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Holi sexi stories-होली की सेक्सी कहानियाँ

ननद ने खेली होली--12

दोनों हाथों से मैने उनकी कलाइयां कस के पकड के आंगन के फर्श पे दबा रखी थीं। उनकी दो चार चुडीयां भी टूट गईं पर मैने पकड ढीली नहीं की।

आप कहें की रंग...तो ननद भाभी की होली में रंग की जरूरत थोडे ही पडती है। ननदोई जी ने मेरी चूंचीयों पे इतना रंग लगा रखा था....एक नहीं कई ननदों पे लगाने के लिये काफी था।

अपनी कडी कडी रंग लगी चूंचिया मैं उनकी गदराई चूंचीयों पे रगड रही थी। कस के अपनी छाती से उनकी छाती दबाती हुई बोली, क्यों ननदोई जी ऐसे ही दबाते हैं क्या...'

अरे बगल में ही तो हैं दबवा के देख लो ना...सच में बडा मजा आयेगा...जवाब में नीचे से छाती रगडते हुये बोली।

मैने अपनी जांघों के बीच उनकी जांघे दबा रखी थीं और चुत से कस के उनकी चूत पे घिस्से मार मार के....हम दोनों की ही हालत खराब हो रही थी

ऐसी मस्त चूत है ननद रानी एक बार मेरे सैंया से मरवा के देख लो ना...मैने फिर चिढाया.।

वही गलती मैने की ...ज्यादा बोलने की मेरी हाथ की पकड थोडी ढीली हुई और उन्होने एक घुटबे से मेरे पेट में धक्का दिया और छुडा के ...मैं नीचे। लेकिन नीचे से भी मैं बेकाबू थी...मेरे हाथ उनकी भरी भरी चूंचीयां दबा रहे थे...मेरे होंठ कच कचा के निपल काट रहे थे। बस ये समझिये की आप औरतों की ड्ब्लू ड्ब्लू ई देख रहे हों....बस फरक यही था की दोनों बिना कपडों के हो, होली के रंगों से सराबोर और एक से एक गालियां दे रही हों।

थोडी देर में मैं उपर थी...उनके सीने पे चढी एक हाथ गले पे और दूसरा चूत पे ...दो उंगलियां अंदर।

ननद रानी मैं बोर्डिंग में थी और रैगिंग के जमाने से ले के...लास्ट इयर तक लेस्बियन रेस्लिंग क्वीन थी....बोली मैं।

अरे तो मैं भी कुछ कम नहीं थी..चल ऐन होली के दिन मुकाबला होगा आंगन में...और कोई बीच में नहीं आयेगा....मंजूर...उन्होने चैलेंज दिया।

मंजूर ....लेकिन हारने वाली को मुहल्ले के हर मर्द से चुदाना होगा जो होली में आयेगा...मैने दांव बताया।

एकदम ...हंस के उन्होने दांव कबूल कर लिया।

सब मतलब सब....आंख नचा के मैं बोली।

समझती हूं मैं ...छिनाल तेरी चालाकी लेकिन एक बार जुबान दे दी तो दे दी....मंजूर है।

लुढकते हुये हम लोग एक दम नन्दोइ जी के बगल में आ गये थे लेकिन मेरा ध्यान तो नीचे पडी ननद रानी पे था।

अरे भाभी ....मुहल्ले के मर्दों की चिंता बाद में करना जरा ये बगल में तो....इनका तो इलाज करो।

रंगों से लिपटे नन्दोई जी आंगन में...लेटे और उनका बित्ते भर का खडा लंड हवा में लोह की खंभे की तरह..।

अरे एक दम सलह्ज नहीं करेगी तो कौन करेगी....बीबी तो साले से फंस गयी है.....क्यों ननदोई जी और उठ के मैं सीधे टांगे फैला के उनके लंड के उपर...खुला मोटा सुपाडा मेरी चूत को रगड्ता हुआ...थोडा सा दबा के मैने आधा सुपाडा अंदर किया फिर रुक गई...और चूत से कस कस के सुपाडा भींचने लगी।

नन्दोई जी की आंखॊ में न जाने कब की भूख पूरी होने की खुशी साफ झलक रही थी। उन्होने कच कचा के मेरे उभार पकड लिये और बोले अब आयेगा मजा ससुराल की होली का।

एक दम नन्दूई जी कह के मैने उनके दोनों कंधे पकड के कस के धक्का मारा और आधे से ज्यादा लंड, मेरी चूत में रगडता, घिसता....अंदर पैबस्त हो गया।

क्यों मजा आ रहा है....मेरे मर्द से चुदवाने में....बगल में ध्यान से देख रही लाली ने पूछा।

अरे आपके मर्द कहां...मेरे नन्दोइ हैं..हां वैसे मैं अपने मर्द को भी नन्दोइ बनाने को तैयार हूं.क्यों नन्दोइ जी हो जाए इस होली में एक दिन बद के.....मैं इनके सैंया के साथ और ये मेरे सैंया के साथ ....अगल बगल।

एक दम मुझको मंजूर है कह के कस के उन्होने मेरी चूंचियां दबा के जोर से नीचे धक्का दिया।

क्या जोर था उनके हाथों में जिस तरह पूरी ताकत से वो मेरी चूंचीयां भींच रहे थे मसल रहे थे....और लंड भी इतना कडा और मस्त....लेकिन मैने और आग लगाई,

अरे ननदोई जी क्या मेरी ननद की ननद की चूत समझ रखी है....अपनी छोटी बहन हेमा की....अरे लडकियों की चुदाई और एक औरत की चुदाइ में जमीन आसमान का फर्क है।

अच्छा बताता हूं तुझे और एक झटके में उन्होने मुझे नीचे कर दिया...मेरी जांघे फैला के वो करारा धक्का दिया की मुझे दिन में भी तारे नज्रर आ गये।

क्यों आया मजा भाभी, लाली बोली,

उंह कुछ खास नहीं, ननद रानी....एक बार जब तुम मेरे सैंयां का लंड घोंट लोगी ना तो पता चलेगा, मर्द का लंड क्या होता है...मैने और मिर्चें लगाईं।

फिर तो एक हाथ से उन्होने मेरी क्लिट दूसरे से एक निपल पिंच करने शुरु किये...और दूसरा निपल मुंह में...क्या मस्त चुसाइ कर रहे थे नन्दोइ और साथ में इंजन के पिस्टन की तरह...मूसल अंदर बाहर।

हां अब लग रहा है की नन्दोइ जी को बचपन से उनकी मां बहनों ने अच्छी तरह ट्रेन किया है...हां हां...ओह....मेरे मुंह से मजे से सिसकियां निकल रही थीं।

अरी बहनचोद मां तक पहुंच गई अब बताता हूं....तेरी चूत को चोद चोद के भॊसडा ना बना दिया ...ऐसा झाडुंगा की हफ्ते भर तक सडका टपकता रहेगा,,,और फिर मेरए दोनों पैरों को मोड के दुहरा कर दिया और पैरों को एक दम सटा के...,मेरी कसी चूत और संकरी हो गई...और उसमें उनका मूसल जैसा लंड...दोनो भरे भरे चूतडों को पकड वो करारा धक्का दिया की चोट सीधे बच्चे दानी पे लगी।

अरे तेरी छिनाल मां के गुन नहीं गाउंगी तो किसके गाउंगी...ना जाने मेरी ननद की सासु जी ने किस घुड साल में गधों की गली में जा जा के चुदवाया होगा की ये गधे घोडे के लंड वाला लडका हुआ, जो चोद चोद के मेरी छिनाल ननदों को...ओह काटो नहीं...नन्दोई जी ने कस के मेरे गदराये जोबन पे दांत गडा दिये थे।

ले ले..अरे अभी तो सलहज रानी तुम्हारी चूत चोद रहा हूं...फिर तेरी गांड मारुंगा फिर तेरे इन मस्त मम्मों के बीच ...हचक हचके के चोदते नन्दोइ जी बोले।

मुझे बहोत मजा आ रहा था....एक तो ५-६ दिन के उपवास के बाद आज चूत को भोजन मिल रहा था और फिर नन्दोइ बेचारे पहले तो बीबी के डर के मारे भीगी बिल्ली बन रहे थे और अब जब एक बार मैने उन्हे वश में कर लिया तो....उन्ही के सामने इस तरह...हचक के चोद रहे थे..।

अरे चोदो ना नंदोई जी चूत चोदो गांड मारो....आज मेरी इस गरमागरम चूत को अपने हलब्बी लंड से चोद दो....मैं अपनी कसी चूत कस के उनके लंड पे भींच रही थी, चूंचियां उनके सीने से रगड रही थी...।

तब तक हर हर....बाल्टी से हरे रंग की धार...पूरी की पूरी बाल्टी....मेरी चूंचियों पे ..।



अचानक मैने देखा, गुड्डी नहीं दिख रही थी...चारो ओर मैने और नजर घुमाइ....मेरे सैंया जी लापता थे....तो इसका मतलब भाई बहन...मौके का फायदा उठाया जा रहा था। चार बार चूत चुद चुकी थी...लेकिन मन नहीं भरा था...मेरी असली ननद थी...और मौका भी तो होली का था।

मैं ननदोई जी के नीचे दबी थी और वो हचक हचक के चोद रहे थे। साथ में मौके का फायदा उठा के लाली, मेरी बडी ननद, आंगन में बह रहे रंग को उठा उठा के मेरी चूंचीयों पे लगा रही थीं, फिर हाथ में लाल रंग कस के लगा के उन्होने मेरी चूचीयों पे पोत दिया। मैं भी हंस हंस के पुतवाती रही। और जैसे ही वो हटीं, मैने कस के जीत को अपनी बांहों में भींच लिया और मेरे रसीले जुबना पे लगा रंग ननदोई जी के सीने पे, दोनों पैरों को मैने उनके कमर पे भींच लिया और कस क्स के लिपट के अपनी देह का सारा रंग उनकी देह में...साथ में मेरी चूत कस के उनकी पिचकारी को भींच रही थी, चूत लंड पे रगड रही थी और जम के गालियां दे रही थी।

अरी मेरे ननद के ननद के यार, बहन के भंडुए अपने मायके में बहनों के साथ बहोत होली खेली होगी उस हेमा छिनाल की उभरती चूंचियों पे बहोत रंग लगाया होगा लेकिन ऐसी नहीं खेली होगी आंगन में खुल के।

एक दम सलहज जी तभी तो होली में ससुराल आया हूं.....और उन्होने वो हचक के चोदना शुरु किया...आधे घंटे के बाद ही वो झडे और उस समय तक हम दोनों लथ पथ हो गये थे। पहले तो दूबे भाभी के यहां ननद जी के साथ होली और फिर घर लौट के नन्दोई जी के साथ होली..।

जब मेरी जान में जान आई तो मेरी जांघों के बीच गाढा थक्केदार वीर्य बह रहा था और नन्दोई जी बगल में बैठे थे।

लाली चलने के लिये कहने लगी तो मैं नन्दोइ जी की ओर इशारा कर के कहने लगी और इनके कपडे ...वो तो चिथडे हो गये हैं।

तब तक गुड्डी भी आ गई। वो बोली अरे जीजू ऐसे ही चल चलेंगें।

अरे तू तो जानती नहीं, तेरे जीजू इतने चिकने हैं, और इस हालत में....रास्ते में एक से एक लौंडे बाज रहते हैं...मार मार के इनकी गांड इतनी चौडी कर देंगे की जितनी इनकी मां का भॊंसडा भी नहीं होगा। हां जो हमारे पास होगा वही तो पहनायेंगे।

एक दम भाभी, गुड्डी मेरा मतलब समझ के बोली। और फिर थोडी देर में उनकी बीबी का पेटीकोट, मेरी साडी और ब्रा....साथ में पूरा सिंगार, हाथों में चूडियां,नेल पालिश, पैरों में महावर, पायल और बिछुये, होंठों पे लिप स्टिक, माथे पे बिंदी, गले में माला...साथ में हम सब गा भी रहे थे..।

रसिया को नार बनाउंगी, रसिया को,

सिर पे उढाय सुरंग रंग चुनरी गले में माल पहनाउंगी, रसिया को।

हां ब्लाउज स्पेशल था.। सफेद और उस पे रंग से उनकी छोटी बहन हेमा के रेट लिखे हुये थे, चार आने चूंची दबवाने के, आठ आने एक बार चुद्ववाने के पांच रुपये में रात भर...और ढेर सारी गालियां

तब तक वो भी आ गये थे और बोले की अरे शाम हो गई है चाय वाय हो जाय। मैने गुड्डी को इशारा किया और थोडी ही देर में वो चाय और पकौडे ले आये।

थोडी देर में पकौडों ने असर दिखाना शुरु किया...किसी को नहीं मालूम था सिवाय मेरे और गुड्डी के।

और होली हो नाच गाना ना हो।

 
ननद ने खेली होली--13

पहले तो नन्दोई जी के ही पैरों में घुंघरु बांधे गये। साडी ब्लाउज में गजब के लग रहे थे। खूब ठुमके दिखाये उन्होने। उसके बाद हम लोग...।

होली का सदा बहार गीत...रंग बरसे भीगे चुनर वाली...रंग बरसे...और शुरु मैने ही किया...खूब अदा से ...।

अरे सोने के थाली में जेवना परोसों अरे...( और फिर मैने लाइन थोडी बदल दी और ननदोई जी के गोद में जा के बैठ गई)

अरे सोने के थाली में जुबना परोसों अरे जोबना परोंसों...( और दोनॊ हाथॊ से अपने दोनो उभार उठा के सीधे ननदोई जी के होठों पे लगा दिया)

अरे जेवे ननद जी का यार बलम तरसै...बलम तरसैं...ननदोई जी को दोनों हाथॊ से पकड के उनकी ओर देख के..।

फिर ननद जी का नम्बर आया तो उन्होने..।

पान इलाची का बीडा लगायों गाया और खिलाया भी अपने सैंया कॊ भी और भैया को भी।

लेकिन मजा आया गुड्डी के साथ ...उसने बडी अदा से छोटे छोटे चूतड ,मटकाते हुये ठुमके लगाये...और गाया..।

अरे बेला चुन चुन सेजियां सेजियां लगाई, अरे सेजियां लगाई..।

मैं सोच रही थी की देखें वो किसका नाम लेती ही लेकिन पहले तो उसने अपने जीजू कॊ खूब ललचाया रिझाया फिर मेरे सैंया की गोद में बैठ के लाइन पूरी की,

अरे सोवे गोरी का यार जीजा तरसैं...अरे सोवे मेरा यार..।

ननदोई जी ने मुझे चैलेंजे किया, अरे होली के गाने हों और जोगीडा ना हो कबीर ना हो...ये फिल्मी विल्मी तो ठीक है...।

मैने पहले तो थोडा नखडा किया फिर लेकिन शर्त रखी की सब साथ साथ गायेंगे खास के नन्दोई जी और वो ढोलक भी बजायेंगे...।

उन्होने ढोलक पकडी और लाली ननद जी ने मंजीरे,

मैने गाना शुरु किया और गुड्डी भी साथ दे रही थी..।

अरे होली में नंदोई जी की बहना का सब कोइ सुना हाल अरे होली में,

अरे एक तो उनकी चोली पकडे दूसरा पकडे गाल,

अरे हेमा जी का अरे हेमा जी का तिसरा धईले माल...अरे होली में..।

कबीरा सा रा सा रा..।

हो जोगी जी हां जॊगी जी

ननदोई जी की बहना तो पक्की हईं छिनाल..।

कोइ उनकी चूंची दबलस कोई कटले गाल,

तीन तीन यारन से चुद्व्वायें तबीयत भई निहाल..।

जोगीडा सा रा सा रा

अरे हम्ररे खेत में गन्ना है और खेत में घूंची,

लाली छिनारिया रोज दबवाये भैया से दोनों चूंची,

जोगीडा सा रा सा रा...अरे देख चली जा..।

चारो ओर लगा पताका और लगी है झंडी,

गुड्डी ननद हैं मशहूर कालीन गंज में रंडी...।

चुदवावै सारी रात....जोगीडा सा रा रा ओह सारा.।

ओह जोगी जी हां जॊगी जी,

अरे कहां से देखो पानी बहता कहां पे हो गया लासा...अरे

अरे लाली ननद की लाली ननद की बुर से पानी बहता

और गुड्डी की बुर हो गई लासा..।

एक ओर से सैंया चोदे एक ओर से भैया..।

यारों की लाइन लगी है

....जरा सा देख तमाशा

जोगीडा सा रा सा रा.। .।

और इस गाने के साथ मैं और गुड्डी जम के अबीर गुलाल उडा रहे थे और एक बार फिर से सूखे रंगों की होली शुरु हो गई।

बेचारे जीत नन्दोइ जी को तो हम लोगों ने इस हालत में छोडा नहीं था की वो ड्राइव कर पाते, इसलिये ये ही लाली, जीत और गुड्डी को छोडने गये। उसके बाद से उन्हे अल्पी और क्म्मॊ को ले के शापिंग पे जाना था।

मैं बेड रूम में जा के लेट गई। डबल होली में, ननद और ननदोइ दोनों के साथ मजा तो बहोत आया लेकिन मैं थोडी थक गई थी।

जब हम लोग दूबे भाभी के यहां होली खेल रहे थे और यहां गुड्डी की रगडाइ हो थी, वो सब कैमरे में रिकार्ड करवा लिया था कैसे अपने भैया और जीजू के साथ , एक साथ। मैनें देखना शुरु किया, थोडा फास्ट फारवर्ड कर के , थोडा रोक रोक के। वो सीन बहोत जोरदार था जब मेरी ननद रानी, वो किशोर किसी एक्स्पर्ट की तरह दो दो लंड को एक साथ....जीत का लंड उसने मुंह में लिया था और अपने भैया का मुठीया रही थी। और फिर दोनों लंड को ...बारी बारी से ...जीभ निकाल के जैसे कॊइ लडकी एक साथ दो दो लालीपाप चाटे...उसकी जीभ लपट झपट के पहले मेरे सैंया के सुपाडे के चारो ओर ...और फिर ननदोइ जी के ...उसके जवान होठ गप्प से सुपाडे को होंठॊ में भर लेते, दबा देते, भींच लेते...और जीभ पी होल को छॆडती...और जिस तरह से प्यार से उसकी बडी बडी कजरारी आंखे...चेहरा उठा के वो देखती...जब चूसते चूसते गाल थक जाते तो अपने टेनिस बाल साइज के छोटे छोटे कडे जोबन के बीच दबा के लंड को रगडती...अकेली उस लडकी ने दोनों मदों की हालत खराब कर रखी थी। चल मैं सोच रही थी...३ दिन की बात और है। नरसों होली है और उसके अगले दिन सुबह ही इस बुलबुल को ले के हम फुर हो जायेंगें। साल भर की कोचिंग में नाम लिखवाना है उसका, लेकिन असली कोचिंग तो उसे मैं दूंगी। लंड की कोई कमी नहीं होगी..एक साथ दो तीन...हरदम उसकी चूत से वीर्य बहता रहेगा।

आज दूबे भाभी ने क्या कया करम नहीं किए लाली ननद के और उसके बाद वो एक दम सुधर गईं। कहां तो वो ननदोई जी को गुड्डी पे हाथ नहीं डालने दे रही थीं और कहां उनके सामने उनकी छोटी बहन ने अपने जीजू का लंड न सिर्फ चूसा, बल्की उनसे कहलवाया भी। और उनके भैया के सामने नंगा करके मैने क्या कुश्ती लडी...अरे होली में ये सब ना हो तो मजा कया है। तब तक वो सीन आ गया जिसमें गुड्डी की सैंड विच बनी। एक एक बार दोनों से चुद चुकी थी वो। दोनों का लंड चाट चाट के फिर उसने खडा कर दिया था। और अबकी उसके भैया ने लेट के उसे अपने उपर ले लिया...खूब मजे से वो छिनार उनका इतना मोटा लंड घोंट गई....खैर चिल्लाती भी कैसे उसके मुंह में उसके जीजा लंड पेल रहे थे और दोनों हाथों से उसके कंधे को पकड के राजीव के लंड के उपर उसे कस के दबा भी रहे थे।

राजीव भी उसकी पतली कमर को पकड के पूरी ताकत से उसे अपनी ओर खींच रहे थे और इंच इंच कर के उस छिनाल ने वो लंड घॊंट ही लिया। पी र्कैसे आराम से खुद ही उपर नीचे कर के ...चूत में दो बार की चुदाइ का माल भरा था..इस लिये खूब सटासट जा रहा था। नन्दोई जी मेरे सैंया को आंख मारी और उन्होने पूरी ताकत से खींच के उसे अपनी ओर कर लिया। पीछे से नन्दोई जी गांड सहला रहे थे....कितने दिनों से वो उसकी इस छोटी छोटी कसी गांड के दीवाने थे...और उसे पता तो चल ही गया होगा खास कर जब उन्होने थूक लगा के उसकी गांड की दरार पे उंगली रगडनी चालू कर दी। खूब क्रींम लगाया उन्होने अपने सुपाडे में ...नन्दोई जी का खूब मोटा है लेकिन राजीव से १८ होगा...इसी लिये मैने राजीव को मना किया था...उनका तो मेरी मुट्ठी इतना होगा।

 
ननद ने खेली होली--14

मैने प्लान बना रखा था जब ये हम लोगों के साथ रहेगी....मैं अपने उपर लेके अपनी चूंची उसके मुंह में घुसेड के राजीव से उसकी गांड मरवाउंगी, अपने सामने...और सिर्फ थूक लगा के। अरे गांड मारी जाय ननद की और चीख चिल्लाहट ना हो दर्द ना हो...तो क्या मजा। चीख तो वो अभी भी रही थी, लेकिन राजीव ने उसके मुंह में जीभ डाल के उसे बंद कर दिया। नन्दोई जी भी सुफाडा ठेल के रुक गये। वो गांड पटकती रही छटपटाती रही, लेकिन एक बार गांड के छल्ले को लंड पार कर ले ना फिर तो...उसके बाद धीरे धीरे आधा लंड...नीचे से राजीव धक्का दे रहे थे और उपर से ....कभी बारी बारी से कभी साथ साथ...वो चीख रही थी, सिसक रही थी...उसके बाद दो बार और चुदी वो। और राजीव उसके भैया जब उसके मुंह में झडे तो साल्ली....पूरा गटक गई। एक बूंद भी बाहर नहीं। और मैं कब सो गई पता नहीं।

अगले दिन दिया आइ, गुड्डी और अल्पी की सहेली। मैने बताया था ना की ननद की ट्रेनिंग में...गुड्डी की सहेली जो अपने सगे भाई से फंसी थी और जिसको देख के राजीव का टन टना गया था और उसकी भी गीली हो गई थी।

खूब गदराइ, गोरी, जब से चूंचिया उठान शुरु हुआ था नौवें -दसवें क्लास से ही दबवा मिजवा रही थी। इसलिये खूब भरे भरे....( अरे जोबन तो आते ही हैं मर्दों के लिये फालतू में लडकियां इतना बचा छुपा के रखती हैं, मेरी एक भाभी कहती थीं), शोख धानी शलवार, कुर्ता।

गुड्डी आई है क्या...उसने पूछा। लेकिन उसकी चपल आंख टेबल पे पडी प्लेट में गुलाल अबीर पे थी ( होली शुरु हो चुकी थी, इस लिये मैं प्लेट में गुलाल अबीर जरूर रखती थी और नीचे छुपा के पक्के रंग)।

पहले तू ये बता की तू सहेली किसकी है फिर मैं रिश्ता तय कर के आगे बरताव करुं। हंस के मैं बोली। अल्पी को मेरी बहन बनने की और राजीव को जीजू बना के, उनके साथ उसके मजे लेने की खबर उसकी सारी सहेलियों को लग चुकी थी।

देखिये भाभी ...गुड्डी मेरी पक्की सहेली है इसलिये आपको तो मैं भाभी ही कहुंगी और मेरा आपका तो रिश्ता पहले दिन से ही ननद भाभी का है, लेकिन अल्पी मेरी अच्छी सहेली है और जो उसके जीजू वो मेरे जीजू...और जो उसका हक जीजू पे वो मेरा...खास तौर से फागुन में तो जीजा साली का ...मुस्करा के वो बोली।

तो फिर भाभी से ...थोडा सा लगवा लो...हाथ में गुलाल ले के उसके गोरे गदराये गालों की ओर बढी।

ना ना भाभी ...आज नहीं होली के दिन..। होली के दिन आप चाहे जितना डालियेगा मैं मना नहीं करुंगी। उसने नखडा बनाया।

अरे चल जरा सा बस सगुन के लिये...और मैने थोडा सा गुलाल गाल में लगा दिया। देख कितना सुंदर लगता है तेरे गोरे गाल पे ये गुलाल...और फिर मैने एक चुटकी माथे पे भी लगा दिया और फिर दुबारा गाल पे लगा के अबकी कस के मीज दिया। कितने मुलायम गाल हैं, इनके और नन्दोई जी के हाथ आ गये तो कच कचा के काटे बिना छोडेंगे नहीं, और कस कस के मसलेंगें।

झुक के प्लेट से उसने भी अबीर उठा ली...थोडा मैं भी तो लगा दू और मेरे चेहरे पे लगाने लगी।

गाल से मेरा हाथ गले पे आ गया। हल्का सा गुलाल मैने वहां भी लगा दिया।

वो मेरा इरादा सम्झ गई और जोर से उसने दोनो हाथ गले के पास ला के मेरा हाथ रोकने की कोशिश की, नहीं भाभी वहां नहीं।

क्यों वहां कोई खास चीज है क्या और उसके रोकते रोकते....मैं बहोत ननदों से होली खेल चुकी थी...मेरा हाथा सीधे उसके कबूतर पे..।

क्या मस्त उभार थे, इस उमर में भी आल्मोस्ट मेरी साइज के...खूब कडे...मेरे हाथ पहले उसके उरोज के उपर के हिस्से पे...एक बार होली में जब हाथ ब्रा के अंदर घुस जाय तो निकालना मुश्किल होता है....और थोडी देर में ही मेरा हाथ कस कस के मींज रहा था, दबा रहा था, चल तेरे जीजू जबतक नहीं आते भाभी से ही काम चला मैने चिढाया.।

धत्त भाभी...मैने ऐसा तो नहीं कहा था...बस हो गया प्लीज ....हाथ ....निकाल....ओह ..ओह..।

चल तू भी क्या याद करेगी किस सीधी भाभी से पाला पडा था और मैने हाथ ब्रा से तो निकाल लिया लेकिन उस हाथ से उसका कुर्ता पूरी तरह फैला के रखा और दूसरे हाथ से बडी प्लेट का गुलाल उठा के ( उसमें पक्का सूखा लाल रंग भी मिला हुआ था) सीधे उसके कुर्ते के अंदर...ब्रा ....ब्रा के अंदर लाल...लाल। अ

अरे एक गलती हो गई...ननद की मांग तो भरी ही नहीं...और ढेर सारा गुलाल ...उसकी मांग में...अब चल तेरी मांग मैने भरी है, तो सुहाग रात भी मैं मनाउंगी मैने चिढाया।

भाभी अब मुझे भी तो लगाने दीजिये...वो बोली।

एक् दम बोल कहो कहां लगाना है और मैने खुद आंचल हटा दिया, मेरे लो कट ब्लाउज से....वो गाल ...गले से होते हुए मेरे उभार तक..।

और मौके का फायदा उठा के मैने उसके कुर्ते के सारे बटब खॊल दिये...ब्रा साफ साफ दिख रही थी। गुलाल से रंगी...।

मैने तेरे एक कबूतर पे तो गुलाल लगाया दूसरे पे नहीं ...और मैने अबकी खुल के अंदर हाथ डाल के उसका दूसरा जोबन पकड लिया।

मेरा दूसरा हाथ उसके शलवार के नाडे पे था।

१० मिनट के अंदर हम दोनों के कपडे दूर पडे थे,,,अबीर गुलाल से लथ पथ...हम दोनो सिक्स्टी नाइन की पोज में....मेरी जीभ उसकी जांघॊं के बीच में और उसकी मेरी ...जैसे अखाडे में लड रहे पहलवानों की देह धूल मिट्टी में लिपटी रह्ती है...उसी तरह गुलाल अबीर में लिपटी हम ननद भौजाइ, एक किशोरी एक तरुणी..।

गुलाल से सने मेरे दोनों हाथ अभी भी उसके चूतड रंग रहे थे और जीभ....कभी उसकी लेबिया को फ्लिक करती, कभी क्लिट को...।

और दिया उमर में कम भले हो लेकिन अनुभव में कम नहीं लग रही थी। उसके भी हाथ, उंगलिया, जीभ मेरे तन मन को रंग रहे थे।

हम दोनों एक दूसरे को किनारे पे पहुंचाते पहुंचाते रुक जाते...और फिर से शुरु हो जाते।

तभी मुझे जीत और इनकी आवाज सुनाई पडी...।

आ जाओ तुम दोनों के लिये गिफ्ट है ...मैने हंस के दावत दी।

और राजी्व ने तो जब से पहली बार दिया को देखा था तब से...उनका उसके लिये तन्नाया था। वो मेरे सर की ओर आये । एक हाथ से मैने दिया की लेबिया कस के फैलाई और राजीव का बीयर कैन ऐसा मोटा लंड पकड के उसकी चूत में लगा दिया। राजीव ने कस के उसके दोनों किशोर चूतड पकडे और पूरी ताकत से एक बार में अपना हलब्बी लौंडा पेल दिया।

उईईईईईईईईईईईई माआआआआं......हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला।

पीछे से नन्दोई जी ने अपना लंड मेरी चूत में पेल दिया था। फिर तो दोनों ने हम दोनों की एक साथ हचक हचक के वो चुदाइ की...सिक्स्टी नाइन करते चुदवाने का ये मेरा पहला मौका था.।

मैं राजीव के मोटे लंड को दिया की चूत में रगडते, फैलाते घुसते देख रही थी.।

मेरी जीभ अब भी चुप नहीं थी....वो अब राजीव के मोटॆ चिकने लंड को चाट रही थी जब तक वो दिया की कसी चूत में कच कचा के घुसता...और जब पूरा लंड दिया की चूत में होता तो मेरे होंठ कस के उसकी क्लिट को चूसते, भींचते और हल्के से काट लेते.।

दिया की जीभ भी यही बदमाशियां कर रही थी। मैं मजे से एक साथ ननद और ननदोइ का मजा लूट रही थी होली में...और आधे घंटे की नान स्टाप चुदाइ के बाद हम चारों एक साथ झडे।

 
ननद ने खेली होली--15

जब दिया उठी तो उसने एक खुश खबरी दी...अल्पी और गुड्डी के क्लास की आज फेयर वेल थी और उसकी तीन सहेलियां आ रही थी होली खेलने, मधु, शिखा और नीतू।

चलो तैयार हो जाओ तुम दोनॊं...मैने उनसे और ननदोई जी से कहा।

एक दम फटा फट...और दोनो गायब हो गये।

थोडी देर में तूफान की तरह तीनों दाखिल हुयीं।

जैसे गुलाल और अबीर के इंद्र धनुष आ गयें हो लाल गुलाबी पीले धानी चुनरियां दुपटे...और दिया भी उनके साथ शामिल हो गई।

मधु टाप और जीन्स में, शिखा चुनरी और चोली में और नीतू स्कूल के सफेद ब्लाउज और स्कर्ट में....।

रंग, गुलाल से लैस हाथों में पहले से रंग लगाये..।

ब्रज में आज मची होरी ब्रज में...।

अपने अपने घर से निकरीं कोई सांवर कोई गोरी रे...।

कोइ जोबन ...कोइ उमर की थोरी रे..।

और ये और जीत भी सफेद कुर्ते पाजामें में बेकाबू हो रहे थे।

हे नहीं मैने उन सबों के अरमानों पे पानी फेर दिया, चलो पहले एक दो मेरे साथ किचेन में हेल्प कराओ और हां रंग वंग सब पीछे....पहले मैं अपनी ननदों कॊ खिला पिला लूंगी फिर होळी और ....उन लडकियों से मैने पूछा, तुम लोग तो सिर्फ ननदोइ जी से खेलोगी ये तो तुम्हारे भाई लगेंगें।

नहींंंंंंंंंंंं अब समवेत स्वर में चिल्लाइं। अल्पी के जीजू तो हमारे भी जीजू।

गुड्डी तो मुझे मालूम था की नहीं आयेगी। उसकी बडी बहन लाली ने तय किया था की वो आज ही होली का सब काम खतम कर लेंगी और कल सिर्फ औरतों लडकियों की होली...और उसमें वो लेसबियन कुश्ती ...भी होनी थी ....मेरी और लाली की...तो कल तो टाइम मिलता नहीं...पर अल्पी...मेरे पूछे बिना नीतू बोली, भाभी वो थोडी थकी थकी लग रही थी...फिर उसको भी घर जल्दी लौटना था। मैं समझ गई कल इन्होने वो हचक के उसे चोदा था ....होली थी ...छोटी साली थी और फिर कल की गुड्डी के घर होने वाली होली में मेरी असिस्टेंट तो वहॊ थी। तो उसे भी होली का सब काम आज ही निपटाना था।

किचेन में ढेर सारी गरम गुझिया बना के मैं और नीतू बाहर आये तो वहां दिया, शिखा और मधु ने सब इंतजाम कर दिया था। घर के पिछवाडॆ एक छोटा सा पांड जैसा था, छाती तक पानी होगा, मैने पहले ही टेसू डाल के उसे रंगीन कर दिया था चारों ओर दहकते हुये पलाश के पेड, बौराये हुये आम.। खूब घने पेड आउर चारों ओर दीवार भी....मैने अपनी ननदों को सब समझा दिया...यहां तक की ट्रिक भी बता दिया...जीत मेरे ननदोइ और उनके जीजा...उन्हे गुद गुदी बहोत लगती है और ये ...ये तो बस दो चार लड्कियां रिक्वेस्ट कर लें चुप चाप रंग लगवा लेंगें...उन्हे मैने ढेर सारे रंग भी दिये। तब तक जीत और ये भी आ गये मैने सब को जबर्न गुझिया खिलाई और ठंडाई पिलाई...ये कहने की बात नहीं...की सबमें डबल भांग मिली हुई थी। और बोला,

चलिये सबसे पहले इतनी सुंदर सेक्सी ननदें आई हैं रंग खेलने इसलिये पहले आप दोनों चुप चाप रंग लगवा लें...एक एक पे दो...दो...उन के मुलायम किशोर हाथों से गालों सीने पे रंग लगवाने में उन दोनों को भी मजा आ रहा था। लेकिन होली में कोइ रुल थोडी चलता है पहले तो मधु के के टाप में जीत ने हाथ डाला और फिर फिर शिखा की चोली में इन्होने घात लगाई। और वो सब साल्लीयां आई भी तो इसीलिये आई थीं। और फिर तालाब में पहले नीतू..और फिर जो जाके निकलती वो दूसरे को भी। ....शिखा थोडा नखडा कर रही थी...लेकिन सबने मिल के एक साथ उसे हाथ पांव पकड के पानी में...और जब वो सारी निकलीं तो...देह से चिपके टाप, चोली, चूतडों के बीच में धंसी शलवार, लहंगा...सब कुछ दिखता है....तब तक इन्होने मेरी ओर इशारा किया और जब तक मैं सम्हलूं...चारों हाथ पैर ननदो के कब्जे में थे और मैं पानी में....दो ने मिल के मेरी साडी खींची और दो ने सीधे ब्लाउज फाड दिया। मुझे लगा की जीत या कम से कम ये तो मेरी सहायता के लिये उत्रेंगे लेकिन ये बाहर खडे खडे खी खी करते रहे...खैर मैने अकले ही किसी का टाप किसी का ब्लाउज...और हम सब थोडी देर में आल्मोस्ट टापलेस थे और उसके बाद उन दोनों का नम्बर था।

अब तक भांग का असर पूरी तरह चढ गया था...फिर तो किसी के पैंटी मे हाथ था तो किसी के ब्रा में और मैने भी एक साथ दो दो ननदों की रगडाइ शुरु कर दी।

सालियां ४ और जीजा दो फिर भी अब अक उन के कपडे बचे हैं कैसी साली हो तुम सब....और फिर चीर हरण पूरा हो गया।

हे इतनी मस्त सालियांं और अभी तक ...बिना चुदे कोई गई तो...अरे लंड का रंग नहीं लगा तो फिर क्या जीजा साली की होली....मैने ललकारा....फिर तो वो बो होल्ड्स बार्ड होली शुरु हुई...।

जो उन दोनों से बचती उसे मैं पकड लेती...।

तीन चार घंटे तक चली होली....तिजहरिया में वो वापस गई<

अगले दिन गुड्डी के घर` सिर्फ औरतों की होली...सारी ननद भाभीयां...१४ से ४४ तक....और दरवाजा ना सिर्फ अंदर से बंद बल्की बाहर से भी ताला मारा हुआ...और आस पास कोइ मर्द ना होने से...आज औअर्तें लडकियां कुछ ज्यादा ही बौरा गईं थी। भांग,ठंडाइ का भी इसमें कम हाथ नहीं था। जोगीडा सा रा सा रा...कबीर गालियों से आंगन गूंज रहा था। कुच बडी उमर की भौजाइयां तो फ्राक में छोटे छोटे टिकोरे वाली ननदों को देख के रोक नहीं पा रहीं थीं.रंग, अबीर गुलाल तो एक बहाना था। असली होली तो देह की हो रही थी.....मन की जो भी कुत्सित बातें थी जो सोच भी नहीं सकते थे...वो सब बाहर आ रही थीं। कहते हैं ना होली साल भर का मैल साफ करने का त्योहार है, तन का भी मन का भी...तो बस वो हो रहा था। कीचड साफ करने का पर्व है ये इसीलिये तो शायद कई जगह कीचड से भी होली खेली जाती है..और वहां भी कीचड की भी होली हुई।

पहले तो माथे गालों पे गुलाल, फिर गले पे फिर हाथ सरकते स्ररकते थोडा नीचे...।

नहीं नहीं भाभी वहां नहीं....रोकना , जबरद्स्ती...।

अरे होली में तो ये सगुन होता है....।

उंह..उंह....नहीं नहीं..।

अरे क्यों क्या ये जगह अपने भैया केलिये रिजर्व की है क्या या शाम को किसी यार ने टाइम दिया है...फिर कचाक से पूरा हाथ...अंदर..।

और ननदें भी क्यों छोडने लगी भौजाइयों को...।

क्यों भाभी भैया ऐसे ही दबाते हैं क्या....अरे भैया से तो रात भर दबाती मिजवाती हैं हमारा जरा सा हाथ लगते ही बिचक रही हैं..।

अरे ननद रानी आप भी तो बचपन से मिजवाती होंगी अपने भैया से...तभी तो नींबू से बडके अनार हो गये...आपको तो पता ही होगा और फिर भाभी के हाथ में ननद के...अरे ऐसे ...नही ऐसे दबाते हैऔर निपल खींच के इसे भी तो..।

 
ननद ने खेली होली--16

तब तक कोई और भौजाई, शलवार में हाथ डाल के...बिन्नो बडा छिपा के माल रखा है...अरे आज जरा होली के दिन तो अपनी बुल बुल को बाहर निकालो....और उस के बाद साडी साया...चोली ब्लाउज सब रंग से सराबोर और उस के बाद पकड पकड के रगडा रगडी...।

मेरी और लाली भौजी की भी होली की कुश्ती शुरु हुयी।

पहला राउंड उनके हाथ रहा, मेरी साडी उन्होने खींच के उतार ली और ये जो वो जा, देखते देखते सब ननदों में चिथडे चिथडॆ हो बट गयी।

लेकिन मैने हाथ उनके ब्लाउज पे मारा...और थोडी देर में वो टाप लेस थी। ब्लाउज में हाथ डाल के होली खेलते समय मैने उनके ब्रा के हुक पहले से ही खॊल दिये थे.बेचारी जब तक अपने जोबन छुपाती, साडी भी गई और दोनों हाथों में पक्के रंग लगा के मैने कस के उनकी चूंचीया मसली रगडी...जाके अपने भैया से रगड रगड के छुडवाना...कोइ भाभी बोलीं।

टाप लेस तो थोडी देर में मैं भी हो गई। फिर पहले तो खडे खडे,,,फिर पैर फंसा के उनहोने मुझे गिरा दिया और फिर ना सिर्फ रंग बल्की कीचड, सब कुछ....अपनी ३६ डी चूंचीयों से मेरी चूंचीयां रगडती....लेकिन जब वो मेरी चूंचीयों का मजा ले रही थी मैने हाथ जांघो मे बीच कर सीधे साये का नाडा खॊल दिया और जैसे ही वो उठी, पकड के खींच दियां और वो सिर्फ पैंटी में।

पहला राउंड एक दूसरे के सारे कपडॆ उतारने तक चलना था और पैंटी उतारना बहोत मुश्किल हो रहा था। जब हाथ थक गये तो मैने होंठों का सहारा लिया...पहले तो उसके उपर से जम के होंठ रगडे। मुझे मालूम था की उनके चूत पे होंठों का क्या असर होता है। ये सिक्रेट मुझे ननदोइ जी ने खुद बताया था। और साथ में दांत लगा के मैने पैंटी में थोडी चीर लगा दी पिर पहले तो दो उंगली डाल के , फिर हाथ से उसे तार तार कर दिया और दोनों हाथों मे लहरा के अपनी जीत का ऐलान कर दिया। यही नहीं, पीछे से उन्हे पकड के...उनकी टांगों के बीच अपनी टांगे डाल के अच्छी तरह फैला दिया। उनकी पैंटी के अंदर मैने जो लाल पीला बैंगनी रंग लगाया था वो सब का सब साफ साफ दिख रहा था...और मेरी उंगलियों ने उनकी बुर को फैला के सबको दर्शन करा दिये..।

अरे देखॊ देखॊ..ये वही चूत है जिसके लिये शहर के सारे लडके परेशान रहते थे...एक ने आ के देखते हुये कहा तो दूसरी बोली लेकिन लाली बिन्नो ने किसी का दिल नहीं दुखाया सबको खुश किया। और उसके बाद गुलाल, रंग सीधे बाल्टी...।

लेकिन लेज कुश्ती का अंत नहीं था अभी तो...फिर सेकेंड राउंड शुरु हुआ...और चारॊं ओर से ननदों भाभीयों का शोर...।

अरे चोद दे ननद साली को गली के गदहों कुत्तॊ से चुदवाती है आज पता चलेगा..।

अरे क्या बोलती हो भाभी....रोज तो हमारे भैया से चुदवाती हो। इस शहर का लंड इतना पसंद था तभी तो मां बाप ने भेजा यहां चुदवाने को...और तुम तो तुम तुम्हारी बहने भी अपने जीजा के लंड के लिये बेताब रहती हैं...ननदें क्यों चुप रहती। अरे इनकी बहने तो बहने....भाई भी साले गांडू हैं।

ये राउंड बहोत मुश्किल हो रहा था...मैं उन्हे नीचे नहीं ला पा रही थी। लेकिन तभी मुझे गुद गुदी की याद आई...और थोडी देर में मैं उपर थी...दोनों टागों के बीच मेरी चूत उनके चूत पे घिस्सा मार रही थी। फिर दो उंगलियों के बीच दबा के कस के मैने पिंच किया...उनकी क्लिट...और दांतों से उनके निपल कच कचा के काट लिये....इस तिहरे हमले से १० मिनट में उन्होने चें बोल दिया.फिर तो वो हल्ला बोला भाभीयों ने ननदों पे ...कोइ नहीं बचा।

और मैं भी अपनी ननद कॊ क्यों छॊडती.पिछली बार तो मैं घर पे भूल गई थी पर आज मेरी असिस्टेंट अल्पी पहले से तैयार थी...१० इंच का स्ट्रैप आन डिल्डॊ...और फिर तो लाली ननद की वो घचाघच चुदाई मैने की की वो अपनी स्कूल में चुदाई भी भूल गई।

क्यों ननद रानी याद है ना हारने वाली को सारे मुहल्ले के मर्दों से चुदवाना पडेगा...जोर से मैने पूछा।

हां...सारी भाभीयां एक साथ बोलीं..।

और उसमें मेरे सैंयां भी आते हैं...हल्के से मैने कान में कहा।

अब हार गयी हूं तो और कस के धक्का नीचे से लगाती बोलीं तो शर्त तो माननी पडेगी।

और फिर तो उंगली, फिस्टिंग...कया नहीं हो रहा था...और दूबे भाभी के यहां हुआ वो तो बस ट्रेलर था...मैने भी लाली ननद के बाद अपनी कमसिन ननदों को नहीं छोडा..सब कुछ किया करवाया। इसके बाद तो मर्दों से चुदवाना उनके लिये बच्चों का खेल होगा।

और अगले दिन होली के दिन....जब होली के पहले ...ये मस्ती थी...मुहल्ले भर के भाभियों ने तो इनको पकडा ही अल्पी की सहेलियों ने भी....और फिर मुह्ल्ले के लडके भी आ गये और सारे देवरों ने कुछ भी नहीं छोडा....दिन भर चली होली। कीचड पेंट वार्निश और कोई लडका नहीं होगा जिसके पैंट में मैने हाथ न डाला हो या गांड में उंगली ना की हो...और लडकों ने सबने मेरे जोबन का रस लूटा...और ननदों कॊ भी...यहां तक की बशे में चूर इन्हे इनकी भाभीयां पकड लाई और मैने और दूबे भाभी ने लाली को पकड के झुका रखा था...और पीछे से अल्पी ने पकड के अपने जीजा का लंड सीधे उनकी बहन की बुर में...।

शाम को कम्मो का भी नम्बर लग गया। हम लोग उसके यहां गये...अल्पी नहीं थीं। उसकी मम्मी बोली की अपने सहेलियों के यहां गई और सब के यहां हो के तुम लोगों के यहां पहूंचेगी ३-४ घंटे बाद। कम्मॊ जिद करने लगी की मैं जीजा की साथ जाउंगी। मैं बोल के ले आई और फिर घर पहुंच के..।

मैने अपनी चूंची उस कमसिन के मुंह में डाल दी थी और टांग उठा के ...होली के नशे में हम तीनों थे। थोडा चीखी चिल्लाई पर...पहली बार में तो आधा लेकिन अगली बार में पूरा घोंट लिया।

अगले दिन जैसा तय था गुड्डी को ले के हम वापस आ गये।

उस के साथ क्या हुआ ये कहानी फिर कभी....।

लेकिन जैसी होली हम सब की हुई इस २१ की वैसी होली आप सब की हो ....सारे जीजा, देवर और नन्दोइयों की और

सारी सालियों सलहजों भाभीयों की।

समाप्त

 
ससुराल की पहली होली-1

"ओह भाभी प्लीज,…"

" क्या कह रही है तू ,…स्क्विज ,…ओ के " और ये कह के मैंने उसके टॉप फाड़ते किशोर उभारो को और जोर से दबा दिया। उसके खड़े निपल्स को भी मैंने पुल करना शुरू कर दिया।

" नहीं भाभी , छोड़िये न ," बड़ी शोख अदा और नाज से छुड़ाने की कोशिश करते उस किशोरी ने कहा।

और मैंने दूसरे जोबन को भी दबाना शुरू कर दिया और उसे चिढ़ाते हुए छेड़ने लगी ,

" अरी , अभी तो ऊपर से दबा रही हूँ। कल होली के दिन तो खोल के रगुंगी , रगड़ूंगी , मसलूँगी और अगर तुम्हारा मन करे न तो तुम्हारे उसे ' दिन में भैया और रात में सैयां ' वाले भाई से भी दबवा , मसलवा दूंगी। "

लाज से उसके गाल टेसू हो गए।

और जैसे ही मैंने उसे छोड़ा , एक पड़ोसन चालु हो गयीं ,

" अरे ननद रानी ये जवानी के हॉर्न , दबाने के लिए ही तो हैं। "

ये होली के पहले कि शाम थी , और हम लोग अपनी ननद मीता को छेड़ रहे थे।

वह ग्यारहवें में पढ़ती थी और उम्र का अंदाजा आप लगा लें। खूब लम्बी , सुरु के पेड़ कि तरह छरहरी , उभरते हुए टेनिस के गेंद कि साइज के उभार , और मचलते , छलकते , बलखाते नितम्ब , चोटियां लम्बी सीधे नितम्ब के दरारों तक पहुंचती … खूब गोरी , दूध में दो चार बूँद गुलाबी रंग के डाल दें बस वैसा रंग , भरे हुए गाल ,…

लेकिन शर्मीली कुछ ज्यादा ही थी।

ननद भाभियो में जो गालियां चलती हैं , बस वो चिढ जाती थी यहाँ तक की जीजा साली के खुले मजाक में भी। पिछली होली में उसके जीजा ने रंग लगाने के बहाने जब उसके जीजा ने फ्राक के अंदर हाथ दाल के उसके बड़े टिकोरे ऐसे जोबन दबा दिए , तो वो एकदम उछल गयी।

लेकिन मैंने तय कर लिया था की इस होली में इसकी सारी लाज शरम उतार के उसे होली का असली मजा दिलवाउंगी। आखिर एकलौती भाभी हूँ उसकी।

शादी के बाद ये मेरी दूसरी होली थी लेकिन ससुराल में पहली।

पिछली होली तो मेरे मायके में हुयी जब ये आये थे और क्या नहीं हुआ था वहाँ। रंग के साथ मेरी बहन रीमा को 'इन्होने ' अपनी मोटी पिचकारी का स्वाद भी चखाया। और सिर्फ रीमा ही नहीं , उसकी सहेलियों को भी। कोई नहीं बचीं। यहाँ तक की मेरी भाभी भी , अपनी सलहज को तो उन्होंने आगे और पीछे दोनों ओर का मजा दिया। और भाभी ने भी उनकी जबरदस्त रगड़ाई की थी।

लेकिन ये होली पूरी तरह मेरी होनी थी ससुराल में देवर ननदों के साथ रंग खेलने की , मजे लेने की।

और ननद के नाम पे यही मीता थी , इनकी ममेरी बहन , लेकिन सगी से भी ज्यादा नजदीक।

और देवर के नाम पे मीता का एक भाई रवी।

मेरी जिठानी , नीरा मुझसे दो चार साल ही बड़ी थी और हर मजाक में मेरा हाथ बटाती। और इस बार होली में साथ देने के लिए उनके गाँव की जो बनारस में ही था , वहाँ से उनकी भाभी भी आयी थी , चमेली भाभी। बिना गाली वाले मजाक के तो वो बोल नहीं सकती। कसी हुयी देह , खूब भरी भरे नितम्ब और गद्दर जोबन। ।और जब गारी गातीं तो किसी की भी पैंट , शलवार उतार देतीं।

जैसे मीता , मेरी नन्द शर्मीली थी वैसे ही मेरा देवर रवी। हम लोग तो कहते भी थे "

"तेरा पैंट खोल के चेक करना पड़ेगा देवर है कि ननद। … "

खूब गोरा , एकदम नमकीन और बात बात पे शर्माता , मीता से दो साल बड़ा था , उन्नीस का ,अभी बी एस सी में था।

उपफ मैंने अपने बारे में तो बताया नहीं।

जब मेरी शादी हुयी थी आज से डेढ़ दो साल पहले तो मैं रवी की उम्र कि थी , उन्नीस लगा ही था।

मैं छरहरी तो हूँ लेकिन दुबली पतली न हूँ न रही हूँ खास तौर पे खास जगहो पे।

मैं नवी दसवी में थी तभी , जब मेरे सहेलियों के टिकोरे थे मेरे उभार पूरे स्कूल में ,…

गोरी , भरे भरे गाल , रूप ऐसा जो दर्पण में ना समाये और जोबन ऐसा जो चोली में न समाये

और पतली कमर पे ३५ साइज के हिप्स भी खूब भरे भरे लगते ,

और राजीव तो मेरे उभारो के दीवाने , सबके सामने भी हिप्स पिंच कर लेते

" थोड़ी सी पेट पूजा कहीं भी कभी भी " वाले ख्याल के थे वो , और मैं कौन होती उनको मना करने वाली।

२० दिन के हनीमून में उन्होंने पूरी सेंचुरी लगायी थी , मुख मिलन छोड़ के , और उनका ये जोश अभी भी जारी थी।

उपफ मैं भी न बजाय कहानी सुनाने के अपनी ही ले बैठी। चलिए तो तो अब ससुराल में अपनी पहली होली कि बात आगे बढ़ाती हूँ।

जैसा मैं बता रही थी होली के पहले वाले शाम की बात ,

मेरी ननद मीता आयी थी और थोड़ी देर बाद रवी भी आ गया मेरा छोटा देवर।

मैं , मेरी जेठानी नीरा भाभी , और उनकी भाभी , चमेली भाभी गुझिया बना रहे थे।

रवी , एकदम चिकना , नमकीन , मुस्करा के मैंने अपनी जेठानी से कहा ,

" दीदी , कच्ची कली "

" कच्ची कली या कच्ची कला " अपनी हंसी रोकते हुए वो बोलीं।

लेकिन चमेली भाभी को तो रोकना मुश्किल था , वो बोलीं ,

" अरे ई गाँव में होते न तो रोज सुबह शाम कबहुँ गन्ने के खेत में कबहुँ अरहर के खेत में , लौंडेबाज , निहुरा के इसकी गांड बिना मारे छोड़ते नहीं। "

होली का असर तो मुझ पे भी था मैं बोली ,

' अरे भाभी , गाँव शहर में कौन फरक , कल होली में तो ई पकड़ में आएगा न बस सारी कसर पूरी कर देंगे। मार लेंगे इसकी हम तीनो मिल के। "

" एकदम कल इसकी गांड बचनी नहीं चाहिए " चमेली भाभी बोली और अबकी खुल के मेरी जेठानी ने भी उनका साथ दिया।

रवि , मेरे देवर की किस्मत वो हम लोगो की ओर आ गया और मुझसे पूछ बैठा ,

" भाभी कल होली के लिए कितना रंग लाऊं "

और चमेली भाभी ने छूटते ही जवाब दिया ,

" आधा किलो तो तुम्हारी बहन मीता के भोंसड़े में चला जाएगा और उतना ही तुम्हारी गांड में "

शर्मा के बिचारा गुलाबी हो गया।

दूसरा हमला मैंने किया , इक वेसिलीन कि बड़ी सी शीशी उसे पकड़ाई और समझाया ,

" देवर जी ये अपनी बहन को दे दीजियेगा , बोलियेगा ठीक से अंदर तक लगा लेगी और बाकी आप लगा लेना , पिछवाड़े। फिर डलवाने में दर्द कल होली में थोडा कम होगा "

बिचारे रवी ने थोड़ी हिम्मत की और जवाब देने की कोशिश की

" भाभी डालूंगा तो मैं , डलवाने का काम तो आप लोगों का है "

और अबकी जवाब मेरी जेठानी ने दिया ,

" लाला , वो तो कल ही पता चलेगा , कौन डलवाता है और कौन डालता है। "

मैंने उसके गोरे चिकने गालों पे जोर से चिकोटी काटी और बोली ,

" देवर जी , कल सुबह ठीक आठ बजे , अगर तुम चाहते हो मेरे इन सलोने चिकने गालों पे सबसे पहले तुम्हारा हाथ पड़े "

" एकदम भाभी बल्कि उसके पहले ही आपका देवर हाजिर हो जाएगा। "

वो गया और हम देर तक खिलखिलाती रहीं।

राजीव ,"मेरे वो "रात को सोने जल्दी चले गए।

होली के पहले की रात , बहुत काम था।

गुझिया , समोसे , दहीबड़े ( ये कहने की बात नहीं की आधे से ज्यादा भांग से लैस थे ) और ज्यादातर खाना भी। अगला दिन तो होली के हुडदंग में ही निकलना था।

नीरा भाभी , मेरी जिठानी और चमेली भाभी ने कड़ाही की कालिख अपने दोनों हाथों में पोत ली , अच्छी तरह रगड़ के और दबे पाँव राजीव के कमरे में गयी. वो अंटागफिल गहरी नींद में सो रहे थे ।

आराम से उनकी दोनों भाभियों ने उनके गाल पे कड़ाही की कालिख अच्छी तरह रगड़ी। नीरा भाभी ने फिर अपने माथे से अपनी बड़ी सी लाल बिंदी निकाली और राजीव के माथे पे लगा दी। वो चुटकी भर सिंदूर भी लायी थीं और उससे उन्होंने अपने देवर की मांग भी अच्छी तरह भर दी। चमेली भाभी तो उनसे भी दो हाथ आगे थीं , उन्होंने राजीव का शार्ट थोडा सरकाया और उनके उस थोड़े सोये थोड़े जागे कामदेव के तीर पे , रंग पोत दिया। मैं पीछे खड़ी मुस्करा रही थी।

और जब वो दोनों बाहर गयीं तो मेरा मौका था।

पहले तो मैंने अपने कपडे उतारे।

राजीव ने तो सिर्फ शार्ट पहन रखा था। मैंने उसे भी सरका के अलग कर दिया। और अब मेरे। रसीले होंठ सीधे उनके लिंग पे थे। थोड़े ही देर चूसने के बाद लिंग एकदम तन्ना गया। मेरी जुबान उनके कड़े चर्मदंड पे फिसल रही थी. कितना कड़ा था।

मेरे रसीले गुलाबी होंठ उनके खूब बड़े पहाड़ी आलू ऐसे मोटे कड़े सुपाड़े को चाट रहे थे , चूम रहे थे चूस रहे थे। बीच बीच में मेरी जीभ की नोक उनके सुपाड़े के पी होल के छेद में सुरसुरी कर देती थी। अब वो पूरी तरह जग गए थे।

मैंने उन्हें जबरदस्त आँख मारी और मेरा एक हाथ अब मेरे पति के बॉल्स को मादक ढंग से सहला रहा था दबा रहा था। यही नहीं , मेरी तर्जनी का नेल पालिश लगा लम्बा नाख़ून , बॉल्स से उनके पिछवाड़े के छेद तक स्क्रैच कर रहा था। और जब मैंने नाख़ून राजीव के पिछवाड़े के छेद पे लगाया , तो बस उनकी हालत खराब हो गयी।

वो मचल रहे थे , उछल रहे थे अपने हिप्स जोर जोर से पटक रहे थे। और हिप्स उठा उठा के अपना बित्ते भर लम्बा , मोटा मूसल , मेरे संकरे गले में ठूंस रहे थे।
 
मेरी भी हालत खराब थी। पूरा लंड हलक तक मेरे अंदर था। मेरे गाल फूले हुए थे ,आँखे बाहर निकल रही थीं। लेकिन मैं रुकी नहीं और पूरे जोर के साथ चूसती रही , चाटती रही. उनका लिंग फड़क रहा था और जब मैंने अपने जुबान पे प्री कम की कुछ बूंदो का स्वाद महसूस किया तभी मैं रुकी।

मैंने धीमे धीमे उनका लिंग बाहर निकाला , आलमोस्ट सुपाड़े तक , लेकिन सुपाड़ा अभी भी मेरे मुंह के अंदर था।

कुछ देर रुक के मैंने उसे फिर चुभलाना चूसना शुरू कर दिया।

और अबकी मेरी शरारती उंगलियां और नटखट हो गयीं। कभी वो राजीव के बॉल्स को सहलाती , कभी हलके से तो कभी जोर दबा देतीं और फिर वो पिछवाड़े के छेद पे पहुँच। उंगली का टिप हलके हलके गोल गोल चक्कर कट रहा था कभी गुदा द्वार को दबा रहा था , नाख़ून से स्क्रैच कर रहा था।

राजीव उचक रहे थे , चूतड़ उठा रहे थे , लेकिन अब बिना रुके मैं जोर जोर से लंड चूस रही थी। मेरी जीभ लंड को नीचे से चाट रही थी , सहला रही थी। दोनों होंठ चर्मदण्ड से रगड़ रहे थे और गाल वैक्यूम क्लीनर से भी तेज चूस रहे थे। राजीव झड़ने के कगार पे थे।

लेकिन अबकी मैं नहीं रुकी और चूसने, की रफ्तार बढ़ा दी और साथ ही मेरी उंगली का जो टिप उनके पिछवाड़े , दबा रहा था , सहला रहा था , मैंने पूरे जोर के साथ टिप अंदर घुसा दी।

जिस तेजी से उन्होंने झड़ना शुरू किया मैं बता नहीं सकती। लेकिन मैं पिछवाड़े घुसी ऊँगली के टिप को गोल गोल घुमाती रही। हमेशा , मैं उनकी गाढ़ी थक्केदार मलायी घोंट लेती थी , लेकिन इस बार मैंने उनके लिंग कि सारी मलायी एक कुल्हड़ में गिरा दी। लेकिन मैं इतने पे ही नहीं रुकी। मैंने लंड के बेस को फिर से दबाया , बॉल्स को भींचा , और एक बार फिर लंड से गाढ़ी मलायी की पिचकारी फूट पड़ी। वो निकलता ही रहा , निकलता ही रहा और पूरा बड़ा सा कुल्हड़ भर गया।

और अब जब मैं उनके पास गयी उन्होंने मुझे कस के अपने चौड़े सीने पे भींच लिया।

उनकी प्यार भरी उंगलियां मेरी पान सी चिकनी पीठ सहला रही थीं।

और कुछ ही देर में उनके भूखे नदीदे होंठो ने मेरे मस्ती से पागल कड़े निपल्स को गपुच कर लिया और जोर जोर से चूसने लगे। उनके होंठो का दबाव मैं अपने उभारों पे महसूस कर रही थी , और दांतों की चुभन भी। उनके दांतो के निशान के हार मेरे निपल्स के चारों ओर पड गए।

और साथ ही उनकी जीभ , कभी मेरे कड़े तने निपल्स को सहलाती , लिक करती नीचे से ऊपर तक। जोबन का रस लेना किसी को सीखना हो तो राजीव से सीखे। मस्ती से मेरी आँखे मुंदी पड रही थीं।

मेरे हाथ अब राजीव के हिप्स को सहलाने लगे , दबोचने लगे। और मेरी प्रेम गली अब उनके कामदण्ड को दबा रही थी।

थोड़ी देर में उनका लिंग फिर तन्ना के उठ खड़ा हुआ।

अब राजीव से भी नहीं रहा गया और उन्होें मेरी गोरी गुलाबी केले के तने ऐसी चिकनी जांघो को पूरी तरह फैला दिया और वो मेरे ऊपर आ गए। चौदहवीं के चाँद की चांदनी पूरे कमरे में बिखरी पड़ रही थी। बाहर से फाग और कबीर गाने की आवाजें आ रही थी

अरे नकबेसर कागा लै भागा मोरा सैयां अभागा ना जागा।

लेकिन मेरा सैयां जग गया था , और उसका काम दंड भी। उ

न्होंने अपने खूब तन्नाये , बौराये लिंग को मेरे क्लिट पे रगड़ना शुरू कर दिया और उनका एक हाथ अब निपल्स को कभी फ्लिक करता तो कभी पुल करता। एक हाथ निपल्स और जोबन पे और दूसरा मेरे क्लिट पे , मैं पागल हो रही थी चूतड़ पटक रही थी। लेकिन वो तो यही चाहते थे।

थोड़ी देर बाद उन्होंने मेरे दोनों निचले होंठो को फैला के अपना सुपाड़ा , उसमे सेट कर दिया और साथ में दो उँगलियों से क्लिट को रोटेट करने लगे।

मैं बावरी हो गयी , नीचे से चूतड़ उठा उठा के कोशिश करने लगी कि वो लंड अंदर पेल दें। लेकिन वो मुझे तड़पा रहे थे , आखिर हार के मैं बोल ही पड़ी

" चोद दो मेरी चूत , डाल दो अपना मोटा लंड मेरे राजा , पेलो न प्लीज , चोदो न ,"

और राजीव यही तो सुनना चाह रहे थे। और अब पागलों की तरह उन्होंने मेरी चुदाई शुरू कर दी। एक झटके में ही बित्ते भर का लंड मेरी कसी चूत के अंदर था। जैसे कोई धुनिया रुई धुनें बस उसी तरह , और मैं भी चूतड़ उठा उठा के जवाब दे रही थी।

लेकिन राजीव का मन इतनी आसानी से भरने वाला कहाँ था। थोड़ी देर में उन्होंने मुझे कुतिया बना दिया , उनका फेवरिट आसन , और अब तो धक्को की ताकत और बढ़ गयी। उनके बॉल्स सीधे मेरे चूतड़ो से टकराते। और साथ में ही उनके हाथ पूरी ताकत से मेरे बूब्स निचोड़ रहे थे।

कुछ देर में फिर उन्होंने पोज बदला और अब हम आमने सामने थे। चुदाई की रफ्तार थोड़ी मन्द पड़ गयी , लेकिन वो बिना रुके चोदते रहे।

मैं थक कर चूर हो गयी , पसीने से नहा गयी लेकिन राजीव का लंड पिस्टन की तरह अंदर बाहर होता रहा। और फिर वो झड़े तो , झड़ते ही रहे , झड़ते ही रहे। साथ मैं मैं भी।

मैंने अपनी टांग उनके ऊपर कर ली। उनका लिंग मेरे अंदर ही था। और हम दोनों कब सो गए पता नहीं चला।

सोते समय उनके दोनों हाथ मेरे उभार पे थे , मेरी टांग उनके ऊपर और लिंग मेरी बुर में।

भोर के पहले पता नहीं कब हम दोनों की नींद खुली और कब चुदाई फिर से चालु हो गयी पता नहीं।

मैंने हलके हलके पहले कमर हिलायी , फिर चूत में उनके लंड को निचोड़ना शुरू कर दिया। उन्होंने धक्को कि रफ्तार बढ़ायी , और अबकी जबी वो झड़ने वाले थे तो मैंने उनका लंड निकाल के सीधे कुल्हड़ के ऊपर किया और सारी मलायी कुल्हड़ में।

" ये क्या कर रही हो " मुस्करा के उन्होंने पुछा।

" एक स्पेशल रेसिपी के लिए " मैं भी मुस्करा के बोली।

सोने के पहले मैंने उन्हें एक ग्लास दूध दिया , रोज की तरह। लेकिन एक फर्क ये था की आज उसमें एक सिडेटिव था। और कुछ ही देर में उनकी अाँख लग गयी। तीन बार झड़ने के बाद वो थोड़े थक भी गए थे।

और जब मैं श्योर हो गयी की वो गाढ़े नींद में सो गए हैं , तो मैं हलके से उठी और बेड शीट को भी सरका दिया। और उनके कपड़ो के साथ ही उसे भी हटा दिया। अब वहाँ कुछ भी नहीं था जिससे अपने को वो ढक सकते। मैंने अपनी ब्रा और पैंटी उनके पास रख दी और साथ में मेरी लिपस्टिक से लिखा एक नोट भी रख दिया ,

" होली के लिए आपकी ख़ास ड्रेस "

दरवाजा मैंने बाहर से बंद कर दिया। .
 
ससुराल की पहली होली-2

जब मैं बाहर निकली तो मेरे पड़ोस के मकान के एक कमरे की लाइट जल रही थी। राजन का कमरा था वो। पडोसी और इनसे उम्र में कम होने से मेरा देवर तो लगता ही था , वो था भी बड़ा रसिया। और देह भी खूब गठी , कसरती , मस्क्युलर।

मैं उसे जॉन कहती थी। उसकी बाड़ी एकदम जान अब्राहम से मिलती थी , मैनली मस्क्युलर।

जब भी वो बालकनी से मुझे अकेले खुल के रसीले अश्लील मजाक करता। एक दिन तो उसने मुझे फ्लाइंग किस भी कर दिया लेकिन मैं कौन कम थी। अपने ब्लाउज के बटन खोल के कैच कर के मैंने उसमें उसे रख दिया। अब तो हम लोगो कि इशारे बाजी और बढ़ गयी और एकदम खुल के होने लगी।

एक बार उसने अंगूठे और तरजनी से चुदाई का इंटरनेशनल सिम्बल बनाया तो मैंने भी जोर से हिप्स के धक्के मार के उसका जवाब दिया।

और आज तो होली का दिन था , वो मेरा देवर था छेड़छाड़ तो बनती थी। वोजब बाहर निकला तो मैंने जबरदस्त गुड मार्निंग की। पहले तो नाइटी के उअप्र से अपने उभारों को मैंने सहलाया , फिर नाइटी के बटन खोल के सुबह सुबह अपने जोबन का दर्शन करा दिया ( ब्रा पैंटी तो मैं इनके लिए छोड़ आयी थी )

यही नहीं ,मैंने अपने निपल्स को सहलाया भी और पुल भी किया।

उसका शार्ट तन गया। लेकिन होली का असर दोनों ओर था।

उसने शार्ट खोल के अपना लंड निकाला। एकदम मस्त , कड़ियल। ७-८ इंच का रहा होगा और खूब मोटा। मुझे दिखा के मुठियाने लगा। मैंने भी उसके लंड पे फ्लाइंग किस दिया , जीभ निकाल के चिढ़ाया और सीढी से धड़ धढ़ाती नीचे चली गयी। नीरा भाभी और चमेली भाभी आलरेडी जग गयी थीं और सुबह का घर का काम शुरू हो गया था।

हम लोगों ने किचेन का काम जल्दी जल्दी ख़तम किया और साथ में रंग बनाने का और , ' और भी तैयारियां '.

मैं सोच रही थी क्या पहनू होली खेलने के लिए , मैं अपने पुराने कपडे देख रही थी।

बॉक्स में एक पुरानी थोड़ी घिसी आलमोस्ट ट्रांसपेरेंट सी , एक गुलाबी साडी मिली।

अब सवाल ब्लाउज का था। राजीव ने दबा दबा के साइज बड़ी कर दी थी।

मेरा चेहरा खिल उठा एक पुरानी आलमोस्ट बैकलेस लो कट चोली थी , खूब टाइट जब मैंने सिलवाई थी शादी के दो साल पहले। और शादी के बाद मेरी साइज राजीव ३४ सी से बढ़ाकर ३६ कर दी थी। बड़ी मुश्किल से फिट हुयी वो भी ऊपर के दो बटन खोल के , बस आधे से ज्यादा मेरे गद्दर गोरे जोबन दिख रहे थे और जरा सी झुकती तो मेरे मटर के दाने के बराबर निापल साफ दिखते।

मैंने जिद कर के अपनी जिठानी को भी एक पुरानी धुरानी खूब घिसी 'सब कुछ दिखता है ' वाली साडी और वैसा ही लो कट एकदम टाइट ब्लाउज पहनवाया।

लेकिन सबसे हिम्मती थीं चमेली भाभी , उन्होंने एक सिंथेटिक झलकती हुयी पीली साडी पहनी और साथ में एक स्लीवलेस स्पधेड ब्लाउज और वो भी बिना ब्रा के।

चमेली भाभी ने मेरे जोबन पे चिकोटी काटी और हंस के बोला ,

" क्यों तैयार हो ससुराल की पहली होली के , लिए देवरो से डलवाने के लिए "

मैं कौन पीछे रहने वाली थी। सफेद ब्रा विहीन ब्लाउज से झांकते उनके कड़े निपल्स को पिंच करके मैंने भी छेड़ा

"और आप भी तो तैयार हो मेरे सैयां से मसलवाने रगड़वाने के लिए। "

अभी आठ भी नहीं बजे थे लेकिन दरवाजे की घंटी बजी।

मैंने दरवाजा खोला। और कौन , मेरा गोरा चिकना , शर्मीला देवर , रवी। एक लाल टी शर्ट और हिप हगिंग जींस में सब मसल्स साफ दिख रही थीं।

मैंने प्यार से उसके गोरे नमकीन गाल सहलाये और बोला , " तैयार हो डलवाने के लिए "

शर्म से उसके गाल गुलाबी हो गए

चमेली भाभी ने भी देवर के चिकने गाल सहलाये और छेड़ा ,

" माल तो बड़ा नमकीन है , गाल तो पूरा मालपूआ है कचकचा के काटने लायक "

नीरा भाभी ने हम दोनों को डांटा

" बिचारा सीधा साधा देवर , इत्ती सुबह आया। तुम दोनों बिना उसे कुछ खिलाये पिलाये , सिर्फ तंग कर रही हो। "

चमेली भाभी एक प्लेट में गुझिया और एक ग्लास में ठंडाई लाई।ये कहने की बात नहीं है की दोनों में भांग कि डबल डोज थी।

रवी मेरे देवर ने कुछ बोलने कि हिम्मत की

" भाभी मेरी पिचकारी पूरी तैयार है। ".

मैंने झुक के जानबूझ के प्लेट से गुझिया उठायी। और जोबन के साथ निपल भी मेरे देवर को साफ दिख रहे थे। जब तक वो सम्हलता , भांग की दो गोली पड़ी गुझिया उसके मुंह में।

और अब मैंने छेड़ा ,

"अरे देवर जी , पिचकारी में कुछ रंग बचा भी है कि सब मेरी ननद मीता के अंदर डाल आये ?"

और अबकी मेरा आँचल भी ढलक गया और अब तो जोबन पूरा उसकी आँख में गड गया और मैंने मुस्करा के चिढ़ाया

" सिर्फ देखने के लिए ,…"

" मैं समझा आज तो छूने पकडने और मसलने का मौका मिलेगा " मेरा देवर भी कम शरारती नहीं था।

भांग की अब चार गोली उसके पेट में चली गयी थी और ५-१० मिनट में उसका असर पूरा होना था।

चमेली भाभी क्यों पीछे रहतीं और उन्होंने भांग मिली ठंडई तो पिलायी और साथ ही गुझिया खिलाने कि भी जिद करने लगी।

रवी नखड़े कर रहा था , तो चमेली भाभी आपने अंदाज में बोली

" अरे लाला ज्यादा नखड़ा न करो नहीं तो निहुरा के पीछे वाले छेद से घुसेड़ दूंगी अंदर "

मैं भी हंस के बोली

" और क्या जाएगा तो दोनों ओर से अंदर ही और पिछवाड़े के छेड़ का मजा मिलेगा वो अलग। "

बिचारा मेरा देवर , तीसरी भंग वाली गुझिया भी अंदर।

मैं आन्गन में आगयी और रंग भरी पिचकारी उठा के उसे ललकारा ,

" आ जाओ मेरी ननद के यार , देखु तेरी बहनो ने क्या सिखाया है। "

"उसने मुझे पकड़ने की कोशिश की , लेकिन वो जैसे ही पास आया मैंने सारी पिचकारी। , सररर अपने देवर की 'तीसरी टांग' पे खाली कर दी।

और उधर पीछे से मेरी जेठानियों, चमेली भाभी और नीरा भाभी ने बाल्टी का रंग उसके पिछवाड़े ,

लेकिन मेरा देवर , रवी , मेरे पीछे पड़ाही रहा। एक दो बार कन्नी काट के मैं बची लेकीन उसने पकड़ ही लिया। मैंने अपने चेहरे को छुपाने की दोनों हाथों से भरपूर कोशिश की , लेकिन उंसकी जबरदस्त पकड़ के आगे , …

थोड़ी देर में उसके हाथ में मक्खन से गाल सहला रहे थे , रगड़ रहे थे। मेरी उसे रोकने कि लाख कोशिश , सब बेकार गयी। यही नहीं थोड़ी देर में उसके रंग लगे हाथ सरक के नीचे आने लगे।

मेरे भी दोनों हाथ उसे रंग लगा रहे थे , पीछे से चमेली और नीरा भाभी भी रंग लगा रही थी , लेकिन बिना रुके उसके हाथ मेरी चोली के अंदर घुस ही गए। वैसे भी लो कट चोली में दोनों जोबन आधे से ज्यादा तो बाहर ही थे। पहले तो वो थोडा घबड़ायाया , झिझका कि कही मैं बुरा न मान जाऊं। लेकिन कौन भाभी होगी जो होली में चोली के अंदर घुसे हाथ वो भी देवर के हाथ का बुरा मानती।

वो हलके हलके रंग लगता रहा फिर खुल के मेरे जोबन को जोर जोर से रवी खुल के रगड़ने लगा , मसलने लगा। यहाँ तक कि एक बार उसने निपल भी पिंच कर दिए। मस्ती से मेरे उभार पत्थर हो रहे थे , निपल भी खूब कड़े हो गए थे। बिचारी चमेली भाभी और नीरा भाभी की लाख कोशिशों के बावजूद उसके दोनों हाथ जोर जोर से मेरी गोल गोल रसीली चूंचीयों का खुल के रस ले रहे थे।

रवी थोडा और बोल्ड हो गया और उसने एक हाथ मेरे साये में डालने की कोशिश की। लेकिन मैंने उसे बरज दिया।

" देवर जी , नाट बिलो द बेल्ट "

और वो ठिठक गया।

लेकिन ये मनाही चमेली भाभी के लिए नहीं थी। कड़ाही की कालिख से पुते उनके हाथ रवी के पिछवाड़े उसके पैंट के अंदर घुस गए और चमेली भाभी की उंगली अंदर पिछवाड़े इस तरह घुसी की बिचारे रवी की चीख निकल गयी।
 


" अरे देवर जी अबहिं तो एक ऊँगली घुसी है जो इतना चीख रहे हो " चमेली भाभी ने मुंह बनाया।

" अरे नहीं चीख वो इस लिए रहा है , की एक उंगली से इसका क्या होगा , ये तो पुराना मरवानेवाला है " नीरा भाभी , मेरी जेठानी ने टुकड़ा जड़ा।

चमेली भाभी की उंगली अंदर ही थी की नीरा भाभी ने उसे गुदगुदी लगानी शुरू की और रवी को मुझे छोड़ना पड़ा.

और अब फिर बाजी मेरे हाथ थी।

नीरा भाभी और चमेली भाभी ने कस उन्हें दबोच लिया लिया था बिचारे हिल डुल भी नहीं सकते थे।

अब मौका मेरे हाथ था।

मैंने खूब आराम से गाढ़े पक्के लाल ,काही और बैंगनी रंगो की कॉकटेल अपने हाथों पे बनायी और बहोत ही प्यार से देवर जी के चिकने गालों पे रगड़ा। फिर उन नरम मुलायम गालों पे जोर से चिकोटी काटते, चमेली भाभी के साथ मिल के उनकी शर्ट , बनियाइन उतार के और बोला ,

" मेरी छिनाल ननद के यार , आपने तो सिर्फ टॉप में हाथ डाला था और हमने आपको पूरा टॉपलेस दिया। "

रंग मैंने उसकी छाती पे भी लगाया और अंगूठे और तरजनी के बीच उसके टिट्स को ले के पहले तो गोल गोल घुमाया , फिर लम्बे नाखूनों से जोर से पिंच कर दिया।

एक गाल पे मैंने लाल काही रंग लगाया था तो दूसरे पे , नीरा भाभी ने वार्निश की तीन चार पक्की परत लगा दी। यहीं नहीं , वार्निश और सफेद पेंट उन्होंने देवर की छाती पे भी कई कोट लगा दिया। उसके चारों

और जब देवर की छाती मेरी जेठानी के कब्जे में हो गयी तो मेरे हाथ सरक के , उनके पैंट के अंदर घुस गए और मेरी उंगलिया , गाढ़ा पक्का लाल रंग , 'उसके 'चारों और लगाने लगीं। मस्ती से तन्ना के वो एकदम टन्न हो गया , लेकिन देवर ने अपना विरोध दर्ज कराया

में

" भाभी , आपने बोला था , की नाट बिलो द बेल्ट और आप खुद ,…"

उसकी बात काट के मैंने 'उसे 'दबोचते हुए बोला " यही तो देवर आप मात खा गए। अरे होली तो उन्ही सब कामों के लिए होती है जिसे रोज मना किया जाता है। "

जब तक मैं अगवाड़े बिजी थी चमेली भाभी ने पिछवाड़े का मोर्चा सम्हाल रखा था और वो भी ' अंदर तक डुबकी लगा के '.

मैं गयी और एक बाल्टी गाढ़ा रंग सीधे पैंट के अंदर,…

और मौक़ा पा के अब चमेली भाभी ने आगे पीछे दोनों और का मोर्चा सम्हाल लिया। एक हाथ उनका आगे से 'चर्म दंड मंथन ' कर रहा था और दूसरे ने पीछे के छेद में गचागच , गचागच , अंदर बाहर , और अब दो उँगलियाँ अंदर थीं ,…

रंगो का स्टाक ख़तम हो गया था , उसे लेने मैं गयी और इधर बाजी पलट गयी।

रवी मेरे देवर चमेली भाभी को दौड़ाया , और वो भागीं।

लेकिन उनकी साडी का आँचल रवी की पकड़ में आ गया। उसने जोर से खींचा और, थोड़ी ही देर में पूरी साडी मेर्रे देवर के हाथ में। उसने साडी का बण्डल बनाया और सीधे छत पे।

चमेली भाभी अब सिर्फ ब्लाउज और साये में , और ब्लाउज भी सफेद , स्लीवलेस।

और रवी ने उन्हें अब दबोच लिया था।

चमेली भाभी अब सिर्फ ब्लाउज और साये में , और ब्लाउज भी सफेद , स्लीवलेस।

और रवी ने उन्हें अब दबोच लिया था।

सहायता करने के लिए मैंने गाढ़े लाल रंग की एक बाल्टी सीधे रवी के ऊपर फेंकी , लेकिन मेरा देवर भी कम चतुर चालाक नहीं था।

उसने चमेली भाभी को आगे कर दिया और पूरी की पूरी बाल्टी का रंग चमेली भाभी के ब्लाउज पे।

अब वो एकदम उनके जोबन से चिपक गया था।

रवी ने चमेली भाभी के बड़े बड़े गद्दर जोबन को , ब्लाउज के ऊपर से पकड़ा , लेकिन बजाय हाथ अंदर डालने के , उसने आराम से चट चट उनकी , चुटपुटिया बटन खोल दीं। और दोनो गोरे गोरे , गदराये , खूब बड़े जोबन बाहर थे। बस अब तो रवी की चांदी थी। जोर जोर से वो चमेली भाभी की रसीली चूंचियां मसलने रगड़ने लगा।

बीच बीच में वो उनके बड़े खड़े निपल्स को भी पिंच करता , अंगूठे और तर्जनी के बीच लेकर रोल करता , पुल करता। जिस तरह से चमेली भाभी सिसकियाँ भर रही थीं , ये साफ था की उन्हें कितना मजा आ रहा है।

वो कस कस जे अपनी दनो हथेलियों से उनकी चूंची दबा रहा था , रगड़ रहा था , नाखुनो के निशान बना रहा था।

और जब एक पल के लिए उसने हाथ हटाया तो चमेली भाभी की गोरी गोरी चूंचिया , एकदम लाल भभूका हो गयीं थी। मैं और नीरा भाभी पूरी कोशिश कर रहे थे , उसे छुड़ाने को लेकिन चमेली भाभी की चुन्ची में जैसे कोई चुम्बक लगा हो , मेरे देवर के दोनों हाथ वही चिपक गए थे।

हार कर नीरा भाभी ने वही ट्रिक अपनायी , गुदगुदी।

और अबकी जब देवर ने चमेली भाभी को छोड़ा , तो हम लोगों ने कोई गलती नहीं की।

चमेली भाभी और मेरी जिठानी , नीरा भाभी ने मिलकर उसके दोनों हाथ पीछे कर के पकडे। और मैंने उस के हाथ उसी की शर्ट और बनियाइन से जोर जोर से डबल गाँठ में बाँध दी। अब वो लाख कोशिश करता ये छूटने वाली नहीं थी। ( आखिर मैं भी गाइड की लीडर थी और कैम्प की मस्तियों के साथ साथ नाट में मुझे मेडल भी मिला था )

अब बाजी एक फिर हम तीनो के हाथ में थी।

वो बिचारा गिड़गिड़ाया , शिकायत की।

" भाभी आप तीन , और मैं अकेला , कम से कम हाथ तो छोड़ दीजिये "

"एकदम नहीं। " अपने भीगे ब्लाउज से झाकते जोबन उसके पीठ पे पीछे से रगड़ते मैं बोली , और साथ में मेरे दोनों हाथ उसके टिट्स पे थे। जोर से पिंच कराती मैंने उसकी बात का जवाब दिया ,

" अरे जा के अपनी छिनार बहना से पूछना, वो भी तो एक साथ तीन तीन बुलाती है चढ़ाती है। "

" अरे , एक बुर में, एक गांड में और एक मुंह में " चमेली भाभी ने बात का खुलासा किया।

" अरे लाला ,कभी तुमने नंबर लगाया की नहीं , मीता के साथ। पूरे मोहल्ले में बांटती है और मेरा देवर ६१ -६२ करता है। " नीरा भाभी क्यों पीछे रहती और उसकी पैट की ओर दिखाकर मुझे इशारा किया।

फिर क्या था , नइकी भौजी थी मैं। मेरा हक़ था।

झुक के पहले तो मैंने पैंट की बेल्ट निकाली , फिर बड़े आराम से ,बटन खोली ,उसके उभरे बल्ज को रंग लगे हाथों से रगड़ा और फिर पल

भर में पैंट नीचे।

चमेली भाभी ने पैंट उठा के वहीँ फ़ेंक दी , जहाँ कुछ देर पहले रवी ने उनकी साडी फेंकी थी, सीधे छत पे।

बिचारा मेरा देवर , अब सिर्फ एक छोटी सी चड्ढी में था और तम्बू पूरा तना हुआ।

नीरा भाभी मेरी जिठानी पे भी अब फगुनाहट सवार हो गयी थी। हाथों में उन्होंने लाल रंग मला और सीधे , फ्रेंची फाड़ते बल्ज पे ही रगड़ने मसलने लगी।

मैं और चमेली , जो पैर अब तक रंगो से बचे हुए थे पैंट के कवच में , उन्हें लाल पीला करने में जुट गयी।

इतना तो मैंने मायके से सीख के आयी ही थी की अगर होली के दिन देवर का एक इंच भी बिना रंगे बच जाय , तो फिर देवर भाभी की होली नहीं।

चमेली भाभी रवी के सामने कड़ी हो के जोर से उन्होंने उसे अपनी अंकवार में भर लिया और लगी अपनी बड़ी बड़ी चूंचियों का रंग देवर के सीने पे पोतने।

वही रंग जो कुछ देर पहले रवी ने उनके गद्दर जोबन पे रगड़ा मसला था।

चमेली भाभी के हाथ अब रवि के छोटे छोटे लेकिन खूब कड़े मस्त चूतड़ों पे था और उन्हें जोर जोर से भींच रहा था , दबोच रहा था। और जैसे ये काफी ना हो , उन्होंने अपने गीले पेटीकोट से झांकती , चुन्मुनिया को भी रवी के चड्ढी फाड़ते तन्नाये लिंग पे रगड़ना शुरू कर दिया।

मैं क्यों पीछे रहती। मैंने उसे पीछे से दबोचा। कुछ देर तो उस के छोटे छोटे टिट्स को तंग किया , फिर देवर को दिखा के , हाथ में बार्निश लगायी और दोनों हाथ सीधे चड्ढी के अंदर , और' उसे 'मैंने गपच लिया।

खूब बड़ा , ६ इंच से ज्यादा ही होगा , लेकिन ख़ास बात थी उसकी मोटाइ और कड़ाई।

थोड़ी देर मुठियाने के बाद मैंने एक झटके से सुपाड़ा खोल दिया और अंगूठे से सुपाड़े को मसलते , कान में बोला

" क्यों देवर जी ये हथियार कभी तेरी बहन , मीता की प्रेम गली में गया है। चौबीसो घंटे चुदवासी रहती है वो। "

लेकिन मेरी बात चमेली भाभी और नीरा भाभी ने एक साथ काटी।

" अरे मीता की फिकर मत करो , उस पे तो हमारे भाई चढ़ेंगे दिन रात। सफेद दरिया बहेगी उस की बिल से। ये तो इन्होने हमारी सास के भोसड़े के लिए

सम्हाल कर रखा है। "

और उसी के साथ अबकी चमेली भाभी ने दो उंगली पूरी जड़ तक एक झटके में उसके पिछवाड़े पेल दी और आशीष भी दिया।

" तेरी इस मस्त गांड को खूब मोटे मोटे लंड मिलें , अगली होली तक चुदवा चुदवा कर हमारी सास के भोसड़े की तरह हो जाय , जिसमें से तुम और मीता निकले हो। "

रवी सिसक रहा था , हलके से चीख रहा था कुछ दर्द से कुछ मजे से।

वार्निश के बाद अब पे कड़ाही की कालिख मल रही थी।

" देवर जी ये रंग सिर्फ एक तरीके से छूट सकता है , घर लौट के मेरी कुँवारी ननद से खूब चुसवाना इसको "

" बाकी का चीर हरण तो कर दो " नीरा भाभी दर्शन के लिए बेताब हो रही थीं।

मैं थी नयकी भौजी , इसलिए हक़ मेरा ही था।

अपने गदराये जोबन उसकी पीठ पे रगड़ते हुए मैंने चिढ़ाया , "मार दिया जाय की छोड़ दिया जाय , बोला साले भडुवे क्या सलूक किया जाय."

और मेरे उँगलियों ने एक झटके में चड्ढी खिंच के नीचे।

चमेली भाभी ने उसे भी वहीँ पहुंचा दिया , जहाँ उनकी पैंट थी , छत पे।

स्प्रिंग वाले चाक़ू की तरह वो बाहर निकला , एकदम खड़ा मोटा , और पहाड़ी आलू ऐसा सुपाड़ा मैंने पहले ही खोल दिया था।

लाल , नीला, वार्निश , कालिख रंगो से पुता।

मेरा तो मन ललच रहा था अंदर लेने के लिए। मेरी रामप्यारी एकदम गीली हो गयी थी उसे देख के , लेकिन सबके सामने।

नीरा भाभी ने रवी को छेड़ा ,

" क्यों देवर जी तुम्हे ऐसा ही विदा कर दें "
 
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