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Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

पद्मा और जीजाजी कि गरम हरकतो ने मुझे भी काफी गरम कर दिया था,इधर दीदी भी जीजाजी कि सब हरकतो को देख रही थी तो उनका भी पूरा चेहरा लाल हो चूका था जबकि जीजाजी और पद्मा ये समझ रहे थे कि उन दोनों को कोई नही देख रहा हे इसलिए वो ये सारा तमाशा कर रहे थे।

शायद अब पद्मा भी काफी गरम हो गयी थी और उसको लगने लगा था कि जीजाजी उसे चोदे बगैर मानेगे नही तो उसने जीजाजी से धीरे से कहा कि जीजाजी अब सहन नही होगा पर ये भी हे और दीदी भी बाकि होली आप रात को मना लेना। जीजाजी ने कहा सलहज जी क्या गारंटी हे कि आप रात को मुझे होली मनाने देंगी?और रोहित का आप क्या करेंगी,तब पद्मा ने कहा कि आप रात को फिर से इनके साथ ड्रिंक करने बेठ जाना और इनको इतनी पिला देना कि इन्हे सुबह तक होश नही आये तब में आपके साथ अभी का अधूरा काम पूरा कर दूंगी,पर उन दोनों को ये पता नही था कि दीदी और में उनकी ये बात सुन रहे हे।

दीदी ने मेरे पास आकर कहा कि कि रोहित मुझे पता नही था कि तेरे जीजाजी पद्मा के साथ ऐसी होली खेलेंगे ,मेने कहा दीदी कोई बात नही,कभी कभी सब बहक जाते हे ,मेरी समझ में ये तो आ गया था कि पद्मा के मन में भी आज जीजाजी से चुदाई का मन हे,पर न जाने क्यू में भी ये सोच रहा था कि आज जीजाजी और पद्मा कि चुदाई देखु।

हुआ रात को वो ही जीजाजी ने मुझसे कहा कि साले साहब थोड़ी ड्रिंक हो जाये,,मेने सहमति से अपना सर हिला दिया और हम ड्रिंक करने बेठ गए,दीदी कमरे में सोने चली गयी और हम अपने रूम में आकर ड्रिंक करने लगे ,पद्मा ने नमकीन वगेरा रख दी और हम पेग पर पेग बनाते चले गए,में देख रहा था कि जीजाजी अपना पेग तो छोटा बना रहे थे पर मेरा पेग लार्ज बना रहे थे ,में भी उन दोनों कि चुदाई देखना चाहता था इसलिए उनकी नजरे बचाकर कभी कभी पेग को फेला भी देता था।

हम दोनों दारू पीते पीते बातें करने लगे ! पीते पीते रात के १०.३० बज गए ! पद्मा भी अब सो चुकी थी या कहे की सोने का नाटक कर रही थी ! मैंने इस तरह से नशा चड़ने की एक्टिंग की जीजाजी को लगा अब में जरुर सो जाऊंगा , और मैंने किया भी ऐसे ही में वही जहाँ नीचे बिस्तर लगा हुआ था वही लेट गया , अब जीजाजी उठे और पद्मा को जगाने लगा !

"भाभी देखो रोहित भाई तो यही लुड़क गए ! "

"ओह हो ये भी ना इनको भी ज्यादा नहीं झिलती अब ये तो सुबह ही उठेंगे "

मुझे पता था की वो दोनों जानबूझ कर ऐसी बातें कर रहे है ! पद्मा ने वहां से सारा सामान उठाया और किचन में रखने चली गयी जीजाजी वही मेरे पास लेट गए

"आप ऊपर सो जाए में यहाँ इनके पास नीचे लेट जाती हूँ , आप को नीचे नींद नहीं आएगी " पद्मा ने जीजाजी को कहा !

"नहीं भाभी आप भाई को ऊपर बेड पर लेटा दो और आप भी ऊपर सो जाओ में यहाँ आराम से सो जाऊंगा "

पद्मा ने मुझे उठाने की कोशिश की पर में भी तो पक्का खिलाडी था ! में भी इस तरह से बेसुध पड़ा रहा की उन दोनों को यकीं हो जाए की में सच में नशे में सो गया हूँ

"क्या भाई ऐसे ही नशे में ऐसे ही सो जाते है क्या भाभी"

"हा ज्यादा पी लेते है तो ऐसे ही हो जाते है अब ये सुबह ही उठेंगे और फिर सर पकड़ कर बैठ जाएँगे "

"मतलब अब नहीं उठेंगे "

"हा जी अब नहीं उठेंगे "

"पक्का है ना "

"हा हा पक्का है "

"

में समझ गया अब काम शुरू होने वाला है , पर मुझे डर भी था की कही इन दोनों में मुझे इनको कुछ करते देख लिया तो पद्मा का क्या रिअक्शन होगा ! तो मुझे बड़ी सावधानी से सब कुछ देखना होगा !

"चलो अब रात बहुत हो गयी है मुझे नींद आ रही है , आप भी सो जाएँ " पद्मा उठी और उसने टी वी और लाईट दोनों बंद कर दी !

धत तेरे की ये क्या ये लाईट बंद हो गयी अब क्या कद्दू दिखेगा मुझे, हो गया सारे प्लान का गुड़ गोबर !

जीजाजी मेरे बगल में आकर लेट गए और पद्मा ऊपर बेड पर ! काफी देर तक वो दोनों ऐसे ही पड़े रहे में भी ये सोच रहा था क्या हुआ क्या आज इन का मन नहीं हो रहा !

अब लेटे लेटे मुझे सही में नींद आने लगी थी ! तभी अचानक पद्मा उठी और किचन में फ्रीज़ में पानी पीने की लिए उसने लाईट जलाई मैंने चुपचाप देखा तो जीजाजी भी उठे हुआ थे और पद्मा को ही देख रहा था !

"क्या बात है भाभी नींद नहीं आ रही है " उसने धीरे से कहा!

"आ तो रही है पर प्यास भी तो लग रही है ना , बिना प्यास मिटाए नींद कहा से आएगी" पद्मा ने भी धीरे से जवाब दिया

बस अब की बार लाईट बंद ना हो में ऐसा भगवान् से प्राथना कर रहा था

"प्यास तो मुझे भी लगी है "

"तो बुझाते क्यों नहीं "

ऐसा सुन कर जीजाजी खड़े हुए और किचन की तरफ चले गए वहां उन्होंने भी पानी पिया और फिर मेरे पास आकर मुझे हिलाते हुए मुझसे पानी के लिए पूछा ! पर में कहाँ उठाने वाला था जब उसे तस्सली हो गयी की में अब नहीं उठूँगा तो वो फिर से किचन में गया जहाँ पद्मा खड़ी थी

उसने पद्मा के कान में कुछ कहा तो पद्मा मुस्कुरा दी , उसके बाद पद्मा ने लाईट बंद कर दी और वापस बिस्तर पर लेट गयी !जीजाजी मेरे पास दुबारा आ गए , में सोच रहा था ये हो क्या रहा है !

थोड़ी देर हुई होगी की जीजाजी चुपके से उठे और सीधा बिस्तर पर चढ़ गए ! अँधेरा होने की वज़ह से मुझे साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा था पर उन दोनों की फुसफुसाहट थोड़ी थोड़ी सुनाई दे रही थी !

"आप यहाँ क्या कर रहे हो " पद्मा ने अचानक उन्हें देख कर कहा

"भाभी अब तो नाराज़ ना हो दिन में में कुछ ज्यादा ही मस्त हो गया था इसलिए "

"तो अब क्या इरादा है"

"अब तो सारी रात ही हमारी है "

"अच्छा दिन में तो इतनी जल्दी हो गए अब रात भर क्या मुझे लोरी सुनाओगे"

"ये देखो ना क्या हाल है मेरा "

"अरे बाप रे ये क्या है"

" भाभी देखो ना कैसे तड़प रहा है "

"तो में क्या कर सकती हूँ इसका "

"आप कुछ मत करो जो करूँगा में करूँगा "

"देखते है "

"ये क्या ...? नहीं अभी कपडे मत उतारो "

"तो भाभी मज़ा कैसे आएगा "

"ऐसे ही करना है वो कर लो "

जीजाजी उसके कपडे उतारने की कोशिश कर रहे होंगे और पद्मा उसे मना कर रही होगी ! अब तो मेरा तन कर आधा इंच और लम्बा हो गया था !

"बस नीचे की स्कर्ट उतारने दो ना भाभी "

"नही , अरे .....नहीईइ ना ओह्ह हो आप मानोगे नहीं .....कही रोहित उठ गया तो "

"अब वो नहीं उठता "

"चलो नीचे उतारो मत बस ऊपर कर लो "

"नहीं ना भाभी मज़ा तो नंगे बदन ही आता है "

"प्लीस्स्स्स ....नहीई आप नहीं मानोगे ना ......ओह्ह्ह हो ....मत करो !!!!!!

"अब आएगा ना मज़ा" जीजाजी ने जितने वाली आवाज़ में कहा

मतलब स्कर्ट उतार चूका था !
 
"अब इसे मत उअतारो ना !!!!!!!! ऊपर कर लो !

"बस हो गया भाभी ...अब देखो मज़े !!!!!

"कुछ तो रहने दो शरीर पर "

"बस बस देखो ....अहह क्या मज़ेदार बदन है तुम्हारा भाभी"

"मतलब आप नहीं मानने वाले ना पुरे उतार ही दिए ना"

"अब बताओ भाभी क्या मज़ा नहीं आ रहा तुम्हे "

"क्यों नहीं आएगा , अपने ही पति के साथ दुसरे मर्द से मज़े ले रही हूँ तो मज़ा तो आएगा ही "

"अह्ह्ह ह्ह्ह्हाआ नहीईइ कितना बड़ा है ये .....आराम से डालो ना "

"बस बस आह्हा पूरा गया ना भाभी .....कैसा है मज़ेदार है ना"

"ओह्ह्ह्ह अहह्ह्ह्हा ईईइ क्या सीधा है ओह्ह उह्ह्ह्ह "

"कैसे मज़े आते है जोर से या धीरे से "

"तेज़ करो और तेज़ .....ओह्ह्हह्ह्ह्ह ईईईईइ मर गयीईई अह़ा आःह्हा उह्ह्हह्ह क्या शानदार है "

उन दोनों की चुदाई शुरू हो चुकी थी पर मुझे कुछ नहीं दिख रहा था बस आवाजें आ रही थी मैंने अपना लंड निकल लिया और लगा मुठ मारने

सच में आज मुठ का मज़ा ही अलग था ,

बिस्तर पर धप धप की आवाजें तेज़ होती जा रही थी , मैंने थोडा सा उठकर ऊपर देखने की कोशिश की तो थोडा सा अँधेरे में दिखा की पद्मा दोनों टंगे फैलाए लेटी हुए है औरजीजाजी उसके ऊपर चढ़े हुआ धकाधक उसे चोदे जा रहे है !उनके झटको की स्पीड बदती ही जा रही थी पद्मा में मुह से मादक आवाजें निकले जा रही थी ! माहोल बहुत ही गरम हो चला था !

"अह्ह्ह बताओ ना भाभी किस है मेरा लंड "

"आःह्ह्हा मज़ा आ गया ईई उह्ह्हह्ह क्या शानदार झटके है तुम्हारे उघ्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्ह मर गयीई आज तो !!!!!!!!!!!!!

"

" ''''' आह्ह्ह उह्ह्ह्ह फाड़ डाला आज तो मर गयीईई आज तो

"आहा भाभी आःह्ह्हा आह्ह्ह में होने वाला हूँ भाभी अह्ह्ह " बताओ कहा डालू

"आःह्हा अन्दर ही रहने दो सस अहह उह्ह्ह बाहर मत निकालना ऊउह्ह्ह आईई "

"में हुआ हुआ !!!! आःह्हा आह्ह्ह "

"आहा आआह्ह्ह कितना गरम है आःह्ह्ह उह्ह्ह्ह ईईईई "

जीजाजी के धक्के बंद हो गए अब उन दोनों की सांसे चल रही थी कुछ देर तक तो दोनों ऐसे ही पड़े रहे जीजाजी ने अपना सारा माल पद्मा की चुत में ही डाल दिया था !

"अब उठो मुझे बाथरूम जाने दो हटो मेरे ऊपर से "

पद्मा उठ कर बत्रुम की तरफ गयी में दुबारा वैसे लेट गया पद्मा ने बाथरूम की लाईट जलाई और मेरी तरफ देखा निश्चिन्त होकर वो अन्दर चली गयी उस वक़्त वो पूरी नंगी थी जीजाजी भी उसके पीछे पीछे बाथरूम में चला गए वो भी पूरा नंगा थे उनका लोडा अब भी थोडा ताना हुआ था उसने जाते ही बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर दिया ! में उठ कर दरवाज़े के पास आ गया और कान लगा कर सुनने लगा पर अन्दर से शावर की आवाज़ आ रही थी ! थोड़ी देर में बड़े जोर से पानी में भीगने और पट पट की आवाजें शुरू हो गयी ! और साथ साथ पद्मा की आहे भी सुनाई दे रही थी ! मतलब जीजाजी अब उसे शावर के नीचे ही चोदने लगा था ! बड़ी मस्त आवाजें थी ! में अंदाज़ा लगा रहा था की किस तरह पद्मा खड़ी होगी जरुर जीजाजी उसे एक टांग उठा कर पीछे की तरफ से उसकी चुत चोद रहा होगा ! करीब २० मिनट तक वो आवाजें लगातार आती रही ! फिर कुछ देर में सब शांत हो गया शावर बंद हो गया और फिर में अपनी जगह पर आ गया !

पर मेरा मन अब नही लग रहा था मेने सोचा दीदी के कमरे में चलकर देखु कि दीदी क्या कर रही हे

 
होली पर बीबी चुदी दीदी चुदी--2

दोस्तों सुबह कि एक बात में आपको कहना चाहूंगा,जीजाजी और पद्मा जब होली के मजे ले रहे थे और मेने दीदी कि आँखों में वासना के लाल डोरे देख लिए थे तब दीदी नहाने के लिए बाथ रूम में चली गयी थी तब मेने दीदी को नहाते देखने कि सोची। दीदी के साथ रहते हुए मैंने इस बात को महसूस किया की मेरी दीदी वाकई बहुत ही खूबसूरत औरत है. ऐसा नहीं था की दीदी शादी के पहले खूबसूरत नहीं थी. दीदी एकदम गोरी चिट्टी और तीखे नाक-नक्शे वाली थी. पर दीदी और मेरे उम्र के बीच फर्क था, इसलिए जब दीदी कुंवारी थी तो मेरी उतनी समझदारी ही नहीं थी की मैं उनकी सुन्दरता को समझ पाता या फिर उसका आकलन कर पाता. फिर शादी के बाद दीदी अलग रहने लगी थी. अब जब मैं जवान और समझदार हो गया था तो मुझे अपनी दीदी को काफी नजदीक से देखने का अवसर मिल रहा था और यह अहसास हो रहा था की वाकई मेरी बहन लाखो में एक हैं. शादी के बाद से उसका बदन थोड़ा मोटा हो गया था. मतलब उसमे भराव आ गया था. पहले वो दुबली पतली थी मगर अब उसका बदन गदरा गया था. शायद ये उम्र का भी असर था . उसके गोरे सुडौल बदन में गजब का भराव और लोच था. चलने का अंदाज बेहद आकर्षक और क्या कह सकते है कोई शब्द नहीं मिल रहा शायद सेक्सी था. कभी चुस्त सलवार कमीज़ तो कभी साडी ब्लाउज जो भी वो पहनती थी उसका बदन उसमे और भी ज्यादा निखर जाता था . चुस्त सलवार कुर्ती में तो हद से ज्यादा सेक्सी दिखती. दीदी जब वो पहनती थी उस समय सबसे ज्यादा आकर्षण उसकी टांगो में होता था . सलवार उसके पैरो से एकदम चिपकी हुई होती थी. जैसा की आप सभी जानते है ज्यादातर अपने यहाँ जो भी चुस्त सलवार बनती है वो झीने सूती कपड़ो की होती है. इसलिए दीदी की सलवार भी झीने सूती कपड़े की बनी होती थी और वो उसके टांगो से एकदम चिपकी हुई होती. कमीज़ थोरी लम्बी होती थी मगर ठीक कमर के पास आकर उसमे जो कट होता था असल में वही जानलेवा होता था. कमीज़ का कट चलते समय जब इधर से उधर होता तो चुस्त सलवार में कसी हुई मांसल जांघे और चुत्तर दिख जाते थे. दीदी की जांघे एकदम ठोस, गदराई और मोटी कन्दली के खंभे जैसी थी फिर उसी अनुपात में चुत्तर भी थे. एकदम मोटे मोटे , गोल-मटोल गदराये, मांसल और गद्देदार जो चलने पर हिलते थे. सीढियों पर चढ़ते समय कई बार मुझे कविता दीदी के पीछे चलने का अवसर प्राप्त हुआ था. सीढियाँ चढ़ते समय जब साडी या सलवार कमीज में कसे हुए उनके चुत्तर हिलते थे, तो पता नहीं क्यों मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती थी. इसका कारण शायद ये था की मुझे उम्र में अपने से बड़ी और भरे बदन वाली लड़कियोँ या औरते ज्यादा अच्छी लगती थी. सीढियों पर चढ़ते समय जब दीदी के तरबूजे के जैसे चुत्तर के दोनों फांक जब हिलते तो पता नहीं मेरे अन्दर कुछ हो जाता था. मेरी नज़रे अपने आप पर काबू नहीं रख पाती और मैं उन्हें चोर नजरो से देखने की कोशिश करता. पीछे से देखते समय मेरा सामना चूँकि दीदी से नहीं होता था इसलिए शायद मैं उनको एक भरपूर जवान औरत के रूप में देखने लगता था और अपने आप को उनके हिलते हुए चूत्तरों को देखने से नहीं रोक पाता था. अपनी ही दीदी के चुत्तरों को देखने के कारण मैं अपराधबोध से ग्रस्त हो शर्मिंदगी महसूस करता था. कई बार वो चुस्त सलवार पर शोर्ट कुर्ती यानि की छोटी जांघो तक की कुर्ती भी पहन लेती थी. उस दिन मैं उनसे नज़रे नहीं मिला पाता था. मेरी नज़रे जांघो से ऊपर उठ ही नहीं पाती थी. शोर्ट कुर्ती से झांकते चुस्त सलवार में कसे मोटे मोटे गदराये जांघ भला किसे अच्छे नहीं लगेंगे भले ही वो आपकी बहन के हो. पर इसके कारण आत्मग्लानी भी होती थी और मैं उनसे आंखे नहीं मिला पाता था.

दीदी की चुत्तर और जांघो में जो मांसलता आई थी वही उनकी चुचियों में भी देखने को मिलती थी. उनके मोटे चुत्तर और गांड के अनुपात में ही उनकी चुचियाँ भी थी. चुचियों के बारे में यही कह सकते है की इतने बड़े हो की आपकी हथेली में नहीं समाये पर इतने ज्यादा बड़े भी न हो की दो हाथो की हथेलियों से भी बाहर निकल जाये. कुल मिला कर ये कहे तो शरीर के अनुपात में हो. कुछ १८-१९ साल की लड़कीयों जो की देखने में खूबसूरत तो होंगी मगर उनकी चुचियाँ निम्बू या संतरे के आकार की होती है. जवान लड़कियोँ की चुचियों का आकार कम से कम बेल या नारियल के फल जितना तो होना ही चाहिए. निम्बू तो चौदह-पंद्रह साल की छोकरियों पर अच्छा लगता है. कई बार ध्यान से देखने पर पता चल पाता है की पुशअप ब्रा पहन कर फुला कर घूम रही है. इसी तरह कुछ की ऐसी ढीली और इतनी बड़ी-बड़ी होगी की देख कर मूड ख़राब हो जायेगा. लोगो का मुझे नहीं पता मगर मुझे तो एक साइज़ में ढली चूचियां ही अच्छी लगती है. शारीरिक अनुपात में ढली में हुई, ताकि ऐसा न लगे की पुरे बदन से भारी तो चूचियां है या फिर चूची की जगह पर सपाट छाती लिए घूम रही हो. सुन्दर मुखड़ा और नुकीली चुचियाँ ही लड़कियों को माल बनाती है.
 


एकदम तीर की तरह नुकीली चुचिया थी दीदी की. भरी-भरी, भारी और गुदाज़. गोल और गदराई हुई. साधारण सलवार कुर्ती में भी गजब की लगती थी. बिना चुन्नी के उनकी चूचियां ऐसे लगती जैसे किसी बड़े नारियल को दो भागो में काट कर उलट कर उनकी छाती से चिपका दिया गया है. घर में दीदी ज्यादातर साड़ी या सलवार कमीज़ में रहती थी . गर्मियों में वो आम तौर पर साड़ी पहनती थी . शायद इसका सबसे बड़ा कारण ये था की वो घर में अपनी साड़ी उतार कर, केवल पेटीकोट ब्लाउज में घूम सकती थी. ये एक तरह से उसके लिए नाईटी या फिर मैक्सी का काम करता था. अगर कही जाना होता था तो वो झट से एक पतली सूती साड़ी लपेट लेती थी. मेरी मौजूदगी से भी उसे कोई अंतर नहीं पड़ता था, केवल अपनी छाती पर एक पतली चुन्नी डाल लेती थी. पेटीकोट और ब्लाउज में रहने से उसे शायद गर्मी कम लगती थी. मेरी समझ से इसका कारण ये हो सकता है की नाईटी पहनने पर भी उसे नाईटी के अन्दर एक स्लिप और पेटीकोट तो पहनना ही पड़ता था, और अगर वो ऐसा नहीं करती तो उसकी ब्रा और पैन्टी दिखने लगते, जो की मेरी मौजूदगी के कारण वो नहीं चाहती थी. जबकि पेटीकोट जो की आम तौर पर मोटे सूती कपड़े का बना होता है एकदम ढीला ढाला और हवादार. कई बार रसोई में या बाथरूम में काम समय मैंने देखा था की वो अपने पेटीकोट को उठा कर कमर में खोस लेती थी जिससे घुटने तक उसकी गोरी गोरी टांगे नंगी हो जाती थी. दीदी की पिंडलियाँ भी मांसल और चिकनी थी. वो हमेशा एक पतला सा पायल पहने रहती थी. मैं दीदी को इन्ही वस्त्रो में देखता रहता था मगर फिर भी उनके साथ एक सम्मान और इज्ज़त भरे रिश्ते की सीमाओं को लांघने के बारे में नहीं सोचता था. वो भी मुझे एक मासूम सा लड़का समझती थी और भले ही किसी भी अवस्था या कपड़े में हो , मेरे सामने आने में नहीं हिचकिचाती थी.

खेर दीदी जिस बाथरूम में गयी थी उसमे लैट्रीन और बाथरूम दोनों को सेपरेट कर दिया गया. इसके लिए बाथरूम के बीच में लकड़ी के पट्टो की सहायता से एक दिवार बना दी गई. ईट की दीवार बनाने में एक तो खर्च बहुत आता दूसरा वो ज्यादा जगह भी लेता, लकड़ी की दीवार इस बाथरूम के लिए एक दम सही थी. लैट्रीन के लिए एक अलग दरवाजा बना दिया गया.

दीदी बाथ रूम में थी और में लेट्रीन में घुस गया ताकि दीदी को नहाते देख सकू .. दीदी शायद कोई गीत गुनगुना रही थी. लैट्रीन में उसकी आवाज़ स्पष्ट आ रही थी.

बहुत आराम से उठ कर लकड़ी के पट्टो पर कान लगा कर ध्यान से सुन ने लगा. केवल चुड़ियो के खन-खनाने और गुन-गुनाने की आवाज़ सुनाई दे रही थी. फिर नल के खुलने पानी गिरने की आवाज़ सुनाई दी. मेरे अन्दर के शैतान ने मुझे एक आवाज़ दी, लकड़ी के पट्टो को ध्यान से देख. मैंने अपने अन्दर के शैतान की आवाज़ को अनसुना करने की कोशिश की, मगर शैतान हावी हो गया था. दीदी जैसी एक खूबसूरत औरत लकड़ी के पट्टो के उस पार नहाने जा रही थी. मेरा गला सुख गया और मेरे पैर कांपने लगे. अचानक ही पजामा एकदम से आगे की ओर उभर गया. दिमाग का काम अब लण्ड कर रहा था. मेरी आँखें लकड़ी के पट्टो के बीच ऊपर से निचे की तरफ घुमने लगी और अचानक मेरी मन की मुराद जैसे पूरी हो गई. लकड़ी के दो पट्टो के बीच थोड़ा सा गैप रह गया था. सबसे पहले तो मैंने धीरे से हाथ बढा का बाथरूम स्विच ऑफ किया फिर लकड़ी के पट्टो के गैप पर अपनी ऑंखें जमा दी.

दीदी की पीठ लकड़ी की दिवार की तरफ थी. वो सफ़ेद पेटिको़ट और काले ब्लाउज में नल के सामने खड़ी थी. नल खोल कर अपने कंधो पर रखे तौलिये को अपना एक हाथ बढा कर नल की बगल वाली खूंटी पर टांग दिया. फिर अपने हाथों को पीछे ले जा कर अपने खुले रेशमी बालो को समेट कर जुड़ा बना दिया. बाथरूम के कोने में बने रैक से एक क्रीम की बोतल उठा कर उसमे से क्रीम निकाल-निकाल कर अपने चेहरे के आगे हाथ घुमाने लगी. पीछे से मुझे उनका चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था मगर ऐसा लग रहा था की वो क्रीम निकाल कर अपने चेहरे पर ही लगा रही है. लकड़ी के पट्टो के गैप से मुझे उनके सर से चुत्तरों के थोड़ा निचे तक का भाग दिखाई पड़ रहा था. क्रीम लगाने के बाद अपने पेटिको़ट को घुटनों के पास से पकर कर थोड़ा सा ऊपर उठाया और फिर थोड़ा तिरछा हो कर निचे बैठ गई. इस समय मुझे केवल उनका पीठ और सर नज़र आ रहा थे. पर अचानक से सिटी जैसी आवाज़ जो की औरतो के पेशाब करने की एक विशिष्ट पहचान है वो सुनाई दी. दीदी इस समय शायद वही बाथरूम के कोने में पेशाब कर रही थी. मेरे बदन में सिहरन दौर गई. मैं कुछ देख तो सकता नहीं था मगर मेरे दिमाग ने बहुत सारी कल्पनाये कर डाली. पेशाब करने की आवाज़ सुन कर लण्ड ने झटका खाया. मगर अफ़सोस कुछ देख नहीं सकता था.

फिर थोड़ी देर में वो उठ कर खड़ी हो गई और अपने हाथो को कुहनी के पास से मोर कर अपनी छाती के पास कुछ करने लगी. मुझे लगा जैसे वो अपना ब्लाउज खोल रही है. मैं दम साधे ये सब देख रहा था. मेरा लण्ड इतने में ही एक दम खड़ा हो चूका था. दीदी ने अपना ब्लाउज खोल कर अपने कंधो से धीरे से निचे की तरफ सरकाते हुए उतार दिया. उनकी गोरी चिकनी पीठ मेरी आँखों के सामने थी. पीठ पर कंधो से ठीक थोड़ा सा निचे एक काले रंग का तिल था और उससे थोड़ा निचे उनकी काली ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ था. इतनी सुन्दर पीठ मैंने शायद केवल फ़िल्मी हेरोइनो की वो भी फिल्मो में ही देखी थी. वैसे तो मैंने दीदी की पीठ कई बार देखि थी मगर ये आज पहली बार था जब उनकी पूरी पीठ नंगी मेरी सामने थी, केवल एक ब्रा का स्ट्रैप बंधा हुआ था. गोरी पीठ पर काली ब्रा का स्ट्रैप एक कंट्रास्ट पैदा कर रहा था और पीठ को और भी ज्यादा सुन्दर बना रहा था. मैंने सोचा की शायद दीदी अब अपनी ब्रा खोलेंगी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया. अपने दोनों हाथो को बारी-बारी से उठा कर वो अपनी कांख को देखने लगी. एक हाथ को उठा कर दुसरे हाथ से अपनी कांख को छू कर शायद अपने कांख के बालो की लम्बाई का अंदाज लगा रही थी. फिर वो थोड़ा सा घूम गई सामने लगे आईने में अपने आप को देखने लगी. अब दीदी का मुंह बाथरूम में रखे रैक और उसकी बगल में लगे आईने की तरफ था. मैंने सोच रहा था काश वो पूरा मेरी तरफ घूम जाती मगर ऐसा नहीं हुआ. उनकी दाहिनी साइड मुझे पूरी तरह से नज़र आ रही थी. उनका दाहिना हाथ और पैर जो की पेटिको़ट के अन्दर था पेट और ब्रा में कैद एक चूची, उनका चेहरा भी अब चूँकि साइड से नज़र आ रहा था इसलिए मैंने देखा की मेरा सोचना ठीक था और उन्होंने एक पीले रंग का फेसमास्क लगाया हुआ था. अपने सुन्दर मुखरे को और ज्यादा चमकाने के लिए. अब दीदी ने रैक से एक दूसरी क्रीम की बोतल अपने बाएं हाथ से उतार ली और उसमे से बहुत सारा क्रीम अपनी बाई हथेली में लेकर अपने दाहिने हाथ को ऊपर उठा दिया. दीदी की नंगी गोरी मांसल बांह अपने आप में उत्तेजना का शबब थी और अब तो हाथ ऊपर उठ जाने के कारण दीदी की कांख दिखाई दे रही थी. कांख के साथ दीदी की ब्रा में कैद दाहिनी चूची भी दिख रही थी. ब्रा चुकी नोर्मल सा था इसलिए उसने पूरी चूची को अपने अन्दर कैद किया हुआ था इसलिए मुझे कुछ खास नहीं दिखा, मगर उनकी कांख कर पूरा नज़ारा मुझे मिल रहा था. दीदी की कांख में काले-काले बालों का गुच्छा सा उगा हुआ था. शायद दीदी ने काफी दिनों से अपने कांख के बाल नहीं बनाये थे. वैसे तो मुझे औरतो के चिकने कांख ही अच्छे लगते है पर आज पाता नहीं क्या बात थी मुझे दीदी के बालों वाले कांख भी बहुत सेक्सी लग रहे थे. मैं सोच रहा था इतने सारे बाल होने के कारण दीदी की कांख में बहुत सारा पसीना आता होगा और उसकी गंध भी उन्ही बालों में कैद हो कर रह जाती होगी. दीदी के पसीने से भीगे बदन को कई बार मैंने रसोई में देखा था. उस समय उनके बदन से आती गंध बहुत कामोउत्तेजक होती थी और मुझे हवा तैरते उसके बदन के गंध को सूंघना बहुत अच्छा लगता था. ये सब सोचते सोचते मेरा मन किया की काश मैं उसकी कांख में एक बार अपने मुंह को ले जा पाता और अपनी जीभ से एक बार उसको चाटता. मैंने अपने लण्ड पर हाथ फेरा तो देखा की सुपाड़े पर हल्का सा गीलापन आ गया है. तभी दीदी ने अपने बाएं हाथ की क्रीम को अपनी दाहिने हाथ की कांख में लगा दिया और फिर अपने वैसे ही अपनी बाई कांख में भी दाहिने हाथ से क्रीम लगा दिया. शायद दीदी को अपने कान्खो में बाल पसंद नहीं थे.

कान्खो में हेयर रिमूविंग क्रीम लगा लेने के बाद दीदी फिर से नल की तरफ घूम गई और अपने हाथ को पीछे ले जाकर अपनी ब्रा का स्ट्रैप खोल दिया और अपने कंधो से सरका कर बहार निकाल फर्श पर दाल दिया और जल्दी से निचे बैठ गई. अब मुझे केवल उनका सर और थोड़ा सा गर्दन के निचे का भाग नज़र आ रहा था. अपनी किस्मत पर बहुत गुस्सा आया. काश दीदी सामने घूम कर ब्रा खोलती या फिर जब वो साइड से घूमी हुई थी तभी अपनी ब्रा खोल देती मगर ऐसा नहीं हुआ था और अब वो निचे बैठ कर शायद अपनी ब्लाउज और ब्रा और दुसरे कपड़े साफ़ कर रही थी. मैंने पहले सोचा की निकल जाना चाहिए, मगर फिर सोचा की नहाएगी तो खड़ी तो होगी ही, ऐसे कैसे नहा लेगी. इसलिए चुप-चाप यही लैट्रिन में ही रहने में भलाई है. मेरा धैर्य रंग लाया थोड़ी देर बाद दीदी उठ कर खड़ी हो गई और उसने पेटीकोट को घुटनों के पास से पकड़ कर जांघो तक ऊपर उठा दिया. मेरा कलेजा एक दम धक् से रह गया. दीदी ने अपना पेटिकोट पीछे से पूरा ऊपर उठा दिया था. इस समय उनकी जांघे पीछे से पूरी तरह से नंगी हो गई थी. मुझे औरतो और लड़कियों की जांघे सबसे ज्यादा पसंद आती है. मोटी और गदराई जांघे जो की शारीरिक अनुपात में हो, ऐसी जांघे. पेटीकोट के उठते ही मेरे सामने ठीक वैसी ही जांघे थी जिनकी कल्पना कर मैं मुठ मारा करता था. एकदम चिकनी और मांसल. जिन पर हलके हलके दांत गरा कर काटते हुए जीभ से चाटा जाये तो ऐसा अनोखा मजा आएगा की बयान नहीं किया जा सकता. दीदी की जांघे मांसल होने के साथ सख्त और गठी हुई थी उनमे कही से भी थुलथुलापन नहीं था. इस समय दीदी की जांघे केले के पेड़ के चिकने तने की समान दिख रही थी. मैंने सोचा की जब हम केले पेड़ के तने को अगर काटते है या फिर उसमे कुछ घुसाते है तो एक प्रकार का रंगहीन तरल पदार्थ निकलता है शायद दीदी के जांघो को चूसने और चाटने पर भी वैसा ही रस निकलेगा. मेरे मुंह में पानी आ गया. लण्ड के सुपाड़े पर भी पानी आ गया था. सुपाड़े को लकड़ी के पट्टे पर हल्का सा सटा कर उस पानी को पोछ दिया और पैंटी में कसी हुई दीदी के चुत्तरों को ध्यान से देखने लगा. दीदी का हाथ इस समय अपनी कमर के पास था और उन्होंने अपने अंगूठे को पैंटी के इलास्टिक में फसा रखा था. मैं दम साधे इस बात का इन्तेज़ार कर रहा था की कब दीदी अपनी पैंटी को निचे की तरफ सरकाती है. पेटीकोट कमर के पास जहा से पैंटी की इलास्टिक शुरू होती है वही पर हाथो के सहारे रुका हुआ था. दीदी ने अपनी पैंटी को निचे सरकाना शुरू किया और उसी के साथ ही पेटीकोट भी निचे की तरफ सरकता चला गया. ये सब इतनी तेजी से हुआ की दीदी के चुत्तर देखने की हसरत दिल में ही रह गई. दीदी ने अपनी पैंटी निचे सरकाई और उसी साथ पेटीकोट भी निचे आ कर उनके चुत्तरों और जांघो को ढकता चला गया. अपनी पैंटी उतार उसको ध्यान से देखने लगी पता नहीं क्या देख रही थी. छोटी सी पैंटी थी, पता नहीं कैसे उसमे दीदी के इतने बड़े चुत्तर समाते है. मगर शायद यह प्रश्न करने का हक मुझे नहीं था क्यों की अभी एक क्षण पहले मेरी आँखों के सामने ये छोटी सी पैंटी दीदी के विशाल और मांसल चुत्तरों पर अटकी हुई थी. कुछ देर तक उसको देखने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपनी पैंटी साफ़ करने लगी. फिर थोड़ी देर बाद ऊपर उठी और अपने पेटीकोट के नाड़े को खोल दिया. मैंने दिल थाम कर इस नज़ारे का इन्तेज़ार कर रहा था. कब दीदी अपने पेटीकोट को खोलेंगी और अब वो क्षण आ गया था. लौड़े को एक झटका लगा और दीदी के पेटीकोट खोलने का स्वागत एक बार ऊपर-निचे होकर किया. मैंने लण्ड को अपने हाथ से पकर दिलासा दिया. नाड़ा खोल दीदी ने आराम से अपने पेटीकोट को निचे की तरफ धकेला पेटीकोट सरकता हुआ धीरे-धीरे पहले उसके तरबूजे जैसे चुत्तरो से निचे उतरा फिर जांघो और पैर से सरक निचे गिर गया. दीदी वैसे ही खड़ी रही. इस क्षण मुझे लग रहा था जैसे मेरा लण्ड पानी फेंक देगा. मुझे समझ में नहीं आ रहा था मैं क्या करू. मैंने आज तक जितनी भी फिल्में और तस्वीरे देखी थी नंगी लड़कियों की वो सब उस क्षण में मेरी नजरो के सामने गुजर गई और मुझे यह अहसास दिला गई की मैंने आज तक ऐसा नज़ारा कभी नहीं देखा. वो तस्वीरें वो लड़कियाँ सब बेकार थी. उफ़ दीदी पूरी तरह से नंगी हो गई थी. हालाँकि मुझे केवल उनके पिछले भाग का नज़ारा मिल रहा था, फिर भी मेरी हालत ख़राब करने के लिए इतना ही काफी था. गोरी चिकनी पीठ जिस पर हाथ डालो तो सीधा फिसल का चुत्तर पर ही रुकेंगी. पीठ के ऊपर काला तिल, दिल कर रहा था आगे बढ़ कर उसे चूम लू. रीढ़ की हड्डियों की लाइन पर अपने तपते होंठ रख कर चूमता चला जाऊ. पीठ पीठ इतनी चिकनी और दूध की धुली लग रही थी की नज़र टिकाना भी मुश्किल लग रहा था. तभी तो मेरी नज़र फिसलती हुई दीदी के चुत्तरो पर आ कर टिक गई. ओह, मैंने आज तक ऐसा नहीं देखा था. गोरी चिकनी चुत्तर. गुदाज और मांसल. मांसल चुत्तरों के मांस को हाथ में पकर दबाने के लिए मेरे हाथ मचलने लगे. दीदी के चुत्तर एकदम गोरे और काफी विशाल थे. उनके शारीरिक अनुपात में, पतली कमर के ठीक निचे मोटे मांसल चुत्तर थे. उन दो मोटे मोटे चुत्तरों के बीच ऊपर से निचे तक एक मोटी लकीर सी बनी हुई थी. ये लकीर बता रही थी की जब दीदी के दोनों चुत्तरों को अलग किया जायेगा तब उनकी गांड देखने को मिल सकती है या फिर यदि दीदी कमर के पास से निचे की तरफ झुकती है तो चुत्तरों के फैलने के कारण गांड के सौंदर्य का अनुभव किया जा सकता है. तभी मैंने देखा की दीदी अपने दोनों हाथो को अपनी जांघो के पास ले गई फिर अपनी जांघो को थोड़ा सा फैलाया और अपनी गर्दन निचे झुका कर अपनी जांघो के बीच देखने लगी शायद वो अपनी चूत देख रही थी. मुझे लगा की शायद दीदी की चूत के ऊपर भी उसकी कान्खो की तरह से बालों का घना जंगल होगा और जरुर वो उसे ही देख रही होंगी. मेरा अनुमान सही था और दीदी ने अपने हाथ को बढा कर रैक पर से फिर वही क्रीम वाली बोतल उतार ली और अपने हाथो से अपने जांघो के बीच क्रीम लगाने लगी. पीछे से दीदी को क्रीम लगाते हुए देख कर ऐसा लग रहा था जैसे वो मुठ मार रही है. क्रीम लगाने के बाद वो फिर से निचे बैठ गई और अपने पेटीकोट और पैंटी को साफ़ करने लगी. मैंने अपने लौड़े को आश्वाशन दिया की घबराओ नहीं कपरे साफ़ होने के बाद और भी कुछ देखने को मिल सकता है. ज्यादा नहीं तो फिर से दीदी के नंगे चुत्तर, पीठ और जांघो को देख कर पानी गिरा लेंगे.
 
होली पर बीबी चुदी दीदी चुदी--3

करीब पांच-सात मिनट के बाद वो फिर से खड़ी हो गई. लौड़े में फिर से जान आ गई. दीदी इस समय अपनी कमर पर हाथ रख कर खड़ी थी. फिर उसने अपने चुत्तर को खुजाया और सहलाया फिर अपने दोनों हाथों को बारी बारी से उठा कर अपनी कान्खो को देखा और फिर अपने जांघो के बीच झाँकने के बाद फर्श पर परे हुए कपड़ो को उठाया. यही वो क्षण था जिसका मैं काफी देर से इन्तेज़ार कर रहा था. फर्श पर पड़े हुए कपड़ो को उठाने के लिए दीदी निचे झुकी और उनके चुत्तर लकड़ी के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. निचे झुकने के कारण उनके दोनों चुत्तर अपने आप अलग हो गए और उनके बीच की मोटी लकीर अब दीदी की गहरी गांड में बदल गई. दोनों चुत्तर बहुत ज्यादा अलग नहीं हुए थे मगर फिर भी इतने अलग तो हो चुके थे की उनके बीच की गहरी खाई नज़र आने लगी थी. देखने से ऐसा लग रहा था जैसे किसी बड़े खरबूजे को बीच से काट कर थोड़ा सा अलग करके दो खम्भों के ऊपर टिका कर रख दिया गया है. दीदी वैसे ही झुके हुए बाल्टी में कपड़ो को डाल कर खंगाल रही थी और बाहर निकाल कर उनका पानी निचोड़ रही थी. ताकत लगाने के कारण दीदी के चुत्तर और फ़ैल गए और गोरी चुत्तरों के बीच की गहरी भूरे रंग की गांड की खाई पूरी तरह से नज़र आने लगी. दीदी की गांड की खाई एक दम चिकनी थी. गांड के छेद के आस-पास भी बाल उग जाते है मगर दीदी के मामले में ऐसा नहीं था उसकी गांड, जैसा की उसका बदन था, की तरह ही मलाई के जैसी चिकनी लग रही थी. झुकने के कारण चुत्तरों के सबसे निचले भाग से जांघो के बीच से दीदी की चूत के बाल भी नजर आ रहे थे. उनके ऊपर लगा हुआ सफ़ेद क्रीम भी नज़र आ रहा था. चुत्तरो की खाई में काफी निचे जाकर जहा चूत के बाल थे उनसे थोड़ा सा ऊपर दीदी की गांड की सिकुरी हुई भूरे रंग की छेद थी. ऊँगली के अगले सिरे भर की बराबर की छेद थी. किसी फूल की तरह से नज़र आ रही थी. दीदी के एक दो बार हिलने पर वो छेद हल्का सा हिला और एक दो बार थोड़ा सा फुला-पिचका. ऐसा क्यों हुआ मेरी समझ में नहीं आया मगर इस समय मेरा दिल कर रहा था की मैं अपनी ऊँगली को दीदी की गांड की खाई में रख कर धीरे-धीरे चलाऊ और उसके भूरे रंग की दुप-दुपाती छेद पर अपनी ऊँगली रख हलके-हलके दबाब दाल कर गांड की छेद की मालिश करू. उफ़ कितना मजा आएगा अगर एक हाथ से चुत्तर को मसलते हुए दुसरे हाथ की ऊँगली को गांड की छेद पर डाल कर हलके-हलके कभी थोड़ा सा अन्दर कभी थोड़ा सा बाहर कर चलाया जाये तो. पूरी ऊँगली दीदी की गांड में डालने से उन्हें दर्द हो सकता था इसलिए पूरी ऊँगली की जगह आधी ऊँगली या फिर उस से भी कम डाल कर धीरे धीरे गोल-गोल घुमाते हुए अन्दर-बाहर करते हुए गांड की फूल जैसी छेद ऊँगली से हलके-हलके मालिश करने में बहुत मजा आएगा. इस कल्पना से ही मेरा पूरा बदन सिहर गया. दीदी की गांड इस समय इतनी खूबसूरत लग रही थी की दिल कर रहा थी अपने मुंह को उसके चुत्तरों के बीच घुसा दू और उसकी इस भूरे रंग की सिकुरी हुई गांड की छेद को अपने मुंह में भर कर उसके ऊपर अपना जीभ चलाते हुए उसके अन्दर अपनी जीभ डाल दू. उसके चुत्तरो को दांत से हलके हलके काट कर खाऊ और पूरी गांड की खाई में जीभ चलाते हुए उसकी गांड चाटू. पर ऐसा संभव नहीं था. मैं इतना उत्तेजित हो चूका था की लण्ड किसी भी समय पानी फेंक सकता था. लौड़ा अपनी पूरी औकात पर आ चूका था और अब दर्द करने लगा था. अपने अंडकोष को अपने हाथो से सहलाते हुए हलके से सुपाड़े को दो उँगलियों के बीच दबा कर अपने आप को सान्तवना दिया.इस समय में पद्मा को बिलकुल भुला हुआ था।

सारे कपड़े अब खंगाले जा चुके थे. दीदी सीधी खड़ी हो गई और अपने दोनों हाथो को उठा कर उसने एक अंगराई ली और अपनी कमर को सीधा किया फिर दाहिनी तरफ घूम गई. मेरी किस्मत शायद आज बहुत अच्छी थी. दाहिनी तरफ घूमते ही उसकी दाहिनी चूची जो की अब नंगी थी मेरी लालची आँखों के सामने आ गई. उफ़ अभी अगर मैं अपने लण्ड को केवल अपने हाथ से छू भर देता तो मेरा पानी निकल जाता. चूची का एक ही साइड दिख रहा था. दीदी की चूची एक दम ठस सीना तान के खड़ी थी. ब्लाउज के ऊपर से देखने पर मुझे लगता तो था की उनकी चूचियां सख्त होंगी मगर साल की होने के बाद भी उनकी चुचियों में कोई ढलकाव नहीं आया था. इसका एक कारण ये भी हो सकता था की उनको अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ था. दीदी को शायद ब्रा की कोई जरुरत ही नहीं थी. उनकी चुचियों की कठोरता किसी भी 17-18

साल की लौंडिया के दिल में जलन पैदा कर सकती थी. जलन तो मेरे दिल में भी हो रही थी इतनी अच्छी चुचियों मेरी किस्मत में क्यों नहीं है. चूची एकदम दूध के जैसी गोरे रंग की थी. चूची का आकार ऐसा था जैसे किसी मध्यम आकार के कटोरे को उलट कर दीदी की छाती से चिपका दिया गया हो और फिर उसके ऊपर किशमिश के एक बड़े से दाने को डाल दिया गया हो. मध्यम आकार के कटोरे से मेरा मतलब है की अगर दीदी की चूची को मुट्ठी में पकड़ा जाये तो उसका आधा भाग मुट्ठी से बाहर ही रहेगा. चूची का रंग चूँकि हद से ज्यादा गोरा था इसलिए हरी हरी नसे उस पर साफ़ दिखाई पर रही थी, जो की चूची की सुन्दरता को और बढा रही थी. साइड से देखने के कारण चूची के निप्पल वन-डायेमेन्शन में नज़र आ रहे थे. सामने से देखने पर ही थ्री-डायेमेन्शन में नज़र आ सकते थे. तभी उनकी लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई का सही मायेने में अंदाज लगाया जा सकता था मगर क्या कर सकता था मजबूरी थी मैं साइड व्यू से ही काम चला रहा था. निप्पलों का रंग गुलाबी था, पर हल्का भूरापन लिए हुए था. बहुत ज्यादा बड़ा तो नहीं था मगर एक दम छोटा भी नहीं था किशमिश से बड़ा और चॉकलेट से थोड़ा सा छोटा. मतलब मुंह में जाने के बाद चॉकलेट और किशमिश दोनों का मजा देने वाला. दोनों होंठो के बीच दबा कर हलके-हलके दबा-दबा कर दांत से काटते हुए अगर चूसा जाये तो बिना चोदे झर जाने की पूरी सम्भावना थी
 


दाहिनी तरफ घूम कर आईने में अपने दाहिने हाथ को उठा कर देखा फिर बाएं हाथ को उठा कर देखा. फिर अपनी गर्दन को झुका कर अपनी जांघो के बीच देखा. फिर वापस नल की तरफ घूम गई और खंगाले हुए कपरों को वही नल के पास बनी एक खूंटी पर टांग दिया और फिर नल खोल कर बाल्टी में पानी भरने लगी. मैं समझ गया की दीदी अब शायद नहाना शुरू करेंगी. मैंने पूरी सावधानी के साथ अपनी आँखों को लकड़ी के पट्टो के गैप में लगा दिया. मग में पानी भर कर दीदी थोड़ा सा झुक गई और पानी से पहले अपने बाएं हाथ फिर दाहिनी हाथ के कान्खो को धोया. पीछे से मुझे कुछ दिखाई नहीं पर रहा था मगर. दीदी ने पानी से अच्छी तरह से धोने के बाद कान्खो को अपने हाथो से छू कर देखा. मुझे लगा की वो हेयर रेमोविंग क्रीम के काम से संतुष्ट हो गई और उन्होंने अपना ध्यान अब अपनी जांघो के बीच लगा दिया. दाहिने हाथ से पानी डालते हुए अपने बाएं हाथ को अपनी जांघो बीच ले जाकर धोने लगी. हाथों को धीरे धीरे चलाते हुए जांघो के बीच के बालों को धो रही थी. मैं सोच रहा था की काश इस समय वो मेरी तरफ घूम कर ये सब कर रही होती तो कितना मजा आता. झांटों के साफ़ होने के बाद कितनी चिकनी लग रही होगी दीदी की चुत ये सोच का बदन में झन-झनाहट होने लगी. पानी से अपने जन्घो के बीच साफ़ कर लेने के बाद दीदी ने अब नहाना शुरू कर दिया. अपने कंधो के ऊपर पानी डालते हुए पुरे बदन को भीगा दिया. बालों के जुड़े को खोल कर उनको गीला कर शैंपू लगाने लगी. दीदी का बदन भीग जाने के बाद और भी खूबसूरत और मदमस्त लगने लगा था. बदन पर पानी पड़ते ही एक चमक सी आ गई थी दीदी के बदन में. शैंपू से खूब सारा झाग बना कर अपने बालों को साफ़ कर रही थी. बालो और गर्दन के पास से शैंपू मिला हुआ मटमैला पानी उनकी गर्दन से बहता हुआ उनकी पीठ पर चुते हुए निचे की तरफ गिरता हुआ कमर के बाद सीधा दोनों चुत्तरों के बीच यानी की उनके बीच की दरार जो की दीदी की गांड थी में घुस रहा था. क्योंकि ये पानी शैंपू लगाने के कारण झाग से मिला हुआ था और बहुत कम मात्रा में था इसलिए गांड की दरार में घुसने के बाद कहा गायब हो जा रहा था ये मुझे नहीं दिख रहा था. अगर पानी की मात्रा ज्यादा होती तो फिर वो वहां से निकल कर जांघो के अंदरूनी भागो से ढुलकता हुआ निचे गिर जाता. बालों में अच्छी तरह से शैंपू लगा लेने के बाद बालों को लपेट कर एक गोला सा बना कर गर्दन के पास छोड़ दिया और फिर अपने कंधो पर पानी डाल कर अपने बदन को फिर से गीला कर लिया. गर्दन और पीठ पर लगा हुआ शैंपू मिला हुआ मटमैला पानी भी धुल गया था. फिर उन्होंने एक स्पोंज के जैसी कोई चीज़ रैक पर से उठा ली और उस से अपने पुरे बदन को हलके-हलके रगरने लगी. पहले अपने हाथो को रगरा फिर अपनी छाती को फिर अपनी पीठ को फिर बैठ गई. निचे बैठने पर मुझे केवल गर्दन और उसके निचे का कुछ हिस्सा दिख रहा था. पर ऐसा लग रहा था जैसे वो निचे बैठ कर अपने पैरों को फैला कर पूरी तरह से रगर कर साफ़ कर रही थी क्योंकि उनका शरीर हिल रहा था. थोरी देर बाद खड़ी हो गई और अपने जांघो को रगरना शुरू कर दिया. मैं सोचने लगा की फिर निचे बैठ कर क्या कर रही थी. फिर दिमाग में आया की हो सकता है अपने पैर के तलवे और उँगलियों को रगर कर साफ़ कर रही होंगी. मेरी दीदी बहुत सफाई पसंद है. जैसे उसे घर के किसी कोने में गंदगी पसंद नहीं है उसी तरह से उसे अपने शरीर के किसी भी भाग में गंदगी पसंद नहीं होगी. अब वो अपने जांघो को रगर रगर कर साफ़ कर रही थी और फिर अपने आप को थोड़ा झुका कर अपनी दोनों जांघो को फैलाया और फिर स्पोंज को दोनों जांघो के बीच ले जाकर जांघो के अंदरूनी भाग और रान को रगरने लगी. पीछे से देखने पर लग रहा था जैसे वो जांघो को जोर यानि जहाँ पर जांघ और पेट के निचले हिस्से का मिलन होता और जिसके बीच में चूत होती है को रगर कर साफ़ करते हुए हलके-हलके शायद अपनी चूत को भी रगर कर साफ़ कर रही थी ऐसा मेरा सोचना है. वैसे चुत जैसी कोमल चीज़ को हाथ से रगर कर साफ़ करना ही उचित होता. वाकई ऐसा था या नहीं मुझे नहीं पता, पीछे से इस से ज्यादा पता भी नहीं चल सकता था. थोड़ी देर बाद थोड़ा और झुक कर घुटनों तक रगर कर फिर सीधा हो कर अपने हाथों को पीछे ले जाकर अपने चुत्तरों को रगरने लगी. वो थोड़ी-थोड़ी देर में अपने बदन पर पानी डाल लेती थी जिस से शरीर का जो भाग सुख गया होता वो फिर से गीला हो जाता था और फिर उन्हें रगरने में आसानी होती थी. चुत्तरों को भी इसी तरह से एक बार फिर से गीला कर खूब जोर जोर से रगर रही थी. चुत्तरों को जोर से रगरने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था क्योंकि वहां का मांस बहुत मोटा था, पर जोर से रगरने के कारण लाल हो गया था और थल-थलाते हुए हिल रहा था. मेरे हाथों में खुजली होने लगी थी और दिल कर रहा था की थल-थलाते हुए चुत्तरों को पकड़ कर मसलते हुए हलके-हलके मारते हुए खूब हिलाउ. चुत्तारों को रगरने के बाद दीदी ने स्पोंज को दोनों चुत्तरों की दरार के ऊपर रगरने लगी फिर थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गैई जिस से उसके चुत्तर फ़ैल गए. फिर स्पोंज को दोनों चुत्तरों के बीच की खाई में डाल कर रगड़ने लगी. कोमल गांड की फूल जैसी छेद शायद रगड़ने के बाद लाल हो गुलाब के फूल जैसी खिल जायेगी. ये सोच कर मेरे मन में दीदी की गांड देखने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गई. मन में आया की इस लकड़ी की दिवार को तोड़ कर सारी दुरी मिटा दू, मगर, सोचने में तो ये अच्छा था, सच में ऐसा करने की हिम्मत मेरी गांड में नहीं थी. बचपन से दीदी का गुस्सैल स्वभाव देखा था, गांड पर ऐसी लात मारेगी की गांड देखना भूल जाऊंगा. हालाँकि दीदी मुझे प्यार भी बहुत करती थी और मुझे कभी भी परेशानी में देख तुंरत मेरे पास आ कर मेरी समस्या के बारे में पूछने लगती थी.
 


स्पोंज से अपने बदन को रगड़ने के बाद. वापस स्पोंज को रैक पर रख दिया और मग से पानी लेकर कंधो पर डालते हुए नहाने लगी. मात्र स्पोंज से सफाई करने के बाद ही दीदी का पूरा बदन चम-चमाने लगा था. पानी से अपने पुरे बदन को धोने के बाद दीदी ने अपने शैंपू लगे बालों का गोला खोला और एक बार फिर से कमर के पास से निचे झुक गई और उनके चुत्तर फिर से लकड़ी के पट्टो के बीच बने गैप के सामने आ गए. इस बार उनके गोरे चम-चमाते चुत्तरों के बीच की चमचमाती खाई के आलावा मुझे एक और चीज़ के दिखने को मिल रही थी. वो क्या थी वो तो चूत है. . इस बात का अहसास होते ही की मैं अपनी दीदी की चूत देख रहा हूँ, मुझे लगा जैसे मेरा कलेजा मुंह को आ जायेगा और फिर से मेरा गला सुख गया और पैर कांपने लगे. इस बार शायद मेरे लण्ड से दो बूँद टपक कर निचे गिर भी गया पर मैंने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया. लण्ड भी मारे उत्तेजना के काँप रहा था. बाथरूम में वैसे तो लाइट आँन थी मगर चूँकि बल्ब भी लकरी के पट्टो के सामने ही लगा हुआ था इसलिए दीदी की पीठ की तरफ रोशनी कम थी. फिर भी दोनों मोटी जांघो के बीच ऊपर की तरफ चुत्तरों की खाई के ठीक निचे एक गुलाबी लकीर सी दिख रही थी. पट्टो के बीच से देखने से ऐसा लग रहा था जैसे सेब या पके हुए पपीते के आधे भाग को काट कर फिर से आपस में चिपका कर दोनों जांघो के बीच फिट कर दिया गया है. मतलब दीदी की चूत ऐसी दिख रही थी जैसे सेब को चार भागो में काट कर फिर दो भागो को आपस में चिपका कर गांड के निचे लगा दिया गया हो. कमर या चुत्तरों के इधर-उधर होने पर दोनों फांकों में भी हरकत होती थी और ऐसा लगता जैसे कभी लकीर टेढी हो गई है कभी लकीर सीधी हो गई है. जैसे चूत के दोनों होंठ कभी मुस्कुरा रहे है कभी नाराज़ हो रहे है. दोनों होंठ आपस में एक दुसरे से एक दम सटे हुए दिख रहे थे. होंठो के आपस में सटे होने के मतलब बाद में समझ में आया की ऐसा चूत के बहुत ज्यादा टाइट होने के कारण था. दोनों फांक एक दम गुलाबी और पावरोटी के जैसे फूले हुए थे. मेरे मन में आया की काश मैं चूत की लकीर पर ऊपर से निचे तक अपनी ऊँगली चला और हलके से दोनों फांकों को अलग कर के देख पाता की कैसी दिखती है, दोनों गुलाबी होंठो के बीच का अंदरूनी भाग कैसा है मगर ये सपना ही रह गया. दीदी के बाल धुल चुके थे और वो सीधी खड़ी हो गई.

बालो को अच्छी तरह से धोने के बाद फिर से उनका गोला बना कर सर के ऊपर बाँध लिया और फिर अपने कंधो पर पानी डाल कर अपने आप को फिर से गीला कर पुरे बदन पर साबुन लगाने लगी. पहले अपने हाथो पर अच्छी तरह से साबुन लगाया फिर अपने हाथो को ऊपर उठा कर वो दाहिनी तरफ घूम गई और अपने कान्खो को आईने में देख कर उसमे साबुन लगाने लगी. पहले बाएं कांख में साबुन लगाया फिर दाहिने हाथ को उठा कर दाहिनी कांख में जब साबुन लगाने जा रही थी तो मुझे हेयर रिमुविंग क्रीम का कमाल देखने को मिला.

 
होली पर बीबी चुदी दीदी चुदी--4

गतांक से आगे ....................................................

दीदी को नंगा देख कर मेरा लोडा खड़ा हो चूका था और मेरे पास मुठ मरने कोई चारा था,मेने अपना लोडा निकला और मूठ मारने लगा,मेरी आँखे न जाने कब दीदी कि चूत कि कल्पना करते करते बंद हो गयी और दीदी एकदम बहार निकल आयी। दीदी मुझे चिल्लाते हुए बोली रोहित ये क्या कर रहे हो?मेने कहा दीदी कुछ नही ,बस पद्मा और जीजाजी को होली कि मस्ती देख मुझे भी मस्ती चढ़ गयी ,फिर आपको नहाते देखा तो मन किया मूठ मरने का ,दीदी चिल्लाई क्या तूने मुझे नहाते देखा,हे भगवन तुझे शर्म नही आयी कि तू क्या कर रहा हे। मेने कहा दीदी अभी में मस्ती के मूड में हु और तुम्हारी चूत देखना चाहता हु। जीजाजी जो पद्मा के साथ कर रहे हे वो आपने भी देखा और मेने भी देखा ,आज होली हे आज हम दोनों भाई बहन होली मानते हे। दीदी चिल्लाते हुए बोली देखो माँ…तुमने कैसा लाडला पैदा किया है....अपनी बड़ी बहन को बुर दिखने को बोल रहा है....हाय कैसा बहनचोद भाई है मेरा....मेरी चुत देखने के चक्कर में है...उफ्फ्फ....मैं तो फंस गई हूँ...मुझे क्या पता था की मुठ मारने से रोकने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी...."

“दीदी की ऐसे बोलने पर मेरा सारा जोश ठंडा पर गया. मैं सोच रहा था अब मामला फिट हो गया है और दीदी ख़ुशी ख़ुशी सब कुछ दिखा देंगी. शायद उनको भी मजा आ रहा है, इसलिए कुछ और भी करने को मिल जायेगा मगर दीदी के ऐसे अफ़सोस करने से लग रहा था जैसे कुछ भी देखने को नहीं मिलने वाला. मगर तभी दीदी बोली "ठीक है मतलब तुझे चुत देखनी है...मैं दीदी के चेहरे की तरफ देखने लगा तो दीदी आँख नचाते हुए बोली "चुत ही तो देखनी है...वो तो मैं पेटिकोट उठा कर दिखा दूंगी..." फिर तेजी से बाहर निकल बाथरूम चली गई. मैं सोच में पड़ गया मैं दीदी को पूरा नंगा देखना चाहता था. मैं उनकी चूची और चुत दोनों देखना चाहता था और साथ में उनको चोदना भी चाहता था, पर वो तो बाद की बात थी पहले यहाँ दीदी के नंगे बदन को देखने का जुगार लगाना बहुत जरुरी था. मैंने सोचा की मुझे कुछ हिम्मत से काम लेना होगा. दीदी जब वापस रूम में आकर अपने पेटिकोट को घुटनों के ऊपर तक चढा कर बिस्तर पर बैठने लगी तो मैं बोला " दीदी....दीदी...मैं….चू…चू…चूची भी देखना...चाहता हूँ". दीदी इस पर चौंकने का नाटक करती बोली "क्या मतलब...चूची भी देखनी है….चुत भी देखनी है....मतलब तू तो मुझे पूरा नंगा देखना चाहता है....हाय....बड़ा बेशर्म है....अपनी बड़ी बहन को नंगा देखना चाहता है....क्यों मैं ठीक समझी ना...तू अपनी दीदी को नंगा देखना चाहता है...बोल, ...ठीक है ना...." मैं भी शरमाते हुए हिम्मत दिखाते बोला "हां दीदी....मुझे आप बहुत अच्छी लगती हो....मैं....मैं आप को पूरा...नंगा देखना....चाहता..."

"बड़ा अच्छा हिसाब है तेरा....अच्छी लगती हो.....अच्छी लगने का मतलब तुझे नंगी हो कर दिखाऊ...कपड़ो में अच्छी नहीं लगती हूँ क्या...."

"हाय दीदी मेरा वो मतलब नहीं था....वो तो आपने कहा था....फिर मैंने सोचा....सोचा...."

"हाय भाई...तुने जो भी सोचा सही सोचा....मैं अपने भाई को दुखी नहीं देख सकती....मुझे ख़ुशी है की मेरा इक्कीस साल का नौजवान भाई अपनी बड़ी बहन को इतना पसंद करता है की वो नंगा देखना चाहता है..मैं तुझे पूरा नंगा हो कर दिखाउंगी.....फिर तुम मुझे बताना की तुम अपनी दीदी के साथ क्या-क्या करना चाहते हो....".मेरी तो जैसे लाँटरी लग गई. चेहरे पर मुस्कान और आँखों में चमक वापस आ गई. दीदी बिस्तर से उतर कर नीचे खड़ी हो गई और हंसते हुए बोली "पहले पेटिको़ट ऊपर उठाऊ या ब्लाउज खोलू..." मैंने मुस्कुराते हुए कहा "हाय दीदी दोनों....खोलो....पेटिको़ट भी और ब्लाउज भी...."

"इस.....स......स....बेशर्म पूरा नंगा करेगा....चल तेरे लिए मैं कुछ भी कर दूंगी....अपने भाई के लिए कुछ भी...पहले ब्लाउज खोल लेती हूँ फिर पेटिको़ट खोलूंगी....चलेगा ना..." गर्दन हिला कर दीदी ने पूछा तो मैंने भी सहमती में गर्दन हिलाते हुए अपने गालो को शर्म से लाल कर दीदी को देखा. दीदी ने चटाक-चटाक ब्लाउज के बटन खोले और फिर अपने ब्लाउज को खोल कर पीछे की तरफ घूम गई और मुझे अपनी ब्रा का हूक

खोलने के लिए बोला मैंने कांपते हाथो से उनके ब्रा का हूक खोल दिया. दीदी फिर सामने की तरफ घूम गई. दीदी के घूमते ही मेरी आँखों के सामने दीदी की मदमस्त, गदराई हुई मस्तानी कठोर चूचियां आ गई. मैं पहली बार अपनी दीदी के इन गोरे गुब्बारों को पूरा नंगा देख रहा था. इतने पास से देखने पर गोरी चूचियां और उनकी ऊपर की नीली नसे, भूरापन लिए हुए गाढे गुलाबी रंग की उसकी निप्पले और उनके चारो तरफ का गुलाबी घेरा जिन पर छोटे-छोटे दाने जैसा उगा हुआ था सब नज़र आ रहा था. मैं एक दम कूद कर हाय करते हुए उछला तो दीदी मुस्कुराती हुई बोली "अरे, रे इतना उतावला मत बन अब तो नंगा कर दिया है आराम से देखना....ले...देख..." कहती हुई मेरे पास आई. मैं बिस्तर पर बैठा हुआ था और वो निचे खड़ी थी इसलिए मेरा चेहरा उनके चुचियों के पास आराम से पहुँच रहा था. मैं चुचियों को ध्यान से से देखते हुए बोला "हाय...दीदी पकड़े..."

"हाँ...हाँ....पकड़ ले जकड़...ले अब जब नंगा कर के दिखा रही हूँ तो...छूने क्यों नहीं दूंगी....ले आराम से पकड़ कर मजा कर......अपनी बड़ी बहन की नंगी चुचियों से खेल...." मैंने अपने दोनों हाथ बढा कर दोनों चुचियों को आराम से दोनों हाथो में थाम लिया. नंगी चुचियों के पहले स्पर्श ने ही मेरे होश उड़ा. उफ्फ्फ दीदी की चूचियां कितनी गठीली और गुदाज थी, इसका अंदाजा मुझे इन मस्तानी चुचियों को हाथ में पकड़ कर ही हुआ. मेरा लण्ड फरफराने लगा. दोनों चुचियों को दोनों हथेली में कस हलके दबाब के साथ मसलते हुए चुटकी में निप्पल को पकड़ हलके से दबाया जैसे किशमिश के दाने को दबाते है. दीदी के मुंह से एक हलकी सी आह निकल गई. मैंने घबरा कर चूची छोड़ी तो दीदी ने मेरा हाथ पकड़ फिर से अपनी चुचियों पर रखते हुए दबाया तो मैं समझ गया की दीदी को मेरा दबाना अच्छा लग रहा है और मैं जैसे चाहू इनकी चुचियों के साथ खेल सकता हूँ. गर्दन उचका कर चुचियों के पास मुंह लगा कर एक हाथ से चूची को पकड़ दबाते हुए दूसरी चूची को जैसे ही अपने होंठो से छुआ मुझे लगा जैसे दीदी गनगना गई उनका बदन सिहर गया. मेरे सर के पीछे हाथ लगा बालों में हाथ फेरते हुए मेरे सर को अपनी चुचियों पर जोर से दबाया. मैंने भी अपने होंठो को खोलते हुए उनकी चुचियों के निप्पल सहित जितना हो सकता था उतना उनकी चुचियों को अपने मुंह में भर लिया और चूसते हुए अपनी जीभ को निप्पल के चारो तरफ घुमाते हुए चुमलाया तो दीदी सिसयाते हुए बोली "आह....आ...हा....सी...सी....ये क्या कर रहा है...उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़.....मार डाला....साले मैं तो तुझे अनारी समझती थी....मगर....तू....तो खिलाड़ी निकला रे.....हाय...चूची चूसना जानता है.....मैं सोच रही थी सब तेरे को सिखाना पड़ेगा....हाय...चूस भाई...सीईई....ऐसे ही निप्पल को मुंह में लेकर चूस और चूची दबा....हाय रस निकाल बहुत दिन हो गए....."
 
अब तो मैं जैसे भूखा शेर बन गया और दीदी की चुचियों को मुंह में भर ऐसे चूसने लगा जैसे सही में उसमे से रस निकल कर खा जाऊंगा. कभी बाई चूची को कभी दाहिनी चूची को मुंह में भर भर कर लेते हुए निप्पलों को अपने होंठो के बीच दबा दबा कर चूसते हुए रबर की तरह खींच रहा था. चुचियों के निप्पल के चारो तरफ के घेरे में जीभ चलाते हुए जब दुसरे हाथ से दीदी की चूची को पकड़ कर दबाते हुए निप्पल को चुटकी में पकड़ कर खींचा तो मस्ती में लहराते हुए दीदी लड़खड़ाती आवाज़ में बोली " "हाय ....सीईई...ई...उफ्फ्फ्फ्फ्फ....चूस ले.....पूरा रस चूस.....मजा आ रहा है....तेरी दीदी को बहुत मजा आ रहा है भाई.....हाय तू तो चूची को क्रिकेट की गेंद समझ कर दबा रहा है....मेरे निप्पल क्या मुंह में ले चूस....तू बहुत अच्छा चूसता है....हाय मजा आ गया भाई....पर क्या तू चूची ही चूसता रहेगा.....बूर नहीं देखेगा अपनी दीदी की चुत नहीं देखनी है तुझे.....हाय उस समय से मरा जा रहा था और अभी....जब चूची मिल गई तो उसी में खो गया है....हाय चल बहुत दूध पी लिया.....अब बाद में पीना" मेरा मन अभी भरा नहीं था इसलिए मैं अभी भी चूची पर मुंह मारे जा रहा था. इस पर दीदी ने मेरे सर के बालों को पकड़ कर पीछे की तरफ खींचते हुए अपनी चूची से मेरा मुंह अलग किया और बोली "साले....हरामी....चूची...छोड़....कितना दूध पिएगा....हाय अब तुझे अपनी निचे की सहेली का रस पिलाती हु....चल हट माधरचोद....." गाली देने से मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि मैं समझ गया था की ये तो दीदी का शगल है और शायद मार भी सकती है अगर मैं इसके मन मुताबिक ना करू तो. पर दुधारू गाये की लथार तो सहनी ही परती है. इसकी चिंता मुझे अब नहीं थी. दीदी लगता था अब गरम हो चूँकि थी और चुदवाना चाहती थी. मैं पीछे हट गया और दीदी के पेट पर चुम्मा ले कर बोला "हाय दीदी बूर का रस पिलाओगी...हाय जल्दी से खोलो ना..." दीदी पेटिको़ट के नाड़े को झटके के साथ खोलती हुई बोली "हा राजा मेरे प्यारे भाई....अब तो तुझे पिलाना ही पड़ेगा...ठहर जा अभी तुझे पिलाती अपनी चुत पूरा खोल कर उसकी चटनी चटाऊंगी फिर...देखना तुझे कैसा मजा आता है...." पेटिको़ट सरसराते हुए निचे गिरता चला गया पैंटी तो पहनी नहीं थी इसलिए पेटिको़ट के निचे गिरते ही दीदी पूरी नंगी हो गई. मेरी नजर उनके दोनों जन्घो के बीच के तिकोने पर गई. दोनों चिकनी मोटी मोटी रानो के बीच में दीदी की बूर का तिकोना नज़र आ रहा था. चुत पर हलकी झांटे उग आई थी. मगर इसे झांटो का जंगल नहीं कह सकते थे. ये तो चुत की खूबसूरती को और बढा रहा था. उसके बीच दीदी की गोरी गुलाबी चुत की मोटी फांके झांक रही थी. दोनों जांघ थोड़ा अलग थे फिर भी चुत की फांके आपस में सटी हुई थी और जैसा की मैंने बाथरूम में पीछे से देखा था एक वैसा तो नहीं मगर फिर भी एक लकीर सी बना रही थी दोनों फांके. दीदी की कमर को पकड़ सर को झुकाते हुए चुत के पास ले जाकर देखने की कोशिश की तो दीदी अपने आप को छुड़ाते हुए बोली "हाय...भाई ऐसे नहीं....ऐसे ठीक से नहीं देख पाओगे....दोनों जांघ फैला कर अभी दिखाती हूँ...फिर आराम से बैठ कर मेरी बूर को देखना और फिर तुझे उसके अन्दर का माल खिलाउगीं...घबरा मत भाई...मैं तुझे अपनी चुत पूरा खोल कर दिखाउंगी और....उसकी चटनी भी चटाउगीं...चल छोड़ कहते हुए पीछे मुड़ी. पीछे मुड़ते ही दीदी गुदाज चुत्तर और गांड मेरी आँखों के सामने नज़र आ गए. दीदी चल रही थी और उसके दोनों चुत्तर थिरकते हुए हिल रहे थे और आपस में चिपके हुए हिलते हुए ऐसे लग रहे थे जैसे बात कर रहे हो और मेरे लण्ड को पुकार रहे हो. लौड़ा दुबारा अपनी पूरी औकात पर आ चूका था और फनफना रहा था. दीदी ड्रेसिंग टेबल के पास रखे गद्देदार सोफे वाली कुर्सी पर बैठ गई और हाथो के इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और बोली "हाय...भाई...आ जा तुझे मजे करवाती हूँ....अपने मालपुए का स्वाद चखाती हूँ....देख भाई मैं इस कुर्सी के दोनों हत्थों पर अपनी दोनों टांगो को रख कर जांघ टिका कर फैलाऊंगी ना तो मेरी चुत पूरी उभर कर सामने आ जायेगी और फिर तुम उसके दोनों फांको को अपने हाथ से फैला कर अन्दर का माल चाटना....इस तरह से तुम्हारी जीभ पूरा बूर के अन्दर घुस जायेगी....ठीक है भाई...आ जा....जल्दी कर....अभी एक पानी तेरे मुंह में गिरा देती हूँ फिर तुझे पूरा मजा दूंगी...." मैं जल्दी से बिस्तर छोर दीदी की कुर्सी के पास गया और जमीं पर बैठ गया. दीदी ने अपने दोनों पैरो को सोफे के हत्थों के ऊपर चढा कर अपनी दोनों जांघो को फैला दिया. रानो के फैलते ही दीदी की चुत उभर कर मेरी आँखों के सामने आ गई. उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ़....क्या खूबसूरत चुत थी. गोरी गुलाबी....काले काले झांटो के जंगल के बीच में से झांकती ऐसी लग रही थी जैसे बादलो के पीछे से चाँद मुस्कुरा रहा है. एक दम पावरोटी के जैसी फूली हुई चुत थी. दोनों पैर कुर्सी के हत्थों के ऊपर चढा कर फैला देने के बाद भी चुत के दोनों होंठ अलग नहीं हुए थे. चुत पर ऊपर के हिस्से में झांटे थी मगर निचे गुलाबी कचौरी जैसे होंठो के आस पास एक दम बाल नहीं थे. मैं जमीन पर बैठ कर दीदी के दोनों रानो पर दोनों हाथ रख कर गर्दन झुका कर एक दम ध्यान से दीदी की चुत को देखने लगा. चुत के सबसे ऊपर में किसी तोते के लाल चोंच की तरह बाहर की तरफ निकली हुई दीदी के चुत का भागनाशा था. कचौरी के जैसी चुत के दोनों फांको पर अपना हाथ लगा कर दोनों फांको को हल्का सा फैलाती हुई दीदी बोली

 
होली पर बीबी चुदी दीदी चुदी--5

गतांक से आगे ....................................................

कचौरी के जैसी चुत के दोनों फांको पर अपना हाथ लगा कर दोनों फांको को हल्का सा फैलाती हुई दीदी बोली

ध्यान से देख ले....अच्छी तरह से अपनी दीदी की बूर को देख बेटा....चुत फैला के देखेगा तो तुझे....पानी जैसा नज़र आएगा....उसको चाट का अच्छी तरह से खाना....चुत की असली चटनी वही है...." दीदी के चुत के दोनों होंठ फ़ैल और सिकुर रहे थे. मैंने अपनी गर्दन को झुका दिया और जीभ निकल कर सबसे पहले चुत के आस पास वाले भागो को चाटने लगा. रानो के जोर और जांघो को भी चाटा.

जांघो को हल्का हल्का काटा भी फिर जल्दी से दीदी की चुत पर अपने होंठो को रख कर एक चुम्मा लिया और जीभ निकाल कर पूरी दरार पर एक बार चलाया. जीभ छुलाते ही दीदी सिसया उठी और बोली "सीईई....बहुत अच्छा भाई...तुम्हे आता है...मुझे लग रहा था की सिखाना पड़ेगा मगर तू तो बहुत होशियार है....हाय….बूर चाटना आता है.... ऐसे ही..तुने शुरुआत बहुत अच्छी की है....अब पूरी चुत पर अपनी जीभ फिराते हुए.....मेरी बूर की टीट को पहले अपने होंठो के बीच दबा कर चूस...देख मैं बताना भूल गई थी....चुत के सबसे ऊपर में जो लाल-लाल निकला हुआ है ना....उसी को होंठो के बीच दबा के चूसेगा....तब मेरी चुत में रस निकलने लगेगा....फिर तू आराम से चाट कर चूसना....सीईईई.मैंने अपने होंठो को खोलते हुए टीट को मुंह में भर कर चूसना शुरू कर दिया. टीट को होंठो के बीच दबा कर अपनी दांतों से हलके हलके काटते हुए मैं उस पर अपने होंठ रगर रहा था. टीट और उसके आस पास ढेर सारा थूक लग गया था और एक पल के लिए जब मैंने वह से अपना मुंह हटाया तो देखा की मेरी चुसाई के कारण टीट चमकने लगी है. एक बार और जोर से टीट को पूरा मुंह में भर कर चुम्मा लेने के बाद मैंने अपनी जीभ को करा करके पूरी चुत की दरार में ऊपर से निचे तक चलाया और फिर चुत के एक फांक को अपने दाहिने हाथ की उँगलियों से पकर कर हल्का सा फैलाया. चुत की गुलाबी छेद मेरी आँखों के सामने थी. जीभ को टेढा कर चुत के मोटे फांक को अपने होंठो के बीच दबा कर चूसने लगा. फिर दूसरी फांक को अपने मुंह में भर कर चूसा उसके बाद दोनों फांक को आपस में सटा कर पूरी चुत को अपने मुंह में भर कर चूसने लगा. चुत से रिस रिस कर पानी निकल रहा था और मेरे मुंह में आ रहा था. चुत का नमकीन पानी शुरू में तो उतना अच्छा नहीं लगा पर कुछ देर के बाद मुझे कोई फर्क नहीं पर रहा था और मैं दुगुने जोश के साथ पूरी चुत को मुंह में भर कर चाट रहा था. दीदी को भी मजा आ रहा था और वही कुर्सी पर बैठे-बैठे अपने चुत्तारो को ऊपर

उछालते हुए वो जोश में आ कर मेरे सर को अपने दोनों हाथो से अपनी चुत पर दबाते हुए बोली बहुत अच्छा कर रहा है....राजा.....हाय......सीईई....बड़ा मजा आ रहा है....हाय मेरी चुत के कीड़े....मेरे सैयां.....ऊऊऊउ...सीईईइ.....खाली ऊपर-ऊपर से चूस रहा है.... बहनचोद....जीभ अन्दर घुसा कर चाट ना.....बूर में जीभ पेल दे और अन्दर बाहर कर के जीभ से मेरी चुत चोदते हुए अच्छी तरह से चाट....अपनी बड़ी बहन की चुत अच्छी तरह से चाट मेरे राजा....माधरचोद....ले ले.....ऊऊऊऊ......इस्स्स्स्स्स...घुसा चुत में जीभ....मथ....दे.......दीदी बहुत जोश में आ चुकी थी और लग रहा था की उनको काफी मजा आ रहा है. उनके इतना बोलने पर मैंने दोनों हाथो की उँगलियों से दोनों फान्को को अलग कर के अपनी जीभ को कड़ा करके चुत में पेल दिया. जीभ को चुत के अन्दर बाहर करते हुए लिबलिबाने लगा और बीच बीच में बूर से चूते रस को जीभ टेढा करके चूसने लगा. दीदी की दोनों जांघे हिल रही थी और मैं दोनों जांघो को कस कर हाथ से पकर कर चुत में जीभ पेल रहा था. जांघो को मसलते हुए बीच बीच में जीभ को आराम देने के लिए मैं जीभ निकल कर जांघो और उसके आस-पास चुम्मा लेने लगता था. मेरे ऐसा करने पर दीदी जोर से गुर्राती और फिर से मेरे बालों को पकर कर अपनी चुत के ऊपर मेरा मुंह लगा देती थी. दीदी मेरी चुसी से बहुत खुश थी और चिल्लाती हुई बोल रही थी "हाय....राजा...जीभ बाहर मत निकालो....हाय बहुत मजा आ रहा है...ऐसे ही.... बूर के अन्दर जीभ डाल के मेरी चुत मथते रहो....हाय चोद....दे माधरचोद....अपनी जीभ से अपनी दीदी की बूर चोद दे....हाय सैयां....बहुत दिनों के बाद ऐसा मजा आया है....इतने दिनों से तड़पती घूम रही थी....हाय हाय....अपनी दीदी की बूर को चाटो….मेरे राजा….मेरे बालम.... तुझे बहुत अच्छा इनाम दूंगी.... भोसड़ीवाले.....तेरा लौड़ा अपनी चुत में लुंगी....आजतक तुने किसी की चोदी नहीं है ना....तुझे चोदने का मौका दूंगी....अपनी चुत तेरे से मरवाऊगीं....मेरे भाई.....मेरे सोना मोना....मन लगा कर दीदी की चुत चाट....मेरा पानी निकलेगा....तेरे मुंह में....हाय जल्दी जल्दी चाट....पूरा जीभ अन्दर डाल कर सीईई.....". दीदी पानी छोरने वाली है ये जान कर मैंने अपनी पूरी जीभ चुत के अन्दर पेल दी और अंगूठे को टीट के उ़पर रख कर रगरते हुए जोर जोर से जीभ अन्दर बाहर करने लगा. दीदी अब और तेजी के साथ गांड उछल रही थी और मैं लप लप करते हुए जीभ को अन्दर बाहर कर रहा था. कुत्ते की तरह से दीदी की बूर चाटते हुए टीट को रगरते हुए कभी कभी दीदी की चुत पर दांत भी गरा देता था, मगर इन सब चीजों का दीदी के ऊपर कोई असर नहीं पर रहा था और वो मस्ती में अब गांड को हवा में लहराते हुए सिसया रही थी "हाय मेरा निकल रहा है....हाय भाई...निकल रहा है मेरा पानी....पूरा जीभ घुसा दे....साले.....बहुत अच्छा....ऊऊऊऊऊ.....सीईईईईईइ....मजा आ गया राजा...मेरे चुत चाटू सैयां....मेरी चुत पानी छोर रही है...........इस्स्स्स्स्स्स्स्स......मजा आ गया....बहनचोद....पी ले अपनी दीदी के बूर का पानी....हाय चूस ले अपनी दीदी की जवानी का रस.....ऊऊऊऊ.......गांडू......" दीदी अपनी गांड को हवा में लहराते हुए झरने लगी और उनकी चुत से पानी बहता हुआ मेरी जीभ को गीला करने लगा. मैंने अपना मुंह दीदी की चुत पर से हटा दिया और अपनी जीभ और होंठो पर लगे चुत के पानी को चाटते हुए दीदी को देखा. वो अपनी आँखों को बंद किये शांत पड़ी हुई थी और अपनी गर्दन को कुर्सी के पुश्त पर टिका कर ऊपर की ओर किये हुए थी. उनकी दोनों जांघे वैसे ही फैली हुई थी. पूरी चुत मेरी चुसाई के कारण लाल हो गई थी और मेरे थूक और लार के कारण चमक रही थी. दीदी आंखे बंद किये गहरी सांसे ले रही थी और उनके माथे और छाती पर पसीने की छोटी-छोटी बुँदे चमक रही थी. मैं वही जमीन पर बैठा रहा और दीदी की चुत को गौर से देखने लगा. दीदी को सुस्त परे देख मुझे और कुछ नहीं सूझा तो मैं उनके जांघो को चाटने लगा. चूँकि दीदी ने अपने दोनों पैरों को मोड़ कर जांघो को कुर्सी के पुश्त से टिका कर रखा हुआ था इसलिए वो एक तरह से पैर मोड़ कर अधलेटी सी अवस्था में बैठी हुई थी और दीदी की गांड मेरा मतलब है चुत्तर आधी कुर्सी पर और आधी बाहर की तरफ लटकी हुई थी. ऐसे बैठने के कारण उनके गांड की भूरी छेद मेरी आँखों से सामने थी. छोटी सी भूरे रंग की सिकुरी हुई छेद किसी फूल की तरह लग रही थी और लिए अपना सपना पूरा करने का इस से अच्छा अवसर नहीं था. मैं हलके से अपनी एक ऊँगली को दीदी की चुत के मुंह के पास ले गया और चुत के पानी में अपनी ऊँगली गीली कर के चुत्तरों के दरार में ले गया. दो तीन बार ऐसे ही करके पूरी गांड की खाई को गीला कर दिया फिर अपनी ऊँगली को पूरी खाई में चलाने लगा. धीरे धीरे ऊँगली को गांड की छेद पर लगा कर हलके-हलके केवल छेद की मालिश करने लगा. कुछ देर बाद मैंने थोरा सा जोर लगाया और अपनी ऊँगली के एक पोर को गांड की छोटी सी छेद में घुसाने की कोशिश की. ज्यादा तो नहीं मगर बस थोड़ी सी ऊँगली घुस गई मैंने फिर ज्यादा जोर नहीं लगाया और उतना ही घुसा कर अन्दर बाहर करते हुए गांड की छेद का मालिश करने लगा. बड़ा मजा आ रहा था. मेरे दिल की तम्मना पूरी हो गई. बाथरूम में नहाते समय जब दीदी को देखा था तभी से सोच रहा था की एक बार इस गांड की दरार में ऊँगली चलाऊंगा और इसकी छेद में ऊँगली डाल कर देखूंगा कैसा लगता है इस सिकुरी हुई भूरे रंग की छेद में ऊँगली पेलने पर. मस्त राम की किताबों में तो लिखा होता है की लण्ड भी घुसेरा जाता है. पर गांड की सिकुरी हुई छेद इतनी टाइट लग रही थी की मुझे विश्वास नहीं हो रहा था की लण्ड उसके अन्दर घुसेगा. खैर दो तीन मिनट तक ऐसे ही मैं करता रहा. दीदी की बूर से पानी बाहर की निकल कर धीरे धीरे रिस रहा था. मैंने दो तीन बार अपना मुंह लगा कर बाहर निकलते रस को भी चाट लिया और गांड में धीरे धीरे ऊँगली करता रहा. तभी दीदी ने मुझे पीछे धकेला "हट...माधरचोद....क्या कर रहा है....गांड मारेगा क्या....फिर अपने पैर से मेरी छाती को पीछे धकेलती हुई उठ कर खड़ी हो गई. मैं हड़बड़ाता हुआ पीछे की तरफ गिरा फिर जल्दी से उठ कर खड़ा हो गया. मेरा लण्ड पूरा खड़ा हो कर नब्बे डिग्री का कोण बनाते हुए लप-लप कर रहा था मगर दीदी के इस अचानक हमले ने फिर एक झटका दिया. मैं डर कर दो कदम पीछे हुआ. दीदी नंगी ही बाहर निकल गई लगता था फिर से बाथरूम गई थी. मैं वही खड़ा सोचने लगा की अब क्या होगा. थोड़ी देर बाद दीदी फिर से अन्दर आई और बिस्तर पर बैठ गई और मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा फिर मेरे लपलपाते लण्ड को देखा और अंगराई लेती हुई बोलीबहुत मजा आया....अच्छा चूसता है...तू.... "मुझे लग रहा था की तू अनारी होगा मगर तुने तो अपने बहनोई को भी मात कर दिया....उस साले को चूसना नहीं आता था...खैर उसका क्या...उस भोसड़ीवाले को तो चोदना भी नहीं आता था....तुने चाट कर अच्छा मजा दिया... इधर आ,……आ ना...वहां क्यों खड़ा है भाई.....आ यहाँ बिस्तर पर बैठ...."
 
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