ऐसा शारीर बनाने मैं कामयाबी भी हासिल कर ली थी जिसमे, दिल गुर्दे फेफड़े बाकि बस अंदरूनी अंग हमारी तरह थे लेकिन कंकाल का ढाचा बेहद मजबूत था, उसने त्वचा का composition भी वैसा ही रखा था ताकि उपरी शारीर अभेद्द और कठोर हो, एक कृत्रिम मस्तिष्क का निर्माण भी किया गया जो आम मानव मस्तिष्क जैसा हो लेकिन अब समस्या ये थी की बेजान शारीर मैं जान कैसे डाले, मेरे भाई ने कई प्रयोग किया उस शारीर मैं जान डालने के लेकिन सब विफल रहे क्युकी उसके पास वो उर्जा नहीं थी जो हर मनव शारीर को संचालित करती है......आत्मा, ऐसे समय मैं हमें हमारे गुरूजी का ध्यान आया, हम दोनों भाइयो ने गुरूजी को बचपन से देखा था जिससे हमें उनकी शक्ति का अंदाजा था, महेश ने गुरु जो पत्र लिखकर साडी समस्या बताई और गुरूजी ने भी मदद का आश्वासन दिया, तुम दोनों को याद होगा वो गुरूजी उनकी मृत्यु के १ साल पहले कुछ समय के लिए कही बाहर गए थे, उस समय वो हमारे पास आये थे, गुरूजी ने अपनी सिद्धियों की मदद से एक आत्मा को इस लुक मैं खिंच लिया, फिर वो आत्मा उस शारीर मैं चली तो गयी लेकिन कोइ भी आत्मा तब तक किसी शारीर मैं स्थिर नहीं होती जबतक वो उसका अपना शारीर न हो, उस उर्जा के तत्त्व को stabilize करने के लिए एक निश्चित मात्र मैं बिजली का प्रयोग किया गया, वो शारीर बिलकुल शांत था किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था की ये प्रोयोग सफल हुआ या नहीं लेकिन गुरूजी निश्चिन्त थे और वो भारत लौट आये थे उसके कुछ दिनों बाद मेरा भाई लैब मैं उस कृत्रिम शारीर पर कुछ टेस्ट कर रहा था तभी न जाने कैसे कालसैनिको को इस प्रयोग का पता चला और उनके मन मैं उस कृत्रिम मानव को पाने की लालसा जाग उठी और उन्होंने लैब पर हमला कर दिया उस हमले मैं बाकि वैज्ञानिक तो बचकर भाग गए लकिन मेरा भाई पकड़ा गया और उसे उनलोगों ने लोहे की जंजीर से बांधकर जिन्दा जला दिया लेकिन तब तब उस कृत्रिम मानव को होश आ चूका था वो वो अपने निर्माता को पहचानने लगा था और जो उसे पहला अहसास हुआ वो क्रोध था उसने इतना भीषण हत्याकांड अपने आँखों से देखा था, कालसेना तो उस कृत्रिम मानव को मानवता के खिलाब हथियार बनाना चाहती थी लेकिन तब तक वो कृत्रिम मनव जाग गया और उसने उन कालसैनिको को वो भयानक मौत दी जिसके वो हक़दार थे, महेश की गुप्त आर्गेनाइजेशन के लोग बाद मैं मुझसे मिले और मुझे अपने भाई की अमानत सँभालने को कहा और मैंने उसे घर ले आया, मेरी बीवी ने उसका नाम रूद्र रखा, हमने रूद्र को अपना बच्चा मन क्युकी हमारी कोई संतान नहीं थी, मैं अपने भाई की मौत को भुला नहीं था मैंने अपने स्तर पर खोज की लेकिन शायद कालसेना को इसकी भनक लग चुकी थी और जब मैं और रूद्र दोनों बाहार थे तब उन्होंने मेरी बीवी की कुर्बानी दी, हम जब घर पहुचे तब मेरी बीवी की लाश पर एक नोट लिखा था की 'हमें ढूंढने की कोशिश मैं इसी तरह मारे जाओगे' पर अब मेरे पास खोने को कुछ नहीं था, अब मैंने कालसेना का खत्म करने की ठानी थी और मेरे साथ रूद्र भी था इसी सब के बीच मुझे गुरूजी की मौत की खबर मिली और साथ ही गुरुजी का एक ख़त जो उन्होंने मेरे नाम छोड़ा था जिसे तुम्हारे पिता ने मुझे बादमे भेजा जिसमे राघव की खूबियों और शक्तियों का जिक्र था, मैंने रूद्र के साथ राजनगर लौट आया और ऐसे लोगो को खोजा वो कालसेना से पीड़ित हो ऐसे मैं हमें संजय मिला जो एक राज परिवार से है और अब हमारे हथियारों के खर्च को देखा है और अरुण जिससे तुम कुछ ही समय मैं मिलोगे वो एक एक्स कमांडो है जिसे हथियारों की काफी समझ है,..हमने जब राघव पर नजर रखी तो पाया की राघव को अभी अपनी शक्तियों का अंजादा नहीं है और अब यही सही समय है उसे सब बताने का मैं और रूद्र तुम लोगो से मिलने वाले थे लेकिन आज तुमसे अचानक मिलना होगा सोचा नहीं था,

रमण- आपकी कहानी और आपके भाई के मौत का काफी दुःख हुआ और साथ ही मैं आपके लड़ने के जज्बे को सलाम करता हु, अब समझ आ रहा है की रूद्र पर काला जादू असर क्यों नहीं करता क्युकी उसने हमारी तरह जन्म नहीं लिया बल्कि उसे लैब मैं बनाया गया है...लेकिन आप बार बार किसी गुप्त संस्था का जिक्र कर रहे थे जिसमे आपका भाई काम करता था, क्या आप नहीं जानते उस संस्था के बारे मैं

नरेश-उस संस्था के कुछ लोग हमसे जुड़े हुए है वो लोग भी कल आने वाले है तब ये सवाल तुम उन्ही से पूछना

ये लोग बात कर ह रहे थे की दरवाजे से अरुण उन्हें अंदर आता दिखाई दिया.......


To Be Continue.........
 
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