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Fantasy नागिन के कारनामें (इच्छाधारी नागिन )

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डॉक्टर जय राज की तरफ इस तरह झुक गया जैसे उसका जवाब पूरा ध्यान लगातार सुनना चाहता हो।

"दरअसल में सही डाइग्नोज नहीं कर सका। उसके सारे भीतरी अंग सही रूप से काम कर रहे हैं और यही राय सर्जन नरेन्द्र गुप्ता की भी है। सर्जन नरेन्द्र गुप्ता को जानते हैं आप?"

"हां, जानता हूं, उन्हें खूब अच्छी तरह जानता हूं। मुझे हैरत है कि आप दोनों मिलकर भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके ? हालांकि मैंने पहली बार ही उनका चैकअप करके कह दिया था कि उनका दिल कमजोर हो रहा है।"

"लेकिन अगर आपकी बात मान भी ली जाए, तो सवाल यह पैदा होता है कि दिल कमजोर हुआ है तो किसी चीज से कमजोर हुआ है?" राज ने कहा, "अब से एक साल पहले तक तो वह बिल्कुल सही और सेहतमंद मर्द था। फिर.....अचानक यह.....?" इन्सान के दिल पर मानसिक और शरीरिक स्थितियां भी असर करती हैं। जिनकी वजह से वो ठीक तरह काम नहीं कर पाता।"

"इसका मतलब यह हुआ कि सतीश का दिल किसी मानसिक परेशानी या तनाव से कमजोर हुआ है?"

"एक तरह से यही समझ लीजिए। लेकिन यह मेरा आखिरी फैसला नहीं है। हो सकता है उसका दिल कमजोर होने की कोई और ही वजह हो....।" डॉक्टर जय ने लापरवाही से कहा।

फिर उसने घड़ी देखी और अपनी बात आगे बढ़ाई

"साढ़े बारह बज गए हैं, मेरे ख्याल से हमें लंच कर लेना चाहिए। बातें तो बाद में भी होती रहेंगी। लंच के बाद ही मैं आपको अपनी लेब्रॉटरी भी दिखा दूंगा।"

"जैसे आज चाहें....।" राज ने कहा।

दरअसल वो समझ गया था कि लंच का तो सिर्फ बहाना ही है, डॉक्टर जय बातचीत के विषय को बड़ी खूबसूरती से टाल गया था। जिसे राज ने भी महसूस कर लिया था।

"एक मिनट प्लीज।" डॉक्टर जय ने कहा और कमरे से बाहर चला गया। राज ने सोचा, शायद वो लंच के लिए नौकरों से कहने गया है।

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करीब एक घंटे बाद वो लंच से फारिग हुए। लंच के दौरान इधर-उधर की ही बातें होती रहीं, काम की कोई बात नहीं छिड़ी थी उनमें, या फिर डॉक्टर जय अपने मिस्र प्रवास के दौरान घटी कुछ दिलचस्प घटनाओं के बारे में बताता रहा था, जो उसके साथ पेश आई थीं। राज से भी उसने उसके मिस्र के सफर के बारे में दो चार सवाल पूछे थे। लेकिन राज ने उसे यह कहकर टाल दिया था कि उसका मिस्र का सफर ज्यादा दिलचस्प नहीं रहा था। क्योंकि वो एक ऐतिहासिक खोज अभियान दल के साथ गया था और पूरा वक्त अपने काम में व्यस्त रहता था। इस वजह से वो सैर-सपाटा नहीं कर सका था।

खाने के बाद थोड़ा आराम किया गया, उसके बाद डॉक्टर जय वर्मा राज को अपनी लेबॉटरी में ले गया। राज की अपेक्षा अनुसार ही वो काफी अजीब और दिलचस्प थी। खौफनाक, जहरीले सांप, तरह-तरह के बिच्छू-छिपकलियां, काक्रोच और न जाने की शीशियों में रसायनों में डूब, मुर्दा जीव भी।

कीमती और आधुनिक वैज्ञानिक यन्न भी लेब्रॉटरी में बड़े सलीके से फिट किए गए थे। सैंकड़ों छोटी-बड़ी शीशियां और जार विभिन्न प्रकार की दवाईयों और जारों में भारी शीशे लगी अलमारियों हासिल किए हुए जहर भी भरे हुए थे, यह अन्दाजा राज ने शीशियां देख कर ही लगा लिया था। जिसकी बाद में डॉक्टर जय ने पुष्टि की।

सबसे पहले डॉक्टर जय ने राज को अपना जहर का भण्डार ही दिखाया था और उनकी विशेषताओं के बारे में बताया था। उसके बाद डॉक्टर जय उसे लेब्रॉटरी के उस हिस्से में ले गया, जहां जहर निकालने के लिए अजीब-अजीब यन्त्र फिट थे। जहरीले जानवरों से जहर निकालते के कुछ लाइव प्रयोग भी उसने करके राज को दिखाएं और जहरों के असर का प्रैक्टिकल भी दिखाया।

काफी देर तक वो अपनी आर्यजनक और दिलचस्प जानकारियां और आविष्कार राज का दिखाता और समझाता रहा था।

उस दौरान जब राज जहरीले कीड़ों का जायजा ले रहा था,

उसके कदम खुद-ब-खुद शीशे के एक बॉक्स के सामने जाकर ठिठक गए, जिसमें बालिश्त भर का एक सांप रखा हुआ बल खा रहा था। राज के दीमाग में बिजली की तरह ख्याल कौंधा

"कहीं यह वही सांप तो नहीं?"

पर सवाल इतने मजबूत तरीके से उसके दिमाग में उठ खड़ा हुआ था कि वो खुद पर काबू न रख पाया और उसने डॉक्टर जय से पूछा ही लिया

"यह कैसा सांप है डॉक्टर?"

"यह मिस्र का एक सांप है। निहायत ही जहरीला और खतरनाक सांप है यह।" उसने जवाब दिया।

"इसके दांत होते हैं?" राज ने फिर पूछ लिया।

"हां। इसके दांत होते हैं।" डॉक्टर जय ने अजीब तरीके से घूरते हुए राज की तरफ देखा-"आपने ऐसा क्यों पूछा?"

राज ने उस पर यह जाहिर नहीं किया था कि उसे भी सांपों और जहरों के बारे में काफी कुछ मालूम है या वो भी जहरों पर प्रयोग करने का शौक रखता है। इसलिए राज ने बहुत ही सरसरी ढंग से डॉक्टर जय की बात का जवाब दिया

"कुछ नहीं, यों ही अपनी जानकारी के लिए पूछ लिया था। एक बार मैंने मिस्र में किसी से सुना था कि वहां एक बहुत छोटा सा सांप होता है। जिसके दांत नहीं होते, लेकिन उसका जहर बहुत मारक होता है।"

"और कुछ या इतना ही सुना था?" डॉक्टर जय ने जिज्ञासा के साथ और दिल में उतर जाने वाली निगाहों से राज की तरफ देखते हुए पूछा था।

"बस इतना ही सुना था। वैसे मुझे इन चीजों में कोई खास दिलचस्पी नहीं है।'' राज ने जवाब दिया।
 
"ओह.....।" डॉक्टर जय ने जैसे इत्मीनान की सांस ली थी-"यह उस नस्ल का नहीं है, इसके तो दांत होते हैं।

लेकिन खतरनाक यह भी पूरा होता है। इसका काटा तीन मिनट से ज्यादा जिन्दा नहीं रह सकता, जिस नस्ल का आप जिक्र कर रहे हैं, उसका भी एक सांप मेरे पास था....लेकिन....।"

"लेकिन क्या?" राज ने उसे बात अधूरी छोड़कर खामोश देखा तो पूछा।

"वो मर गया.....।" डॉक्टर जय ने जवाब दिया।

"मर गया?" राज ने हैरत से उसके शब्द दोहरा कर पूछा।

"हां! एक दिन मैं उसका कुछ जहर ले रहा था। जहर लेने के बाद उसे एक पाईप में रखकर मैं मार्क लगाना भूल गया। मैं मेज पर अपने काम में व्यस्त रहा और वो पाईप से निकल कर फर्श पर पहुंच गया। थोड़ी देर बाद मैं किसी काम से नीचे झुका तो मैंने उसे फर्श पर कुचला हुआ पाया था। वो मेरे जूतों तले ही कुचला गया था। न जाने मेरा गांव कब उस पर पड़ गया था। इस तरह अपनी जरा सी लापरवाही की वजह से मैं एक कीमती और दुर्लभ सांप से हाथ धो बैठा था।"

"क्या वाकई वो बहुत खतरनाक सांप था?" राज ने अनजान बनते हुए पूछा।

"इतना ज्यादा खतरनाक कि आप सोच भी नहीं सकते। उस सांप की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उसका जहर बड़ा मीठा ओर ठण्डा होता था।"

"क्या मतलब?" राज चौंका।

"मतलब यह कि जहर होने के बाबजूद उसमें तेजी और तलखी नहीं थी। एक बार की बात सुनिए। क्या आपने कभी जाना चीनी का नाम सुना है?"

"नहीं।” राज ने फौरन जवाब दिया-"वो क्या चीज होती है?"

"जाना चीनी का आविष्कार प्राचीन युग के वैज्ञानिकों ने किया था। उस चीनी से बर्तन बनाए जाते थे। लेकिन क्योंकि उन बर्तनों को तैयार करने में बहुत पैसा खर्च होता था और बहुत वक्त लगता था, इसलिए उन बर्तनों को बड़े-बड़े अमीर उमरा ही इस्तेमाल किया करते थे या शाही महलों में इस्तेमाल होते थे।"

"क्यों, उस चीनी में ऐसी क्या खास बात थी?" राज ने दिलचस्पी से पूछा।

"उस जमाने में जहर खिला देने के मामले आम हुआ करते थे। आम तौर पर लोग अपने दुश्मनों को जहरों की मदद से मौत दे दिया करते थे, और खासतौर पर राजाओं, सम्राटों के महलों में जहर का इस्तेमाल साजिशों में होता ही रहता था। सम्राटों के उत्तराधिकारी सम्राट को जहर देकर खुद सम्राट बन जाते थे, उनकी महारानियां महल पर और सम्राट पर अपना एकाधिकार बनाए रखने के लिए सम्राटों की प्रेमिकाओं को जहर देकर मरवा देती थीं। इसके अलावा भी बहुत कुछ होता था।"

डॉक्टर जय ने कुछ देर रूक कर राज की तरफ देखा, जो बड़े गौर से उसकी बातें सुन रहा था। डॉक्टर ने कांच की एक नलकी उठा ली और उससे हुआ बोला

"कहने का मतलब यह कि उस दौर में जहरों से बहुत फायदे उठाए जाते थे और बड़ी कलाकारी से जहरों का इस्तेमाल किया जाता था। इसलिए उन गुप्त हमलों से बचाव के लिए सम्राट और सांसद वगैरहा जाना मी के बने हुए बर्तन अपने व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए बनवाते थे।"

"ऐसी क्या खूबी होती थी उन बर्तनों में?" राज ने पूछा।

"उनमें खूबी बड़े कमाल की होती थी। उन बर्तनों में खाना डालते ही डालते नाजुक होते थे कि अगर आप किसी खाने की चीज में जरा सा जहर होता था तो बर्तन चटक जाते थे। वो बर्तन इतने नाजुक होते थे कि अगर आप किसी खाने की चीज में जरा सा जहर मिला दें, जिससे किसी की मौत नामुकिन हो, तब भी खाना प्लेट में पड़ते ही वो बर्तन चटक जाते थे....और पता चल जाता था कि खाने में जहर मिला हुआ है।"

"बड़ी अजीब और काम की चीज थी तब तो जाना चीनी मिी....।" राज ने हैरत से कहा।

"हां, बहुत ज्यादा।" डॉक्टर जय ने कहा, "दरअसल इतनी लम्बी भूमिका का मतलब सिर्फ इतना था कि इस खास जाना मी की दो प्लेटें मेरे हाथ लग गईं थीं। उससे पहले मैंने उस चीनी मिी के बारे में सिर्फ सुना ही था। जब प्लेटें मेरे हाथ लग गई तो मैंने उन सुनी सुनाई अफवाहों को परखने की सोची, जो उस मिी के बारे में सुनी हुई थीं। वो मी वैसी ही निकली जैसी कि बताई जाती थी, एक प्लेट में जब मैंने जरा सा जहरीला खाना डाला था तो उसमें फौरन बाल आ गया था। वह इतना कम था कि एक चूहे को भी नहीं मार सकता था।"

"लेकिन इससे उस समय के जहर का क्या सम्बंध रहा है?" राज ने पूछा।
 
"हां, वो भी बता रहा हूं।" डॉक्टर जय बोला, "आपको जानकर हैरत होगी कि जो प्लेट साबुत बच गई थी, उसमें मैंने उस छोटे मिनी सांप का जहर डाला था, काफी मात्र में। उस प्लेट पर जरा सा भी असल नहीं हुआ। इससे आप अन्दाजा लगा सकते हैं कि उस सांप का जहर कितना ठण्डा हिस्सा भी कोई इन्सान हज्म नहीं कर सकता, न कोई जानवर। जिस्म में पहुंचने के बाद वो अपना चमत्कार जरूर दिखाता है। यह अलग बात है कि मात्र कम होने से नुकसान कुछ कम हो।"

"कमाल है! वो वाकई बड़ा हैरतअंगेज सांप होगा।" राज ने गर्दन हिला कर कहा-"काश, मैं भी उसे एक नजर देख सकता ! क्या आपने उसके जहर का कोई सैम्पि भी रखा था?"

"बहुत थोड़ा। वो मैंने अपने प्रयोगों के लिए रख छोड़ा है।"

उसके बाद तो लेब्रॉटरी से निकल कर फिर ड्राइंग रूम में आ गया। आज काफी वक्त गुजर चुका था। ड्राइंगरूम में बैठ कर राज से जाना मिी की वो दोनों प्लेटें देखने की इच्छा जताई।

डॉक्टर जय ने मुस्करा कर मजाकिया लहजे में कहा

"मैं यह बताना भूल गया था कि उस मी की एक खासियत यह भी थी कि एक बार जो इन्सान उसके बारे में सुन लेता था, उसे देखने की इच्छा जरूर प्रकट करता था।" कह कर वो उठा और अन्दर चला गया।

करीब पन्द्रह मिनट बाद जब डॉक्टर जय वापस लौटा तो उसके हाथों में बहुत ही खूबसूरत और नाजूक सी दो प्लेटें थी।

"लो ये देखो, वे दोनों खास किस्म की प्लेटें।"

राज ने दोनों प्लेटे हाथों में लेकर गौर से देखी तो वाकई उनमें से एक प्लेट बिल्कुल सही थी, लेकिन दूसरी प्लेट में बाल आ गया था। राज ने सोचते हुए डॉक्टर से पूछा

"डॉक्टर साहब, यह भी तो हो सकता है, वो दूसरी प्लेट जाना चीनी की हो ही नहीं, जिसमें आपने कई बार उस मिनी सांप का जहर डाला था?"

"मेरे ख्याल में तो ऐसा नहीं है। देखिए, इन दोनों की बनावट एक जैसी है और चीनी मिी भी एक जैसी लगती है।"

"बनावट तो एक जैसे ही है लेकिन आजकल तो एक ही मी और बनावट के हजारों बर्तन बनाए जा रहे है, हो सकता है ऐसा ही कुछ प्रबन्ध उस दौर में भी चाहें कोई भी रही हो।"

"आपका एतराज मेरे दिल को नहीं छूता फिर भी अगर सन्देह दूर करने के लिए अगर एक और प्रयोग करके देख लिया जाए तो क्या हर्ज हैं? मैं लेब्रॉटरी से थोड़ा जहर ले आता हूं उसके बाद हम अभी प्रयोग करके देख लेगें।"

"बहुत बढ़िया सुझाव है। इस तरह मुझे एक नए प्रयोग को देखने का मौका भी मिल जाएगा।" ।

"अच्छा, तो दो मिनट इन्तजार कीजिए, मैं अभी आया।"

डॉक्टर जय फिर अन्दर चला गया।

कुछ मिनट बाद ही वो वापिस आया तो उसके हाथ में एक छोटी सी शीशी थी। वापस आकर उसने शीशी राज को दिखाते हुए कहा

"यह उसी सांप का जहर है जिसे देखकर आप ठिठक गए थे और जिसके बारे में मैंने बताया था कि उसका काटा तीन मिनट से ज्यादा जिन्दा नहीं रह सकता।" डॉक्टर जय ने कहा।

"फिर तो जहर बहुत मारक होगा?"

"बहुत मारक और तेज भी।'' डॉक्टर जय ने जवाब दिया और जेब से एक दूसरी शीशी निकाल कर मेज पर रख दी, फिर राज को देख कर बोला

"और यह उसी मिस्री सांप कर जहर है।"

राज ने देखा तो दूसरी शीशी में किसी नीली सी तरल चीज के सिर्फ कुछ कतरे पड़े हुए थे। शीशियों के बराबर उसने चीनी की दोनों प्लेटें भी रख दीं।

फिर उसने नौकर को आवाज देकर एक गिलास पानी मंगवाया और एक गिलास खाली भी मांगा। गिलास आ जाने पर उसने दोनों गिलासों में पानी आधा-आधा कर दिया, फिर उसने दोनों शीशियां खोल कर एक शीशी में से एक बूंद एक गिलास में डाली, फिर दूसरी शीशी में से एक बूंद दूसरे गिलास में डाली।

अब उनके सामने दो गिलास आधे-आधे जहरीले पानी से भरे रखे हुए थे, जिनमें दो गिलास आधे-आधे जहरीले पानी से भरे रखे हुए थे, जिनमें से एक में उस सांप का जहर था जो डॉक्टर

जय के कहे अनुसार मर चुका था और दूसरे गिलास में उस सांप का जहर था जो इस वक्त भी उसकी लेब्रॉटरी में मौजूद था और जिसका काटा हुआ तीन मिनट से ज्यादा जिन्दा नहीं रह सकता था।
 
उसके बाद डॉक्टर जय ने एक गिलास उठाया, जिसमें उस मिनी छोट सांप का जहर घुला हुआ था, जो मर चुका बताया गया था। उस गिलास का आधा पानी उसने एक प्लेट में डाल दिया और आधा दूसरी प्लेट में।

दो मिनट तक वो दोनों खामोश खड़े प्लेटों की तरफ और से देखते रहे। लेकिन प्लेटें सही सलामत रहीं। दो मिनट बाद डॉक्टर जय ने दोनों प्लेटों का पानी फिर गिलासों में उड़ेल दिया। फिर दूसरा गिलास उठाया और उसका पानी भी आधा-आधा उड़ेल दिया।

राज का मुंह उस वक्त हैरत से खुल गया जब उसने दोनों प्लेटों को चटकते हुए देखा। जैसे चीनी मिी की प्लेटें ठोकर लगने से चटक जाती हैं।

"देखा अपने!" डॉक्टर जय ने राज की तरफ देखते हुए विजेता जैसे गर्व से कहा, "मैंने कहा था न कि दोनों ही प्लेटें असली जाना चीनी की बनी हुई हैं। अब देख लीजिए, एक जहर कितनी तेज है और दूसरा कितना ठण्डा?"

"वाकई बहुत तेज जहर है यह।" राज ने स्वीकार किया।

"लेकिन यकीन कीजिए कि उस मीठे जहर के मुकाबले में यह कुछ भी खतरनाक नहीं है।'

"वाकई दोनों चीजें बहुत हैरतअंगेज हैं। दोनों जहर भी और ये दोनों प्लेटें भी।"

इस प्रयोग से फारिग होकर डॉक्टर जय ने दोनों प्लेटों को पौंछ कर दूसरी मेज पर रख दिया और दो बोतलें मंगा कर दोनों गिलासों का जहरीला पानी उनमें भर दिया। फिर वो राज की तरफ मुड़ा

"चार बज रहे हैं, चाय मंगवा ली जाए तो क्या हर्ज है?"

"चाय में क्या हर्ज हो सकता है!'' राज ने हंस कर कहा।

डॉक्टर जय ने नौकर को आवाज देकर चाय लाने के लिए कहा। चाय भी दो-चार मिनट में ही आ गई। वो दोनों चाय पीने में व्यस्त हो गए।

चाय पीने के बाद राज ने डॉक्टर जय ने पूछा

"इतनी बड़ी और शानदार कोठी है लेकिन सोई-सोई सी लगती

"क्या मतलब?” डॉक्टर जय ने ताज्जुब से राज को तरफ देखा।

"मतलब यह कि किसी हसीन मालकिन के बगैर कोठी में वो बाहर नहीं है जो होनी चाहिए.....।"

"ओह.....।" उसने गहरी सांस लेकर कहा, "आपका मतलब शायद एकाध बीवी से है?"

"जी हां!"

"बात दरअसल यह है कि राज साहब कि मैंनी कभी बीवी की जरूरत ही महसूस नहीं की। इसलिए मुझे कभी शादी का ख्याल ही नहीं आया। रात-दिन प्रयोगों में व्यस्त रहता हूं। घर के कामों के लिए कई-कई नौकर हैं। हर तरह की सुविधा और आराम उपलब्ध हैं, फिर क्यों खामखां एक मुसीबत गले बांधी जाए?"

"मुसीबत.....?"

"मुसीबत ही तो है। अगर बीवी मनपसन्द न मिले तो मुसीबत से कम नहीं होती।"

"इसका मतलब है आपके दिल पर अभी तक किसी हसीना के रंगरूप का जादू नहीं चला?"

"जी नहीं ! वैसे कई जादुई हसीनाएं मेरी जिन्दगी में आकार वापस जा चुकी हैं।" डॉक्टर जय ने कहा।

"और कोई भी अपने कदम नहीं जमा पाई....। राज ने डॉक्टर जय की बात पूरी कर दी।

"सिर्फ एक ने कदम जमाए थे मेरी जिन्दगी में.....और मेरे दिल पर।"

"तो आपको उससे सच्चा प्यार हो गया था।"

"हां, और आज तक है। लेकिन मैंने कभी उससे शादी की इच्छा नहीं जताई....और न ही कोई ऐसा इरादा है।"

"अजीब आदमी हैं आप। लोग तो अपनी प्रेमिकाओं को पाने के लिए दूध की नदियां खोद लाते हैं, पहाड़ तोड़ देते हैं, मौत से टकरा जाते हैं, अपना सब कुछ कुर्बान कर देते हैं। और आप हैं कि.....।"

"जी हां।" उसने राज की बात काटते हुए कहा-''मैं वाकई अजीब सा आदमी हूं। प्यार के बारे में मेरा ख्याल है कि अगर मैं किसी औरत से प्यार करता हूं तो जरूरी नहीं कि उसे बीवी बना लूं बाकि प्यार करता हूं तो जरूरी नहीं कि उसे बीवी बना लूं । बल्कि प्यार तो शादी के बगैर ही अच्छा लगता है। वो किसी दूसरे की बीवी होकर भी तो मेरी प्रेमिका बनी रह सकती है। इस तरह एक औरत से एक वक्त में दो मर्द फायदा उठा सकते हैं। खूबसूरत औरतें एक तरह से बेशकीमती चीजें होती है

और कीमती चीजों का लाभ जितने ज्यादा से ज्यादा आदमियों को पहुंच सके, बेहतर होता है।"

"और वो औरत....यानि कि आपकी प्रेमिका, वो भी क्या ऐसा ही नजरिया रखती है?"

"पहले नहीं रखती थी, मगर मेरी सोहबत में रहने के बाद अब रखने लगी है।"

"यानि उसने शादी भी कर ली है और एक निष्ठावान प्रेमिका की तरह अब भी आपकी भावनाएं सन्तुष्ट कर रही है।"

"बड़ी खुशी के साथ।"

"कमाल है!"

"कोई कमाल नहीं है। सिर्फ अपने-अपने नजरिये की बात है। आप मेरे खास नजरिये को दुनिया के नजरिये की कसौटी पर कस रहे हो, इसलिए आपको यह अजीब लग रहा है।"

"फिर भी मेरा ख्याल है कि पूरी दुनिया में इस नजरिये के आदमी गिने-चुने ही होंगे।"

"हां, दुनिया के ज्यादातर आदमी तंगदिल ही होते हैं।"

"क्या आपकी प्रेमिका के पति को इस स्थिति की जानकारी
 
"नहीं, उसे नहीं मालूम है। दरअसल वो भी दुनिया के तंगदिल लोगों में से एक है। मजबूरी में उससे यह राज छुपाना ही पड़ता

"यह तो आप भी स्वीकार करेंगे कि आपका नजरिया दुनिया के सांस्कृति और मानसिक नजरियों से कुछ हटकर है?"

"कुछ नहीं, बिल्कुल हटकर है। मुझे गर्व है कि मैं दुनिया बालों से बिल्कुल अलग नजरिया रखते की हिम्मत और ताकत रखता

चाय खत्म हो चुकी थी, इसलिए डॉक्टर जय के नौकर को बुलाकर बर्तन ले जाने के लिए कहा और जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल कर राज की तरफ बढ़ाते हुए बोला

"लो सिगरेट पियो.....।”

राज ने पैकेट में से एक सिगरेट निकाली और उसे सुलगाकर कश लेते हुए डॉक्टर जय की तरफ देखने लगा। इस वक्त तक उसकी बातों से राज ने जो अन्दाजा लगाया था, वो यह था कि या तो यह बहुत खतरनाक किस्म का आदमी है, या फिर खिसका हुआ है।

एक बात और भी थी, जो न जाने क्यों राज बड़ी सखी से महसूस कर रहा था। राज का ख्याल था कि डॉक्टर जय ने उससे मिस्री सांप के मर जाने को सिर्फ बहाना किया है, जबकि हकीकत में वो कहीं-न-कहीं जिन्दा है। क्योंकि ऐसे सतर्क और तजुर्बेकार शख्स से इस तरह की लापरवाही की अपेक्षा नहीं की जा सकती थी।

"क्या सोचने लगे?" डॉक्टर जय ने राज को सोचते हुए पाकर पूछा।

"कुछ नहीं....कुछ नहीं।" राज चौंक कर बोला, मैं जाना चीनी की प्लेटों के बारे में सोच रहा था। क्या आप उनमें से एक प्लेट मेरे हाथ बेच सकते हैं?" ।

"आप क्यों खरीदना चाहते हैं उस प्लेट को?" डॉक्टर ने सन्देह से पूछा।

"कुछ खास बात नहीं है, मैं भी उस दुर्लभ चीज को रखना चाहता हूं बस।"

"बेचना तो बहुत मुश्किल है।" डॉक्टर ने अपनी आधी सिगरेट का सिरा ऐश-ट्रे में रगड़ते हुए, "लेकिन चूंकि आप मेरी प्लेटों पर बुरी तरह फिदा हो गए हैं, इसलिए एक प्लेट मैं आपको तोहफे में देता हूं।"

"थैक्स डॉक्टर।" राज ने जवाब दिया-"मैं आपकी इस दयालुता को कभी नहीं भूलूंगा।"

"इसकी जरूरत नहीं है। दोस्ती और विश्वास के सामने ये सारी चीजें बेकार हैं।"

"बहरहाल, मैं आपका आभारी हूं।'' राज ने कहा और डॉक्टर जय मुस्कराने लगा।

वक्त काफी हो चुका था, इसलिए राज ने डॉक्टर जय से इजाजत मांग ली। थोड़े से रूकने के अनुरोध के बाद डॉक्टर ने उसे इजाजत दे दी। राज उसकी दी हुई जाना चीनी की प्लेट को लेकर चल पड़ा।

वो घर वापिस पहुंच गया। डॉक्टर जय से जाना चीनी की प्लेट मांगने के पीछे राज की कोई भावना नहीं काम कर रही थी। दरअसल आदमी बौखलाहट में अजीब-अजीब सी हिमाकतें करने लगता है। राज भी क्योंकि इन दिनों सतीश को मौत की तरफ बढ़ता देखकर बौखलाया हुआ था, इसलिए झुंझलाहट और बौखलाहट में हो गई एक हिमाकत ही थी यह।

उसका मकसद यह था कि कुछ दिन सतीश के खाने-पीने की चीजें प्लेट में रखकर जांची जाए, ताकि वो अपने अनुमान की पुष्टि कर सके कि सतीश को वाकई कोई जहर दिया जा रहा है या यह उसका वहम ही है।

हालांकि वो समझ भी रहा था कि यह ख्याल बड़ा मूर्खता भरा है। क्योंकि इस स्थिति में यह नामुमकिन था कि ज्योति पूरी डिश में जहर मिला देती, और सतीश भी इतना बेवकूफ नहीं था कि वो सतीश की प्लेट में उसकी आंखों के सामने ही कोई संदिग्ध चीज मिला देती हो और उसे पता भी नहीं चलता हो।

इसलिए यह तय था ज्योति अगर सतीश को कोई घातक जहर दे भी रही थी तो वह जहर खाने में नहीं दिया जा रहा होगा।

इसके अलावा जहर देने का दूसरा तरीका क्या हो सकता था? वो सोच रहा था। लेकिन उसे अभी तक कोई ऐसा तरीका सूझा नहीं था। दिमाग लड़ाने के बावजूद वो कोई ऐसा तरीका सूझा नहीं था। दिमाग लड़ाने के बावजूद वो कोई सूत्र नहीं पा सका था। जिसे सोचकर यकीन से कहा जा सकता कि हां, यह तरीका हो सकता है जहर देने का।

वो ज्योति की गैहाजिरी में उसके कमरे की तलाशी ले चुका था

और उसे ऐसी कोई भी चीज नहीं मिली थी जिससे उस पर शक किया जा सके। ज्योति का पूरा परिवेश बेदाग था।

फिर भी राज का दिल गवाही देता था कि इस धवल, स्वच्छ चादर के पीछे कोई घिनौना राज छुपा हुआ है। जिस तक उसकी अक्ल नहीं पहुंच पा रही, क्योंकि बीच में ज्योति का दूरदर्शी दिमाग और उसका जादुई हुस्न दीवार बन कर खड़े हुए

इन्हीं सब चीजों को देखते हुए वो सोचते लगता था कि काश ज्योति अपने तेज तर्रार दिमाग और दूरदर्शिता का इस्तेमाल किसी नेक काम में कर सकती होती तो वह यकीनन कोई बड़ी हस्ती होती।

डॉक्टर से लाई हुई प्लेट राज ने सुरक्षा और सावधानी से एक बक्से में रख दी थी।

अब सवाल यह था कि उसे इस्तेमाल कैसे करे? सतीश को इस बात के लिए राजी करना बहुत मुश्किल काम था कि वो उस प्लेट में खाना खाया करे।

दूसरे, ज्योति की आधुनिकताा पसन्द तबीयत भी यह कभी न बर्दाश्त करती कि घर में दर्जनों नई प्लेटें होने के बावजूद उसका पति एक पुरानी और चटकी हुई प्लेट में हर रोज खाना खाए।

आखिर काफी सोच-विचार के बाद राज ने इस समस्या का हल भी निकाल लिया। घर के बावर्चियों को उसने इनाम का लालच देकर इस बात पर तैयार कर लिया था कि वो हर रोज वह प्लेट मेज पर सतीश के सामने रख दिया करे। उसने सोचा था कि दो चार दिन तो सतीश और ज्योति इस बात पर ध्यान ही नहीं देंगे कि रोजाना एक ही प्लेट सतीश के सामने रखी जा रही हैं । बाद में अगर कोई बात हुई भी तो जैसा मौका होगा, वैसा जवाब दे दिया जाएगा।

इन दिनों खाने के वक्त सतीश के सामने वही जाना चीनी की प्लेट रखी जाने लगी। दस-बारह दिन बीत गए और उम्मीद के खिलाफ किसी ने भी प्लेट पर ध्यान नहीं दिया। राज खाने के बाद किसी ने किसी बहाने किचेन में जाकर प्लेट का मुआयना कर लेता था।
 
लेकिन नतीजा कुछ भी नहीं निकला। यानि प्लेट में कोई दूसरी चटक नहीं दिखाई दी थी उसे, जिससे साफ हो गया कि इस तरह का ख्याल सिर्फ बेवकूफी ही था। खाने में किसी किस्म का जहर नही मिलाया जाता था।

, दस-बारह दिन के बाद राज ने खुद ही वो प्लेट बावर्ची से वापिस ले ली।

धीरे-धीरे एक महीना और गुजर गया, लेकिन राज को अपनी गतिविधियों में जरा बराबर भी सफलता नहीं मिली। सतीश दिन-प्रतिदिन दुबला और कमजोर होता जा रहा था, इसके साथ ही राज की शारीकि और मानसिक शक्यिां भी जैसे खत्म होती जा रही थी। रहस्यों और उलझनों के इस दौर में वो हैरान, परेशान , अकेला ही चारों तरफ टक्करे मारता फिरता था

और उसकी निगाहों के सामने ही उसका सबसे प्यारा दोस्त सतीश अपनी अकाल मृत्यु की तरफ तेजी से बढ़ता जा रहा था।

ज्योति अब बिलकुल स्वस्था हो चुकी थी, बीमारी से उबरने के बाद उसका रूप कुछ और निखर आया था। जैसे सोना आग में तप कर सुन्दर हो जाता है। जहां तक राज ने ज्योति की फितरत का विश्लेषण किया था, उससे उसने अन्दाजा लगाया था कि ज्योति को सतीश की जिन्दगी या मौत से कोई दिलचस्पी नहीं थी, वो सिर्फ दिखावें के लिए सतीश की बीमारी पर चिंजा प्रकट करती थी। कभी जब सतीश की तबीयत बिगड़ जाती थी तो पूरी-पूरी रात उसके सिरहाने बैइ कर गुजार देती थी। इस में दिली लगाव या प्यार नहीं था, सिर्फ दुनियादारी ही थी।

डाक्टर जय वर्मा भी अब नियमित रूप से सप्ताह में एक बार जरूर आता था। कई बार राज को सन्देह हुआ कि कहीं डॉक्टर जय ही ज्योति के जरिये सतीश पर मिस्त्री सांप के जहर का एक्सपेरीमेंट तो नहीं कर रहा था? लेकिन इस बात को उसकी अक्ल नहीं स्वीकारती थी, भला सतीश ने जय का क्या बिगाड़ा था, जो जय उसकी जान लेने पर तुल जाता ?

डॉक्र जय गुप्ता के अलावा राज ने सतीश के दूसरे दोस्तों को भी परखा और जांचा, नौकरी की जांच की, आने-जाने वालों पर कडी निगाह रखी, लेकिन नतीजा जीरों ही रहा। उसके संदेह की सुई घूम-फिर कर फिर उसी एक बिन्दु पर पहुंचकर रूक जाती,यानि ज्योति पर।

उसकी तालाश और तफ्तीश की सीमा जैसे ज्योति पर आकर खल्क हो जाती थी, जो रूप और शालीनता के पर्दे में अपनी असलियत छुपाए हुए थी।

मानसिंह तनाव और आत्मिक यन्त्र्या के इस जमाने में, कभी-कभी एक ख्याल और राज के दिल में आता था जिससे वो और भी परेशान रहने लगा था। वो ख्याल यह था कि आखिर डॉक्र जय गुप्ता की वो प्रेमिका कौन थी जिसका उसने जिक्र किया था ? हालांकि एक असम्बंधित आदमी की प्रेमिका के बारे में सोचना बेकार था। फिर भी न जाने क्यों बार-बार यह सवाल राज के जेहन में चकराने लगता था। जब यह सवाल उसके मन में उठता था तो खुद-ब-खुद ज्योति की तस्वीर उसके जेहन मे नाच जाती थी।

"क्या ज्योति ही डॉक्टर जय की शादीशुदा प्रेमिका हैं ?" उसने यह सवाल एकांत में कई बार अपने आप से पूछा होगा, जिसका जवाब उसे अपने दिमाग से नही मिलता था।

जब डॉक्टर संयज सतीश की कोठी पर आता था तो कई बार राज ने जय और ज्योति के चेहरों का गौर से जायजा बार राज ने जय और ज्योति के चेहरों का गौर से जायजा भी लिया था। लेकिन उसे जय और ज्योति के चेहरे हमेशा सपाट ही नजर आते थे। बिल्कुल भावहीन, प्यार का रंग और उसकी गर्मी की चमक उनके चेहरों पर कभी नजर नही आती थी उसे यह उसके सवाल का जवाब था कि ज्योति डॉक्टर जय की प्रेमिका नहीं हो सकती। लेकिन भगवान ही जाने क्यों, राज का दिल पूरी तरह संतुष्ट नहीं होता था।

फिर एक दिन एक अजीब संयोग हुआ। उस दिन सतीश को बुखार आ गया था और वो अपने कमरे में पड़ा हुआ था। शाम को चार बजे राज सतीश को दवा खिला का ज्योति के कमरे में से होता हुआ अपने कमरे में जा रहा था। ज्योति ड्रेसिंग टेबल के सामने बैठी अपने चांद से सुन्दर चेहरे पर मेकअप कर रही थी। वो इस वक्त सुर्ख लिपस्टिक अपने रसीले होंठों पर फेर रही थी।

कदमों की आहट सुनकर उसने राज की तरफ गर्दन घुमाकर दूखा और मुस्कुरा कर बोली।

"हेलो राज ! क्या सतीश को दवा पिला दी हैं ?"

"जी हां।" राज ने सिर हिला दिया।

“एक बात कहूं, अगर तुम मान लो तो ......।"

.

“जी....कहिए............? राज चलता-चलता ठिठक गया

"ओडियन में एक बहुत अच्छी पिक्चर लगी है। मैने बहुत दिनों से कोई पिक्चर नहीं देखी। अगर तुम मेरे साथ चलों तो तुम्हारी बड़ी कृपा होगी।" ज्योति ने कहा।

"आप देख आईए , मेरे जाने की क्या जरूरत हैं ?" राज ने गम्भीरता से कहा।

“अकेले पिक्चर देखने में दिल नहीं लगता।' ज्योति ने बड़ी अदा से मचल कर कहा।

" सतीश यहां अकेला रह जाएगा.....।"राज ने बहाना बनाया।

'मैं सतीश से कह देती हूं। फिर यहां उसकी देखभाल के लिए कई नौकरी भी तो मौजूद है।

"नही भाभी, यह अच्छा नहीं लगता कि सतीश यहां.............।"

'राज.....।" उसने राज की बात काटकर बड़ें विनीता स्वर में कहा-“आज मेरा दिल पिक्चर देखने को बहुत कर रहा है। भगवान के लिए निराश न करो।"

“अच्छा, चलता हूं।” राज ने ज्योति की जिद के आगे हथियार डालते हुए कहा।

"थैक्यू ।” वो राज को राजी पाकर किसी फूल की तरह खिल उठी थी।

"मैं जरा कपड़ें बदल लूं। सिर्फ दस मिनट इन्तजार करो।"

"मंजूर! मैं इन्तजार कर रही हूं। लेकिन जरा जल्दी आना। शो शुरू होने में सिर्फ बीस-पच्चीस मिनट ही बाकी रह गए है।"
 
"बस, आप गया और अभी आया।" राज ने कहा और कपड़ें बदलने के लिए तेजी से अपने कमरे की तरफ चल पड़ा। इस वक्त उसने ज्योति के साथ पिक्चर जाने का फैसला दो वजहों से किया था। एक तो यह कि उसने बड़े प्रार्थना भरे स्वर में आग्रह किया था, जो सभ्यातावश वो मना नहीं कर सका था।

दूसरे उसने सोचा था कि शायद एकांत में और अच्छे मूड में होने की वजह से ज्योति के मुंह से कोई बात निकल जाए जिससे मामले की उलझी डोर का कोई सिरा हाथा आ सके। वर्ना न तो राज पिक्चरो का इतना शौकीन था, और न ही उसे ज्योति के साथ एकांत में वक्त गुजारने की कोई इच्छा थी।

अपने कमरे में पहुंच कर राज ने जल्दी-जल्दी कपड़े बदले और फौरन ही वापिस ज्योति के कमरे की तरफ चल पड़ा था। इस सारे काम में उसे ज्यादा से ज्याद तीन-मिनट लगे होंगे।

"चलिए भाभी..........मैं..........।

ज्योति के कमरे में पहुचकर उसने इतना ही कहा था कि उसे चौंक कर खामोशी हो जाना पड़ा था। कमरे मे घुसते ही उसनेदेखा कि सामने सोफे पर बैठा डॉक्टर जय सिगरेट के कश लगा रहा था और ज्योति आईने के सामने खड़ी अपने मेकअप को आखिरी टच दे रही थी। वो दोबारा लिपस्टिक लगा रही थी।

राज ने गौर से देखा तो उसने ज्योति के होंठों की लाल लिपस्टिक को कही-कहीं से उतरा हुआ पाया, जैसे जल्दी में किसी चीज से रगड़ खाकर उतर गई हो। बाकी मेकअप एकदम फिट थां

राज ने सोचा, अभी कुछ मिनट पहले वो अपना मेकअप पूरा कर चुकी थी, होंठों पर लिपस्टिक भी बड़े अच्छे और मोहक ढंग से लगाई हुई थी उसने फिर इतनी सी देर में क्या हो गया कि उसे दोबारा लिपस्टिक लगाने की जरूरत पड़ गई?

ये तमाम सवाल उसके जहन में सिर्फ आधे मिनट में ही होकर गुजर गई थे। फिर फौरन ही उसे डॉक्टर जय का ख्याल आ गया

"हैलों डॉक्टर साहब, कहिए, क्या हालचाल हैं ?" राज ने जल्दी से अपना हाथ बढ़ा कर कहा।

.

"कृपा हैं ऊपर वाले की.......।" डॉक्टर जय ने मुस्कराकर नलीकण्ठ का हाथ पकड़ लिया, दोनों एक ही सोफे पर अगल-बगल बैठ गई

"राज!'' ज्योति ने आईने में देखते हुए कहा-“डॉक्टर जय भी हमारे साथ पिक्चर देखने चल रहे है......

“यह तो बड़ी खुशी की बात हैं।" राज ने कहा।

"अजी कहां आप लोगों को बोर ही तो करूंगा। लेकिन ज्योति की जिद हैं तो हमारी गर्दन झुकी हुई हैं।" डॉक्टर जय ने मुस्कराकर कहा। फिर अपनी घड़ी देखकर बोला, "मेरा ख्याल हैं, टाईम हो गया हैं.........हब हमें चलना चाहिए।"

"हां, अब चलना चाहिए.....वर्ना फिल्म निकल जाएगी।

राज ने उसका समर्थन किया और वो दोनों चलने के लिए उठ खड़े हुए।

ज्योति भी मेकअप से फारिग हो चुकी थी उसने भी अपना पर्स उठाया और चल दी।

किसी किस्म की घटना घटे बगैर वो दोनों पिक्चर देखकर वापिजस आ गए। लेकिन राज का जेहन अब भी इस बात में उलझा हुआ था कि आखिर ज्योति को दोबारा लिपस्टिक लगाने की क्या जरूरत पड़ गई ? लिपस्टिक उतर जाने से राज के उस सन्देह को बल मिला था जो उसे ज्योति और डॉक्टर जय पर था।

कमरे मे एकांत एक खूबसूरत औरत एक चालाक मर्द ऐसे माहौल उमें होठों की लाली उड़ जाना कोई बड़ी बात तो नही थी।

अगर राज को इस बात का सबूत मिल जाता कि ज्योति ही डॉक्टर जय की शादीशुदा प्रेमिका थी तो उसके लिए ज्योति का राज जानने में आसानी हो जाती। नाकामी के अन्धेरे में उसे रोशनी की किरण नजर आ जाती । उसे फौरन यकीन हो जाता कि ज्योति ही डॉक्टर जय से कोई जहर लाकर सतीश का दे रही है। एक बार इसका फैसला कर लेने के बाद सतीश का इलाज और देखभाल भी आसानी से की जा सकती थी। फिर उसे मौत के जाल से निकाल लेना कोई मुश्किल न होता।
 
उस घटना ने राज के सन्देह को मजबूर उरूर किया था, लेकिन इस आधार पर दोनों के सम्बन्धों के बारे में कोई ठोस फैसला नहीं किया जा सकता था।

उस दिन रात गए तक राज उसी बात पर सोचता रहा और किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका था। लेकिन उससे तीसरे दिन ही उसे अपने सवाल का सही जवाब मिल गया।

उस दिन यो ही बैठे-बैठे राज को ख्याल आया कि क्यों न डॉक्टर जय से मिला जाए? यह ख्याल आते ही वो सतीश की कार लेकर डॉक्टर जय की कोठी पर जा पहुंचा।

वो क्योंकि कई बार डॉक्टर जय की कोठी पर आ चुका था, और घंटों यहां गुजार चुका था, इसलिए पूर बेतकल्लुफी से किसी को कोई सूचना दिए बगैर सीधा अन्दर गया और ड्राइंगरूम मे जाकर बैठ गया। नौकर ने पूछने पर बताया कि साहब लॉन में माली को फूल-पौधों के बारे में कुछ निर्देश दे रहे थे।

“अच्छा, भागकर उन्हें कह कि राज आया हैं। राज ने कहा और नौकर वाकई भाग गया।

वो कोठी के पिछले हिस्से की तरफ गया था जहां डॉक्टर जय ने बड़ा खूबसूरत बगीचा लगा रखा था।

इन्तजार की घड़ियां गुजारने के लिए राज ने ड्राईगरूम अपने मालिक की ऊंची पसन्द का प्रत्यक्ष सबूत था।

कमरे के मध्य एक खूबसूरत काले रंग की मेज के गिर्द कुछ आराम कुर्सियां रखी हुई थी, दाई तरफ आतिशदान के करीब सोफा रखा हुआ था, उसी दीवार के साथ एक कोने में छोटी सी ड्रेसिंग टेबल भी लगी खड़ी थी।

राज अपनी सूरत देखने के लिए शीशे के सामने जा खड़ा हुआ। आईने में अच्छी तरह खुद का जायजा लेकर वो पलटने लगा तो उसकी नजर एक लेडीज रूमाल पर पड़ी, जो मेज पर रखी एक किताब की आड़ में पड़ा हुआ था। राज ने वो रूमाल उठाकर देखा और पहली नजर में ही उसे पहचान गया कि यह ज्योति का रूमाल था। रूमाल पर कही-कही लाल-लाल धब्बे थे।

एक फौरी ख्याल से राज ने उसे सूंघा तो रूमाल में से हल्की-हल्की चैनल फाइल की खुशबू आ रही थी, इसके अलावा लिपस्टिक की विशेष महक तो थी ही।

ज्योति का रूमाल और उस पर लिपस्टिक के दाग देखकर राज का दिमाग फौरन दो दिन पहले की उस घटना की तरफ घूम गया।

ज्योति का रूमाल, लिपस्टिक के धब्बे, दो दिन पहले ज्योति की उड़ी-उड़ी लिपस्टिक-ये तमाम बाते राज को एक ही सिलसिले की कड़ियां लग रही थी।

वैसे तो ज्योति का रूमाल डॉक्टर जय के यहां रह जाए, कोई सन्देह की बात नहीं थी, क्योंकि ज्योति डॉक्टर जय के यहां आती जाती रहती थी और वो अपना रूमाल भूल भी सकती थी। लेकिन रूमाल पर लिपस्टिक के धब्बो ने राज के सन्देह पूरे कर दिए थे। उसने सोचा, यकीनन ऐसा हुआ होगा कि ज्योति के होंठों की लिपस्टिक डॉक्टर जय के होंठों पर लग गई होगी और बाद में हड़बड़ी दे दिया होगा, जिसे ज्ञर लौटकर डॉक्अर जय ने लापरवाही से यहां डाल दिया होगा।

राज यह भी जानता था कि डॉक्टर जय की कोठी में कोई औरत नही रहती , जिसके बारे में सोचा जा सकता कि यह रूमाल उसका होगा। न ही ज्योति अपने बढ़िया रूमालों से मेकअप पोछने की आदी थी। इस काम के लिए उसने ड्रेसिंग टेबल के पास ही दो गहरे रंग के नर्म तौलिये टांग रखे थें

इस ख्याल ने जैसे यह बात साफ कर दी थी कि ज्योति ही डॉक्टर जय की गुप्त प्रेमिका हैं

कमरे के बाहर से कदमों की आहट सुनकर राज ने वो रूमाल बही डाल दिया और वापस आकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया। एक मिनट बाद ही डॉक्टर जय वर्मा कमरे में दाखिल हुआ।

"हेलों राज साहब !'' उसने आते ही कहा- आज अचानक कैसे दर्शन दे दिए ?"

"आपकी याद खींच लाइ .........।” राज ने कुर्सी से उठकर हंसते हुए कहा।

हाथ मिलाने के बाद दोनों आमने-सामने कुर्सियों पर बैठ गए और इधर-उधर की बाते शुरू कर दी।
 
हालांकि रूमाल देख कर राज यह फैसला करचुका था। कि डॉक्टर जय और ज्योति में निश्चित ही प्रेम सम्बंध हैं और यह सबूत पाकर उसे कुछ खुशी भी हुई थी, क्योंकि अपने ख्याल में उसने आज इस उलझी हुई गुत्थी का एक सिरा पा लिया था, फिर भी उसने रूमाल के बारे मे पुष्टि करने का फैसला कर लिया और सोचने लगा। जितनी देर से दोनों हाथ मिलाकर बैठे, इधर-उधर की बातें कीं, उतनी देर में एक तरकीब सूझ गई थी।

उसने बातें करते-करते डॉक्टर जय से कहा

"मेरा ख्याल हैं कि आजकल तो आप बहुत ज्यादा मस्त होंगे

"मस्त तो हम हमेशा ही रहते हैं।" जय बोला, "लेकिन आपने खासतौर से आज ही क्यों कहा ?"

"क्योंकि मेरे अन्दाजे के मुताबिक हाल में ही में आप अपनी प्रेमिा से मिल चुके हैं"

उसने राज को गौर से देखा और व्यंग्य से बोला-'तो आप ज्योतिषी भी हैं राज जी ?"

"ऐसा ही समझ लीजिए डॉक्टर साहब ।" राज ने हंस कर कहा।

"तो श्रीमान जी , मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं ज्योतिष को बिल्कुल नहीं मानता। रही लवर से मिलने की बात, तो अक्सर उससे मुलाकाते होती ही रहती हैं। अपनी तो जिन्दगी ही उन मुलाकातों के सहारे गुजर रही हैं, और ......।"

"नही साहब मैं आम मुलाकातों का जिक्र नही कर रहा हूं।" राज ने उसकी बात काटकर कहा, “मैं तो उसे खास मुलाकात की बात कर रहा हूं जिसमें प्यार मोहब्बत वगैरह सब कुछ शामिल हैं और जो दो दिन कि अन्दर-अन्दर ही हुई।

“ओफ्फोह........। आप तो बड़ी गम्भीरता से अपनी ज्योतिष विद्या का प्रयोग करने लगे ।” उसने यह बात सुनी तो जरा चौंककर बोला थां

“जी हां। और यह प्रार्थना भी कर दूं कि ये बाते में ज्योतिष विद्या के आधार पर नही कह रहा हूं। बल्कि अपनी जनरल नॉलिज के आधार पर कह रहा हूं।"

"जनरल नॉलिज.....।" डॉक्टर जय ने हैरानी से उसके शब्द दोहराए।

एक क्षणा के लिए उसके चेहरे पर घबराहट के भाव प्रकट हुए, लेकिन अगले ही क्षण उसने अपने आप पर काबू पा लिया। शायद उसे खौफ हो गया हो कि कहीं राज उसका राज तो नहीं जान गया। इसलिए उसने बड़ी बेचैनी से पूछा।

"हालांकि मतलब तो बिल्कुल साफ है।" राज ने जरा व्यंग्स से कहा-'अच्छा ठहरिये। इस तरह शायद आप समझ नही सकेंगे। मैं सबूत ही क्यों न पेश कर दूं?"

कह कर राज उठा और ड्रेसिंग टेबल पर से वो रूमाल उठा लाया और डॉक्टर जय को दिखा कर बोला

“देखिये डॉक्टर साहब, आपकी ताजा मुलाकात का अन्दाजा मैने इसी रूमाल से लगाया है। अभी-अभी जब आए बागीचे में थे तो मैंने कमरे में एकांत से उकताकर कमरे का जायजा लेना शुरू कर दिया था। इत्तेफाक से मुझें ड्रेसिंग टेबल पर यह रूमाल रखा हुआ मिला गया, जिस पर लगे लिपस्टिक के धब्बे इस बात का सबूत हैं कि किसी रूप सुन्दरी के होंठों की लाली आपके प्यासे होंठों ने चुराई होगी और उसी हसीना ने बाद में आपकों होंठ साफ करने के लिए यह रूमाल पेश किया होगा।"

वो राज को धूर रहा था। राज बोला

"अब बताइए, मेरी जनरल नॉलिज किसी ज्योतिषी से कम हैं क्या ?"

रूमाल राज के हाथ में देखकर एक बार फिर पल भर के लिए डॉक्टर फौरन ही वो फिर सम्भल गया। राज की बात खत्म हो जाने के बाद उसने एक लम्बी चैन की सांस ली और आराम से मेज पर टांगें फैलाता हुआ बोला

"ओह........ । इस रूमाल की बात कर रहे हैं आप ? मैने सोचा, न जाने क्या नॉलिज हो गई हैं आपकों........।'

"अच्छा, आप सच-सच बताइए, क्या मेरा अन्दाजा गलत हैं?

क्या इस रूमाल पर लिपस्टिक के धब्बे आपके जोशीले चुम्बनों की कथा नहीं कह रहे ?"

'बेशक, आपका अन्दाजा एकदम सही है।' डॉक्टर जय ने सहमति से सिर हिलाते हुए कहा- 'मैं हाल ही मैं अपनी प्रेमिका से मिला हुं और हमने प्यार भी किया था, लेकिन यह रूमाल जो आपके हाथ में हैं, वो न मेरा हैं ना ही मेरी प्रेमिका का।"

"मैं कैसे यकीन कर सकता हूं ?" राज बोला, “जबकि मैं अच्छी तरह जानता हूं कि आपकी इस कोठी में कोई औरत नही रहती हैं जो ऐसी कीमती रूमाल इस्तेमाल कर सकती हो और इस तरह खुले दिल से लिपस्टिक बर्बाद करती हो।

“ज्यादा बड़ें जासूस बनने की कोशिश मत करो मेरे दोस्त । यह काम बहुत मुश्किल है।” डॉक्टर जय ने इस तरह मुस्कराकर कहा, जैसें राज की बाते मूर्खतापूर्ण वहम पर आधारित हों

"में सच कह रहा हूं। यह रूमाल मेरा या मेरी प्रेमिका का नही हैं बल्कि यह रूमाल मिसेज ज्योति का हैं, वो ही इसे पिछले हफ्ते यहां भूल गई थी, गलती से। इसे मैंने कल इसलिए इस्तेमाल कर लिया था क्योंकि उस वक्त मुंह साफ करने के लिए और कोई साफ कपड़ा नही मिला था। नौकरो की अर्थपूर्ण मुस्कराहटों से बचने के लिए रंगे हुए होंठ साफ कर लेना बहुत जरूरी था।

सच पूछो तो इन फैशनेबल औरतों से मिलने पर मुझें उलझन ही होती हैं कि कमबख्त लिपस्टिक इतनी ज्यादा थोप लेती हैं कि अगर कोई जल्दबाजी में किस करे तो लिपस्टिक इश्तहार बन जाती हैं, उधर उनका खूद का चेहरा लुटा-पिटा नजर आने लगता है। इधर हम होते हैं कि होठ रगड़ते फिरते है।"

वो खामोशी हुआ तो राज ने पूछा

“क्या वाकई यह रूमाल ज्योति भाभी का हैं ?"

“आपको मेरे जवाब पर शक क्यों हैं ?" उसने अपनी तेज आंखों से राज के चेहरे को देखा- “वाकई यह रूमाल मिसेज सतीश का है। लेकिन इससे आपके दावे का खण्डन तो नहीं हो जाताा । मेरी प्रेमिका वाकई कल मुझसे मिलने आई थी और यह लिपस्टिक उसी के गुलाबी होंठों पर से मेरे होंठो पर शिफ्ट हुई थी।
 
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