• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Hindi Sex Kahani - तीन सगी बेटियां

दरवाज़े पे बजे बेल के आवाज़ ने उसे जगा दिया। जल्द से उसने टीशर्ट और शॉर्ट्स पहन लिया और दरवाज़ा खोला।

आशा: कहाँ थी दीदी, कब से बेल बजा रही हूँ।

निशा: दो ही बार बजाए, सशा कहाँ है।

आशा: आ रही है, किसी दोस्त से बात कर रही है। ये देखो मैं क्या लायी हूँ। रैबिट का टेल। इसे मैं भी पहन सकती हूँ, देखो।

निशा: क्या. क्या है यह्। और तू क्यों पहनेगी। भला कोई जानवर का टेल पहनता है क्या।

आशा: अरे दीदी यह रियल रैबिट का टेल नहीं है। यह तो आर्टिफीसियल है। और इसे पहनकर मैं बनी रैबिट जैसे लगूँगी।

निशा: क्या बकवास.स्पाइडरमैन को जैसे स्पाइडर ने काटा था वैसे तुझे रैबिट ने काटा है लगता है। चल जा मुझे खाना बनाना है। तेरे बचपना के लिए टाइम नहीं है

आशा: यह बचपना नहीं है.।आप को पसंद नहीं तो आप की मर्ज़ी.

और वह चल दी। थोड़ी देर में सशा आ गयी।

बाकी का दिन ऐसे ही निकल गया। जगदीश राय खाना खाने नीचे आए। खाना खाते वक़्त जगदीश राय निशा से नज़रे चुराते रहे। उन्हे ताजुब हो रहा था की इतना सब होने के बावजूद निशा के चेहरे पर कोई शर्म या अपराध बोध (गिल्ट) नहीं था।

खाना परोसते वक़्त निशा पापा के बहूत क़रीब आकर खाना परोस रही थी, पर जगदीश राय उससे बच रहा था।
खाना खाते वक़्त आशा और सशा के बड़बड़ के बीच निशा पापा को घूरे जा रही थी।
निशा आज रात पापा को न दूध देने गयी न मसाज करने गयी।

रात को निशा दिन में हुए घटने पर विचार कर रही थी। एक बात वह जान चुकी थी की पापा को वह पसंद है पर भोले होने के कारण डर रहे है। इतना आगे बढ़ने के बाद वह अब पीछे नहीं जा सकती ।
उसके माँ के बाद इस घर की औरत वही है , और वह यह कर्त्तव्य पूरा करेगी। वह अपने पापा को माँ की याद में उदास नहीं होने देगी। चाहे इसके लिए उसे कुछ भी करना पडे।

अगले दिन जगदीश राय की नींद प्लेट के गिरने की आवाज़ से खुल गयी। क्लॉक पर 9 बज चुके थे। वह आज बहूत लेट उठा था।

जगदीश राय(मन में): "मैं रोज़ 7 बजे से पहले उठता हूँ, और आज इतने सालो बाद लेट उठा हूँ। आजकल सब बदल रहा है। मैं बदल रहा हूँ। निशा बदल रही है। और घर का माहौल बदल रहा है। क्यों?
 
कल निशा की गांड के सामने मैंने अपने हथ्यार कैसे डाल दिए। क्या हुआ मेरे कण्ट्रोल को।
मुझे निशा से बात करनी पडेगी। जो हो रहा है उसे रोकना होगा।
पर क्यों रोकू मैं? क्या मैं खुश नहीं हूँ। निशा की मुलायम गांड से सुन्दर गांड देखी है किसी की। सीमा शादी के वक़्त भी इतनी सुन्दर और सेक्सी नहीं थी।
निशा का क्या क़सूर है। वह सिर्फ मुझे खुश देखना चाहती है। और सारे घर का सारा काम करती है। और उसकी उम्र ही क्या है। और बदले में वह मुझसे शायद थोड़ा दोस्ती मांगती है तो यह क्या गुनाह है।
फिर भी मैं उससे बात करूंगा। पर कैसे? मुझे उससे डरकर या शर्मा कर रहना नहीं चाहिये। मैं उसका बाप हूँ कोई बॉयफ्रेंड नही। मैं ज़रूर उससे बात करुँगा।"

जगदीश राय यह सब सोचकर उठा, फ्रेश होकर, निचे ड्राइंग रूम में आकर बैठ गया।

निशा मैक्सी पहने, हाथ में चाय लेके आई।

निशा: उठ गए पापा। क्या बात है। बड़ी गहरी नींद थी। लगता है कल आप बहुत थक गए थे।।

यह कहकर निशा हंस दी।

जगदीश राय न चाहते हुआ भी शर्मा गये।

जगदीश राय: नहीं.।। बस.। युही.। लेटा रहा.।

तभी आशा और सशा दौड़ते हुए आयी, और टेबल पर पड़ी टोस्ट लेकर भाग गयी।

सशा: पापा , स्कूल बस आने ही वाली है.। लेट हो गये हम लोग.। शाम को मिलते है।

जगदीश राय: हाँ हाँ.। ठीक से पढ़ाई करना.।

निशा सशा के पीछे दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी, तभी गुप्ताजी दिख गये। वह निशा की सेक्सी बॉडी को घूरे जा रहा था। निशा ने अपने मैक्सी को ठीक किया।

निशा: अरे अंकल आप यहा।

गुप्ताजी: निशा बेटी. कैसी हो. कॉलेज वैगरा ठीक है न.

निशा: हाँ अंकल सब ठीक है।

गुप्ताजी: कहाँ है अपने स्टंट मैन.। बस में स्टंट करते हुए गिर पड़े.।राय साहब, कहाँ हो?

जगदीश राय: अरे गुप्ता जी आप। आईये आइए, बेठिये।।।

गुप्ताजी: अब आपकी हालत कैसी है.। दर्द कम है या नहीं.।

जगदीश राय: अरे अब तो मैं एक दम ठीक हु.। ज़ख्म से भी दर्द नहीं है. और बॉडी पेन भी ग़ायब है।। बस पूरा नौजवान बन गया हु. ह। ह

गुप्ताजी: अरे वह.। मैंने तो सोचा था राय साहब तो गए एक महीने के लिये। यहाँ तो आप दो ही दिनों में ठीक हो गये।

निशा: वह तो होगा ही.। उनकी नर्स भी तो मैं ही हु.हे हे।

गुप्ताजी: हाँ. बेटी के प्यार ने ही जादू दिखाया होगा.।क्यों राय साहब.।बहुत सेवा करवा रहे हो क्या बेटी से.
 
जगदीश राय के मन में पिछले दिनों की सीन्स फ़्लैश बैक की तरह दौड गयी।

जगदीश राय (शर्माते हुए): अरे नहीं नहीं.कुछ भी बोलती रहती है. निशा, गुप्ताजी के लिए चाय तो बनाओ.

गुप्ताजी: अरे नहीं नहीं. मैं तो मॉर्निंग वाक के लिए निकला था.चाय पीकर निकला हूँ. फिर आऊंगा कभी .बिटिया के हाथ से खाना भी खाके जाऊंगा है है हा.।

और जाते जाते भी मैक्सी के ऊपर से निशा की फुटबॉल जैसे बड़े मम्मो को घूरते हुए चला गया।

निशा(मन में): ठरकी बुड्ढा. तू आ तुझे खाना नहीं.ज़हर देती हूँ.

फिर निशा रोज़ के काम काज पर लग गयी। उसने 11।30 बजे तक जगदीश राय से कुछ भी नहीं बोली.

पर जगदीश राय पेपर की आड़ लिए निशा को देखे जा रहा था। मैक्सी के ऊपर से निशा का हर अंग उभर कर आ रहा था।

और पेपर के अंदर से अपने लंड को सहला भी रहा था।

थोड़ी देर बाद निशा अपने पापा के सामने आकर खड़ी हो गयी और फैन से हवा खाने लगी।

निशा: ओह पापा. कितनी गर्मी है.हमे ए सी लगा देनी चाहिये.

जगदीश राय (ड्रामा स्टाइल में, पेपर हटाते हुए): हाँ. लग सकती है.

निशा पसीने में लथपथ खड़ी थी. मैक्सी पूरी तरह उसके मम्मो , पेट और जांघ से चिपक गई थी।

जगदीश राय निशा को घूरे जा रहा था। निशा इस बात से अन्जान नहीं थी। उसने पुरी कॉन्फिडेंस से अपने बदन के अंगो को पापा को दिखा रही थी।

कुछ देर बाद वह अपने कमरे में चली गयी। जगदीश राय ने राहत की सास ली। उसका लंड खड़ा हुआ था।

जगदीश राय फिर अपने आप को पेपर के पीछे छुपा दिया।

तभी निशा नीचे आ गयी।

निशा: उफ़. अब कुछ राहत है.गर्मी ने तो मार दिया.

जगदीश राय ने जब देखा तो उसके सोने-जा रहा लंड फिर फड़फड़ना शुरू कर दिया।
 
निशा ने पापा की एक दूसरी शर्ट पहनी थी। जो कल वाली शर्ट से छोटी थी। शर्ट सिर्फ उसके गाण्ड तक पहुच रही थी। निशा की बड़ी गांड शर्ट के अंदर मुश्किल से समां रही थी।

निशा: क्यों. कैसी लग रही हु.।

जगदीश राय: क्या कैसी लग रही हो?

निशा: कमाल है।।आप मुझे घूर रहे है।। और मुझसे पूछ रहे है।।क्या?

जगदीश राय: वह तो.मैं कुछ और सोच रहा था.

निशा: अच्छा जी.।ठीक है।। पर बताईये तो सही. कैसी लग रही हु.

जगदीश राय: बताया तो था कल.

निशा: वह कल वाली शर्ट के लिए.आज यह दूसरी शर्ट है.यह हाफ शर्ट है.। कल वाली फुल शर्ट थी।

जगदीश राय: मुझे तो कोई फर्क नहीं नज़र आ रहा . वैसी ही लग रही हो.

जगदीश राय परिस्थिती से बचना चाहता था।

निशा: मैं आपसे बात नहीं करूंगी.जाइए.

और निशा मटकते चल दी। चलते वक़्त शर्ट निशा की गांड से उछलकर गांड के निचले हिस्से को दिखा रहा था।

फिर निशा झाड़ू ले आयी। और कहा।

निशा: पापा फैन बंद कर रही हूँ। डाइनिंग टेबल के निचे बहुत खाना गिरा पड़ा है। सशा अभी भी खाना गिरा देती है खाते वक़्त।

जगदीश राय ने जब निशा को देखा तो उसे पसीना आने लगा

अब तक जगदीश राय निशा की जाँघो पर घूर रहा था। पर अब उसने जाना की निशा शर्ट का पहला २ बटन खोल रखी है। जिसमें उसकी चूचो की गल्ला (क्लीवेज) साफ़ दिख रही थी। निशा के चुचे शर्ट के अंदर तने हुए थे। और पतली कॉटन शर्ट में से निशा की निप्पल्स का आकार साफ़ दिख रहा था।

निशा कोई अप्सरा की तरह लग रही थी।
 
जगदीश राय को यह जानते देर नहीं लगी की निशा ने ब्रा नहीं पहनी है। निशा ने झाड़ू मारना शुरू कर दिया। जब भी निशा झुकति , जगदीश राय को निशा की आधि से ज़ादा गोरी मुलायम बड़े चूचे दिख जाती।

जगदीश राय निशा को पुरे रूम में झाड़ू लगाते हुए घूरे जा रहा था। वह निशा के चूचे और गाण्ड की एक भी खुला दृश्य खोना नहीं चाहता था।

निशा अब झाड़ू लगा कर कमरे के बीच में आ गयी। सारा कचरा हॉल के सेण्टर में इक्कत्रित किया था।

निशा ने अब अपने पापा के ऑंखों में आंखें डाल कर देखा। उसने देखा की उसके पापा उसे घूर रहे है।

और फिर निशा झुकी। पूरी झुकी।

थियेटर के परदे की तरह सरकती हुयी, छोटी सी शर्ट निशा की गांड को अपने पापा के सामने प्रदर्शित कर दिया।

और जगदीश राय दंग रह गया। जगदीश राय को वह दिख गया जिसे देखने के लिए उसने कल्पना भी नहीं की थी।

गाँड के सुन्हरे गालो के बीचो बीच , जाँघो से सुरक्षित , छिपी सुन्दर चूत उसके आँखों के सामने था।

निशा ने पेंटी भी नहीं पहनी थी।

जगदीश राय का लंड लोहे की तरह तनकर फड़फड़ा रहा था। साफ़ सुथरी चूत इतनी सुन्दर लग रही थी की जगदीश राय को उसे चूमने का दिल किया।

निशा उस्सी पोजीशन में कम से कम 2 मिनट तक झूकी रही। और फिर मुडी।

निशा: अब पापा, मेरी यह शर्ट कैसे लग रही है।।?

जगदीश राय निशा की चूत देखकर इतना गरम हो चूका था की उनकी कान लाल हो चुके थे।

जगदीश राय अपने होश में नहीं था।

निशा: बोलो पापा.

जगदीश राय: क्या .।बेटी. हाँ.। सब ठीक है.।

निशा: हाँ हाँ .क्या ठीक है.मैं पूछ रही हो. शर्ट कैसी लग रही है आपको अभी.

जगदीश राय , होश में आते हुये, निशा की ऑंखों में घूरते हुए, तेज़ी से सासे लेते हुए, हाथो से खड़े लंड को सहलाते हुये।।

जगदीश राय: बहूत सेक्सी है. बहूत बढ़िया. सुपर्ब.।तुम अप्सरा लग रही हो बेटी.मॉडल की तरह

निशा: हम्म्म.। यह हुई न बात.

ओर निशा किचन के तरफ चल दी।

निशा किचन में आते ही , किचन के टॉप पर हाथ रखकर झूक गयी और अपने आँखें बंद कर सर झुकाये खड़ी रही।

उसका दिल ज़ोरो से धड़क रहा था और पैर कांप रहे थे।

अपने पापा को चूत दिखाने में जो हिम्मत उसने जुटायी थी, वह सिर्फ वह ही जानती थी।
 
उसने कापते हाथों से गिलास लिया और खुद को सँभालने के लिए पानी पीए।

निशा के ऑंखों के सामने, चूत को घूरते हुई, पापा की दो आंखें झलक रही थी।

निशा(मन में): कहीं मैने कुछ ज्यादा तो नहीं कर दिया? नहीं तो, नहीं तो पापा तारीफ़ नहीं करते। और उन्हें तो मेरी चूत बहुत भा गायी, लगता तो ऐसे ही है। पर इस सब का अन्त कहाँ होगा? अगर पापा फ्रस्टेट हो गए तोह? शायद मैं बहुत ज्यादा सोच रही हूँ। जब पापा खुश है, मैं खुश हूं, तब तो सब ठीक है।

यह सब सोचकर निशा ड्राइंग हॉल में खाना परोसने चल दी। पर जगदीश राय वहां नहीं था।

निशा(मन में): अरे पापा कहाँ चले गए? खाना खाए बगैर. पापा।। पापा।। कहाँ हो।।?

निशा अपनी छोटी शर्ट उछालते हुयी, गांड दीखाते हुए , सीडियों से पापा के कमरे में जाने लगी।

पर जगदीश राय वहां नहीं था। और फिर निशा ने कॉमन बाथरूम बंद पाया।

निशा जैसे ही बाथरूम के दरवाज़े के पास आयी , उससे अंदर से गुर्राने की आवाज़ सुनाई देने लगी।

निशा समझ गयी, की अंदर क्या हो रहा है। उसके चेहरे पर गर्व और मुस्कान दोनों छा गयी।

जगदीश राय बाथरूम में पूरा नंगा खड़ा तेज़ी से मुठ मार रहा था। उसका लोहे जैसे लंड को ठण्डा किये बिना उससे ड्राइंग रूम में बेठना असम्भव था।

उसके आँखों के सामने से निशा की बिना बालों वाली, साफ़ गुलाबी कलर की चूत, हट नहीं रही थी।

और वह चूत के नशे में , निशा का नाम लिए जा रहा था।

जगदीश राय (हाथ चलाते हुए):आह.आह.आह।। निशा ओह निशा.।आह.

निशा, अपना नाम अपने मूठ-मारते पापा के मुह से सुनकर गरम हो चली थी। निशा देर नहीं लगाती हुई अपनी दो ऊँगली अपने चूत के पास ले गयी।

उसकी छोटी चूत इतनी गीली थी की क्लाइटोरिस रबर के बटन की तरह फुलकर बाहर निकला हुआ था।

और बाथरूम से निकलते हुये "आह निशा" के शब्दो के ताल में वह अपने चूत को कभी सहलाती तो कभी चूत के अंदर ऊँगली डालती।

थोड़ी ही देर में जगदीश राय की आवाज़े और तेज़ हुई और जोरदार होने लगी। जगदीश राय झड़ने ही वाला था।

निशा के हाथ भी बाथरूम के बाहर तेज़ी से चल रहे थे। चूत से बहता पानी जांघो से लगकर एक लकीर बना रहा था और बाथरूम के बाहर फर्श पर गिर रहा था।

निशा खड़ा नहीं हो पा रही थी और उसने दिवार से खुदो को सम्भाला। दो उँगलियाँ चूत में घूसाते वक़्त आवाज़ बना रही थी।

ओर तभी निशा का सारा बदन अकड गया और वह तेज़ी से झडने लगी। निशा इतनी ज़ोर से झडी की मुह से चीख़ निकली और वह वही फर्श पर गिर पडी।

निशा फर्श पर टाँगे मोड़ कर, सर झुकाये बाथरूम के बाहर बैठी थी। फ़र्श पर उसकी चूत का पानी गिरा पड़ा था।

शायद उसने ओर्गास्म के वक़्त थोड़ा मूत भी दिया था। वह कांप रही थी। ओर्गास्म की लहर अभी पूरी तरह ठण्डा नहीं हुआ था।

और तभी बाथरूम का दरवाज़ा खुला। जगदीश राय निशा को बाथरूम के बाहर फर्श पर बैठे देख चौक गया।

निशा ने आँख खोले जब अपने पापा के पैरो को देखा तो वह पूर तरह शर्मा गयी। उसने सर नहीं उठाया।

वह इतनी बेबस थी की मन ही मन वह अपने पापा के बाहों में खो जाना चाहती थी।

जगदीश राय फर्श पर पड़े पानी को देख कर समझ गया। उसे निशा की मासूम शर्माए चेहरे पर बहुत प्यार आया।
 
निशा ने धीरे से अपने सर को उठाया। जगदीश राय और निशा बिना कुछ कहे , एक दूसरे को देखते रहे।

ओर फिर जगदीश राय निशा के पास आए और अपना हाथ बढाया।

निशा अपने कापते हाथ जगदीश राय के हाथेली में रख दिया । और अपने कापते पैरो को सम्भाले उठ गयी।

फर्श पर पड़े चूत के पानी से उसका पूरा गांड और शर्ट का निचला हिस्सा भीग गया था।

जगदीश राय निशा के हुस्न को निहारता गया। और अपने पापा के चीरते नज़रो के सामने निशा पिघलती गयी।

निशा शर्मायी, बिना कुछ कहे, मुड कर अपने रूम की तरफ चल दी।

शर्ट का दायाँ(राइट) भाग गाण्ड से ऊपर सरका हुआ था।

जगदीश राय , निशा की चूत की पानी से भीगी हुई , मटकती नंगी गाण्ड को निहारता रहा।

लंड फिर से खड़ा होने लगा था।

जगदीश राय हॉल में जाकर डाइनिंग टेबल पर बैठ गया। उसे निशा के बाथरूम से पानी की आवाज़ साफ़ सुनाइ दे रही थी।

वह बीते हुए कुछ पलो को मन ही मन निहार रहा था। कैसे निशा ने उसे अपनी चूत दिखाई थी और कैसे निशा उसी के साथ बाथरूम के बाहर मुठ मार रही थी।
निशा की पानी से चमकती हुई उभरी हुई गांड को सोचकर वह फिर से पागल हो चला था।

वह निशा का दिवाना हो चला था यह उसे पता चल गया था।

तभी निशा के पैरो की आहट सुनाई दी।

निशा: चलो पापा खाना खा लेते है।

जगदीश राय ने निशा के चेहरे की तरफ देखा। निशा के चेहरे पर कोई शर्म या हिचकिचाहट नहीं था।

निशा के टाइट टॉप और एक बहुत ही टाइट शॉर्ट्स पहनी थी। शायद वह शॉर्ट्स सशा की थी।

शॉर्टस उसके गांड को और गोलदार बना रही थी। और शॉर्ट्स से बाहर निकलती हुई उसकी गोरी जांघे जगदीश राय को पुकार रहे थे।

जगदीश राय (लंड को हाथ से छुपाते हुए): हाँ. खा लेते है.

खाने के बीच निशा का फ़ोन बजा।

निशा: हेलो.। अरे केतकी.।क्या हाल है.अरे नहीं.। मैं ठीक हु.।ह्म्म्म. अरे वह पापा
बस से गिर पड़े.।। हैं.तो उन्हें काफी चोट आयी थी..

निशा: हाँ. तो बस उन्ही के देख भाल कर रही हु.।

और निशा अपने पिता के तरफ देखा और मुस्करायी। जगदीश राय भी थोड़ा मुस्कुराया.

निशा:. ओह अच्छा. उसने बर्थडे पार्टी देना है.।कितने बजे. ४ बजे. ठीक है मैं आउंगी.

और कुछ देर कॉलेज के यहाँ वहां के बात करने के बाद निशा ने फ़ोन काट दिया।

निशा: पापा, वह मेरी फ्रेंड बर्थडे पार्टी दे रही है.तो क्या मैं जाऊं.।।6 बजे तक आ जाऊँगी।

जगदीश राय: हाँ हाँ जाओ बेटी।

निशा: पर आप ठीक है.

जगदीश राइ: हाँ हाँ मैं तो एकदम ठीक हु. और वैसे भी अब खाने के बाद मैं तो लेट जाउँगा।

निशा: फिर ठीक है.

थोडे देर बाद जगदीश राय अपने रूम में जाके लेट गया। लेटे हुए निशा के साथ बीते पलो के खलायों में सैर कर रहा था।

करीब 3:30 बजे निशा ने सलवार और जीन्स पहने , अपने पापा के रूम का दरवाज़ा खोल दिया।

उसके हाथो में एक कटोरी थी।

निशा: पापा.तेल लायी हु.

जगदीश राय: ओह. तो मसाज करोगी.?

जगदीश राय निशा को सलवार/जीन्स में देखकर उदास हो गया। पिछले दिनों से निशा सिर्फ कम कपडो में ही अच्छी लग रही थी।

निशा: जी नही. मैं तो चली.। आज आपको मेरे बिना ही काम चलाना पड़ेगा.हे हे ।।। जहाँ चाहे मसाज कर सकते है.।समझे पापा.हे हे।

और निशा की कातील हसी से रूम गूंज उठा।

जगदीश राय, थोड़ा मुस्कुराया थोड़ा शर्माया.

निशा: मैं कल आपको मसाज कर दूँगी. ठीक है. चलो बॉय। लेट हो रही हु.

जगदीश राय निशा की बातो से बहूत गरम हो गया और सीधे अपने काम पर लग गया।

शाम को 5 बजे आशा और सशा आयी।

जगदीश राय: तुमलोग आज लेट कैसे।

आशा, आप को याद नहीं. आज थर्स डे है. मेरा बॉलीवुड डांस क्लास होता है और सशा
का जिमनास्टिक्स क्लास।

जगदीश राय: ओह अच्छा।

निशा कुछ देर बाद आयी।

निशा: सशा और आशा आए?

जगदीश राय: हाँ. ऊपर है.

जगदीश राय मुड़कर सोफे पर जा रहा था तभी।।

निशा:पापा, क्या आपने मसज किया.

जगदीश राय: वह.।।हाँ.किया.

निशा: तेल लगाकर?

जगदीश राय (नज़रे झुकाए): हाँ. तेल लगाकर।।थोडा।।

निशा: बस थोड़ा ही. .उस दिन की तरह लुंगी तो ख़राब नहीं हुई न.क्या मैं धो दू.?

जगदीश राय (झेंपते हुए): क्या.।

निशा: लुंगी और क्या।।हेहे

जगदीश राय: नहीं .सब ठीक है .।लून्गी सब ठीक है.।।

निशा (मुस्कुराते हुए): ओके ओके.
 
कुछ 1 घंटे बाद निशा खाना परोसकर सब लोग खाने लगे।

आशा: दीदी. आप पिछले 3 दिनों से कॉलेज नही गयी ना.कल का क्या प्लान है।।

निशा: हाँ. कलललल.।।नही जाऊँगी.। कल तो फ्राइडे है. वैसे भी लेक्चर्स कम है.

निशा खाते खाते सोच रही थी।

निशा(मन में): कल तोह फ्राइडे है.कल के बाद मंडे से मेरी कालेज, पापा का ओफ्फिस। और यह ४ दिन की लहर थी यही ख़तम हो जाएगी.यह उमंग जो मैंने जगाया है इसे कायम रखना बहूत ज़रूरी है. पापा के लिए. और शायद अब मेरे लिए भी.

फ्राइडे सुबह निशा जल्दी उठ गयी थी। उसने फ़टाफ़ट नाश्ता वग़ैरा बनाना शुरू कर दिया।

रात को वह ठीक से सो नहीं पाई थी। अपने पापा का प्यारा चेहरा , उनका बदन और उनका कठोर मोटा लंड उसे सोने नहीं दे रही थी। पिछले ४ दिन से जो उसे आज़ादी मिली थी , आज के बाद मिलना मुश्किल होने वाला था।

निशा (मन में):मुझे तो अपने डबल-मीनिंग वाले टेढ़े बातों को भी कण्ट्रोल करना पडेगा। ओवरस्मार्ट आशा का दिमाग तेज़ी से चलता है।

करीब 9 बजे जगदीश राय उठे। आज कल जगदीश राय सुबह बेहद खुश रहते थे। सब कुछ मानो ठीक चल रहा हो।

निशा: पापा. चाय।

जगदीश राय , निशा का सुन्दर चेहरा देखकर और भी खुश हो गया। वह अपनी मम्मी की नाइटी पहनी थी।

निशा चाय देकर, किचन के तरफ चल दी। नाइटी से साफ़ पता चल रहा था की निशा ने अंदर पेटिकोट नहीं पहना था। जगदीश राय, रोज़ की तरह निशा की गांड पर अपनी आँखे सेंकता रहा।
 
करीब 9:30 बजे, आशा और सशा आ गए और नाश्ता खाकर चल दिए।

निशा: अरे सशा, आज तुम लोग कब आओगे

सशा: दीदी, मेरी तो आज एक्स्ट्रा क्लास है स्कूल में। तो क़रीब ४ बज जाएंगे। और।।

निशा: आशा मैडम आपका क्या प्रोग्राम है.

आशा: मुझे एक सहेली के घर जाना है, कुछ नोट्स तैयार करने है.

निशा: हम्म्म.।सच बोल रही है. या.?।

आशा (झेंपते हुए): सच दीदी. झूट क्यों बोलू.।।वैसे आप क्यों पूछ रही है?.

निशा (झेंपने की बारी उसकी थी): बस यही.चलो जाओ अब तुम दोनों.।

जगदीश राय ने भी यह बात सुनी।

जगदीश राय (मन में): कहीं निशा मसाज के लिए तो नहीं पूछ रही है. शायद उसे.

1 घन्टे के बाद निशा बोली.

निशा: पापा मैं ने नाश्ता टेबल पर रख दिया है. आप खा लेना.

जगदीश राय: तुम नहीं खाओगी बेटी.

निशा: नहीं पापा. मैं पहले नहाके आती हु.। इस गर्मी में रहना मुश्किल है.।

जगदीश राय टेबल पर बैठे खा रहा था। टेबल से उसे सीडियों के ऊपर का कॉरिडोर साफ़ दिख रहा था। ऊपर से पानी का आवाज़ सुनाई दे रहा था। निशा शावर में नहा रही थी शायद।

जगदीश राय मन में निशा के नंगे जिस्म पर पानी के बूंदो की कल्पना कर रहा था। उसके फुटबॉल जैसे बड़े बड़े पानी से चमकते चूचे सोचकर उसके टेबल पर बैठना मुश्किल हुए जा रहा था।
 
Back
Top